अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३
पित्रर्थे जीवितं दास्ये पिबेयं विषमुल्बणम् ॥५९॥
सीतां त्यक्ष्येऽथ कौसल्यां राज्यं चापि त्यजाम्यहम्
अनाज्ञप्तोऽपि कुरुते पितुः कार्यं स उत्तमः ॥६०॥
उक्तः करोति यः पुत्रः स मध्यम उदाहृतः ।
उक्तोऽपि कुरुते नैव स पुत्रो मल उच्यते ॥६१॥
अतः करोमि तत्सर्वं यन्मामाह पिता मम ।
सत्यं सत्यं करोम्येव रामो द्विर्नाभिभाषते ॥६२॥
इति रामप्रतिज्ञां सा श्रुत्वा वक्तुं प्रचक्रमे ।
राम त्वदभिषेकार्थं संभाराः संभृताश्च ये ॥६३॥
तैरेव भरतोऽवश्यमभिषेच्यः प्रियो मम ।
अपरेण वरेणाशु चीरवासा जटाधरः ॥६४॥
वनं प्रयाहि शीघ्रं त्वमद्यैव पितुराज्ञया ।
चतुर्दश समास्तत्र वस मुन्यन्नभोजनः ॥६५॥
एतदेव पितुस्तेऽद्य कार्यं त्वं कर्तुमर्हसि ।
राजा तु लज्जते वक्तुं त्वामेवं रघुनन्दन ॥६६॥
श्रीराम उवाच
भरतस्यैव राज्यं स्यादहं गच्छामि दण्डकान् ।
किन्तु राजा न वक्तीह मां न जानेऽत्र कारणम् ॥६७॥
श्रुत्वैतद्रामवचनं दृष्ट्वा रामं पुरः स्थितम् ।
प्राह राजा दशरथो दुःखितो दुःखितं वचः ॥६८॥
स्त्रीजितं भ्रान्तहृदयमुन्मार्गपरिवर्तिनम् ।
निगृह्य मां गृहाणेदं राज्यं पापं न तद्भवेत् ॥६९॥
एवं चेदनृतं नैव मां स्पृशेद्रघुनन्दन ।
इत्युक्त्वा दुःखसन्तप्तो विललाप नृपस्तदा ॥७०॥
हा राम हा जगन्नाथ हा मम प्राणवल्लभ ।
मां विसृज्य कथं घोरं विपिनं गन्तुमर्हसि ॥७१॥
इति रामं समालिङ्ग्य मुक्तकण्ठो रुरोद ह ।
विमृज्य नयने रामः पितुः सजलपाणिना ॥७२॥
हमसे ऐसी बातें क्यों करती हों ? पिताजीके लिये मैं जीवन दे सकता हूँ, भयंकर विष पी सकता हूँ ॥ ५८-५९ ॥ और सीता, कौसल्या तथा राज्यको भी छोड़ सकता हूँ । जो पुत्र पिताकी आज्ञाके बिना ही उनका अभीष्ट कार्य करता है वह उत्तम है ॥ ६० ॥ जो पिताके कहनेपर करता है वह मध्यम होता है और जो कहनेपर भी नहीं करता वह पुत्र तो विष्ठाके समान है ॥ ६१ ॥ अतः पिताजीने मेरे लिये जो कुछ आज्ञा की है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, यह सर्वथा सत्य है; राम एक मुखसे दो बात कभी नहीं कहता" ॥ ६२ ॥
रामकी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर कैकेयीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया, “हे राम ! तुम्हारे अभिषेकके लिये जो कुछ सामग्री एकत्रित की गयी है ॥ ६३ ॥ उसके द्वारा निश्चय ही मेरे प्रिय पुत्र भरतका अभिषेक होना चाहिये । (यहाँ मेरा प्रथम वर है) । दूसरे वरके अनुसार पिताकी आज्ञासे आज तुरन्त ही तुम वल्कल-वस्त्र और जटा धारणकर वनको जाओ और वहाँ मुनिजनोचित भोजन करते हुए चौदह वर्ष-तक रहो ॥ ६४-६५ ॥ वत्स, तुम्हारे पिताका यही कार्य है, जो तुम्हें करना चाहिये । किन्तु राजा इन सब बातोंको तुमसे कहनेमें संकोच करते हैं” ॥६६॥
श्रीरामचन्द्रजी बोले-माता ! भरत आनन्दसे यह राज्य भोगें और मैं भी अभी दण्डकारण्यको जाता हूँ । किन्तु इसका कारण मालूम नहीं होता कि महाराज मुझसे क्यों नहीं कहते ? ॥ ६७ ॥
रामके ये वचन सुनकर और उन्हें अपने सामने बैठे देखकर दुःखातुर महाराज दशरथने इस प्रकार अति दुःखभरे वचन कहे ॥ ६८ ॥ "राम ! मुझ स्त्री-परवश, भ्रान्तचित्त, कुमार्गगामी पापात्माको बाँधकर यह राज्य ले लो; इससे तुम्हें कोई पाप न लगेगा ॥ ६९ ॥ हे रघुनन्दन ! ऐसा होनेपर मुझे भी असत्य स्पर्श न करेगा।" ऐसा कह राजा दशरथ दुःखातुर होकर विलाप करने लगे ॥ ७० ॥ 'हा राम ! हा जगन्नाथ ! हा प्राणप्यारे ! मुझे छोड़कर तुम घोर वनमें जाना कैसे उचित समझ रहे हो ?' ॥ ७१ ॥
ऐसा कहकर उन्होंने रामको गले लगा लिया और जी खोलकर रोने लगे । तब रामने हाथमें जल लेकर
| [ सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५७ |
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| आश्वासयामास नृपं शनैः स नयकोविदः ।<br>किमत्र दुःखेन विभो राज्यं शासतु मेऽनुजः ॥७३॥<br><br>अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य पुनर्यास्यामि ते पुरम् ।<br>राज्यात्कोटिगुणं सौख्यं मम राजन्वने सतः ॥७४॥<br><br>त्वत्सत्यपालनं देवकार्यं चापि भविष्यति ।<br>कैकेय्याश्च प्रियो राजन्वनवासो महागुणः ॥७५॥<br><br>इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृज्ज्वरः ।<br>सम्भाराश्चोपहीयन्तामभिषेकार्थमाहृताः ॥७६॥<br><br>मातरं च समाश्वास्य अनुनीय च जानकीम् ।<br>आगत्य पादौ वन्दित्वा तव यास्ये सुखं वनम्॥७७॥<br><br>इत्युक्त्वा तु परिक्रम्य मातरं द्रष्टुमाययौ ।<br>कौसल्याऽपि हरेः पूजां कुरुते रामकारणात् ॥७८॥<br><br>होमं च कारयामास ब्राह्मणेभ्यो ददौ धनम् ।<br>ध्यायते विष्णुमेकाग्रमनसा मौनमास्थिता ॥७९॥<br><br>अन्तःस्थमेकं घनचित्प्रकाशं<br>निरस्तसर्वातिशयस्वरूपम् ।<br>विष्णुं सदानन्दमयं हृदब्जे<br>सा भावयन्ती न ददर्श रामम् ॥८०॥ | पिताके आँसू पोंछे ॥ ७२ ॥ और नीतिकुशल रामजीने धीरे-धीरे उन्हें ढाढस बँधाया। वे कहने लगे—"प्रभो ! यदि मेरे छोटे भाई भरत राज्यशासन करें तो इसमें दुःखकी क्या बात है ? ॥ ७३ ॥ मैं भी इस प्रतिज्ञाका पालन कर फिर आपके पास अयोध्या लौट ही आऊँगा । और हे राजन् ! वनमें रहनेसे तो मुझे राज्यसे भी करोड़ गुना सुख होगा ॥ ७४ ॥ इसमें आपके सत्यकी रक्षा होगी, देवताओंका कार्य सिद्ध होगा और कैकेयीका भी हित होगा; अतः हे राजन् ! वनवासमें सब प्रकार महान् गुण है ॥ ७५ ॥ अब मैं शीघ्र ही जाना चाहता हूँ; माता कैकेयीकी हार्दिक व्यथा शान्त हो । अभिषेकके लिये एकत्रित की हुई यह सामग्री अलग रख दी जाय ॥ ७६ ॥ माता कौसल्याको सान्त्वना देकर और जानकीको समझा-बुझाकर मैं अभी आता हूँ और आपके चरणोंकी वन्दना-कर आनन्दपूर्वक वनको. जाता हूँ" ॥ ७७ ॥<br><br>ऐसा कह उन्होंने पिताकी परिक्रमा की और मातासे मिलनेके लिये आये । इस समय माता कौसल्या रामके मंगलके लिये श्रीविष्णुभगवान्की पूजा कर रही थीं ॥ ७८ ॥ उन्होंने कुछ पहले हवन कराके ब्राह्मणों-को बहुत-सा धन दिया था और इस समय वह मौन धारणकर एकाग्रचित्तसे श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान कर रही थीं ॥ ७९ ॥ अपने हृदयमें अन्तर्यामी, चिद्घन-स्वरूप, तेजोमय, निरतिशयस्वरूप, सदानन्दमय भगवान् विष्णुका ध्यान करती रहनेके कारण उन्होंने श्रीरामचन्द्र-जीको नहीं देख पाया ॥ ८० ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
| ५८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा सीता और लक्ष्मणके सहित वनगमनकी तैयारी करना।
श्रीमहादेव उवाच
ततः सुमित्रा दृष्ट्वैनं रामं राज्ञीं ससम्भ्रमा ।
कौसल्यां बोधयामास रामोऽयं समुपस्थितः ॥ १ ॥
श्रुत्वैव रामनामैषा बहिर्दृष्टिप्रवाहिता ।
रामं दृष्ट्वा विशालाक्षमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥ २ ॥
मूर्ध्ववघ्राय पस्पर्श गात्रं नीलोत्पलच्छवि ।
भुङ्क्ष्व पुत्रेति च प्राह मिष्टमन्नं क्षुधार्दितः ॥ ३ ॥
रामः प्राह न मे मातर्भोजनावसरः कुतः ।
दण्डकागमने शीघ्रं मम कालोऽद्य निश्चितः ॥ ४ ॥
कैकेयीवरदानेन सत्यसन्धः पिता मम ।
भरताय ददौ राज्यं ममाप्यारण्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥
चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ।
आगमिष्ये पुनः शीघ्रं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा सहसोद्विग्ना मूर्च्छिता पुनरुत्थिता ।
आह रामं सुदुःखार्ता दुःखसागरसम्प्लुता ॥ ७ ॥
यदि राम वनं सत्यं यासि चेन्नय मामपि ।
त्वद्विहीना क्षणार्द्धं वा जीवितं धारये कथम् ॥ ८ ॥
यथा गौर्बालकं वत्सं त्यक्त्वा तिष्ठेन्न कुत्रचित् ।
तथैव त्वां न शक्नोमि त्यक्तुं प्राणात्प्रियं सुतम् ॥ ९ ॥
भरताय प्रसन्नश्चेद्राज्यं राजा प्रयच्छतु ।
किमर्थं वनवासाय त्वामाज्ञापयति प्रियम् ॥ १० ॥
कैकेय्या वरदो राजा सर्वस्वं वा प्रयच्छतु ।
त्वया किमपराद्धं हि कैकेय्या वा नृपस्य वा ॥ ११ ॥
पिता गुरुर्यथा राम तवाहमाधिका ततः ।
पित्राज्ञप्तो वनं गन्तुं वारयेयमहं सुतम् ॥ १२ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वती ! तब महारानी सुमित्राने रामको देखकर सम्भ्रमपूर्वक महारानी कौसल्याको चेत कराकर बताया कि राम खड़े हुए हैं ॥ १ ॥ रामका नाम सुनते ही उनकी बहिर्दृष्टि हुई और उन्होंने विशालनयन रामको देख गले लगाकर गोदमें बैठा लिया ॥ २ ॥ तथा उनका शिर सूँघकर उनके नील-कमल-सदृश श्याम शरीरपर हाथ फेरा और कहा—"बेटा, भूख लगी होगी कुछ मिष्टान्न खा लो" ॥ ३ ॥
रामजी बोले—"माता ! मुझे भोजन करनेका समय नहीं है क्योंकि आज मेरे लिये यह समय शीघ्र ही दण्डकारण्य जानेके लिये निश्चित किया गया है ॥ ४ ॥ मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताजीने माता कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे अति उत्तम वनवास दिया है ॥ ५ ॥ वहाँ मुनिवेषसे चौदह वर्ष रहकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा; आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें" ॥ ६ ॥
