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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

उदयसिंहका विवाह। २४६ ९९ पारस पत्थर तिनके घरमाँ उनकी रय्यति सबै निहाल १०३ बातें सुनिकै ये मालिनि की फुलवा हुकुमदीन फरमाय ॥ हार बनायो ज्यहि मालिनि है मोको बेगि दिखावै आय १०४ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै मनमाँ बार बार पछिताय ॥ ज्यों त्यों आई घर अपने को तहँपर मिले बनाफरराय १०५ हाल बनायो सब फुलवाको मालिनि बार बार समुझाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपै जर्दी आनन परै दिखाय १०६ ऊदन बोले तब मालिनि ते काहे सोच करो अधिकाय ॥ नई पुरानी जेवर लैके हमको देउआय पहिराय १०७ देखन जैबे हम फुलवा को मालिनि मानो कही हमार ॥ शंका लावो कछु जियरे ना तुम्हरो जाय न बांकोबार १०८ कौन डुमरिहा जग हमरो है जो तुम्हरे तन करै निगाह ॥ निश्चय जानो अपने मनमाँ हमफुलवाते करब विवाह १०६ बातें सुनिकै उदयसिंह की मालिनि शंका दीन भुलाइ ॥ तुरतै गहना को लै आई पहिरनलागलहुरवाभाय ११० मिस्सी रगरी सब दाँतन में तापर लीन्ह्यो पान चबाय ॥ काजल आँज्यो दोउ नैनन में शोभा कही बूत ना जाय १११ बेंदी बँदनी टीका तीनों मस्तक ऊपर धरा सँवार ॥ करनफूल कानन में पहिरा तामें गुज्झी करें बहार ११२ मोहनमाला मोतिनमाला पहिरे और फुलनके हार ॥ बाजू जोसन टाड़ैं तीनों दोऊभुजा पहिरि सरदार ११३ नीले रँगकी चुरियाँ पहिरी गोरे हाथनका श्रृङ्गार ॥ आगे अगेला पिछे पछेला तिनविच ककनाकैरेंबहार ११४ छल्ले पहिरे सब अँगुरिन में अँगुठा लीन आरसी धार ॥

१२ आल्हखण्ड । २५० पहिरि करधनी ली कम्मर में पायँन पायजेब झनकार ११५ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजै नीचे मेंहदी करै बहार ॥ बिछुआपहिरे सब अँगुरिन में अनवटअँगुठनकाश्रृंगार ११६ वेष जनाना ऊदन धरिकै तुरतै पालकी लीन मँग़ाय ॥ बैठि पालकी में नरनाहर मनमें सुमिरिशारदामाय ११७ हिरिया मालिनि को सँग लै कै फुलवा महल गयेनगन्याय ॥ उतरि पालकी सों नरनाहर शारदचरणकमलफिरिध्याय ११८ आगे हिरिया पाछे ऊदन फुलवा पास पहुँचे जाय ॥ फुलवा देख्यो जब ऊदन को मनमाँ बड़ी खुशी है जाय ११९ रूप देखिकै त्यहि मालिनिको मनमाँ गई सनाकाखाय ॥ कै पैताना खाली दीन्ह्यो आदरकीनफेरिअधिकाय १२० बैठि उसीसे जब ऊदनगे फुलवा बोली बचन रिसाय ॥ कैसी मालिनि यह लाई है मालिनिहालदेयबतलाय १२१ मालिनि बोली तब फुलवाते बेटी साँची देयँ बताय ॥ बेटी प्यारी परिमालिक की नौकरितासुपासकीआय १२२ राजनीति का यह जानति है राखति सबऊ सखी का भाय ॥ बैठि उसीसे यह जावै जो तौ वह क्षमा करै हर्षाय १२३ सुनिकै बातें ये मालिनि की फुलवा क्षमा कीन सुखपाय ॥ हँसिकै बोली फिरि मालिनिते साँची साँची देउ बताय १२४ कौन बहादुर परिमालिक घर कारो राजपुत्र यहिकाल ॥ बातें सुनिकै ये फुलवाकी बोला देशराजका लाल १२५ आल्हा ब्याहे हैं नैनागढ़ पथरीगढ़ै वीर मलखान ॥ पिरथी घरमाँ ब्रह्मा ब्याहे ठाकुर दिल्लीके चौहान १२६ कारो इकलो बघऊदनहै ज्यहिकै बाँड़ि बहै तलवार ॥

