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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

मराठा ब्रह्मवर्त के बाड़े में राजा बना बैठा है। अतः आंग्ल सेना को फिर से ब्रह्मवर्त पर जोर का आक्रमण करना आवश्यक हो गया। इस लड़ाई में पराजय होते ही तात्या गंगा नदी उतरकर सेना के साथ फतेहपुर आकर नाना से मिल गया। थोड़े ही दिनों में ग्वालियर की सेना में विद्रोह कराने की योजना नाना के दरबार में बनने लगी। इस काम पर तात्या के सिवाए किसकी नियुक्ति इष्टतर थी? इस विलक्षण बुद्धि ने आज पूरी-की-पूरी रेजिमेंट चुपचाप पोली करके विद्रोह कराने जाए। तात्या टोपे तुरंत गुप्त रीति से ग्वालियर गए और वहां से अपने साथ ग्वालियर सेना की मुरार छावनी की पैदल, घुड़सवार एवं तोपखाना आदि लेकर तुरंत कालपी वापस लौटे। यह सुनते ही नाना ने कालपी की इस सारी सेना की व्यवस्था करने का अधिकार देकर बाला साहब को उधर भेज दिया। कालपी शहर विद्रोहियों के लिए लश्करी दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। कानपुर और कालपी के बीच यमुना का प्रवाह होने से अंग्रेजी सेना से रक्षा करनेवाली वह प्राकृतिक खंदक ही थी, इसलिए कालपी शहर में अपना डेरा बनाए रखकर वहां की सुरक्षा के लिए कुछ सेना छोड़ शेष सेना के साथ तात्या टोपे कानपुर की अंग्रेजी सेना को शह देने कर विचार करने लगे। सर कोलिन जब अंग्रेजी सेना के साथ लखनऊ को मुक्त कराने कानपुर से चला तब उसने कानपुर की सुरक्षा के लिए यूरोप की लड़ाइयों में ख्यातिप्राप्त जनरल विंडहम को सेना के साथ वहां रखा था। उस यूरोपियन सेना को नई कुमुक आने के पहले और लखनऊ की ओर जारी झगड़ा समाप्त होने के पूर्व कानपुर शहर पर संभव हुआ तो एक बार चढ़ाई कर देखें-यह नाना का विचार बना और उसक कार्य के लिए तात्या टोपे के साथ ग्वालियर से आई सेना भी भेजी गई। इस सेना का मुख्य सेनापति तात्या टोपे को ही बनाया गया। इस तरह कल तक नाना के दरबार का जो ब्राह्मण मुंशी था, वह तात्या टोपे आज एक सेना का मुख्य सेनापति हो गया। और यूरोप के रणांगण में सैनिक अनुभव लेते हुए जिसका जीवन गया उस जनरल विंडहम पर वह हमला करने का रहा है। और उसके आए हुए असंगठित लश्करी सिपाही संस्थापित विजयी आंग्ल सेना के सामने खड़े हैं। यह असमान लड़ाई कैसे होती है-स्वतंत्रता की चेतना, दूसरे सारे लाभ विपक्ष की ओर होते हुए भी कैसे लड़ती है! अर्थात् साधन आदि के अभाव में भी इतना लड़ती है तो जब उसके साथ अनुशासन, संगठन आदि के लाभ जुड़ जाएं तो कितना लड़ सकती है-यह इसकी जीवंत शिक्षा मिल जाने जैसा होगा। ग्वालियर की विद्रोही सेना के साथ तात्या टोपे 9 नवंबर को कालपी पहुंच गए। कानपुर से कालपी छियालीस मील दूर है। वहां से कानपुर की अंग्रेजी सेना की पूरी जानकारी लेकर तात्या ने कालपी छोड़ यमुना नदी उतरकर दोआब में प्रवेश किया। जालौन में सारा खजाना और काठ-कबाड़ रखकर उसकी सुरक्षा के लिए तीन हजार 1857 का स्वातंत्र्य समर - 308

सैनिक, बीस तोपें छोड़ यमुना उतरते ही वे तुरंत कानपुर पर हमला करने नहीं गए। लखनऊ में विद्रोहियों से सर कोलिन की लड़ाई शुरू होने और यह ज्ञात हो जाने कर कि सर कोलिन वहां पूरी तरह फंस गया है, तात्या कानपुर के आसपास मंडराते रहे। लखनऊ में सर कोलिन अब कुछ दिन विद्रोहियों से उलझा रहेगा, यह दिखते ही तात्या शिवराजपुर तक चढ़ आए। रास्ते में सैनिक महत्त्व के स्थानों पर उन्होंने सेना के थान बनाए। नवंबर की तारीख को इतनी व्यवस्था करके तात्या ने अंग्रेजी रसद का मुख्य रास्ता बंद कर दिया। तात्या के इन दांव-पेचों का अर्थ विंडहम की नजर में आए बिना न रहा। उसने कलकत्ता से आ रही गोरी सेना के प्रवाह को कानपुर में ही रोके रखा। कार्थ्यू के अधीन सेना देकर उसे कालपी के पास रखा और तात्या सर कोलिन की पीठ पर मार करने जाता है या कानपुर आता है, इसकी राह देखता रहा। परंतु विंडहम बैठकर राह देखनेवाला योद्धा नहीं था। उसका बहादुर स्वभाव उसे युद्ध हेतु निरंतर आगे ढकेल रहा था। अंग्रेजों की हिंदुस्थान ही नहीं, पूरे एशिया की सेना के विषय में जो एक सैनिक धारणा थी उसके मन पर उसकी छाप भी थी। यह धारण कि 'एशियाटिक लोगों को हराने की उत्तम युक्ति है उनपर सीधे हमला कर देना। कोई चाहे जितना सशक्त हो, परंतु किंचित भी पैर पीछे लिया या देर की तो एशियाटिक लोग गर्व से फूल जाते हैं। किंतु कितना भी अशक्त हो, पर पीछे न हटते हुए तेजी से उनपर टूट पड़े तो एशियाटिक लोगों की आंखें कितना चौंधिया जाती हैं औ वे घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं।' इस सैन्य धारणा का उपयोग आज तक अंग्रेजों ने कितनी ही बार किया और अधिकतर वे सफल रहे। और चूंकि एशियाटिक लोगों से लड़ते हुए वास्तविक बल से अधिक उसके दिखावे में सफलता की संभावना अधिक रहती है, इसलिए युद्ध में गोरी मुट्ठी भर सेना हो तो भी वह सीधे तीर की तरह एशियाटिक लोगों पर हमला करती रहे और उनका आक्रमण होने के पहले ही आप उनपर आक्रमण कर हमारी शक्ति अधिक है, ऐसे उनका डराते रहें। यह आंग्ल युद्ध शस्त्र का एक प्रयोगसिद्ध नियम ही बन गया था। जो भी अंग्रेजी सोल्जर यहां आता, वह यह नियम कंठस्थ करता और जो अंग्रेजी इतिहासकार ग्रंथ लिखता वह इस नियम का सिद्धांत बार-बार लिखता था। ऐसी शिक्षा पाया जनरल विंडहम तात्या टोपे की हलचलों को मन माफिक चलने देकर राह देखता बैठनेवाला नहीं था। उसने कानपुर शहर से निकल कालपी के बाजू की नहर के पुल तक हमला किया। अंग्रेजी सेना की गतिविधि देखकर विद्रोहियों की सेना ने भी हलचल प्रारंभ की। उनकी सेना अकबरपुर से सुखंडी आ गई और सुखंडी से 25 नवंबर को पांडु नदी तक आकर भिड़ गई। अपने इतने पास तक साहसी शत्रु के आ जाने की सूचना मिलने से विंडहम की सेना में लड़ाई की तैयारी शुरू हो गई और एशियाटिक लोगों को हराने की रामबाण युक्ति 26 नवंबर को अपनाने की योजना बनी। विद्रोहियों पर स्वयं होकर ही सीधे आक्रमण कर पहले उनका सामना पीटा जाए और फिर ऐसे अकेले-अकेले पकड़ अन्य हिस्सों को भी नष्ट कर दिया जाए, यह सकंल्प कर विंडहम तारीख 26 को 1857 का स्वातंत्र्य समर – 309