अचानक ऐसी बात सुनकर माता कौसल्या दुःखसे अचेत हो गयीं और फिर चेत होनेपर दुःखसागरमें उछलती-डूबती दुःखातुर होकर रामसे कहने लगीं ॥ ७ ॥ "राम ! यदि सचमुच ही तुम वनको जाते हो तो मुझे भी साथ ले चलो; तुम्हारे बिना मैं आधे क्षण भी कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ ८ ॥ जिस प्रकार गौ अपने अल्पवयस्क बछड़ेको छोड़कर अन्यत्र नहीं रह सकती उसी प्रकार मैं भी तुझ अपने प्राणप्रिय पुत्रको नहीं छोड़ सकती ॥ ९ ॥ यदि राजा भरतसे प्रसन्न हैं तो उन्हें राज्य भले ही दें परन्तु तुझ प्रियपुत्रको वनवासकी आज्ञा क्यों देते हैं ? ॥ १० ॥ कैकेयीको वर देकर चाहे महाराज अपना सर्वस्व दे डालें, (इसमें कोई आपत्ति नहीं) किन्तु तुमने राजा अथवा कैकेयीका क्या बिगाड़ा है ? ॥ ११ ॥ हे राम ! जिस प्रकार पिता तुम्हारे गुरु हैं उसी प्रकार मैं भी तो उनसे अधिक तुम्हारी गुरु हूँ ! यदि पिताने तुमसे वन जानेको कहा है तो मैं तुम्हें रोकती हूँ ॥ १२ ॥ यदि मेरे वाक्यका
| सर्ग ४ ] | अयोध्याकाण्ड | ५९ |
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| यदि गच्छसि मद्वाक्यमुल्लङ्घ्य नृपवाक्यतः ।<br>तदा प्राणान्परित्यज्य गच्छामि यमसादनम् ॥१३॥ | उल्लङ्घन कर तुम राजाकी आज्ञासे वनको चले जाओगे तो मैं अपना प्राण छोड़कर यमपुरको चली जाऊँगी” ॥ १३ ॥ |
| लक्ष्मणोऽपि ततः श्रुत्वा कौसल्यावचनं रुषा ।<br>उवाच राघवं वीक्ष्य दहन्निव जगत्त्रयम् ॥१४॥ | तब लक्ष्मणने भी कौसल्याके वचन सुनकर रामजीकी ओर देखकर रोषसे त्रिलोकीको दग्ध करते हुए-से कहा ॥ १४ ॥ “मैं उन्मत्त, भ्रान्तचित्त और कैकेयीके |
| उन्मत्तं भ्रान्तमनसं कैकेयीवशवर्तिनम् ।<br>बद्ध्वा निहन्मि भरतं तद्वन्धून्मातुलानपि ॥१५॥ | वशवर्ती राजा दशरथको बाँधकर भरतको उनके सहायक मामा आदिके सहित मार डालूँगा ॥ १५ ॥ आज |
| अद्य पश्यन्तु मे शौर्यं लोकान्प्रदहतः पुरा ।<br>राम त्वमभिषेकाय कुरु यत्नमरिन्दम ॥१६॥<br>धनुष्पाणिरहं तत्र निहन्यां विघ्नकारिणः । | सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेवाले कालानलके समान मेरे पौरुषको पहले वे सब लोग देख लें । हे शत्रुदमन राम ! आप अभिषेककी तैयारी कीजिये ॥१६॥ उसमें विघ्न उपस्थित करनेवालोंको मैं हाथमें धनुष-बाण लेकर मार डालूँगा ।” |
| इति ब्रुवन्तं सौमित्रिमालिङ्ग्य रघुनन्दनः ॥१७॥<br>शूरोऽसि रघुशार्दूल ममात्यन्तहिते रतः ।<br>जानामि सर्वं ते सत्यं किन्तु तत्समयो नहि॥१८॥ | लक्ष्मणजीके इस प्रकार कहनेपर रघुनाथजीने उन्हें गले लगाकर कहा ॥ १७ ॥ “हे रघुश्रेष्ठ ! तुम बड़े शूरवीर और मेरे परम हितकारी हो । तुम जो कुछ कहते हो वह मैं सब सत्य मानता हूँ, किन्तु यह उसका समय नहीं है ॥ १८ ॥ यह जो कुछ राज्य और देह |
| यदिदं दृश्यते सर्वं राज्यं देहादिकं च यत् ।<br>यदि सत्यं भवेत्तत्र आयासः सफलश्च ते ॥१९॥ | आदि दिखायी देता है वह सब यदि सत्य होता तो अवश्य तुम्हारा परिश्रम सफल होता ॥ १९ ॥ किन्तु |
| भोगा मेघवितानस्थविद्युल्लेखेव चञ्चलाः ।<br>आयुरप्यग्निसन्तप्तलोहस्थजलविन्दुवत् ॥२०॥ | ये भोग तो मेघरूपी वितानमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं और आयु अग्निमें तपाये हुए लोहेपर पड़ी हुई जलकी बूँदके समान क्षणिक है॥ २० ॥ |
| यथा व्यालगलस्थोऽपि भेको दंशानपेक्षते ।<br>तथा कालाहिना ग्रस्तो लोको भोगानशाश्वतान् २१ | जिस प्रकार सर्पके मुँहमें पड़ा हुआ भी मेंढक मच्छरोंको ताकता रहता है उसी प्रकार लोग कालरूप सर्पसे ग्रस्त हुए भी अनित्य भोगोंको चाहते रहते हैं ॥२१॥ कैसा |
| करोति दुःखेन हि कर्मतन्त्रं<br>शरीरभोगार्थमहर्निशं नरः ।<br>देहस्तु भिन्नः पुरुषात्समीक्ष्यते<br>को वात्र भोगः पुरुषेण भुज्यते ॥२२॥ | आश्चर्य है कि शरीरके भोगोंके लिये ही मनुष्य रात-दिन अति कष्ट सहकर नाना प्रकारकी क्रियाएँ करता रहता है । यदि यह समझ ले कि शरीर आत्मासे भिन्न है तो फिर भला पुरुष कैसे किसी भोगको भोग सकता है ? ॥ २२ ॥ पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धु- |
| पितृमातृसुतभ्रातृदारबन्ध्वादिसङ्गमः ।<br>प्रपायामिव जन्तूनां नद्यां काष्ठौघवच्चलः ॥२३॥ | बान्धवोंका संयोग प्याऊपर एकत्रित हुए जीवों अथवा नदी-प्रवाहसे इकट्ठी हुई लकड़ियोंके समान चञ्चल है ॥ २३ ॥ यह निस्सन्देह दिखायी पड़ता है कि |
| छायेव लक्ष्मीश्चपला प्रतीता<br>तारुण्यमम्बूर्विवदध्रुवं च।<br>स्वप्नोपमं स्त्रीसुखमायुरल्पं<br>तथापि जन्तोरभिमान एषः ॥२४॥ | लक्ष्मी छायाके समान चञ्चल, यौवन जल-तरंगके समान अनित्य है, स्त्री-सुख स्वप्नके समान मिथ्या और आयु अत्यन्त अल्प है तथापि प्राणियोंका इनमें कितना अभिमान है ? ॥२४॥ यह संसार सदा रोगादि-संकुल |
| ६० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| संसृतिः स्वप्नसदृशी सदा रोगादिसङ्कुला ।<br>गन्धर्वनगरप्रख्या मूढस्तामनुवर्तते ॥२५॥ | तथा स्वप्न और गन्धर्व-नगरके समान मिथ्या है, मूढ़-जन ही इसको सत्य मानकर इसका अनुकरण करते हैं ॥२५॥ |
| आयुष्यं क्षीयते यस्मादादित्यस्य गतागतैः ।<br>दृष्ट्वाऽन्येषां जरामृत्यू कथञ्चिन्नैव बुध्यते ॥२६॥ | नित्य सूर्यके उदय और अस्त होनेसे आयु क्षीण हो रही है तथा नित्य ही दूसरोंकी वृद्धावस्था और मृत्यु होती देखी जाती है तो भी मूढ़ पुरुषको किसी प्रकार चेत नहीं होता ॥२६॥ |
| स एव दिवसः सैव रात्रिरित्येव मूढधीः ।<br>भोगाननुपतत्येव कालवेगं न पश्यति ॥२७॥ | नित्यप्रति उसी प्रकार दिन और रात होते हैं किन्तु मूढ़मति पुरुष भोगोंके पीछे ही दौड़ता है, कालकी गतिको नहीं देखता ॥२७॥ |
| प्रतिक्षणं क्षरत्येतदायुरामघटाम्बुवत् ।<br>सपत्ना इव रोगौघाः शरीरं प्रहरन्त्यहो ॥२८॥ | कच्चे घड़ेमें भरे हुए जलके समान आयु प्रतिक्षण क्षीण हो रही है और रोग-समूह शत्रुओंके समान शरीरको सुकाये डालते हैं ॥२८॥ |
| जरा व्याघ्रीव पुरतस्तर्जयन्त्यवतिष्ठते ।<br>मृत्युः सहैव यात्येष समयं सम्प्रतीक्षते ॥२९॥ | वृद्धावस्था सिंहिनीके समान डराती हुई सामने खड़ी है और यह मृत्यु भी उसके साथ ही चलती हुई (अन्त) समयकी प्रतीक्षा कर रही है ॥२९॥ |
| देहेऽहंभावमापन्नो राजाऽहं लोकविश्रुतः ।<br>इत्यस्मिन्मनुते जन्तुः कृमिविड्भस्मसंज्ञिते ॥३०॥ | किन्तु देहमें अहं-भावना करनेवाला जीव इस कृमि, विष्ठा और भस्मरूप शरीरको ही 'मैं लोक-प्रसिद्ध राजा हूँ' ऐसा मानता है ॥३०॥ |
| त्वगस्थिमांसविण्मूत्ररेतोरक्तादिसंयुतः ।<br>विकारी परिणामी च देह आत्मा कथं वद ॥३१॥ | हे लक्ष्मण ! तुम कुछ सोचकर बताओ कि जिसके आश्रयसे तुम संसारको दग्ध करना चाहते हो वह त्वचा, अस्थि, मांस, विष्ठा, मूत्र, शुक्र और रुधिर आदिसे बना हुआ विकारी और परिणामी देह आत्मा किस प्रकार हो सकता है ! |
| यमास्थाय भवाँल्लोकं दग्धुमिच्छति लक्ष्मण ।<br>देहाभिमानिनः सर्वे दोषाः प्रादुर्भवन्ति हि ॥३२॥ | हे भाई ! इस देहाभिमानसे युक्त पुरुषोंमें ही सम्पूर्ण दोष प्रकट हुआ करते हैं ॥३१-३२॥ |
| देहोऽहमिति या बुद्धिरविद्या सा प्रकीर्तिता ।<br>नाहं देहश्चिदात्मेति बुद्धिर्विद्येति भण्यते ॥३३॥ | 'मैं देह हूँ' इस बुद्धिका नाम ही अविद्या है और 'मैं देह नहीं, चेतन-आत्मा हूँ' इसको विद्या कहते हैं ॥३३॥ |
| अविद्या संसृतेर्हेतुर्विद्या तस्या निवर्तिका ।<br>तस्माद्यत्नः सदा कार्यो विद्याभ्यासे मुमुक्षुभिः ।<br>कामक्रोधादयस्तत्र शत्रवः शत्रुसूदन ॥३४॥ | अविद्या जन्म-मरणरूप संसारकी कारण है और विद्या उसको निवृत्त करनेवाली है; अतः मोक्ष-कामियोंको सदा विद्योपार्जनका प्रयत्न करना चाहिये । हे शत्रुदमन ! काम-क्रोध आदि इस साधनमें विघ्न करनेवाले शत्रु हैं ॥३४॥ |
| तत्रापि क्रोध एवालं मोक्षविघ्नाय सर्वदा ।<br>येनाविष्टः पुमान्हन्ति पितृभ्रातृसुहृत्सखीन् ॥३५॥ | उनमें भी मोक्षमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तो एकमात्र क्रोध ही पर्याप्त है, जिसका आवेश होनेसे पुरुष पिता, माता, सुहृद् और बन्धुओंका भी वध कर डालता है ॥३५॥ |
| क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् ।<br>धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्क्रोधं परित्यज ॥३६॥ | मनके सन्तापका मूल क्रोध ही है और क्रोध ही संसारका बन्धन तथा धर्मका क्षय करनेवाला है । इसलिये तुम क्रोधको छोड़ दो ॥३६॥ |
| क्रोध एष महान् शत्रुस्तृष्णा वैतरणी नदी ।<br>सन्तोषो नन्दनवनं शान्तिरेव हि कामधुक् ॥३७॥ | यह क्रोध महान् शत्रु है, तृष्णा वैतरणी नदी है, सन्तोष नन्दनवन है और शान्ति ही कामधेनु है ॥३७॥ |
| तस्मात्क्षान्तिं भजस्वाद्य शत्रुरेवं भवेन्न ते । | इसलिये तुम शान्ति धारण करो, इससे (क्रोधरूपी) शत्रु का तुमपर प्रभाव न होगा । |
| देहेन्द्रियमनःप्राणबुद्ध्यादिभ्यो विलक्षणः ॥३८॥ | आत्मा |
सर्ग ४ ] अयोध्याकाण्ड ६१
