आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
४ आल्हाखण्ड । ५८८ ऊदन बैठे रस बेंदुलपर मन में ध्याय शारदामाय ॥ सजे सिपाही सब ठाढ़े थे तुरतै कूच दीन करवाय २३ बाजत डंका अहतंका के यमुना पास पहुँचे जाय ॥ पार उतरिकै श्री यमुना के दिल्लीशहर गये नगच्याय २४ चन्दन बगिया जहँ पिरथीकी तहँ पर गये बनाफरराय ॥ चन्दन बढ़ई को बुलवायो चन्दन सबै दीन गिरवाय २५ तब तो माली हल्ला करिकै चलिभे जहां पिथौराराय ॥ लगी कचहरी महराजा की शोभा कही बून ना जाय २६ ठाढ़े माली तहँ बिनवत हैं दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ ऊदन आये हैं मोहवे ते चन्दनबाग डरी कटवाय २७ कहा न माना क्यहु मालीका ओ महराज पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये माली की चौंड़ा धाँधू लीन बुलाय २८ कहि समुझावा तिन दूननते यहु महराज पिथौराराय ॥ जितने आये हैं बगिया में सबकी कटा देउ करवाय २६ इतना सुनिकै चौंड़ा धाँधू दूनों लीन फौज सजवाय ॥ चढ़ि इकवन्ता भौंरानँदपर दूनों कूच दीन करवाय ३० भारीलश्कर इत लाखनि का उत यहु गयो चौंड़ियाआय ॥ चन्दन छकड़ा चौंड़ा घेरे औ यह बोला भुजा उठाय ३१ कौन बहादुर है मोहवे मा चन्दनबाग लीन कटवाय ॥ हुकुम पिथौरा का नाहीं है लकड़ी एक यहाँ से जाय ३२ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की सम्मुख गये बनाफरराय ॥ हमीं बहादुर हैं मोहवे के चन्दनबाग लीन कटवाय ३३ मोहिं ठकुरानी बेला रानी मोहवे वाली दीन पठाय ॥ सच्ची ह्वैहै लै ब्रह्मा को चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३४
चन्दनबागकेरमैदान। ५८६ ५ दुनिया जानति है ऊदन को जिनके लड़न क्यार बयपार ॥ दूसर धंधा कछु कीन्हे ना चौड़ा मानु कही यहि बार ३५ अटक पारलौं झंडा गड़िगा बाजी सेतबन्धलौं टाप ॥ दतिया बूंदी जालंधर औ हमरी भई कमायूँ थाप ३६ चन्दन जैहैं सब मोहबे को चाहे फौज देउ कटवाय ॥ रुकिहै चन्दन अब चौड़ाना तुमते साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै लीन्ह्यो गुर्ज उठाय ॥ ऐंचि कै मारा सो ऊदन के लैगा बेंदुल वार बचाय ३८ बचा डुलरूवा द्यावलिवाला हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥ कलश सूवरण हौदावाले सो धरती मा दीन गिराय ३६ झुके सिपाही दुहुँतरफा के लागी चलन तहाँ तलवार ॥ पैग पैग पै पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ४० मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ४१ बिजयसिंह है बिकानेर को बिरसिंह गाँजर को सरदार ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ समरधनी तलवार ४२ कोऊ हारै नहिं काहू सों दोउ रण परा बरोबरि आय ॥ दोऊ ठाकुर हैं हाथी पर दोऊ देयँ सेलके घाय ४३ वार चूकिगे बिरसिंह ठाकुर मारा विजयसिंह सरदार ॥ जूझिगे बिरसिंह समरभूमि में हिरसिंह आयगयोत्यहिबार ४४ सँभरो ठाकुर अब हौदापर कीन्ह्यो विजयसिंह ललकार ॥ सुनिकै बातें विजयसिंह की हिरसिंह खैंचिली नितलवार ४५ ऐंचिकै मारा विजयसिंह को सो तिन लीन ढालपर वार ॥ रिसहा ठाकुर बिकानेर को सोत्यहि मारा फेरि कटार ४६
