आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
१२ आल्हखण्ड । २०८ बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥ मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८ जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥ जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९ इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥ चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२० बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥ चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१ सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥ माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२ नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥ सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३ यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥ बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४ दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥ अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५ चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥ पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६ कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥ कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७ कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥ उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८ मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥ तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६
ब्रह्माका विवाह । २०६ १३ पटा बनेटी बाना कहूँ कहूँ कहूँकहूँ गदका को घमसान ॥ बाढ़ि घरावैं कहूँ कहूँ क्षत्री कहूँकहूँ हँनैं निशाना जवान १३० देखि तमाशा चौंड़ा ताहर मनमें बड़े खुशी है जायें ॥ कूच कराये दउ मोहबे ते दिल्लीशहरगये नगच्याय १३१ ह्यौंसुधि पाई माहिल ठाकुर दिल्ली अटे अगाड़ी जाय ॥ माथनवायो जब माहिल ने खातिर कीन पिथौराराय १३२ सोने कि चौकी में बैठारयो राजा दिल्लीके महराज ॥ बोले पिरथी फिर माहिल ते तुम्हरोकौन करी हमकाज १३३ बोले माहिल फिर पिरथी ते मानो कही सत्य महराज ॥ ब्याहजो कीन्ह्यो तुम मोहबे में खोई सबै अपनी लाज १३४ जाति बनाफरकी ओछी है है सब जातिन केरि उतार ॥ इतना कहतै चौंड़ा ताहर दोऊ आयगये दरबार १३५ सूरति दीख्यो जब ताहर की गरई हाँक दीन ललकार ॥ हमजो वरजा तुमको ताहर ना तुम मानी कही हमार १३६ सुनिकै बातें ये राजा की ताहर हाथजोरि शिरनाय ॥ कही हकीकति सब मलखे की ताहर बारवार समुझाय १३७ माहिल बोले फिर राजा ते नाहर दिल्ली के सरदार ॥ टीका फेरो तुम जल्दी सों इतनी मानो कही हमार १३८ इतना सुनिकै चौंड़ा चलिभा ताहर बोले बचन उदार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले जिनके बाँट परी तलवार १३६ ब्याहन आवैं जब तुम्हरे घर तब तुम मूड़ लिह्यो कटवाय ॥ टीका फिरिहै अब दादा ना तुमते सत्यदीन बतलाय १४० यह मन भाय गई माहिल के तुरतै कीन्ह्यो रामजुहार ॥ बिदा माँगिकै पृथीराज सों चलिभा उरई का सरदार १४१ २४
