आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
उदयसिंहका विवाह । २४३ ५ कौन शहर है देवा ठाकुर हमको साँच देउ बतलाय ३३ देवा बोला तब ऊदन ते जानो नहीं हमारो भाय ॥ इतना कहिकै दूनों चलि भे रहिगा पावकोस फिरिआय ३४ तहँ चरवाहन को देखत भो तिनसों कह्यो बनाफरराय ॥ कौन शहर औ को राजा है हमको साँच देउ बतलाय ३५ सुनिकै बातें बघऊदन की बोला अहिरपूत तब भाय ॥ नरपति राजा नरवरगढ़ है ओ परदेशी बात बनाय ३६ इतना सुनिकै दूनों चलिभे पुर के पास पहुंचे जाये ॥ तहाँ जलेड़ा बहु नारिन को खैन्नैं बारिकूप में आय ३७ को गति बरखै तिन नारिनकै पतली कमर तीनिबलखाय ॥ दाँत अनारन के बीजासम मीसी हँसत परै दिखलाय ३८ परी बत्तीसी है पानन कै आननकमलखिला जसभाय ॥ छाती सोहैं नवरंगी सम क्युएडी भौंर सरिस दिखरायँ ३६ गजकीशुण्डा सम भुजदण्डा जंघा कदलिथम्भ अनुमान ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का तेंहा होयँ अनेकन ज्वान ४० ऐसी बाला सब आला हैं नाभी यमुन भँवरसम भाय ॥ रूप देखिकै तिन नारिन का पहुँचा पास बनाफरराय ४१ मनमाँ सोचा उदयसिंह तब औ यह ठीक लीन ठहराय ॥ जौने पुरकी अस नारी हैं रानिनरूप वरणि ना जाय ४२ यहै सोचिकै बघऊदन फिरि बोला एक नारिके साथ ॥ पूरब तेनी पश्चिम आये बाबा सूर्य चराचर नाथ ४३ घोड़ पियासा अति हमरो है याको पानी देउ पियाय ॥ बातें सुनिकै ये ऊदन की बोली तुरत नारिसिसियाय ४४ करन दिल्लगी हमसों आयो क्षत्री घोड़े के असवार ॥
६ आल्हखण्ड । २४४ पनी पियावन अब घोड़े का फेरि न कह्यो दूसरीबार ४५ नरपति राजा यहि नगरी का सबविधि शूरबीर सरदार ॥ टरिजा टरिजा अब जल्दी सों क्षत्री घोड़े के असवार ४६ इतना सुनिकै ऊदन बोले अब ना बोले फेरि गवाँरि ॥ ऐसी बातें जो फिरि बोलै तौ मुँहँ घाँसिदेउँ तरवारि ४७ नरपति खरपति कै गिनतीना बर बर करै बैजनी नारि ॥ काह हक़ीक़ति है नरपति कै हमरे साथ करै तरवारि ४८ सुनिकै बातें ये ऊदन की सहमी तहाँ तुरत सो नारि॥ औरी नारी त्यहि सों बोलीं आई संग भरन जे बारि ४९ रूप उजागर सब गुण सागर नागर घोड़े को असवार ॥ करुई वाणी नाहक बोलिउ बहिनी मानों कही हमार ५० यहु बर लायक है फुलवा के सबविधि रूपशील गुणवान ॥ वह तो बोली भल धीरज में पर परिगई बनाफर कान ५१ सवैया ॥ ऊदन बोलिउठा त्यहि नारि सों कौनअहै फुलवा सहिदानी । देहु बताय न राखु छिपाय चुभी मनमें सुनिबे को कहानी ॥ कोमल बैन सुन्यो जब भामिनि बोलिउठी तबहीं यह बानी । नरपतिकी कन्या लखिकै ललिते रतिहू मनमें सकुचानी ५२ त्यहि की समता सुन्दरता की यहिपुर नारिकौन यहिकाल ॥ काह बतावों परदेशी मैं फूलन शयनकरै वह बाल ५३ त्यहिमुख फुलवाकी गाथासुनि ऊदन आगम गयो जनाय ॥ दक्षिण बाहू फरकन लाग्यो दहिने भई शारदा माय ५४ यदि आगैं फिरि माड़ो कै जो कछुकहाविजैसिनिभाल ॥
उदयसिंहका विवाह । २४५ ७ बाण लागिगा उर मन्मथ का घायल देशराजका लाल ५५ आदर करिकै फिरि देवा का बोला उदयसिंह सरदार ॥ अब दिन थोड़ा अतिबाकी है देखो चलैं शहर को यार ५६ आखिर सोना है बिरवातर सबदिन मारग में सरदार ॥ भागि भरोसे शहर जो पावा तौकस त्यागि चलैं यहिवार ५७ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा मैनपुरी चौहान ॥ ज्योतिष बिद्या के परचय से जाना कुशलकरी भगवान ५८ देवा बोला फिरि ऊदन सों मानो कही लघुरवाभाय ॥ द्रव्य बांधिकै पर पुर जैये यहनहिं हृदयमोर पतियाय ५६ तासों रहिबो तर बिरवा के नीकी बात बनाफरराय ॥ द्रव्य प्राण की घातक जानो मानो साँच बचन तुमभाय ६० इतना सुनिकै ऊदन बोले साँचौ मानो कही हमार ॥ भय उर राखो कछु जियरे ना चलिये टिकैं यहाँ सरदार ६१ इतना कहिकै बघऊदन ने आगे दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ पाछे चलिभा देवाठाकुर मनमें बार बार पछिताय ६२ जायकै पहुंचे फुलबगिया में मालिन भीर दीखअधिकाय ॥ तहाँ पै उतरे बघऊदन जब माली पास पहुँचा आय ६३ माली बोला बघऊदन ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ चलिकै उतरो बहु मोरे घर ह्याँनहिंटिको मुसाफिरभाय ६४ यह फुलवाई महाराजा की ह्याँसों मेख लेउ उखराय ॥ सुनिकै बातें त्यहि माली की चुप्पै मुहरैं दीन गहाय ६५ पांच अशर्फी माली पायो मनमाँ बड़ा खुशी ह्वैजाय ॥ हाथ जोरिकै माली बोला द्वारे टिको चलै तुम भाय ६६ द्वारे कुइँयाँ मीठा पानी नींबू वृक्ष तहाँ अधिकाय ॥
८ आल्हखण्ड । २४६ हाटक निकटै म्वरे द्वारे के सीधा घास लिह्यो मँगवाय ६७ सुनिकै बातैं त्यहि माली के ऊदन कूच दीन करवाय ॥ द्वारे पहुंचे फिरि माली के मेखैं तहाँ दीन गड़वाय ६८ मांगिकै पलँगा माली लायो द्वारे तुरत दीन डरवाय ॥ गद्दा परिगा मखमलवाला आला बैठ बनाफरराय ६६ माली चलिभा फुलवगियाका मालिनि द्वार पहुँची आय ॥ मालिनि बोली उदयसिंह ते ठाकुर हाल देउ बतलाय ७० कहाँ ते आये औ कहँ जैहौ तुम्हरो काह नाम है भाय ॥ बातैं सुनिकै ये मालिनि की बोले तुरत बनाफरराय ७१ नाम हमारो उदयसिंह है हमरो देश मोहोबा जान ॥ छोटे भैया हम आल्हा के साँचे बचन हमारे मान ७२ सुनिकै बातैं ये ऊदन की मालिनि फेरि कहा शिरनाय ॥ आल्हा बेहे कौन शहर में साँची साँची देउ बताय ७३ सुनिकै बातैं ये मालिनि की बोला उदयसिंह सरदार ॥ भैया ब्याहे नैनागढ़ माँ सुनवाँभौजी आय हमार ७४ बड़ी खुशहाली भै मालिनिके बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ हमहूँ सुनवाँ साथै खेलीं हिरिया नाम हमारो भाय ७५ मैको हमरो है नैनागढ़ सुनवाँ बहिनी लगे हमारि ॥ चलिकै बैठो म्वरे मन्दिर में देवर सेवा करों तुम्हारि ७६ बातैं सुनिकै ये हिरिया की भा मन खुशी बनाफरराय ॥ दिह्यो अशर्फी दश मालिनिको औयहबोल्योवचनसुनाय ७७ सीधा लावो तुम लरिकनको भोजन वेगि पकावो जाय ॥ दिना चारि यहि पुरमा रहिकै पाछे कूच देव करवाय ७८ सुनिकै ये ऊदन की मालिनि बैठि धाम में जाय ॥