६ आल्हखण्ड । ५६० लागि कटारी गै हिरसिंह के सोऊ जूझिगयो त्यहिवार ॥ हिरसिंह विरसिंह गाँजरवाले दोऊ जूझिगये सरदार ४७ तब महराजा कनउज वाला लाखनिराना कहा पुकार ॥ गंगा मामा कुड़हरिवाले मारो विजयसिंह यहिवार ४८ इतना सुनिकै गंगाठाकुर अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ विजयसिंह को फिरिललकारा ठाकुर कूच जाउ करवाय ४९ नहीं तो बचिहौ ना हौदापर जो विधि आपु बचावै आय ॥ इतना सुनिकै विजयसिंह ने अपनो हाथी दीन बढ़ाय ५० विजयसिंह औ फिरि गंगाका परिगा समर बरोबरि आय ॥ सेल चलाई विजयसिंह ने गंगा लैगे वार बचाय ५१ ऐंचिकै भाला गंगा मारा त्यहिके गई प्राणपर आय ॥ जूझिग राजा विकानेर का गंगा बढ़ा तड़ाका धाय ५२ हीरामणि चरखारी वाला सोऊ गयो तहॉपर आय ॥ त्यहिललकारा फिरि गंगाको ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ५३ वार हमारी ते बचिहै ना जो विधि आपु बचावै आय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत है ठाकुर कूच जाउ करवाय ५४ इतना कहिकै हीरामणि ने मारी खैंचि तुरत तलवार ॥ बचिगा ठाकुर कुड़हरि वाला लीन्हेसिआड़ि ढालपरवार ५५ बोला ठाकुर चरखारी का ठाकुर धन्य तोर अवतार ॥ मैं हनि मारा दुहुँ हाथ ते पै तुम लीन ढालपर वार ५६ सुनिकै बातें हीरामणि की गंगा लीन तुरत तलवार ॥ ऐंचिकै मारा हीरामणि के सो पै जूझिगयोत्यहिवार ५७ स्याबासि स्याबासि गंगा मामा लाखनि कहा बचन् ललकार ॥ तुम्हारी समता का क्षत्री ना अब कोउ देखिपरे यहिवार ५८
चन्दनबागकेरमैदान। ५६१ ७ करि खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला देशराजका लाल॥ लड़ै इकल्ला रजपूतन ते कल्ला काटि गिरावै हाल ५६ जैसे होरी बल्ला जावै तैसे चलै खूब तलवार॥ करै दुपल्ला तहँ छातिन के नाहर उदयसिंह सरदार ६० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय॥ तैसे रणमा चौंड़ा मारै क्षत्रीजायँ युद्ध अलगाय ६१ चौंड़ा ऊदनकी मारुनमा द्वउदल भिन्न भिन्न हैजायाँ॥ यहु रण नाहर चौंड़ा बाँभनु बहु रणबाछु बनाफरराय ६२ कोऊ काहूते कमती ना द्वउरण परा बरोबरि आय॥ लाखनि धाँधूका मुर्च्चाभा शोभा कही बूत ना जाय ६३ लड़ै सिपाही दुहुँ तरफा ते आमाझोर चलै तलवार॥ ना मुहँ फेरैं दिल्लीवाले ना ई मोहबे के सरदार ६४ बड़ी लड़ाई भै बगियां में चौंड़ा ऊदन के मैदान॥ कायर भागे दुहुँ तरफा ते अपने अपने लिये परान ६५ लश्कर भाग्यो पृथीराज का जीत्यो कनउजका सरदार॥ लादिकै छकरनमें चन्दन को चलिभाउदयसिंहतहिव्हार ६६ बाजत डंका अहर्तंका के लाखनि कूचदीन करवाय॥ पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुँचे आय ६७ लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर बेलै खबरि जनाई जाय॥ यह अलबेला बेला रानी अनमन उठी तहाँ ते धाय ६८ दीख्यो छकरा फिरि चन्दनका बोली सुनो बनाफरराय॥ गीले चन्दन ते सरि है ना सूखो चन्दन देउ मँगाय ६६ बारह खम्भा हैं दिल्ली मा जहाँ दरबार पिथौरा क्यार॥ ते लै आवो तुम जल्दी अब ठाकुर उदयसिंह सरदार ७०
[Header] ८ आल्हखण्ड । ५६२
सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि बनाफरराय ॥ सूखो चन्दन हम कनउज ते स्वामिनि आजु देयँ मँगवाय ७१ पै नहिं जावैं अब दिल्ली को तुम ते साँच देयँ बतलाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली साँची कहौ बनाफरराय ७२ मंशा तुम्हारी पूरण ह्वैगै जूझै समर चँदेलेराय ॥ हम पर मोहे तुम ऊदन थे ताते डारे कन्त मराय ७३ चहौ एकन्त भोग जो करनो सोहै कठिन बनाफरराय ॥ परपति भोगै अब बेला ना चहुतनधज्जीधज्जीउड़िजाय ७४ भल चतुराई तुम सीखी थी कीन्ही खूब समय पर भाय ॥ पूर मनोरथ तब होई ना मानो साँच बनाफरराय ७५ राज पाट अरु तनु धनकारण हम नहिं सकैं धर्मको टारि ॥ सतयुग त्रेता अरु द्वापरके करिबे धर्म यहां अनुहारि ७६ चन्दनखम्भा की तुम लावौ की अब लेउ शाप विकराल ॥ झूठ न यामें कछु जानो तुम बेटा देशराजके लाल ७७ इतना सुनिकै डरे बनाफर तब फिरि कहा कनौजीराय ॥ ह्वै तुम बेटी महराजा की काछी बात रहिउ बतलाय ७८ ऐस बनाफर नहिं ऊदनहैं जो रण डारै कन्त मराय ॥ मौत आयगै चन्देले कै उनकै बुद्धिगयी बौराय ७६ भरी कचहरी परिमालिक की बीरा लीन्ह्यनि हाथउँड़ाय ॥ बीरालेती जो ब्रह्मा ना ऊदन बिदा लेतिकरवाय ८० बढ़िहा राजा परिमालिकहैं घटिहा बंश बीर चौहान ॥ घाटि न करतीं जो ब्रह्माते जीतत कौन समरमैदान ८१ चंदन जितनो तुम बतलावौ तितनो देयँ आज मँगवाय ॥ पगिया अरझी नहिं दिल्ली में अनहक प्राण गँवावैं जायँ ८२
चन्दनबागकेरेमैदान । ५६३ ह इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच कनौजीराय ॥ प्राणपियारे जो तुम्हरे हैं तौ तुम कूचदेउ करवाय ८३ तेहा राखौ रजपूती का चन्दनखम्भ देउ मँगवाय ॥ नहीं जनाना बनि मोहबे, ते जावो लौटि कनौजीराय ८४ शाप मैं देहौं अब ऊदन का तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ मोहबा दिल्ली दुउ शहरनमें परिहैं राँड़ राँड़ दिखलाय ८५ इतना सुनिकै लाखनि बोले बेला साँच देयँ बतलाय ॥ बहुत झमेला ते मतलब ना चन्दन देब वही मँगवाय ८६ तौ तौ लड़का रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरो मुड़वाय ॥ सुनि कै बातें लखराना की बेला बड़ी खुशी है जाय ८७ तबै बनाफर उदयसिंहजी तहँते कूच दीन करवाय ॥ फिरि यह बोले लखराना ते मानो कही कनौजीराय ८८ मृत्यु रूप यह बेला रानी दीन्ह्यसि बोलि दुऊकुलभाय ॥ नाश करनके हित यह बेला चन्दनखम्भ रही मँगवाय ८६ नहीं तो मतलब का खम्भाते जब हम और देयँ मँगवाय ॥ अपन रँड़ापा ते चाहति है सब संसार राँड़ द्वै जाय ६० प्राण आपने हम मल्हना को दीन्हे व्याह नेगमें भाय ॥ सो अब विरिया चलिआई है बेला मृत्यु बहाना आय ६१ कयहू समुझाये ते समुझै ना बेला विपति बोलि हरियाय ॥ जियत पिथौरा के द्वैहैं ना की हम खम्भलेयँ उखराय ६२ दुखित पिथौरा अब दुनियामा मरिगे सात पूत रणआय ॥ पुत्र न एको अब पृथ्वी के जो अवलम्बपरै दिखलाय ६३ बिना पुत्रके गति नहिं होवे वेद औ शास्त्र रहे बतलाय ॥ अगमा मल्हना दुउ रानिनकी बेला नाशिदीन करवाय ६४ ३८
१० आल्हखण्ड । ५६४ ह्वै झमेला हमपर तुमपर कैसी करैं कनौजीराय ॥ ऐसी सुनिकै लाखनि बोले मानो साँच बनाफरराय ६५ होनी ह्वैहै सो ह्वैहै अब याही ठीक लेउ ठहराय ॥ मृत्यु आयगै जब रावणकै तब वनवासगये रघुराय ६६ कोऊ रक्षा तब कीन्ह्यो ना जब मुनिपिया समुन्दरजाय ॥ ब्रह्मा विष्णू शिव सम्बन्धी इनसेऔर कौन अधिकाय ६७ बिपति समुन्दर पर जब आई तब सबगये तुरत अलगाय ॥ त्यहिते सम्मत अब याही है भुरहीं कूच देउ करवाय ६८ मर्जी होई नारायण की होई स्वई बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ६६ सम्मत ठीकौ अब याही है दिल्ली चलैं तड़ाकाधाय ॥ मर्जी याही नारायण की अनरथरूप परै दिखलाय १०० इतना कहिकै लाखनि ऊदन सोये द्वऊ सेजपर जाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों भंडागड़ानिशाकोआय १०१ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भांय १०२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यश सों रहौ सदा भरपूर १०३ पूरण कीन्ह्यो अब याहींते चन्दन बाग केरि सबगाथ ॥ वन्दन करिकै पितु माताके दूनों धरौं चरणपर माथ १०४ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १०५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारा- यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुधकृपा- शंकरसूनुपं०ललिताप्रसादकृतचंदनवाटिका युद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्दनखम्भाकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ सोहत मुण्डनमाल हिये अरु भाल में चन्द्र बिराजत नीके । शूल औ शक्ति कृपाण लिये डमरू कर सोहत शम्भुबलीके ॥ खातहैं भंग धरे शिरगंग सो नंग फिरैं अरधंग सतीके । जंग जुरे न टरैं ललिते हम ध्यावत चर्ण हैं शम्भु यतीके १ सुमिरन ॥ विपत्ति विदारण जगतारण के दूनों धरौं चरणपर माथ ॥ पूर मनोरथ तुम्हहीं करिहौ स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ वल्कल धारे जटा सँवारे मारे बली बीर दशमाथ ॥ सो हैं स्वामी अवधपुरी के लीन्हे धनुषत्राण प्रभु हाथ २ अक्षत चन्दन औ पुष्पन सों मानस पूजन परम उदार ॥ सो मैं करिकै रघुनन्दन का जावा चहौं जगत के पार ३ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धहौ स्वामी र... ... ... ॥
२ आल्हखण्ड । ५६६ कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥ सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २ इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥ सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३ झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥ चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४ देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥ पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६ तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७ तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥ बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥ धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६ सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥ १०
चन्दनखम्भाकामंदान । ५६७ ३ भा खलभल्ला औ हल्ला तब लोगन दीन्ह्यो लागलगाय ॥ मुर्चाबन्दी दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ बीर समुहाय ११ मारन लागे तलवारी सों दूनों तरफ बरोबरि आय ॥ अपने अपने सब मुर्चनमा ज्वाननदीन्हे ज्वान गिराय १२ औ ललकारैं फिरि फिरि मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ लिहे जँजीरें हाथी मारैं घोड़ा मारैं टाप चलाय १३ दाँतन काटैं फिरि फिरि डाटैं चाटैं रक्त भूत बैताल ॥ मारि लहाशन के भुइँ पाटैं ल्वाटैं समरशूर त्यहिकाल १४ ह्वातैं लागीं तहँ श्वानन की ज्वानन खूब कीन तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १५ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलै ऊना चलै बिलाइतिक्यार १६ भाला बरछी तीर तमंचा कहुँ कहुँ कड़ाबीनकी मार ॥ छुरी कटारी कउ कउ मारैं कउ कउ बीर रहे ललकार १७ कउ मुखफारैं नखन बिदारैं डारैं चीरि फारि मैदान ॥ कोऊ हारै नहिं काहू सों ज्वाननकीन घोर घमसान १८ परशूठाकुर लाखनि दिशि को अंगद नृपतिग्वालियरक्यार ॥ मुर्चाबन्दी भै दूनन कै दूनों लड़न लागि सरदार १६ अंगद मारै तलवारी सों परशू लेय ढालपर वार ॥ परशू मारै तलवारी सों अंगद रोकि लेय त्यहिवार २० बड़ी लड़ाई भै दूननमा दूनन खूब कीन तलवार ॥ वार चूकिगे अंगद राजा परशू मारिदीन त्यहि वार २१ गिरिगा राजा ग्वालियर का आयो बीर भुगन्ता ज्वान ॥ बीर भुगन्ता के मुर्चा मा परशू खूब कीन मैदान २२
४ आल्हखण्ड । ५६८ वार चूकिगे परशू ठाकुर गस्यो वीर सुगन्ता ज्वान ॥ चन्दन खम्भा के मुर्च्चा मा परशू जूझिगये मैदान २३ ऐंड़ा बेंडा ऊदन मारैं सीधा हनैं कनौजीराय ॥ अगलबगल में जगनायकजी बहु रणशूर ढहावत जायें २४ रानी अगमा के महलन के फाटक ऊपर कनौजीराय ॥ सँग जगनायक ऊदन ठाकुर येऊ गये तड़ाका धाय २५ मुर्च्चाबन्दी है बिसहिनि में तहँ पर गये पिथौराराय ॥ सुनी हकीकति लाखनिराना द्वारे जाय गये बिरझाय २६ बदला लेवे संयोगिनि का तब फिरि धरब अगारी पाँय ॥ लैकै डोला अब अगमा का कनउज शहर देहुँ पहुँचाय २७ तौ तौ लड़िका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरौं मुड़वाय ॥ तब जगनायक बोलन लागे मानो कही कनौजीराय २८ जैसे जानैं हम मल्हना को अगमा तैसि हमारी माय ॥ यह गति नाहीं क्यहु ठाकुरकी डोला आजु लेय निकराय २९ जितनी फौजें चन्देले की सो सब साथ हमारे भाय ॥ हमरो तुम्हरो मुर्च्चा द्वै है साँची सुनो कनौजीराय ३० यामें संशय कछु परि है ना तुमते ठीक दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें जगनायक की बोला तुरत बनाफरराय ३१ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है भैने सुनो चँदेलेकेर ॥ रतीभान के ये लरिका हैं नाती बेनचकवै केर ३२ घाट बयालिस पिरथी रोंके तब तुम गये हमारे पास ॥ बन्दि छुड़ाई इन मोहबे की काटी तहाँ यमनकी पाश ३३ आजु कनौजी सब लायक हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ तुमहूँ प्यारे जगनायक जी विग्रहकेर नहीं कछुकाज ३४
चन्दनखम्भाकामैदान । ५६६ तुम्हरे लाखनि के मुर्चामा कटिहैं पायँ आपने भाय ॥ .होय लड़ाई घर अपने मा दुशमनशोरहोय अधिकाय ३५ हुकुम जो पावैं लखरानाका महलन जायँ तड़ाकाधाय ॥ डोला लावैं हम अगमा का राखैं टेक कनौजिराय ३६ सुनिकै बातैं बघऊदन की लाखनि हुकुम दीन फरमाय ॥ चला बनाफर तब जल्दी सों महलन अटा तड़ाकाजाय ३७ रूप देखिकै बघऊदन का रानी गई सनाका खाय ॥ हाथ मेहरियन पर डार्यो ना मानो कही बनाफरराय ३८ पूत सुपूते ग्वालिवाले कीरति छायरही चहुँओर ॥ महल हमारे जो तुम लूटै कीरतिजाय सबै यहि ठोर ३६ फेंट बँधैया कोउ नाहीं है ना कोउ गहनयोग तलवार ॥ साँची बातैं हमरी मानो ठाकुर उदयसिंह सरदार ४० सुनिकै बातैं महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ ब्वला बेंदुला का चढ़वैया रानी साँच देयँ बतलाय ४१ जैसे माता मल्हना रानी तैसे आप हमारी माय ॥ यहु महराजा कनउजवाला द्वारे आय गयो बिरझाय ४२ डोला लेबे हम अगमा का तब अब धरब अगारी पाँय ॥ बदला लेबे संयोगिनि का तब छाती का डाह बुताय ४३ तहँ जगनायक खूब बिगरे थे तिनहुन दीन तहाँ समुझाय ॥ अब समुझावत महरानी हैं बाँदी आप देउ पठवाय ४४ यह मनभाई महरानी के सुन्दरि बाँदी लीन बुलाय ॥ कपड़ा गहना सब आपनदै डोला उपर दीन बैठाय ४५ चलिभा डोला रंगमहल ते संगे चले बनाफरराय ॥ जहाँ कनौजी की भूरीथी डोला तहाँ पहुँचा आय ४६
६ आल्हाखण्ड । ६०० देखिकै डोला लाखनिराना तुरतै कूचदीन करवाय ॥ चलिभा डोला जब फाटकते पहुँचा तुरत बजारे आय ४७ ऊदन बोले तब लाखनि ते मानो कही कन्नौजीराय ॥ कऊ दुसरिहा अब तुम्हरो ना डोला आप देउ लौटाय ४८ कीरति गैहैं सब दुनिया मा ओ महराज कन्नौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनिराना डोला तुरत दीन लौटाय ४६ आयग तिसहिन ते तुरतै तब यहु महराज पिथौराशाय ॥ सुनी हकीकति सबलाखनिकी हाथी तुरत लीन सजवाय ५० आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि बैठ्यो शम्भु शिवाक्रोध्याय ॥ चौंड़ा धाँधू अगल बगलभे डंका तुरत दीन बजवाय ५१ बाजत डंका अह्तंका के राजन कूच दीनकरवाय ॥ भारी लस्कर महाराजा का पहुँचा समरभूमि में जाय ५२ यहु महाराजा तब गाजाअति राजा गहरूदीन ललकार ॥ मारो मारो ओ रजपूतो हमरे समरशूर सरदार ५३ जान न पावैं मोहबेवाले अब शिरकाटि देउ भुइँडारि ॥ गरूई गाजैं सुनि राजाकी बाजैं घूमि घूमि तलवारि ५४ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी लाल ॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जैं भूत प्रेत बैताल ५५ श्वान शृगालन की बनिआई कागन लागी कारि बजार ॥ गिद्ध औ चील्हनके झुण्डनका मुण्डन उपर लाग दरबार ५६ बहैं लहाशैं तहँ मनइन की तापर चढ़े काग औ कङ्क ॥ उठिउठिलड़ि २ गिरि २ कितन्यो मरिगे समर राव औ रङ्क ५७ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया ठाकुर उदयसिंह निरशंक ॥ मारति आवै रजपूतन को लीन्हे सङ्ग सिपाही बङ्क ५८
भयो सामना फिरि धाँधू का दूनों लड़न लाग सरदार ॥ छोड़ बेंदुला पर ऊदन हैं धाँधू हाथी पर असवार ५९ पैंड़ लगायो रस बेंदुल के हौदा उपर पहुँचा जाय ॥ गुर्ज चलाई तब धाँधू ने ऊदन लैगे वार बचाय ६० ढाल कि औझड़ ऊदन मारी धाँधू गिरे मूर्च्छा खाय ॥ भागो हाथी जब धाँधू का देवी गयो मरहटाआय ६१ औ ललकारा उदयसिंह को ठाकुर खबरदार है जाय ॥ वार हमारी ते बचिहौना जो बिधि आपुबचायै आय६२ इतना कहिकै देवी मरहटा तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचि कै मारा बघऊदन के ऊदन लीन ढालपर वार ६३ फिरि ललकारा उदयसिंह ने नाहर होउ तुरत हुशियार ॥ यह कहि मारा तलवारी को देवी जूझिगयो त्यहिबार ६४ जूझिग देवी जब खेतन मा चौंड़ा गरु करै ललकार ॥ लडै चौंड़िया रण खेतनमा दूनों हाथ करै तलवार ६५ मीरासय्यद बनरस वाले येऊ घोर करैं घमसान ॥ कोगति बरणै तहँ देवा कै ठाकुर मैनपुरी चौहान ६६ फिरिफिरि मारै औ ललकारै रणमा कठिन करै तलवार ॥ धूरी हथिनी के हौदा ते राजा कनउज का सरदार ६७ हनि हनि मारै रजपूतन का अद्भुत युद्ध करै त्यहिबार ॥ कोगतिवरणै तहँ धाँधू कै हाथी उपर जवान असवार ६८ करि खलभल्ला औ हल्लाअति दूनों हाथ करै तलवार ॥ लड़ै इकल्ला यहू लल्लाअति ठाकुर उदयसिंह सरदार ६६ बड़ी लड़ाई त्यहि समया भै चन्दन खम्भा के मैदान ॥ ना मुह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ७०
