अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
प्रस्तावना (31) Interestingly the battery, in the procedure as explained, in the previous text is prepared and the same was tested and proved practical. When a cell was prepared according to Agastya Samhita and measured, it gives open circuit voltage as 1.138 volts, and short circuit current as 23 mA. ऐसा ही एक तथ्य प्रकाशित किया गया है कि अगस्त्य-संहिता में विमान बनाने की विधि वर्णित है— Ancient Sanskrit literature is full of descriptions of flying machines - Vimanas. From the many documents found it is evi- dent that the scientist-sages Agastya and Bharadwaja had de- veloped the lore of aircraft construction. The “Agastya Samhita” gives us Agastya’s descriptions of two types of aeroplanes. The first is a “chchatra” (umbrella or balloon) to be filled with hydro- gen. The process of extracting hydrogen from water is described in elaborate detail and the use of electricity in achieving this is clearly stated. This was stated to be a primitive type of plane, useful only for escaping from a fort when the enemy had set fire to the jungle all around. Hence the name “Agniyana”. The sec- ond type of aircraft mentioned is somewhat on the lines of the parachute. It could be opened and shut by operating chords इसी प्रकार डा. एम. एन. दत्त द्वारा अंग्रेजी में अनूदित तथा न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन, से 2007 में प्रकाशित गरुड़महापुराण की भूमिका में सम्पादक एस. जैन ने लिखा है कि अगस्त्य-संहिता में रत्न-विज्ञान के तथ्य मिलते हैं। उन्ही के शब्दों में— According to M.N. Dutt the book comprises three Samhitas viz. the Agastya Samhita, the Brhaspati Samhita (Nitisara) and the Dhanvantari Samhita. Each one of those Samhitas would give it a permanent value, and accord to it an undyeing fame among the works of practical ethics or applied medicine. The Agastya Samhita deals with the formation, crys- tallisation and distgisestive. Traits of the different precious gems and enumerates the names of the countries from which our fore- fathers used to collect these gems. The cutting, polishing, setting
(32) अगस्त्य-संहिता
and apprecising etc. of several kind of gems and diamond, as they were practiced in ancient India, cannot but be interesting to artists and lay men, and the scientific traders unbedded in the highly poetic accounts of these original gems. इसी प्रकार 'अगस्त्य-संहिता' में विद्युत् उत्पादन एवं विद्युत् संचालित उपकरणों के उल्लेख होने की भी धूम मची है। THE MAGICIAN'S DICTIONARY, An Apocalyptic Cyclopaedia of Advanced M/ magic(k)al Arts and Alternate Meanings, Second Edition 1996 में वैदिक देवता वरुण के सम्बन्ध में इस बात का उल्लेख करते हुए कहा गया है - VARUNA One of the Vedic deities, the God of Water — symbol- izes "the Waters of Space." In the Agastya Samhita are in- structions for building a dry-cell battery. Liquid energy, called Mitra Varuna ("Friendly Water God") is produced. Water can thereby be divided into Prana-vayu and Udana-vayu. Vayu means "air." Thus the Ancient Hindus correctly analyzed water as the mixture of two gases. Prana is the life principle (so must corre- spond to oxygen, which is essential to life) and Udana means "upward breathing" (so must correspond to hydrogen, which is the lightest element). इस प्रकार के उल्लेखों का अवलोकन करने से प्रतीत होता है कि 'न्यू कैटेलोगस कैटेलोगोरम' में प्रदत्त सूची में अगस्त्य के नाम पर जिन विभिन्न कालों में विभिन्न विद्वानों द्वारा रचित विविध रचनाओं का उल्लेख हुआ है, उनकी अनुपलब्धता की स्थिति में सभी तथ्य 'अगस्त्य-संहिता' से ही उद्धृत मान लिए गये, क्योंकि रामोपासना के कर्मकाण्ड के रूप में यह संहिता अत्यन्त प्रचलित थी। इन्हीं परवर्ती प्रक्षेपों की श्रृंखला में 'अगस्त्य-संहिता' का भविष्य-खण्ड भी है। इसे 'रामानन्दजन्मोत्सवकथा' के नाम से अनेक बार प्रकाशित किया गया है। मेरे पास रामानन्दाचार्य की 700वीं जयन्ती के अवसर पर रामानन्दाचार्य पीठ अहमदाबाद से प्रकाशित 'स्मारिका' उपलब्ध है, जिसमें यह अंश हिन्दी अनुवाद एवं पद्यमय भूमिका के साथ प्रकाशित किया गया है। इसके 131वें अध्याय की पुष्पिका इस प्रकार है- इति श्रीमदगस्त्य-संहितायां भविष्यखण्डे ऽगस्त्यसुतीक्ष्णसम्वादे श्रीरामानन्दाचार्यावतारोपक्रमे श्रीरामनारदसम्प्रश्नोत्तरं नामैकत्रिंशदुत्तर
प्रस्तावना (33) शततमोऽध्यायः। सम्पूर्ण कथा भविष्यकालिक कथन के रूप में पौराणिक शैली में लिखी गयी है। प्रथम 131 वें अध्याय में रामानन्दाचार्य के अवतार का उपक्रम वर्णित है। दूसरे 132वें अध्याय में सभी द्वादश शिष्यों के साथ आचार्यजी के अवतार-ग्रहण का वर्णन है, जिसमें जन्मतिथि देने के क्रम में संवत्, मास, पक्ष, तिथि एवं वार इन पाँच अंगों में से एक अंग प्रत्येक सन्त की जन्मतिथि में अनुल्लिखित है। तीसरे 133वें अध्याय में रामानन्दाचार्य की जयन्ती के अवसर पर कृत्यों का वर्णन है, जिसमें कहा गया है कि षट्कोण पर मध्य में आचार्य रामानन्द को स्थापित कर उसके बाहर वृत्त बनाकर पुनः द्वादश दल लिखकर सभी द्वादश शिष्यों को स्थापित कर षोडशोपचार से उस यन्त्र की पूजा करें। चौथे 134वें अध्याय में रामानन्दाचार्य के दिग्विजय का वर्णन है तथा पाँचवें 135वें अध्याय में आचार्यजी के अष्टोत्तरशतनाम से पूजन का वर्णन है। ये सभी पाँच अध्याय महामुनि अगस्त्य एवं सुतीक्ष्ण के संवाद के रूप में वर्णित है। सम्पूर्ण अंश में रामानन्दाचार्य को देवस्वरूप माना गया है, जो अपने आपमें रामानन्दाचार्यजी के जन्म एवं इस अंश के रचनाकाल के मध्य सुदीर्घ कालान्तर का द्योतक है। इस सम्पूर्ण अंश को इतिहास कहा गया है, जबकि यहाँ इतिहास का कोई तत्त्व नहीं है। सबसे बड़ी ऐतिहासिक भ्रान्ति है कि जब 'अगस्त्य-संहिता' हेमाद्रि के समय में विद्यमान थी, तब इसमें हेमाद्रि के परवर्ती रामानन्द और उनके शिष्यों का उल्लेख होने के कारण यह स्पष्ट है कि इस खण्ड की रचना परवर्ती काल में हुई है और चूँकि 'अगस्त्य-संहिता' बहुचर्चित थी, प्रामाणिक मानी जाती थी, रामोपासना की परम्परा में आदरणीय थी, यहाँ तक कि वेद की तरह इस संहिता का भी स्वतःप्रामाण्य परम्परा में मान्य था, अतः इस छद्म इतिहास को अगस्त्य-संहिता के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया, ताकि उस प्रक्षेप पर कोई ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचन करने का साहस न कर सके। अब जबकि मूल 'अगस्त्य-संहिता' पाठकों के हाथों में है, तब ऐसे छद्म-प्रक्षेपों का प्रकरण समाप्त हो जाना चाहिए। 