१४ आल्हखण्ड । २१० खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२ माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥ सवैया ॥ भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना। और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥ मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना। गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १ सुमिरन ॥ दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥ नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥ ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २ को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥ माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३ तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥ गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४ शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥ त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५
ब्रह्माका विवाह । २११ १५ छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥ फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥ बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १ मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥ टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २ बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥ मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३ त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥ माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४ कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥ बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५ पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६ काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥ सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७ जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥ ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८ चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥ चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६ हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥ भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १० बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥
१६ आल्हखण्ड । २१२ भलो आपनो जो तुम चाहौ इकलो ब्रह्मा देउ पठाय ११ हमहूं जैबे त्यहि संगैमाँ तुम्हरे काज सिद्ध हैजायँ ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना बोली मन हर्षाय १२ कहा तुम्हारो हम टारब ना भैया उरई के सरदार ॥ इकलो ब्रह्मा तुम लै जावो जामें होय नहीं तहँ मार १३ माहिल बोले फिरि मल्हनाते बहिनी मानो कही हमार ॥ चोरी चोरा काम निकालो नाकछु रीतिभांति की ब्यार १४ यह मन भायगई मल्हना के चुप्पे पलकी लीन मँगाय ॥ ब्रह्माठाकुर को बुलवायो औ पलकीमों दीन बिठाय १५ लैकै पलकी माहिल चलिभे ऊदन अटा तहाँ पर आय ॥ हाल जानिकै सब माहिल को चुप्पै धावन लीन बुलाय १६ लिखिकै चिट्ठी मलखाने को ऊदन तुरतै दीन पठाय ॥ चिट्ठी पढ़िकै मलखाने ने औ सुलखेको लीन बुलाय १७ कहि समुझायो सब सुलखेको सोऊ चला बेगिही धाय ॥ जायकै पकरयो सो माहिलको तुरतै कैद लीन करवाय १८ लैकै पलकी औ माहिल को सिरसागढ़ै पहुँचा आय ॥ बाँधि जँजीरन फिरि माहिलको फाटक पास दीन बैठाय १६ ऊदन चलिभे फिरि महलनको मल्हनै शीश झुकावा जाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय २० माहिल मामा की बातन में इकलो ब्रह्मा दियो पठाय ॥ कुशल न होइहै तहँ ब्रह्माकी साँची बात कहैं हम माय २१ इतना कहिकै ऊदन चलिभे दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥ कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय २२ चिट्ठी लिखिकै मलखाने ने औ परिमालै दीन जनाय ॥