| आत्मा शुद्धः स्वयंज्योतिरविकारी निराकृतिः ।<br>यावद्देहेन्द्रियप्राणैर्भिन्नत्वं नात्मनो विदुः ॥३९॥<br>तावत्संसारदुःखौघैः पीड्यन्ते मृत्युसंयुताः ।<br>तस्मात्त्वं सर्वदा भिन्नमात्मानं हृदि भावय ॥४०॥<br>बुद्ध्यादिभ्यो बहिः सर्वमनुवर्तस्व मा खिदः ।<br>भुञ्जन्प्रारब्धमखिलं सुखं वा दुःखमेव वा ॥४१॥<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यसे ।<br>बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥४२॥<br>अन्तःशुद्धस्वभावस्त्वं लिप्यसे न च कर्मभिः ।<br>एतन्मयोदितं कृत्स्नं हृदि भावय सर्वदा ॥४३॥<br>संसारदुःखैरखिलैर्बाध्यसे न कदाचन ।<br>त्वमप्यम्ब मयादिष्टं हृदि भावय नित्यदा ॥४४॥<br>समागमं प्रतीक्षस्व न दुःखैः पीड्यसे चिरम् ।<br>न सदैकत्र संवासः कर्ममार्गानुवर्तिनाम् ॥४५॥<br>यथा प्रवाहपतितप्लवानां सरितां तथा ।<br>चतुर्दशसमा सङ्ख्या क्षणार्द्धमिव जायते ॥४६॥<br>अनुमन्यस्व मामम्ब दुःखं सन्त्यज्य दूरतः ।<br>एवं चेत्सुखसंवासो भविष्यति वने मम ॥४७॥ | देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिसे पृथक् तथा शुद्ध स्वयंप्रकाश, अविकारी और निराकार है । जबतक मनुष्य देह, इन्द्रिय और प्राण आदिसे आत्माकी भिन्नता नहीं जानते तबतक वे मृत्युपाशमें बँधकर सांसारिक दुःखसमूहसे पीडित होते रहते हैं । इसलिये तुम सर्वदा अपने हृदयमें बुद्धि आदिसे आत्माको भिन्न अनुभव करो, इस सम्पूर्ण बाह्य व्यवहारका अनुवर्तन करो; और सुख अथवा दुःखरूप जैसा प्रारब्ध हो उसीको भोगते हुए चित्तमें खेद न मानो ॥ ३८-४१ ॥ हे रघुपूत्र ! बाहरसे ( इन्द्रिय आदिद्वारा ) कर्तृत्व प्रकट करते हुए जो कार्य प्रारब्धवश उपस्थित हो उसे करते रहनेसे भी तुम बन्धनमें नहीं पड़ोगे ॥४२॥ भीतरसे राग-द्वेषरहित और शुद्धस्वभाव रहनेके कारण तुम कर्मोंसे लिप्त न होगे। मेरे इस सम्पूर्ण कथनपर तुम सर्वदा अपने हृदयमें विचार करो ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे तुम सम्पूर्ण सांसारिक दुःखोंसे कभी बाधित न होगे । हे मात: ! तुम भी मेरे इस कथनपर नित्य विचार करना ॥ ४४ ॥ और मेरे फिर मिलनेकी प्रतीक्षा करती रहना । तुम्हें अधिक काल दुःख न होगा। कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवोंका सदा एक ही साथ रहना-सहना नहीं हुआ करता ॥ ४५ ॥ जैसे नदीके प्रवाहमें पड़कर बहती हुई डोंगियाँ सदा साथ-साथ ही नहीं चलतीं । माता ! यह चौदह वर्षकी अवधि आधे क्षणके समान बीत जायगी, आप अब दुःखको दूर करके हमें वन जानेकी अनुमति दीजिये । आपके ऐसा करनेसे मैं वनमें सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ ४६-४७ ॥ |
| इत्युक्त्वा दण्डवन्मातुः पादयोरपतच्चिरम् ।<br>उत्थाप्याङ्के समावेश्य आशीर्भिरभ्यनन्दयत्॥४८॥ | ऐसा कह श्रीरामचन्द्रजी बहुत देरतक दण्डके समान माताके चरणोंमें पड़े रहे । तदनन्तर माताने उन्हें उठाकर गोदमें बैठा लिया और आशीर्वाद देकर उनकी प्रशंसा की ॥ ४८ ॥ वे बोलीं-“तुम्हारे |
| सर्वे देवाः सगन्धर्वा ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।<br>रक्षन्तु त्वां सदा यान्तं तिष्ठन्तं निद्रया युतम्॥४९॥ | चलते, बैठते अथवा सोते समय गन्धर्वों-सहित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिक सम्पूर्ण देवगण तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें" ॥ ४९ ॥ |
| इति प्रस्थापयामास समालिङ्ग्य पुनः पुनः ।<br>लक्ष्मणोऽपि तदा रामं नत्वा हर्षाश्रुगद्गदः ॥५०॥<br>आह राम ममान्तस्थः संशयोऽयं त्वया हृतः । | इस प्रकार बारम्बार हृदयसे लगाकर माताने रामको विदा किया । तब लक्ष्मणजीने भी रामजीसे आँखोंमें आनन्दाश्रु भरकर गद्गद वाणीसे कहा-“हे राम ! आपने मेरा आन्तरिक सन्देह दूर कर दिया, अब मैं |
| .६२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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यास्यामि पृष्ठतो राम सेवां कर्तुं तदादिश ॥५१॥
अनुगृह्णीष्व मां राम नोचेत्प्राणांस्त्यजाम्यहम् ।
तथेति राघवोऽप्याह लक्ष्मणं याहि माचिरम्॥५२॥
प्रतस्थे तां समाधातुं गतः सीतापतिर्विभुः ।
आगतं पतिमालोक्य सीता सुस्मितभाषिणी ॥५३॥
स्वर्णपात्रस्थसलिलैः पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।
पप्रच्छ पतिमालोक्य देव किं सेनया विना ॥५४॥
आगतोऽसि गतः कुत्र श्वेतच्छत्रं च ते कुतः ।
वादित्राणि न वाद्यन्ते किरीटादि विवर्जितः ॥५५॥
सामन्तराजसहितः सम्भ्रमान्नागतोऽसि किम् ।
इति स सीतया पृष्टो रामः सस्मितमब्रवीत् ॥५६॥
राज्ञा मे दण्डकारण्ये राज्यं दत्तं शुभेऽखिलम् ।
अतस्तत्पालनाथार्थाय शीघ्रं यास्यामि भामिनि ।५७।
अद्यैव यास्यामि वनं त्वं तु श्वश्रूसमीपगा ।
शुश्रूषां कुरु मे मातुर्न मिथ्यावादिनो वयम् ॥५८॥
इति ब्रुवन्तं श्रीरामं सीता भीताऽब्रवीद्वचः ।
किमर्थं वनराज्यं ते पित्रा दत्तं महात्मना ॥५९॥
तामाह रामः कैकेय्यै राजा प्रीतो वरं ददौ ।
भरताय ददौ राज्यं वनवासं समानघे ॥६०॥
चतुर्दश समास्तत्र वासो मे किल याचितः ।
तया देव्या ददौ राजा सत्यवादी दयापरः ॥६१॥
अतः शीघ्रं गमिष्यामि मा विघ्नं कुरु भामिनि।
श्रुत्वा तद्रामवचनं जानकी प्रीतिसंयुता ॥६२॥
अहमग्रे गमिष्यामि वनं पश्चात्त्वमेष्यसि ।
इत्याह मां विना गन्तुं तव राघव नोचितम् ॥६३॥
हिन्दी अनुवाद
आपकी सेवा करनेके लिये आपके पीछे-पीछे चलूँगा, आप इसके लिये आज्ञा दीजिये ॥ ५०-५१ ॥ हे प्रभो ! आप मुझपर कृपा कीजिये, नहीं तो मैं प्राण छोड़ दूँगा।” तब रघुनाथजीने भी लक्ष्मणसे कहा—'बहुत अच्छा, चलो देरी न करो' ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सीतापति भगवान् राम सीताजीको समझानेके लिये चले और अपने महलमें पहुँचे तब मन्द-मुसकानपूर्वक बोलनेवाली श्रीसीताजीने पतिदेवको आते देख एक सुवर्ण-पात्रमें जल लेकर भक्तिपूर्वक उनके चरण धोये और स्वामीकी ओर देखते हुए पूछा—"देव ! इस समय सेनाके बिना ही आप कैसे आये हैं ? आप प्रातःकाल कहाँ गये थे ? आपका श्वेत छत्र कहाँ है ? बाजोंका बजना क्यों बन्द हो गया है और आप किरीटादि राजोचित आभूषणोंसे रहित क्यों हैं ? ॥ ५३-५५ ॥ आप मन्त्री और राजाओंके सहित बड़े ठाट-बाटसे क्यों नहीं आये ?”
सीताजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा ॥ ५६ ॥ "हे शुभे ! पिताजीने मुझे दण्डकारण्यका सम्पूर्ण राज्य दिया है, अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही उसका प्रबन्ध करनेके लिये वहाँ जाऊँगा ॥ ५७ ॥ मैं आज ही वनको जा रहा हूँ; तुम अपनी सासुके पास जाकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें रहो । मैं झूठ नहीं बोलता" ॥ ५८ ॥
रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीने भयभीत होकर कहा—"आपके महात्मा पिताजीने आपको वनका राज्य क्यों दिया है ?” ॥ ५९ ॥
तब रामचन्द्रजीने उनसे कहा—"हे अनघे ! महाराजने प्रसन्नतापूर्वक कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे वनवास दिया है ॥ ६० ॥ देवी कैकेयीने मेरे लिये चौदह वर्षतक वनमें रहना माँगा था, सो सत्यवादी दयालु महाराजने देना स्वीकार कर लिया है ॥ ६१ ॥ अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही वहाँ जाऊँगा, तुम इसमें किसी प्रकारका विघ्न खड़ा न करना।” रामचन्द्रजीके ऐसे वचन सुनकर सीताजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—"पहले मैं वनको जाऊँगी उसके पीछे आप आना । हे राघव ! मुझे छोड़कर आपको वनमें जाना उचित नहीं है” ॥ ६२-६३ ॥
| सर्ग ४ ] | अयोध्याकाण्ड | ६३ |
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तामाह राघवः प्रीतः स्वप्रियां प्रियवादिनीम् ।<br>कथं वनं त्वां नेष्येऽहं बहुव्याघ्रमृगाकुलम् ॥६४॥<br>राक्षसा घोररूपाश्च सन्ति मानुषभोजिनः ।<br>सिंहव्याघ्रवराहाश्च सञ्चरन्ति समन्ततः ॥६५॥<br>कद्वम्लफलमूलानि भोजनार्थं सुमध्यमे ।<br>अपूपानि व्यञ्जनानि विद्यन्ते न कदाचन ॥६६॥<br>काले काले फलं वाऽपि विद्यते कुत्र सुन्दरि ।<br>मार्गो न दृश्यते क्वापि शर्कराकण्टकान्वितः ॥६७॥<br>गुहागह्वरसम्बाधं झिल्लीदंशादिभिर्युतम् ।<br>एवं बहुविधं दोषं वनं दण्डकसंज्ञितम् ॥६८॥<br>पादचारेण गन्तव्यं शीतवातातपादिमत् ।<br>राक्षसादीन्वने दृष्ट्वा जीवितं हास्यसेऽचिरात् ॥६९॥<br>तस्माद्भद्रे गृहे तिष्ठ शीघ्रं द्रक्ष्यसि मां पुनः ।<br>रामस्य वचनं श्रुत्वा सीता दुःखसमन्विता ॥७०॥<br>प्रत्युवाच स्फुरद्वक्त्रा किञ्चित्कोपसमन्विता ।<br>कथं मामिच्छसे त्यक्तुं धर्मपत्नीं पतिव्रताम् ॥७१॥<br>त्वदनन्यामदोषां मां धर्मज्ञोऽसि दयापरः ।<br>त्वत्समीपे स्थितां राम को वा मां धर्षयेद्वने ॥७२॥<br>फलमूलादिकं यद्यत्तव भुक्तावशेषितम् ।<br>तदेवामृततुल्यं मे तेन तुष्टा रमाम्यहम् ॥७३॥<br>त्वया सह चरन्त्या मे कुशाः काशाश्च कण्टकाः ।<br>पुष्पास्तरणतुल्या मे भविष्यन्ति न संशयः ॥७४॥<br>अहं त्वां क्लेशये नैव भवेयं कार्यसाधिनी ।<br>बाल्ये मां वीक्ष्य कश्चिद्वै ज्योतिःशास्त्रविशारदः ॥<br>प्राह ते विपिने वासः पत्या सह भविष्यति ।<br>सत्यवादी द्विजो भूयाद्गमिष्यामि त्वया सह ॥७६॥ | तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर अपनी प्रिया प्रियवादिनी जानकीसे कहा—"मैं तुम्हें अनेकों व्याघ्रादि वन्य-पशुओंसे पूर्ण वनमें कैसे साथ ले चलूँ ॥ ६४ ॥ वहाँ मनुष्योंको खानेवाले भयंकर राक्षस रहते हैं और सब ओर सिंह, व्याघ्र तथा शूकर आदि हिंस्र-जीव फिरते हैं ॥ ६५ ॥ हे सुन्दर कमरवाली ! वहाँ भोजनके लिये कडुए और खट्टे फल-मूलादि ही मिलते हैं; किसी प्रकारके पूए आदि व्यञ्जन वहाँ कभी नहीं मिलते ॥ ६६ ॥ हे सुन्दरि ! वे फल भी सदा नहीं मिलते, किसी-किसी समय कहीं मिलते हैं । उस वनमें कहीं-कहीं तो धूलि और काँटोंसे ढके रहनेके कारण मार्ग भी दिखायी नहीं देता ॥ ६७ ॥ वह दण्डकारण्य ऐसे ही अनेकों दोषोंसे भरा हुआ है । उसमें अनेकों गुफाएँ और गडढे हैं तथा वह झिल्ली और डाँसोंसे भरा हुआ है ॥ ६८ ॥ ऐसे वनमें शीत, वायु और घाम आदिके समय भी पैदल ही चलना पड़ता है । मुझे सन्देह है कि तुम वनमें राक्षसादिको भयंकर मूर्त्ति देखकर तुरन्त ही प्राणत्याग कर बैठोगी ॥ ६९ ॥ इसलिये हे भद्रे ! तुम घर ही रहो, मुझे शीघ्र ही फिर देख पाओगी ।"<br>रामके ये वचन सुनकर सीताने दुःखातुर होकर कुछ क्रोधसे ओंठ काँपते हुए कहा—"मुझ पतिव्रता धर्मपत्नीको आप घर क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥ ७०-७१ ॥ आप धर्मज्ञ और दयालु हैं फिर अपनी अनन्यभक्ता और दोषहीना मुझ पत्नीको क्यों छोड़ते हैं ? हे राम ! वनमें भी आपके पास रहते हुए मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है ? ॥ ७२ ॥ जो भी फल-मूलादि आपके खानेसे बचेंगे वे ही मेरे लिये अमृतके समान होंगे । उनसे सन्तुष्ट होकर मैं आनन्दपूर्वक रहूँगी ॥ ७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके साथ विचरते हुए मेरे लिये कुश-कास और कण्टकादि भी फूलोंके समान होंगे ॥ ७४ ॥ मैं आपको किसी प्रकारका कष्ट न दूँगी, बल्कि आपके कार्यमें सहायिका होऊँगी । बाल्यावस्थामें एक ज्योतिषशास्त्र-विशारद महात्माने मुझे देखकर कहा था कि तू अपने पतिके साथ वनमें रहेगी । उन ब्राह्मण महोदयका वाक्य सत्य हो, मैं अवश्य आपके साथ वनमें चलूँगी ॥ ७५-७६ ॥ एक बात और कहती हूँ, उसे सुनकर आप मुझे वनको ले चलिये । आपने बहुत-से |