प्रातः ही शत्रु पर पिल पड़ा। विद्रोही एक घनी झाड़ी में खड़े थे। उन्होंने अंग्रेजी सेना पर तोपों की मार शुरू की। बहुत देर तक मारामारी चलने के बाद अंग्रेजों ने तीन तोपें जीत लीं। विंडहम कहने लगा, मेरे सीधे हमले से एशियाटिक लोग और एक बार पराजित हुए और गोरी सेना फिर एक बार विजयी होते हुए भी तू पीछे-पीछे क्यों हटती जा रही है? या फिर आज तक युद्ध में पीछे हटने को ही तू पीछे-पीछे क्यों हटती जा रही है? या फिर आज तक युद्ध में पीछे हटने को ही तू विजय कहती रही है? कैसी विजय और कैसा रण? विंडहम की गोरी सेना तात्या टोपे के घुड़सवारों के दबाव में कानपुर तक पीछे हट गई। उसकी पीठ पर चढ़े जा रहे घुड़सवारों के दबाव में कानपुर तक पीछे हट गई। उसकी पीठ पर चढ़े जा रहे घुड़सवार न लड़ाई कर रहे थे, न पीछा छोड़ रहे थे। मराठों की सेना की तरह ही वे शत्रु के चारों ओर मंडराते उन्हें पीछे धकेलते और आप आगे घुसते सीधे हमले से हमेशा की तरह न डरते ये एशियाटिक लोग उलटे उसे ही धमकाते आगे गए। मैलसन कहता है-‘'परंतु विद्रोहियों का नेता तात्या टोपे कोई पागल आदमी नहीं था। जनरल विंडहम ने जो आघात किया उससे डरने की बात तो दूर, उलटे अंग्रेज सेनानी का मर्म उस चतुर मराठे की नजर में आया। विंडहम की आंतरिक स्थिति किसी खुली पुस्तक की तरह तात्या टोपे ने पढ़ ली और असल सेनानी की मूल चतुराई से उस स्थिति का पूरा लाभ लेने का निश्चय किया।’'135

दिन भर की लड़ाई के बाद विंडहम को चौबीस घंटे की भी फुरसत न देकर अपनी सेना को तात्या ने उस रात दूसरे दिन प्रातः ही आक्रमण के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। परंतु शिओली और शिवराजपुर की सेना आकर उसके अंग्रेजों के दांए बाजू पर तोपों से गोलीबारी करने के पूर्व आगे न बढ़ते हुए गोलीबारी होते ही अंग्रेजों पर तेजी से टूट पड़ना है, ऐसी उसकी योजना थी। इधर विंडहम ने भी अपनी सेना को प्रातः ही सशस्त्र खड़ा किया, पर प्रातः नौ बजे तक खड़े रहने के बाद भी विद्रोहियों के आने का समाचार या उनकी गतिविधि ज्ञात नहीं हुई, तब अंग्रेजी सेना कलेवा करने अपने-अपने तंबू में चली गई। कोई ग्यारह बजे अंग्रेजी सेना को फिर सशस्त्र होने का आदेश मिला। जनरल विंडहम को सेनापति तात्या टोपे के हेतु का पता नहीं चल पा रहा था। सारी अंग्रेजी सेना में अनिश्चितता का वातावरण था।

इसी समय निश्चितता का भयानक राज शुरू करने के लिए तात्या टोपे की सेना की ओर से अंग्रेजों के दाएं बाजू पर तोप का गोला आकर गिरा। वह गोला गिरने के साथ ही सामने से भी गोलीबारी चालू हो गई। तुरंत विंडहम ने छह तोपों के साथ कार्थ्यू को ब्रह्मवर्त के रास्ते शहर के उस भाग की सुरक्षा करने भेजा। विद्रोहियों की तोपों और अंग्रेजों के बीच के भाग की तोपों की भयंकर लड़ाई शुरू हुई। उसमें अंग्रेजी गोलंदाज जल्दी ही हारने लगे। तात्या ने अपनी सेना का अर्धवृत्त व्यूह बनाकर उसमें अंग्रेजी सेना को सामने और दोनों बाजू से घेरने की योजना बनाई थी। विंडहम ने

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135 मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 167 ।

तात्या के अधवृत्त को तोड़ने का बहुत प्रयास किया। पर तात्या की तोपों ने अंग्रेजों को आगे कदम रखना असंभव कर दिया। आगे कदम बढ़ाना तो दूर, अब मूल जगह पर भी अटल रहना असंभव देख अंग्रेज रण से पीछे हटने लगे। अंग्रेजों का बायां बाजू अपनी तोपें छोड़कर भी पीछे हटा। यह देखते ही उनके दाएं बाजू की सेना ने जोर लगाकर तोपों की रखा की। परंतु अब तो अंग्रेजी सेना के पैर रण से उखड़ गए। वे जैसे-जैसे पीछे हटते दिखे वैसे-वैसे विद्रोहियों का अर्धवृत्त उन्हें पीछे हटाता गया। शाम को छह बजे इस जंगी धकेला-धकेली में अंग्रेजी सेना पूरी तरह हार गई और उसका सेनापति जनरल विंडहम अपनी सेना के साथ अस्त-व्यस्त रीति से भागा। उसके हजारों तंबू, छोलदारियां, बैल, रसद और पोशाक विद्रोहियों के हाथ लगे। इस तरह उस जवां मई मराठे की तलवार को इस दूसरी विजय का मुकुट पहनाया गया। कल की लड़ाई में उसकी अप्रत्यक्ष जीत थी, पर आज तो उसकी प्रत्यक्ष परिपूर्ण विजय हुई। उसने अंग्रेजों के एक उत्तम सेनापति को दिन भर चले भयंकर रण में पराभूत ही नहीं किया, उसका पीछा भी किया। तंबुओं, छोलों के साथ उसकी छावनी गिराई और कानपुर शहर से उसे खदेड़कर उस शहर को जीता। यदि इस सेनापति जैसी ही उसकी सेना भी कर्तव्यनिष्ठ और संगठित होती तो अंग्रेजी इतिहासकार भी कहते हैं कि इस मराठे ने उस दिन जनरल विंडहम की सारी सेना काट डाली होती। इतना बढ़िया दांव तात्या टोपे ने जनरल विंडहम पर लगाया था। और तात्या के इस दांव की गूंज सर कोलिन को लखनऊ में सुनाई दी। जिस समय तात्या कानपुर आया, उसे यह आशा थी कि कोलिन को कम-से-कम एक माह लखनऊ उलझाए रहेगा और तब तक विंडहम के अकेलेपन का सहज ही लाभ लिया जा सकेगा। परंतु उसक यह दांव उसकी ओर से इतना विजयी हुआ, तभी उसको समाचार मिला कि लखनऊ का काम शीघ्र निपटाकर-वहाँ विद्रोहियों अधिक बाधा न होने से सर कोलिन भी कानपुर पर आक्रमण करता आ रहा है। अब गंगा के दोनों बाजुओं से अंग्रेजी सेना तात्या पर चढ़ आयी थी। लखनऊ में विद्रोहियों के ढीलेपन से अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से स्वयं कुश्ती लड़ने का बोझा क्रांतिवीरों के इस सेनानी पर आ पड़ा। फिर भी वह मराठा तारीख 27 को ब्रिदोहियों पर फिर से यथासंभव चढ़ाई करने या कम-से-कम उनकी चढ़ाई न होने देने का निश्चय कर प्रातः से ही लड़ाई चालू की। अंग्रेजों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 311

के दांए और बाएं बाजू पर विद्रोहियों की तोपें और सेना मार करने लगी। कल की तरह आज भी अंग्रेजों को विद्रोहियों ने और विद्रोहियों को अंग्रेजों ने दोपहर बारह बजे तक जहां-का-तहां दबाकर रखा। परंतु कल अंग्रेज जैसे पीछे हटे थे वैसा आज न हटकर वे रण में आगे पैर बढ़ाकर शत्रु पर टूट पड़े। एशियाटिक लोगों पर सीधे हमला किया तो फिर विजय में शंका क्यों हो? विजय में कोई शंका नहीं, पर यह दाईं ओर हाहाकार कौन कर रहा है? ब्रिगेडियर विल्सन मरा। कैप्टन माक्री मरा। कैप्टन मार्फी, मेजर स्टर्लिंग, लेफ्टिनेंट केन, लेफ्टिनेंट रिबन को भी काट मारा। एशियाटिकों में भी तात्या टोपे होता ही है। उस तात्या ने और उसकी सेना ने शाम तक मारामारी कर आगे बढ़ आई अंग्रेजी सेना को उसके कमांडर के साथ पीछे भगाकर इस तीसरे दिन भी यह तीसरी विजय प्राप्त की। कल से अधिक आज अंग्रेजी सेना की हिम्मत पस्त हुई। उसके दोनों भागों को ही रणांगण से भगा दिया। कल आधा शहर लिया था तो आज तात्या ने सारा कानपुर कब्जा लिया और इस तरह इस जवां मर्द मराठे की तलवार पर यह तीसरी विजय का मुकुट दमकने लगा। 136 अंग्रेजी सेना पीछे भाग रही थी, तभी अंग्रेजों का कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन उसकी छावनी में उपस्थित हो गया। उसने अपनी आंखों से अंग्रेजी सेना की हुई गत देखी थी। उसने अपनी आंखों से विद्रोहियों की विजयी सेना कानपुर शहर में घुसते देखी, उसने अपने कान से विद्रोहियों के रणसिंघे व रणताशे और जयनाद कड़कड़ाते सुने। कानपुर की ओर तात्या टोपे क्या गड़बड़ कर रहा है, यह उसके ध्यान में अच्छी तरह आया। सर कोलिन के अंग्रेजों की छावनी में आ पहुंचने की बात जानते ही जिसका डर था वही हो गया, यह तात्या ने समझ लिया। लखनऊ का जोर ढाली पड़ने से सर कोलिन ससैन्य अवध की ओर से कानपुर दौड़ आया। यह अप्रिय सत्य सामने आते ही धीरज न खोकर तात्या ने अवध की ओर का पुल तोड़कर अंग्रेजी सेना को गंगा नदी उतरना असंभव बनाने को पुल पर तोपों की मार शुरू की। पर विद्रोहियों की इन तोपों का रूख समझकर सर कोलिन ने अंग्रेजी तोपों की उलटी मार चालू की और उसकी छाया में 30 नवंबर तक सारी अंग्रेजी सेना अवध से कानपुर शहर के पास आ बैठी। फिर भी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 312 136 इस पराजय का नितांत ही रोचक वर्णन एक अंग्रेज अधिकारी ने इन शब्दों में किया है-"आपको आज के संघर्ष का विवरण पढ़कर आश्चर्य होगा, क्योंकि आपको विदित होगा कि अपने सम्मान चिह्नों, महान् उपाधियों और नितांत प्रसिद्ध शौर्य से मंडित गोरे सैनिकों को पराजय मिली और घृणित एवं तुच्छ भारतीयों ने उनके तंबू और सामग्री ही नहीं, प्रतिष्ठा का भी अपहरण कर लिया था। अब हमारे शत्रुओं को हमें 'पराजित फिरंगी' कहने का अधिकार प्राप्त हो गया। हमारे सैनिक अपने उलट दिए गए तंबुओं, फटे और जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों तथा सामग्री और भागते हुए ऊंटों, हाथियों, अश्वों एवं नौकरों सहित भाग निकले। यह संपूर्ण घटना ही नितांत लज्जाजनक और विषादपूर्ण है।"