ब्रह्माका विवाह । २१३ १७ नेवता पठवो सब राजन को यहँहीं कुँवाँ बियाहैं माय २३ धायकै चिट्ठी मलखाने की सोई कीन रजापरिमाल ॥ गायके नेवता परिमालिक का आये सबै तहाँ नरपाल २४ तम्बू गड़िगे महराजन के झण्डा आसमान फहरायँ ॥ सुनवाँ बोली हाँ ऊदन ते तुम सुनिलेउलहुरवाभाय २५ ब्याह नगीचे है ब्रह्माका ना मोहबे का भयो तयार ॥ काह तुम्हारे मनमाँ ब्यापी देवर बेंदुल के असवार २६ सुनिकै बातें ये भौजी की बोले उदयसिंह सरदार ॥ हम नहिं जावैं अब मोहबे का भौजी मानों कही हमार २७ सुनिकै बातें ये ऊदन की सुनवाँ कहे बचन मुसुकाय ॥ दूध पियायो मल्हना रानी सेयो तुम्हें बनाफरराय २८ तुम्हें न चाहिये अस बघऊदन धोखा देउ समय पर आय ॥ धोखो दीन्हो माहिल मामा मलखे कैद लीन करवाय २६ कुशल आपने सब लड़काकी चाहैं सदा लहुरवा भाय ॥ को जगरक्षक है जननी सम ऊदन काह गये बौराय ३० करो तयारी अब भैया सँग मानो कही बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे आल्है खबरिजनायोजाय ३१ बातें सुनिकै बघऊदन की आल्हा लश्करलियोसजाय ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर मनमें सुमिरि शारदामाय ३२ चढ़ा बेंदुला की पीढ़ी पर नाहर उदयसिंह सरदार ॥ दशहरिपुरवा ते चलिकै फिरि पहुंचे मोहबे के दरबार ३३ खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने दोऊ भाय बैठि शिरनाय ॥ भई तयारी फिर सिरसा की सबकोउ अटे तहाँपर जाय ३४ गई पालकी तहँ मल्हना की सिरसा भीर भई अधिकाय ॥
१८ आल्हाखण्ड । २१४ आल्हा दीख्यो जब माहिल को मनमें गई दया तब आय ३५ फिरि ललकार्यो मलखाने को यहुका कीन लहुरवा भाय ॥ जल्दी छोड़ो तुम मामा को हमसों विपति दीखि ना जाय ३६ सुनिकै बातें ये आल्हा की मलखे तुरतै दीन छुड़ाय ॥ कुँवाँ बियाहउ ब्रह्मा ठाकुर पलकी चढ़यो गणेश मनाय ३७ भई तयारी फिरि विवाह की सबियाँ क्षत्री भये तयार ॥ हम ना जैबे अब दिल्ली को बोला उरई का सरदार ३८ बातैं सुनिकै ये माहिल की बोला उदयसिंह त्यहिबार ॥ तुम ना जैहौ जो दिल्ली को तौ को करिहै काम हमार ३६ बाँधि जंजीरन हम लैजैहैं मामा उरई के सरदार ॥ बातैं सुनिकै ये ऊदन की माहिल तुरत भये तय्यार ४० हाथी सजिकै आगे चलि भे पाछे चले घोड़ असवार ॥ पैदल सेना त्यहि पाछे सों तोपैं चलिभइँ पांच हजार ४१ आगे हाथी परिमालिक का पाछे सबै शूर सरदार ॥ पाग बैजनी शिरपर बाँधे ऊदन बेंदुलपर असवार ४२ कूच कराये सिरसागढ़ सों दिल्लीशहर गये नगच्याय ॥ दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेपर तम्बू तुरत दीन गड़वाय ४३ ध्वजपताका एकमिल व्हैगै नभमाँ गई लालरी छाय ॥ लागि कचहरी परिमालिककी शोभा कही बून ना जाय ४४ आल्हा बोले चूड़ामणि सों पंडित साइति देउ बताय ॥ लैके पत्रा पंडित बोले मानो कही बनाफरराय ४५ भौनलगन की अब बिरिया है ऐपनबारी देउ पठाय ॥ बातैं सुनिकै चूड़ामणि की मलखे रूपना लीन बुलाय ४६ ऐपनबारी बारी लैके दिल्ली तुरत देउ पहुंचाय ॥