उदयसिंहका बिवाह । २४७ ६ माली आवा जब बगिया ते तबसब हाल कहे समुझाय ७६ देवा बोला हाँ ऊदन ते अब रँग और परै दिखराय ॥ काहे अटक्यो तुम नरवर में साँचे हाल देव बतलाय ८० बातें सुनिकै ये देवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ फुलवा बेटी जो नरपति की तामें लाग्यो चित्त हमार ८१ कीनि प्रतिज्ञा हम अपने मन साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥ नैनन दीखे बिन फुलवा को ना हम धरब अगाड़ीपाँय ८२ सुनिकै बातें ये ऊदन की देवा बोला बचन बनाय ॥ ऐसी करिहौ जो बघऊदन तौ सब जैहैं काम नशाय ८३ घोड़ खरीदैन को आये तुम नरवर नैन खरीदे आय ॥ काह बतैहौ तुम राजा ते सोऊ कहो लहुरवाभाय ८४ तुमका सौंप्यो महराजा म्हिँ ऊत तुँकाह गयो बौराय ॥ तनिक मिहिरिया के देखै का ऊमफुलदेहौ लाज गवाँय ८५ अबै न बिगरा कछु बघऊदन ह्याँ ते कूच देव करवाय ॥ सुनिकै बातें ये देवा की बोला फेरि बनाफरराय ८६ मोहिं भरोसा है शारद को देवा मैनपुरी चौहान ॥ घोड़ खरीदन फिरि हम जैहैं करिहैं कुशलमोरिभगवान ८७ पै मन अटको है फुलवा में हटको मानै नहीं हमार ॥ खटको भटको पटको झटको सोवो आज यहाँ सरदार ८८ इतना कहतै बघऊदन के दोऊ नैन गये अलसाय ॥ देवा ऊदन दोऊ सोये चकरन पहरादीन बिठाय ८६ सोयकै जागे जब बघऊदन प्रातःक्रिया कीन हर्षाय ॥ फेरिकै पहुँचे मालिनि घरमाँ मालिनि हरवा रही बनाय ६० ऊदन बोले तहँ मालिनि सौं हिरिया भौजी बात बनाय ॥
१० आल्हखण्ड । २४८ लाव मलाई अब जल्दी सों दौरति चली बजारे जाय ६१ इतना सुनिकै हिरिया बोली साँची सुनो बनाफरराय ॥ हार छोड़िकै जाउँ बजारे तौ तकसीर बड़ी है जाय ६२ तनकिउ देरी हमका लागी फुलवा जाई बेगि रिसाय ॥ बातें सुनिकै ये हिरिया की बोले फेरि बनाफरराय ६३ हार तुम्हारो हम गूंथत हैं मालिनि जाउ बजरिया धाय ॥ पांच अशर्फी ऊदन दीन्ह्यो मालिनिचली तड़ाकाजाय६४ बेला चमेली औ निवारिको ऊदन हार कीन तय्यार ॥ मालिनि आई जब बजारेते देखा चार लरिनको हार ६५ हिरिया बोली तब ऊदन ते देवर मानो कही हमार ॥ हार डुलरिया रोज बनावों चौलर आज भयो तय्यार ६६ कर्री गांठि तुम्हारी की फूनन खूब सटा है यार ॥ हाल जो पूँछी फुलहर सें उत्तर काह देब सरदार ६७ बातें सुनिकै ये मालिन की बोला उदयसिंह त्यहिंवार ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार कीन तय्यार ६८ इतनासुनिकै हिरियामालिनि तुरतै डलिया लीन उठाय ॥ जहँना बेटी रह नरपति कै मालिनि तहाँ पहुंची जाय ६६ बैठि पलँगरा फुलवा बेटी मालिनि हार दीन पहिराय ॥ चार लरिन को हरवा दीख्यो फुलवा बोलीवचनरिसाय १०० रोज डुलरिया लै आवति थी कौने गूँधा चौलरहार ॥ साँच बतावै री मालिनि अब नाहीं पेट फोरैहौं त्वार १०१ इतना सुनिकै मालिनि बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार बनायो आय १०२ वह तो ब्याही है मोहबे माँ जहँपर बसैं रजापरिमल ॥
उदयसिंहका विवाह। २४६ ९९ पारस पत्थर तिनके घरमाँ उनकी रय्यति सबै निहाल १०३ बातें सुनिकै ये मालिनि की फुलवा हुकुमदीन फरमाय ॥ हार बनायो ज्यहि मालिनि है मोको बेगि दिखावै आय १०४ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै मनमाँ बार बार पछिताय ॥ ज्यों त्यों आई घर अपने को तहँपर मिले बनाफरराय १०५ हाल बनायो सब फुलवाको मालिनि बार बार समुझाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपै जर्दी आनन परै दिखाय १०६ ऊदन बोले तब मालिनि ते काहे सोच करो अधिकाय ॥ नई पुरानी जेवर लैके हमको देउआय पहिराय १०७ देखन जैबे हम फुलवा को मालिनि मानो कही हमार ॥ शंका लावो कछु जियरे ना तुम्हरो जाय न बांकोबार १०८ कौन डुमरिहा जग हमरो है जो तुम्हरे तन करै निगाह ॥ निश्चय जानो अपने मनमाँ हमफुलवाते करब विवाह १०६ बातें सुनिकै उदयसिंह की मालिनि शंका दीन भुलाइ ॥ तुरतै गहना को लै आई पहिरनलागलहुरवाभाय ११० मिस्सी रगरी सब दाँतन में तापर लीन्ह्यो पान चबाय ॥ काजल आँज्यो दोउ नैनन में शोभा कही बूत ना जाय १११ बेंदी बँदनी टीका तीनों मस्तक ऊपर धरा सँवार ॥ करनफूल कानन में पहिरा तामें गुज्झी करें बहार ११२ मोहनमाला मोतिनमाला पहिरे और फुलनके हार ॥ बाजू जोसन टाड़ैं तीनों दोऊभुजा पहिरि सरदार ११३ नीले रँगकी चुरियाँ पहिरी गोरे हाथनका श्रृङ्गार ॥ आगे अगेला पिछे पछेला तिनविच ककनाकैरेंबहार ११४ छल्ले पहिरे सब अँगुरिन में अँगुठा लीन आरसी धार ॥