  • चार्ल्स बाल कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 190 ।

क्रांतिकारी कानपुर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने उस शहर के पास ही अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से दो-दो हाथ करने का मन बनाया। क्योंकि-“ They had, as their leadr, a man of very great national abilities."137 इस कर्मठ सेनानी ने अपना बायां बाजू कानपुर और गंगा के बीच-अड़चनवाली जगह में, अपना मध्य कानपुर शहर में और अपना दायां बाजू गंगा नहर पर फैला रखा था। उसकी सेना में लश्करी शिखण प्राप्त करीब दस हजार सिपाही थे। उसने दिसंबर की 1 तारीख को अंग्रेजी सेना के कमांडर-इन-चीफ को चैन से नहीं बैठने दिया। दूसरे दिन तो उसी के तंबू पर विद्रोहियों ने यकायक गोलीबारी शुरू कर दी। 4 तारीख को उन्होंने कुछ ज्वालाग्रही नौकाएं अवध के पुल को जलाने के लिए गंगा के प्रवाह में छोड़ दीं। तारीख 5 को उनके तोपखाने ने अंग्रेजों की सारी सेना पर ऐसी गोलीबारी की कि सर कोलिन को अपना डेरा छोड़कर सेना की हलचल और अपना तोपखाना बहुत देर तक बंद करना पड़ा। विद्रोहियों की इस ढीठता से दी गई रण चुनौतियों को आज तक चुप होकर सुनने की बारी जो सर कोलिन पर आई थी वह 4 तारीख के बाद आनी नहीं थी। क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर रास्ते की सारी बाधाएं दूर कर दी थी और इसीलिए प्रत्यक्ष अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर रोज-रोज गोलीबारी की गेंद का खेल खेलनेवाले जिद्दी, ढीठ और उद्दाम विद्रोहियों के पास कोई नौ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में स्वयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उन सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास काली, गोरी कुल पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार और पैंतीस तोपें-ऐसे सब मिलाकर छह हजार लोगों की सज्जित सेना थी। चार्ल्स बाल कहता है-‘‘संख्या पचहत्तर हजार थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।‘‘ सर कोलिन ने विद्रोहियों के दाएं बाजू असुरक्षित जगह पडत्री हुई है, यह देखकर 6 दिसंबर को प्रातः नौ बजे लड़ाई शुरू की। दाईं ओर मुख्य हमला किया जाना है, यह बात छिपाने के लिए पहले बाएं बाजू पर अंग्रेजी तोपें गोला फेंकने लगीं। और इस कारण विद्रोहियो का ध्यान भी उधर ही गया। ग्रेट हेड ने विद्रोहियों के मध्य पर भी एक नकली हमला किया। इस तरह उधर गोलीबारी की भयानक उठा-पटक में वे धरती दहला रहे थे। तभी दाईं ओर छिपते-छिपाते अंग्रेजों ने विद्रोहियों पर बहुत जोर से वास्तविक हमला किया। जो सिख और गोरे लोग तीर की तरह चलते आ रहे थे उन पर ग्वालियर की सेना ने तोपों से भयानक गोलाबारी की। उसी तरह पांडे लोगों की सेना भी बंदूकों से आंग्ल सेना पर आग बरसाने लगी। सिख लोगों के डबल मार्च से दौड़ते ही विद्रोहियों से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 313 137 मैलसन, खंड 2, पृष्ठ 184 ।

उनकी आधे-एक घंटे तक विकट कुश्ती हुई। इतने में पील के लोग तोपें लेकर वहां आ गया तो विद्रोहियों का दायां बाजू हटने लगा। एक बार उसके हटना शुरू करते ही अंग्रेजी सेना को जो जोश आया-मत पूछो! उन्होंने जल्दी ही बाहर की सेना को तितर-बितर कर दिया। उनकी तोपें पकड़ लीं और उनकी सारी छावनी पर भी कब्जा कर लिया। विद्रोहियों के दाएं बाजू पर ऐसी परिपूर्ण विजय सर कोलिन को प्राप्त हुई। परंतु उसकी इच्छा इतने से शांत होनेवाली नहीं थी। उसके मन में दाएं बाजू की ओर कालपी का रास्ता रोककर तात्या को ससैन्य शरण लाने का विचार था, इसलिए उसने ब्रह्मवर्त के रास्ते पर मैंसफील्ड को तत्काल भेज दिया। इस दिन एशियाटिक लोगों के संबंध में पश्चिम का सैनिक सिद्धांत उसके विधि और निषेधात्मक दोनों ही स्वरूपों में वहां प्रकट हुआ। विद्रोहियों के मध्य पर ग्रेट हेड ने जो हल्ला किया था वह इतना कमजोर था कि यदि विद्रोहियों ने उसपर सचमुच जोर का आघात किया होता तो उसकी हवा निकल गई होती और वह दिन निकल गया होता। पर अंग्रेज सीधे हल्ला बोलते आए तो विद्रोही धौंस में आ गए। अघातक पद्धति से सर कोलिन की इच्छा अधूरी रही; क्योंकि तात्या के ससैन्य शरण आने की संभावना घट गई। वह मराठा सेनापति-तात्या टोपे-मैंसफील्ड को डांटते-डपटते अंग्रेजी जाल तोड़कर अपनी तोपों और सेना के साथ पार निकल गया। तात्या को पकड़ना चाहते थे। सर कोलिन, इस मराठी शेर को पकड़ने में तुझे अभी कई खूनी जाल बिछाने होंगे। यद्यपिइ स दिन तात्या टोपे तोपों सहित निकल गया था, फिर भी होप ग्रांट ने हमला किया। 9 दिसंबर को शिवराजपुर के पास तात्या की सेना से उसकी एक भागती भिड़ंत हुई। और उसमें से भी तात्या और सेना भाग गए, फिर भी विद्रोहियों की अधिकतर तोपें अंग्रेजों के हाथ लगीं। इस तरह सर कोलिन ने तारीख 6 से 9 तक इन चार दिनों में विंडहम की पराजय का प्रतिशोध लिया। विद्रोहियों की बत्तीस तोपें जब्त कीं और विद्रोहियों की सांकल तोड़कर कुछ को कालपी की ओर और कुछ को अवध की ओर भाग दिया। इस कठिन विजय के बाद कुछ सरल विजय भी वह क्यों न प्राप्त करे। इसलिए वह ब्रह्मवर्त दौड़ गया। वहां का राजमहल उसने खंडहर बना दिया। वहां की संपत्ति को लूटा और फिर उस विजय पर झंडा लगाने को ब्रह्मवर्त के विशाल मंदिर तोड़-फोड़कर ध्वस्त कर दिए। ब्रह्मवर्त के इसी महल में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का गर्भ संभव हुआ था 1857 का स्वातंत्र्य समर – 314

और ब्रह्मावर्त के इन मंदिरों ने ही इस स्वतंत्रता गर्भ पर आशीर्वचन बरसाए थे। इसी ब्रह्मावर्त में भारतभूमि के देदीप्यमान वीर रत्न नाना, तात्या, बाला साहब, झांसी की 'छबीली' शिशु से युवा हुए थे। रामगढ़ से धकेला गया मराठों का राज जिस दिन यहां अंग्रेजों के रक्त की कीचड़ से पुनः प्रादुर्भूत हुआ, उस दिन इस महल ने और इन देवालयों ने दीपोत्सव किया था। परंतु आज इस दीपोत्सव की आग से ही वे भस्मीभूत हो गए हैं। लेकिन इतिहास, उनकी उस पवित्र भस्म पर एक अश्रु भी मत गिराना। स्वतंत्रता के तेजस्वी गर्भ को जन्म देते समय उस उदात्त प्रसव वेदना से जो राज मंदिर और देव मंदिर मरते हैं उनकी मृत्यु गुलामों के झुंड पैदा करनेवाले राज मंदिरों और देव मंदिरों के अस्तित्व से हजार गुना अधिक चैतन्यकारी है! चिता की अग्नि के उपयोग में आने की अपेक्षा यज्ञ की हवि के उपयोग में लिये जानेवाला कष्ट हजार गुना अधिक चैतन्यदायी होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 315