ब्रह्माका बिवाह । २१५ १६ बातें सुनिकै मलखाने की रूपना हाथजोरि शिर नाय ४७ उत्तर दीन्ह्यो मलखाने को मानो कही बनाफरराय ॥ नैनागढ़ भुन्नागढ़ नाहीं ह्याँपर बसै पिथौराराय ४८ लौटब मुशकिल है दिल्ली ते पिरथी मूड़ लेइ कटवाय ॥ औरो बारी हैं मोहेबे के तिनका आप देयँ पठवाय ४६ बातें सुनिकै ये रुपना की बोले उदयसिंह सरदार ॥ तेहा राखो रजपूती का बाँधो सदा ढाल तलवार ५० जौन गोसइयाँ पैदा कीन्ह्यो सोई सदा बचावनहार ॥ बातें सुनिकै उदयसिंह की रूपन बोला बचन उदार ५१ घोड़ा पावैं हरनागर को औ मलखे कि ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी हम लै जावैं लावैं नहीं नेकहू बार ५२ सुनिकै बातें ये रूपन की मलखे दीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी रूपन लैकै हरनागर पर भयो सवार ५३ माथनाय कै सब क्षत्रिन को तुरतै कूच दीन करवाय ॥ पिरथी केरे फिर फाटकपर रूपन तुरत पहूंचा जाय ५४ तब ललकारा दरबानी ने बारी बड़ो के असवार ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहो ताहर समरथ रावरे क्यार ५५ सुनिकै बातें द्वारपाल्जादे रूपन पास बचन ततकाल ॥ आई बरातें हैं मोहेंबे के फाटकपार निकसजापरिमाल ५६ ब्याहन आये हैं ब्रह्माको रूपनवारी नाम हमार ॥ ऐपनवारी हम लाये हैं चाहिये नेग म्हार अब द्वार ५७ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल त्यहिबार ॥ नेगु तुम्हारो का द्वारे का बोलो घोड़े के असवार ५८ सुनिकै बातें द्वारपाल की रूपन कहा बचन ललकार ॥
चारघरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकीधार ५६ जौन शूरमाहो दिल्ली को द्वारे देवै नेग हमार ॥ ऐसे वैसे हम नेगी ना कम्मर बँधी ढाल तलवार ६० शूर सराही हम ऊदन का मलखे सिरसा के सरदार ॥ का गति वरणैं हम आल्हा की जिनसों हारिगई तलवार ६१ तिनके नेगी हम रूपन हैं राजै खबरि जनावो जाय ॥ सुनिकै बातें ये रूपन की रहिगा द्वारपाल सन्नाय ६२ सोचिसमझिकै फिरि बोलनभा रूपन काह गये बौराय ॥ दहीके धोखे कहुँ भूले ना ओतैं जाय कपास चबाय ६३ एक तो ऊदन कै गिनती ना बावन चढ़ैं उदयसिंह आय ॥ ह्यॉपर मलखे सब घर घर हैं आल्हा कौनवस्तु हैं भाय ६४ है परिमालिक अस ठाकुर बहु जिनसे पोत तसीला जाय ॥ जूठनि खावै घर घर बारी सो का रारि मचावै आय ६५ पीकै दारू को आवा है की वश सन्निपात के भाय ॥ झूरिभांग जो तू खावा हो तौ हम औषधि देयँ बताय ६६ ज्ञान ठिकाने करि सागढ़ सों राजै काह सुनावैं जाय ॥ सुनिकै बातें करि डाँड़ेपर रूना बोला क्रोध बढ़ाय ६७ आयगयो तब परिमालिक कौ तहाँ यों कोऊ कहुँ देखि परैना। जानत नाहिन रूपन को अरु नाहक दुष्ट बकै बहु बैना ॥ ताहर नाहर को गहि कै इकलो मलखान जिता बिन सैना। का बड़िवात करै ललिते दिनही नहिं देखिपरै तब नैना ६८ बातें सुनिकै ये बारी की चलिभा द्वारपाल ततकाल ॥
ब्रह्मका विवाह । २१७ २१ हाथ जोरिकै महराजा को सब बारीके कहे हवाल ६९ सुनिकै बातें द्वारपाल की यहु महराज पिथौराराय ॥ सूरज लड़का को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ७० पकरिकै लावो त्यहि बारी को हमको बेगि दिखावो आय ॥ सुनिकै बातें महराजा की सूरज चलिभा शीशनवाय ७१ दीख दुआरेपर बारी को नाहर घोड़े पर असवार ॥ शंका जाके कछु नाहीं है हाथ म लिये नाँगि तलवार ७२ हुकुम लगावा द्वारपाल को फाटक बंद लेउ करवाय ॥ फिरि लयलकारा रजपूतन को लावो पकरि शूरमाँ जाय ७३ हुकुम पायकै तब सूरज को तुरतै चले सिपाही धाय ॥ ऍंड़ लगायो हरनागर के टापन क्षत्री दीन गिराय ७४ बहुतन मार्यो रूपनबारी हाहाकार शब्द गा छाय ॥ देखि तमाशा सूरज ठाकुर मनमाँ बार बार पछिताय ७५ रूपनबारी के मुर्चा माँ कोऊ शूर न रोँकै पायँ ॥ उड़न बछेड़ा हरनागर ने बहुतक क्षत्री दीन गिराय ७६ फिरि फिरि मारै औ ललकारै बारी बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ देखि तमाशा यहुबारी का ताहर समरधनी चौहान ७७ सूरज ताहर दुउ शहजादे रूपन पास पहुंचे जाय ॥ ऍंड़ लगायो हरनागर के फाटकपार निकरिगा साय ७८ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री सबै चले बिरझाय ॥ नेग लेब अब हम भौरिन में गरई हाँक दीन गुहराय ७९ इतना कहिकै ऍड़ लगायो फौजन तुरत पहुंचा आय ॥ जैसे फागुन फगुई खेलैं लोहू छीटन गयो अन्हाय ८० तैसे दीख्यो जब रूपन का बोल्यो उदयसिंह सरदार ॥