'अगस्त्य-संहिता' में परवर्ती प्रक्षेप ऊपर हमने ऐसी रचनाओं का उल्लेख किया है, जिनका सम्बन्ध अगस्त्य- संहिता के प्रतिपाद्य विषय से नहीं रहा। इनके साथ ही ऐसी कुछ रचनाएँ भी परवर्ती काल में लिखी गयीं, जो विषयवस्तु की दृष्टि से कर्मकाण्ड अथवा उपासना से सम्बद्ध होने के आधार पर 'अगस्त्य-संहिता' से सम्बद्ध थीं। इन रचनाओं का विवेचन 'अगस्त्य-संहिता' के वर्तमान संपादन के स्वरूप से है, अतः इन रचनाओं की स्थिति का विवेचन यहाँ आवश्यक हो जाता है।
(34) अगस्त्य-संहिता हेन्स बेकर ने अपनी पुस्तक 'अयोध्या' में अगस्त्य-संहिता से अनेक श्लोकों को उद्धृत किया है तथा इस आधार पर रामोपासना की प्रक्रिया का विशद विवेचन किया है, इस क्रम में उन्होंने 33वें अध्याय से भी अनेक श्लोकों को उद्धृत किया है। हेन्स बेकर ने चूँकि रामनारायण दास द्वारा सम्पादित एवं 1998 ई. में लखनऊ से प्रकाशित 'अगस्त्य-सुतीक्ष्ण संवाद' ग्रन्थ का उपयोग किया है, अतः हेन्स बेकर द्वारा उद्धृत 33वाँ अध्याय रामनारायण दास द्वारा सम्पादित 'अगस्त्य- संहिता' का मूल भाग माना जा सकता है, किन्तु इस 33वें अध्याय का विवेचन इस दृष्टि से आवश्यक है कि यह ग्रन्थ का मूल अंश है या परवर्ती प्रक्षेप है। इस विषय पर विचार करने से पूर्व इस 33वें अध्याय के कुछ श्लोक यहाँ उद्धृत किये जाते हैं, जिन्हें हेन्स-बेकर ने संकलित किया है- ॐ नमो भगवते श्रीरामाय परमात्मने। सर्वभूतान्तरस्थाय ससीताय नमो नमः॥42॥ ॐ नमो भगवते श्रीरामचन्द्राय व्यापिने। सर्ववेदान्तवेद्याय ससीताय नमो नमः॥43॥ ॐ नमो भगवते श्री विष्णवे परमात्मने। परात्पराय रामाय ससीताय नमो नमः॥44॥ ॐ नमो भगवते श्रीरघुनाथाय शार्ङ्गिणे। चिन्मयानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः॥45॥ ॐ नमो भगवते श्रीरामकृष्णाय चक्रिणे। विशुद्धज्ञानदेहाय ससीताय नमो नमः॥46॥ ॐ नमो भगवते श्रीवासुदेवाय विष्णवे। पूर्णानन्दैकरूपाय ससीताय नमो नमः॥47॥ ॐ नमो भगवते श्रीरामभद्राय वेधसे। सर्वलोकशरण्याय ससीताय नमो नमः॥48॥ ॐ नमो भगवते श्रीरामायामिततेजसे। ब्रह्मानन्दैकरूपाय ससीताय नमो नमः॥49॥ विशुद्धज्ञानदेहाय रघुनाथाय विष्णवे। अन्तःकरणसंशुद्धिं देहि मे रघुवल्लभ॥50॥
प्रस्तावना (35)
नमो नारायणानन्त श्रीराम करुणानिधे। मामुद्धर जगन्नाथ घोरसंसारसागरात् ।।51।। रामचन्द्र महीपाल शरणत्राणतत्पर। त्राहि मां सर्वलोकेश तापत्रयमहार्णवात् ।।52।। श्रीकृष्ण श्रीधर श्रीश श्रीराम श्रीनिधे हरे। श्रीनाथ श्रीमहाविष्णो श्रीनृसिंह कृपानिधे ।।53।। गर्भजन्मजराव्याधिघरसंसारसागरात् । मामुद्धर जगन्नाथ कृष्ण विष्णो जनार्दन ।।54।। इन श्लोकों की शैली, भाषा तथा कथ्य के आधार पर स्पष्ट है कि ये परवर्ती पाठ हैं, जो 'अगस्त्य-संहिता' के मूल अंश के आधार पर पौरोहित्य कर्म में सुविधा के लिए रचे गये प्रक्षेप हैं। इसी 33वें अध्याय से हेन्स बेकर ने अनेक ऐसे मन्त्रों का भी उल्लेख किया है, जो 18वें अध्याय में भी हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण 33वाँ अध्याय 'अगस्त्य-संहिता' का व्यावहारिक अध्याय है, जो कर्मकाण्ड कराने में सुविधा की दृष्टि से बाद में किसी पुरोहित के द्वारा रचे गये हैं। इसी प्रकार 'अगस्त्य-संहिता' से ली गयी 'रामनवमी व्रत कथा' 'अगस्त्य- संहिता' के दाय के रूप में उपलब्ध है। रामनवमी व्रत कथा की दो पाण्डुलिपियाँ मेरे अधिकार में हैं। दोनों उत्तर मिथिला की प्राचीन लिपि मिथिलाक्षर अथवा तिरहुता में हैं। दोनों में की पुष्पिका में इत्यगस्त्यसंहितोक्ता रामनवमीकथा समाप्ता का उल्लेख है। दोनों में पूजा पद्धति में पर्याप्त भिन्नता है, किन्तु कथा पाठान्तर होने के बाद भी एक है। इन दोनों पाण्डुलिपियों के आधार पर रामनवमी व्रत कथा का सम्पादन कर यहाँ परिशिष्ट 3 के रूप में प्रकाशित है। इन दोनों पाण्डुलिपियों का विवरण क्रमशः इस प्रकार है- पाण्डुलिपि 'अ' नाम – रामनवमीव्रतकथा प्राप्ति-स्थान – हटाढ़ रुपौली, झंझारपुर, मधुबनी स्वत्व – पं. भवनाथ झा आधार – हस्तनिर्मित वसहा कागज । आकार – 28 से. मी. लम्बाई एवं 9.5 से. मी. चौड़ाई । लिखित स्थान – 23 से. मी. लम्बाई एवं 5.5 से. मी. चौड़ाई ।
(36) अगस्त्य-संहिता पत्र सं. - 7 पृष्ठ सं. - 12 प्रति पृष्ठ पंक्ति सं.- 8 प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 44-45 लिपि - मिथिलाक्षर या तिरहुता लिपिकार - वधू शर्मा लिपिकाल - सन् 1262 साल (अर्थात् 1854-55 ई.)। आरम्भ - अथ रामनवमीपूजाविधिः। सुवर्णप्रतिमां कारयित्वा मृण्मयं वा प्रातः कृतनित्यक्रियः---। अन्त- इत्यगस्त्यसंहितोक्ता रामनवमीव्रतकथा समाप्ता। ॐ यदक्षरेत्यादि। ॐ नममस्ससीतारामलक्ष्मणाभ्याम्। सन् 1262 साल चैत्रकृष्णषष्ठ्यां शुक्रे। लिखितमिदं श्रीरामनवमीकथापूजापुस्तकम्। श्री बच्छूशर्म्मणे द्विजः।(?) पाण्डुलिपि 'आ' नाम रामनवमीव्रतकथा प्राप्ति-स्थान - हटाढ़ रुपौली, झंझारपुर, मधुवनी स्वत्व - पं. भवनाथ झा आधार - ब्रिटिशकालीन कागज। आकार - 22 से. मी. लम्बाई एवं 9 से. मी. चौड़ाई। लिखित स्थान - 16.5 से. मी. लम्बाई एवं 6 से. मी. चौड़ाई। पत्र सं. - 16 पृष्ठ सं. - 30 प्रति पृष्ठ पंक्ति सं.- 7 प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 26-29 लिपि - मिथिलाक्षर या तिरहुता लिपिकार - अज्ञात लिपिकाल - सन् 1287 साल (अर्थात् 1879-80 ई.)। आरम्भ - राम 1 प्र : सु. सीता 1 प्रः सु.। अन्त- इत्यगस्त्यसंहितोक्ता रामनवमीव्रतकथा समाप्ता। ॐ यदक्षरेत्यादि। ॐ नममस्ससीतारामलक्ष्मणाभ्याम्। सन् 1287 साल चैत्रशुक्लद्वितीयायां लिखित्।(?)