चतुर्थ भाग: भस्म व अमृत (कुँवर सिंह, अन्तिम युद्ध व संदेश)

प्रकरण-7 लखनऊ का पतन तात्या टोपे ने कानपुर की ओर जो भयंकर गड़बड़ मचाई थी उसको इस तरह बांध`दने के बाद सर कोलिन ने विद्रोही प्रदेश को फिर से जीत लेने के लिए कमर कसी। दिल्ली जीत लेने के बाद साटन अलीगढ़ तक के निचले प्रदेश में शांति स्थापित करता आया था, इसलिए कानपुर से ऊपर अलीगढ़ तक प्रदेश में शांति स्थापित करने का वालपोल को कालपी के रास्ते भेजा गया। वालपोल कानपुर से ऊपर चढ़ते और सीटन अलीगढ़ से नीचे उतरते हुए मैनपुरी में मिले और ऐसा नक्शा अंग्रेजी सेना के लिए बना कि दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा पूरी तरह पुनर्जित हो और यमुना तीर से इसके सेना जाते-आते दोआब के विद्रोही हटते-हटते फतेहगढ़ के पास इकट्ठा होने लगेंगे, यह स्पष्ट ही था और इस प्रकार अंत में वालपोल, सीटन और कोलिन अपने-अपने अभियान पूरे कर फतेहगढ़ में मिलेंगे, यह सहज ही होने वाला था। सन् 1857 के इस आगामी वर्ष में सामान्य रूप से यह कार्य पूरा करने की अंग्रेजी योजना थी। इस नक्शे के अनुसार वालपोल तोपखाने सहित सर्वांगपूर्ण गोरी सेना लेकर कानपुर से 18 दिसंबर को कालपी के रास्ते ऊपर चला। रास्ते में विद्रोहियों की बिखरी सेना से छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ते विद्रोहियों को आश्रह देनेवाले गांवों पर अंग्रेजी रीति से कहर बरपाते और उस प्रदेश को फिर से पूरी तरह ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 316

वह इटावा शहर तक चलता आया-यहां से भी वैसे आगे बढ़ गया होता; पर इटावा शहर के सारे विद्रोही वहां से चले जाने के बाद भी उसे वहीं पर सेना के साथ ठहरना पड़ा। क्या कारण था? अंग्रेजों कीये बलवान सेना एकदम ठहरकर रह जाए, ऐसा क्यों है? विद्रोहियों के हजारों पैदल तो चलकर नहीं आ गए? या पांडे की सेना के चपल घुड़सवारों की टोलियां अंग्रेजों पर कहीं हमला तो नहीं कर रहीं? या उनकी गड़गड़ाहट करती तोपें कहीं अंग्रेजों पर जलते अंगारों की वर्षा तो नहीं कर रहीं? इटावा के पास ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था। पैदल या हजारों घुड़सवारों की टोलियां या तोपखाने के अंगार-इनमें से कुछ भी इटावा के पास अंग्रेजों को रोके रखने के लिए नहीं था। केवल तीस-चालीस भारतीय दीवारों में गोलीबारी के लिए छेद हैं। इस छोटे से भवन में खड़े लोगों के हाथों में एक-एक मस्केट है और हृदय में एक-एक जलती ज्योति लिये इनतं ीस-चालीस लोगों ने ही इटावा के दरवाजे में इस अंग्रेजी चतुरंग सेना को रोका हुआ है। उन्होंने इस अंग्रेजी तोपखाने के साथ इटावा तक चली आई अंग्रेजी सेना से रणांगण में 'युद्धं देहि' की माँग प्रस्तुत की है। इटावा के दरवाजे में पैर रखनेवाले को 'युद्धं देहि'। अब इस बित्त भर भवन में दृढ़ता से खड़े रहकर अंग्रेजी घुड़सवार, पैदल, तोपखाना युद्ध भी क्या करे! और थोड़ी राह देखें जिससे पागलपन की यह मांग छोड़कर ये सिरफिरे होश में आएं और अभी भी पलायन की खुली राह पकड़ें। परंतु कितनी ही राह देखी, फिर भी उनका पागलपन सही नहीं हो रहा था। ठीक है-करो युद्ध। केवल उन्हें एक बार तोपखाना दिखाना ही काफी है। यही उनसे युद्ध करके उन्हें पराजित करना हो जाएगा। इसलिए अंग्रेजी सेना ने अपना जबड़ा दिखाकर उन सिरफिरों को डराना चाहा। डर, डर किसे? जिसने एक बार दिव्य स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता-लक्ष्मी के चैतन्य से सम्मोहित होकर मृत्यु से ही प्रेम किया, मृत्यु का भय छोड़ा, मृत्यु के लिए जो उतावला हो गया-उसे इस विश्व में कौन डरा सकता है? जो जय के लिए लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! जो जय के लिए लड़ता है वह डरता है, जो कीर्ति के लिए लड़ता है वह डरता है, पर जो मृत्यु के लिए ही लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! पृथ्वी के सारे अंगारे और आकाश की सारी बिजलियां एक साथ आकर उसपर गिरें तो भी जो अपनी प्रिय वस्तु प्राप्त करने के लिए अति तीव्र गति से दौड़ रहा है उसका क्या बिगड़ेगा? जिसने केवल 'मृत्यु' की आशा पकड़ी उसे विश्व में निराशा कैसे शेष रहे? प्रिया की ओर प्रियतम जिस तरह दौड़ता जाता है वैसे ही वे मृत्यु के लिए दौड़े जाते हैं-ऐसे इन इटावा के देशवीरों को भय कैसा? और वह दिखाए कौन? और इसलिए उन्होंने पलायन के खुले मार्ग छोड़ दिए। उन्होंने विजय की कल्पना भी नहीं की। अंग्रेजों की चतुरंग सेना को धिक्कारते हुए ये मुट्ठी भर लोग उस भवन से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 317

‘युद्धं देहि’ की गर्जना करने लगे। दिल्ली से जो डरी नहीं, कानपुर के रण से डरकर जो रुकी नहीं-वह अंग्रेजी सेना इस बित्ता भर भवन के पास मानो ठोकर खाकर रुक गई। मैलसन लिखता है-"संख्या से मुट्ठी भर, केवल मस्कट ही पास में, परंतु निराशा के अवसान से अधिक युद्ध का उत्साह उनमें भरा हुआ था। अपने ध्येय के लिए आत्मार्पण करने को वे मृत्यु की लालसा कर रहे थे। वालपोल ने उस स्थान का निरीक्षण किया। कोई सेना वहां रुकी रहे ऐसा उसमें कुछ नहीं था। उसे हमला कर जीतना बहुत आसान था। परंतु उनपर हमला करने का अर्थ कितने ही मनुष्यों की बलि देनी पड़ेगी। इसलिए युक्तियां खोजी जा रही थी। उन सबमें विफलता दिखने पर चारा सुलगाकर उन्हें अंदर ही जला डालने की बात भी सोची गई। परंतु बेकार। उन दीवारों के छेदों में से उन पक्के योद्धाओं ने हमला करनेवालों पर ऐसी निरंतर अचूक मार की कि तीन घंटे देने का निर्णय किया गया। इंजीनियर लोगों ने सुरंग खोदी और उसे बत्ती दे दी। सुरंग से वह पूरा जीवन आकाश में उछला और फिर नीचे गिरा। उसके उछलने और गिरने में उन देशवीरों को वह शहादत का सम्मान मिल गया, जिसकी उन्हें अति उत्कट अभिलाषा थी। वे सारे उसी स्थान पर मर गए। उस दिन से कैसे मरा जाए? इस विषय पर इटावा की यह पवित्र समाधि दिन-रात भयंकर मूक व्याख्यान देती रहती है। इटावा! शूर इटावा!! थर्मापिल के पहाड़ में, इटली के ब्रेशा के किले में, नीदरलैंड के ही रूटर के शरीर में तुझसे अधिक तेजोमय क्या होगा? इटावा! शूर इटावा!! इटावा से वालपोल आ रहा है और सीटन भी अलीगढ़, कासगंज, मैनपुरी आदि स्थानों पर विद्रोहियों की फुटकर सेना को पीटते नीचे उतर रहा था। इन दोनों सेनाओं की भेंट 3 जनवरी, 1857 को मैनपुरी में हुई। पहले के कार्यक्रम के अनुसार दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा अंग्रेजी सेना ने दिल्ली, मेरठ से लेकर इलाहाबाद तक वापस जीत लिया। इधर गंगा किनारे से चढ़ते हुए फतेहगढ़ के नवाब को दंडित कर और दोआब के विद्रोहियों का वह अंतिम आश्रय तोड़-फोड़कर दोआब का सारा प्रदेश शत्रु-विहीन करने कानपुर से सर कोलिन भी फतेहगढ़ की ओर बढ़ रहा था। ऐसे दोनों ओर से ऊपर बढ़ रही अंग्रेजी सेना ने अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी आदि स्थानों से सारे-के-सारे विद्रोहियों को भगाकर फतेहगढ़ में बंद कर दिया। फतेहगढ़ में फर्रूखाबाद के नवाब ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था, यह पहले कहा ह गया है। उस नवाब की सेना से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ की बहुत बार छीना-झपटी हुई। फतेहगढ़ में दिल्ली और कानपुर से पराजित सिपाहियों की संख्या ही अधिक होने से वे लड़ाई शुरू होते ही मृत्यु के डर से भाग जाते। परंतु वह मृत्यु क्या इस अपमान से टलनेवाली थी? सो भी नहीं। वे भागते और अंग्रेज उनका पीछा करते। कभी छह सौ, कभी सात सौ, कभी-कभी हजार तक लोगों को काट डालते। यह इन भगोड़ों का मराना और वह उस इटावा का मरना! जमीन-आसमान का अंतर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 318

