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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

से सब ओर लज्जा की कालिमा छा गई थी और सबकी यह इच्छा थी कि पेशवा की गद्दी का अंत होना ही है तो वह उसके प्रारंभ जैसा उज्जवल हो। मरना हो तो मारते-मारते मरे। बालाजी विश्वनाथ जिस गद्दी का पहला पेशवा था उस गद्दी का अंतिम पेशवा श्रीमंत नाना साहब था, यह अभिमानपूर्वक इतिहास को कहा जा सके, इसलिए हे राजतेजयुक्त बालक! तू महाराष्ट्र की पेशवाई गद्दी पर चिरकाल विराजमान हो। इसी समय श्री क्षेत्र काशी में मोरोपंत तांबे और उनकी सुशील पत्नी भागीरथी चिमणाजी अप्प साहब पेशवा के आश्रय में रहते थे। इस दंपती को अपना नाम इतिहास में अजर-अमर होनेवाला था, लेकिन हिंदुस्थान के हाथ में दामिनी-सी दमकनेवाली खड्ग जैसी कन्या को जन्म देने का सौभाग्य उसे प्राप्त है, उस समय उस दंपती को यह शायद ही ज्ञात होगा। 19 नवंबर, 1835 को उपर्युक्त दंपती की गोद में महारानी लक्ष्मीबाई साहब ने जन्म पाया। उस शौर्यशालिनी का बचपन का नाम मनुबाई था। इस सुलक्षणी कन्या का जन्म हुए तीन-चार वर्ष बीतते-न-बीतते सारा परिवार काशी छोड़ बाजीराव के उदार आश्रय में ब्रह्मावर्त आ गया और वहां लक्ष्मीबाई और नाना साहब के मेल से रत्न और कांचन का जो संयोग बना उसे देखकर किसे आनंद न हुआ होगा! आगे चलकर अपने स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए तलवारें कैसे चलानी हैं, इसका प्रशिक्षण लेते हुए शस्त्रशाला में राजपुत्र नाना साहब एवं मनोहारिणी छबीली लक्ष्मीबाई को साथ-साथ खेलते देखकर किन नेत्रों को हर्ष नहीं हुआ होगा! मनुष्य की शक्ति कितनी मर्यादित है! जिस समय राजपुत्र नाना और छबीली लक्ष्मी तलवार का खेल एक साथ सीखते थे, उस समय लोगों को न अद्वितीय बच्चों का भावी दिव्यत्व नहीं दिखा और अब जब वह दिव्यत्व उन्हें दिखता है, तब उनकी वह भूतकालीन बाल लीलाएं नहीं दिखती। लेकिन मनुष्य के चर्मचक्षु की वह अदूरदृष्टि दूर करने को यदि कल्पना का चश्मा मिले तो भूतकाल की वह बाललीला हम सहज ही देख सकेंगे। श्रीमंत नाना साहब और उनके बंधु राव साहब जब अपने शिक्षक के पास विद्याभ्यास कर रहे थे तब यह तेजस्विनी छबीली भी अटक-अटककर पढ़ना सीख रही थी।¹⁷ हाथी के हौदे में नाना साहब बैठे हैं और दूसरे पर बैठकर यह मूर्त लक्ष्मी कब आती है, इसकी प्रतीक्षा में लगाम खींचे खड़े हैं-तभी कमर में तलवार लटकी हुई, वायु के कोमल झोंके से जिसके घुंघराले केश किंचित् मात्र हिल रहे हैं और जिसकी गौर तनु उन्मत्त घोड़े को नियंत्रण में रखने के श्रम से गुलाबी हो गई है-ऐसी छबीली अपने घोड़े पर साथ आते ही दोनों ही दौड़ते निकल जाते हैं। नाना की आयु लगभग अठारह और छबीली का सात वर्ष के आसपास थी। सातवें वर्ष से भावी धर्मयुद्ध के इन दो प्रमुख योद्धाओं की कवायद प्रारंभ हुई, यह कितनी मनोरम बात है! इन दो मानवी रत्नों का तब से एक-दूसरे पर बहुत प्रेम था। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 55 ¹⁷ पारसनी कृत 'झांसी की रानी का चरित्र', पृष्ठ 28-29 ।

इन दो भाई-बहनों की यम द्वितीया के दिन भाईदूज होती थी। सुंदर, सतेज, मनोहारी छबीली हाथ में सोने का दीप लेकर उस तरुण राजकुमार की आरती उतारती थी। सन् 1542 में छबीली का झांसी के महाराज गंगाधर राव साहब से विवाह हुआ और वह झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई बनी। महारानी लक्ष्मीबाई झांसी में अपने पति सहित लोकप्रिय हो रही थी। कि सन् 1841 में बाजीराव साहब का देहांत हो गया। बाजीराव साहब की मृत्यु के लिए एक बूंद आंसु भी नहीं बहाना है, क्योंकि सन् 1818 में स्वयं का राज्य बेचकर इस कुल कलंकी ने देसरे राज्य को डुबोने में अंग्रेजों की सहायता की थी। अपनी 5 लाख की पेंशन में से बहुत सारा धन बचाया था। अफगानिस्तान की लड़ाई में जब अंग्रेजों को भेजे। फिर आगे जब पंजाब में सिख राष्ट्र से अंग्रेजों की लड़ाई शुरू हुई तब ब्रह्मावर्त का मराठा मंडल सिखों से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध उठेगा, ऐसा दिखने लगा; परंतु तभी इस बाजी ने उसे बेरंग कर दियां उसने शिवाजी के इस पेशवा ने अपनी गांठ का व्यय करके एक हजार पैदल और एक हजार शनिवार बाड़ा बचाने के लिए सेना नहीं थी, पर सिखों का बाड़ा अंग्रेजों को सौंपने के लिए भरपूर सेना थी। हाय रे राष्ट्र! मराठे सिखों का राज लेंगे और सिख मराठों का राज्य लेंगे। किस कारण से? इसलिए कि दोनों की छाती पर अंग्रेज नाच सकें। ऐसा बाजीराव मरा, इसके लिए मृत्यु का आभार ही माना जाए। बाजीराव ने मृत्यु-पूर्व ही मृत्युपत्र लिखकर श्रीमंत नाना साहब को पेशवाई के सारे अधिकार और अपने वारिसदारी के सारे हक सौंप दिए थे। परंतु बाजीराव के मरने का समाचार मिलते ही अंग्रेज सरकार ने घोषित किया कि नाना साहब को 5 लाख रूपयों की पेंशन पर किसी भी तरह का अधिकार नहीं है। अंग्रेज सरकार का कुछ प्रतिबिंब उनके द्वारा स्वयं लिखवाए गए पत्र में प्रतिबिंबित हुआ है। वे पूछते हैं-‘हमारे विख्यात राजवंश से आपका यह कृपण व्यवहार पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। हमारा विस्तृत राज्य और राज्य-षासन जब आपको श्रीमंत बाजीराव से प्राप्त हुआ त बवह ऐसे समझौते पर प्राप्त हुआ कि आप उसके मूल्य के रूप में 5 लाख रूपए प्रति वर्श दें। यह पेंशन यदि हमेशा रहनेवाली नहीं है तो उस पेंशन के लिए दिया हुआ राज्य हमेशा आपके पास कैसे रहेगा? उस समझौते की एक षर्त तो तोड़ी जाए और दूसरी बनी रहे, यह अनुचित है।’'18 बाद में ऐसा जो कहा जा रहा था कि आप दत्तक पुत्र हैं, इसलिए आपका हक नहीं बनता, उसके संबंध में साफ-साफ और तर्कसंगत निवेदन करने के बाद श्रीमंत नाना साहब कहते हैं- ‘'श्रीमंत बाजीराव साहब 1857 का स्वातंत्र्य समर – 56 18 नाना साहिब्स क्लेम ईस्ट इंडिया कंपनी' में यह मूल पत्र दिया हुआ है।