प्रस्तावना (37)
इसी प्रकार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन पुस्तकालय में अगस्त्य-संहिता के नाम से एक अपूर्ण पाण्डुलिपि सुरक्षित है, जिसमें एकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण है। इस पाण्डुलिपि का विवरण इस प्रकार है- । नाम अगस्त्य-संहिता प्राप्ति-स्थान - सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी। प्रवेश संख्या - 104571 विषय - पुराणेतिहास आधार - कागज । आकार - 5.5 इंच लम्बाई एवं 4.5 से. मी. चौड़ाई । पत्र सं. - 11 पत्रांक - 31-41 पृष्ठ सं. - 22 प्रति पृष्ठ पंक्ति सं. - 8 प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 21-23 लिपि - देवनागरी लिपिकार - अज्ञात लिपिकाल - अज्ञात आरम्भ - १ श्रीरामचन्द्राभ्यां नमः । श्रुतिरुवाच । अन्त- श्रीअगस्त्यसंहितायामेकचत्वारिंशोध्यायः । यद्यपि इस पाण्डुलिपि पत्रांक 31 से आरम्भ है, अतः प्रथम दृष्ट्या खण्डित प्रतीत होती है और अपेक्षा की जाती है कि इसके पूर्व और परवर्ती पृष्ठ कभी थे किन्तु वे नष्ट हो गये हैं। किन्तु गहन विवेचन करने पर यह पाण्डुलिपि स्वतन्त्र एवं पूर्ण प्रतीत होती है। इस अध्याय के आरम्भ में १श्रीरामचन्द्राभ्यां नमः है तथा यह पंक्ति पत्र के ऊपरी भाग से आरम्भ है, अर्थात् इसके पूर्व 40वें अध्याय का अन्त नहीं हुआ है। संख्या 1 भी इस बात का संकेत करती है कि लिपिकार ने पाण्डुलिपि का आरम्भ यहीं से स्वतन्त्र रूप में किया है, न कि विशाल ग्रन्थ के साथ अविच्छिन्न रूप में। पाण्डुलिपि का अन्त पृष्ठ के आधे भाग पर हुआ है, जिसके बाद पृष्ठ रिक्त है। यदि इसके बाद भी 42 अध्याय होता तो पाण्डुलिपि लेखन की शैली के अनुरूप उसी स्थान से लेखन आरम्भ होता अथवा इसी 41वें
(38) अगस्त्य-संहिता
अध्याय से यदि अगस्त्य-संहिता का अन्त रहता तो अन्त में ग्रन्थ समाप्ति की पुष्पिका रहती, नमस्क्रियात्मक या आशीर्वादात्मक मंगलाचरण होता। साथ ही पत्रांक दुबारा लिखा गया है। पत्र संख्या 35 की वर्द्धित छाया यहाँ प्रमाण के लिए प्रस्तुत है- [चित्र: पाण्डुलिपि का अंश - पत्र संख्या ३५] इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उक्त पाण्डुलिपि पूर्ण एवं स्वतन्त्र है तथा पाण्डुलिपियों के बंडल में इसके साथ इसी लिपिकार की दूसरी पाण्डुलिपि रहने के कारण बाद में किसी ने भ्रमवशात् लगातार पत्रांक डाल दिया है। इस अध्याय में सीताजी की स्तुति है, जो काव्यात्मकता की दृष्टि से इतनी उच्च कोटि की रचना है कि इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत न रखकर विशुद्ध भक्ति- काव्य की कोटि में रखना अपेक्षित होगा। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने 'वैष्णव सम्प्रदायों का साहित्य एवं सिद्धान्त' ग्रन्थ में इस अंश का विवेचन 'जानकी-स्तवराज' के नाम से किया है तथा इसे रामोपासना की परम्परा में रसिक-सम्प्रदाय का स्वतन्त्र एवं मान्य ग्रन्थ माना है। आचार्यजी ने उक्त ग्रन्थ में 'जानकी-स्तवराज' के जिस 49वें श्लोक को उद्धृत किया है, वह वर्तमान पाण्डुलिपि में 54वें श्लोक के रूप में उपलब्ध है। यद्यपि यहाँ भी इसे आगमशास्त्र के अन्तर्गत सम्मिलित करने का अथक प्रयास किया गया है और सम्पूर्ण स्तुति को श्रुति, संकर्षण के संवाद के रूप में योजित कर शिव के मुख से यह स्तुति करायी गयी है। इस स्तुति में सीता के पादादिकेशान्तवर्णन है। पादादिकेशान्तवर्णन के द्वारा स्तुति की परम्परा भक्ति- काव्यों में प्रसिद्ध रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित विष्णुपादादिकेशान्त वर्णन प्रसिद्ध है। अतः इसे परवर्ती कवि की रचना मानना उचित होगा।
१. सुतीक्ष्ण-अगस्त्य संवाद व राम-उपासना विधान
प्रस्तावना (39)
'अगस्त्य-संहिता का प्रतिपाद्य विषय 'अगस्त्य-संहिता' आगम शास्त्र की परम्परा में रामोपासना का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसमें रामोपासना के कर्मकाण्ड का विस्तार से प्रतिपादन है, जिसे गृहस्थों के लिए भोग एवं मोक्ष दोनों का प्रदाता कहा गया है। कर्मकाण्ड के अन्तर्गत षोडशोपचार, पंचोपचार, एकादशोपचार पूजा विधि का वर्णन किया गया है। इस कर्मकाण्ड के अन्तर्गत नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य, तीनों में हवन-कर्म को अनिवार्य माना गया है। यह 'अगस्त्य-संहिता' की परम्परा की विशेषता है। इस ग्रन्थ में गार्हस्थ्य-धर्म को भी महिमा-मण्डित किया गया है तथा सांसारिक भोग को मोक्ष का बाधक न मानकर मोक्ष का साधक माना गया है, बशर्ते कि भोग, भोग्य और भोक्ता तीनों के रूप में श्रीराम को स्थापित कर भोग किया जाये और देवता के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना विकसित रहे। इस सम्पूर्ण समर्पण तथा अनन्या भक्ति की महिमा 'अगस्त्य-संहिता' में सर्वत्र गायी गयी है। इस संहिता में केवल 'भक्त्या' शब्द का प्रयोग 33 स्थलों पर मिलता है, जो कर्मकाण्ड में भी भक्ति की सहभागिता को व्यक्त करता है। इस कर्मकाण्ड को जहाँ गृहस्थों के लिए अनिवार्य बतलाया गया है, वहाँ यतियों, संन्यासियों के लिए इसे हेय मानते हुए कहा गया है कि यतिगण किसी भी साधन से पूजा न करें, क्योंकि ये साधन हिंसा के बिना सम्भव नहीं हैं और यतियों के लिए अहिंसा परम धर्म है। यतियों के लिए योग-पद्धति का विवरण दिया गया है, जिसके माध्यम से अष्टाङ्ग योग का पालन करते हुए योगी ब्रह्मस्वरूप श्रीराम में विलीन होकर मुक्त जाते हैं। योग-मार्ग का पालन गृहस्थों के लिए असम्भव मानकर गृहस्थों को इस पथ पर नहीं चलने का सुझाव देते हुए कहा गया है कि यति धर्म में यदि आसक्ति पाप का कारण होता है, तो गार्हस्थ्य-धर्म में अनासक्ति भी पाप है। यदि गृहस्थ हैं, तो सांसारिक विषयों से अनासक्ति नहीं दिखाएँ और यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाने के कारण यति-धर्म में प्रवृत्त हैं, तो आसक्ति न रखें। दोनों ही स्थितियाँ पाप के कारण हैं। गृहस्थों के लिए केवल ज्ञान को भी श्रेयस्कर नहीं बतलाया गया है। केवल ज्ञान हो जाने से, जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान हो जाने से गृहस्थ को न तो मुक्ति मिल सकती है न ही इस संसार में सुख मिल सकता है। अतः गृहस्थ को निष्काम भाव से दान, जप, हवन, पूजन, भजन कीर्तन आदि करते हुए जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान करना चाहिए।