फतेहगढ़ में नाना का एक सच्चा मददगार नादिर खान था। उसे फांसी पर लटकाने के लिए सबके सामने से ले जाया गया। फांसी पर चढ़ते हुए उसने लोगों को अंतिम उपदेश में कहा, "तुम सभी देशवासियों! अपनी तलवारें म्यान से निकालकर अंग्रेजों की सत्ता को निर्मूल कर देने के लिए आगे बढ़ो।" इस पराभव का परिणाम फर्रूखाबाद के नवाब को जल्दी ही भुगतना पड़ा। उसकी राजधानी, किले, युद्ध सामग्री सब अंग्रेजों के हाथ लगी और बचे-खुचे विद्रोही उसके साथ रुहेलखंड में गंगा पार भगा दिए गए। 4 जनवरी को जब सर कोलिन फतेहगढ़ में विजयी होकर घुसा, उस समय सारा दोआब और बनारस से ऊपर मेरठ तक सारा भूप्रदेश पूरी तरह अंग्रेजी सेना के अधीन हो गया था। तब यह प्रश्न खड़ा हो गया कि दोआब की विजय के बाद अंग्रेजी सेना का कार्यक्रम क्या हो? दोआब के विद्रोह की ज्वालाएं ठंडी हो जाने से अन्य प्रदेशों के विद्रोह अपने आप ही शांत हो जाएंगे, यह अंग्रेज सरकार को कुछ समय पहले तक जो आशा थी वह अब पूर्ण रूप से विफल हो गई थी। दिल्ली गिरते ही आठ निद के अंदर ब्रिदोह राख हो जाएगा-ऐसी भविष्यवाणी बड़े-बड़े राजकरण कुशल लोगों ने की थी। परंतु वास्तव में दिल्ली पतन से विद्रोह राख तो नहीं हुआ, भविष्य कथन ही राख हो गया। क्योंकि दिल्ली में रुका पड़ा सेना समूह उस शहर के गिरते ही किसी उतमत्त मेघ जैसा गरजते हुए चारों ओर फैल गया-बख्तार खान के अधीन रोहिला सेना, वीरसिंह के नेतृत्व में नीमच की सेना और अपने-अपने सूबदारों के नेतृत्व में अन्य हारी हुई सेनाएं अंग्रेजों की शरण जाना छोड़ दिल्ली गिरते ही अपमान में क्रोध में आगबबूला होकर दिल्ली में चूका बदला कहीं दूसरी ओर लेने निकल पड़ीं। 138 विद्रोहियों को अब हारने की चिंता नहीं थी। विजय की आशा का पहला जोश ठंडा पड़ गया था। अब उनके सीने में निश्चय की परिपक्वता आ गई थी। चाहे कुछ भी हो, अंग्रेजों से लड़ते रहने के सिवाए कोई दूसरा विचार उन्होंने अपने पास नहीं आने दिया। या तो फिरंगी मरें या स्वयं मरें। इन दो में से जब तक एक पूरी तरह समाप्त नहीं होता तब तक शस्त्र नीचे नहीं रखने का उनका स्वाभिमानी निश्चय हो गया था । वे आपस में लड़ रहे थे। उनमें से कुछ लोभवश अनियंत्रित व्यवहार कर रहे थे। कोई-कोई मृत्यु के भय से कभी-कभी भाग रहे थे । पर अंग्रेजों से लड़ाई छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार नहीं था। और या तो फिरंगी या वे स्वयं-किसी एक का पूरा नाश होने तक तलवार नहीं रखने का संकल्प हर विद्रोही के भिंचे दांत और तनी हुई। भृकुटी पर लिखा हुआ यदि स्पष्टता से दिखाई देता था तो वह दोआब की पराजय के बाद। इस समय लड़ाई में पकड़कर फांसी चढ़ाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 319 138 एक बार दिल्ली में ऐसी अफवाह फैली कि श्रीमंत नाना साहब स्वयं दिल्ली पर हमला करके बादशाह को मुक्त कर ले जाने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह की कैद के मुख्य अधिकारियों को कड़े आदेश दिए कि-'सचमुच नाना की ऐसी कोई गड़बड़ शुरू हो जाए तो वे बादशाह को गोली मार दें।"-चार्ल्स बाल, खंड 2, पृष्ठ 94

अंग्रेज अधिकारियों द्वारा उन विद्रोही सिपाहियों से इस युद्ध के विषय में किए गए प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा, “फिरंगियों को मारना ही धर्माज्ञा है! और इसका अंत? सारे फिरंगियों का नाश और सारे सिपाहियों का नाश! आगे जो प्रभु की इच्छा।”¹³⁹ दिल्ली हार जाने के विद्रोहियों की स्वतंत्रता की चेतना घटने की जगह अधिकारियों सुलगती गई और दिल्ली का प्रतिशोध लेने वे लखनऊ और बरेली–इन शहरों की ओर लड़ते निकले। क्योंकि दोआब जीतने के बाद रूहेलखंड और अवध, ये दो प्रदेश अभी भी विद्रोहियों के कब्जे में थे और वहां उनके राजसिंहासन क्रियाशील थे। इसलिए अंग्रेजी सेना का मुख्य प्रश्न इन दोनों प्रदेशों को जीतने का था। इस प्रश्न का उत्तर सर कोलिन ने यह दिया कि पहले रूहेलखंड जीता जाए और फिर लखनऊ का समाचार लिया जाए। लॉर्ड केनिंग का आग्रह यह था कि पहले लखनऊ का बड़ा केंद्र ध्वस्त किया जाए। जिससे विद्रोहियों के दूसरे छोटे-छोटे शहर अपने आप शरण में आ जाएंगे। लॉर्ड केनिंग के आदेशों के अनुसार चलना बाध्य होने के कारण कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन ने पहले लखनऊ पतन करने का निश्चय पक्का किया। फतेहगढ़ में सीटन एवं वालपोल और कोलिन की पिछली योजनानुसार इकट्ठी हुई सेना की संख्या कुल दस-ग्यारह हजार तक थी। दोआब में मुख्य स्थानों पर संरक्षण के लिए थोड़ी-थोड़ी अंग्रेजी सेना रखकर और आगरा से आई नई कुमुक के साथ सर कोलिन कानपुर से आई हुई विशाल सेना लेकर लखनऊ की ओर चल पड़ा। इस समय की अंग्रेजी सेना का वर्णन अंग्रेजी ग्रंथकार इस तरह करते हैं-‘उन्नाव और बुन्नी की बीच विशाल रेतीले मैदान में उस समय जो अंग्रेजी सेना उतरी थी वैसी अंग्रेजी सेना हिंदुस्थान के मैदान में पहले कदाचित् ही जमा हुई होगी। इंजीनियर, तोपखाना, घोड़े, पैदल, रसद की गाड़ियां, सेवल लोग—यह अपूर्व अंग्रेजी सेना सर्वांग सज्जित थी। उसमें सत्रह बटालियन पैदल थीं, जिनमें पंद्रह गोरी थीं। अट्ठाईस स्क्वाड्रन घुड़सवारों की थी, जिनमें चार गोरी रेजिमेंट थीं। चौवन हलकी तोपें और अस्सी भरी तोपें थीं। उन्मत्त अवध को पदनत करने के लिए फरवरी की 23 तारीख को कानपुर छोड़कर अपनी इस सबल सेना के साथ सर कोलिन कैंपबेल फिर से एक बार गंगा के पार उतरने लगा। अवध को पदनत करने के लिए, हे गां! यह कितनी आंग्ल सेना तुम्हारे किनारे उतरी है? और हे मानिनी अवग्ध! अब इस सेना से डरकर तू पदनत होने वाली है या नहीं? सर कोलिन रास्ते के हिंदू मंदिरों को बारूद से उड़ाते हुए आगे आ रहा है, इसकी पूरी जानकारी अवध शहर को थी। परंतु अपने को पदनत करने के लिए अंग्रेजी सेना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 320 ¹³⁹ चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 242 ।