२२ आल्हखण्ड । २१८ कहौ हकीकत सब दिल्ली कै द्वारे भली कीन तलवार =१ बातैं सुनिकै उदयसिंह की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ सुनिकै बातें ये रूपन की माहिल बोले वचन बनाय =२ यह नहिं चाहिये पृथीराज को जो अब रारि बढ़ावत जायँ ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सम्मुख लड़ै समर में आय =३ जो मन पावै बघऊदन का राजै तुरत देयँ समुझाय ॥ नेग कराय देयँ द्वारे का सातो भाँवरि देयँ फिराय =४ भली भली कहि ऊदन बोले माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर दिल्ली शहर पहुँचे जाय ८५ को गति बरर्णै तहँ पिरथी कै भारी लाग राजदरबार ॥ खाँड़ेराय पिरथी का भाई धाँधू तासु पुत्र सरदार ८६ रहिमति सहिमति जिन्सीवाले औ रणधीर लहाउर क्यार ॥ भुर्रा सुगुलिया काबुल वाला टिहुनन घरे नाँगि तलवार =७ देवी मरहटा दक्षिण वाला आला समरथनी मैदान ॥ अंगद राजा ग्वालियर का जगनिकक्यारभुरंगताज्वान== सातो लड़िका पृथीराज के तेऊ बैठि राजदरबार ॥ मोती जवाहर, गोपी, ताहर, सूरज, चन्दन ये सरदार =८ मर्दन, सर्दन, सातो लड़िका ये रणबाघ लड़ैया बाल ॥ सोने सिंहासन पिरथी सोहैं त्यहिमाँ जड़े जवाहरलाल ९० औरो ठाकुर बहु बैठे हैं एकते एक शूर सरदार ॥ तहँही पहुँचे उरई वाला तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ६१ कियो खातिरी पृथीराजने अपने पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोला तब पिरथी ते मानो कही पिथौरागाय ६२ काम न सरिहै लड़े भिड़ेते दूनों तरफ हानिहै आप ॥
[Header] ब्रह्माका बिवाह । २१६ २३
जहर घुरावो तुम शरबत में औ लशकरमें देउ पठाय ६३ बिना बयारी जूना टूटे औ बिन औषधि बहै बलाय ॥ यहै तयारी अब करिदारो तौ सबकाम सिद्ध है जाय ६४ साम दाम औ दण्ड भेद सों क्षत्री करें आपनो काम ॥ छल बल क्षत्री का धर्म है तुमको कौन करै बदनाम ६५ बातें सुनिकै ये माहिल की भा मन बड़ा खुशी नरनाह ॥ स्याबासि स्याबासि उरई वाले हमका नीकि दीन सलाह ६६ बिदा मांगिकै पृथीराज सों तम्बुन फेरि पहुंचा आय ॥ हाल बतायो परिमालिक को चेउँ न करी पिथौराराय ६७ जैसे पियासा पानी पावै सूखे धान परै जस नीर ॥ बातें सुनिकै ये माहिल की तैसे आय गयो मनधीर ६८ घड़ा मँगायो ह्वाँ पिरथी ने तामें जहर दीन डरवाय ॥ चारो नेगिन को बुलवायो सूरज पूत लीन बुलवाय ६६ कह्यो हकीकति सब सूरज सों पिरथी बार बार समुझाय ॥ तुरत कहारन को बुलवायो सूरज घड़ा लीन उठवाय १०० माथनायकै फिरि पिरथी को मनमें श्रीगणेश पद ध्याय ॥ सूरज चलिभा फिरि दिल्ली सों लश्कर तुरत पहुंचा आय १०१ जहँना तम्बू परिमालिक का बहिँगी तहाँ दीन धरवाय ॥ माथ नायकै परिमालिक को आपो बैठिगयो तहँ जाय १०२ मलखे बैठे हैं दहिने पर बायें बैठ उदयसिंहराय ॥ बैठ बराबर आल्हा ठाकुर शोभाकही बूत ना जाय १०३ सूरज बोले तहँ राजा सों शरबंत आप देउ बँटवाय ॥ करो तयारी फिरि द्वारे की साइति आयगईनगच्याय १०४ देवा बोला महराजा सों मानो कही चँदेलो राय ॥