उदयसिंहका विवाह । २५१ १३ बड़ा लड़ैया जगमाँ जाहिर ठाकुर बेंदुलका असवार १२७ इतना सुनिकै फुलवा बोली मालिनि साँच देउ बतलाय ॥ हाथ पैर पुरुषन के ऐसे करै करै परै दिखाय १२८ इतना सुनिकै मालिनि बोली साँचे बचन करो परमान ॥ भैंसि चराई बालापनमाँ माता पिता दरिद्रीजान १२६ परी व्यवस्था लरिकाई में ताको करी कहाँलगगान ॥ जैसी गुजरी हमरे ऊपर ऐसी परै न काहू आन १३० फुलवा बोली फिरि हिरिया ते मालिनि जाउ घरै यहिबार ॥ काल्हि सबेरे यहि लैजायो साँची मानो कही हमार १३१ इतना सुनिकै हिरिया चलिमै अपने घरै पहुँचि आय ॥ फुलवा बाँदी को बुलवायो तासों चौपरलीन मँगाय १३२ खेलन लागी मालिनि सँगमाँ आधी राति गई नगच्याय ॥ लैकै पंखा बाँदी हाँकै ऊइन केर वस्त्र उड़िजाय १३३ कब्जा झलकै तलवारी का सो फुलवा के परा निगाह ॥ फुलवा बोली तब मालिनिते झलकै बगल तुम्हारे काह १३४ तुम नहिं बेटीहौ मालिनिकी औ छल किह्यो यहाँपर आय ॥ सुनि मकरन्दा तुमका पाई तुरतै खोदि लेइ गड़वाय १३५ अब पहिंचाना हम तुमको है बेटा देशराज के लाल ॥ जियत न जैहौ तुम महलनते औपारिग्योकालके गाल १३६ नाम तुम्हारो उदयसिंह है तुम्हीं बेंदुल के असवार ॥ इतना सुनिकै मालिनि बोली कीन्ह्योनीकी आजचिन्हार १३७ कहँ पै देख्यो तुम ऊदन को साँचे हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै सब बाँदिनको फुलवा तुरतै दीन हटाय १३८ ओ फिरि बोली बबऊदन ते मानो कही बनाफरराय ॥

१४ आल्हखण्ड । २५२ रानी कुशला के महलन में योगीरूपधरा तुम जाय १३९ घर घर लूटा तुम माड़ो माँ हमसों शपथकीन फिरिआय ॥ भेद बतावा घर अपने का तब तुमलीन बापका दायँ १४० ब्याह हमारो जब तुम कीन्हा मलखे हना मोहिं ततकाल ॥ मिलन आपनो तुम्हें बतावा नाहर देशराज के लाल १४१ साँचो चाहत जो जाको है ताको स्वई मिलै सबकाल ॥ यह सुनि राखा हम विप्रन सों सो सब साँचाभयो हवाल १४२ पै गति तुम्हरी ह्वाँ नहीं है हमसों ब्याह करो सरदार ॥ बड़ा लड़ैया मकरन्दा है ज्यहिते हारिगई तलवार १४३ सुनिकै बातें ये फुलवा की बोला उदयसिंह सरदार ॥ काह हकीकति मकरन्दा कै साँची मानो कही हमार १४४ भल पहिचान्यो तुम मोका है अब सब पूर भये मम काम ॥ ब्याह तुम्हारो अब कीन्हे बिन / लौटिन जायँ आपनेधाम १४५ इतना सुनिकै फुलवा बोली मानो कही बनाफरराय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता जादू सेल शनीचर भाय १४६ व्यापी जियरा अति मेरो है ताते धीर धरा ना जाय ॥ करो बियारी तुम महलन में सोवो सेज बनाफरराय १४७ ऊदन बोले तब फुलवा ते तुमको साँच देयँ बतलाय ॥ क्वारी कन्या की शय्यापर कबहुँ न धरैं बनाफर पायँ १४८ धीरज राखो अपने मनमाँ सोवो तुरत सेज में जाय ॥ भयो भरोसा तब फुलवा के सोई विकट नींदको पाय १४९ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ उये निशाकर आसमान में विरहिनिपीरभईअधिकाय १५० माथ नवावों पितु अपने को ह्वाँ ते करों तरँग को अन्त ॥

उदयसिंहका विवाह । २५३ १५ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत ऊदनफुलवामिलाप वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ -⁘- सवैया ॥ कौन कि आश सुपासमिलै नितहोत मनैमन याहि बिचारा । आशकि पाश सुपास कहाँ यह सोचत मोचत दुःख अपारा ॥ भीतररी यहि लोकहिकि शिर शास्त्र औ वेद पुराण निहारा । बाम भये रघुनाथ सों साँच करै ललिते फिरि कौन उबारा १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दौं रिपुसूदन के लवणासुरै पराजय कीन ॥ मानों शत्रुन के जीतै को साँचो जन्म शत्रुहन लीन १ काटिकै मधुबन पुरी बसायो मथुरापुरी परा त्यहि नाम ॥ अश्वमेध में सब जग जीत्यो कीन्ह्यो शम्भु साथ संग्राम २ छोटे भाई लपणलाल के साँचे भये भरत के दास ॥ इन यश बरणा अश्वमेध में पूरण भई हमारी आश ३ मातु सुमित्रा के बालक ये जग में भये सुयश की राश ॥ जो कोउ सुमिरै रिपुसूदन का साँचो करै प्रेम बिश्वास ४ प्यारो होवै रघुनन्दन का साँचो स्वै रामको दास ॥ छूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब ऊदन ब्याह करौं परकाश ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उये दिवाकर जब पूरब में बालकरूप बिम्ब अतिलाल ॥

