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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ६५


तान् रामः क्षणमात्रेण चतुर्दशशार्यमम्। संप्रदर्श्य निजं लोकं प्रेषयामास लीलया ॥५९॥
तान् राक्षसान् मृतान् श्रुत्वा खगद्यास्ते त्रयः क्रुधा। युद्धाय निर्ययुः सैन्यैः सहिताश्च चतुर्दश ॥६०॥
रामोऽपि वधूं सीतां च गुहायां स्थाप्य बेगतः। चकार राक्षसैर्युद्धं शस्त्रैरस्त्रैर्भयावहम् ॥६१॥
चतुर्दशसहस्राणि शरीरूपाणि राघवः। कृत्वा तेषां च पुरतः शरैस्तान्मर्दयन्खगान् ॥६२॥
हन्ता खर दूषण च तथा त्रिशिराः शरैः। चतुर्दशसहस्रांस्तान्प्रेषयामास स्व पदम् ॥६३॥
मुहूर्तेन तु रामेण सहस्राणि चतुर्दश। मिता सेना खराद्यैश्च निहता गौतमीतटे ॥६४॥
खराद्याः कटका यत्र स्थितास्तच्च त्रिकटकम्। क्षेत्रं ख्यातं त्र्यंबकस्य तदेव प्रानपते भुवि ॥६५॥
जनस्थानं भृगुगणां ददौ वस्तुं रघूद्वहः। अथ सीता समालिङ्ग्य राघवं प्रशशंस सा ॥६६॥
अथ तां जानकीं प्राह रामो रहसि सादरम्। सीते त्वं त्रिविधा भूत्वा रजोरूपा वमानले ॥६७॥
वामांङ्गे मे सत्वरूपा बस छाया तमोमयी। पञ्चवट्यां दशाम्यस्य मोहनार्थं वमात्र वै ॥६८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा सीता चकार सा। ततः सूर्पणखा लंकां गत्वा रावणमब्रवीत् ॥६९॥
धिक् त्वां राक्षसराजात्र वृत्तं चरैर्न वेत्सि यः। चतुर्दशसहस्रा सा सेना स्वद्वन्धुभिः सह ॥७०॥
मानुषेणैव रामेण जनस्थाने निपातिता। तस्याश्च वचनं श्रुत्वा तां दृष्ट्वा तादृशीं तदा ॥७१॥
सिंहासनारूढश्चालय पुनः पप्रच्छ तां स्वसाम्। वद किं कारणं युद्धे प्राह सा राक्षसेश्वरम् ॥७२॥
सुरम्भां जानकीं दृष्ट्वा मया चित्ते विचिंतितम् गवणार्ये विनेष्यामि धतुं तां तत्पुरोगता ॥७३॥
शारद्वाजेन सीताऽह दशास्येन तु रावण। सौमित्रिणा वचव्यामात्तथा राघवस्य च। ७४॥
मायोऽपि मे हतः पुत्रस्तण्डपानो निर्धवरूप। मत्ताणार्थं कृतं युद्ध वधुभिस्ते निपातिताः। ७५॥

यह देखकर त्रिशिरा, खर और दूषण उनके मुखसे सब समाचार सुनकर क्रोधयुक्त हो चौदह भयानक राक्षसोंको उसी समय रामसे लड़नेके लिये भेजा ॥ ५७ । ५८॥ तब रामने चौदह बाणोंसे क्षणमात्रमं लीला-पूर्वक उनको मारकर अपने लोक भेज दिया ॥ ५९ ॥ उनके मारे जानेका समाचार सुनकर खर आदि तीनों राक्षस क्रुद्ध होकर चौदह हज़ार मतिकोंके साथ युद्धके लिए निकल पड़े ॥ ६० ॥ राम भी सीता तथा लक्ष्मणको एक गुफामे रखकर शीघ्र अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार करते हुए राक्षसोंके साथ भयानक युद्ध करने लगे ॥ ६१ ॥ उस समय राम अपने चौदह हज़ार रूप बनाकर उनके सामने गये और समरभूमिमें उन सबका मर्द मर्दन कर डाला ॥ ६२ ॥ उन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा तथा चौदह हज़ार राक्षसोंको बाणोंसे मारकर अपने धाम भेज दिया ॥ ६३ । इस प्रकार मुहूर्त्तमात्रमें रामने चौदह हज़ार सैनिकों तथा खर आदिको गौतमी तटपर किनारे मार डाला ॥६४॥ जहाँ ये खरा दूषण त्रिशिरा तीनों भाई कटक रूपसे रहते थे। वह स्थान त्रिकटक न मस प्रसिद्ध था और उसीको लोग त्र्यम्बक भी कहते थे ॥ ६५ ॥ तदनन्तर रघुनन्दन रामने वह स्थान त्रिकटक ( त्र्यम्बक ) ब्राह्मणोंको निवास करनेके लिए दान दे दिया । यह सब देखकर सीता रामका आलिंगन करके उनकी प्रशंसा करने लगीं ॥ ६६ ॥ एक दिन राम एकान्तम सीताके सादर कहने लगे—हे सते ! तुम तीन रूपोंको धारण करके रजोरूपमे अग्निम समायरूपसे छायाकी तरह मेरे वायें अगमें और तमोमयी बनकर रावणको मोहित करनेके लिये यहीं पञ्चवटीमें निवास करो ॥ ६७ । ६८ ॥ उत्तर उस बचनको सुनकर सीतान वैसा ही किया । तभी शूर्पणखा लंकामें जाकर रावणसे बोली — ॥ ६९ ॥ हे राक्षसराज ! तुम्हारे जैसे राजाको धिक्कार है, जो दूतोंके द्वारा तुम्हें राज्यकी दशाका पता नहीं लगता । चौदह हज़ार सेना सहित तुम्हारे भाइयोंको मनुष्यरूपवाले रामने दण्डकारण्यमे मारकर गिरा दिया । उसके इस बचनको सुन तथा उसका यह दशा देख सिंहासनसे कुछ ऊंचे होकर वह अपनी बहिनसे पूछने लगा कि युद्ध होनेका क्या कारण है, सो बतलाओ । तब वह राक्षसेश्वर रावणसे बोली— । ७०-७२ ॥ विदर्भोंमें परम लावण्यमयी देखकर मैने निश्चय किया था कि इसको रावणके लिये ले आऊँगी । यह विचारकर मैं उसकी पकड़नेके लिये आगेमें गयी ॥ ७३ ॥ हे रावण ! इतनेहीम एक बाणने मेरी यह दशा कर दी । रामके