८ आल्हखण्ड । ६०२ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ बड़े लड़ैता ज्वान ॥ ऊंचे खाले कायर भागे छोड़िकै समर भूमि मैदान ७१ शूर सिपाही ईजति वाले आली खानदान के ज्वान ॥ बढ़ि बढ़ि मारैं तलवारी सों अपने धरे गदोरी प्रान ७२ आदि भयङ्कर को चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ चौड़ा धाँधू को ललकारा चन्दन तुरत लेउ उल्टाय ७३ जान न पावैं मोहवे वाले सबकी कटा देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें महाराजा की बोला तहाँ बनाफरराय ७४ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है ओ महराज बीर चौहान ॥ जैसे नौकर चन्देले के तैसे आप करो परमान ७५ नहीं बरोबरि कोउ तुम्हरे है ज्यहिपर आप चढ़े महराज ॥ बेला बेला दुहुँ तरफाते ज्यहिते भये दुःखके साज ७६ हमें पठायो है बेलाने चन्दन लेन हेतु महराज ॥ पहिले बगिया को कटवायो पाछे कीन भयङ्कर काज ७७ सची होई चंदेले सँग राखी दुहूँ कुल न की लाज ॥ हम समुझावा भल बेला को की तुम करो मोहोबे राज ७८ अनरथ भायो मन बेला के खम्भन हेतु दीन पठशाय ॥ ना चढ़िआये जयचँद राजा ना चढ़िये चँदेलेराय ७६ तुम्हें मुनासिब अब याही है राजन कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै महाराजा तहँ हाथी तुरत लीन लौटाय ८० भाग्यो लश्कर फिरि पिरथी का सबदलतितिर बितिर है जाय ॥ लादि कै खम्भा तहँ छकरन में लाखनि कूचदीनकरवाय ८१ पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुंचे आय ॥ खेतलूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ८२
चन्दनखम्भाकामदान । १९०२ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनारायणभाय ८३ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर ८४ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिसई यह गाथ ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ८५ माथ तुम्हारो है दुनिया मा दूसर नहीं हमारो नाथ ॥ सत्य शपथ यह धर्म कर्म की स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ८६ सुमिरि भवानी शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त ८७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण- जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतचन्दनखम्भयुद्ध वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ चन्दनखम्भाकामैदान समाप्त ॥ इति ॥
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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ बेलाकेसतीहोनेकेसमयकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ भक्तन हेतु सबयं तनुधारि सदा बिपदा सुरसाधुहरी । हिरणाकश्यप दुःख दियउ तब रूपकियो नरसिंह हरी ॥ प्रह्लाद विभीषण औ हनुमान महानन में इन रेखपरी । अँवरीष औ अंगद की समता ललिते जगमें अब कौनकरी १ सुमिरन ॥ तुम्हैं विनायक मैं सुमिरत हौं गणपति गणाध्यक्ष महराज ॥ बिघन हरण लम्बोदर स्वामी पूरणकरो हमारे काज १ हे जगतारण भवभय हारण स्वामी एकदन्त महराज ॥ विपति विदारण सब सुखकारण राखनहार जगतमें लाज २ तुमहीं ब्रह्मा औ विष्णु हौ तुमहीं शम्भु सुरासुर काल ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी शिवाशम्भु के बाल ३