[Header] १६ आल्हखण्ड । २५४

बेटी फुलवा के महलन में जागा देशराजका लाल १ देवा बोला ह्याँ हिरियाते मालिनि मानो कही हमार ॥ देर लगावो अब घरमाँ ना लावो उदयसिंह सरदार २ लै कै पलकी मालिनि चलि भै फुलवा पास पहुँची जाय ॥ फुलवा बोली तब हिरियाते अब यहि जावो तुरत लिवाय ३ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे पहुँचे तुरत द्वार में आय ॥ बैठ पालकी में बघऊदन मनमें सुमिरि शारदांमाय ४ आयकै पहुँचे जब मालिनिघर देवा बोला वचन सुनाय ॥ साथ जनाना का करिबे नाँ जैबे जहाँ चँदेलाराय ५ बन्यो जनाना तुम नरवर में कैहौं हाल जाय दरबार ॥ बाना छोड़े रजपूती का ऊदन जीवैका धिक्कार ६ इतना सुनतै कायल व्हैगा नाहर उदयसिंह सरदार ॥ पेट मारने के कारण सों ऊदन लीन्ही हाथ कटार ७ हाथ पकरिकै देवाठाकुर बोला सुनो बनाफरराय ॥ चरचा करिबे ना मोहबेमाँ ऊदन साँच देवँ बतलाय ८ भई लालसा हमरे मनमाँ फुलवा देखनको अधिकाय ॥ करु अभिलाषा पूरण हमरी आल्हाकेर ल्हुरवा भाय ६ ऊदन बोले तब देवाने तुमको कैसे लवँ दिखाय ॥ जैसे बताओ देवा ठाकुर तैसे साँचो करैं उपाय १० इतना सुनिकै देवा बोले योगी बनो बनाफरराय ॥ अलख जगैवें पुर घर घर में याही सीधोसाद उपाय ११ गइ मनभाई बघऊदन के दूनों लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ काँधे माला औ मृगछाला आला योगिरूप बनाय १२ गुदड़ी लीन्ही दोऊ ठाकुर तामें छिपी ढाल तलवार ॥

उदयसिंहका बियाह। २५५ १७ डमरू लीन्ह्यो देवा ठाकुर बंशी उदयसिंह सरदार १३ धुरपद, सोरठ, जैजैवन्ती, गावैं पूरराग कल्यान ॥ टप्पा ठुमरी भजन रेखता तोरैं गजल पर्ज पर तान १४ को गति बरौ तिन योगिनकै एकते एक रूप गुणवान ॥ ड्योढ़ी दाबे दोउ नरपति कै योगी चले तुरत बलवान १५ देखि तमाशा तिन योगिनका मारग भीर भई अधिकाय ॥ ता ता थेई ता ता थेई थेई थेई दीन मचाय १६ बाजै डमरू भल देवा का ऊदन बंशी रहा बजाय ॥ मोर कि नाचन ऊदन नाचै मारग भूलि गये सबभाय १७ मोहीं तिरिया भल नरवर की चढ़िचढ़ि लखैं अटरिन आय ॥ एक एक सों बोलन लागीं जैसे नारिन केर स्वभाव १८ धन्य बखानों इन मातन को जिनकी कोखिलिन अवतार ॥ देखो आली इन योगिन को कैसो रूप दीन करतार १६ ये दोउ बालक क्यहू राजा के बारे लीन योग को धार ॥ सब गुण आगर दोउ नागर हैं योगी कामरूप अवतार २० क्यहू पियासे लरिका घर में भोजन करैं क्यहू भरतार ॥ पै ते भूलीं दोउ योगिन में तन मन केरो नहीं सँभार २१ गावत नाचत दोऊ योगी पहुँचे नरपति के दरबार ॥ बाजा डमरू तहँ देवा का नाचा बेंदुल का असवार २२ कमर झुकावै भाव बतावै गावै देशराज का लाल ॥ देखि तमाशा यहु योगिन का भा मनवड़ा खुशीनरपाल २३ नरपति बोला तब योगिन ने साँचे हाल देउ बतलाय ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ चाहौ काह लेनको भाय २४ हम तो आये बंगाले ते जावैं हिंगलाज महराज ५

१८ . आल्हखण्ड । २५६ द्रव्य न चाहैं कछु महराजा केवल उदरभरनसों काज २५ सुनिकै बातें ये देवा की बोला नरवरका सरदार ॥ धुरपद गावो यहि समया में भोजन अबै होय तय्यार २६ बातें सुनिकै महराजा की बोला देशराज का लाल ॥ ब्याही नारी के हाथे का भोजन करें नहीं नरपाल २७ इतना सुनिकै राजा बोले योगी मानो कही हमार ॥ है जो कन्या उपरोहित कै भोजन सोई करी तैयार २८ देवा बोला तब राजा ते यह नहिं ठीक भूमिभरतार ॥ जरिजा अँगुरी जो बाम्हनिकै हमरो योगहोय सब छार २६ शास्त्र पुराणन को जानैं हम मानैं लिखा ठीक महराज ॥ मारै शापै गारी देवै तबहूँ बिप्र पूजने काज ३० होय जो कन्या तुम्हरे घर की भोजन करै स्वई तैयार ॥ तौ तौ योगी भोजन करि हैं नाहीं मांगैं और दुवार ३१ इतना सुनिकै फिरि बोलत भा राजा नरवर का सरदार ॥ बेटी हमरी जो फुलवा है सोई भोजन करी तयार ३२ इतना सुनिकै योगी बोले यहही ठीक रहा महराज ॥ धर्म न जैहै कछु योगिन का रहि है दऊ दिशाकीलाज ३३ पुत्र आपने मकरन्दा को तबहीं बोलि लीन नरपाल ॥ फुलवा बहिनी जो तुम्हरी है तासों कहौजाय यह हाल ३४ इतना सुनिकै मकरँद चलिभा औ फुलवा ते कहा सुनाय ॥ बातें सुनि है मकरन्दा की माता पास पहुँची आय ३५ आयसु लैके महतारी की भोजन करन लागि तैयार ॥ नाचैं गावैं दोऊ योगी मोहित भयो राजदरबार ३६ भयो बुलावा फिरि महलन में योगी करें चलैं ज्यँउनार ॥