६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७

यद्यस्ति पौरुषं किञ्चित्तार्ह सीतां समानय । नोचेदधोमुखस्तिष्ठ यथा स्त्री हतभर्तृका ॥ ७६ ॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मान्वयामास तां स्वसाम् । तौ रामलक्ष्मणौ हत्वा तव शोकाप्रमार्जनम् ॥ ७७ ॥ करोम्यहं लोहितेन तयोः स्नेटं भजस्व मा । एव नानाविधैर्वाक्यैः सान्त्वयित्वा स्वसां मुहुः ॥ ७८ ॥ स्वहितस्योपदेष्टारं मातुलं तपसि स्थितम् । ययौ रथेन मारीचं तस्मै वृत्तं न्यवेदयत् ॥ ७९ ॥ सोऽथ तं भीषयामास नाभिनपं मुहुर्मुहुः । विश्वामित्राध्वरे त्यक्तमात्मानं तं न्यवेदयत् ॥ ८० ॥ रामारण्या परां रत्नं रजतं ह्यवधूपितम् । श्रुत्वाऽत्र र्याद्ववर्णञ्चिद्राप मन्त्रं बिभेम्यहम् ॥ ८१ ॥ केन ते शिक्षिता बुद्धिरियं लङ्काविघातिनी । आम्ररूपोऽस्ति कः शत्रुर्येनेयं शिक्षिता मतिः ॥ ८२ ॥ कथां न कुरु रामस्य तं दृष्ट्वा न्वं मरिष्यसि । ततः क्रोधेन तं प्राह यदि नायासि राघवम् ॥ ८३ ॥ मया सद्यो वधिष्यासि त्वामतः कुरु मद्वचः । धृत्वा त्वं मृगरूपञ्च गवस्त्वमनुयास्यति ॥ ८४ ॥ त्वं शब्दं कुरु रामस्य लक्ष्मणस्तेन यास्यति । ततस्तां जानकीं वेगाल्लङ्कां स्वामानयाम्यहम् ॥ ८५ ॥ लङ्कार्द्धं ते दास्यामि स्वां राज्यादशुभादहन् । इति तस्याग्रहं दृष्ट्वा मारीचो ह्यचिन्तयत् ॥ ८६ ॥ रामहस्तान्मृतिः श्रेष्ठा माऽस्तु रावणहस्ततः । इति निश्चित्य मारीचस्तथेत्युक्त्वा ययौ तदा ॥ ८७ ॥ रावणेन रथे स्थित्वा गत्वा पञ्चवटीं प्रति । धृत्वा हैममृगाधीत्री मोहयामास जानकीम् ॥ ८८ ॥ सा दृष्ट्वा तामनी दृष्ट्वा शृम शवद्रममब्रवीत् । क्रीडार्थं मां मृगं हेम धन्वा देहि रघूत्तम ॥ ८९ ॥ मृगश्चेद्वानभिन्नांगः करोमि कंचुकीं स्वयः । तत्तस्या रचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा गर्व रघूत्तम । ९० ॥

कहलक्ष्मणने पंचवटीमें डेरो पड़ रहा सो है ॥ ७४ ॥ उन्होंने बिना किसी कारण तपस्या कर। हुए मेरे प्राण-प्रिय पुत्र सम्बकको भी मार डाला । तब युद्ध कलह करनेके लिए खर-दूषणादि भाईयात रामके साथ युद्ध किया । किन्तु उसने उन्हें भी मार डाला ॥ ७५ ॥ यदि ऐसे तुझे भी बल हो तो सीताका हरण कर नहीं तो पतित मर जानपर विधवा स्त्रीकी तरह नीचा मुंह करके बैठा रह ॥ ७६ ॥ उसवे वचन सुनकर रावण अपनी बहिनको समझाने लगा और बोला कि मैं राम-लक्ष्मणको मारकर उनके खूनसे तुम्हारे आंसूओंका माजन करूंगा-तुम दुःखित न होना । इस प्रकार अनेक वाक्योंसे उसने भगिनीको सान्त्वना समझाया ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ इसके पश्चात् रथपर बैठकर वह हितका उपदेश करनेवाले तथा तपमें स्थित अपने मामा मारीचके पास गया और उसे सब हाल कह सुनाया ॥ ७९ ॥ तब मारीच अपने भाव रावणको बार-बार डराता हुआ बोला कि रामने मुझे विश्वमित्रके यज्ञके समय बाणसे उठाकर समुद्रके किनारे फेंक दिया था ॥ ८० ॥ तभी से मैं रण, रन, रजत (चांदी), रमम, सभा, तथा रमणी आदि नामोंके रकार अक्षर सुनने मात्रसे ही डर जाता हूँ (अर्थात् रामके भयसे मैंने इन सब चीजोंसे प्रेम करना भी छोड़ दिया है ॥ ८१ ॥ लंकाका नाश करनेवाली यह मंत्रणा तुमको किसने दी है ? वह मित्ररूपमें छिपा हुआ तुम्हारा शत्रु ही है, जिसने तुमको यह मति दी है ॥ ८२ ॥ उसकी बात मत सुनो, नहीं तो मारे जाओगे । यह सुना तो शुद्ध होकर रावण मारीचसे बोला-यदि तुम रामके पास नहीं जाओगे तो मैं तुम्हें मार डालूंगा। इसलिये मेरा कहा मान सो ! तुम मृग बनकर जब रामके पास जाओगे तो राम तुम्हारे पीछे चल देगा । वनमें दूर से जाकर तुम रामके जैसा स्वर बनाकर 'हा लक्ष्मण' ऐसा चिल्लाना । तब लक्ष्मण भी आश्रम छोड़कर तुम्हारे ओर चल देंगे। उस समय मैं शीघ्र से ताको अपनी लंकामें उठा लाऊंगा ॥ ८३-८५ ॥ यदि मेरा कार्य सिद्ध हो जायगा तो मैं तुमको लंकाका आधा राज्य दे दूंगा। उसके आग्रहको सुनकर मारीचने मनमें विचार किया कि रावणके हाथसे मरनेकी अपेक्षा रामके हाथसे मरना अच्छा है। यह निश्चय करके मारीच 'बहुत अच्छा' कहता हुआ रथपर सवार होकर रावणके साथ पंचवटीकी उसी समय चल पड़ा। वहीं जाकर उसने सुवर्णका मृग बनकर सीताको मोहित कर लिया ॥ ८६-८८ ॥ तब अमोलगमयी छपारूपवाणी सीता मृगको देखकर रामसे बोलीं- हे रघूत्तम राम ! इस मृगको पकड़कर मुझे दे दो। मैं उसके साथ क्रीड़ा करूंगी ॥ ८९ ॥ और यदि बाणसे मारकर ला हो तो मैं उसके चमड़ेकी कांचली बनाऊंगी। सीताके वचन सुन उपा कुछ सोर-समझकर रघूत्तम राम सीताकी रक्षाके लिये भाई लक्ष्मणको