(40) अगस्त्य-संहिता अगस्त्य-संहिता उपासना का शास्त्रीय-ग्रन्थ है, अतः इसमें कर्म के भी निष्काम और सकाम कर्म के भेदों का सांगोपांग विवेचन किया गया है। यहाँ तक कि मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, भ्रामण आदि लौकिक सिद्धियों के लिए भी श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करने की विधि विस्तार से बतलायी गयी है। किन्तु उस स्थल के अन्त में स्पष्ट हिदायत दे दी गयी है कि इन कर्मों के करने से मोक्ष दूर होता चला जायेगा और वे साधक भूत, प्रेत और पिशाच की योनियों में चले जायेंगे। पुनर्जन्म लेकर बार-बार कीट आदि रूप में सांसारिक कष्ट भोगेंगे। अतः साधक को चाहिए कि वे ऐसे सकाम कर्म से विरत रहें। अपनी उन्नति के लिए सकाम कर्म को भी बुरा नहीं माना गया है। सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्म करने में बुराई नहीं है, किन्तु इसमें भी दोष दिखाया गया है कि इससे मोक्ष मिलने में बाधा मिलेगी, क्योंकि एक कार्य के दो फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अन्ततः निष्काम कर्म की श्रेष्ठता हर तरह से यहाँ प्रतिपादित है, जिससे ईश्वर की कृपा पाकर साधक भोग और मोक्ष दोनों का अधिकारी हो जाता है। यहाँ प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषय-वस्तु संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है- प्रथम अध्याय अगस्त्य-संहिता का प्रारम्भ महामुनि अगस्त्य और सुतीक्ष्ण के वार्तालाप की भूमिका से हुआ है। दण्डकारण्य में नर्मदा के तट पर सुतीक्ष्ण का आश्रम था। एक दिन वहाँ अगस्त्य का आगमन हुआ, तो अतिथि सत्कार के बाद सुतीक्ष्ण ने पूछा कि मैंने अपने जीवन में कई यज्ञ किए, प्रभूत दक्षिणा दी, दान दिया, फिर तपस्या भी की, किन्तु अब भी मैं काम, क्रोध आदि से पीड़ित हूँ। अब मुझे ऐसा उपाय बतलाएँ, जिससे मैं इस संसार के सागर को पार कर सकूँ। इस प्रश्न के उत्तर के रूप में महामुनि अगस्त्य ने शिव और पार्वती की एक कथा सुनायी, जिसमें पार्वती द्वारा इसी प्रश्न पर भगवान् शिव ने संसार के सागर को पार करने का उपाय बतलाया था। यहाँ शिव सर्वप्रथम संसार की विभीषिका का वर्णन करते हैं कि माया से ग्रस्त मनुष्य कैसे बार-बार पृथ्वी पर जन्म लेते हैं और फिर अपकर्म कर पुनः रौरव नरक में जा गिरते हैं। अथवा, कुछ लोग वशीकरण, आकर्षण आदि तान्त्रिक क्रियाओं को करते हुए वर्णाश्रम धर्म का विचार न कर मांस, रक्त, मदिरा का अर्पण कर कर्मकाण्ड सम्पन्न करते
प्रस्तावना (41) हैं, वे भूत, प्रेत, पिशाच या ब्रह्मराक्षस की योनि में जन्म लेते हैं। भगवान् शिव की उक्ति पर सहमत होती हुई देवी पार्वती जब कहतीं हैं कि इस धर्म से किसी का भी उपकार नहीं होनेवाला है, तब शिव पार्वती के साथ परिहास करते हुए पूर्वपक्ष के रूप में कहते हैं कि मैं तीनों लोकों का अन्तक हूँ, इसलिए हिंसा मुझे प्रिय है, मुझे जो मांस अर्पित करते हैं वे मेरे प्रिय हैं।' बहुत परिहास हो जाने पर अन्त में भगवान् सिद्धान्त प्रकट करते हैं कि सच तो यह है कि हिंसकों के लिए इस संसार को पार करना असम्भव है।' द्वितीय अध्याय पार्वती द्वारा मुक्ति का उपाय पूछने पर भगवान् परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या करते हैं और आश्रम के अनुसार उपासना पर जोर देते हुए उस परमेश्वर का ध्यान करने का उपदेश करते हैं। यज्ञ, वेदाध्ययन, अतिथि पूजन, गुरुशिष्य परम्परा का पालन, दान आदि गृहस्थों और ब्रह्मचारियों के लिए करणीय है। तृतीय अध्याय इस अध्याय के आरम्भ में पार्वती सबके लिए परमेश्वर की उपासना के मार्ग की जिज्ञासा करतीं है। इसके उत्तर में भगवान् शंकर परमेश्वर के द्वारा अवतार लेने का वर्णन कर रामावतार की विस्तृत चर्चा करते हैं। भगवान् श्रीराम स्वयं नारायण के अवतार हैं, श्रीसीता लक्ष्मीस्वरूपा हैं और शेषावतार लक्ष्मण हैं, शंख और चक्र के अवतार भरत और शत्रुघ्न हैं तथा वानर सभी देव के अवतार हैं। ऐसे श्रीराम की आराधना के अनेक मार्ग हैं। कुछ लोग पंचाग्नि व्रत, चान्द्रायण उपवास आदि से आराधना करते हैं तो कोई 'राम', 'राम' जप कर अमरत्व प्राप्त करते हैं। कुछ लोग गार्हस्थ्य धर्म का पालन करते हुए भगवान् की सेवा कर उन्हें प्रसन्न करते हैं। इस अध्याय में उपासना की अनेक विधियाँ वर्णित हैं। चतुर्थ अध्याय पार्वती द्वारा जिज्ञासा करने पर भगवान् शिव हिरण्यगर्भ-सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। यहाँ एक कथा है कि एकबार जब ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़ वर्ष तक निराहार रहकर तपस्या की, तब स्वयं भगवान् विष्णु प्रकट हुए। ब्रह्माजी भाव-विह्वल होकर उनकी स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवान् ने ब्रह्माजी से वर