उदयसिंहका विवाह। २५७ १६ ˙ इतना सुनिकै योगी चलिभे पीढ़न बैठिगये सरदार ३७ भोजन परसन फुलवा लागी देवा चितय दीन कईबार ॥ बैठे पाटापर बघऊदन मनमाँलाग्यो करनविचार ३८ किह्यो रसोई कारी कन्या भोजन केर नहीं अधिकार ॥ बनि बौराहा जो हम जावैं तौ रहिजावै धर्म हमार ३६ देवा बोला फिरि ऊदन ते यहही फुलवा है सरदार ॥ इनही कारण नाक छिदायो धारयो बेष जनाना यार ४० किह्यो बहाना ह्याँ ऊदन ने औ गिरि गयो पछाराखाय ॥ रानी चंपा दौरति आई योगिन पास पहुँची आय ४१ कौर डारिकै देवा योगी तहँपर बार बार पछिताय ॥ देखिकै सूरति लघुयोगी कै चंपा बोली बचन सुनाय ४२ पाप आयगा यहिके मनमाँ तांते गिरा पछाराखाय ॥ योगी नाहीं यहु भोगी है यहिका डारों पेट फराय ४३ मकरँद लरिका का बुलवावों यहिका योग सिद्ध हैजाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोला रानी काह गई बौराय ४४ भूत चुरैलै यहि महलन में की क्यहु नजरि लगाई आय ॥ जो कछु होई यहिके जीका तौ फिरि योग देयँदिखराय ४५ ऐसे वैसे हम योगी ना ना हम माँगैं खेत खरिहान ॥ हमतो योगी संतोषी हैं जाने काह नारि बैलान ४६ सुनिकै बातें ये देवा की रानी गई सनाकाखाय ॥ जल के छीटा फुलवा मारे जागा तुरत बनाफरराय ४७ बड़ी खुशाली देवा कीन्ह्यो लीन्ह्यो तुरत ताहि लपटाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते तुमका साँचदेयँ बतलाय ४८ परिगै छाया क्यहु ब्याही कै ताते गई मूरछा आय ॥ १७

२० आल्हाखण्ड । २५८ फुलवा बोली तब माताते योगी साँच रहा बतलाय ४६ परिगै छाया जब बाँदी कै तबहीं गिरा मूरछाखाय ॥ ऊदन बोले तब रानी ते ह्याँते जान चहैं हम माय ५० इतना सुनिकै चम्पा बोली योगी मानो कही हमार ॥ भोजन दूसर हम परसावैं योगी जँयलेउ ज्यवनार ५१ देवा बोला तब रानी ते साँचे बचन करो परमान ॥ फिरिकै बैठें हम चौकाना पूरण नियम हमारो जान ५२ ऐसे योगी आगे हैं हैं भोगिहैं भोगस्वादवश आय ॥ तैसे योगी हम नाहीं हैं अपनो डारैं नियम नशाय ५३ योगी हैकै भोगी होवै शोचन योग सोय अधिकाय ॥ इतना कहिकै दोऊ योगी माँगिकै बिदा चले हर्षाय ५४ आयकै पहुँचे मालिनि घरमाँ योगिनबाना धरे उतार ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधी नाहर उदयसिंह सरदार ५५ ऊदन बोले फिरि देवा ते ठाकुर मैनपुरी चौहान ॥ कई महीना ह्याँपर गुजरे ना अब रहिगा द्रव्यठिकान ५६ घोड़ खरीदन कासों जावैं यहही शोच होय अधिकाय ॥ पै कछु औषधि ह्याँ सूझैना कैसी करी यहांपर भाय ५७ का लै जावैं अब मोहबे को काबुल काह खरीदैं जाय ॥ इतना सुनिकै देवा बोले धीरज धरो लहुरवाभाय ५८ गत नहिंशोधैं कहुँ पण्डितजन मत यह ठीक हृदय ठहराय ॥ कूच करावो अब नरवरते चलिये नगरमोहोबे भाय ५६ यह हम कहिबे परिमालिकते नरवर टिक्यन चँदेलेराय ॥ भूज तुरैलै इनके लागीं ऊदन तहां गये बौराय ६० कछु नहिं आशा तहँ बचनेकी निश्चय गई प्राणपै आय ॥