सर्गः ७ ] सारकाण्डम् ६७


सीताया गच्छ बंधुं मस्त्रीष्याशु मृगं ययौ । ततः पलायनं चक्रे मृगो रामं विरूपयन् ॥ ९१ ॥
शमबाणेन भिन्नांगः शब्दं दीर्घं चकार सः । हा सौमित्रे रमागच्छ हा हतोऽस्म्यथ कानने ॥ ९२ ॥
इत्युक्त्वा रामवद्वाचा ममार रुधिरं वमन् । तं शब्दं जानकी श्रुत्वा चोदयामास लक्ष्मणम् ॥ ९३ ॥
सोऽप्याह रामवत्तन्न नेदं गीर्न भयं त्यज । ततः सा तं पुनः प्राह जानामि तव चेष्टितम् ॥ ९४ ॥
भरतस्योपदेशेन मृतिं रामस्य वाञ्छसि । अथवा मेऽभिलाषोऽस्ति तर्हि प्राणान् त्यजाम्यहम् ॥ ९५ ॥
तच्छ्रुत्वचनं पश्याः श्रुत्वा वाच्या महद्वचम् जानकीं प्राह सौमित्रिर्मातः शृणु वचो मम ॥ ९६ ॥
रामवाक्यं ह्युरस्कृत्य जनन्याज्ञा मया नया । ताडितं वाक्यशरेणाद्य भेष्यस्यस्याद्यचञ्चलम् ॥ ९७ ॥
तथापि शृणु मद्वाक्यं यन्मयाऽऽरोप्यते हितम् मर्य्या धनुषो रेखा कृतां लक्ष्मणतोऽधुना ॥ ९८ ॥
त्वद्रक्षणार्थं दुष्टानां दुर्लंघ्यां महदापदाम् । मा समुल्लङ्घयस्येनां प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ ९९ ॥
इत्युक्त्वा धनुषः कोट्या कृत्वा रेखां समंततः । वाष्पदेरो पञ्चवट्याः सौमित्रिः परियोपनाम् ॥ १०० ॥
नत्वा सीतां नमस्कुर्व्या ययौ रामं त्वरान्वितः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र रावणो भिक्षुरूपधृक् ॥ १०१ ॥
गत्वा पञ्चवटीद्वारं रेखायाश्च बहिः स्थितः । वाग्यतोऽपि वै चोक्त्वा तूष्णीं तस्थौस राक्षसः ॥ १०२ ॥
तामाज्ञायामयौ सीता भिक्षां तस्मै समर्पयितुम् । ययौ द्वारं दीर्घहस्ता गृहाभ्यन्तरवर्तिनी रम् ॥ १०३ ॥
तदा भिक्षुः पुनः प्राह सीतां पङ्कजलोचनाम् भगिनी गुरोर्यन्तेण भिक्षामेनां त्वयाऽर्पिताम् ॥ १०४ ॥
गार्हस्थ्यं चेट्यधर्माय ग्रसितुं न्व समिच्छामि । तर्हि रेखां समुल्लङ्घ्य मां भिक्षां दातुमर्हसि ॥ १०५ ॥
तद्भिक्षोर्वचनं श्रुत्वा ऽधर्माऽभून्मेति शंकिता रेखाद्वहि सव्यपादं दत्वा दीर्घेणमण्डरा ॥ १०६ ॥
गृहाणैषा वरं भिक्षामिति न प्राह जानकी । ततोऽद्रामध्यस्थां पुन्त्रा भिक्षुरूपं विसृज्य च ॥ १०७ ॥
स्ववाहे रथे सीतां सन्ध्याभ्यामन्ववर्तत अवादूच्छति वेगेन तावदृष्टो जटायुषा ॥ १०८ ॥