गंगा पार हो रही है, यह उस मानिनी अवध को विशेष बुरा नहीं लग रहा था। उसे जो दुःख था, जिस दिशा की ओर देखकर वह जार-जार आंसू बहाने लगी थी और पराजय की मृत्यु की छाया उसके अभिमानी चेहरे पर जिधर से पड़ रही थी, वहां से कोई अंग्रेजी सेना नहीं चली आ रही थी। वहां से तो जंगबहादुर की नेपाली सेना आक्रमण करती आ रही थी। अंग्रेजी सेना को अपने पर आक्रमण के लिए आते देख दुःखी हो-अवध ऐसी कायर होती तो उसने रणक्षेत्र में यह भैरव रूप धारण ही न किया होता। अंग्रेजी सत्ता को केश पकड़कर पीटते हुए जिस दिन अवध ने अपने घर से भगाया उसी दिन उसे साफ मालूम था कि उस अंग्रेजी सत्ता के समर्थन में कोई और अंग्रेजी सेना उसपर आक्रमण करेगी। और उस आगामी रण के लिए वह अपनी हजार भुजाओं से सशस्त्र होकर रण में उतरी थी। परंतु अवध को जो अब तक ज्ञात नहीं था कि मेरे शत्रु अंग्रेज मुझपर तलवार चलाएंगे, परंतु उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके मित्र, उसके सहोदर भी उसपद कुल्हाड़ी से वार करेंगे। वह अंग्रेजों से कुश्ती लड़ने को तो तैयार थी, परंतु हिंदुस्थान के एक स्वकीय से भी हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए जूझना पड़ेगा, यह उसे ज्ञात नहीं था। इस उदाहरण का आविष्कार करने के लिए जब जंगबहादुर अपनी नेपाली सेना सहित उसपर आ क्रमण करने आया तब ऐन समय पर विश्वास के कारण स्वजन परित्यक्त अवध जंगबहादुर की ओर देख-देखकर जार-जार आसूं बहाने लगी। क्योंकि दोआब की विशाल अंग्रेजी सेना इकट्ठी कर उसके साथ जब सर कोलिन गंगा पार करके लखनऊ की ओर चलने लगा, उसी समय पूर्व दिशा से अपनी नेपाली सेना सहित जंगबहादुर भी अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए उधर आ रहा था। अंग्रेज, उसके मित्र और हिंदुस्थानी शत्रु! कारतूसों को गाय की चरबी लगानेवाले उसके मित्र और उस चरबी को मुंह लगाने से मना करनेवाले हिंदुस्थानी उसके शत्रु! ऐसा यह अद्वितीय कुलकलंकी जंगबहादुर हिंदुस्थान में युद्ध प्रारंभ हो गया है, यह सुनते ही अंग्रेजों से मिल गया था। सन् 1857 के थोड़े ही पहले वह विलायत गया था और अंग्रेजी ग्रंथकार कहते हैं कि 'उसने इंग्लैंड का वैभव देखा, इसलिए वह विद्रोह में सम्मिलित होने से डरा।' इंग्लैंड का वैभव क्या वास्तव में इतना भारी था? इंग्लैंड का वैभव जैसे जंगबहादुर ने प्रत्यक्ष देखा था वैसे ही नाना के अजीमुल्ला खान और सतारा के रंगो बापूजी ने भी देखा था। परंतु उस वैभव का उनपर क्या परिणाम हुआ और कैसे वे उस वैभव के हर चिह्न के पीछे क्रांतियुद्ध के लिए नई शपथ लेते गए, यह इतिहास कह ही रहा है। अतः इंग्लैंड के वैभव में कुछ नया कुछ नहीं था। जो विशेष था वह देखनेवाले के दृष्टिकोण में था। वह आंग्ल वैभव देखकर उनका देशभिमान चेत गया और उन्होंने सोचा कि मेरी मातृभूमि भी स्वतंत्रता के तिलक से मंडित हो जाए तो क्या बहार होगी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 321

देशद्रोही को बेचैनी हुई कि यदि मैं इस वैभव की गुलामी अपनी मां पर लाद दूं तो मुझे दो टुकड़े अधिक मिलेंगे। दो टुकड़े स्वयं को अधिक मिलें, इसलिए अपनी मातृभूमि को गुलाम बनाने को तैयार खड़े जंगबहादुर ने अपनी नेपाली सेना अंग्रेजों को सौंप दी। काठमांडू से तीन हजार गोरखा लोग अवध के पूर्वी भाग-आजमगढ़ और जौनपुर में अगस्त 1857 से आकर रूके हुए थे। उनसे लड़ने को विद्रोहियों का नेता गोरखापुर का मोहम्मद हुसैन तलवार लिये खड़ा था। इस समय दोआब की लड़ाई के कारण अंग्रेजी सेना की बड़ी खींचातानी हो गई थी और इस कारण बेणीमाधव, मोहम्मद हुसैन, रजा इरादत खान आदि योद्धाओं ने बनारस के आसपास का, अवध के पूर्व की ओर का प्रांत पूरी तरह कब्जे में ले लिया था। उस प्रांत में अंग्रेजी सेना के अन्य स्थानों से खाली होने के पहले ही नेपाली सेना ने बड़ी वीरता से विद्रोहियों को अवध की ओर धकेल दिया था। कुछ दिन बाद जंगबहादुर से अंग्रेज सरकार का निश्चित करार हो गया और उस प्रदेश में तीन सेनाएं तैयार की गईं। 23 दिसंबर को स्वयं जंगबहादुर नेपाल से चलकर अंगेजों से आ मिला। कुल मिलाकर नौ हजार गोरखा लोगों की चुनी हुई सेना उसके साथ थी। उस सेना ने अंग्रेजों के फ्रैंक रोक्राफ्ट की सेना के साथ बनारस के उत्तर और अवध के पूर्व का सारा प्रांत जीतने में सफलता प्राप्त की। अंग्रेजों और गोरखों की यह सबल और संगठित सेना लड़ाई के बाद लड़ाई कर उस प्रांत के विद्रोहियों को पीछे-पीछे हटाती हुई फरवरी की 25 फरवरी को अवध में आ घुसी। घाघरा नदी पार कर अंबरपुर में यह अंग्रेजी और नेपाली सेना आ पहुंची। उस रास्ते में एक मजबूत किला ऐसे महत्त्वपूर्ण स्थान पर घड़ी झाड़ियों में खड़ा था कि उसे विद्रोहियों से जीते बिना अंग्रेजी सेना आगे जा ही नहीं सकती थी। इसलिए नेपाली सेना ने उसपर आक्रमण किया। किला लड़ने लगा। उस सर्वांगपूर्ण सेना वे वह किला लड़ने लगा और उस किले को इस तरह लड़ानेवाले क्रांतिवीरों की संख्या कितनी थी। चौंतीस! चौंतीस लोग स्वतंत्रता की स्फूर्ति में मस्त होकर अपने देश के शत्रुओं से वह किला लड़ा रहे थे। नेपाली सेना ने जबरदस्त आक्रमण किया तो उन चौंतीस देशवीरों ने उसका जबरदस्त सामना किया। क्योंकि चौंतीस लोग शत्रु के हजारों सैनिकों से युद्ध करें-ऐसा दिव्य समर इस जड़ पृथ्वी पर किसी भी काल में होना नहीं है। “उन चौंतीसों ने देश की इज्जत और धर्म की रक्षा के लिए वह किला ऐसी वीरता से लड़ाया कि शत्रु के सात योद्धा मारे गए तब भी वह किला लड़ता रहा। और ज बवह चौंतीसवां अपने स्थान से न हटकर धारातीर्थ में गिर गया तब ही वे शत्रु उस किले में जा सके।"140 जैसी दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 322