| ६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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अन्यत्किञ्चित्प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा मां नय काननम्।
रामायणानि बहुशः श्रुतानि बहुभिर्द्विजैः ॥७७॥
सीतां विना वनं रामो गतः किं कुत्राचिद्वद ।
अतस्त्वया गमिष्यामि सर्वथा त्वत्सहायिनी ॥७८॥
यदि गच्छसि मां त्यक्त्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः
इति तं निश्चयं ज्ञात्वा सीताया रघुनन्दनः ॥७९॥
अब्रवीद्देवि गच्छ त्वं वनं शीघ्रं मया सह ।
अरुन्धत्यै प्रयच्छाशु हारानाभरणानि च ॥८०॥
ब्राह्मणेभ्यो धनं सर्वं दत्त्वा गच्छामहे वनम् ।
इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाशु द्विजानाहूय भक्तितः ॥८१॥
ददौ गवां वृन्दशतं धनानि
वस्त्राणि दिव्यानि विभूषणानि ।
कुटुम्बवद्भ्यः श्रुतशीलवद्भ्यो
मुदा द्विजेभ्यो रघुवंशकेतुः ॥८२॥
अरुन्धत्यै ददौ सीता मुख्यान्याभरणानि च ।
रामो मातुः सेवकेभ्यो ददौ धनमनेकधा ॥८३॥
स्वक्रान्तःपुरवासिभ्यः सेवकेभ्यस्तथैव च ।
पौरजानपदेभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ॥८४॥
लक्ष्मणोऽपि सुमित्रां तु कौसल्यायै समर्पयत् ।
धनुष्पाणिः समागत्य रामस्याग्रे व्यवस्थितः ॥८५॥
रामः सीता लक्ष्मणश्च जग्मुः सर्वे नृपालयम् ॥८६॥
श्रीरामः सह सीतया नृपपथे गच्छन् शनैः सानुजः
पौरान् जानपदान्कुतूहलदृशः सानन्दमुद्वीक्षयन् ।
श्यामः कामसहस्रसुन्दरवपुः कान्त्या दिशो भासयन् ।
पादन्यासपवित्रिताऽखिलजगत् प्रापालयं तत्पितुः ॥८७॥
हिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणोंके मुखसे बहुत-सी रामायणें सुनी होंगी ॥७७॥ बताइये, इनमेंसे किसीमें भी क्या सीताके बिना रामजी वनको गये हैं ? अतः मैं आपकी पूर्णतया सहायिका होकर अवश्य आपके साथ चलूँगी ॥७८॥ यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अभी आपके सामने ही अपने प्राण छोड़ दूँगी।"
तब रघुनाथजीने सीताका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर कहा—"देवि ! तुम शीघ्र ही मेरे साथ वनको चलो; ये हार आदि सम्पूर्ण आभूषण वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीको दे दो ॥७९-८०॥ हम अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर वनको चलेंगे।"
ऐसा कह भगवान् रामने लक्ष्मणजीद्वारा भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको बुलवाया ॥८१॥ और उन रघुकुलकेतु भगवान् रामने प्रसन्नतापूर्वक सैकड़ों गौओंके झुण्ड, बहुत-सा धन, दिव्य वस्त्र और आभूषण कुटुम्बी तथा विद्वान् और शीलसम्पन्न ब्राह्मणोंको दिये ॥८२॥
सीताजीने अपने मुख्य-मुख्य आभूषण अरुन्धतीजीको दे दिये तथा अपनी माताके सेवकोंको भी रामने बहुत-सा धन दिया ॥८३॥ इसी प्रकार अपने अन्तःपुरवासी सेवकों, पुरवासियों, देशवासियों तथा ब्राह्मणोंको भी उन्होंने बहुत-सा धन दिया ॥८४॥
इधर श्रीलक्ष्मणजीने भी अपनी माता सुमित्राको कौसल्याजीको सौंप दिया और आप हाथमें धनुष लेकर रामके सामने आकर खड़े हो गये । तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता सब महाराज दशरथके पास चले ॥८५-८६॥
सहस्रों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम शरीरवाले भगवान् राम सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित अपनी कान्तिसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए धीरे-धीरे राजमार्गसे चले । उस समय जो पुरवासी और जनपदवासी लोग कुतूहलवश आनन्दमयी दृष्टिसे उनकी ओर देख रहे थे उनके देखते हुए और अपने चरण-स्पर्शसे सम्पूर्ण संसारको पवित्र करते हुए वे अपने पिताके घर पहुँचे ॥८७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
चतुर्थः सर्गः ॥४॥
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ५: भगवान्का वनगमन
[ सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६५
पञ्चम सर्ग
भगवान्का वनगमन
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले—जानकी और लक्ष्मणके सहित |
|---|---|
| आयान्तं नागरा दृष्ट्वा मार्गे रामं सजानकिम् ।<br>लक्ष्मणेन समं वीक्ष्य ऊचुः सर्वे परस्परम् ॥ १ ॥<br>कैकेय्या वरदानादि श्रुत्वा दुःखसमावृताः ।<br>बत राजा दशरथः सत्यसन्धं प्रियं सुतम् ॥ २ ॥<br>स्त्रीहेतोरत्यजत्कामी तस्य सत्यवता कुतः ।<br>कैकेयी वा कथं दुष्टा रामं सत्यं प्रियङ्करम् ॥ ३ ॥<br>विवासयामास कथं क्रूरकर्माऽतिमूढधीः ।<br>हे जना नात्र वस्तव्यं गच्छामोऽद्यैव काननम् ॥ ४॥<br>यत्र रामः सभार्यश्च सानुजो गन्तुमिच्छति ।<br>पश्यन्तु जानकीं सर्वे पादचारेण गच्छतीम् ॥ ५ ॥<br>पुंभिः कदाचिद्दृष्टा वा जानकी लोकसुन्दरी ।<br>साऽपि पादेन गच्छन्ती जनसङ्घेष्वनावृता ॥ ६ ॥<br>रामोऽपि पादचारेण गजाश्वादि विवर्जितः ।<br>गच्छति द्रक्ष्यथ विभुं सर्वलोकैकसुन्दरम् ॥ ७॥<br>राक्षसी कैकेयीनाम्नी जाता सर्वविनाशिनी ।<br>रामस्यापि भवेद्दुःखं सीतायाः पादयानतः ॥ ८ ॥<br>बलवान्विधिरेवात्र पुंप्रयत्नो हि दुर्बलः । | श्रीरामचन्द्रजीको मार्गमें आते देख और कैकेयीके वरदानादिका समाचार सुन समस्त नगरवासी दुःखार्तुर होकर आपसमें कहने लगे—“हाय ! कामवश राजा दशरथने अपने सत्यपरायण प्रिय पुत्रको स्त्रीके कहनेसे क्यों छोड़ दिया ? उसकी सत्यता कहाँ चली गयी ? और दुष्टा कैकेयीने भी सत्यवादी और प्रियकारी रामको क्यों वनवास दिया ? वह ऐसी क्रूरकर्मा और हतबुद्धि क्यों हो गयी ? भाइयो ! अब हमें यहाँ न रहना चाहिये; हम भी आज ही वनको चलेंगे, जहाँ स्त्री और छोटे भाईके सहित श्रीराम जाना चाहते हैं। देखो तो, आज जानकीजी पैदल चल रही हैं ॥ १-५ ॥ हाय ! जिस त्रिलोकसुन्दरी जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो, वही आज बिना किसी परदेके जनसमूहमें पैदल चल रही हैं ॥ ६ ॥ भाइयो ! इन सर्वलोकैकसुन्दर भगवान् रामकी ओर भी देखो; ये भी आज बिना हाथी-घोड़ेके पैदल ही जा रहे हैं ॥ ७ ॥ यह कैकेयी-नामकी राक्षसी सबका नाश करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भाई ! इन सीताजीके पैदल चलनेसे रामजीको भी तो बड़ा दुःख होता होगा ॥ ८ ॥ किन्तु किया क्या जाय ? इसमें दैव ही प्रबल है, पुरुषका प्रयत्न सर्वथा असमर्थ है ।” |
| इति दुःखाकुले वृन्दे साधूनां मुनिपुङ्गवः ॥ ९ ॥<br>अब्रवीद्वामदेवोऽथ साधूनां सङ्घमध्यगः ।<br>मानुशोचथ रामं वा सीतां वा वच्मि तत्त्वतः ॥ १० ॥<br>एष रामः परो विष्णुरादिनारायणः स्मृतः ।<br>एषा सा जानकी लक्ष्मीर्योगमायेति विश्रुता ॥ ११ ॥<br>असौ शेषस्तमन्वेति लक्ष्मणाख्यश्च साम्प्रतम् ।<br>एष मायागुणैर्युक्तस्तत्तदाकारवानिव ॥ १२ ॥<br>एष एव रजोयुक्तो ब्रह्माऽभूद्विश्वभावनः ।<br>सत्त्वाविष्टस्तथा विष्णुस्त्रिजगत्प्रतिपालकः ॥ १३॥ | इस प्रकार साधु-समाजको दुःखार्तुर देख मुनिवर वामदेव उनके बीचमें आकर कहने लगे—“मैं आप-लोगोंको वास्तविक बात बताता हूँ, आप इन राम और सीताके लिये किसी प्रकारकी चिन्ता न करें ॥ ९-१० ॥ ये राम आदिनारायण भगवान् विष्णु हैं और ये जानकीजी योगमाया नामसे विख्यात श्रीलक्ष्मीजी हैं ॥ ११ ॥ इस समय जो लक्ष्मण नाम धारणकर इनका अनुगमन कर रहे हैं ये शेषजी हैं। ये पुरुषोत्तम भगवान् ही मायाके गुणोंसे युक्त होकर विभिन्न आकारवाले-से प्रतीत हुआ करते हैं ॥ १२ ॥ रजोगुणसे युक्त होकर ये ही विश्वरचयिता ब्रह्माजी हुए हैं और सत्त्वगुणविशिष्ट होनेपर ये ही त्रिलोक- |
६
६६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