१२ आल्हखण्ड । २५० पहिरि करधनी ली कम्मर में पायँन पायजेब झनकार ११५ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै नीचे मेंहदी करै बहार ॥ बिछुआपहिरे सब अँगुरिन में अनवटअँगुठनकाश्रृंगार ११६ वेष जनाना ऊदन धरिकै तुरतै पालकी लीन मँग़ाय ॥ बैठि पालकी में नरनाहर मनमें सुमिरिशारदामाय ११७ हिरिया मालिनि को सँग लै कै फुलवा महल गयेनगन्याय ॥ उतरि पालकी सों नरनाहर शारदचरणकमलफिरिध्याय ११८ आगे हिरिया पाछे ऊदन फुलवा पास पहुँचे जाय ॥ फुलवा देख्यो जब ऊदन को मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ११९ रूप देखिकै त्यहि मालिनिको मनमाँ गई सनाकाखाय ॥ कै पैताना खाली दीन्ह्यो आदरकीनफेरिअधिकाय १२० बैठि उसीसे जब ऊदनगे फुलवा बोली बचन रिसाय ॥ कैसी मालिनि यह लाई है मालिनिहालदेयबतलाय १२१ मालिनि बोली तब फुलवाते बेटी साँची देयँ बताय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की नौकरितासुपासकीआय १२२ राजनीति का यह जानति है राखति सबऊ सखी का भाय ॥ बैठि उसीसे यह जावै जो तौ वह क्षमा करै हर्षाय १२३ सुनिकै बातें ये मालिनि की फुलवा क्षमा कीन सुखपाय ॥ हँसिकै बोली फिरि मालिनिते साँची साँची देउ बताय १२४ कौन बहादुर परिमालिक घर कारो राजपुत्र यहिकाल ॥ बातें सुनिकै ये फुलवाकी बोला देशराजका लाल १२५ आल्हा ब्याहे हैं नैनागढ़ पथरीगढ़ै वीर मलखान ॥ पिरथी घरमाँ ब्रह्मा ब्याहे ठाकुर दिल्लीके चौहान १२६ कारो इकलो बघऊदनहै ज्यहिकै बाँड़ि बहै तलवार ॥
उदयसिंहका विवाह । २५१ १३ बड़ा लड़ैया जगमाँ जाहिर ठाकुर बेंदुलका असवार १२७ इतना सुनिकै फुलवा बोली मालिनि साँच देउ बतलाय ॥ हाथ पैर पुरुषन के ऐसे करै करै परै दिखाय १२८ इतना सुनिकै मालिनि बोली साँचे बचन करो परमान ॥ भैंसि चराई बालापनमाँ माता पिता दरिद्रीजान १२६ परी व्यवस्था लरिकाई में ताको करी कहाँलगगान ॥ जैसी गुजरी हमरे ऊपर ऐसी परै न काहू आन १३० फुलवा बोली फिरि हिरिया ते मालिनि जाउ घरै यहिबार ॥ काल्हि सबेरे यहि लैजायो साँची मानो कही हमार १३१ इतना सुनिकै हिरिया चलिमै अपने घरै पहुँचि आय ॥ फुलवा बाँदी को बुलवायो तासों चौपरलीन मँगाय १३२ खेलन लागी मालिनि सँगमाँ आधी राति गई नगच्याय ॥ लैकै पंखा बाँदी हाँकै ऊइन केर वस्त्र उड़िजाय १३३ कब्जा झलकै तलवारी का सो फुलवा के परा निगाह ॥ फुलवा बोली तब मालिनिते झलकै बगल तुम्हारे काह १३४ तुम नहिं बेटीहौ मालिनिकी औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥ सुनि मकरन्दा तुमका पाई तुरतै खोदि लेइ गड़वाय १३५ अब पहिंचाना हम तुमको है बेटा देशराज के लाल ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते औपारिग्योकालके गाल १३६ नाम तुम्हारो उदयसिंह है तुम्हीं बेंदुल के असवार ॥ इतना सुनिकै मालिनि बोली कीन्ह्योनीकी आजचिन्हार १३७ कहँ पै देख्यो तुम ऊदन को साँचे हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै सब बाँदिनको फुलवा तुरतै दीन हटाय १३८ ओ फिरि बोली बबऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥
१४ आल्हखण्ड । २५२ रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९ घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥ भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४० ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥ मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१ साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥ यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२ पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥ बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३ सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४ भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥ ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५ इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६ व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥ करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७ ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥ क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८ धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥ भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५० माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥
उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥
[Header] १६ आल्हखण्ड । २५४
बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १ देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥ देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २ लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥ फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥ बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४ आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥ साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५ बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥ बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६ इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥ पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७ हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥ चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८ भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥ करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६ ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥ जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १० इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥ अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११ गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२ गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥
उदयसिंहका बियाह। २५५ १७ डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३ धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥ टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४ को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥ ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५ देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥ ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६ बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥ मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७ मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥ एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८ धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥ देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६ ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥ सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २० क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥ पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१ गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥ बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२ कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥ देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३ नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४ हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५
१८ . आल्हखण्ड । २५६ द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५ सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥ धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६ बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥ ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७ इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥ है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८ देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥ जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६ शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥ मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३० होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥ तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१ इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥ बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२ इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥ धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३ पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥ फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥ बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५ आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥ नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६ भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥
उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙ इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७ भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥ बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८ किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥ बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६ देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥ इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४० किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥ रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१ कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥ देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२ पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥ योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३ मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४ भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥ जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५ ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥ हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६ सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥ जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७ बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८ परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥ १७
२० आल्हाखण्ड । २५८ फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६ परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५० इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥ भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१ देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥ फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२ ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥ तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३ योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥ इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४ आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५ ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६ घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥ पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७ का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८ गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥ कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६ यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥ भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६० कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥
उदयसिंहका विवाह । २५६ २१ कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१ यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२ उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३ उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥ भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४ करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥ बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५ गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥ टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६ मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥ इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७ सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥ हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८ लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥ रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६ कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥ इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७० लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१ लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥ दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२ पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥
२२ आल्हखण्ड । २६० चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३ कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४ पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥ देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५ ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥ जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६ तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥ जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७ बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥ ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८ तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६ हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८० आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥ पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१ यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥ करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२ यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥ सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३ खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥ जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४ जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥
उदयसिंहका विवाह । २६१ २३ जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५ गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥ सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६ हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥ करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७ सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८ यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥ चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६ उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥ रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६० जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥ पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१ आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२ जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३ काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥ तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५ कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥ तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६ वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥
२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