ने अपनी पेंशन में मितव्ययिता से कुछ राशि बचाई, इसलिए अब पेंशन चालू रखने का कोई कारण नहीं है, ऐसा यदि कंपनी कहती है तो इस तर्क का सारे इतिहास में उदाहरण मिलना कठिन होगा। यह पेंशन जो दी गई वह समझौते की शर्त के रूप में दी गई उस समझौते में बाजीराव उस पेंशन को किस तरह व्यय करें, उस शर्त में क्या यह भी तय किया गया था? दिए हुए राज्य के लिए यह पेंशन मिलती है। उसे कैसे व्यय करना है, यह कहने का इस जगत् में किसी को तनिक भी अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं अपितु श्रीमंत बाजीराव इस पेंशन की सारी-की-सारी राशि यदि ब चाते तो भी वैसा करने में वे पूरी तरह स्वतंत्र थे। कंपनी से मैं यह पूछता हूं कि उनके कर्मचारियों की पेंशन का व्यय किस तरह होता है, क्या इसकी जांच करने का अधिकार उसे है? कोई भी पेंशनभोगी कितना खर्च करता है, क्या बचाता है,? यह स्वयं के नौकरों से भी पूछना संभव है क्या? परंतु जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जा रहा है।” यह आवेदन लेकर नाना के विश्वासपात्र वकील अजीमुल्ला खान विलायत गए। इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में जो महत्त्व के पात्र हैं उनमें अजीमुल्ला खान का नाम स्मरणीय है। अजीमुल्ला खान पहले बहुत निर्धन होते हुए भी अपने बुद्धिबल से अपनी उन्नति कर नाना के एकनिष्ठ वकील हो गए थे। वे पहले एक अंग्रेज के यहां घरेलु नौकर थे।¹⁹ उस अति सामान्य नौकरी में भी अपनी महत्त्वाकांक्षा न छोड़ते हुए वहां उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाषाएं अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में षेश अध्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहां की सरकारी पाठषाला में षिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार में रख लिया। सन् 1854 में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंग्रेजी रीति-रिवाजों की संपूर्ण जानकारी होने से लंदन के लोगों में वे बहुत प्रिय हो गए। अपनी आकर्षक और मीठी वाणी, अपने षारीरिक तेज एवं अपनी असीम उदारता के कारण अजीमुल्ला अनेक अंग्रेजी ललनाओं के गले का हार बन गए। लंदन के सार्वजनिक बगीचों में या ब्राइटन के समुद्री किनारे पर रत्न जड़ित पोषाक में इस ‘भारतीय राजा’ को देखने आंग्ल नर-नारियों की भीड़ इकट्ठी होती थी। कुछ अंग्रेज युवतियां तो अजीमुल्ला पर इतनी लट्टू हो गई थी कि उनके वापस हिंदुस्थान आ जाने पर भी उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम की भाषा में लिखे उनके प्रेमपत्र आते थे। हैवलॉक की सेना ने जब ब्रह्मवर्त जीता तब उसे इंग्लैंड की अनेक भद्र महिलाओं द्वारा अपने ‘प्रिय अजीमुल्ला खान’ को भेजे पत्र देखने को मिले। अजीमुल्ला खान के प्रति महिलाओं के मन आकर्षित हो गए थे तो भी ईस्ट इंडिया कंपनी का मन उसकी ओर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 57 ¹⁹ थॉमसन कृत-‘कानपुर’।

आकर्षित न हुआ और उसने अनेक दिन चक्कर लगवाकर उन्हें साफ जवाब दिया कि 'गर्वंनर जनरल द्वारा किया गया फैसला हमको पूरी तरह मान्य है और इसलिए बाजीराव के दत्तक का उनकी पेंशन पर किसी तरह का अधिकार शेष नहीं रहता।' इस तरह मुख्य कार्य के संबंध में निराश हो जाने पर अजीमुल्ला खान इंग्लैंड छोड़कर हिंदुस्थान की ओर आने के लिए फ्रांस के रास्ते निकले। हम उन्हें यात्रा में ही छोड़कर यह देखें कि नाना साहब उस समय क्या कर रहे थे? श्रीमंत नाना साहब पेशवा के जीवन की विस्तृत जानकारी प्रकाशित करने का सुअवसर महाराष्ट्र के इतिहास के भाग्य में है क्या? वह अवसर जब आएगा तब आएगा, पर अभी उनके संबंध में जो भी जानकारी मिली है, यद्यपि वह उनके शत्रुओं की ओर से ही प्राप्त हुई है तब भी उसका संकलन करके रखना बुरा न होगा। श्रीमंत के बचपन की थोड़ी-बहुत जानकारी ऊपर दी जा चुकी है। ब्रह्मवर्त एक छोटा सा परंतु ठाठदार नगर था। नगर से लगा हुआ भागीरथी का पाट था। सुंदर घाट, अनेक देवालय और नाना भूषणों से मंडित वहां आनेवाले नर-नारियों के समूह की शोभा से वह बह्मवर्त नगर और वह भागीरथी का पाट बहुत सुंदर लगता था। श्रीमंत का बाड़ा बहुत विस्तीर्ण और उत्तम साज-सामान से सुशोभित था। अलग-अलग रंग की मूल्यवान दरियों और गलीचों से उस बाड़े के दीवानखाने सजे हुए थे। यूरोपियन कारगरी का भिन्न-भिन्न रंगो में कांच का सामान, मोमबत्तियों के बड़े-बड़ें दर्पण, हाथी दांत और सोने से निर्मित रत्नजड़ित नक्काशी के काम, संक्षेप में हिंदुस्थान के राजमहलों में दिखनेवाली सब प्रकार की कमनीयता श्रीमंत के उस दीवानखाने में दिखती थी।²⁰ घोड़ों और ऊंटों के सारे उढ़ावन चांदी के होते थे। श्रीमंत को घोड़ों का बहुत शोक था और उत्तर हिंदुस्थान में उनकी अश्वविद्या की बड़ी धूम थी। उनकी घुड़सवार उत्तम और होशियार घोड़ों से हमेशा भरी रहती थी। अलग-अलग जाति के हिरन, शिकारी घोड़ों से हमेशा भरी रहती थी। अलग-अलग जाति के हिरन, शिकारी कुत्ते, सांभर, ऊंट एवं हिंदुस्थान के सब तरह के जानवर पालने में उनकी बहुत रूचि थी। परंतु इन सब वस्तुओं की तुलना में श्रीमंत का शस्त्रागार बहुत उत्तम था। उसमें अलग-अलग तरह के शस्त्र, तेज धारवाली तलवारें, एकदम नई बंदूकें और सब तरह की तोपें बहुत थी। श्रीमंत स्वभाव से स्वाभिमानी थे। हम एक बड़े राजवंश के अंगभूत हैं और उस महान् और प्रथित वंश को सोहे, ऐसा जीवन की सकें तो जीना है, अन्यथा पूरी तरह नामशेष हो जाता ही अच्छा, यह उनका निश्चय था। अपने आभिजात्य और कुल की महानता का उनके द्वारा भेजे गए आवेदन में बार-बार साभिमान उल्लेख हुआ है। मराठों के विस्तृत साम्राज्य का अधिपति होते हुए भी पेंशन के लिए दूसरों के दरवाजे पर निवेदन करने की