एष रुद्रस्तामसोऽन्ते जगत्प्रलयकारणम् । एष मत्स्यः पुरा भूत्वा भक्तं वैवस्वतं मनुम् ॥१४॥ नाव्यारोप्य लयस्यान्ते पालयामास राघवः । समुद्रमथने पूर्वं मन्दरे सुतलं गते ॥१५॥ अधारयत्स्वपृष्ठेऽद्रिं कूर्मरूपी रघूत्तमः । महीं रसातलं याता प्रलये सूकरोऽभवत् ॥१६॥ तोलयामास दंष्ट्राग्रे तां क्षोणीं रघुनन्दनः । नारसिंहं वपुः कृत्वा प्रह्लादवरदः पुरा ॥१७॥ त्रैलोक्यकण्टकं रक्षः पाटयामास तन्नखैः । पुत्रराज्यं हृतं दृष्ट्वा ह्यदित्या याचितः पुरा ॥१८॥ वामनत्वमुपागम्य याच्ञया चाहरतपुनः । दुष्टक्षत्रियभूभारनिवृत्त्यै भार्गवोऽभवत् ॥१९॥ स एव जगतां नाथ इदानीं रामतां गतः । रावणादीनि रक्षांसि कोटिशो निहनिष्यति ॥२०॥ मानुषेणैव मरणं तस्य दृष्टं दुरात्मनः । राज्ञा दशरथेनापि तपसाऽऽराधितो हरिः ॥२१॥ पुत्रत्वाकाङ्क्षया विष्णोस्तदा पुत्रोऽभवद्धरिः । स एव विष्णुः श्रीरामो रावणादिवधाय हि ॥२२॥ गन्ताऽद्यैव वनं रामो लक्ष्मणेन सहायवान् । एषा सीता हरेर्माया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥२३॥ राजा वा कैकेयी वापि नात्र कारणमण्वपि । पूर्वेद्युर्नारदः प्राह भूभारहरणाय च ॥२४॥ रामोऽप्याह स्वयं साक्षाच्छ्वो गमिष्याम्यहं वनम् । अतो रामं समुद्दिश्य चिन्तां त्यजत बालिशाः ॥२५॥ रामरामेति ये नित्यं जपन्ति मनुजा भुवि । तेषां मृत्युभयादीनि न भवन्ति कदाचन ॥२६॥
रक्षक भगवान् विष्णु होते हैं ॥१३॥ तथा कल्पान्त-में तमोगुणका आश्रय कर ये ही जगत्का प्रलय करनेवाले रुद्र होते हैं । पूर्वकालमें इन्हीं रघुनाथजीने मत्स्यरूप होकर अपने भक्त वैवस्वत मनुको नावमें बैठाकर प्रलयकालके समय उनकी रक्षा की थी । समुद्र-मन्थनके समय, जब मन्दराचल पाताल-लोकको जाने लगा ॥१४-१५॥ तब इन्हीं रघुनाथजीने कूर्मरूप होकर उसे अपनी पीठपर धारण किया था । प्रलयकालमें जब पृथिवी रसातलको चली गयी तो ये शूकररूप हुए ॥१६॥ और उस पृथिवीको अपनी दाढ़ोंपर उठा लिया । इसी प्रकार एक बार प्रह्लादको वर देनेके लिये इन्होंने नृसिंहरूप धारण किया ॥१७॥ और तीनों लोकोंके कण्टकरूप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको अपने नखोंसे फाड़ डाला । एक बार, अपने पुत्र इन्द्रका राज्य गया हुआ देख जब अदितिने इनसे प्रार्थना की ॥१८॥ तब इन्होंने वामनरूप धारणकर याचना करके उसे फिर लौटा लिया । इन्होंने पृथिवीके भाररूप दुष्ट क्षत्रिय-गणोंको नष्ट करनेके लिये भृगुपुत्र परशुरामका रूप धारण किया था ॥१९॥ वे ही जगत्प्रभु इस समय रामरूपसे प्रकट हुए हैं; अब ये रावण आदि करोड़ों राक्षसोंका वध करेंगे ॥२०॥ उस दुरात्माकी मृत्यु मनुष्यके हाथ ही बदी है । महाराज दशरथने (अपने पूर्वजन्ममें) तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी इसलिये आराधना की थी कि वे उनके यहाँ पुत्ररूपसे अवतार लें; इसलिये भगवान् इनके पुत्र हुए हैं । वे विष्णु भगवान् ही श्रीरामचन्द्रजी हैं । अब ये रावणके वधके लिये आज ही लक्ष्मणसहित वनको जायेंगे । ये सीताजी जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाली साक्षात् भगवान्की माया हैं ॥२१-२३॥ इनके वन-गमनमें राजा या कैकेयी अणुमात्र भी कारण नहीं हैं । कल ही इनसे नारदजीने पृथिवी-का भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी ॥२४॥ उस समय स्वयं रामने भी उनसे यही कहा था कि कल मैं वनको जाऊँगा । अतः भोले भाइयो ! आप-लोग रामके लिये कोई चिन्ता न करें ॥२५॥ संसारमें जो लोग नित्य प्रति 'राम-राम' जपा करते हैं उनको भी किसी समय मृत्युके भय आदि नहीं
सर्ग ५] अयोध्याकाण्ड ६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| का पुनस्तस्य रामस्य दुःखशङ्का महात्मनः।<br>रामनाम्नैव मुक्तिः स्यात्कलौ नान्येन केनचित् ॥२७॥ | होते ॥२६॥ फिर उन महात्मा रामके लिये तो दुःखकी शंका ही कैसे हो सकती है ? कलियुगमें तो एकमात्र राम-नामसे ही मुक्ति हो सकती है और किसी उपायसे नहीं ॥२७॥ |
| मायामानुषरूपेण विडम्बयति लोककृत् ।<br>भक्तानां भजनार्थाय रावणस्य वधाय च ॥२८॥ | ये जगत्कर्त्ता प्रभु भक्तोंको गुण-कीर्तनका सुयोग देनेके लिये और रावणको मारनेके लिये ही मायामानुषरूपसे संसारमें लीला कर रहे हैं ॥२८॥ |
| राजाभीष्टसिद्धयर्थं मानुषं वपुराश्रितः ।<br>इत्युक्त्वा विररामाथ वामदेवो महामुनिः ॥२९॥ | इसके सिवा राजा दशरथकी मनोरथ-सिद्धिके लिये भी इन्होंने यह मनुष्य-शरीर धारण किया है।" ऐसा कह महामुनि वामदेवजी मौन हो गये ॥२९॥ |
| श्रुत्वा तेऽपि द्विजाः सर्वे रामं ज्ञात्वा हरिं विभुम् ।<br>जहुर्हृत्संशयग्रन्थि राममेवान्वचिन्तयन् ॥३०॥ | यह सुन वहाँ एकत्रित हुए सब द्विजगणोंने भी भगवान् रामको सर्वव्यापक श्रीविष्णु भगवान् जाना और वे अपने हृदयका संशय छोड़कर श्री-रामचन्द्रजीका ही स्मरण करने लगे ॥३०॥ |
| य इदं चिन्तयेन्नित्यं रहस्यं रामसीतयोः।<br>तस्य रामे दृढा भक्तिर्भवेद्विज्ञानपूर्विका ॥३१॥ | 'जो पुरुष नित्यप्रति राम और सीताके इस रहस्यका मनन करेगा, उसकी भगवान् राममें विज्ञानके सहित दृढ-भक्ति हो जायगी ॥३१॥ |
| रहस्यं गोपनीयं वो यूयं वै राघवप्रियाः ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तेऽपि रामं परं विदुः ॥३२॥ | आप सब लोग रामके परम प्रिय हैं अतः इस रहस्यको सदा गुप्त रक्खें।' ऐसा कह विप्रवर वामदेवजी वहाँसे चले गये और पुरजनोंने भी जाना कि राम परमात्मा हैं ॥३२॥ |
| ततो रामः समाविश्य पितुर्गेहमवारितः ।<br>सानुजः सीतया गत्वा कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥३३॥ | तदनन्तर रामजीने बिना किसी रोक-टोकके पिताके महलमें प्रवेश किया और लक्ष्मण तथा सीताके सहित वहाँ पहुँचकर कैकेयीसे कहा—॥३३॥ |
| आगताः स्मो वयं मातस्त्वयस्ते सम्मतं वनम् ।<br>गन्तुं कृतधियः शीघ्रमाज्ञापयतु नः पिता ॥३४॥ | "माताजी ! आपके कथनानुसार हम तीनों बनको जानेके लिये तैयार होकर आ गये हैं; अब शीघ्र ही पिताजी हमें आज्ञा दें" ॥३४॥ |
| इत्युक्ता सहसोत्थाय चीराणि प्रददौ स्वयम् ।<br>रामाय लक्ष्मणायाथ सीतायै च पृथक् पृथक् ॥३५॥ | रामके ऐसा कहनेपर कैकेयीने सहसा उठकर स्वयं ही राम, लक्ष्मण और सीताको अलग-अलग वल्कल-वस्त्र दिये ॥३५॥ |
| रामस्तु वस्त्राण्युत्सृज्य वन्यचीराणि पर्यधात् ।<br>लक्ष्मणोऽपि तथा चक्रे सीता तन्न विजानती ॥३६॥ | तब रामचन्द्रजीने अपने राजोचित वस्त्रोंको उतारकर बनवासियोंके-से वस्त्र धारण किये; लक्ष्मणजीने भी ऐसा ही किया किन्तु सीताजी उन्हें पहनना नहीं जानती थीं ॥३६॥ |
| हस्ते गृहीत्वा रामस्य लज्जया मुखमैक्षत ।<br>रामो गृहीत्वा तच्चीरमंशुके पर्यवेष्टयत् ॥३७॥ | अतः उन वस्त्रोंको हाथमें लेकर वे लज्जापूर्वक रामजीकी ओर देखने लगीं । तब रामचन्द्रजीने उस चीरको लेकर सीताजीके वस्त्रोंपर ही लपेट दिया ॥३७॥ |
| तद्दृष्ट्वा रुरुदुः सर्वे राजदाराः समन्ततः ।<br>वसिष्ठस्तु तदाकर्ण्य रुदितं भर्त्सयन् रुषा ॥३८॥ | यह देखकर रनिवासकी सभी स्त्रियाँ रोने लगीं । तब वसिष्ठजीने उनके रोनेका शब्द सुनकर क्रोधित हो कैकेयीको डाँटते हुए कहा—"अयि दुःशीले ! |
| ६६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
|---|
[मूल संस्कृत श्लोक]
कैकेयीं प्राह दुर्बुत्ते राम एव त्वया वृतः ।
वनवासाय दुष्टे त्वं सीतायै किं प्रयच्छसि ॥ ३९ ॥
यदि रामं समन्वेति सीता भक्त्या पतिव्रता ।
दिव्याम्बरधरा नित्यं सर्वाभरणभूषिता ॥ ४० ॥
रमयन्यनिशं रामं वनदुःखन्निवारिणी ।
राजा दशरथोऽप्याह सुमन्त्रं रथमानय ॥ ४१ ॥
रथमारुह्य गच्छन्तु वनं वनचरप्रियाः ।
इत्युक्त्वा राममालोक्य सीतां चैव सलक्ष्मणम् ॥ ४२ ॥
दुःखान्निपतितो भूमौ रुरोदाश्रुपरिप्लुतः ।
आरुरोह रथं सीता शीघ्रं रामस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥
रामः प्रदक्षिणं कृत्वा पितरं रथमारुहत् ।
लक्ष्मणः खड्गयुगलं धनुस्तूणीयुगं तथा ॥ ४४ ॥
गृहीत्वा रथमारुह्य नोदयामास सारथिम् ।
तिष्ठ तिष्ठ सुमन्त्रेति राजा दशरथोऽब्रवीत् ॥ ४५ ॥
गच्छ गच्छेति रामेण नोदितोऽचोदयद्रथम् ।
रामे दूरं गते राजा मूर्च्छितः प्रापतद्भुवि ॥ ४६ ॥
पौरास्तु बालवृद्धाश्च वृद्धा ब्राह्मणसत्तमाः ।
तिष्ठ तिष्ठेति रामेति क्रोशन्तो रथमन्वयुः ॥ ४७ ॥
राजा रुदित्वा सुचिरं मां नयन्तु गृहं प्रति ।
कौसल्याया राममातुरित्याह परिचारकान् ॥ ४८ ॥
किञ्चित्कालं भवेत्तत्र जीवनं दुःखितस्य मे ।
अत ऊर्ध्वं न जीवामि चिरं रामं विना कृतः ॥ ४९ ॥
ततो गृहं प्रविश्यैव कौसल्यायाः पपात ह ।
मूर्च्छितश्च चिराल्लब्ध्वा तूष्णीमेवावतस्थिवान् ॥ ५० ॥
रामस्तु तमसातीरं गत्वा तत्रावसत्सुखी ।
जलं प्राश्य निराहारो वृक्षमूलेऽस्वपद्विभुः ॥ ५१ ॥
सीतया सह धर्मात्मा धनुष्पाणिस्तु लक्ष्मणः ।
पालयामास धर्मज्ञः सुमन्त्रेण समन्वितः ॥ ५२ ॥
[हिन्दी अनुवाद]
तूने तो केवल रामके वन जानेका ही वर माँगा है न ? फिर तू सीताको भी वनके वस्त्र कैसे देती है ? ॥ ३८-३९ ॥ यदि पतिव्रता सीता भक्तिवश रामके साथ जाना चाहती है तो वह समस्त आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य वस्त्र धारण किये हुए ही जाय ॥ ४० ॥ तथा नित्यप्रति रामके वनवास-दुःखको दूर करती हुई उनको आनन्दित करे।”
तब महाराज दशरथने सुमन्त्रसे कहा—“सुमन्त्र ! तुम रथ ले आओ ॥ ४१ ॥ वनवासियोंके प्रिय ये राम आदि रथपर चढ़कर ही वनको जायँगे।” ऐसा कह वे सीता और लक्ष्मणके सहित रामको देख-कर दुःखसे पृथिवीपर गिर पड़े और आँखोंमें आँसू भरकर रोने लगे। तब रामजीके देखते-देखते शीघ्र ही सीताजी रथपर चढ़ीं ॥ ४२-४३ ॥ फिर रामचन्द्रजी पिताकी परिक्रमा कर रथारूढ हुए और उनके पीछे दो खड्ग तथा दो धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजी सवार हुए और सारथीसे रथ हाँकनेको कहा। तब राजा दशरथ कहने लगे—'सुमन्त्र ! ठहरो, ठहरो' ॥ ४४-४५ ॥ किन्तु रामचन्द्रजीने 'चलो, चलो' कहकर शीघ्रता करनेको कहा। इसलिये सुमन्त्रने रथ हाँक दिया। रामके दूर निकल जानेपर महाराज मूच्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ४६ ॥ तदनन्तर समस्त पुरवासी, बालक-वृद्ध और वयोवृद्ध मुनिगण 'हे राम ! ठहरो, मत जाओ' इस प्रकार चिल्लाते हुए रथके पीछे-पीछे चले ॥ ४७ ॥