उदयसिंहका विवाह । २५६ २१ कीन दवाई हम ऊदन की सब धन आये तहाँ गँवाय ६१ यह मन भाई उदयसिंह के तुरतै कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर के डाँड़े पर पहुंचे फेरि बनाफर आय ६२ उतरि बेंदुला ते भुइँ आये तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ परिगा पलँगा तहँ ऊदन का लेटे तहाँ बनाफरराय ६३ उबटन लाग्यो भल हल्दी का पीली देह परै दिखराय ॥ भोजन कमती कैदिन खायो तासोंबदनगयो कुम्हिलाय ६४ करिकै सूरति बीमरिहा कै बोला उदयसिंह सरदार ॥ बात बनावो परिमालिक ते तौ रहिजावै धर्म हमार ६५ गंगा कीन्ही हम फुलवा सँग तुम्हरो ब्याह करब ह्याँ आय ॥ टरै प्रतिज्ञा जो क्षत्री कै तौफिरि जहरखाय मरि जाय ६६ मित्र साँकरो फिरि ऐसो अब परिहै बार बार नहिं आय ॥ इतना सुनिकै देवा चलिभा पहुंचा जहाँ चँदेलोराय ६७ सूरति दीख्यो जब देवा की भा मन खुशी रजापरिमाल ॥ हाथ जोरिकै देवा बोल्यो औ ऊदनके कह्यो हवाल ६८ लगीं चुरैलैं नरवरगढ़ में ऊदन हैगे हाल बिहाल ॥ रूपिया पैसा सब खर्चा भे रहिगा कछू नहीं नरपाल ६६ कीरतिसागर तम्बू भीतर ब्याकुल परा लहुरवाभाय ॥ इतना सुनिकै परिमालिक जी तुरतै गये सनाकाखाय ७० लिखिकै पाती आल्हाजी को तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ दैके पाती फिरि धावन को बाकी हाल कह्यो समुझाय ७१ लैंकै पाती धावन चलिभा दशहरिपुरै पहूँचा जाय ॥ दीन्ह्यो पाती जब आल्हा को बाँचा आंकु आंकु निरताय ७२ पढ़िकै पाती आल्हा ठाकुर तुरतै हाथी लीन मँगाय ॥

२२ आल्हखण्ड । २६० चढ़िकै हाथी आल्हा चलिभे मनमाँ सुमिरि शारदामाय ७३ कीरतिसागरपर पहुंचत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ चढ़े पालकी परिमालिकजी सोऊ अटे वहाँपर जाय ७४ पौढ़ा पलँगापर बघऊदन पागल बना बनाफरराय ॥ देखि सनाका परिमालिक भे मनमाँ बार बार पछिताय ७५ ऊदन ऊदनकै गोहरायो आल्हा बैठि पलँगपर जाय ॥ जब नहिं बोले बघऊदन हैं आल्हा बोले बचन रिसाय ७६ तुम्हीं पठायो है ऊदन को साँची सुनो चँदेलेराय ॥ जो कछु जीका यहिके होईहै मोहवा तुरत द्याव फूँकवाय ७७ बोलि न आवा परिमालिक ते हाँ अरु हूँव बन्दभा भाय ॥ ऊदन ऊदन कै गोहरायो बारम्बार चँदेलेराय ७८ तबहूं ऊदन कछु बोले ना आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥ उठिकै चुप्पे चढ़ि हाथीमाँ दशहरिपुरै पहुंचे आय ७६ हाल बतायो सब सुनवाँ को सुनतै गई सनाकाखाय ॥ सोचन लागी अपने मनमाँ साँची बात गई जिय आय ८० आँखि लागिगै तहँ फुत्तवाकै ब्याकुल भये लघुरवामाय ॥ पूरी गवाही मन यह दीन्ह्यो साँची ठीक लीन ठहराय ८१ यहै सोचिकै सुनवाँ बोली लीजै ऊदन यहाँ बुलाय ॥ करब दवाई हम ऊदन कै नीको होय बनाफरराय ८२ यह मन भायगई आल्हा के तुरतै पलकी दीन पठाय ॥ सौंपिकै देवा को ऊदन का औ चलिभयो चँदेलेराय ८३ खबरि फैलिगै यह मोहवेमाँ ब्याकुल उदयसिंह सरदार ॥ जितनी रानी परिमालिक की रोईं छाँड़ि सबै डिंडकार ८४ जितनी रय्यत रह मोहवे की कीरतिसागर चली बिहाल ॥