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²⁰ थॉमसन कृत-'कानपुर' में कानपुर के कत्लेआम में से जो दो व्यक्ति बचे हुए थे, थॉमसन उन्हीं में एक थे, अतः उपर्युक्त पुस्तक का किंचित् महत्त्व है।

मजबूरी का उनको बहुत दुःख होता था। ‘संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते’ के अनुसार अकीर्ति की अपेक्षा मृत्यु का आलिंगन करनेवालों में से वे थे। उनका स्वभाव राजा जैसा उदार और शूरों जैसा स्वाभिमानी था। कभी-कभी कानपुर की सेना के यूरोपीय अधिकारियों को वे पार्टियां देते थे; परंतु उनके निमंत्रण को वे कभी स्वीकार नहीं करते थे, क्योंकि उनकी पात्रता के अनुसार तोपों की सलामी देना कंपनी को स्वीकार न था। 21 वे अपने प्रदेश के लोगों से बहुत स्नेह करते थे। उनका स्वभाव गंभीर और रहन-सहन बहुत सादा था। किसी तरह के दुर्व्यसन का उन्हें रत्ती भर भी शौक नहीं था। उनका कई बार निरीक्षण कर चुके एक सज्जन लिखते हैं- “मैंने जब उन्हें देखा, उस समय उनकी आयु लगभग अट्ठाईस वर्ष होगी; पर वे चालीस के आसपास के दिखते थे। शरीर उनका स्थूल था, चेहरा गोल, आंखें उग्र, पानीदार और चंचल, कद-काठी सामान्य, स्पेनिश लोगों जैसा गोरा रंग और बातचीत कुल मिलाकर आनंदी और कुछ विनोदी थी। दरबार में वे किनखाबी पोशाक पहनकर बैठते थे।” उनके शरीर पर पहने अलंकार और उनके सिर के अत्यंत मूल्यवान मुकुट को देख यूरोपियन महिलाएं ललचा जाती थीं-ऐसा ट्रेवेलियन लिखता है। नाना का व्यवहार भी इस भव्यता को शोभा देने योग्य उदार और दयालु था। वे स्वयं की प्रजा पर कृपा करते थे, इसमें तो कोई आश्चर्य ही नहीं; परंतु जिन्होंने उनसे बेईमानी कर उनके जीवन का सत्यानाश किया, उन अंग्रेज लोगों पर भी वे हमेशा कृपा करते रहते थे। कितने ही अंग्रेज युवा दंपतियों को हवाखोरी करने की इच्छा होने पर महाराज की बग्घी उनके लिए भेज दी जाती थी। कितने ही अवसरों पर महाराज के घर अंग्रेज अधिकारी तथा अन्य लोग अपनी मैडमों के साथ बुलाए जाते और उत्तम शोलें, मूल्यवान मोती, रत्न आदि वस्तुएं उनको उपहारस्वरूप दी जाती। व्यक्ति के लिए द्वेष उनकी उदार आत्मा को कलुषित नहीं करता था, यह इससे अच्छी तरह सिद्ध होता है। राष्ट्रयुद्ध में जिनकी दे हके टुकड़े-टुकड़े करना है उन्हीं प्रतिस्पर्धियों को अन्य अवसरों पर उपकृत करना, यह वीरता की उच्च कल्पना हिंदुस्थान के काव्य और इतिहास में हर क्षण दृष्टिगोचर होती आई है। राजपूत वीर अपने कट्टर शत्रु से भी युद्ध-अवसर को छोड़ ऐसी ही उदारता से व्यवहार करते थे। श्रीमंत नाना अपनी उदारता के कारण उस समय के अंग्रेजों के बहुत प्यारे हो गए थे, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। श्रीमंत नाना के आतिथ्य- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 59 21 1. थॉमसन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 48। 2. सर जॉन के कहता है-"A quiet unostentatious young man not at all addicted to any extravagant habits." 3. चार्ल्स बाल कृत-'द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड 1. पृष्ठ 305। 4.ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 68-69। 5. “नाना साहब हमारे देशवासियों के साथ संपर्क होने पर सदैव जिस सत्यता का व्यवहार करते थे वह अवर्णनीय है। अधिकारियों को उनकी मैत्री और सरलता पर पूर्ण विश्वास और भरोसा था। पदाधिकारी भी उन्हें 'महान् पुरुष' कहकर ही संबोधित करते थे।” -ट्रेवेलियन कृत- 'कानुपर'

सात्कार का जब तक आनंद ले रहे थे तब तक अंग्रेज अधिकारियों और मैडमों के वे गले का हार बने हुए थे। परंतु कानपुर के रण-मैदान में स्वराज्य के लिए और स्वधर्म के लिए उनके द्वारा तलवार उठाए जाते ही उनपर दुःशब्दों और निम्न स्तर की गालियों की बौछार शुरू हो गई। ऐसे इन कोतवाल को डांटनेवाले कृतघ्न चोरों से ही हिंदुस्थान में अंग्रेजी का इतिहास भरा है। श्रीमंत नाना साहब एक विद्याचार-संपन्न व्यक्ति थे। उन्हें विश्व की राजनीति में बहुत रूचि थी और उसके लिए वे बहुत से प्रमुख अंग्रेजी पत्र खरीदते थे। हर रोज दैनिक पत्र आते ही महाराज वह सब पढ़वा लेते थे। इस काम के लिए मि. टॉड नामक एक अंग्रेज नियुक्त था। वे प्रोफेसर भी कानपुर के कत्लेआम में मारे गए। इंग्लैंड और हिंदुस्थान में अंग्रेजों की राजनीति पर नाना बहुत बारीकी से चर्चा किया करते थे। अवध के राज्य के संबंध में वे उसी अंग्रेज व्यक्ति से बहस किया करते थे।²² श्रीमंत नाना साहब पेशवा के व्यक्तित्व से संबंधित चरित्र की ऊपर दी हुई जानकारी उनके ही शत्रुओं के इतिहास से शब्दशः ली जाने के कारण एक बात समझ लेनी चाहिए, वह यह कि उस जानकारी में यदि सद्गुणों का वर्णन है तो वह बहुतायात से सत्य होना चाहिए। क्योंकि अंग्रेजों जैा दीर्घद्वेशी शत्रु नाना जैसे कट्टर प्रतिद्वंदी का सद्गुण विवशता से ही किंचित मात्र देगा। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त वर्णन पढ़कर श्रीमंत के लिए मन में आदर हिलोरें मारता है और जिस वंश का बालाजी विश्वनाथ से उद्गम हुआ है, उस रण-विख्यात भट वंश के इस अंतिम पेशवा की वह गोरी और भव्य मूर्ति-मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट लकदक कर रहा है, कांतिमान देह पर किनखाबी पोषाक पहनी है, सतेज और चपल नेत्रों में मानभंग से उत्पन्न गुस्से की लालिमा है, कमर में 3 लाख रुपयों की तलवार लटकी हुई है और स्वराज्य एवं स्वधर्म का प्रतिशोध लेने के लिए गुस्से की ज्वाला जिसकी देह से और पानीदार तलवार जिसकी म्यान से बाहर कूदने को तैयार है-उस अंतिम पेशवा को प्रणाम करने के लिए मस्तक नत होने लगता है। अंत में अंग्रेजीं का अंतिम उत्तर आया कि 'आपका बाजीराव की पेंशन पर तिनके बराबर भी अधिकार नहीं था। इतना ही नहीं, आपका ब्रह्मवर्त की ओर के प्रदेश पर स्थापित स्वतंत्र शासक का अधिकार भी अब आपको नहीं मिलेगा।' ऐसा अंतिम उत्तर अंग्रेजों की ओर से नाना को आया और 'हम जो कर रहे हैं वही न्याय है' यह भी कहा गया। न्याय? अब यह न्याय है या अन्याय, इसका ठीक-ठीक उत्तर देने का कष्ट अंग्रेज सरकार को उठाने की आवश्यकता नहीं है। उधर कानपुर के मैदान पर जल्दी ही इस प्रश्न का यथार्थ निर्णय करने की जंगी तैयारी शुरू हो चुकी है और मराठों के हृदय को दुखाना न्याय है या अन्याय, इसकी पूरी चर्चा अब वहीं होगी। अंग्रेजों के कटे सिर, उनकी कटी हुई गरदनें, चीरे हुए शरीर और बहनेवाले रक्त का लाल-लाल नाला-ये 1857 का स्वातंत्र्य समर - 60 22 चार्ल्स बाल कृत-'द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी', खंड 1 ।

