आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
३६ आल्हाखण्ड । ४६० ह्वाँ सुधिपाई परिमालिक ने आये देशराज के लाल ॥ वन्दन कैकै यदुनन्दन को पलकी चढ़े रजापरिमाल १६४ कीरतिसागर मदनतालपर आये तुरत चँदेलेराय ॥ हाथ पकरिकै तहँ ऊदन का औछातीमा लीनलगाय १६५ पगिया धरदइ फिरि पैरन मा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंह तहँ आपनिकथा गयेसबगाय १६६ सुनिकै बातें उदयसिंह की बोले फेरि चँदेलेराय ॥ पारस पत्थर तुम लैलेवो भोगो राज्य बनाफरराय १६७ तुमका सौंपत हम ब्रह्माका ऊदन मानो कही हमार ॥ तुम जो जैहौ अब कनउज को तौ को धर्म निवाहन हार १६८ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची सुनो रजापरिमाल ॥ तीन तलाकें हमका दीन्ही सो अब रहीं करेजेशाख १६६ कहा मानिकै तुम माहिल का नाकछुकीन्ह्यो तनक विचार ॥ मोहिं निकारयो तुम भादों मा राजा मोहबे के सरदार २०० इतना सुनिकै मल्हना बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ जो तुम जैहौ अब कनउज का पिरथी मोहबालेय लुटाय २०१ दूध आपनो हम प्यावा है स्यावा तुम्हें बनाफरराय ॥ बैस बुढ़ापा मा दुखपावा रंजित मरे समरमा आय २०२ अबनहिं जावो तुम कनउजको मानों कही लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिर नाय २०३ एक महीना दिन बारा भे कनउज तजे मोहिं अब माय ॥ जो नहिं जावैं अब कनउजका भाई आल्हा उठै रिसाय २०४ कीन बहाना हम गाँजर का आयन नगर मोहोबा धाय ॥ देश निकासी हमरी द्वैहै जो कहूँ सुनी बनाफरराय २०५
कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७ भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥ दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६ चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥ यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७ इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥ धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८ बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥ मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६ सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥ पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१० सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११ मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥ छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२ पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥ सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३ मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥ गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥ देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७
३८ आल्हखण्ड । ४६२
रहै समुन्दर में जौलों जल जौलों रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तौलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २१८ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकान्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २१६ पुत्र हमारे जो चारो हैं तिनपर कृपाकरो रघुराज ॥ रामदत्त(१)औकृष्णदत्त(२)औशम्भू(३)ब्रह्मदत्त(४)महराज २२० नन्दै चन्दे औ नन्दै वाणैंमें माधव मास विपति को काल ॥ ब्रह्मदत्त गे ब्रह्मलोक को भे अब इन्द्रदत्त युग साल २२१ सवैया ॥ संवत वनइस उनसठ आदि में माधव मास महादुखदाई । आय गयो विस्फोटक रोग अब शान्त भयो बहु देव मनाई ॥ फेरि अचानक भइ यह बात कि गर्दन फाटिगै फूट कि नाई । ब्रह्मदत्त विरंचीलोक बसे ललिते यहदुःख कहैं निज गाई २२२ भक्त तुम्हारे चारो होवैं यह बर मिलै मोहिं भगवान ॥ कीरतिसागर मदनताल का पूराचरितकीन हमगान २२३ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत कीरतिसागर कीर्त्तिवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ कीरतिसागरका मैदान सम्पूर्ण ॥ इति ॥
अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुर आल्हसिंहजी कामनावनवर्णन ॥ सवैया ॥ जौन चहै ललिते सुख सम्पति तौन भजैं नित शम्भुभवानी । अक्षत चन्दन पुष्पन बिल्व सों पूजतहैं जे महा कउ ज्ञानी ॥ नाति औ पूत परोसिन ज्ञातिन भांतिन भांति लहैं सुखखानी । बाराणसी रजधानी बिराजत छाजत शम्भु तहाँ सुखदानी १ सुमिरन ॥ ज्ञानी ध्यानी सब जानत हैं जगको शम्भु करैं उपकार ॥ विकट निशानी कलि पापनकी यामें गये सबै मन हार १ योग यज्ञकै चर्चा उठिगै अर्चा होय न एकोबार ॥ विषय कमाई घर घर होवै दर दर उलटिगये व्यवहार २ सन्ध्या तर्पण की चर्चा ना पर्चा ठुमरिन के अधिकार ॥ खर्चा होवै सँग वेश्यन के नारी पती देयँ धिक्कार ३ ऐसे पापी यहिकलियुग मा स्वामी शम्भु करैं उपकार ॥
२ आल्हखण्ड । ४६४ जो तन त्यागै श्री काशी मा सो नर चला जाय भवपार ४ है रजधानी गिरिजापति कै जाहिर तीनि लोक यहिवार ॥ अल्हा मनावन को अबजाई मैने जौनु चँदेले क्यार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया माहिल उरई का परिहार ॥ काम औ धंधा कछु ज्यहिके ना केवल चुगुलिन का बयपार १ सोयकै जागा सो उरई मा घोड़ी तुरत लीन कसवाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिलठाकुर दिल्ली शहर पहुँचा जाय २ बड़ी खातिरी पिरथी कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ समय पायकै माहिल बोले मानो कही पिथौराराय ३ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा मोहबा आपु लेउ लुटवाय ॥ ऐसो अवसर फिरि मिलिहै ना मानो कही पिथौराराय ४ इतना सुनिकै पृथीराज ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥ चन्दन गोपी ताहर सजिगे मनमा श्रीगणेश पद ध्याय ५ लैके फौजै सातलाखलों पिरथी कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर मदनतालपर पहुँचा फेरि पिथौरा आय ६ तम्बू गड़िगे चौगिर्दा सों सब रँग ध्वजारहे फहराय ॥ पिरथी बोले फिरि माहिलते राजै खबरि सुनाबो जाय ७ हाल हमारो सब जानत हौ तुमते कहौं काह समुझाय ॥ इतनासुनिकै माहिल चलिभे पहुँचे जहाँ अँदेलेराय ८ हाल बनायो परिमालिक ते माहिल झूठ साँच समुझाय ॥ सुनिकै बातें माहिल मुखते राजा गये सनाकाखाय ९ अवापसीना परिमालिक के शिर सों छत्र गिरामहराय ॥ खबरि पायकै मल्हना रानी माहिलमहल लीनबुलवाय १०
आल्हाकामनावन । ४६५ ३ मल्हनावोली फिरिमाहिल ते काहे चढ़े पिथौराराय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ११ उड़न बछेड़ा पाँचो चाहें पारस चहैं पिथौराराय ॥ डोला चाहें चन्द्रावलि का ताहर साथ बियाही जाय १२ बैठक चाहें खजुहागढ़ की चाहें राज ग्वालियर क्यार ॥ इतना लीन्हे बिन जैहैं ना राजा दिल्ली के सरदार १३ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना गई सनाकाखाय ॥ धीरज धरिकै फिरि बोलति भै पिरथी देउ जाय समुझाय १४ बारह दिनकी मुहलति देवैं त्यरहें डाँड़ लेयँ भरवाय ॥ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं अये पिथौराराय १५ देखि अनाथन ह्याँ तिरियनको लूटन अये अधर्मीराय ॥ धर्मी होवैं तो मोहलति अब बारह दिन की देयँ कराय १६ त्यरहें पावैं जो पिरथी ना मुहबा शहर लेयँ लुटवाय ॥ हथी पछारा था द्वारे पर जायकै जबै लहुरखाभाय १७ मलखे ठाकुर जब सिरसा थे तब नहिं अये पिथौराराय ॥ इतना कहिकै मल्हना रानी नीचे बैठी शीश झुकाय १८ बोलि न आवा जब मल्हनाते माहिल बोले बचन बनाय ॥ बारह दिन लौं बुलै पिथौरा पहिले मूड़ देउँ कटवाय १६ त्यरहें दिन जो लुटै पिथौरा तौ माहिल कै जनै बलाय ॥ बैर बिसाहा मलखे ऊदन ताते चढ़े पिथौरा धाय २० इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ जो कछु भाषा मल्हनारानी माहिल यथातथ्य गा गाय २१ कछु नहिं ब्वाला दिल्लीवाला मल्हना गाथ सुनो यहि बार ॥ मल्हना सोचै मन अन्तर मा अबधौं कवन बचावनहार २२
४ आल्हखण्ड । ४६६ बिना बँडुला के चढ़वैया नैया कौन लगेहै पार ॥ दैया मैया सुखदैया जग मैया शारद चरण तुम्हार २३ यहै बिचारत मल्हना रानी तुरतै बोलि लीन प्रतिहार ॥ तुरत बुलावा जगनायक का मैंने जौनु चँदेले क्यार २४ खबरि पायकै जगनाय्कजी तुरतै गये तड़ाका आय ॥ आवत दीख्यो जगनायक को मल्हना उठी तड़ाकाधाय २५ पकरि कै बाहू जगनायक की अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले महरानी ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय २६ कौन साँकरा है माई पर हमते हाल देउ बतलाय ॥ तुरतै करिकै त्यहि कारज को पाछे शीश नवावों आय २७ इतना सुनिकै मल्हना बोली ईजति राखि लेउ यहिवार ॥ जल्दी जावो तुम कनउजको लावो उदयसिंह सरदार २८ सात लाखलों फौजैं लै कै सागर परा आय चौहान ॥ बारह दिनकी मुहलति दीन्ही त्यरहें लूटी नगर निदान २६ कहि समुझायो तुम आल्हाते की विपदामा होउ सहाय ॥ घाटि न समझा हम ब्रह्मा ते संकट परा आज दिनआय ३० इतना कहिकै रानी मल्हना कागज़ कलम दवाइतिलीन ॥ शिरी सर्बऊ ते भूषित करि पूरण पत्र समापतकीन ३१ सो दै दीन्ह्यो जगनायक को औरो कह्यो बहुत समुझाय ॥ जगनिक बोले तब मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ कैसे जावैं हम कनउज को औ मुह कौन दिखावैं माय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ३३ तवै निकरिगे आल्हा ठाकुर तिनते बात न पूछा कोय ॥ विपति विदारण जगतारणकी मर्जी यही आज दिन होय ३४
आल्हाकामनावन । १६७ ५ नहीं तो होते मलखे ठाकुर कैसे चढ़त पिथौरा आय ॥ जियत न जैबे हम कनउजको कौवा मरे हाड़ लै जाय ३५ इतना सुनिकै मल्हना बोली दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ राखो ईजति यहि समया मा जल्दी जाउ कनौजै धाय ३६ शोच बिचारन की विरिया ना मैंने बारबार बलिजायँ ॥ इतना सुनिकै जगनिक बोले माई साँच देयँ बतलाय ३७ घोड़ा मँगावो हरनागर को अबहीं जाउँ तड़ाकाधाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना ब्रह्मै खबरि दीन पठवाय ३८ माहिल ब्रह्मा जहँ बैठे थे चेरी तहाँ पहुँची जाय ॥ कह्यो सँदेशा सो मल्हना को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३६ सुनि संदेशा रनि मल्हनाका बोला उरई का सरदार ॥ घोड़ न देवो जगनायक कों ब्रह्मा मानु कही यहिबार ४० आल्हा रूठे हैं मोहवे ते कनउज बसे बनाफरराय ॥ घोड़ तुम्हारो फिरि देहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४१ कहा न माना कछु माहिलका ब्रह्मा घोड़ दीन कसवाय ॥ बड़ी खुशहाली सों जगनायक सबको यथा योग शिरनाय ४२ मनियादेवनको सुमिरन करि घोड़ा उपर भयो असवार ॥ जहाँ पिथौरा दिल्ही वाला पहुँचा उरई का सरदार ४३ खबरि सुनाई जगनायक की माहिल बारबार समुझाय ॥ लेउ बछेड़ा अब हरनागर मानो कही पिथौराराय ४४ इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा बकशी लीन बुलाय ॥ कहि समुझावा सब चौंड़ा ते यहु महराज पिथौराराय ४५ हुकुम पायकै महाराजा को चौंड़ा कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपरमा जगनिक गयो तड़ाका ध्याय ४६