140 मैलसन कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 227 ।

नहीं लड़ी, जैसा लखनऊ नहीं लड़ा, ऐसा वह अंबरपुर का किला लड़ा। अंबरपुर का किला जीतने के बाद गोरखों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना वहां के प्रदेश जीतते हुए आगे बढ़ी। उसी के पीछे-पीछे जनरल फ्रैंक भी सुलतानपुर के नाजिम मेहंदी हुसैन और उनके कमांडर बंदा हुसैन से बदायूं और सुलतानपुर आदि स्थानों पर लड़ाइयां लड़ता ऊपर चढ़ रहा था। अवध के पूर्वी भाग के इस प्रदेश में विद्रोहियों ने आज तक जो शासन संभाला था उसे उपर्युक्त जनरल फ्रैंक द्वारा हथिया लेने पर उसे फिर से प्राप्त करने लखनऊ की पूर्व रियासत के तोपखाने के प्रसिद्ध अधिकारी मिर्जा गफूर बेग को लखनऊ दरबार ने भेजा। उसकी सेना के सुलतानपुर की जंगी लड़ाई में 23 फरवरी को पराजित हो जाने के बाद जनरल फ्रैंक पूरी तरह सफल हो गया। पर सर कोलिन से मिलने के पूर्व देदार के किले पर उसने घेरा डाला। उस किले के वीर लोगों द्वारा तोपें छिन जाने के बाद भी शत्रु से लड़ाई जारी रखने से अंग्रेजी सेना को लेकर फ्रैंक को पीछे हटना पड़ा। वास्तव में देखा जाए तो फ्रैंक ने इतनी लड़ाइयां जीती थी कि एक आकस्मिक और छोटी पराजय से उसकी कुछ भी हानि होनेवाली नहीं थी। फिर भी उस समय अंग्रेजी अनुशासन और जवाबदेही इतनी कड़ी थी कि फ्रैंक की अनेक जीतों के बाद भी उसकी एक हार का समाचार मिलते ही सर कोलिन ने महत्वपूर्ण पदोन्नति के लिए लिखा उसका नाम काट दिया। इस तरह लखनऊ शहर पर आक्रमण करने को बढ़ रही अलग-अलग सेनाएं एक-दूसरे के एकदम पास आने लगीं। कानपुर से निकली सर कोलिन की प्रचंड सेना उधर पश्चित से बढ़ रही थी तो फ्रैंक और जंगबहादुर की सेना पूर्व की ओर से ऊपर चढ़ रही थी। 11 मार्च के पहले ये सारी सेनाएं इकट्ठा हो गई और उस पापी शहर की गरदन काटने के लिए उनकी तलवारें उतावली हो गई थी। पापी! नहीं! नहीं! केवल अभागा लखनऊ-उसके गले पर ये अपनों और परायों की तलवारें सपासप चलने को उतावली हैं तो फिर उसके प्रतिकार के लिए भी कुछ व्यवस्था हो रही है या नहीं? कानपुर की ओर तात्या क्या गड़बड़ कर रहा है, यह देखने सर कोलिन जब पिछले नवंबर में गया था तब से इस मार्च तक इस लखनऊ की सुरक्षा और उसके शत्रु के विनाश के लिए उसके निरंतर प्रयास चल रहे थे। आज तक कितनी ही बार कानपुर में नाना साहब की बार-बार हार और अखंड समर ने उसका अप्रत्यक्ष संरक्षण किया था। अंग्रेजी सेना लखनऊ की ओर बदला लेने के लिए गंगा पार होने लगती कि नाना कानपुर की ओर उसपर दबाव बनाकर उसे फिर दोआब में खींच लेते। ऐसा उत्तम पेंच नाना ने डाला था, फिर भी लखनऊ उसका वैसा लाभ नहीं ले पाया जैसा लेना चाहिए था। लखनऊ में शान से लहराते स्वतंत्रता के झंडे की रक्षा के लिए राजा से रंक तक हर कोई हथेली पर जान लिये लड़ रहा था। उसमें कितने ही जमींदार और राजा भी थे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 323

लखनऊ के जमींदार केवल अंग्रेजों द्वारा लादी गई लगान पद्धति से असंतुष्ट होकर नहीं उठे थे; वे तो स्वदेश को पापी फिरंगियों के स्पर्श से ही क्रोधित थे। यह केवल मेरा विचार हो ऐसा नहीं है, यह विचार उस समय के गवर्नर जनरल केनिंग का भी था, जो इस उद्धरण से सहज हो जाएगा- “अवध के राजा और जमींदार केवल अपनी नई लगान पद्धति से दुःखी हुए हैं, ऐसा कदाचित् आपको लगेगा। परंतु मेरी दृष्टि से इसमें दूसरी भी एक बात विचार करने के योग्य है। चंदा, वैजा और गोंडा के राजा ने जो कड़वा वैर हमसे पाला है वैसा वैर हमारे किसी भी दूसरे अधीन या मांडलीक ने न पाला होगा। चंदा के राजा का एक भी गांव हमने नहीं लियाः बल्कि हमने उसका लगान भी कम किया था। वैसा के राजा के प्रति भी हमने बहुत उदारता बरती थी। गोंडा के राजा के चार सौ गांवों में से केवल तीन हमने लिये और उसके बदले में दस हजार रूपए लगान कम किया था। “राज्यकर्ताओं में परिवर्तन हो जाने से जितना किसी का न हुआ होगा उतना लाभ नौपारा के युवा राजा का हुआ। अंग्रेजी शासन चालू होते ही हमने उसे एक हजार गांव दिए और सारे उत्तराधिकारियों को दूर कर उसकी मां को हमने उसका अभिभावक नियुक्त किया। परंतु बिलकुल आरंभ से उसकी सेना लखनऊ के कारागार में भेज दिया। “तालुकेदार अशरफ बख्श खान, जिसे पहले के राजा ने बहुत त्रास दिया था उसे हमने उसकी मालगुजारी का पूरा स्वामित्व दे दिया। पर पहले-सा ही वह हमसे गहरा वैर करने लगा। इससे और दूसरे अनेक उदाहरणों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जो राजा और जमींदार हमारे विरूद्ध हुए हैं वे हमारे शासन के कारण व्यक्तिगत हानि से बिलकुल नहीं है।”¹⁴¹ इसीलिए अंग्रेजी इतिहासकार होम्स ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि“जिन राजाओं और जमींदारों ने इस स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ कर उसे लड़ा वे लोग व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा उदात्त ध्येय से प्रेरित हो गए थे। ऐसे कितने ही राजा और जागीरदार थे, जिन्हें सचमुख बुरा लगने के लिए कोई विशेष दुःख का कारण नहीं था, पर वे भी हमारी राज्यसत्ता के कानून के विरूद्ध फड़फड़ा रहे थे। हमारी राजपद्धति ही उन्हें इस चुभने वाले सत्य की स्मृति दिलाती रहती थी कि हम हारे हुए राष्ट्र हैं।” पर इन सबमें प्रमुख वह फैजाबाद का देशभक्त, वीर पुरुष अहमद शाह मौलवी कहां है? क्रांतियुद्ध की जलती ज्योति हाथ में लेकर ज बवह सारे हिंदुस्थान में आग 1857 का स्वातंत्र्य समर – 324 141 1. सर जेम्स आउट्रम के पत्र का लॉर्ड केनिंग द्वारा दिया गया उत्तर। 2. होम्स लिखित- 'सेपॉय वार'।

लगाए जा रहा था तब लखनऊ के अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़कर उसे फांसी का दंड दिया था। उस दंड पर कार्यवाही होने के पूर्व उसे फैजाबाद के कारावास में ले जाया गया और इस विदेशी कारावास की कोठरी में से उठाकर उसे सन् 1857 की आंधी ने स्वराज्य सिंहासन की सीढ़ी पर खड़ा कर दिया। वह देशवीर अहमद शाह मौलवी अपने देश की स्वतंत्रता और अपने धर्म की स्थापना के लिए रणक्षेत्र में रंग गया था। जैसा वह समरांगण में शस्त्रयोद्धा था वैसा ही सभारंण के वाक्योद्धा भी था। सभारंण में अपने वाक् शौर्य से वह हजारों देशबंधुओं को मंत्रबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता था। आलमबाग में चार हजार सेना और तोपों के साथ आउट्रम बैठा था और तात्या टोपे के पेच के कारण सर कोलिन कानपुर में बंधा हुआ था तब लखनऊ इस अवसर पर क्यों न अपने शत्रु को रण से भगा देने के लिए जोर का प्रयास करे, इसलिए मौलवी ने अपने लोगों को उत्तेजित, संगठित और एकीकृत करने के लिए रात-दिन प्रयास किए। अवध की बेगम दरबार में मुख्य राजसत्ताधारी होने से उसके कर्तृत्व से उस लखनऊ शहर में इकट्ठा हजारों भिन्न-भिन्न राजा-महाराजाओ का एकीभवन और संगठित होना जब स्पष्टतया कठिन दिखने लगा, जब अंग्रेजों की मुट्ठी भर सेना को जोरदार हमला कर नष्ट करने के अनंत शुभ प्रसंग लखनऊ की आतंरिक अराजकता और ढील के कारण व्यर्थ गए और जब दिल्ली गिर जाने, कानपुर हारने और फतेहगढ़ हाथ से जाने से उन प्रदेशों के हजारों क्रांतिवीर लखनऊ में आकर अधिक उत्तेजित होने की जगह पहले की अराजकता में अधिक उद्धरता को जोड़ने लगे और अब जबकि विजय से फूले और अगणित सैनिकों से हजार गुना सबल बने अंग्रेजों का अंतिम अनिवार्य हमला निकट आ गया है, हर क्षण ऐसी अति आशंका दिखने लगी, तब इस देशाभिमानी मौलवी ने लखनऊ के दरबार में अपने वाक् तेज से, अपनी बेझिझक करारी टीका से, अपने अप्रतिम कर्तव्य-बल से कितने ही अपनों के हृदय जाग्रत कर दिए। अभी भी एक दिल और अप्रतिहत बल से प्रयास करें तो अंग्रेजों को रणक्षेत्र में पीटना संभव है, यह उसने लखनऊ की राजसभा में आवेश से प्रतिपादित किया; परंतु उसके उस तेज से उत्तेजित न होकर उस राजसभा के कर्तृत्वशून्य और दीपक से डरे लोग और अधिक जलने लगे और कुछ ही दिनों में उस मौलवी को उन्होंने कारागृह में बंद कर दिया। परंतु बेगम से अधिक इस मौलवी का प्रभाव सिपाहियों पर था और उसमें भी दिल्ली की ओर से आई सेना का तो इस मौलवी पर बहुत विश्वास था, इसलिए उसे कारा से तुरंत मुक्त करने के लिए राजदरबार में पूर्ण प्रभाव हुआ और यह आपस के भेदभाव से झगड़ते रहने का अति नाशकारी व्यसन तोड़कर दरवाजे पर थपकी देते बैठे शत्रु का खात्मा करने सब लोग युद्ध के लिए तैयार हो जाएं-यह आवेश उसने फिर से सेना में उत्पन्ना किया। 1857 का स्वातंत्र्य समर — 325