सब इस प्रश्न की यथायोग्य चर्चा करेंगे और इस चर्चा को शांति से सुन कानपुर के कुएं पर बैठे गिद्ध इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देंगे कि यह न्याय था या अन्याय। नाना के घर ऐसे विशाल समारोह की तैयारी शुरू है तो उधर उनकी बहना छबीली भी शांत नहीं बैठी है। उसके भी सामने ‘न्याय या अन्याय', यही प्रश्न आ पड़ा है। सन् 1853 में उसके पति अचानक परलोक सिधार गए और उसके दत्तक प्रिय पुत्र दोमादर को उत्तराधिकारी के अधिकार न देते हुए अंग्रेज सरकार ने झांसी अधिगृहीत कर ली। परंतु ऐसी चिट्ठी-पत्री से अधिगृहीत होनेवाली वह रियासत नहीं थी। उस झांसी की रियासत पर नागपुर की बांका का राज्य नहीं था, वहां तो नाना की 'छबीली' बहन महारानी लक्ष्मीबाई राज्य कर रही थी। वह ऐसे अधिग्रहण की क्या परवाह करे! अंग्रेजों का यह कुटिल और जल्लादी कृत्य देखकर दुःख, अपमान, मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झांसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की—"अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी।'”23 अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी-जिसमें हिम्मत हो वह लेकर देखे! 1857 का स्वातंत्र्य समर – 61 23 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन', खंड 2।

प्रकरण-4 अवध मानव जाति के दुर्भाग्य से इस जग में चोर को छोड़ संन्यासी को फांसी देने का न्याय हमेशा होता आया है। पर राजनीति के क्षेत्र में तो यह खुल्लम-खुल्ला किया जाता है। जुल्म और अन्याय दोनों भाववाचक कल्पनाएं मानवीय मन को स्वीकार नहीं होती, अतः उनके कारण होनेवाले त्रास का प्रतिशोध लेने के लिए जब वह झल्लाकर बाहर निकल पड़ता है तब यह नहीं देखता कि उस जुल्म और अन्याय की जड़ में कौन है और जो सामने पड़ जाता है उसी गरीब को मारने लगता है। इस उतावली में जो अन्याय की जड़ या आत्मा है उसे भुला दिया जाता है। इस घालमेल के कारण कोई बड़ी हानिन यदि नहीं होती है तो उस उपेक्षा को क्षमा किया जा सकता है। परंतु सच में देखा जाए तो इस घालमेल के परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। चोरों को मारने के लिए बनाए गए फंदे संन्यासियों को मारने में खप जाते हैं और उधर चोर के सुरक्षित बच जाने से चोरी की घटनाएं पहले से भी अधिक होने लगती हैं। लेकिन इस फांसी पर संन्यासी के बदले यदि एकाध चोर को भी चढ़ा दिया गया तो भी उस चोरी का सारा क्रोध उस एक ही चोर पर उतार दिए जाने से बाकी के चोर निर्भय होकर-'पुनष्चः हरिः ओम्' करने को तैयार हो सकते हैं। विषवृक्ष का वास्तविक नाश उसकी शाखाएं और पत्तियां तोड़ते रहने से नहीं हो सकता-वह तो तब होगा जब उन शाखाओं और पत्तों को बार-बार आगे धकेलती हुई और उनका पोषण करती हुई उस वृक्ष की जड़ें खोदकर उनका सर्वनाश किया जाए। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 62

डलहौजी किसी परिस्थिति का परिणाम है। वह परिस्थिति जब तक बनी हुई है तब तक बनी हुई है तब तक एक डलहौजी जाए तो उसकी जगह दस डलहौजी आएंगे। परंतु यह सिद्धांत भूलकर अंग्रेज इतिहासकार जान-बूझकर और हिंदुस्थानी लोग भोलेपन और अज्ञान से डलहौजी के शासनकाल में हुए सारे अत्याचारों का दोष इतने जोर से उस पर थोपते हैं मानो वही मुख्य कर्ता था। परंतु यह मानना पूरी तरह गलत है। इस मान्यता का यह परिणाम होता है कि डलहौजी को छोड़ मुख्य कारा की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता। यदि इंग्लैंड की सरकार की सम्मति न हो तो डलहौजी की हिम्मत है कि वह इधर का पैर उधर रख सके। डलहौजी के हर कृत्य को इंग्लैंड की सरकार की स्वीकृति मिले बिना हिंदुस्थान में एक पत्ता भी हिलना असंभव है। ऐसी स्थिति में डलहौजी यदि एक अंश का दोषी है तो उसके पीछे छिपकर यह अधम कृत्य करनेवाले ठगों पर दस गुना दोष आना चाहिए। परंतु इंग्लैंड की सरकार माने वहां के मुट्ठी भर अधिकारी-इन मुट्ठी भर अधिकारियों को इंग्लैंड की जनता के सामने कंपकंपी आती है। अंग्रेज जनता की अनिच्छा हो तो इन अधिकारियों को एक क्षण भी अपने अधिकार संभाले रहना संभव न हो। ऐसी परिस्थिति में ये अधिकारी भी डलहौजी के पापी कृत्यों को मान्यता क्यों देते थे? वह इसलिए कि उनके सारे कृत्य सारी अंग्रेज जनता को पसंद थे। इस तरह देखें तो इंग्लैंड नामक पूरा राष्ट्र ही इस अन्याय और अत्याचार का दोषी है। साम्राज्य के रक्त की चटक लग जाने से पूरा राष्ट्र ही क्रूर, निर्दयी बन गया है। जब सारा इंग्लैंड मधुमक्खी का छत्ता है। तो डलहौजी नामक एक मधुमक्खी पर सारा गुस्सा उतारने से क्या लाभ? जब तक यह छत्ता बना हुआ है तब तक ये मधुमक्खियां हिंदुस्थान के फूलों से मधु ले जाकर उसके बदले में विष भरे डंक मारती ही रहेंगी। उस छत्ते को सीने से चिपकाए रखें और उसमें से मधु लेने के लिए आनेवाली मधुमक्खियों को गाली-गलौच करें कि ये डंक बहुत मारती है। तो इसमें कोई तुक नहीं। यह मूर्खतापूर्ण कल्पना और यह अभागी अंधता सन् 1857 के नेताओं की दृष्टि को स्पर्श न कर सकी। यही उस क्रांतियुद्ध का मुख्य रहस्य है। उसका हेतु (साध्य) अमुक कानून रद्द करो या अमुक डलहौजी हटाओ, यह न होकर कानून बनाने की या उस डलहौजी को भेजने की मुख्य शक्ति अर्थात् राज्यसत्ता को प्राप्त करना ही था। सभी अंग्रेज डलहौजी हैं और उस छत्ते की सारी मधुमक्खियों का उद्देश्य अपने भारतीय फूलों से मुध लेकर उसके एवज में विष भरे डंक मारते रहने का है, यह अंतिम सत्य उन चतुर और माननीय पुरुषों के ध्यान में है और ऐसे इन अंग्रेजों से पूरी तरह संबंध तोड़े बिना, गुलामी की शाखाएं न तोड़ते हुए उस हलाहल भरे कंटीले वृक्ष को समूल उखाड़े बिना, संक्षेप में यह कि स्वराज्य की यह औषधि संग्राम भूमि के अतिरिक्त कहीं और नहीं मिलती। यह वास्तविकता सत्य उनकी कुशाग्र बुद्धि को ज्ञात होते ही एक क्षण भी न रुकते हुए वे अपने प्राण अपने हाथों में और तलवार शत्रु की गरदन पर रखने रण-मैदान में कूद पड़े। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 63

सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की पवित्रता और महानता इसी सत्य ज्ञान में और उसके लिए किए गए प्राणदान में है। जिन्हें डलहौजी ही सारे अत्याचारों का मुख्य कारण लगता है उन्हें इस युद्ध की वास्तविक महानता ज्ञात नहीं होगी। ऐसे अज्ञानी व्यक्तियों को यदि सत्य ज्ञात करने की इच्छा हो तो विशेषतः अवध का राज्य किसने अधिग्रहण किया, यह देखें और क्यों अधिगृहीत हुआ, यह समझ लें। अवध का वह विस्तृत और संपन्न राज्य डलहौजी के पहले एक शताब्दी तक अधिग्रहण होता रहा था। अवध के नवाब ने जब से अंग्रेजों से रिश्ते बनाए तब से उसके राज्य का एक-एक टुकड़ा अंग्रेजों की ओर जाने लगा था। सन् 1801 में एक समझौता वजीर के सिर पर जबरन लादा गया, उसमें यह अपहरण की इच्छा पूरी निर्लज्जता से प्रदर्शित की गई थी। नवाब वजीर उस समय पहले से ही कंपनी की सहयोगी सेना के लिए प्रतिवर्ष 75 लाख रूपये दे रहा था। कंपनी की इस डकैती से नवाब का खजाना कठिनाई में आ गया थां पर अंग्रेजों ने जबरन यह मांग की कि नवाब अपनी सेना हटाकर उसके स्थान पर कंपनी की सेना रखे। इस सेना का खर्च उठाने की शक्ति नवाब के खजाने में नहीं है, यह अंग्रेज अच्छी तरह से जानत थे; बल्कि यह जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने यह मांग की थी। नवाब के पास खजाना नहीं था, किंतु प्रदेश था, अंत में उसमें से एक उपजाऊ टुकड़ा तोड़कर नवाब ने अंग्रेजों को दिया और नाहीं-नाहीं कहते भी नवाब के सिर यह संक्षक सेना बैठ ही गई। इस सन् 1801 के समझौते की तीसरी धारा का अर्थ था-“नवाब अपने प्रदेश की व्यवस्था से प्रजा को सुखकर करे और हर काम में वह कंपनी के अधिकारियों से सलाह-मशवरा करे।” अब यह प्रजा को सुखकर व्यवस्था कैसे रखनी है। यदि नवाब कोई सुधार करने की इच्छा करे तो उसकी इच्छा के विरूद्ध कंपनी उस पर गुर्राए।²⁴ फिर भी आग्रह था कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए । नवाब का खजाना बार-बार डकैती डालकर खाली किया जाता और उस पर नई मांग भी रखी जाती और इस डकैती की पूर्ति के लिए जब नवाब को कर लादने की विवशता होती तो कंपनी कहती कि प्रजा को सुखकर व्यवस्था होनी चाहिए। नवाब को जब इस तरह स्वयं के राज्य में सुधार करना असंभव हो जाए और प्रजा विद्रोह कर राज्य में सुधार का प्रयास करे तो उसका बंदोबस्त करने अंग्रेजी बैनेट और संरक्षक सेना की तलवारें प्रजा की गरदन पर रख उसे हूं-चूं भी नहीं करने देगा-इस प्रकार कंपनी का आग्रह बना ही रहता कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए! इस तरह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 64 ²⁴ 1.‘डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन’, पृष्ठ 348-349। 2. सर जॉन के ने कहा है-‘सत्यता यह है कि यह एक ऐसी त्रुटियुक्त प्रणाली थी जिसकी जितनी अधिक भर्त्सना की जाए, कम ही है। इस प्रकार उसने निकृष्ट श्रेणी का द्वैध शासन आरंभ कर दिया था। राजनीतिक और सैनिक सत्ता तो कंपनी के हाथों में थी, किंतु अवध का आंतरिक शासन अभी भी नवाब, वजीरों के हाथ में था।’