उदयसिंहका विवाह । २६१ २३ जायके देखें जब ऊदन को रोवैं तहाँ बृद्ध औ बाल ८५ गई पालकी जब आल्हा की चकरन जाय कहा सब हाल ॥ सुनवाँ भौजीने बुलवायो चलिये देशराज के लाल ८६ हमसोंफिरिफिरि यह समुझायो आवैं यहाँ लहुरवाभाय ॥ करब दवाई हम नीकी बिधि चंगे होयँ बनाफरराय ८७ सुनिकै बातें ये चकरन की ऊदन ठीक लीन ठहराय ॥ हाल बतावब जो भौजीते हैहैं काम सिद्धि तहँ जाय ८८ यहै सोचिकै मन अपने माँ पलकी चढ़ा लहुरवाभाय ॥ चारि कहरवा हुँकरत चलिगे दशहरिपुरै पहुंचे आय ८६ उतरि पालकी ते भुइँ आवा द्यावलि देखिगई घबड़ाय ॥ रानी सुनवाँ तहँ चलिआई औ करगहिकै गईलिवाय ६० जायकै पहुंची निजमहलन में पलँगा उपर दीन बैठाय ॥ पूँछन लागी बघऊदन ते साँचे हालदेउ बतलाय ६१ आँखि लागिगै का फुलवा कै द्यावर विकलभयो अधिकाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बोला तुरत बनाफरराय ६२ जैसे साँची तुम पुछती हौ तैसे साँच देयँ बतलाय ॥ किरिया कीन्ही हम फुलवा तै भौरी करब तुम्हारी आय ६३ काह बतावैं हम भौजी ते नाकछु सूझा और उपाय ॥ तब बौराहा बैनिकै आयन तुमते साँचदीन बतलाय ६४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ काठक घोड़ा बाण अजीता उनघर सेल शनीचर आय ६५ कैसे किरिया तुम कै लीन्ही देवर भूल भई अधिकाय ॥ तेहिते चुप्पे घरमाँ बैठो मानो कही बनाफरराय ६६ वैसी फुलवा लाखन मिलि हैं आपन साँच लहुरवा भाय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६२ यह नहिं भाई मन ऊदन के सुनतै वदन गयो कुम्हिलाय ६७ जब रुख दीख्यो यह ऊदन का सुनवाँ चली महलते धाय ॥ जायकै पहुँची आल्हा ढिगमाँ औ सब हाल कहा समुझाय ६८ सुनिकै बोले आल्हा ठाकुर तिरिया काह गई बौराय ॥ बेढब राजा है नरवर का तहँ शिर कौन कटावै जाय ६६ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली क्षत्री पूत बनाफरराय ॥ तुमका बातें ये छाजैं ना कन्ता वार वार बलिजायँ १०० इतना सुनिकै आल्हा बोले तिरिया बिना बुद्धिकी आय ॥ नाहक हिंसा हम करिहैं ना मरिहैं जीवजन्तु अधिकाय १०१ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली दोऊ हाथ जोरि शिर नाय ॥ यह नहिं हिंसा है क्षत्री कै कीन्हेनि युद्ध कृष्ण यदुराय १०२ सोलह सहस आठ कन्यन को लड़िकै लीन कृष्ण महराज ॥ तिनकी बहिनी के पति अर्जुन कीन्हेनि युद्ध द्रौपदी काज १०३ धर्म धुरंधर भीषम हैगे लड़िगे काशिराज घर जाय ॥ अम्बा अम्बे अम्बालिका को लाये जीति नृपन समुदाय १०४ पै कछु हिंसा तिन मानी ना जानैं धर्म कर्म अधिकाय ॥ पढ़िकै भूल्यो तुम महराजा की यहि अवसर गयो डेराय १०५ लड़नो मरनो समरभूमि में यहही क्षत्री को बयपार ॥ लहँगा लुगरा हमरो पहिरो अपनी देउ ढाल तलवार १०६ मैं चढ़िजाऊँ नरवरगढ़ को व्याहूं जाय लहुरुवा भाय ॥ किरिया कीन्ही बघऊदन ने भौंरी करब यहाँ पर आय १०७ झूठी किरिया जो ह्वैजैहै तौ मरि जाय जहर को खाय ॥ ऐसो वैसो बघऊदन ना गंगा झूठ उलीचै जाय १०८ उदय दिवाकर हों पश्चिम में चन्दा चहौ रसातल जाय ॥

उदयसिंहका विवाह । २६३ २५ सोंकि समुन्दर चहु महि लेवै बिल्ली लड़ै सिंहसों आय १०६ ये अनहोनी चहु हैव जावै झूठ न कहै लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले अब तू चुपसाधिरहिजाय ११० टरिजा टरिजा री सम्मुख ते काहे बार बार बकाय । ब्याहन जैबे हम नरवर में तहदिल होयँ बनाफरराय १११ इतना सुनिकै सुनवाँ चलि भै आल्हा रूपना लीन बुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी मलखानेको सिरसा तुरतदीन पठवाय ११२ खबरि पायकै मलखे ठाकुर दशहरिपुरै पहुँचे आय । हाथ जोरिकै द्वउ आल्हा के बोले चरण शीश नवाय ११३ काह आज्ञा है दादा कै जो सेवक का लीन बुलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की आल्हाहाल कहासमुझाय ११४ घोड़ खरीदन गे काबुल को नरवर नैन खरीदनि जाय ॥ बनि बौगहा ऊदन बैठे चलिये ब्याहकरन अबभाय ११५ बड़ी खुशहाली भै मलखे के बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ न्यवत पठावो सब राजन को दादा भली बनी यह आय ११६ इतना सुनिकै आल्ही ठाकुर तुरतै धावन लीन बुलाय ॥ पाती लिखिकै सबराजन को तुरतै न्यवतं दीनपठवाय ११७ यक हरिकारा गा भुन्नागढ़ यक नैनागढ़ दीन पठाय ॥ यक हरिकारा गा बौरीगढ़ दिल्ली एक पहुँचा जाय ११८ उरई कनौउज सिरसा मोहबे सबने न्यवत दीन पठवाय ॥ खबरि पायकै सब राजागण दशहरिपुरै पहूंचे आय ११९ कीनि खातिरी सबके आल्हा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय १२० ब्यावलिबोली फिरि आल्हा ते मानो कही बनाफरराय ॥