(42) अगस्त्य-संहिता माँगने के लिए कहा तो ब्रह्माजी ने दुर्भाग्य और दरिद्रता से ग्रस्त प्रजा के उद्धार का उपाय पूछा। साथ ही ब्रह्मा ने पूछा कि मनुष्यों और भक्तों के लिए कौन उपाय है, जिससे उन्हें शरीर के अन्त होने पर शान्ति मिले। इसपर भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को षडक्षर मन्त्र ‘ॐ रामाय नमः’ का सांगोपांग उपदेश किया। पंचम अध्याय इस षडक्षर मन्त्र के प्रथम उपदेशक ब्रह्मा हुए। सुतीक्ष्ण के प्रश्न पर अगस्त्य ने आगे की कथा बतलायी कि ब्रह्मा द्वारा उपदिष्ट इस मन्त्र से जब पार्वती भी उपासना करने लगीं, तब उनके मन में ज्ञान का उदय हुआ और पुनर्जन्म के विना भगवान् शंकर को संसार के विनाश की आशंका होने लगी। तब उन्होंने पार्वती को गार्हस्थ्य धर्म का पालन करते हुए पूजा सामग्रियों से प्रतिदिन श्रीराम की आराधना का उपदेश किया और कहा कि गृहस्थ केवल ज्ञान से इस संसार में और परलोक में कल्याण नहीं प्राप्त कर सकता है उसे दान, होम आदि भी करना चाहिए। आसक्त परिव्राजक और विरक्त गृहस्थ दोनों कुम्भीपाक नरक प्राप्त करते हैं, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती है। अतः जो गृहस्थ हैं वे पुष्प, चन्दन, अक्षत, नैवेद्य आदि से सगुण राम की उपासना करें। किन्तु इस विधि से वानप्रस्थी और यति को उपासना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूजा के साधन हिंसा का त्याग कर प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यदि वानप्रस्थी और यति गृहस्यों की तरह इन साधनों से पूजा करते हैं, तो वे 'आरूढपतित' कहलायेंगे। षष्ठ अध्याय इस अध्याय से अगस्त्य और सुतीक्ष्ण की वार्ता के रूप में तुलसी-माहात्म्य का विस्तृत वर्णन है, जिसमें तुलसी वृक्ष का दल, मंजरी, काष्ठ आदि प्रत्येक अंग का आध्यात्मिक महत्त्व बतलाया गया है तथा तुलसी-माला धारण करने का विधान किया गया है। तुलसी वृक्ष लगाने से भी भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति वर्णित है। सप्तम अध्याय यहाँ अगस्त्य मुनि एक कथा कहते है कि एकबार भगवान् शंकर देवी पार्वती के साथ वाराणसी में निवास करने लगे तो सभी देवता वहीं आकर जम गये। अब भगवान् शिव को चिन्ता हुई कि ये देवगण तो मेरी उपासना करते हैं, इन्हें मैं मुक्ति कैसे प्रदान करूँ। इसी समय ब्रह्माजी वहाँ पधारे तो भगवान् ने यही जिज्ञासा उनसे की। तब ब्रह्मा ने उन्हें भी षडक्षर मन्त्रराज का उपदेश Rarest Archiver
प्रस्तावना (43)
दिया। भगवान् शिव सौ मन्वन्तर तक इस मन्त्र का जप करते रहे। तब श्रीराम प्रसन्न होकर प्रकट हुए। भगवान् शिव ने अपनी चिन्ता उनके सामने रखी तो श्रीराम की कृपा से वहाँ बसनेवाले सभी लोग मुक्त होकर श्रीराम स्वरूप विष्णु में विलीन हो गये। पुनः भक्तवत्सल भगवान् शिव ने कहा कि इस संसार में कहीं भी किसी प्रकार जो मृत्यु को प्राप्त करते हैं, उन्हें कैसे मुक्ति मिलेगी? इसपर भगवान् श्रीराम ने इस षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य कहा कि ब्रह्मा से या आपसे (शिव से) इस मन्त्र को जो ग्रहण कर जप करेंगे या मुमूर्षु के दक्षिण कर्ण में यदि मन्त्र का उपदेश करेंगे तो, मुक्ति मिल जाएगी। उसी दिन से वारणसी मुक्तिक्षेत्र कहलाने लगी। अष्टम अध्याय सुतीक्ष्ण ने पूछा कि इस मन्त्रराज का सर्वप्रथम उपदेश किसने किया तथा कैसे यह पृथ्वी पर प्रतिष्ठित हुआ। अगस्त्य ने कहा कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम अपने पुत्र वसिष्ठ को यह मन्त्र दिया। वसिष्ठ ने वेदव्यास को तथा वेदव्यास ने अपने शिष्य शौनक को सबसे पहले देकर अन्य शिष्यों को भी दिया। उस शौनक से मैंने (अगस्त्य ने) यह मन्त्र लिया और मैं इसे सांगोपांग आपको सुना रहा हूँ। इसी अध्याय में गुरु का लक्षण बतलाते हुए कहा गया है कि देवों के उपासक, शान्त चित्तवाले, सांसारिक विषयों से विरक्त, अध्यात्म को जाननेवाले, ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेवाले, वेद, शास्त्र आदि के ज्ञानी, उद्धार और संहार दोनों करने में समर्थ, ब्राह्मणश्रेष्ठ, तन्त्रज्ञ, यन्त्र एवं मन्त्र के ज्ञाता, धर्म और रहस्य के ज्ञाता, पुरश्चरण करनेवाले, सिद्धपुरुष, जिन्हें मन्त्र सिद्ध हों तथा जो प्रयोगों का ज्ञान रखते हों, तपस्वी और सत्यवादी गृहस्थ गुरु कहलाते हैं। शिष्य का भी लक्षण विस्तार से यहाँ वर्णित है कि चाण्डाल पर्यन्त सभी व्यक्ति यहाँ अधिकारी हैं। धर्म में आस्था रखनेवाले, गुरु के भक्त, श्रद्धा के साथ सीखने की इच्छा रखनेवाले, स्त्रियों के प्रति काम, क्रोध आदि से उत्पन्न दुःखों को देखते हुए वैराग्य रखनेवाले, सभी प्रकार से संसार को पार करने की इच्छा रखनेवाले, ब्राह्मण, धर्म और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले, निष्काम शिष्य होते हैं। अथवा मन, वचन, कर्म, एवं धर्म से गुरु की नित्य सेवा करने वाले, क्षत्रिय, एवं वैश्य शिष्य होते हैं। अपने वर्ण और आश्रम के लिए कथित धर्म के अनुसार कर्म करनेवाले, सदा पवित्र रहनेवाले, पवित्र नियमों का पालन करनेवाले द्विजों की सेवा करनेवाले, धार्मिक, शूद्र शिष्य होते हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ चाहे वे प्रतिलोम विवाह से या अनुलोम विवाह से उत्पन्न हो, वे भी शिष्या हो सकतीं हैं।
(44) अगस्त्य-संहिता