राजा दशरथ बहुत देरतक रोते रहे, फिर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा—“मुझे रामकी माता कौसल्याके घर ले चलो ॥ ४८ ॥ मुझ दुखियाका वहाँ रहकर कुछ काल जीना हो सकता है; किन्तु रामसे रहित होकर अब मैं अधिक काल जीवित नहीं रह सकूँगा” ॥ ४९ ॥ तब कौसल्याके घर पहुँचते ही राजा अचेत होकर पृथिवीपर गिर पड़े; फिर बहुत देर पीछे चेत होनेपर वे चुपचाप बैठे रहे ॥ ५० ॥
इधर श्रीरामचन्द्रजी तमसा-नदीके तटपर पहुँचकर वहाँ सुखपूर्वक रहे और रात्रिके समय बिना कुछ आहार किये केवल जल पीकर सीताजीके सहित वृक्षके नीचे सो गये। तथा सुमन्त्रके सहित धर्मात्मा
सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६९
मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद
पौराः सर्वे समागत्य स्थितास्तस्याविदूरतः ।
शक्ता रामं पुरं नेतुं नोचेद्गच्छामहे वनम् ॥ ५३ ॥
इति निश्चयमाज्ञाय तेषां रामोऽतिविस्मितः ।
नाहं गच्छामि नगरमेते वै क्लेशभागिनः ॥ ५४ ॥
भविष्यन्तीति निश्चित्य सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ।
इदानीमेव गच्छामः सुमन्त्र रथमानय ॥ ५५ ॥
लक्ष्मणजी धनुष लेकर उनकी रक्षा करते रहे ॥ ५१-५२ ॥ उनके पास ही समस्त पुरवासी आकर ठहर गये। उन्होंने निश्चय किया कि हम या तो रामको अयोध्या लौटा ले चलेंगे, नहीं तो हम भी इनके साथ वनको ही चले जायँगे ॥ ५३ ॥ रामचन्द्रजीको उनके इस निश्चयका पता चलनेपर अति विस्मय हुआ और उन्होंने यह सोचकर कि मैं तो अयोध्याको लौटूँगा नहीं, ये व्यर्थ वनमें क्लेश भोगेंगे, सुमन्त्रको बुलाकर कहा—"सुमन्त्र, तुम रथ ले आओ, हम अभी चलेंगे" ॥ ५४-५५ ॥
इत्याज्ञप्तः सुमन्त्रोऽपि रथं वाहैरयोजयत् ।
आरुह्य रामः सीता च लक्ष्मणोऽपि ययुर्द्रुतम् ॥ ५६ ॥
अयोध्याभिमुखं गत्वा किञ्चिद्दूरं ततो ययुः।
तेऽपि राममदृष्ट्वैव प्रातरुत्थाय दुःखिताः ॥ ५७ ॥
रथनेमिगतं मार्गं पश्यन्तस्ते पुरं ययुः ।
हृदि रामं ससीतं ते ध्यायन्तस्तस्थुरन्वहम् ॥ ५८ ॥
रामकी ऐसी आज्ञा होनेपर सुमन्त्रने रथमें घोड़े जोत दिये तब राम, लक्ष्मण और सीता उसपर चढ़कर शीघ्रतासे चले ॥ ५६ ॥ उन्होंने अपना रथ कुछ दूर अयोध्याकी ओर ले जाकर फिर वनकी ओर बढ़ाया। प्रातःकाल होनेपर पुरवासियोंने उठकर जब रामको न देखा तो वे अत्यन्त दुःखी हुए ॥ ५७ ॥ और रथके पहियोंकी लीकके मार्गको देखते हुए वे अयोध्यापुरी लौट आये तथा प्रतिदिन हृदयमें राम और सीताका ध्यान करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ ५८ ॥
सुमन्त्रोऽपि रथं शीघ्रं नोदयामास सादरम् ।
स्फीतान् जनपदान्पश्यन् रामः सीतासमन्वितः ॥
गङ्गातीरं समागच्छच्छृङ्गवेराविदूरतः ।
गङ्गां दृष्ट्वा नमस्कृत्य स्नात्वा सानन्दमानसः ॥ ६० ॥
इधर सुमन्त्रने भी शीघ्र ही आदरपूर्वक अपना रथ बढ़ाया। तब सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी विस्तृत देशोंको देखते हुए शृंगवेरपुरके पास गंगाजीके तटपर पहुँचे। गंगाजीको देखकर उन्होंने प्रसन्न-चित्तसे नमस्कार करके स्नान किया ॥ ५९-६० ॥ और फिर
शिंशपावृक्षमूले स निपसाद रघूत्तमः ।
ततो गुहो जनैः श्रुत्वा रामागमनमहोत्सवम् ॥ ६१ ॥
सखायं स्वामिनं द्रष्टुं हर्षात्तूर्णं समापतत् ।
फलानि मधुपुष्पादि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥ ६२ ॥
रामस्याग्रे विनिक्षिप्य दण्डवत्प्रापतद्भुवि ।
गुहमुत्थाप्य तं तूर्णं राघवः परिषस्वजे ॥ ६३ ॥
रघुश्रेष्ठ रामजी शिंशपा (सीसमके) वृक्षकी छायामें बैठे। इसी समय निषादराज गुहने लोगोंके मुखसे रामजीके आनेका मंगलसमाचार सुना ॥ ६१ ॥ यह सुनते ही वह तुरन्त अपने एकमात्र सखा और स्वामी श्रीरघुनाथजीको देखनेके लिये प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक फल, शहद और पुष्पादि लेकर वहाँ आया ॥ ६२ ॥ और वह भेंटकी सामग्री रामके आगे डालकर दण्डके समान पृथिवीपर गिर पड़ा। तब श्रीरघुनाथजीने उसे तुरन्त ही उठाकर गले लगा लिया ॥ ६३ ॥
संपृष्टकुशलो रामं गुहः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
धन्योऽहमद्य मे जन्म नैषादं लोकपावन ॥ ६४ ॥
बभूव परमानन्दः स्पृष्ट्वा तेऽङ्गं रघूत्तम । ...
तदुपरान्त रामजीके कुशल पूछनेपर गुहने हाथ जोड़कर कहा—"हे लोकपावन ! मैं धन्य हूँ, आज मेरा निषाद-जातिमें जन्म लेना सफल हो गया ॥ ६४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आपके अंगसंगसे मुझे परम आनन्द प्राप्त
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ६: गङ्गोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट
६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६
७०
नैषादराज्यमेतत्ते किङ्करस्य रघूत्तम ॥ ६५ ॥
त्वदधीनं वसन्नत्र पालयास्मान् रघूद्वह ।
आगच्छ यामो नगरं पावनं कुरु मे गृहम् ॥ ६६ ॥
गृहाण फलमूलानि त्वदर्थं सञ्चितानि मे ।
अनुगृहीष्व भगवन् दासस्तेऽहं सुरोत्तम ॥ ६७ ॥
हुआ है । हे रघुवर ! आपके दासका यह नैषाद-राज्य आपहीका है इसलिये हे रघुनाथजी ! आप यहाँ रहकर हमलोगोंकी रक्षा कीजिये । चलिये नगरमें पधारकर मेरा घर पवित्र कीजिये ॥ ६५-६६ ॥ हे भगवन् ! आपके लिये मैंने जो कुछ फल-मूलादि एकत्रित किये हैं उन्हें स्वीकार कीजिये । हे सुरश्रेष्ठ ! मैं आपका दास हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये" ॥ ६७ ॥
रामस्तमाह सुप्रीतो वचनं शृणु मे सखे ।
न वेक्ष्यामि गृहं ग्रामं नव वर्षाणि पञ्च च ॥ ६८ ॥
दत्तमन्येन नो भुञ्जे फलमूलादि किञ्चन ।
राज्यं ममैतत्त्वे सर्वं त्वं सखा मेऽतिवल्लभः ॥ ६९ ॥
तब रामचन्द्रजीने अति प्रसन्न होकर उससे कहा—"मित्र ! सुनो, मैं चौदह वर्षतक किसी घर या गाँवमें नहीं जा सकता ॥ ६८ ॥ और न किसी औरके दिये हुए फल-मूलादि ही खा सकता हूँ । मित्र ! तुम्हारा यह सम्पूर्ण राज्य मेरा ही है और तुम भी मेरे अत्यन्त प्रिय सखा हो" ॥ ६९ ॥
वटक्षीरं समानाय्य जटामुकुटमादरात् ।
बबन्ध लक्ष्मणेनाथ सहितो रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
जलमात्रं तु सम्प्राश्य सीतया सह राघवः ।
आस्तृतं कुशपर्णाद्यैः शयनं लक्ष्मणेन हि ॥ ७१ ॥
उवास तत्र नगरप्रासादाग्रे यथा पुरा ।
सुष्वाप तत्र वैदेह्या पर्यङ्क इव संस्कृते ॥ ७२ ॥
ततोऽविदूरे परिगृह्य चापं
सवाणतूणीरधनुः स लक्ष्मणः ।
ररक्ष रामं परितो विपश्यन्
गुहेन सार्धं सशरासनेन ॥ ७३ ॥
तदनन्तर रघुनाथजीने वटका दूध मँगाकर लक्ष्मणके सहित भली प्रकार सँवारकर जटाजूट बाँधे ॥ ७० ॥ लक्ष्मणजीने कुश और पत्तोंकी एक शय्या बना दी, उसीपर केवल जल पीकर सीताके सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हुए और पहले जिस प्रकार अयोध्यापुरीके महलमें जनकनन्दिनीके सहित सुसज्जित पलंगपर पौढ़ते थे उसी प्रकार सो गये ॥ ७१-७२ ॥ उनके पास ही धनुष, बाण और तरकश लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी धनुषधारी गुहके सहित धनुष चढ़ाकर इधर-उधर देखते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी रखवाली करने लगे ॥ ७३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
गंगोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट ।
श्रीमहादेव उवाच
सुप्तं रामं समालोक्य गुहः सोऽश्रुपरिप्लुतः ।
लक्ष्मणं प्राह विनयाद् भ्रातः पश्यसि राघवम् ॥ १ ॥
शयानं कुशपत्रौघसंस्तरे सीतया सह ।
यः शेते स्वर्णपर्यङ्के स्वास्तीर्णे भवनोत्तमे ॥ २ ॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! उस समय रामजीको सोते देख गुहने आँखोंमें आँसू भरकर नम्रतापूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—"भाई ! देखते हो, जो रघुनाथजी अपने भव्य-भवनमें सुन्दर बिछौनेसे युक्त सुवर्ण-निर्मित पलंगपर पौढ़ते थे वे ही आज सीताजीके सहित कुश और पत्तोंकी साथरीपर पड़े
सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७१
कैकेयी रामदुःखस्य कारणं विधिना कृता । मन्थराबुद्धिमाश्रित्य कैकेयी पापमाचरत् ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह सखे शृणु वचो मम । कः कस्य हेतुर्दुःखस्य कश्च हेतुः सुखस्य वा ॥ ४ ॥ स्वपूर्वार्जितकर्मैव कारणं सुखदुःखयोः ॥ ५ ॥ सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा । अहं करोमीति वृथाऽभिमानः स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥ ६ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनद्वेष्यमध्यस्थबान्धवाः । स्वयमेवाचरन्कर्म तथा तत्र विभाव्यते ॥ ७ ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं स्वकर्मवशगो नरः । यद्यद्यथागतं तत्तद् भुक्त्वा स्वस्थमना भवेत् ॥ ८ ॥ न मे भोगागमे वाञ्छा न मे भोगविवर्जने । आगच्छत्वथ मागच्छत्वभोगवशगो भवेत् ॥ ९ ॥ यस्मिन् देशे च काले च यस्माद्वा येन केन वा । कृतं शुभाशुभं कर्म भोक्तव्यं तत्तत्र नान्यथा ॥ १० ॥ अलं हर्षविषादाभ्यां शुभाशुभफलोदये । विधात्रा विहितं यद्यत्तदलङ्घ्यं सुरासुरैः ॥ ११ ॥ सर्वदा सुखदुःखाभ्यां नरः प्रत्यवरुध्यते । शरीरं पुण्यपापाभ्यामुत्पन्नं सुखदुःखवत् ॥ १२ ॥ सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । द्वयमेतद्धि जन्तूनामलङ्घ्यं दिनरात्रिवत् ॥ १३ ॥ सुखमध्ये स्थितं दुःखं दुःखमध्ये स्थितं सुखम् । द्वयमन्योन्यसंयुक्तं प्रोच्यते जलपङ्कवत् ॥ १४ ॥ तस्माद्धैर्येण विद्वांस इष्टानिष्टोपपत्तिषु । न हृष्यन्ति न मुह्यन्ति सर्वं मायेति भावनात् ॥ १५ ॥