६ आल्हखण्ड । ४६८ दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥ देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७ इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥ लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८ ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६ ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५० लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥ चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१ तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥ कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२ इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥ कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३ इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४ जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥ बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५ तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥ दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥ करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७ करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥ बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८
आल्हाकामनावन । ४६६ ७. उठा तड़ाका सो महलनते बरगद तरे पहुँचा आय ॥ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा कोड़ा लीन चुराय ५६ घोड़ बँधायो निज महलन मा औ यह हुकुमदीन फरमाय ॥ चर्चा करि है जो घोड़ा की ताको मूड़ देउँ गिरवाय ६० इतना कहिकै गंगा ठाकुर महलन करन लाग बिश्राम ॥ सोयकै जागे जब जगनायक लागे लेन रामको नाम ६१ घोड़ न दीख्यो हरनागर को तब देहीं ते गयो परान ॥ देखन लाग्यो चौगिर्दा ते औ मनकरनलाग अनुमान ६२ चौड़ा आयो का पाछे ते हमरो घोड़ चुरायो आय ॥ घोड़ा कोड़ा कछु देखे ना मनमा गयो सनाकाखाय ६३ चिह्न देखिकै तहँ टापन के कुड़हरि शहर पहुँचा आय ॥ जहाँ अथाई पनिहारिन की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६४ करें बतकही ते आपस मा घोड़ा दीख नहीं असमाय ॥ जैसो लायो नरनायक है मानो उड़न बछेड़ा आय ६५ सुनिकै चर्चा तहँ घोड़ा की जगनिकखुशीभयोअधिकाय ॥ जहाँ कचहरी गंगाधर की जगनिक तहाँ पहुँचाजाय ६६ बड़ी खातिरी करि गंगाधर अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले गंगाधर ते घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६७ चढ़ा पिथौरा है मोहवापर लीन्हे सात लाख चौहान ॥ जायें मनावन हम आल्हाको हमरे बचन करो परमान ६८ जो सुनि पैहैं आल्हा ऊदन तुम्हरो नगरलेयें लुटवाय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत हैं घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ६६ तब महराजा कुड़हरिवाला बोला काहगयो बौराय ॥ चोर न ठाकुर कउ कुइहरि मा घोड़ा कोड़ा लेय चुराय ७०