२४ आल्हखण्ड । २६४ रीती भाँती मल्हना करि हैं पाल्यो बारे दूध पिलाय १२१ कौन हितैषी है मल्हना सम ह्याँते कूच देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें ये माता की आल्हा कूचदीन करवाय १२२ कीरतिसागर मदनताल पर डेरा गड़े नृपन के आय ॥ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे मल्हना महल पहुँचेजाय १२३ द्यावलि बिरमा सुनवाँ आदिक येऊ गईं तहाँ पर आय ॥ बड़ी खुशहाली भै मल्हना के हमरे बूत कही ना जाय १२४ चूड़ामणि पण्डित को तुरतै आल्हा लीन तहां बुलवाय ॥ तेल कि साइति सो बतलायो सुवरणकलशलीनमँगाय १२५ घृतको दीपक धरि कलशापर चौकी तहाँ दीन डरवाय ॥ ऊदन बैठे फिरि चौकी पर मनमें सुमिरि शारदामाय १२६ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावन लगीं तहाँ सब गीत ॥ आई विरिया फिरि नहखुर की पगियाधरी शीशपरपीत १२७ कङ्कण बांधा गा हाथेमाँ शिरपर मौरदीन धरवाय ॥ ब्याहके कपड़ा फिरि पहिरायो पलकीतुरतलीनमँगाय १२८ सुमिरि भवानी महिरवाली पलकी बैठ बनाफरराय ॥ बेटी बैठी चन्द्रावलि तहँ राईलोन उतारति जाय १२९ चली पालकी बघऊदन की कुँवना पास पहुँची आय ॥ इन्द्रसेन चन्द्रावलि दुलहा सोकुँवनापरगयोलिवाय १३० रानी मल्हना त्यहि समयामें दीन्ह्यो कुँवाँ पैर लटकाय ॥ पहिली भाँवरिके घूमत खन ऊदन लीन्ह्यो पैर उठाय १३१ प्राणनेग मैं तुमको दीन्हे माता कादु पैर डरपाय ॥ याविधि कहिकै सातों भाँवरि घूमे तहां बनाफरराय १३२ बैठे पलकी फिरि बघऊदन आल्हा नेगदीन चुकवाय ॥

[Header] उदयसिंहका विवाह । २६५ २७ [Body] भये अयाचक सब याचकगण जयजयकार रहे तहँगाय १३३ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ बैठे हाथी आल्हा ठाकुर करिकै रामचन्द्रको ध्यान १३४ मलखे सुलखे देवा ब्रह्मा मन्नागूजर भयो तयार ॥ औरो राजा न्योते आये तिनहुन बाँधिलीन हथियार १३५ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िंगे बाँके घोड़न भे असवार ॥ कूच कराय दयो मोहबेते चलिभे सबै शूर सरदार १३६ खर खर खर खर कै रथ दौरे चह चह धुरी रहीं चिल्लाय ॥ चलिभैं फौज दल बादल सों शोभाकही बूत ना जाय १३७ झम्झम्झम्झम् झीलमबोलैं मर्मर होयँ गैंड़की ढाल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल १३८ छाय अँधेरिया गै मारग में छिपिगे अन्धकार सों भान ॥ को गति बरौ शहजाद्यन कै एकते एक रूप गुणखान १३६ तेगा लीन्हे बर्दवान के कोता खानी लिहे कटार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एक तलवार १४० आठरोज का धावा करिकै नरवर पास गये नगच्याय ॥ पांचकोस जब नरवर रहिगा मलखे डेरा दीन डराय १४१ ऊंची टिकुरिन तम्बू गड़िगे नीचे लागीं खूब बजार ॥ हौदा उतरे तहँ हाथिन के क्षत्रिन छोरिधरा हथियार १४२ जहँना तम्बूहै आल्हा का तहँना लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ बैठे साइतिलागे करनविचार १४३ ऐपनवारी की साइति है पण्डित कहा सुनो मलखान ॥ मलखे बोले तब रुपना ते हमरे करो बचन परमान १४४ ऐपनवारी बारी लैके नरपति द्वार देउ पहुँचाय ॥