गुहलक्ष्मणयोरेवं भाषतोर्विमलं नभः । बभूव रामः सलिलं स्पृष्ट्वा प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥
हुए हैं ॥ १-२ ॥ विधाताने रामजीके इस दुःखका कारण कैकेयीको बना दिया। मन्थराकी बुद्धिपर विश्वास करके कैकेयीने यह बड़ा पापका काम किया !” ॥ ३ ॥
यह सुनकर लक्ष्मणजीने कहा-“भाई ! मेरी बात सुनो; किसीके दुःख अथवा सुखका कारण दूसरा कौन है ? अर्थात् कोई भी नहीं है। मनुष्यका पूर्वकृत कर्म ही उसके सुख अथवा दुःखका कारण होता है ॥४-५॥ सुख और दुःखका देनेवाला कोई और नहीं है; 'कोई अन्य सुख-दुःख देता है' यह समझना कुबुद्धि है। 'मैं करता हूँ' यह वृथा अभिमान है, क्योंकि लोग अपने-अपने कर्मोंकी डोरीमें बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ यह मनुष्य स्वयं ही पृथक्-पृथक् आचरण करके उसके अनुसार सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, द्वेष्य, मध्यस्थ और बन्धु आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ७ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि प्रारब्धानुसार सुख या दुःख जो कुछ भी जैसे-जैसे प्राप्त हो उसे वैसे ही भोगते हुए सदा प्रसन्नचित्त रहे ॥ ८ ॥ हमें न तो भोगोंकी प्राप्तिकी इच्छा है और न उन्हें त्यागनेकी । भोग आयें या न आयें हम भोगोंके अधीन नहीं हैं ॥९॥ जिस देश अथवा जिस कालमें जिस-किसीके द्वारा शुभ अथवा अशुभ कर्म किया जाता है, उसे निसन्देह उसी प्रकार भोगना पड़ता है ॥ १० ॥ अतः शुभ अथवा अशुभ कर्मफलके उदय होनेपर हर्ष अथवा दुःख मानना व्यर्थ है, क्योंकि विधाताकी गतिका देवता अथवा दैत्य कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता ॥ ११॥ मनुष्य सदा ही सुख और दुःखसे घिरा रहता है क्योंकि मनुष्य-शरीर पाप और पुण्यके मेलसे उत्पन्न होनेके कारण सुख-दुःखमय ही है ॥ १२ ॥ सुखके पीछे दुःख और दुःखके पीछे सुख आता है। ये दोनों ही दिन और रात्रिके समान जीवोंसे अनुल्लङ्घनीय हैं ॥१३॥ सुखके भीतर दुःख और दुःखके भीतर सुख सर्वदा वर्तमान रहता है। ये दोनों ही जल और कीचड़के समान आपसमें मिले हुए रहते हैं ॥ १४ ॥ इसलिये विद्वान् लोग ‘सब कुछ माया ही है' इस भावनाके कारण इष्ट या अनिष्टकी प्राप्तिमें धैर्य रखकर हर्ष या शोक नहीं मानते” ॥ १५ ॥
गुह और लक्ष्मणके इस प्रकार बातचीत करते-करते आकाशमें उजाला हो गया। तब रामचन्द्रजीने
६६ ७२ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ६
उवाच शीघ्रं सुदृढां नावमानय मे सखे ।
श्रुत्वा रामस्य वचनं निषादाधिपतिर्गुहः ॥ १७ ॥
स्वयमेव दृढां नावमानिनाय सुलक्षणाम् ।
स्वामिन्नारुह्यतां नौकां सीतया लक्ष्मणेन च ॥ १८ ॥
वाहये ज्ञातिभिः सार्धमहमेव समाहितः ।
तथेति राघवः सीतामारोप्य शुभलक्षणाम् ॥ १९ ॥
गुहस्य हस्तावालम्ब्य स्वयं चारोहदच्युतः ।
आयुधादीन् समारोप्य लक्ष्मणेऽप्यारुरोह च ॥ २० ॥
गुहस्तान्वाहयामास ज्ञातिभिः सहितः स्वयम् ।
गङ्गामध्ये गता गङ्गां प्रार्थयामास जानकी ॥ २१ ॥
देवि गङ्गे नमस्तुभ्यं निवृत्ता वनवासतः ।
रामेण सहिताहं त्वां लक्ष्मणेन च पूजये ॥ २२ ॥
इत्युक्त्वा परकूलं तौ शनैरुत्तीर्य जग्मतुः ॥ २३ ॥
गुहोऽपि राघवं प्राह गमिष्यामि त्वया सह ।
अनुज्ञां देहि राजेन्द्र नोचेत्प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥ २४ ॥
श्रुत्वा नैषादिवचनं श्रीरामस्तमथाब्रवीत् ।
चतुर्दश समाः स्थित्वा दण्डके पुनरप्यहम् ॥ २५ ॥
आयास्याम्युदितं सत्यं नासत्यं रामभाषितम् ।
इत्युक्त्वाऽऽलिङ्ग्य तं भक्तं समाश्वास्य पुनः पुनः ॥
निवर्तयामास गुहं सोऽपि कृच्छ्राद्ययौ गृहम् ॥ २७ ॥
ततो रामस्तु वैदेह्या लक्ष्मणेन समन्वितः ॥ २८ ॥
भरद्वाजाश्रमपदं गत्वा बहिरुपस्थितः ।
तत्रैकं वटुकं दृष्ट्वा रामः प्राह च हे वटो ॥ २९ ॥
रामो दाशरथिः सीता लक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
आस्ते बहिर्वनस्येति ह्युच्यतां मुनिसन्निधौ ॥ ३० ॥
तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा पादयोः पतितो मुनेः ।
स्वामिन् रामः समागत्य वनाद्वहिरवस्थितः ॥ ३१ ॥
सावधानतापूर्वक आचमन कर प्रातःक्रिया की ॥ १६ ॥ और बोले—"मित्र ! शीघ्र ही मेरे लिये एक सुदृढ़ नौका लाओ।" रामके ये वचन सुनकर निषादराज गुह स्वयं ही एक सुलक्षण-सम्पन्न सुदृढ़ नौका ले आये और बोले—"स्वामिन् ! सीता और लक्ष्मणके सहित नावपर चढ़िये ॥ १७-१८ ॥ अपने ज्ञाति-भाइयोंके साथ स्वयं इसे सावधानतापूर्वक चलाऊँगा।" तब रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह प्रथम शुभलक्षणा सीताजीको उसपर चढ़ाया ॥ १९ ॥ फिर गुहका हाथ पकड़कर श्रीअच्युत भगवान् रघुनाथजी स्वयं चढ़े। तदनन्तर अपने आयुधादिकों रख श्रीलक्ष्मणजी नौकारूढ़ हुए ॥ २० ॥
तब गुहने अपने ज्ञाति-भाइयोंके सहित स्वयं नौका चलायी। जिस समय नाव गङ्गाके बीचमें पहुंची तब जानकीजीने गङ्गाजीसे प्रार्थना की—॥ २१ ॥ "देवि गङ्गे ! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ। वनवाससे लौटनेपर मैं राम और लक्ष्मणके सहित तुम्हारी पूजा करूँगी।" इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् वे शनैः-शनैः पार उतरकर आगे चलने लगे ॥ २२-२३ ॥ तब गुहने श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे राजेन्द्र ! मैं भी आपके साथ ही चलूँगा; आप मुझे आज्ञा दीजिये, नहीं तो मैं प्राण छोड़ दूँगा" ॥ २४ ॥
निषादपुत्रके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—"मैं चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहकर यहाँ फिर आऊँगा। मैं जो कुछ कहता हूँ सत्य ही कहता हूँ, रामकी बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती।" ऐसा कह रामजीने भक्त गुहको ढाढ़स बँधा उसे बारम्बार गले लगाकर विदा किया। तब निषादराज गुह बड़ी कठिनतासे घर लौटे ॥ २५-२७ ॥
तदनन्तर जानकी और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी भरद्वाज मुनिके आश्रमके पास पहुँचकर बाहर खड़े हो गये। वहाँ एक ब्रह्मचारीको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"हे वटो ! मुनिवरसे जाकर कहो कि दशरथका पुत्र राम सीता और लक्ष्मणके सहित आश्रमके बाहर खड़ा है" ॥ २८-३० ॥
रघुनाथजीका यह कथन सुनकर ब्रह्मचारीने तुरन्त ही मुनिवरके पास जाकर उनके चरणोंमें शिर रखकर कहा—"भगवन् ! पत्नी और छोटे भाईके सहित
सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७३
| सभार्यः सानुजः श्रीमानाह मां देवसन्निभः ।<br>भरद्वाजाय मुनये ज्ञापयस्व यथोचितम् ॥ ३२ ॥ | श्रीमान् रामचन्द्र आये हैं और आश्रमके बाहर खड़े हैं। उन देवतुल्य श्रीरामजीने मुझसे कहा है कि मुनिवर भरद्वाजको इसकी यथायोग्य सूचना दो” ॥ ३१-३२ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय भरद्वाजो मुनीश्वरः ।<br>गृहीत्वार्घ्यं च पाद्यं च रामसामीप्यमाययौ ॥ ३३ ॥ | यह सुनकर मुनिनाथ भरद्वाज सहसा उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्यादि लेकर रामके पास आये ॥ ३३ ॥ |
| दृष्ट्वा रामं यथान्यायं पूजयित्वा सलक्ष्मणम् ।<br>आह मे पर्णशालां भो राम राजीवलोचन ॥ ३४ ॥ | रामको देखकर उन्होंने लक्ष्मणजीसहित उनकी नियमानुसार पूजा की और कहा—“हे राम ! हे कमलनयन |
| आगच्छ पादरजसा पुनीहि रघुनन्दन ।<br>इत्युक्त्वोटजमानाय्य सीतया सह राघवौ ॥ ३५ ॥ | रघुनन्दन ! आइये, अपनी चरण-रजसे मेरी पर्णशालाको पवित्र कीजिये।” ऐसा कह वे सीताजीके सहित दोनों रघुकुमारोंको अपनी कुटियामें ले आये ॥ ३४-३५ ॥ |
| भक्त्या पुनः पूजयित्वा चकारातिथ्यमुत्तमम् ।<br>अद्याहं तपसः पारं गतोऽस्मि तव सङ्गमात् ॥ ३६ ॥ | और फिर उनका भक्तिपूर्वक पूजन कर भली प्रकार आतिथ्य-सत्कार किया तदनन्तर मुनिवर बोले—“राम ! आज आपके समागमसे मेरी तपस्या पूर्ण हो गयी ॥ ३६ ॥ |
| ज्ञातं राम तवोदन्तं भूतं चागामिकं च यत् ।<br>जानामि त्वां परात्मानं मायया कार्यमानुषम् ॥ ३७ ॥ | हे रघुनन्दन ! मैं आपका भूत और भविष्यत् सम्पूर्ण वृत्तान्त जानता हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि आप साक्षात् परमात्मा हैं और कार्यकी सिद्धिके लिये ही मायासे मनुष्यरूप हुए हैं ॥ ३७ ॥ |
| यदर्थमवतीर्णोऽसि प्रार्थितो ब्रह्मणा पुरा ।<br>यदर्थं वनवासस्ते यत्करिष्यसि वै पुरः ॥ ३८ ॥ | पूर्वकालमें ब्रह्माके प्रार्थना करनेसे जिसलिये आपने अवतार लिया है, जिसलिये आपको वनवास हुआ है और जो कुछ आप |
| जानामि ज्ञानदृष्ट्याहं जातया त्वदुपासनात् ।<br>इतः परं त्वां किं वक्ष्ये कृतार्थोऽहं रघूत्तम ॥ ३९ ॥ | आगे करेंगे वह सब, आपकी उपासनाद्वारा प्राप्त हुई ज्ञान-दृष्टिसे मैं जानता हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपसे मैं अधिक क्या कहूँ ? मैं तो कृतार्थ हो गया, जो |
| यस्त्वां पश्यामि काकुत्स्थं पुरुषं प्रकृतेः परम् ।<br>रामस्तमभिवाद्याह सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥ ४० ॥ | आज प्रकृतिसे परे साक्षात् पुरुषोत्तम आप ककुत्स्थनन्दनको देख रहा हूँ।”<br><br>तब सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम करके कहा—॥ ३८-४० ॥ |