हमरे घोड़न की कमतीना चाहौ जौनलेउ कसवाय ॥ तुम्हरो घोड़ा हम जानैं ना ओ जगनायक बात बनाय ७१ सुनिकै बातैं गंगाधर की मैंने ब्वला चँदेलेक्यार ॥ घोड़ा कोड़ा जो पैहैं ना तौ मरिजाएँ पेटको मार ७२ ईजति रहै ना मोहवे की तुमते साँच दीन बतलाय ॥ [L6: होउ हितैषी परिमालिक के घोड़ा कोड़ा देउ मँगाय ७३ सुनिकै बातैं जगनायक की धीरज बहुत दीनसमुझाय ॥ खबरि पायके महरानी ने राजै पास लीन बुलवाय ७४ कहि समुझावा महराजा ते बिपदा परी मोहोवे आय ॥ तुम्है मुनासिब यह नाहीं है घोड़ा कोड़ा लेउ चुराय ७५ देउ तड़ाका घोड़ा कोड़ा राजन यहै बड़ाई आय ॥ सुनिकै बातैं महरानी की तुरतै गयो सथान धाय ७६ डाटन लाग्यो तहँ चकरन को घोड़ा पता लगाओ जाय ॥ पाय इशारा महराजा का चाकर उठे सबे चहुँ धाय ॥ लै कै घोड़ा हरनागर को राजा पास पहुँचैं आय ॥ दीख्यो सूरति हरनागर कै जगना चढ़ा तड़ाकाधाय ७८ जैसे हमका घोड़ा दीन्ह्यो तैसे कोड़ा देउ मँगाय ॥ सवालाख को ओ कोड़ा है जो बनववा चँदेलाराय ७६ लोभ न लावो मन अपने मा कोड़ा तुरत देउ मँगवाय ॥ नहीं तो लौटों जब कनउज ते कुड़हरिशहर लेउँ लुटवाय ८० कोड़ा दीन्ह्यो ना गंगाधर जगना कूच दीन करवाय ॥ छहै दिनौना के अन्तर मा कनउज शहर पहुँचे आय ८१ लगीं दुकानैं हलवाइन की सबविधिसजाशहरअधिकाय॥ ५ दुकानन मा पूछत भा कहँ पै बसैं बनाफरराय ८२
आल्हाकामनावन । ४७१ ६ कहाँ बनाफर आल्हाठाकुर हमका पता देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातैं जगनायककी बोला एक मसखरा भाय ८३ आल्हा ऊदन मोहबे वाले मरिगे समर भूमि मैदान ॥ काह बतावैं परदेशी से तिनकीकुशलनहींहैज्वान ८४ आल्हा तेली इक कनउज मा दूसर नगर आल्ह कुतवाल ॥ सुनी मसखरा की बातैं जब जगनिकद्वैगाहाल बिहाल८५ तबलों ढाढ़ी इक बोलत भा ठाकुर घोड़े के असवार ॥ आल्हा ऊदन मोहबेवाले नीके दऊ भाय सरदार ८६ अबहीं आवत हम ड्योढ़ीते ठाकुर घोड़े के असवार ॥ खड़ा धौरहर वहु ऊदन का झलकैकलश सूबरणक्यार८७ सुनिकै बातैं त्यहि ढाढ़ी की जगनिक दीन दुकान लुटाय ॥ हाट बांट में हल्ला हैगा पहुँचे राजसभा वहु जाय ८८ सुनिकै बातैं हलवाइन की लाखनि राना लीन बुलाय ॥ पकरिकै लावो त्यहि ठाकुर को हमरी नजरि गुजारो आय ८९ इतना सुनिकै लाखनि राना भूरी उपर भये असवार ॥ मीरासय्यद को सँग लैकै आये बेगि हाट त्यहिवार ६० सय्यद दीख्यो जगनायक को तब लाखनिते कह्यो हवाल ॥ यहु है भैनो महराजा को जयहिकानाम रजापरिमाल ६१ इतना सुनिकै लाखनिराना अपनो हाथी लीन घुमाय ॥ मीरासय्यद जगनायक ते भेंटे तुरत तहाँ पर आय ६२ जहाँ धौरहर बघऊदन का दोऊ तहाँ गये असवार ॥ द्वारे ठाढ़े उदयसिंह थे भेंटे तुरत आय सरदार ६३ हाथ पकरिकै जगनायक को महलन तुरत पहुँचे जाय ॥ आल्हा दीख्यो जगनायक को अपने पास लीन बैठाय ६४
१० । आल्हखण्ड । ४७२ लिखी हकीकति जो मल्हनाने सो जगनायक दीन गहाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी महरानी कै आल्हा चुपसाधि रहिजाय ९५ ऊदन बोले जगनायक ते भोजन हेतु चलौ सरदार ॥ आल्हा जावैं जो मोहबे को तो हम बैठि करें ज्यँवनार ९६ बारह दिनके अब अरसा मा लूटी नगर पिथौराराय ॥ ईजति रहै नहिं मल्हना की जो नहिं चलै बनाफरराय ९७ डोला लैहैं चन्द्रावलि का पारस पत्थर लिहैं छिड़ाये ॥ नहीं बनाफर सिरसा वाला जो गाढ़े मा होय सहाय ९८ नाहीं सुनिकै मलखाने की आल्हा छाँड़ि दीन डिंडकार ॥ ऊदन इन्दल देवा सय्यद रोवन लागि सबै सरदार ९९ बात फैलिगै यह महलन मा की मरिगये बीर मलखान ॥ को गति बरणै त्यहि समयैकै महलनछायो घोरमशान १०० द्यावलि सुनवाँ फुलवा रानी शिरधुनि बार बार पछिनायँ ॥ हाय ! बनाफर सिरसा वाले कैसे मरे समर में जाय १०१ सवैया ॥ हाय ! गयी सबमन्दिर छाय सुहाय नहीं ललिते सुख शय्या । बीर मेरे मलखान कुमार गई रणसों सब की मनसय्या ॥ हाय ! दयी बलवान सदा दुख औसुखको करि कर्म धवय्या । बीरबली मलखान समान जहाननहीं अस सोदर भय्या १०२ अस कहि रोवैं आल्हा ठाकुर दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ बहु समुझायो जगनायक ने धीरज धरयो बनाफरराय १०३ अब नहिं जावैं हम मोहबे को तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर लेत लुटवाय१०४