एक ओर नवाबों और जनता को राज्य व्यवस्था सुखकर करना पूरी तरह असंभव बनाकर देसरी ओर कंपनी कहती कि राज्य व्यवस्था सुखकर करनी ही होगी। यह स्थिति कुछ ऐसी ही थी कि कोई अत्याचारी बाप बच्चे को जोर से पीटता जाए और कहे-चुप रह, खबरदार जो रोएगा तो! इसमें फर्क इतना ही है कि वह बाप ऐसा मूर्खतापूर्ण कार्य कम-से-कम सद्हेतु से तो करता है! परंतु कंपनी नवाब का मुंह बांधकर जो पिटाई कर रही थी वह तो केवल उसका गला दबाकर प्राण लेने के लिए ही थी। यह प्राणघात जितनी जल्दी और जितनी सुलभता से हो, करने के लिये अंग्रेजों ने हजारों अड़चनें और हजारों तिकड़में भिड़ाईं-उन सबका वर्णन स्थानाभाव के कारण संभव नहीं। फिर भी उदाहरण के लिए एक अत्यंत नीच तिकड़म दिए बिना रहा नहीं जाता। वह तिकड़म थी, सन् 1837 में लॉर्ड ऑकलैंड द्वारा नवाब से किया हुआ समझौता कुछ ही वर्षों बाद साफतौर पर अस्वीकार करना। यह समझौता होते ही इंग्लैंड उसे भूल गया हो, ऐसा नहीं क्योंकि सन् 1847 में लॉर्ड हार्डिगटन ने उस समझौते को माना था। कर्नल सलीम ने सन् 1841 में वही समझौता माना था।|25 सन् 1853 में हिंदुस्थान में चालू समझौते की सूची में भी वह सन् 1837 का समझौता लिखा हुआ था। पर सन् 1853 में जो समझौता इंग्लैंड की स्मृति में था वह समझौता उसी वर्ष वास्तविकता समय आने पर इंग्लैंड एकदम भूल गया। सन् 1837 के उस समझौते के अनुसार वह रियासत अधिग्रहण करना संभव नहीं था, यह देखते ही एक घंटे पहले तक मान्य किया हुआ और चालू समझौतों की सूची में लिखकर भेजा हुआ समझौता हिंदुस्थान सरकार साफ अस्वीकार करने लगी। ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं था, ऐसा धड़ल्ले से कहते समय अंग्रेज सरकार लज्जित कैसे नहीं हुई-हिंदुस्थान का अंग्रेजी इतिहास जिसने थोड़ा-बहुत भी पढ़ा है, उसे इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होगा। चूंकि अंग्रेज सरकार को अवध का राज्य चाहिए था, अतः वह राज्य हड़पने के लिए सन् 1837 के समझौते की अपेक्षा 1801 का समझौता उसके लिए अधिक लाभदायक था। ये सारी तिकड़में डलहौजी के पहले ही हो चुकी थी, इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि डलहौजी ने अवध के अधिग्रहण करने में कुछ अपूर्व पातक नहीं किया। अवध का प्रदेश सबको चाहिए था, पर उसको कैसे हथियाया जाए, इसका निर्णय डलहौजी के हाथ में हुआ। पंजाब की तरह या ब्रह्मदेश की तरह उसपर चढ़ाई कर उसे जीता नहीं जा सकता था; क्योंकि वहां के लोगों ने कभी ब्रिटिशों से झगड़ा नहीं किया था। नवाब ने उनसे कभी प्रेम से व्यवहार नहीं किया, ऐसा आरोप लगाना भी संभव नहीं था; क्योंकि आज तक हर कठिन अवसर पर नवाब ने अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की जेब में पैसा नहीं था तब नवाब ने उन्हें 1857 का स्वातंत्र्य समर - 65 25 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन', खंड 2, पृष्ठ 52

पैसा दिया और जब बड़ी-बड़ी लड़ाइयों में अंग्रेजों के पास खाने को कुछ नहीं था तब उन्हें अनाज भिजवाया। नागपुर की तरह वहां क, ऐसी शिकायत नहीं थी। क्योंकि राजमहल औरस संतति से भरा हुआ था। वहां झांसी की तरह दत्तक का कोई भी बखेड़ा नहीं था; क्योंकि वर्तमान राजा दिवंगत राजा का औरस पुत्र था और राज्य पर शासनरूढ़ था। इस तरह लखनऊ के इस नवाब ने उपर्युक्त अपराधों में से एक भी अपराध नहीं किया था। यद्यपि ये सारे अपराध नवाब ने नहीं किए थे, फिर भी उस मूर्ख के हाथें एक बड़ा प्रमाद हो ही गया। वह प्रमाद यह कि नवाब के राज्य का प्रदेश बहुत ही उपजाऊ, सुंदर और धनी था। यह उसका अपराध अंग्रेजों के बहुत पहले से ही ध्यान में आया हुआ था। अवध के सुंदर प्रदेश का वर्णन करते हुए अंग्रेजी ब्लू बुक की सुकोमल भाषा में भी कविता फूट पड़ी है-"इस सुंदर प्रदेश में कहीं-कहीं बीस तो कहीं-कहीं दस फीट पर ही भरपूर जल भंडार हैं। सारा प्रदेश हरे-भरे खेतों से भरा हुआ है। अमराई की छाया से शीतल, बांस के ऊंचे-ऊंचे वन अपने सिर ठाट और शान से उठाए हुए, इमली की घनी छाया, नारंगी की गंध, अंजीर के वृक्षों की विचित्रता और पुष्पराग का परिमल आदि सारी प्रकृति की अवर्णनीय सुंदरता फैली हुई है।" ऐसा यह प्रदेश अपने कब्जे में रखने का प्रचंड अपराध अवध के नवाब ने किया था, इसलिए सन् 1849 में डलहौजी ने उसे गद्दी पर से उठाकर फेंक देने का आदेश दे दिया और उस आदेश को समस्त अंग्रेजों की अनुमति और सहयोग मिलने से अवध एक झटके में अधिग्रहीत कर ली गई। कारण यह बताया गया कि नवाब अपने राज्य में सुधार नहीं कर रहा था। ओहो! ईसा मसीह भी इस उदारता के आगे नतमस्तक हो जाएं। नवाब के राज्य में जो एक गुनी दरिद्रता थी उसे चौगुनी करने, जो कुछ चैतन्य था उसे समाप्त करने और अवध के तन पर फटा-पुराना ही सही, पर स्वतंत्रता का जो कपड़ा था उसे फाड़कर नंगा करने तथा उसके सिंहासन पर बलात्कार करनेवाले इंग्लैंड की यह अव्यवस्था की बात यदि एकबार मान ली तो हिंदुस्थान पर तेरा राज क्या एक दिन भी रह पाएगा? आज चीन में अफीम की लत है, अफगानिस्तान में अत्याचार है, बहुत क्या तेरे पैर के नीचे स्थित रशिया को अपने देश से जोड़ सकते हो? तेरे पड़ोसी के घर का सामान अव्यवस्थित है, इसलिए उसके घर में घुसकर उसे बांधकर वह घर अपने कब्जे में लेने का अधिकार तुम्हें कैसे मिला? पर डलहौजी के प्रशासन के संबंध में लिखनेवाला आर्नोल्ड कहता-"नवाब ने इसके सिवाय भी कितने ही अपराध किए थे। जैसे वह अपनी दासियों को जरी की साड़ियां भेंट देता था। देसरा अपराध यह कि उसने 11 मई को आतिशबाजी का जलसा किया। और यह भी कि एक दिन सुबह ही उसने दवाई पी और शाही बेगम और ताज बेगम से भोजन का आग्रह किया। अब इससे भयंकर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 66

अपराध और क्या हो सकता है? फिर भी धन्य हैं अंग्रेज कि नवाब सुबह दवाई पीता था, फिर भी उस (अपराध) की ओर ध्यान न देकर उसे राज्यच्युत नहीं किया। पर अंत में सारे उपाय व्यर्थ गए। कारण, एक दिन नवाब के सामने कुछ घोड़ियों पर घोड़े-छोड़े गए-अर्थात् अंग्रेज सरकार को उन घोड़ियों की पवित्रता भंग होने पर बहुत दया आई और उन्होंने उस भयंकर अवसर पर वहां खड़े नवाब के अपराध पर उसे राज्यच्युत कर दिया।“ ऐसी घिनौनी बातें कहकर नवाब की राज्य व्यवस्था संबंधी अक्षमता का ढोल पीटना चाहनेवाले मूर्ख और ईर्ष्यालु अंग्रेज इतिहास-लेखकों को यह सब देखने हिंदुस्थान आने का कष्ट करने की आवश्यकता ही क्या थी? उन्हें इंग्लैंड में कहीं भी रोनाल्ड के ग्रंथ मिल सकते थे या लज्जावश किसी ने नन दिए हों तो इंग्लैंड के राजमहलों से भी उन्हें बहुत सारी जानकारी मिल गई होती और घोड़ियों का पातिब्रत्य भंग करने से भी बड़े व्रतों को भंग करनेवालों की जिंदगी और राज्य अधिग्रहण कर लेने तथा स्वयं के घर के छेद भरने में वे अपने समय का अधिक उपयोग कर सकते थे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 67