नियुक्त करके शीघ्र मृगके पीछे चल दिए । दृष्टिका चञ्चल आगे दौड़ता हुआ उन्हें बहुत दूर जंगलमें दौड़ा ले गया ॥ ९० ॥ ९१ ॥ वहां बाणसे घायल होकर वह श्रीराम नामक स्वरसे चिल्लाने लगा हा लक्ष्मण ! मैं कानन में मारा गया शीघ्र आओ । ९२ । इतना कहकर जानसे वह वमन करता हुआ मर गया । उस शब्दको सुनकर जनकनन्दिनी जानकीने शीघ्र ही ॥ ९३ ॥ लक्ष्मण बोले- हे सीते ! यह रामका वाक्य नहीं है, मत डरो । सीता फिर कहने लगी कि मैं अब तुम्हारे अभिप्रायको जान गयी ॥ ९४ ॥ तुम भरतके कहनेके अनुसार रामका मरण अथवा रामके मर जानेपर मुझे मांगना चाहते हो । परन्तु याद रखो, मैं तुम्हारे उचित या स्त्री नहीं होने की और तथा मर जाऊंगी ॥ ९५ ॥ सीताके इस वचनको सुनकर सुमित्रापुत्र लक्ष्मण जानकी से कहने लगे- हे माता ! मेरी बात सुनो ॥ ९६ ॥ रामकी आज्ञासे तुम्हारी रक्षण रूपान्तर पूर्वक तुमने जो बाणरूपी बाणसे ताड़ित किया है उसका फल तुम शीघ्र पाओगी । ९७ ॥ तो भी मेरे कहे हुए इस हितकारी वचनको सुन लो । धनुषसे तुम्हारे आगे आज यह रेखा खींच रहा हूँ ॥ ९८ ॥ यह दुष्टोंके रक्षाके लिए और दुष्टोंके लिए दुर्लंघनीय तथा महान् भय उत्पन्न करनेवाली होगी । प्राणोंके कण्ठमें आ जानेपर भी तुम इस रेखाका उल्लङ्घन नहीं करना ॥ ९९ ॥ ऐसा कहकर धनुषके अग्रसे लक्ष्मण पञ्चवटीके बाहर खाईकी भांति सीमाकी बाण और रेखा खींच दी ॥ १०० ॥ तदनन्तर सीताको प्रणाम करके लक्ष्मण शीघ्र रामकी ओर चल दिये । उस समय रावण भिक्षुकका रूप धारण करके पंचवटीके द्वारपर जाकर रेखाके बाहर खड़ा हो गया और 'भवति भिक्षान्देहि' कहकर चुप हो रहा । १०१ । १०२ ॥ तब कृपामयी सीता उसको भिक्षा देनेके लिये बाहर आयी और हाथ बढ़ाकर भिक्षुसे 'भिक्षा लो' ऐसा कहा । १०३ । तब कमलके समान नेत्रोंवाली सीतासे भिक्षुने कहा कि मैं रेखाके भीतरसे दी हुई अन्न नहीं लेता ॥ १०४ ॥ यदि तुम गार्हस्थ्य आश्रमकी रक्षा करना चाहती हो तो रेखाके बाहर आकर भिक्षा दो ॥ १०५ ॥ भिक्षुके इस वचनको सुनकर 'कहीं शाप न लगे' इस डरसे बायें पाँवको रेखाके बाहर रख और लम्बा हाथ करके ॥ १०६ ॥ जानकी 'यह भिक्षा लो' ऐसा बोली । तभी रावणने उनको पकड़ लिया और भिक्षुका रूप त्याग तथा सीताको रथोंके ऊपर बिठाकरके पीछे

६८ आनन्दरामायणे [सर्गः ७

चकार तुमुलं युद्धं रावणेन स पक्षिराट् । निजपद्भ्यां मुखेनाथ चूर्णीकृत्य रथोत्तसम् ॥१०९॥ मगवृष्टिं विनिजित्य बभञ्ज तद्धनुर्महत् । मुकुटं न दश मंछिद्य कृत्वा देहं तु जर्जरम् ॥११०॥ मूर्च्छितं रावणं कृत्वा तां सीतां नेन्यवैनयत् । स्वस्थाभूतो दशास्योऽपि ताडयामास तं पदा ॥१११॥ क्रोधेन भृशताविद्धः पक्षिणा जर्जरीकृतः । ततो जटायुः पतितो वमन् रक्तं मुखेन सः ॥११२॥ ततो विहायसा सीतां निनाय रावणः पुनः । रामरामेति जल्पन्ती सीताऽभूम्यस्तलोचना ॥११३॥ उत्ससर्ज वरध्वाध पथि स्वाभरणानि सा । दृष्ट्वाऽधः पर्वते प्रोच्चैः संस्थितान् पञ्च वानरान् ॥११४॥ प्राक्षिपत्कपिमध्येऽथ भूषनानि नृपोत्तमम् । ततो दशास्यस्तां नीत्वा ह्यशोके सन्यवेशयत् ॥११५॥ प्रार्थयामास तां सीतां नोत्तां सा ददौ तदा । तस्याः संरक्षणार्थाय राक्षसीश्च सहस्रशः ॥११६॥ आज्ञापयद्गृहास्वः स स्वयं गेहं विवेश ह । तदेन्द्रो ब्रह्मवाक्येन पायसं वर्षतुष्टिकृत् ॥११७॥ ददौ रहस्य सीतायै तेन तुष्टा बभूव सा । समर्प्य पायसं किंचिद्रामाय लक्ष्मनाय च ॥११८॥ सुरातिथिभ्यो दत्त्वा दत्वा धेनु च खेचरान् । दत्त्वाऽथ त्रिजटां किंचिद्भक्षयामास जानका ॥११९॥ मन्त्र्य रावणेनापि राक्षसांश्च षोडश । प्रैषिता रामघातार्थं ते कबन्धेन भक्षिताः ॥१२०। यत्र यत्र पञ्चवट्यां रामवाणभयान्मृगः । चचार गौतमीतारे सस्थानं तत्र तत्र हि ॥१२१॥ स्थानसङ्ख्यान्यनेकानि जग्रान्ति च पुराणि हि । मृगस्य पतितं यत्र नूपुरं परिधावता ॥१२२॥ नूपुराख्यो महाग्रामः प्रोच्यते गौतमात्तटे । गमबाणप्रहारेण चपलाक्षोऽपतद्भुवि ॥१२३॥ मृगो यत्र महाँस्तत्र चापल्याग्राम इष्यते । गौतमातटे ग्रासभूम्यां रामवाणहतो मृतः ॥१२४॥ पतितो यत्र तच्चिह्ने दृश्यतेऽद्यापि मानवः । सौमित्रिचापजा रेखा पञ्चवट्याः समन्ततः ॥१२५॥