२ आल्हखण्ड । ६०६ तुम्हैं मनावैं औ ध्यावैं हम गावैं सदा तुम्हारी गाथ ॥ यह वरपावैं गणनायक जी दर्शन देयँ मोहिं रघुनाथ ४ छूटि सुमिरनी गणनायक कै शाका सुनो शूरमन केर ॥ सत्ती होई बेला रानी ठानी युद्ध पिथौरा फेर ५ अथ कथाप्रसंग ॥ खम्भ आयगे जब चन्दन के बेला करनलागि अनुमान ॥ मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो होय सती अस्थान १ यहै विचारत मन धारत सो आरत हृदय भई अधिकाय ॥ तबलों लाखनि को सँग लैकै आये तहाँ बनाफरराय २ बेला बोली तब ऊदन ते मानो साँच लहुरवाभाय ॥ मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो सरादेउ रचवाय ३ इतना सुनिकै ऊदनठाकुर चन्दन तहाँ दीनपहुँचाय ॥ चारि चहद्दी के डाँड़े पर बेला सरादीन रचवाय ४ कनउज मोहवे की फौजें सब ऊदनतुरत लीन सजवाय ॥ सरा रचायो जहँ बेला का सबदल दीन्ह्यों तहाँ टिकाय ५ जितनी रैयति परिमालिक कै देखन हेतु गई सब आय ॥ बेलारानी त्यहि औसर मा भूषण वसन सजे अधिकाय ६ को गति वरणै तहँ बेला कै षोड़श पूरकीन शृंगार ॥ लाश संगलै चन्देले की सरपर गई सती त्यहिबार ७ गाहरिकारा ह्याँ दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥ खबरि पायकै पृथीराज ने अपनी फौज लीन सजवाय ८ को गति वरणै त्यहि समया कै मानो इन्द्र अखाड़े जाय ॥ आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि मनमें शम्भु शिवापद ध्याय ९ चाँड़ा धाँधू वीर भुगन्ता लैकै कूच दीन करवाय ॥
बेलासती अन्तमैदान । ६०७ ३ भारी लश्कर महराजाका गर्जत चला समरको जाय १० थोड़े अरसा मा महराजा आये सरापास नगच्याय ॥ बाजै बाजा ह्याँ सती के हाहाकार शब्दगा छाय ११ बोला पिथौरा हाथी परते ओ महराज कनौजीराय ॥ बंश चँदेले के जो होवै सो सर देवै आगि लगाय १२ जायँ नगीचे नहिं ऊदन अब हैं अकुलीन बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की बोला तुरत लहुरवाभाय १३ हमै आज्ञा है बेला कै की सरदेवो आगिलगाय ॥ इतना कहिकै उदयसिंह ने दीन्ह्यो चितातुरतदँदकाय १४ यह गति दीख्यो पृथीराजने तुरतै हुक्म दीन फरमाय ॥ जान न पावैं मोहेबे वाले सब के देवो मूंड़ गिराय १५ हुकुम पायकै पृथीराज का चौंड़ा धाँधू उठे रिसाय ॥ बीर भुगन्ता गर्जन लाग्यो मारन लाग तड़ाका धाय १६ सय्यद देवा ऊदन ठाकुर इनहुन खैंचिलीन तलवार ॥ को गति वरणै त्यहि समया कै लागी होन भड़ामड़मार १७ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगे घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥ पहिया रथ के रथमा भिड़िगे तीरन भिड़िगे तीर्रकमान १८ मर मर मर मर ढालैं बोलैं खन खन तूण बाण चिल्लायँ ॥ सन् सन् सन् सन् गोली बरसें कायर भागैं समर पराय १६ घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥ झलझलझलझलझीलम झलकैं नीलम रंग परै दिखराय २० चम् चम् चम् चम् तेगा चमकैं दमकैं छुरी कटारी भाय ॥ कोगति वरणै त्यहि समया कै अद्भुत समर कहानाजाय २१ फिरैं भुशुण्डा बिन मुण्डा के रुण्डा करैं खूब तलवार ॥