२४ आल्हखण्ड । २२० पहिले शरबत माहिल पीवैं पाछे सब को देउ बताय १०५ इतना सुनिकै सूरज चलिभे तुरतै काने जनो चढ़ाय ॥ माहिल बोले तब देबाते क्षत्री काह गये बौराय १०६ पान बड़ेको पानी छोटे यहहै रीति सदा की भाय ॥ भाय लहुरवा शरबत पीवै औरो पियैं बनाफरराय १०७ माघ महीना दिन शरदी के हमरो शरबत पियै बलाय ॥ शिरमें पीड़ा ऐसे होवै औ फिरिसन्निपातहै जाय १०८ बातैं सुनिकै ये माहिल की देवा कुत्ता लीन बुलाय ॥ पीतै शरबत कुत्ता मरिगा तब सब गये तहां सन्नाय १०६ जितना शरबत रहै बहिंगिनमें सो सब खन्दक दीन डराय ॥ भागिकै सूरज दिल्ली आये औ दरबार पहुंचे आय ११० खबरि जनाई सब राजा को नेगी चले यहां ते धाय ॥ भागत नेगिन ऊदन देखा पकरा तुरत सबनको जाय १११ दया आयगै तब आल्हा के तुरतै नेगी दीन छुड़ाय ॥ नेगी चलिभे सब दिल्ली को औ दरबार पहुंचे आय ११२ कही हकीकति सब पिरथी ते नेगिन बार बार शिरनाय ॥ माहिल बोले परिमालिक ते मानो कही चँदेलेराय ११३ यह नहिं करतब है पिरथी कै लरिकन घाटि कीन ह्याँ आय ॥ रक्षक ज्यहिको है परमेश्वर त्याहिकोबार न बाँका जाय ११४ पै रिस हमरे अस आई है सबियाँ दिल्ली डेरैं खुदाय ॥ काह बतावैं हम जीजा ते तुम सुनिलेउ लहुरवाभाय ११५ शङ्का हमपर है देवा की साँचे हाल देयँ बतलाय ॥ हम नहिं जानत यह करतबरहैं मानो कही बनाफरराय ११६ बड़ी पियारी मल्हना बहिनी औ नित खातिर करै हमारि ॥
[Header] ब्रह्माका विवाह । २२१ २५
सगो भानजो ब्रह्मा हमरो तासौं कौनि हमारी रारि ११७ सुनिकै बातें ये माहिल की बोले उदयसिंह त्यहिबार ॥ अब तुम जावो फिरि दिल्लीको मामा उरई के सरदार ११८ शंका तुमपर नहिं काहूकी मामा मानो कही हमारि ॥ रक्षक ज्यहिकी जगदम्बा है त्यहिकोसकै कौनजगमारि ११९ सुनिकै बातें ये ऊदन की माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर फिरि दरबार पहुंचे जाय १२० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो माहिल बैठिगयो शिरनाय ॥ माहिल बोले फिरि राजा ते मानो कही पिथौराराय १२१ खंभ गड़ावो दरवाजे पर तिनपर कलश देउ धरवाय ॥ जाँरा भौंरा दोनों हाथी तिनके आगे देउ छुड़ाय १२२ प्यायकै दारू तिन हाथिन को तुरतै मस्त देउ करवाय ॥ द्वारे आवैं जब परिमालिक तबयह बोल्योवचनसुनाय १२३ हाथी पछारो म्वरे द्वार में तुरतै भाँवरि देयँ डराय ॥ कुल की हमरे यह रीती है मानो कही चँदेलेराय १२४ अवती बचिहैं नहिं द्वारे पर मानो कही पिथौराराय ॥ इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय १२५ भई तयारी ह्वाँ दिल्ली में द्वारे खम्भ दीन गड़वाय ॥ जो कुछ माहिल बतलावाथा सो सब सामा दीन कराय १२६ गाड़ो छावा गा जल्दी सों जल्दी चौक भई तय्यार ॥ अई सुहागिल बहु दिल्ली की गावनलगीं मंगलाचार १२७ देखिकै सूरति ह्वाँ माहिल की मलखे कहे वचन यहिबार ॥ खवरि बनावो सब दिल्ली की मामा उरई के सरदार १२८ सुनिकै बातें ये मलखे की माहिल बोले वचन बनाय ॥
[Header] ३६ आल्हखण्ड । २२२
करो तयारी अब द्वारे की मानो कही बनाफरराय १२६ मलखे बोले परिमालिक ते दूनो हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महराजा को ह्योते कूच देयँ करवाय १३० बातें सुनिकै मलखाने की राजा हुकुम दीन फरमाये ॥ बाजे डंका अहलंका के हाहाकारी शब्द सुनाय १३१ रथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़नपर असवार ॥ जितनी फौजें परिमालिक की सबियाँ वेगि भई तय्यार १३२ मनियादेवन को सुमिरन करि गजपर बैठि रजापरिमाल ॥ मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हावहाव करनाल १३३ गर्द उड़ानी तब पिरथी माँ लोपे अन्धकारसों भान ॥ मारू तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १३४ आगे पलकी भै ब्रह्माकै पाछे चले सिपाही ज्वान ॥ घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ दहिने चला वीरमलखान १३५ बँयें बेंदुला को चढ़वैया नाहर लिये नाँगि तलवार ॥ पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार १३६ गर्द न समझैक्यहु डशमनको क्षत्री उदयसिंह सरदार ॥ शोभा वरणै को आल्हा की साँचो धर्मरूप अवतार १३७ भा खलभट्टा औ हल्ला अति दिल्ली पास गये नगच्याय ॥ चन्दन बेटा को बोलवायो यहु महराज पिथौराराय १३८ भई तयारी अगवानी की दिल्ली सजन लागि सरदार ॥ रथ औ हाथिन में बहु बैठे छैला घोड़न भे असवार १३६ बड़ी सजाई भे ठकुरनक छैला चलिभे बाँधि कतार ॥ भाला बल्छी फरसा बाँधे कोऊ लिये ढाल तलवार १४० दगी सलामी दुहुँ तरफन ते धुँवना छायगयो असमान ॥
ब्रह्माका विवाह । २२३ २६ आतशबाजी की शोभा अति भाला तारा के अनुमान १-- कउँधालपकनि खड्गचमकनि हूकनि गुड़गुड़दीन मचाय ॥ पैग पैग पर दूनों चलि चलि रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४२ को गति बरणै महराजन कै मानो देव भूमिगे आय ॥ दो बिचवानी दउ दिशि घूमें रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४३ उठै सुगन्धैं तहँ अतरन की बेला और चमेला हार ॥ का गति बरणों मैं निवारि की क्षत्री किये फूल श्रृंगार १४४ नीली पीली जंगाली औ लाली पगड़िनकेरि कतार ॥ मुँदरी छल्ला मोहनमाला क्यहुगरपरामोतिनकाहार १४५ देखें तमाशा जे नारी नर तिनका लागै नीकि बहार ॥ शाल दुशाले नीले पीले चमकैं इन्द्रधनुष अनुहार १४६ बाल सूर्य्यसम मूंगा चमकैं दमकैं तहाँ जवाहरलाल ॥ जब अगवानी पूरण हैगै गावन लगीं द्वारपरबाल १४७ संगम हैगा दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ भये सतकार ॥ दूनों मिलिकै संगम हैकै पहुँचे पृथीराज के द्वार १४८ जौरा भौंरा हाथी ठाढ़े ताहर बोले बचन पुकार ॥ जौन शूरमा हों मोहबे के द्वारे हाथी देयँ पछार १४६ सुनिकै बातें ये ताहर की चलिभा उदयसिंह झन्नाय ॥ जावत देख्यो उदयसिंह को मलख्यो चला तुरत ठन्नाय १५० को गति बरणै दोउ बीरन की मानो चले कृष्ण बलराम ॥ ऊदन सुमिरयो श्रीशारद को मलखेलीनशिवाशिवनाम १५१ ऊदन चलिभा जौरा दिशिको मलखे भौंरा की दिशिजाय ॥ पूँछ पकरिकै तिन हाथिन कै जैसे सिंह घसीटै गाय १५२ तैसे ऊदन मलखे ठाकुर दोऊ नाग घसीटैं धाय ॥
३६ आल्हखण्ड । २२४
करो तमाशा दिल्लीवाले अँगुरी दाँते लीन चपाय १५३ मलखे ऊदन दोऊ ठाकुर सम्मुख गही सूँढ़ को आय ॥ दाबिकै मस्तक तिन हाथिनका दूनों दीन्हों भूमि लुटाय १५४ दाँत तूरिकै तिन हाथिन का दोऊ चढ़े घोड़ पर आय ॥ ताहर बोले फिरि दोउन ते गानो कही बनाफरराय १५५ कलश गिरावो अब खम्भन ते तौ हम कही शूर फिरि भाय ॥ इतना सुनिकै जगनिक ठाकुर कलशन पासपहुँचा जाय १५६ ताहर बोला कमलापति सों मारो याहि दौरि सरदार ॥ इतना सुनिकै कमलापति फिरि दौरे लिहे नाँगितलवार १५७ क्रोगति बरखै जगनायक कै भैनो जौन चँदेले क्यार ॥ आवत दीख्यो कमलापति को गरुई हाँक दीन ललकार १५८ लौटिज ठाकुर म्वरे मुर्चाते नहिं शिर काटि देउँ भुइँ डारि ॥ सुनिकै बातें जगनायक की कमलापतिउ बढ़ायोरारि १५६ हथी बढ़ायो फिरि आगे को जगनिक पास पहुंच्यो जाय ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर को हौदा उपर बिराजा आय १६० भाला मार्यो कमलापति को सोतो लीन ढाल पर वार ॥ रिसहा बैकै जगनायक फिरि तुरतै खैंचिलीन तलवार १६१ ऐंचि महाउत की मारत भा तुरतै भूमि दीन शिरडार ॥ आवा मस्तक ते भूमा फिरि गरुई हाँक दीन ललकार १६२ सँभरिकै बैठै अब हौदापर ठाकुर हाथी के असवार ॥ की भगि जावै म्वरे मुर्चा ते नहिंअबजानचहतयमद्वार १६३ बातें सुनिकै जगनायक की कमलापतिउ दीन ललकार ॥ काह गवाँरे तू बोलत है ठाकुर घोड़े के असवार १६४ तू अस छत्री हम संगर में केतन्यो डारे खेलि शिकार ॥