अन्त में इस षडक्षर में ॐ, श्रीं, ऐं, क्लीं आदि अन्य बीज लगाकर विभिन्न प्रकार के सकाम प्रयोगों का विवेचन किया गया है। मन्त्र के प्रकार तथा कलशस्थापन-पूर्वक दीक्षा की विधि का संक्षिप्त संकेत है। नवम अध्याय इस अध्याय में श्रीराम के यन्त्र का विस्तृत विवेचन है तथा मालामन्त्रोद्धार वर्णित है। यहाँ मालामन्त्र इस प्रकार है- ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः। इसे चिन्तामणि-मंत्र भी कहा गया है। इस मालामन्त्र तथा 'श्रीं सीतायै नमः' इस सीता मन्त्र से विलसित यन्त्र पर श्रीराम की पूजा कर के उसे धारण करने से दारिद्र्य-दुःखनाश, सन्तान-प्राप्ति, ऐश्वर्य, विद्या, रोगशान्ति आदि अनेक सांसारिक उद्देश्यों की प्राप्ति कही गयी है। दूसरे द्वारा किए गये अभिचार को रोकने में इसे 'वज्रपञ्जर' की संज्ञा दी गयी है। दशम अध्याय इस अध्याय में श्रीराम की सांगोपांग-अर्चना की विधि का वर्णन है। इसके अनुसार श्रीराम के द्वार, पीठ पर स्थित अंग तथा परिवार देवताओं में गणेश, सूर्य, शिव, क्षेत्रपाल, धात्री, ब्रह्मा, गंगा, यमुना, कुलदेवता, शंख, पद्म, निधि, वास्तोष्पति, लक्ष्मी, गुरु सरस्वती, आधारशक्ति, कूर्म, नागाधिपति, पृथ्वी, क्षीरसागर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हनुमान्, सुग्रीव, भरत विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल, सुमन्त, वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गोतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि, नारद, नल, नील, गवय गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि आदि देवों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इनके प्रसन्न होने पर ही श्रीराम और श्रीसीता का प्रसाद प्राप्त हो सकेगा। इस अध्याय में एक नारदीय स्तोत्र है, जिसमें इन सभी देवों के प्रति नमस्कार अर्पित किया गया है। इस स्तोत्र को प्रातःकाल पाठ करने से भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि बतलायी गयी है। यहाँ इन देवों की पूजा पंचोपचार, एकादशोपचार या षोडशोपचार से करने का संकेत किया गया है।
प्रस्तावना (45)
एकादश अध्याय इस अध्याय में सकाम पूजन का प्रायोगिक विवरण है कि यजमान स्नानादि से शरीर की बाह्यशुद्धि कर मातृका-न्यास से अन्तःशुद्धि करें। तब पूजा की सामग्रियों को स्वच्छ कर शंख आदि की पूजा करें। तब वैष्णवन्यास, केशवादिन्यास कर तत्त्वन्यास एवं मूर्तिपंजर-न्यास करें। इस प्रकार षडंग न्यास सम्पन्न कर बाह्य पूजा की तैयारी करें। यहाँ वेदी, अष्टदलकमल, तोरण आदि की निर्माण-विधि वर्णित है। यहाँ कहा गया है कि पुण्यमयी स्त्रियों और गृहस्थों के घिरे हुए स्थान में गायन, वादन और नृत्य के साथ यह आराधना करें। पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों का स्थान निर्धारण तथा उनकी आकृति का विवेचन यहाँ किया गया है। इसी क्रम में भूतशुद्धि, हस्तशोधन, पादशोधन आदि की दूसरी परिभाषा भी दी गयी है। जैसे पूजा के लिए पत्र-पुत्र को भक्तिपूर्वक उठाना कर-शोधन है। श्रीराम की कथा का श्रवण और उनके उत्सवों का दर्शन कर्ण एवं नेत्र की शुद्धि है। द्वादशाध्याय इस अध्याय में मातृका-न्यास का क्रम बतलाया गया है। 'अ' से 'ह' तक के 52 वर्ण को अनुस्वार के साथ शरीर के प्रत्येक अंग में नियोजित करना मातृकान्यास है। इसी में केशवकीर्त्यादि न्यास भी वर्णित है। साधक अपने शरीर में बीजाक्षरों और देवताओं को व्यस्त कर देवत्व प्राप्त कर लेता है तथा उसका यह पांचभौतिक शरीर पवित्र हो जाता है। इस सम्पूर्ण अध्याय में शरीर के विभिन्न न्यासों का निरूपण किया गया है। त्रयोदशाध्याय इस अध्याय में पूजा के पात्रों को यथास्थान रखकर शंखपात्र में सामान्यार्घ्य- स्थापन की विधि प्रारम्भ में बतलायी गयी है कि शंख को आधार पर रखकर सूर्य, चन्द्र और अग्नि के बीज मन्त्र से तीनों मण्डलों की पूजा कर के शंख जल में अंकुश मुद्रा से तीर्थों का आवाहन कर, शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा, गरुड़मुद्रा, सुरभिमुद्रा आदि का प्रदर्शन कर देव का अभिषेक करें और उसी जल से यजमान अपने शरीर एवं अन्य सामग्रियों को पवित्र करें। आगे पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदि की स्थापना, स्नपन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि का विस्तृत वर्णन है। चतुर्दशाध्याय इस अध्याय में हवन-विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसमें विभिन्न प्रकार एवं परिमाग के कुण्डों का निर्माण, मेखला की संख्या, लम्बाई,
(46) अगस्त्य-संहिता चौड़ाई एवं प्रकार का वर्णन है। जप की संख्या के आधार पर कुण्ड का परिमाण निर्धारित किया गया है। हवन के अन्य उपकरण जैसे स्रुव एवं स्रुक् के लक्षण, परिमाण एवं संक्षेप हवन में उसके अनुकल्प के रूप में पीपल का पत्ता बतलाया गया है। इसके बाद कुण्ड के वायुकोण में चावल के पीठा से अष्टदल-कमल का लेखन कर उसके विभिन्न दलों को विभिन्न वर्ण से बनाकर उसपर श्रीराम की अर्चना का विधान किया गया है। पुनः अग्निस्थापन की विधि अग्न्या carry on/अग्न्या न य न/अग्न्या न य न -> अग्न्या न य न, प्रोक्षण उपसारण, परिस्तरण आदि वर्णित है, किन्तु अपनी शाखा के गृह्यसूत्र में उल्लिखित विधियों का आलम्बन करने की अनुशंसा सर्वत्र की गयी है। अग्नि के संस्कार गर्भाधान से विवाह पर्यन्त कर के उस अग्नि में वैष्णव-चरु बनाने का वर्णन है। उस चरु से अंग सहित सीताराम को हवि समर्पित कर के विनायकादि अंग देवताओं को भी आहुति देने का विधान किया गया है। अन्त में ब्रह्म- दक्षिणा, मार्जन, ब्राह्मण भोजन, चरुप्राशन आदि क्रियाएँ भी उल्लिखित हैं। अध्याय के अन्त में एक महत्त्वपूर्ण निर्देश है कि नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों प्रकार के कर्मों में हवन