आल्हाकामनावन । ४७३ ११
मलखे मरिगे जब सिरसा मा तबहुँ न लड़े चँदेलेराय ॥ मोहिं निकार्यो उन भादों मा दारुण बाणी बज्र चलाय १०५ इतना कहिकै जगनायक सों आल्हा ठाकुर रह्यो चुपाय ॥ ऊदन बोले जगनायक ते भोजनकरो शोक बिसराय १०६ तब जगनायक फिरि बोलत भे मानो कही बनाफरराय ॥ संग न जावो जो मोहबे को हमरो शीश लेउ कटवाय १०७ बातैं सुनिकै जगनायक की द्यावलि कहा बचन समुझाय ॥ विपदा तुम्हरी के संगी हैं समरथ बड़े बनाफरराय १०८ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता काह गई बौराय ॥ तीनि तलाकें राजै दीन्हीं सो छाती माँ गई समाय १०६ विपदा भोगी हम मारग में सावन बिकट बादरी घाम ॥ पियैं लयवारिन इन्दल पानी जो सुख चैन करै विश्राम ११० इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ करो तयारी अब मोहबे की पाछिल बात सबै बिसराय १११ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे नैनन गई लालरी छाय ॥ तब समुझायो देवा ठाकुर चहिये चलन महोबे भाय ११२ मनै आयगै यह आल्हाके तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ भोजन करिये जगनायक जी चलिबेअबशिशोमहोबेभाय ११३ भोजन कीन्ह्यो जगनायकजी संग मा उदयसिंह सरदार ॥ जहाँ कचहरी चन्देलेकी आल्हा गये राज दरबार ११४ कही हक़ीक़ति महराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आज्ञा पावैं महराजा की देखें नगर मोहोबा जाय ११५ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला लीन्हे सातलाख चौहान ॥ जो नहिं जावैं हम मोहबे को तौ वह लूटै नगर निदान ११६
१२ आल्हखण्ड । ४७४ तेहिते आज्ञा हम को देवो ओ महराज कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै जयचंद जरिगे बोले सुनो बनाफरराय ११७ रय्यति लूटी तुम गाँजर की मोहवे द्रव्य दीन पहुँचाय ॥ दै समझौता सब गाँजर का पाछे जाउ बनाफरराय ११८ घोड़ा लूटे तुम बूँदी के सो-सब कहाँ दीन पठवाय ॥ गेहूँ खाये तुम गाँजर के ताते गई म्टाई आय ११९ इतना कहिकै जयचंद राजा पहरा चौकी दीन कराय ॥ कैद जानिकै आल्हा ठाकुर रूपनबारी लीन बुलाय १२० खबरि सुनावो तुम ऊदन का आल्हा परे कैदमा जाय ॥ दै समझौता तुम गाँजर का भाई अपन छुटाओ आय १२१ इतना सुनिकै रूपन चलि भा रिजिगिरि अटा तड़ाकाधाय ॥ खबरि सुनाई बघऊदन का सुनतै जरा लहुरवाभाय १२२ द्यावलि बोली जगनायक ते तुमहूं चलेजाउ यहि बार ॥ कपड़ा मैले सब हमरे हैं कैसे जायें राजदरवार १२३ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर तुरतै इन्दल लीन बुलाय ॥ कपड़ा दीन्ह्यो जगनायक को तुरतै बेंदुल लीन सजाय १२४ उड़न बछेड़ा हरनागर पर जगना तुरत भयो असवार ॥ घोड़ बेंदुला के ऊपर मा ठाकुर उदयसिंह सरदार १२५ जयचंद राजा की ड्योढ़ी मा दोऊ अटे तड़ाका आय !! मस्ता हाथी जयचंद राजा फाटक ऊपर दीन ढिलवाय १२६ मारिकै भाला जगनायक ने हाथी दीन्ह्यो तुरत भगाय ॥ जहाँ कचहरी महराजा की दोऊ अटे तड़ाकाधाय १२७ सात तवा तहँ ईसपात के जयचंद राजा दीन धराय ॥ भाला गाड़ै ई लोहे पर औ बलमोहिंदेय दिखलाय १२८
आल्हाकामनावना । ४७५ १३ कैसों भेने चन्देले का गड़बड़ कीन हाट माँ आय ॥ इतना सुनिकै जगनायक ने मनमा सुमिरि दूरगामाय १२६ भाला मारा ईसपात मा सातो तवा निकरिगे पार ॥ स्याबसि स्याबसि क्षत्री बोले हरषे उदयसिंह सरदार १३० सिंह कि बैठक जगना बैठ्यो राजा बहुत गयो शरमाय ॥ ऊदन बोले महाराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १३१ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़ि अवा पिथौरा राय ॥ आयसु पावैं महाराजा की जावैं नगरमोहोबा धाय १३२ मेरी माता सम मल्हना है तापर परी आपदा आय ॥ बीजक समझौ तुम गाँजर का दादा कैद देउ छुड़वाय १३३ घोड़ पपीहा जखमी हैगा जूझै स्वानमती के भाय ॥ जोगा भोगा की बदली मा सबियाँ कनउज जाय बिकाय १३४ घोड़ पपीहा की यउजी मा भूरी हथिनी देउ मँगाय ॥ जोगा भोगा के बदले मा लाखनि संग देउ पठवाय १३५ बारह बरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥ तीनि महीना औ ग्यारह दिन गाँजर खूब कीन तलवार १३६ लैकै पैसा सब गाँजर का औ भरिदीन खजाना आय ॥ लाखनि राना को सँग देवो तब छाती का डाह बुताय १३७ कीन्हीं किरिया लखराना है मोहबे चलब तुम्हारे साथ ॥ आज्ञा देवो लखराना को साँची सुनो भूमिके नाथ १३८ बातैं सुनिकै बघऊदन की जयचंद बहुत गयो घबड़ाय ॥ बोलि न आवा महाराजा ते मुँहँ का पान गयो कुम्हिलाय १३६ थर थर काँपन देही लागी शिरते छत्र गिरा भहराय ॥ करतब अपनी पर शोचत भा यहु महराज कनौजी राय १४०
३४ आल्हखण्ड । ४७६ कीन बहाना फिरि ऊदन ते बोला कनउज का महिपाल ॥ कीन हँसौवा हम आल्हा ते लाला देशराज के लाल १४१ जितनी फौजैं हैं कनउज मा सो लैलेउ बनाफरराय ॥ रुपिया पैसा जो कछु चाहौ तुम्हरौ मालखजाना आय १४२ लाखनि रानाको तिलका सों माँगो जाय बनाफरराय ॥ हमरी ठकुरी नहीं लाखनि पर तुम ते साँचदीन बतलाय १४३ कैद करैया को आल्हा को नीके जाउ लहुरवाभाय ॥ सुनि जगनायक ऊदन आल्हा तीनों चले शीशकोनाय १४४ ऊदन पहुँचे ढिग लाखनि के औ सब हाल कहा समुझाय ॥ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला गाँसानगर मोहोबा आय १४५ बिदा मांगिकै अब माता सों चलिये बेगि कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनि चलिभे सँगमालिहेलहुरवाभाय १४६ रानी तिलका के महलन मा दोऊ अटे तड़ाका धाय ॥ सोने चौकी दोऊ बैठे माताचरणनशीशनवाय १४७ कही हकीकति सब तिलका ते यहु रणबाधु लहुरवाभाय ॥ आयसु पावैं लखराना जो देखैं नगर मोहोबा जाय १४८ सुनिकै बातें उदयसिंह की तिलका गई सनाकाखाय ॥ बारह रानिन मा इकलौता साँची सुनो बनाफरराय १४६ सो चलिजैहैं जो मोहवे का हमरी जियत मौत है जाय ॥ इतना कहिकै रानी तिलका तुरतै बाँदी लीन बुलाय १५० कहि समुझावा त्यहि बाँदीका पद्मै खबरि जनावो जाय ॥ करि श्रृङ्गार महल अपने मा राखै बहू तहाँ बिलमाय १५१ इतना सुनिकै बाँदी दौरी रानी खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातें त्यहि बाँदी की लीन्ह्यो गंगनीर मँगवाय १५२
आल्हाकामनावन । ४७७ १५ हनवन कीन्ह्यो गंगजलसों रेशम सारी लीन मँगाय ॥ ओढ़ी सारी काशमीर की चोलीबन्दकसे अधिकाय १५३ पैर महाउर को लगवाग्रो नैनन सुरमा लीन लगाय ॥ कड़ाके ऊपर छड़ा बिराजैं त्यहिपर पायजेब हहराय १५४ पहिरि करगता करिहाँयैमा नई नई चुरियाँ लीन मँगाय ॥ ग्वरिग्वरिबिहियाँ हरिहरिचुरियाँ शोभा कही बून ना जाय १५५ अगे आगेला पिछे पछेला तिन बिच ककना करें बहार ॥ जोसन पट्टी बांधि बज़ुल्ला टाँड़ै भुजन केर श्रृंगार १५६ को गति बरणै तहँ हमेल कै चमकै हार मोतियनक्यार ॥ नथुनी लटकन पहिरिनासिका कानन करनफूलकोथार १५७ गुज्झी पहिरी दोउ कानन में टीका मस्तक करै बहार ॥ बँदिया शिर पर सोनेवाली पैरन बिछिया की झनकार १५८ अनवट पहिरे द्वउ अँगुठन में हाथन लीन आरसीधार ॥ मुँदरी छल्ला सब अँगुरिनमा रानी खूबकीन श्रृंगार १५६ बिदा माँगिकै महतारी ते ह्वाँ चलि दिये कन्नौजीराय ॥ द्वार राखिकै उदयसिंह का रानी महलगये फिरिआय १६० रानी कुसुमा आवत दीख्यो तुरतै उठी तड़ाकाधाय ॥ पकरिकै बाहू द्वउ प्रीतमकी पलँगा ऊपर लीन बैठाय १६१ पंसासारी को मँगवावा सखियाँ लाईं तुरत उठाय ॥ बड़ी खातिरी करि पदमाकै खेलन लाग कन्नौजीराय १६२ कुसुमा बोली तब लाखनि ते स्वामी हाल देउ बतलाय ॥ किह्यो तयारी तुम कहँना की काहेगयो अचाकाआय १६३ सुनिकै बातें ये पदमा की बोला तुरत कन्नौजीराय ॥ किरिया कीन्ही हम ऊदन ते औबातील गंगमँझाय १६४
१६ आल्हखण्ड । ४७५ जबै मोहोबे को तुम चलिहौ चलिबे साथ बनाफरराय ॥ आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़िआवा पिथौराराय १६५ संगै जैबे हम ऊदन के करिबे जूझ तहाँपर जाय ॥ जो मरिजबै समरभूमि मा तौ यशरही लोकमाछाय १६६ जो बचि अइबे हम मोहबे ते रानी संग करब फिरि आय ॥ सुनिकै बातें लखराना की पदमिनिगिरीपछाराखाय १६७ होश उड़ाने महरानी के पीले अंग भये अधिकाय ॥ थर थर देही काँपन लागी रोवाँ सकल उठे तन्नाय १६८ यह गति देख्यो महरानी कै तब गहिलीन कनौजीराय ॥ चूम्यो चाट्यो बदन लगायो धीरज फेरिदीनअधिकाय १६६ रानी पदमिनि पलँगा बैठी नैनन आँसू रही बहाय ॥ बोले लाखनि तब पदमिनि ते रानी काह गयी बौराय १७० बिटिया आहिउ का बनिया की जो रण सुनिकै गयी डराय ॥ भरम न राखै क्षत्रानी मन रानी साँचदीन बतलाय १७१ सुनि सुनि बातें लखराना की रानी गयी सनाकाखाय ॥ मनमा शोचै मनै विचारै मनमन बारबार पछिताय १७२ धीरज धरिकै पदमिनि बोली प्रीतम साँच देयँ बतलाय ॥ कहे रुकाचिन के लाग्यो ना नहिं सब जैहैं कामनशाय १७३ कहाँ कनौजी तुम महराजा चाकर कहाँ बनाफरराय ॥ नौकर स्वामी की समता ना विद्या काह दयी बिसराय १७४ बनते कन्या धरि आई ती त्यहिके अर्ही बनाफरराय ॥ अर्ही कुकरहा परिमालिक के तुम्हरीकीनगुलामीआय १७५ साथ गुलामन औ राजा का कहँ तुम पढ़ा कनौजीराय ॥ किरिया कीन्ही जो ऊदन ते स्वामी ताहि देउ बिसराय १७६
आल्हाकामनावन । ४७६ १७ सवैया ॥ स्वस्थिर चित्त बिचार करौ यह नाथ सबै बिधि बात अनैसी । रूप औ यौवन छाँड़ितिया सोपिया क्यहिभांतिकहौ तुमऐसी॥ धीरजवन्त कुलीनन की गति नाथ विचारि कहौ तुम कैसी । बात सुहात नहीं ललिते अनरीतिकि प्रीतकरी तुम जैसी १७७ सुनिकै बातें ये पदमिनि की बोला फेरि कनौजीराय ॥ कउने गँवार की बिटियाहै हमते टेढ़ि मेढ़ि बतलाय १७८ ऐसी बातें अब बोलेना दशनन चापि जीभको लेय ॥ जो नहिं जावैं सँग ऊदन के तौसबजगतअयशकोदेय १७६ कहा न मानैं हम काहू को निश्चय जानु मोर प्रस्थान ॥ इतना सुनिकै कुसुमा बोली स्वामी करो बचन परमान १८० राति बसेरा करि महलन मा भुरहीं कूच दिह्यो करवाय ॥ अम्बरे संगकी सखी सहिलरी डुइइइ बालकरहीं खिलाय १८१ दुनियादारी कछु जानी ना कबहुँ न धरा सेज पै पायँ ॥ कैसे काटब हम यौवन का प्रीतम साँचदेउ बतलाय १८२ तुम्हें मोहेबे का जाना रह नाहक लाये गवन हमार ॥ मई बाप का फिरि गरिआवै दैके बार बार धिक्कार १८३ सुनि सुनि बातें ये पदमिनिकी बोला फेरि कनौजीराय ॥ लौटि मोहोबे ते आवब जब रानी संग करब तब आय १८४ द्वार बनाफर उदयसिंह हैं रानी मोह देउ बिसराय ॥ संकट टारे बिन मल्हना के हमको योग रोग दिखलाय १८५ साथ बनाफर के हम जैहैं अइहैं जीति पिथौरा राय ॥ कीरति गैहै सब दुनिया मा रानी संग करब तब आय १८६