ब्रह्माका विवाह । २२५ २६' ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुहँ धाँसिदेउँ तलवार १६५ बातैं सुनिकै कमलापति की भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ ऐँड़ लगायो हरनागर के हाथी उपर गयो सरदार १६६ भाला मार्यो कमलापति के तोंदी परा घाव सो जाय ॥ द्वार जूझिगा कमलापति जब रहिमतसहिमतचलेरिसाय१६७ ऊदन बोले तब देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ देखो आवत दुइ लड़ने को उतसों समर भूमिमें ज्वान १६८ मन्नागूजर को सँग लै कै मारो समर भूमि मैदान ॥ तुम्हरी दूनन की बरणी है मानो कही बीर चौहान १६६ सुनिकै बातें बघऊदन की दोऊ बढ़े अगाड़ी ज्वान ॥ रहिमत सहिमतको ललकार्यो होवो खड़े समर मैदान १७० सुनिकै बातें इन दोउन की उनहुन खैंचि लीन तलवार ॥ उसरिन उसरिन दोऊ मारैं दोऊ लेयँ ढालपर वार १७१ बड़ी लड़ाई भै द्वारेपर औ बहि चली रक्तकी धार ॥ रहिमत सहिमत जिन्सीवाले घायल भये द्वऊ सरदार १७२ सुमिरि भवानी महिरवाली मनियादेव मोहेबे क्यार ॥ घोड़ बढ़ायो बघऊदन ने दोऊ कलशा लिये उतार १७३ देखि वीरता बघऊदन की भा मन खुशी पिथौराराय ॥ हँसिकै बोल्यो बघऊदन ते मानो कही बनाफरराय १७४ उलटी रीती हमरे घरकी ऐसो सदा क्यार व्यवहार ॥ हो समधवारो जब द्वारेपर तबफिरिभौरिनकाव्यवहार१७५ अब तुम लावो परिमालिक को यहहू नेग यहाँ द्वैजाय ॥ होय तयारी फिरि भौरिनकै साँचे हाल दीन बतलाय १७६ इतना सुनिकै ऊदन चलिभो पहुँचा जहाँ रजापरिमाल ॥ १५
३० | आल्हखण्ड । २२६
जो कछु भाषा पृथीराज ने | ऊदन जाय कह्यो सब हाल १७७ सुनी हकीकति जब माहिल सब | पहुंचा पृथीराज के पास। बड़ी उदासी सों बोलत भा | राजा करो बचन विश्वास १७८ ब्याह जो होइहै ब्रह्मानँद का | होइहै बड़ा जगत उपहास॥ भेटन आवैं परिमालिक जब | तब तुम करो द्वारपर नाश १७६ इतना कहिकै माहिल चलिभे | अब ऊदनके सुनो हवाल॥ सुनिकै बातें बघऊदन की | बोले तुरत रजा परिमाल १८० ताकत हमरे अस नाहीं है | जो हम मिलैं द्वार समध्वार॥ गजभर छाती पृथीराज की | क्यहिके जमे करजे बार १८१ रह्यो भरोसे तुम हमरे ना | मानो कही बनाफरराय॥ मलखे बोले तब आल्हा ते | दोऊ हाथ जोगि शिर नाय १८२ भयो हँसौवा अब दिल्ली माँ | दादा साँच परे दिखराय॥ ऐसी बातें राजा बोलैं | सो तुम सुनी रह्यो है भाय १८३ अब तुम चलिहौ समध्वारे को | तौ सब बात यहाँ रहिजाय॥ हँसिहैं दिल्ली में नरनारी | भारी विपति परी अब आय १८४ जेठो भाई बाप बरोबरि | तुम्हरे गये बात बनि जाय॥ सुनिकै बातें ये मलखे की | आल्हा हाथी दीन बढ़ाय १८५ ठाढ़े पृथीराज जहाँ | तहँपर गये बनाफरराय॥ उतरिकै हाथी के हौदा ते | मनमें सुमिरि शारदा माय १८६ गये सामने जब पिरथी के | दधि औ पान दीन चपकाय॥ लखैं तमाशा तहँ नारी नर | भा समध्वार द्वार पर याय १८७ पिरथी बोले तहँ आल्हा सों | मानो कही बनाफरराय॥ अब तुम जावो निज तम्बू को | भौरी समय गयोन गचयाय १८८ निकै बातें ये पिरथी की | लश्कर कूच दीन करवाय॥
ब्रह्माका बिवाह । २२७ ३१ बाजे डंका अहतंका के तम्बुन फेरि पहुंचे आय १८६ पिरथी पहुंचे राजमहल को सबियाँ झगड़ा गयो पटाय ॥ खेत छूटि गा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय १६० करों बन्दना पितु अपने की जिन बल भयोतरँगकोअन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १६१