सीता जब भासा जा रहा था, तभी जटायुन उसे देख लिया ॥ १०७ । १०८ ॥ तब पक्षिराज जटायुन रावणके साथ तुमुल युद्ध किया अपने पाँवों और चांचसे मार-मारकर उसके रथका चूर-चूर कर दिया ॥ १०९ ॥ भंडी गदाद्वारा पीठ डाला। उसका बड़ा भारी धनुष तोड़ दिया। मुकुटोंको काट डाला और उसके शरीरको जर्जरित कर दिया ॥ ११० ॥ इतना ही नहीं, रावणको मूर्च्छित करके वह सीताको लौटा लाने लगा। तभी रावण भी स्वस्थ होकर उसको पाँवोंसे मारने लगा ॥ १११ ॥ बड़ा क्रोध करके रावणने पक्षीको और पक्षीने रावणको जर्जर कर दिया, अन्तम जटायु घायल होकर धरनीपर गिर पड़ा ॥ ११२ ॥ तब रावण सीताको लेकर आकाशमार्गसे लङ्काकी ओर लौटपड़ा। अभागी सीता नीचे झाँकती 'हा राम-हा राम' चिल्लाने लगी ॥ ११३ ॥ उसी समय उन्होंने नीचे एक उन्नत पर्वतके शिखरपर बैठे हुए पाँच बन्दर सुग्रीव-हनुमान् आदिको देखा और अपनी साड़ी को फाड़ तथा उसके टुकड़ेमें अपने गहने बांधकर वही गिरा दिये। उधर दश-मुख रावणने सीताजी को जाकर लङ्काके अशोकाटविकामें रखा ॥ ११४ ॥ ११५॥ प्रेम करनेके लिये उसने सीता-से बड़ी प्रार्थना की, परन्तु सीता किसी प्रकार सहमत नहीं हुई और न उसकी बातोंका कुछ उत्तर ही दिया। उनका रक्षाके लिये रावणने वहाँ हजारों राक्षसिय नियुक्त कर दीं ॥ ११६ । उनको रक्षा करनेकी आज्ञा देकर रावण अपने महलमें चला गया। इसी अवसरपर ब्रह्माके कहनेसे इन्द्रने वहाँ जाकर छह भर तक भूखको मिटा-कर सन्तुष्ट रखनेवाला पायस (खीर) एकान्तमें सीता को दिया। इससे सीता बड़ी प्रसन्न हुई। उन्होंने राम तथा लक्ष्मणके नाम उसमेंसे कुछ पायस निकाला ॥ ११७॥ ११८ ॥ कुछ देवताओंको दिया। कुछ गोवो तथा पक्षियोंको खिलाया और थोड़ासा त्रिजटाको देकर बादमें बची हुई थोड़ीसी खीर जानकीने स्वयं खाया ॥११९॥ तदनन्तर रावणने सलाह करके सोलह राक्षसोंको रामको मारनेके लिये भेजा, परन्तु वे सब रास्तेमें ही कबन्ध-के द्वारा खा डाले गये ॥ १२० ॥ उस समय पञ्चवटीमें रामके बाणके भयसे जहाँ-जहाँ मृगरूपी मारीच गया था, गौतमीके किनारे वहाँ सर्वत्र अनेक नामवाले स्थान स्थापित हुए। जिस जगह दौड़ते हुए मृगका नूपुर गिर पड़ा था, वहाँ नूपुरपुर नामका बड़ा भारी गाँव बस गया। रामके बाणके ताड़ित होकर चपल नेत्रोंवाला मृग जहाँ पृथ्वीपर गिर गया था, वहाँ बड़ा भारी चापल्य नामका गाँव अब भी बसा हुआ दीखता है, गोदावरीके किनारे

अद्यापि दृश्यते स्पष्टा नदीरूपा भयप्रदा पाषाणभूम्यां तत्रैव रावणस्य पदं महत् ॥१२६॥ अद्यापि दृश्यते सौम्यं गर्तशूर्पं नरोत्तमैः । खरादेर्युद्धसमये पंचवट्यां विदेहजा । १२७॥ गुहायां गोषिता भर्त्रा साद्यापि तत्र दृश्यते । यथा रामो लक्ष्मणोऽपि पञ्चवट्यां सदैव हि ॥१२८॥ दृश्यतेऽद्यापि भो देवि सञ्जनैर्ज्ञानदृष्टिभिः । अज्ञानदृष्टिभिन्ने तु दृश्यते प्राकृतरूपिणः । १२९॥ रामतीर्थ रामकृतं सीतालक्ष्मणसंस्कृतैः । तोयैस्तत्र तु सांतव्यै दृश्यतेऽद्यापि मानवः ॥१३०॥ रामेण सीतया यत्र शय्यायां पर्णनोपरि । कृत पूर्व तु शयनं रामशय्यागिरिः स्मृतः । १३१॥ शय्यारूपाणि दृश्यंतेऽद्यापि तत्र तृणानि हि । रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा श्रुत्वा सीतावधोद्यमम् ॥१३२॥ निवेदितं लक्ष्मणेन क्रोधाद्वाष्पपयेनसा । निमित्तान्यनिष्टोराणि दृष्ट्वा चैव समन्ततः ॥१३३॥ परी पञ्चवटीं पश्यंस्तत्र सीता ददर्श न । ततो मानुषभाव तु दर्शयन् सकलाजनान् ॥१३४॥ विचिन्वन्सर्वतः सीतां गृध्रराजं ददर्श सः । अतः स पश्चितन्वा रावणन हतां प्रियाम् ॥१३५॥ ज्ञात्वा तं योजयामास वह्निना जीवितक्षये । तत्तृप्त्यर्थं कव्यमांसं क्षिप्त्वा स्नात्वा रघूत्तमः ॥१३६॥ ययौ दक्षिणमार्गेण विचिन्वन्मूढवत्प्रियाम् । पुरंदराग्निहोत्र स चकार कुशभार्यया ॥१३७॥ एतस्मिन्नंतरे देवि त्वया प्रोक्तस्त्वहं पुरा । ध्या यस्य जपो नित्यं क्रियते राघवरूप हि । १३८॥ सोऽयं स्त्रीविरहादद्य मूढोवद्भ्रमते वने । तवेति वचनं श्रुत्वा तदा त्वामनुवं त्वहम् ॥१३९॥ देवि साक्षान्महाविष्णुश्चैष रामो वहात्मने । शिक्षार्थ सकलाँल्लोकान् मूढवद्भ्रमते वने ॥१४०॥ नार्यांसगो नरेस्त्याज्यः सर्वदाऽवेति शिक्षयन् । स्त्रीविषयज दुःसमीरस्य चमत्कारकम् । १४१॥ दर्शयन् सकलाँल्लोकानिति मांड्वाटते वने । इति मद्वचनं श्रुत्वा तन्परीक्षार्थमुद्यता ॥१४२॥