किया जाना चाहिए। पंचदशाध्याय इस अध्याय में श्रीराम की उपासना के क्रम में अनेक प्रकार के सकाम हवनों की विधि का वर्णन किया गया है। इसमें कामना भेद से हविष्य सामग्री में अन्तर बतलाया गया है। जैसे- बिल्व-पुष्प - ऐश्वर्य पलाश-पुष्प - मेधा, ज्ञान चन्दन के जल से सुगन्धित जूही फूल के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से राजवशीकरण सिद्ध होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से रोगनाश और दीर्घायु की बात कही गयी है। इस अध्याय में इस प्रकार के अनेक प्रयोग हैं, जिनसे वशीकरण, उत्तम स्त्री की प्राप्ति, जगद्वशीकरण, सुख, समृद्धि आदि की प्राप्ति होने की बात कही गयी है। अध्यायान्त में सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि सकाम भाव से जो उपासना करते हैं, उन्हें उसी कामना की सिद्धि होती है, उन्हें मुक्ति नहीं मिलती; क्योंकि एक कर्म के दो फल नहीं हो सकते। फिर अन्त में निर्देश करते हैं कि श्रीराम का षडक्षर मन्त्र मुक्ति देनेवाला है। इसका प्रयोग मारणादि कर्म में नहीं करना चाहिए; क्योंकि विद्वान् तुच्छ खरगोश पर ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया करते हैं।
प्रस्तावना (47)
षोडशाध्याय इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के पुरश्चरण की विधि का वर्णन किया गया है। इस मन्त्र के प्रतिदिन जप में छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ संख्या बतलायी गयी है। इस अध्याय के अनुसार पुरश्चरण के पाँच अंग हैं- पूजन, नित्य जप, तर्पण, होम एवं ब्राह्मण-भोजन। गुरु से प्राप्त मन्त्र की यह पंचागोपासना पुरश्चरण कहलाती है। इस अध्याय में पुरश्चरण कर्त्ता के लिए हविष्यान्न भोजन तथा वर्ज्य पदार्थों का उल्लेख है; पुरश्चरण किस स्थान पर किया जाना चाहिए, इसका भी वर्णन है। यहाँ सम्पूर्ण आचार-संहिता का उल्लेख किया गया है, किन्तु अन्त में प्रतिपादित किया गया है कि निष्काम भाव से इस पुरश्चरण को करने से ईश्वर के साथ साक्षात्कार होगा। गृहस्थों के लिए ब्राह्मण भोजन अनिवार्य बतलाया गया है, किन्तु अशक्त गृहस्थ एवं अन्य प्रकार के साधक भी जपसंख्या को द्विगुणित कर इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। इसी प्रकार, हवन, पूजा अथवा तर्पण में भी अशक्त रहने पर उतनी संख्या में जप कर क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। अन्त में, इस पुरश्चरण से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति कही गयी है।
सप्तदशाध्याय इस अध्याय में शिष्य की दीक्षा के अन्तर्गत अभिषेक की विधि का वर्णन है। इसके आरम्भ दीक्षा के लिए शुभ मुहूर्तों का विधान तथा अपनी शाखा के गृह्यसूक्त के अनुसार नान्दीमुख-श्राद्ध, स्वस्तिवाचन आदि का विधान किया है। सूर्यग्रहण के दिन किसी भी मुहूर्त को देखने की आवश्यकता नहीं है। शिष्य कलश की स्थापना कर ब्राह्मणों का वरण करें और वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रों से सुन्दर सूक्तों को सुनते हुए विष्णु की पूजा करें। गुरु भी भूतशुद्धि, न्यास आदि के साथ विष्णु-पूजन कर रात्रि में जागरण, कथालाप आदि करते हुए छह हजार मन्त्र जप करते हुए रात्रि व्यतीत करें। दूसरे दिन पुनः भूतशुद्धि, न्यास, पूजन, जप आदि सम्पन्न कर हवन करें। पूर्णाहुति के बाद शिष्य को प्राणायाम कराकर सुरास्त्वां० इत्यादि मन्त्र से कलश के जल से अभिषेक करावें। तब शिष्य को नवीन वस्त्र, चन्दन, आभूषण आदि से सज्जित कर षडंगन्यास करें। फिर शिष्य के मस्तक पर हाथ रखकर 108 बार मन्त्र का जप करें। तब गुरु हाथ में जल लेकर उसे शिष्य के हाथों में डाले और मन्त्र दें। शिष्य को विभवानुसार गुरु एवं उनके पुत्र, पत्नी आदि को वस्त्र, आभूषण भोजन आदि देना चाहिए। गुरु को प्रसन्न कर उन्हें विदा कर शिष्य स्वयं भोजन करे और अपने परिजनों को भोजन कराये। उसके बाद प्रतिदिन शिष्य प्रातः, मध्याह्न एवं सन्ध्या में जप करे।
(48) अगस्त्य-संहिता
इसी अध्याय में रामगायत्री का मन्त्रोद्धार तथा पुरश्चरण-विधि वर्णित है। इस रामगायत्री के आदि में अनेक बीज-मन्त्र लगाकर काम्य प्रयोगों का भी उल्लेख यहाँ किया गया है तथा तर्पण-विधि की वर्णित है। अष्टादशाध्याय अध्याय के आरम्भ में श्रीराम की पूजा-सामग्रियों का लक्षण बतलाया गया है। जो पुष्प दूसरे देवता को नहीं चढ़ाया गया हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा पीत वर्ण का हो, कीड़े आदि न लगे हों वे पुष्प श्रीराम की पूजा में विहित है। सदावर्त नामक, शंख, जिसकी पीठ तथा मध्य भाग में कमल-नाल का चिह्न हो, शुभ्र जल से पूर्ण हो, पूजन में प्रशस्त है। पाद्य, अर्घ्य आदि के पात्र ताम्बा अथवा सुवर्ण का बना होना चाहिए। ये पूजा-साधन तीन प्रकार के होते हैं- उत्तम मध्यम एवं अधम। पूजा कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिन्हें लोक में निन्दित नही माना जाता हो। आगे पूजन विधि के क्रम में विभिन्न मुद्राओं-आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी आदि का वर्णन है। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँध लेने से संनिधीकरणी मुद्रा बनती है। इसी मुद्रा में यदि दोनों अंगूठे अन्दर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। इसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, पद्म, धेनु, कौस्तुभ, श्रीवत्स, वनमाला, योनि आदि दश मुद्राओं के लक्षण दिये गये हैं, जो देवार्चन में प्रशस्त हैं। आगे यजमान के बैठने के भी आसनों का वर्णन किया गया है- स्वस्तिक, वज्र, वीर, पद्म, योग, गोमुख आदि। इन आसनों के लक्षण यहाँ वर्णित हैं। अध्याय के अन्त में निर्देश है कि जो विष्णुभक्त न हों, उन्हें ये सब रहस्य कहना नहीं चाहिए। एकोनविंशाध्यायः इस अध्याय के आरम्भ में श्रीराम के षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य बतलाया गया है। हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, सौर, शाक्त एवं वैष्णव मन्त्रों में श्रीराम का मन्त्र श्रेष्ठ है। श्रीराम के भी अन्य मन्त्रों की अपेक्षा यह षडक्षर मन्त्र अनायास फल देनेवाला है, अतः इसे मन्त्रराज कहा गया है। इसके जप और पुरश्चरण से ब्रह्म-हत्यादि पाप नष्ट हो जाते हैं, भूत प्रेत, पिशाच, ग्रह और राक्षस सब भाग