प्रकरण-5 धकेलो उसमें ˙ ˙ ˙ ˙ अब इच्छित राष्ट्रकार्य की तिथि पास आती जा रही है, अतः ऐसे समय इष्ट सिद्धि के लिए कुल देवताओं की कृपा प्राप्त करनी ही चाहिए। इस प्रचंड राष्ट्र-विक्षोभ के कुलदेव की प्रसन्नता ही प्रतिशोध है। इसे प्रसन्न किए बिना और अपनी सहायता के लिए आने को बाध्य करने के सिवाए सन् 1857 में लिये गए संकल्प की सिद्धि नहीं होगी। इसलिए हवनकुंड को प्रदीप्त करो और उसमें इतनी दिव्य हवन सामग्री डालो कि मुख्य कुलदेव चैतन्य होकर प्रकट हो ही जाएं। इंद्रजित् के प्रचंड यज्ञ से अजेय रथा बाहर निकलने तक जैसे हवनों का धूम-धड़ाका उड़ाया गया वैसे ही इस यज्ञ से जब तक मूर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहस्र जिह्वाएं सहस्र दांतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजित् के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र-यज्ञ में सहायता करने के लिए अंग्रेज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभें लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो! पंजाब के इतिहास-प्रसिद्ध राजा, कोहिनूर के तेज से दीप्तिमान उस शूरवीर से पहले आहूति दान का सम्मान पाने योग्य दूसरा कौन होगा! इसलिए चल, आ जा रे डलहौजी! उस कोहिनूर को उसके वास्तविक मालिक के छीनकर ले आ। पंजाब की स्वतंत्रता का खून हुआ है-यह उस राष्ट्र-क्षोभ के कुलदेव को सूचित करने के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर -68

वह अग्नि चेत गई है। इस कोहिनूर को फेंक दो उसमें! इस ब्रह्मदेश को दूसरा सम्मान मिलना उचित है, इसलिए चल आ, रे डलहौजी! उस ब्रह्मदेश को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्मदेश को धकेलो उसमें! सतारा के शिवाजी की गद्दी कहां है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उस पर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गद्दी, अंग्रेजी जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सतारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें! इस चौथे हवन को केवल नागपुर की गद्दी कैसे पूरी पड़ेगी! तदर्थ उस गद्दी के साथ ही नागपुर के सारे भवन, हाथी-घोड़े, राजा-रानियां, रानियां के अलंकार, आक्रोश, चिल्लाहट-जो भी मिले वह सब जल्दी जाओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए पूरा नागपुर धकेल दो उसमें! अब हवनकुंड सच में जाज्वल्य दिखने लगा है। ऐसे समय उतनी ही जाज्वल्य हवि चाहिए। पर ऐसी आग से भी तेजस्विनी हवि ब्रह्मावर्त के मुकुट को उसमें धकेलो! राष्ट्र-क्षोभ के न्याय देव! 'प्रतिशोध' को प्रसन्न करने के लिए नई हवि ऐसी चुनो कि बस! यह मान उसी का। इस नीति होत्र की ज्वाला आकाश छूने लगे, इसलिए यह झांसी की बिजली धकेलो उसमें! देखो, देखो, इस दिव्य हवनकुंड से सारे पापी दुर्योधनों के शरीर कांपने लगे हैं, इसलिए प्रतिशोध का सिर ऊपर दिखने लगा है। ऐसे समय आविर्भूत होने को तत्पर उस देवता को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए हवनों का आक्रमण होना चाहिए। इसलिए चलो, ये हैं अर्काट के नवाब, धकेलो इन्हें! तंजावुर की गद्दी, धकेलो उसमें! अंगूल के राजा, धकेलो उसमें! सिक्कत के भाग, धकेलो उसमें! संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें! खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें! ऐसे रूपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है, इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें! अहा-हा! इस अग्नि-कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह कैसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक जबड़े में सारा जगत् ही पिस जाएगा। परंतु उस जबड़े की धार जब तक अधिक तेज न हो जाए तब तक ठहरना उपयोगी नहीं। इसलिए दिल्ली के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 69

राजमहलों को ताले लगा और वहां के मयुरासन पर बैठनेवाले अकबर के वंशज को खींचकर धकेलो उसमें! अवध प्रांत के बड़े-बड़े तालुकेदार²⁶ क्या कर रहे हैं? उनकी सारी जमीनें और उनके सारे हक छीनकर उन्हें जंगली पशुओं जैसा घेरकर लाओ इधर! वैसे ही बंबई प्रात के (इनाम कमीशन आदि के द्वारा) हजारों हकदारों के हक फेंक-फांककर उन्हें भी लाओ इधर! हवनकुंड प्रज्वलित हैं। इसलिए जमींदार, जागीरदार, तालुकेदार, वतनदार आदि सारे दारों को कंगाल कर धकेलो उसमें! राजा, महाराजा, बादशाह, प्रधान, नवाब, वजीर जैसी उत्तम हवियां इस हवन कुंड में पड़ें और हमारे राष्ट्र-क्षोभ 'कुलदेव' को प्रसन्न करें! हमारी यह वर्तमान दुर्दशा और गुलामी देखकर हमारे पूर्वजों की आंखों से बहनेवाले आंसु उस देवता को अच्छी तरह स्नान करावें। सतारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अवध के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध! जग के न्याय! तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस दुनिया पर निरकुंश होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध ! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होना पड़ता है। तू ही रावण का राम था, तू ही दुर्योधन का भीम था, तू ही हिरण्यकशिपु का नृसिंह था। उनके समय में तुम्हें प्रसन्न करने के लिए जितना हविर्दान नहीं हुआ थ उतना इस प्रचंड हवनकुंड में लगा हुआ है। एतदर्थ, जग से अन्याय और अंधेर समाप्त हो, परवशता और परदासता मिट जाए, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 70 ²⁶ अवध के राज्य को अधिगृहीत करने के बाद वहां के अत्यंत कुलीन, प्रभावशाली और प्रमुख लोगों की जो दुर्दशा हुई वर्णन बहुत भयंकर है। वंश परंपरा से प्राप्त जमीनें और वतन एक क्षण में नष्ट हो गए। इन अभागे तालुकेदारों के लिए 'के' लिखता है–"The charges against him were many and great for he had diverse ordeals to pass through and he seldom survived them all....When the claims of a great talukdar could not be altogether ignored, it was declared that he was a rougue or a fool.... They gave him a bad name and straightway they went out to ruin him!....It was at once a cruel wrong and a grave error to sweep it away as though it were an encumbrance and an usurpation." जो व्यवस्था नवाब नहीं कर सहते थे उस राज्य की ऐसी व्यवस्था करने पर सारे जमींदारों को कंपनी ने जल्दी ही बेरहम मार लगाई, यह आगे वर्णित है। इनाम कमीशन जो नियुक्त किया उसने तो विकट कहर ढाया। अंग्रेजों को जैसे बड़े-बड़े राजा नहीं चाहिए थे वैसे ही रिसजोर जमींदार भी नहीं चाहिए थे। जो जमीनें और जागीरें तलवार के जोर पर प्राप्त की थीं उनके कागज नहीं थे, इसलिए उन्हें एक सिरे से अधिगृहीत किया गया। कम-से-कम पैंतीस हजार 'वतन' और बड़ी जागीरें छानबीन के लिए निकाली और उनमें से केवल पांच वर्ष में तीन पंचमाश समाप्त कर दीं।