यहाँ पाषाणभूमि, पथरीली चरणा, वा रामबाणसे निवृत्त हुआ मृग गिरा था ॥ १२१-१२५ ॥ उसका चिह्न वहाँ आज भी मनुष्योंको दिखाई देता है । मुनिप्रणव लक्ष्मणके धनुष द्वारा खींचा हुआ रेख पञ्चवटीके चारो बार आज भी भयानक नदीरूप धारण हुए स्पष्ट दिखाई देता है । उस पाषाणमयी भूमिमे रावणका बड़ा भारी पदचिह्न एक बड़े भारी गड्ढेके रूपमे अब भी दिखाई दे रहा है। पड़ने करके वाण युद्ध करनेके समय पञ्चवटाम विदेहजा सीताको जिस गुफाम उनके पति रामने छिपाया था, वह भी विद्यमान है। * देवि ! सज्जन तथा ज्ञानी महात्माओको सदैव राम लक्ष्मणका वहीं दर्शन होता है और सामान्य स्थापित लोगों इस समय भ.. दिखाई देते है ॥ १२६-१३० ॥ जिस पवनपर रामने शय्या निर्माण करके सीताके साथ शयन किया था वह रामशय्यागिरिके नामस प्रसिद्ध है ॥ १३१ ॥ वहाँके तृण आज भी शय्याकार दिखाई देते है । इधर गगन लक्ष्मणको आया देखा तथा उनके मुखसे सीताके कष्ट हरणनेको सुना । १३२ ॥ यह सब वृत्त लक्ष्मणने क्रोधपूर्वक आँसू बहाते हुए तथा विस्मयके साथ कहा था । राम बारा बार अत्यन्त भयानक शकुनोंको देख तथा घबराकर शीघ्र ही पञ्चवट म गये तो वहाँ सीता नहीं दिखाई दी । पश्चात् मनुष्यभावसे वे समस्त वनके पशु-पक्षी वृक्ष वृक्षों आदिसों सीताका पता पूछन और सीताको सर्वत्र ढूंढने लगे । इतनेमें गृध्रराज जटायु दिखाई दिया । उस पक्षीके मुँहसे सुना कि रावण प्रिया सीताका हरण कर ले गया है ॥ १३३-१३५ ॥ मरणोपरान्त जटायुके कथनानुसार रामने उसका अग्निसंस्कार किया । उसकी शान्ति तथा तृप्तिके लिए रामने वन्य मृग आदिके मांससे पिण्डदान किया और स्नान आदि क्रिया की ॥ १३६ ॥ पश्चात् सर्वेश्वर राम मूढ पुरुषकी तरह सीताको खोजते हुए दक्षिणकी ओर चले । रास्ते में तृण अभावमे कुशाकी सीता बनाकर उषाके साथ रामने अग्निहोत्र किया ॥ १३७ ॥ इसी बीच हे देवि पार्वती ! तुमने मुझसे प्रश्न किया था-हे प्रभो ! आप जिसपत्ति जिन रामका नाम जपा करते हैं ॥ १३८ ॥ वही राम स्वार्क विरहसे मूढकी तरह वनमे मारे-मारे फिर रहे हैं । तुम्हारा यह वचन सुनकर मैने तुमसे कहा- ॥ १३९ ॥ हे देवि ! यह साक्षात् विष्णु भगवान् राम बनकर पूर्वोक्तमण्डलके संगोंको शिक्षा देनेके लिए वनमें मूढकी तरह भ्रमण कर रहे हैं ॥ १४० ॥ वे सबको यह उपदेश देते हैं कि मनुष्यको स्त्रीमे आसक्त नहीं होना चाहिए । स्त्रीविषयक आसक्ति ऐसे ही दुःख