| अनुग्राह्यास्त्वया ब्रह्मन्वयं क्षत्रियबान्धवाः ।<br>इति सम्भाष्यतेऽन्योन्यमुषित्वा मुनिसन्निधौ ॥ ४१ ॥ | “ब्रह्मन् ! हम क्षत्रिय-कुलोत्पन्न हैं; अतः आपकी कृपाके पात्र हैं” इस प्रकार परस्पर एक दूसरेसे कहनेके उपरान्त वे मुनिके यहाँ ठहर गये ॥ ४१ ॥ |
| प्रातरुत्थाय यमुनामुत्तीर्य मुनिदारकैः ।<br>कृताप्लवेन मुनिना दृष्टमार्गेण राघवः ॥ ४२ ॥ | प्रातःकाल जागनेपर श्रीरघुनाथजी मुनिकुमारोंकी बनायी हुई डोंगीपर चढ़कर यमुनाके पार हुए और मुनिवरके बताये हुए मार्गसे चित्रकूट-पर्वतकी ओर |
| प्रययौ चित्रकूटार्द्रिं वाल्मीकेर्यत्र चाश्रमः ।<br>गत्वा रामोऽथ वाल्मीकेराश्रमं ऋषिसङ्कुलम् ॥ ४३ ॥ | चले जहाँ वाल्मीकिजीका आश्रम था। उस ऋषिगणोंसे भरे हुए, नाना मृग और पक्षियोंसे समाकुल तथा सर्वदा फल-पुष्पादिसे परिपूर्ण वाल्मीकिजीके |
| नानामृगद्विजाकीर्णं नित्यपुष्पफलाकुलम् ।<br>तत्र दृष्ट्वा समासीनं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ॥ ४४ ॥ | आश्रममें जाकर श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी बैठे हुए हैं ॥ ४२-४४ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने |
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| ७४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ६ |
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ननाम शिरसा रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।<br>दृष्ट्वां रामं रमानाथं वाल्मीकिर्लोकसुन्दरम् ॥४५॥<br>जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ।<br>कन्दर्पसदृशाकारं कमनीयाम्बुजेक्षणम् ॥४६॥ | लक्ष्मण और सीताके सहित उन्हें शिर झुकाकर प्रणाम किया। तब श्रीवाल्मीकिजीने सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवकी-सी आकृतिवाले, जटा-मुकुटधारी, त्रिलोकमोहन लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित देखा ॥ ४५-४६ ॥ दृष्ट्वैव सहसोत्तस्थौ विस्मयानिमिपेक्षणः ।<br>आलिङ्ग्य परमानन्दं रामं हर्षाश्रुलोचनः ॥४७॥ | उन्हें देखते ही श्रीवाल्मीकिजी सहसा उठ खड़े हुए, उनके नेत्र आश्चर्यसे निमेषशून्य हो गये और उन्होंने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर परमानन्दस्वरूप श्री-रामचन्द्रजीका आलिंगन किया ॥ ४७ ॥ तथा अति पूजयित्वा जगत्पूज्यं भक्त्यार्घ्यादिभिरादृतः ।<br>फलमूलैः स मधुरैर्भोजयित्वा च लालितः ॥४८॥ | भक्तिभावसे जगत्पूज्य भगवान् रामकी अर्ध्यादिसे सादर पूजा कर उन्हें मीठे-मीठे फल-मूलादि खिलाकर उनका लालन किया ॥ ४८ ॥ राघवः प्राञ्जलिः प्राह वाल्मीकिं विनयान्वितः ।<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानागता वयम् ॥४९॥ | तब श्रीरघुनाथजीने अति नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रीवाल्मीकिजीसे कहा—"हम पिताजीकी आज्ञा मान कर दण्डक-वनमें आये हैं ॥ ४९ ॥ आप भवन्तो यदि जानन्ति किं वक्ष्यामोऽत्र कारणम् ।<br>यत्र मे सुखवासाय भवेत्स्थानं वदस्व तत् ॥५०॥ | सब कुछ जानते ही हैं, फिर हम आपको इसका कारण क्या बताएँ ? अब आप मुझे कोई ऐसा स्थान बताइये जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ ॥ ५० ॥ सीतया सहितः कालं किञ्चित्त्र नयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो राघवेणासौ मुनिः सस्मितमब्रवीत् ॥५१॥ | आपके बताये हुए उस स्थानमें मैं सीताके साथ रहकर कुछ समय विताऊँगा ।" त्वमेव सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् ।<br>तवापि सर्वभूतानि निवाससदनानि हि ॥५२॥ | रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर मुनिवरने मुसकरा-कर कहा—॥ ५१ ॥ "हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आप ही एकमात्र उत्तम निवास-स्थान हैं और सब जीव भी आपके निवास-गृह हैं ॥ ५२ ॥ हे रघुनन्दन ! एवं साधारणं स्थानमुक्तं ते रघुनन्दन ।<br>सीतया सहितस्येति विशेषं पृच्छतस्तव ॥५३॥ | इस प्रकार यह मैंने आपका साधारण निवास-स्थान बताया, परन्तु आपने विशेषरूपसे सीताके सहित अपने रहनेका स्थान पूछा है इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! अब तद्वक्ष्यामि रघुश्रेष्ठ यत्ते नियतमन्दिरम् ।<br>शान्तानां समदृष्टीनामद्वेष्टृणां च जन्तुषु ।<br>त्वामेव भजतां नित्यं हृदयं तेऽधिमन्दिरम् ॥५४॥ | मैं आपका जो निश्चित गृह है वह बताता हूँ। जो शान्त, समदर्शी और सम्पूर्ण जीवोंके प्रति द्वेषहीन हैं तथा अहर्निश आपका ही भजन करते हैं उनका हृदय आपका प्रधान निवास-स्थान है ॥ ५३-५४ ॥ जो धर्माधर्मान्परित्यज्य त्वामेव भजतोऽनिशम् ।<br>सीतया सह ते राम तस्य हृत्सुखमन्दिरम् ॥५५॥ | धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़कर निरन्तर आपका ही भजन करता है, हे राम ! उसके हृदय-मन्दिरमें सीताके सहित आप सुखपूर्वक रहते हैं ॥ ५५ ॥ जो त्वन्मन्त्रजापको यस्तु त्वामेव शरणं गतः ।<br>निर्द्वन्द्वो निःस्पृहस्तस्य हृदयं ते सुमन्दिरम् ॥५६॥ | आपहीके मन्त्रका जाप करता है, आपहीकी शरणमें रहता है तथा द्वन्द्वहीन और निःस्पृह है उसका हृदय आपका सुन्दर मन्दिर है ॥ ५६ ॥ जो अहंकारशून्य, निरहङ्कारिणः शान्ता ये रागद्वेषवर्जिताः । | शान्तस्वभाव, राग-द्वेष-रहित और मृत्पिण्ड, पत्थर
सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७५
समलोष्टाश्मकनकास्तेषां ते हृदयं गृहम् ॥ ५७ ॥
त्वयि दत्तमनोबुद्धिर्यः सन्तुष्टः सदा भवेत् ।
त्वयि सन्त्यक्तकर्मा यस्तन्मनस्ते शुभं गृहम् ॥ ५८ ॥
यो न द्वेष्ट्यप्रियं प्राप्य प्रियं प्राप्य न हृष्यति ।
सर्वं मायेति निश्चित्य त्वां भजेत्तन्मनो गृहम् ॥ ५९ ॥
षड्भावादिविकारान्यो देहे पश्यति नात्मनि ।
क्षुत्तृट् सुखं भयं दुःखं प्राणबुद्ध्योर्निरीक्षते ॥ ६० ॥
संसारधर्मैर्निर्मुक्तस्तस्य ते मानसं गृहम् ॥ ६१ ॥
पश्यन्ति ये सर्वगुहाशयस्थं
त्वां चिद्धनं सत्यमनन्तमेकम् ।
अलेपकं सर्वगतं वरेण्यं
तेषां हृदब्जे सह सीतया वस ॥ ६२ ॥
निरन्तराभ्यासदृढीकृतात्मनां
त्वत्पादसेवापरिनिष्ठितानाम् ।
त्वन्नामकीर्त्या हतकल्मषाणां
सीतासमेतस्य गृहं हृदब्जे ॥ ६३ ॥
राम त्वन्नाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ।
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् ॥ ६४ ॥
अहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वर्धितः ।
जन्ममात्राद्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥ ६५ ॥
शूद्रायां बहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः ।
ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुरा ॥ ६६ ॥
धनुर्बाणधरो नित्यं जीवानामान्तकोपमः ।
एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥ ६७ ॥
साक्षान्मया प्रकाशन्तो ज्वलनार्कसमप्रभाः ।
तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥ ६८ ॥
तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं, उनका हृदय आपका घर है ॥ ५७ ॥ जो तुम्हींमें मन और बुद्धिको लगाकर सदा सन्तुष्ट रहता है और अपने समस्त कर्मोंको तुम्हारे ही अर्पण कर देता है उसका मन ही आपका शुभ गृह है ॥ ५८ ॥ जो अप्रियको पाकर द्वेष नहीं करता और प्रियको पाकर हर्षित नहीं होता तथा 'यह सम्पूर्ण प्रपञ्च मायामात्र है' ऐसा निश्चय कर सदा आपका भजन करता है उसका मन ही आपका घर है ॥ ५९ ॥ जो (सत्ता, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना इन) छः विकारोंको शरीरमें ही देखता है, आत्मामें नहीं; तथा क्षुधा, तृषा, सुख, दुःख और भय आदिको प्राण और बुद्धिके ही धर्म मानता है और स्वयं सांसारिक धर्मोंसे मुक्त रहता है उसका चित्त आपका निज गृह है ॥ ६०-६१ ॥ जो लोग चिद्घन, सत्यस्वरूप, अनन्त, एक, निर्लेप, सर्वगत और स्तुत्य आप परमेश्वरको समस्त अन्तःकरणोंमें विराजमान देखते हैं, हे राम ! उनके हृदय-कमलमें आप सीताजीके सहित निवास कीजिये ॥ ६२ ॥ निरन्तर अभ्यास करनेसे जिनका हृदय स्थिर हो गया है, जो सर्वदा आपकी चरण-सेवामें लगे रहते हैं तथा आपके नाम-संकीर्तनसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं उनके हृदय-कमलमें सीताके सहित आपका निवास-गृह है ॥ ६३ ॥ हे राम ! जिसके प्रभावसे मैंने ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त किया है, आपके उस नामकी महिमा कोई किस प्रकार वर्णन कर सकता है ? ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें मैं किरातोंके साथ रहता था और उन्हींके साथ रहकर बड़ा हुआ । मैं निरन्तर शूद्रोंके आचरणोंमें रत रहता था, मेरी द्विजातीयता केवल जन्ममात्रकी थी ॥ ६५ ॥ मुझ अजितेन्द्रियके शूद्राके गर्भसे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए । उस समय चोरोंके समागमसे मैं भी पक्का चोर हो गया था ॥ ६६ ॥ जीवोंके अन्तकर्ता कालके समान मैं सदा धनुष-बाण धारण किये रहता था । एक दिन एक घोर वनमें मैंने साक्षात् सप्तर्षियोंको जाते देखा । वे अपनी प्रभासे अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशमान थे । उनके सम्पूर्ण वस्त्रादि छीननेकी इच्छासे मैं लोभके वश होकर उनके पीछे दौड़ा और बोला—'ठहरो, ठहरो।' तब मुनीश्वरोंने मेरी ओर देखकर पूछा—'हे द्विजाधम !