केवल आवेश उत्पन्न कर ही यह योद्धा खाली बैठा नहीं रहा, उसने समय-समय पर सिपाहियों को रणक्षेत्र में जाने को प्रवृत्त किया और जब-जब आलमबाग के अंग्रेजों पर हिंदुस्तानियों ने आक्रमण कि तब-तब सबसे आगे मौलवी की दिव्य मूर्ति झलकती थी। 22 दिसंबर को उसने आलमबाग के अंग्रेजों को धोखे में रख उनकी सेना को पूरी तरह बांधने की एक उत्कृष्ट व्यूह-रचना की थी। स्वयं अपनी सेना के साथ अंग्रेजों को भुलावा देकर कानपुर के रास्ते पर बढ़ लिया और उसने दूसरे सैनिकों से कहा कि हमारे अंग्रेजों की पिछाड़ी पहुंचते ही वे सामने से मार लगाएं। यह बेजोड़ चाल थी। पर 'दूसरे'! यही तो सबकुछ बाधक है। उस एक आत्मा के तेज को प्रत्युत्साह देना तो दूर-कम-से-कम उसका आवश्यक अनुगमन करने का अनुशासन भी दूसरों में नहीं दिखा। हर कोई अपने को सयाना समझता! और रणक्षेत्र में पहली गोली चलते ही सब सामना करना छोड़कर उस ओर पीठ फेरनेवाले। अन्यों के ऐसे भय और अव्यवस्था के कारण मौलवी के स्वयं का काम उत्तम रीति से करने पर भी उस दिन विद्रोही रणांगण में पराजित हुए। फिर भी उनके हतोत्साह को उत्साह का तेज देने के लिए मौलवी और उसके जैसे ही अन्य तेजस्वी नेता अतिशय प्रयास करते रहे। 15 जनवरी को विद्रोहियों को समाचार मिला कि आलमबाग की अंग्रेजी सेना को मदद और रसद पहुंचाने के लिए कानपुर से कुछ अंग्रेज लोग आ रहे हैं। यह वार्त्ता समझते ही वह रसद छीनने के लिए विद्रोहियों में बातचीत चली। पर कोई रास्ता न निकले और न कोई योजना बने। अंत में उन विद्रोहियों के अनिश्चय से चिढ़कर उस अभिजात मौलवी ने सबके सामने शपथ ली कि 'मैं स्वयं यह रसद छीनकर अंग्रेजी शिविर से लखनऊ में प्रवेश करूंगा। ऐसी घोर प्रतिज्ञा कर यह साहसी अपने लोगों के साथ कानपुर के रास्ते पर लुके-छिपे बढ़ गया। परंतु इस हमले का समाचार आउटरम को पहले ही नेटिव दूत से मिल जाने पर उसने मौलवी की सेना पर उलटा हमला करने को अंग्रेजी सेना भेज दी। इस परस्पर हमले का जल्दी ही सामना हुआ। मौलवी ने उस दिन अपने अनुयायियों को वीरश्री चढ़ाने के लिए स्वयं भयंकर युद्ध किया। वह जैसे राजनीति में चमकता था वैसे ही रणनीति में भी चमकने लगा। बेसुध लड़ते-लड़ते इस वीरपुरूष को एक गोली हाथ में लगी और वह नीचे गिरा। इस मौलवी को पकड़ने के लिए अंग्रेजों में स्पर्धा लगी थी, फिर भी विद्रोही उसे डोली में डालकर बड़ी चतुराई से लखनऊ ले आए। मौलवी के घायल हो जाने का सामचार सुनते ही एक विद्रोही-हनुमान नामक शूर ब्राह्मण नेता-ने एक दिन का भी विश्राम न लेकर 17 जनवरी को अंग्रेजों पर हमला किया। प्रातः दस बजे से संध्या तक यह शूर पुरूष रणांगण में लड़ता रहा। पर अंत में उसके अत्यंत घायल होकर गिरते ही विद्रोही रण छोड़कर भागने लगे। इधर दरबार में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 326

इस हार के कारण आपसी शत्रुता बढ़ गई। कुकर्मी सिपाहियों ने लड़ने के पहले ही पैसा मांगा, अग्रिम वेतन मिलने पर भी फिर से वेतन लिये बिना वे लड़ना नहीं चाहते थे। पर ऐसे अंधेर में उस तेजस्वी और कर्तृत्ववान् बेगम ने राज्यव्यवस्था का अनुशासन उत्तम बनाए रखा था और यही उसके असामान्य मनोधैर्य का प्रमाण था। $^{142}$ पराजय की एक के बाद एक कड़ी जुड़ती जा रही थी, तभी बेगम का अर्थमंत्री राजा बालकृष्ण सिंह मर गया। परंतु ऐसी असंख्य आपत्तियों से वह परास्त नहीं हुई। क्योंकि जिसे अंग्रेज का दरवाजे पर खड़े रहना भी मृत्यु से अधिक लज्जाजनक लगता था वह फिर रणक्षेत्र में कूद पड़ता और इस कूदने में उसकी कूद भी सबके आगे रहती-ऐसा वीरपुत्र और कोई न होकर मौलवी अहमद शाह ही था। रणांगण में हुआ असह्य घाव अच्छा होते-न-होते उसने 5 फरवरी को फिर सारी सेना लेकर रण की ओर दौड़ लगाई। मौलवी का सारा श्रम व्यर्थ होकर उस दिन भी विद्रोहियों का फिर से पराभव हो गया। फिर भी मौलवी ने लड़ाई जारी रखी। इस वीर की शूरता से चकित होकर इतिहासकार होम्स अपनी पुस्तक में लिखता है-“यद्यपि बहुसंख्या में विद्रोही डरपोक और हिम्मत हारनेवाले थे, फिर भी उनका नेता अपनी निष्ठा से और कर्तृत्व से उदात्त ध्येय का पीछा करनेवाला और सेना का नेतृत्व स्वीकारने योग्य था। यह नेता अर्थात् अहमदउल्ला-फैजाबाद का मौलवी।” $^{143}$ 60वीं रेजिमेंट के एक सूबेदार ने आठ दिन में अंग्रेजों को भगा देने की प्रतिज्ञा की और उसने भी फिर से हमले किए। एक दिन स्वयं बेगम साहिबा भी सेना के साथ बाहर निकली। परंतु उस अभागे लखनऊ को विजय नहीं मिली। विजय मिले तो कैसे? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 327 $^{142}$ 1. सर डब्ल्यू रसेल ने इस बेगम के संबंध में कहा-“सिपाही सेना का प्रचंड भाग लखनऊ में ही है, ऐसा समझा जाता है; किंतु वे उस वीरता सहित नहीं लड़ेंगे जिस वीरता सहित अवध के रक्षक संग्राम करेंगे, जिन्होंने अपने युवा सम्राट् बिर्जिस कादिर के हितों को अक्षुण्ण रखने के लिए अपने प्रमुखों का अनुगमन किया है। और इनके संबंध में निश्चित रूप से ही यह कहा जा सकता है किवे देशभक्ति के युद्ध में लिप्त हैं, जिसे वे अपने देश और सम्राट् के लिए लड़ रहे हैं। रेजीडेंसी के घेरे में भी सिपाहियों ने खुलकर रणभूमि में ऐसा युद्ध कभी नहीं किया जैसी निर्भीकता सहित जमींदारों और उनके प्रजाजनों ने किया। बेगम ने तो अपनी महान् शक्ति और योग्यता का जो परिचय दिया है, उसने संपूर्ण अवध को ही अपने पुत्र के पक्ष में उठाकर खड़ा कर दिया और सरदार तथा सामंत भी उसके प्रति पूर्णतः निष्ठावान् थे। हम तो उनके पुत्र के वैध अधिकारी हाने में अविश्वास व्यक्त कर सकते हैं; किंतु जमींदार, जो वास्तव में इस प्रश्न पर सही निर्णायक कहे जा सकते है, निस्संकोच ही बिर्जिस कादिर को उत्तराधिकारी स्वीकार करते थे। सरकार इन लोगों से विद्रोहियों जैसा व्यवहार करेगी अथवा संभावित शत्रुओं के समान। बेगम ने हमारे विरूद्ध अखंड युद्ध की घोषणा की है। इन रानियों और बेगमों के शक्तिपूरक चरित्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने रनिवासों और हरमों में प्रचुर मानसिक शक्ति प्राप्त होती थी और वे किसी भी स्थिति में योग्य पग उठाने में समर्थ थीं।” -'रसेल की डायरी', पृष्ठ 275 $^{143}$ 2. होम्स कृत-'सेपॉस वार'।