७०आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

त्वं गताऽसि समीपं श्रीराघवस्य तदा वने । सीमारूपेण तं रामं त्वया प्रोक्तं शुभं वचः ॥१४३॥
राम राजीवपत्राक्ष मामग्रे पश्य जानकीम् । क्रीडन्वाऽत्र मया सार्धमेहि शीघ्रं सुखी भव ॥१४४॥
इत्युक्तो राघवः श्रुत्वा विहस्य त्वां वचोऽब्रवीत् जानाम्यहं त्वां काऽसीति सीतान्वं नसि वेद्म्यहम् १४५
त्वं किं सीतास्वरूपेण मोहयस्यत्र मां वने । एवं पुनः पुनः प्रोक्ता यदा त्वं राघवेण हि ॥१४६॥
तदा त्वया तत्स्वरूपं तत्त्वं सत्यं मयेरितम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं प्रार्थयित्वा पुनः पुनः ॥१४७॥
आगताऽसि पुनर्मां त्वं कैलासशिखरेऽमले । त्वं का त्वं किमिति प्रोक्ता राघवेण पुनः पुनः ॥१४८॥
या त्वं सा दंडके जाता म्बिकानाम्नांबिका वने । त्व लज्जिताऽसि शंभोण यत्र तत्र त्वय स्थले ॥१४९॥
वस्त्रलापुरनाम्नाऽभून्मन्नगरं दंडके वने । ततस्तौ रामसौमित्री जग्मतुर्दाक्षणां दिशम् ॥१५०॥
बहवो निहता मार्गे राक्षसा घोररूपिणः एतस्मिन्नन्तरेऽरण्ये कबन्धेन धृतौ तदा ॥१५१॥
श्रीरामलक्ष्मणौ मार्गे योजनायतबाहुना । दृष्ट्वं तं शिरसा हीनं बाहू विच्छेदतुर्मुदा ॥१५२॥
ततः स दिव्यरूपोऽभून्नत्वा रामं वचोऽब्रवीत् । पुरा गन्धर्वराजोऽहं ब्रह्मणो वरदानतः ॥१५३॥
केनाप्यवध्यस्त्वद्यस्यहस्यमणारके मुनीश्वरम् । रक्षो भवेति शप्तोऽहं मुनिना प्राह मां पुनः ॥१५४॥
त्रेतायुगे यदा रामलक्ष्मणौ योजनायतौ । छेत्स्यतस्ते महाबाहू तदा शापान्प्रमोक्ष्यसे ॥१५५॥
ततो राक्षसरूपेणाहमिन्द्रमभ्यद्रवं रुषा । सोऽपि वज्रेण मां राम शिग्देशे क्षताडयत् ॥१५६॥
तदा कुक्षौ शिरःपादयुगलं च गतं क्षणात् । अबद्धस्तन्मन्मुखभृन्मे वज्रताडनात् ॥१५७॥
मुखाभावं कथं जीवेदयमित्यभ्रगाधिपः । दृष्ट्वा मां प्राह कृपया जठरे ते मुखं भवेत् ॥१५८॥
बाहू ते योजनायामावद्य शीघ्रं भविष्यतः । तदत्तवशात्र राक्षस्या लब्ध तद्भक्षयाम्यहम् ॥१५९॥

तया अन्यत्र कारण बदता है ॥१४१॥ इन बातोंका जनकने तथा सीताका शिक्षा देनके लिए राम वनमें इधर-उधर भ्रमण कर रहे हैं। मेरे इस उत्तरको सुनकर तुम उनके पास, लेनका उद्यत हुई ॥१४२॥ उस समय तुम सीताका रूप बनाकर श्रीरामके पास गयी और उनसे कहा- ॥१४३॥ हे कमलसदृश नेत्रोंवाले राम ! अपने सामने खड़ी मुझ जानकीको देखो। आओ, मेरे साथ इस वनमें क्रीडा करके सुख प्राप्त करो ॥१४४॥ तुम्हारे कथनको सुनकर राम हंसे और कहा मैं जानता हूं कि तुम कौन हो ॥१४५॥ आर्य सीताका रूप धारण करके मुझ बनमें क्यों भटका रही हो ? इस प्रकार जब रामने बारम्बार कहा ॥१४६॥ तब तुमने मेरे कहनेके अनुसार रामका वास्तविक स्वरूप पहिचाना और उनकी पुनः पुनः प्रार्थना करके क्षमा मांगी ॥१४७॥ १४८॥ तदनन्तर तुम रमणीक कैलास पर्वतके शिखरपर मेरे पास लौट आयीं। जहाँपर रामने तुमसे पूछा था कि तुम कौन हो ? यहाँ क्यों आयी हो और तुम्हारे नामकी अम्बिका तो दण्डकारण्यमें रहती है। यह सुनकर तुम लज्जित हुईं। जिससे वहाँपर लज्जापुर नामका एक नगर बस गया। तदनन्तर वे राम-लक्ष्मण दक्षिणकी ओर चल दिये ॥१४९॥ १५०॥ उन्होंने मार्गमें बहुत-से घोर राक्षसोंको मारा। इसी जङ्गलमें कबन्धने उन दोनोंको पकड़ लिया ॥१५१॥ उसके चार-चार कोसके लम्बे हाथ थे उसे सिरसे रहित देखकर उनके दोनों हाथ राम-लक्ष्मणने काट डाले ॥१५२॥ तब वह दिव्य रूप धारण करके नमस्कारपूर्वक रामसे कहने लगा-पहले मैं गन्धर्वोंका राजा था। ब्रह्मा ने मुझे वर दिया था कि तुमको कोई नहीं मार सकेगा। इस गर्वमें मैं एक दिन मुनीश्वर अष्टावक्रका रूप देखकर हंस पड़ा। इसपर उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझको शाप दिया कि तू राक्षस हो जायगा। मेरे प्रार्थना करनेपर फिर वे बोले- ॥१५३॥ १५४॥ त्रेता युगमें जब राम-लक्ष्मण तेरी इन योजन भर विस्तारवाली भुजाओंको काटेंगे, तब तू शापसे मुक्त हो जायगा ॥१५५॥ राक्षस होकर एक दिन मैंने इन्द्रके ऊपर धावा किया। उन्होंने कुपित होकर मेरे मस्तकपर वज्र मारा ॥१५६॥ जिससे मेरा सिर और दोनों पाँव पेटमें घुस गये। परन्तु ब्रह्मा का वरदान प्राप्त रहनेसे मेरी मृत्यु नहीं हुई ॥१५७॥ तब मैंने देवताओंके अधिपति इन्द्रसे प्रार्थना की कि मैं बिना मुखके किस प्रकार जी सकूँगा। तब उन्होंने कृपा करके कहा कि जा, तेरे पेटमें मुख हो जायगा ॥१५८॥