(48) अगस्त्य-संहिता इसी अध्याय में रामगायत्री का मन्त्रोद्धार तथा पुरश्चरण-विधि वर्णित है। इस रामगायत्री के आदि में अनेक बीज मन्त्र लगाकर काम्य प्रयोगों का भी उल्लेख यहाँ किया गया है तथा तर्पण-विधि की वर्णित है। अष्टादशाध्याय अध्याय के आरम्भ में श्रीराम की पूजा-सामग्रियों का लक्षण बतलाया गया है। जो पुष्प दूसरे देवता को नहीं चढ़ाया गया हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा पीत वर्ण का हो, कीड़े आदि न लगे हों वे पुष्प श्रीराम की पूजा में विहित है। सदावर्त नामक, शंख, जिसकी पीठ तथा मध्य भाग में कमल-नाल का चिह्न हो, शुभ्र जल से पूर्ण हो, पूजन में प्रशस्त है। पाद्य, अर्घ्य आदि के पात्र ताम्बा अथवा सुवर्ण का बना होना चाहिए। ये पूजा-साधन तीन प्रकार के होते हैं- उत्तम मध्यम एवं अधम। पूजा कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिन्हें लोक में निन्दित नही माना जाता हो। आगे पूजन विधि के क्रम में विभिन्न मुद्राओं-आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी आदि का वर्णन है। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँध लेने से संनिधीकरणी मुद्रा बनतीं है। इसी मुद्रा में यदि दोनों अंगूठे अन्दर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। इसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, पद्म, धेनु, कौस्तुभ, श्रीवत्स, वनमाला, योनि आदि दश मुद्राओं के लक्षण दिये गये हैं, जो देवार्चन में प्रशस्त हैं। आगे यजमान के बैठने के भी आसनों का वर्णन किया गया है- स्वस्तिक, वज्र, वीर, पद्म, योग, गोमुख आदि। इन आसनों के लक्षण यहाँ वर्णित हैं। अध्याय के अन्त में निर्देश है कि जो विष्णुभक्त न हों, उन्हें ये सब रहस्य कहना नहीं चाहिए। एकोनविंशाध्यायः इस अध्याय के आरम्भ में श्रीराम के षडक्षर मन्त्र का माहात्म्य बतलाया गया है। हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, सौर, शाक्त एवं वैष्णव मन्त्रों में श्रीराम का मन्त्र श्रेष्ठ है। श्रीराम के भी अन्य मन्त्रों की अपेक्षा यह षडक्षर मन्त्र अनायास फल देनेवाला है, अतः इसे मन्त्रराज कहा गया है। इसके जप और पुरश्चरण से ब्रह्म-हत्यादि पाप नष्ट हो जाते हैं, भूत प्रेत, पिशाच, ग्रह और राक्षस सब भाग
(50) अगस्त्य-संहिता लगता है, उसे मात्रा कहते हैं। पैंतालीस मात्रा का प्राणायाम उत्तम, तीस मात्रा का मध्यम और पन्द्रह मात्रा का अधम होता है। सभी शुभ एवं अशुभ कर्मों के आरम्भ और अन्त में प्राणायाम करना चाहिए। चार सौ प्राणायाम करने से सैकड़ो महापाप मिट जाते हैं। प्राणायाम के बिना किए गये सभी निष्फल होते हैं। आगे योग के शेष अंगों का वर्णन है। इस प्रकार आठो अंगों को पूरा कर योगी सूर्यमण्डल का भेदन कर परमगति को प्राप्त करते हैं। कर्म योग अथवा ज्ञान योग अथवा दोनों से सगुण अथवा निर्गुण राम की आराधना कर योग के नियमों का पालन करता हुआ साधक भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं। 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं कल से आरम्भ करूँगा' यह सोचनेवाला तो स्वयं अपनी आँखों में धूल झोंकता है। मानव शरीर में स्थित इन्द्रियाँ विष्ठा के बीच रहनेवाले कीड़े से भी अधिक अपवित्र हैं। जो अपने शरीर पर विश्वास करते हैं, वे मूर्ख हैं। ईश्वर ने केवल दुःख का अनुभव करने के लिए इस शरीर का निर्माण किया है। सकाम कर्म करने से पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है अतः सिद्धान्त यही है कि फल प्राप्ति की कामना से कोई कर्म न करें। एकविंशाध्याय अध्याय के आरम्भ में पूर्व पक्ष के रूप में कर्म को भी मुक्ति का साधन मानते हुए उसकी साधकता बतलायी गयी है, किन्तु कर्म को साधन मानने पर क्या क्या विषमताएँ होती हैं उनका उल्लेख करते हुए कर्म की साधकता का खण्डन किया गया है और अन्त में सिद्धान्त के रूप में कहा गया है कि ज्ञान के बिना मुक्ति का दूसरा साधन नहीं है इस ज्ञान के साथ अष्टांग योग का मार्ग अपना कर योगी मुक्त हो जाता है। हृदय में स्थित श्रीराम सर्वत्र प्रकाशित होते हैं, जो शरीर के विनष्ट होने पर स्वयं अवशिष्ट रहते हैं। वस्तुतः ऐसे श्रीराम से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान और अष्टांग योग का समन्वय वैराग्य और यतित्व के बिना दुर्लभः है, अतः शास्त्रानुसार स्वीकृत यतित्व का आचरण करते हुए हर प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का अभ्यास करना चाहिए। द्वाविंशाध्याय इस अध्याय के आरम्भ में सुतीक्ष्ण का प्रश्न है कि योग क्या है और किस उपाय से चित्त को जीता जा सकता है। इसपर अगस्त्य कहते हैं कि जिस प्रयत्न से शरीर के अन्तः में वायु का निरोध होता है उसी प्रयत्न से मन भी निरुद्ध होकर आत्मलीन हो जाता है। प्राणवायु और अपानवायु समान कर चित्त को