स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! ‘मृत्यु सर्वहरश्चाहम्’—ऐसी गर्जना करते यह मर्तिमंत राष्ट्र-क्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर गर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राज; पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां तड़ाक से टूट जाती हैं, जिसके नेत्रों से निकलनेवाली ज्वालाएं अत्याचारों की काली कोठरियों को जलाकर भस्म करती हैं और जिसकी लपलपाती तप्त जिह्वा हजारों दुःशासनों का रक्त गटागट पीती है उस भयंकर, उग्र एवं भयानक राष्ट्रीय प्रतिशोध को शतशः प्रणाम— वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ् गैः हे हिंदभूमि! अंततः इस महायज्ञ से तेरा ‘प्रतिशोध’ सभी में मर्तिमंत रीति से प्रादुर्भूत हो गया। पर वह क्या-क्या करने से शांत होकर संपूर्ण रूप से अंतर्धान होगा, क्या यह भी तुझे ज्ञात है? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 71

प्रकरण-6 अग्नि में घी विश्व में ऐसा कौन सा सद्धर्म है कि जिसमें परतंत्रता और दासता को धिक्कारा नहीं गया हो। इसी कारण जहां परमेश्वर होगा वहां परतंत्रता कभी नहीं रह सकती और जहां परतंत्रता है वहां परमेश्वर का अधिष्ठान नहीं, वहां धर्म नहीं। एतदर्थ किसी भी प्रकार की परतंत्रता का अर्थ धर्म का उच्छेद एवं ईश्वरीय इच्छा का भंग होना है। क्या मनुष्य जाति की उन्नति के लिए उत्पन्न हुए सारे धर्म मनुष्य जाति की अवनति के लिए उत्पन्न हुई परतंत्रता को एक क्षण भी जीवित रखने की आज्ञा देगें? उसमें भी राजनीतिक परतंत्रता सभी परतंत्रताओं से मनुष्य जाति की अत्यंत भयानक अवनति करनेवाली है, इसलिए इस अधम राक्षस का कंठच्छेदन करने की आज्ञा प्रमुखता से ही दी गई होगी। जो अन्यों को गुलाम बनाते हैं और जो गुलामी में रहते हैं, वे दोनों ही मनुष्य जाति को नरक की ओर धकेलते हैं। इसलिए मनुष्य जाति को स्वर्ग की ओर ले जानेवाले सद्धर्म इस राजनीतिक गुलामी को नष्ट करने के लिए अपने अनुयायियों को बार-बार उपदेश देते हैं। उनका यह उपदेश अस्वीकार करनेवाले सारे लोग धर्मद्रोही हैं। दूसरों को गुलामी में ढकेलनेवाले अंग्रेज भले ही रोज चर्च में जाएं, वे धर्मद्रोही ही हैं और परतंत्रता के नरक में सड़नेवाले भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभ्रष्ट हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभ्रष्ट हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या-वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज 1857 का स्वातंत्र्य समर - 72

पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य-प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरूद्ध बलपूर्वक अपने पर थोपा गया है- ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियां तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को दिया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरूषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् 1857 में फिर से गूंजने लगा। हिंदुस्थान की पुण्यभूमि की स्वतंत्रता का हरण कर अंग्रेजों ने सभी धर्मों को तो अपने पैरों तले कुचला ही था, परंतु धर्म का सैद्धांतिक अपमान पूरा नहीं है, ऐसा लगने पर ही शायद, इस हिंदुस्थान के पवित्र धर्म का स व्यावहारिक अपमान करने के लिए वे बहुत आतुर थे। अफ्रीका और अमेरिका में वहां के निवासियों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने के काम में मिली सफलता से बहके हुए पश्चिमवासियों को अफ्रीका की भांति ही हिंदुस्थान में भी सारे लोगों को ईसाई बना डालने की भारी आशा थी। वेद और प्राचीन हिंदू धर्म तथा ईसाइयत की पीठ पर नृत्य करते इस्लाम के जड़-मूल कितने गहरे हैं, इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं था। दर्शनशास्त्र, भक्ति-प्रेम एवं नीति-निपुणता में सारे जग का आदिगुरू आर्य धर्म आज तक कितनों के ही नामकरण और नामशेष देखता आया है, यह इन अल्प बुद्धिवालों को कैसे ज्ञात हो! उन्हें आज पूरे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की रत्ती भर भी आशा नहीं हैं-फिर भी सन् 1857 तक उन्हें इस सफलता के संबंध में पूरा विश्वास था। औरंगजेब जैसे खुले द्वेष से भी भयानक गला काटनेवाला द्वेष करने और हिंदुस्थान को अनजाने ईसामय बना डालने का उनका दृढ़ उद्देश्य था। इतना ही नहीं अपितु इस हेतु उनके खुले प्रयास भी चल रहे थे। हिंदुस्थान में पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति प्रारंभ करनेवाला मैकाले अपने एक निजी पत्र में लिखता है-अपनी यह शिक्षा प्रणाली ऐसी ही बनी रही तो तीस वर्ष में पूरा बंगाल ईसाई हो जाएगा।27 इस टिटहरी को ऐसी आशा और विश्वास था कि अपनी चोंच से मैं यह अगाध समुद्र देखते-देखते पी पाऊंगी। सारे हिंदुस्थान को ईसाई बना डालने के लिए हर अंग्रेज की कुछ-न-कुछ योजनाएं अवश्य होती थी। इस धर्म-प्रवर्तन को प्रकटतः मदद करनेवाला हजारों मिशनरियों द्वारा किया जानेवाला निवेदन मानकर उसके अनुसार हिंदू और इस्लाम धर्म की गरदन पर तलवार चलाने का कार्य भी अंग्रेजी सरकार द्वारा किया जाता था; परंतु उस राष्ट्र को धर्म-प्रवर्तन की अपेक्षा व्यापार-प्रवर्तन और यीशू की तुलना में द्रव्य भक्ति अधिक होने के कारण ऐसे खुले कार्य करके 1857 का स्वातंत्र्य समर - 73 27 "हमारी अंग्रेजी पाठशालाएं दिन-प्रतिदिन आश्चर्यजनक ढंग से प्रगति करती जा रही हैं। अकेले हुगली नगर में ही 1,400 बालक अंग्रेजी सीख रहे हैं। इस शिक्षा का प्रभाव का नितांत चमत्कारपूर्ण हो रहा है। मेरा यह सुदृढ़ विश्वास है कि यदि यह शिक्षा योजना सुचारू रूप से जारी रही तो तीस वर्ष पश्चात् बंगाल में एक भी मर्तिपूजक र रह जाएगा।" -मैकलेज लेटर टू हिज मदर, 12 अक्तूबर, 1836

धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने की गलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी, ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी, बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म-आस्थाओं में परिवर्तन करने क प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते । सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख 'Heathen' षब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था। सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अतः उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस 'रामचन्द्र' के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस 'मोहम्मद- के नाम से सारे मुसलमानों की रग-रग से प्रेम झलक पडऋता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियां बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पश्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टुटपुंजिया शुभ चरति से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है-'मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूं। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।' हिंदुस्थान कके धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले, इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार हो जाता था और हवलदार-सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्तानी धर्म को ही चोट पहुंचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरूद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती 1857 का स्वातंत्र्य समर - 74