२८ आल्हखण्ड । २६६ इतना सुनिकै रूपन बोले दोऊहाथजोरिशिरनाय १४५ ऐपनवारी बारी लै कै दूसर जाय आज महराज ॥ नैना भुन्ना औ दिल्ली में कीन्हे हमीं अकेले काज १४६ मूड़ कटावन हम जैबे ना मानो कही वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै मलखे बोले ⁃हारीबात कहौ तुम ज्वान १४७ गदका बाना पटा बनेठी अइहैं कौन दिवस ये काज ॥ पहिले मुर्चा तुम्हीं कैकै राख्यो देशदेशमें लाज १४८ उदन वियाहे का रहिहैं ना बतियाँ कहिबे का रहिजायँ ॥ यहु दिनमिलिहैं फिरिकबहूंना तातेसोचिसमझिवतलाय १४६ इतना सुनिकै रूपन बोला ठाकुर सिरसा के सरदार ॥ घोड़ बेंडुला हमको देवो ऊदन केरि देउ तलवार १५० घोड़ बेंडुला को मँगवायो औ दैदीन ढाल तलवार ॥ ऐपनवारी बारी लै कै , बेंडुल ऊपर भयो असवार १५१ ऐंड़ा मसक्यो जब बेंडुलके तुरतै चला हवाकी चाल ॥ राजा नरपति के द्वारेपर रूपनपहुँचिगयोततकाल १५२ द्वारपालने तब ललकार्यो नाहर घोड़े के असवार ॥ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १५३ इतना सुनिकै रूपन बोले तुम सुनि लेउ हमारो हाल ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहँपर बसैं रजा परिमाल १५४ छोटो भय्या जो आल्हा को बेटा देशराज को लाल ॥ कारी कन्या जो नरपति कै ब्याहनअयेरजापरिमाल १५५ ऐपनवारी हम लै आये रूपन बारी नाम हमार ॥ खबरि जनावो तुम राजा को बारी खड़ा तुम्हारे द्वार १५६ नेग आपने को झगरत है सो अब पड़े देयँ सरदार ॥

उदयसिंहका विवाह । २६७ २६ इतना सुनिकै द्वारपाल कह बारी घोड़े के असवार १५७ नेग बतावो तुम द्वारे का राजै सबऊ सुनावैं जाय ॥ इतना सुनिकै रूपन बोला तुमसों साँचदेयँ बतलाय १५८ चार घरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग - हमारो यह साँचा है याँच आय तुम्हारे द्वार १५६ सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल ततकाल ॥ पीकै दारू द्वारे आये टेढ़ी बात कहै मतवाल १६० टरिजा टरिजा अब द्वारे ते ओ मतवाले जाति गँवार ॥ असगति नाहीं क्यहुराजा की द्वारे करै आय तलवार १६१ काल गाल माँ तू बैठा है मानै साँच बात यहिवार ॥ हवा खायकै ठंढे ह्वैकै बोलै घोड़े के असवार १६२ इतना सुनिकै रूपन बोला गरुई हाँक दीन ललकार ॥ हाथ सिपाही पर डारै ना जबलग मिलै ढूँढ़िसरदार १६३ हमका जानैं दिल्ली वाले जिनके द्वारकीन तलवार ॥ भुन्नागढ़ औ नैनागढ़ में द्वारे बही रक्तकी धार १६४ चारि रुपल्ली का नौकर तू टिलटिलटिलटिल रहा मचाय ॥ इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि सुनाई जाय १६५ जितनी गाथा रूपन बोले गासो यथातथ्य सब गाय ॥ सुनिकै बातें द्वारपाल की नरपति तुरतै उठा रिसाय १६६ हुकुम लगायो मकरन्दा ते बारी पकरि दिखावै आय ॥ विजयसिंह विजहट को राजा मकरँदसाथचला रिसियाय१६७ द्वारे दीख्यो जब रूपन को गरुई हाँक दीन ललकार ॥ खबरदार हो खबरदार हो बारी घोड़े के असवार १६८ काल गाल माँ तू बैठा है अबहीं जान चहत यमद्वार ॥

३० आल्हखण्ड । २६८ इतना सुनिकै विजयसिंहने अपनी खैंचिलई तलवार १६६ खैंचि सिरोही रूपन लीन्ह्यो द्वारे होन लगी तब मार ॥ अगल बगल में बेंदुल मारै रूपन खूब कीन तलवार १७० घायल ह्वैगे विजयसिंह जब तब सब बढ़े लड़ैया ज्वान ॥ दांतन काटै टापन मारै बेंदुल खूब कीन मैदान १७१ कोगति वरनै तहँाँ त्येनकै दोऊ हाथ करै तलवार ॥ रंग बिरंगे क्षत्री ह्वैगे मानो होली खेलैं गँवार १७२ कितन्यों क्षत्री घायल ह्वैगे कितन्यों गिरिगे खाय पछार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७३ बड़ी लड़ाई भै रूपन ते द्वारे बही रक्तकी धार ॥ देखि तमाशा त्यहि बारीका क्षत्री गये मनैमन हार १७४ ऐंड़ा मसक्यो फिरि बेंदुल कें फाटक पार पहुँचा जाय ॥ मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री चले पछारी धाय १७५ रूपन पहुँचा त्यहि तम्बू में जहँपर बैठि बनाफरराय ॥ जितने क्षत्री नरवरगढ़के आये लौटि सबैकिसियाय १७६ जितनी गाथा रह द्वारे की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ रूपन बारी की बातें सुनि भे मन खुशी बनाफररांय १७७ खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७८ माथ नवायौं पितु अपने को ह्यँाँ ते करों तरँगको अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं माँगों यही भवानीकन्त १७६ इतिश्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भववुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतरूपनबिजम वर्णनौनामद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