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् ७१

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् ७१


तिष्ठन्त्यग्रे मतंगादिमुनीनां परिचारिकाः । शबरीदर्शनार्थं त्वं तत्र याहि रघूत्तम ॥ १६०॥
कथयिष्यति सा सीताशुद्धिं ते रघुनंदन । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा स्तुत्वा स्वर्गं ययौ मुदा ॥ १६१॥
ततो रामो लक्ष्मणेन शबरीसंनिधिं ययौ । साऽपि संपूज्य श्रीरामं विकैशैर्वनसंभवैः ॥१६२।
चितामारोढुमुद्युक्ता राघवं प्राह हर्षिता । ऋष्यमूकगिरावग्रे सुग्रीवो मंत्रिभिः सह ॥१६३।
वर्तते तस्य सख्येन सीताशुद्धिं लभिष्यसि । गच्छ राम इतस्त्वमद्य पंपानाम सरोवरम् ॥१६४।
तत्तटाके तु वृक्षाणां फलानि विविधानि च । भक्षस्व त्वं जलं पीत्वा याहि सुग्रीवसंनिधिम् ॥१६५॥
इत्युक्त्वा शबरी रामं नत्वा वह्निं विवेश सा । रामसंदर्शनान्मुक्तिं प्राप्ता वैकुण्ठमाययौ ॥ १६६।
ततो रामः शनैर्भ्रात्रा ययौ पंपासरोवरम् । फलानि भक्षयामास पीत्वा तज्जलमुत्तमम् ॥ १६७॥
ततः शनैर्ययौ मार्गे ऋष्यमूकाचलं प्रति । पश्यन्वनानि सर्वत्र चिंतयामास जानकीम् ॥१६८।
एवं गिरिंद्रजे प्रोक्तमारण्यं चरितं मया । श्रीरामस्य ससीतस्य लक्ष्मणेन युतस्य च ॥१६९॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे कबन्धवधो नाम सप्तमः सर्ग ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( राम-सुग्रीवमैत्री और बालिवध )

श्रीशिव उवाच

अथ रामो लक्ष्मणेन ऋष्यमूकाचलं प्रति । ययौ धृतधनुर्बाणो नेत्रे सर्वत्र चालयन् ॥ १ ॥
ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वं गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ । सुग्रीवेणाथ तौ दृष्टौ ऋष्यमूकस्थितेन हि ॥ २ ॥
सुग्रीवस्तो तदा दृष्ट्वा चतुर्भिर्मंत्रिभिर्वृतः । संमंत्र्य मारुतिं प्राह वालिना प्रेषितावुभौ ॥ ३ ।

शीघ्र ही तेरे हाथ भी गाजन-रोशन भर लम्बे हो जायेंगे । तबसे मैं जो कुछ इन हाथोके बीच आ जाता है, खा लेता हूँ ॥ १५९ । यहाँसे आगे मतङ्ग आदि मुनियोंकी परिचारिकायें रहती हैं । हे रघूत्तम ! आप वहाँ जाकर शबरीसे मिलें । १६० । हे रघुनन्दन ! वह आपको सीताका पता बतायेगी । इतना कहकर उसने रामकी स्तुति की और नमस्कार करके वह सानन्द स्वर्गको चला गया ॥ १६१ ॥ तदनन्तर राम लक्ष्मणको लेकर शबरीके पास गये । शबरीने वनके अच्छे-अच्छे पुष्पों तथा फलोंसे उनका पूजन-सत्कार किया ॥१६२॥ बादमें चितारोहण करते समय हर्षपूर्वक वह रामसे बोली कि आगे ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर मन्त्रियोंके साथ सुग्रीव रहता है । १६३ ॥ उसकी मित्रता प्राप्त करनेसे आपको सीताका पता मिल जायगा । हे राम ! आप यहाँसे चलकर पंपासरोवर जायें ॥ १६४ । उसके किनारेपर लगे हुए वृक्षोंके विविध फल खा तथा जलपान करके आप सुग्रीवके पास जाइएगा ॥ १६५ ॥ इतना कहकर शबरीने रामको प्रणाम किया और अग्निमें प्रवेश कर गयी । इस प्रकार रामके दर्शनमात्रसे मुक्त होकर वह वैकुण्ठधाम सिधारी । १६६॥ तदनन्तर राम भाई लक्ष्मणके साथ पंपासरोवर गये । वहाँके सुन्दर फल खाकर सरोवरका निर्मल जल पिया ॥ १६७ ॥ पश्चात् धीरे-धीरे ऋष्यमूक पर्वतकी ओर चले । रास्तेमें चारों ओर हरे-भरे वनोंकी शोभा देखकर राम बारम्बार जानकीका स्मरण करने लगे, १६८। हे गिरीन्द्रजे ! यह मैने तुमको सीता लक्ष्मण तथा श्रीरामका किया हुआ चरित्र कह सुनाया । १६९ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीशिवजी बोले—हे प्रिये ! इस तरह राम हाथमें धनुष बाण लिये और नेत्रोंसे चारों ओर देखते हुए लक्ष्मणके साथ ऋष्यमूक पर्वतके पास पहुँचे । १ ॥ वहाँ शिखरपर बैठे सुग्रीवने पर्वतके पास आते हुए राम-लक्ष्मणको देख लिया । २ ॥ उन्हें देखकर सुग्रीवने अपने चारों मन्त्रियोंको बुलवाया और उनसे मन्त्रणा

७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

मां हन्तुं धृतकोदण्डौ वलगुशौरो नराकृती । इतोऽस्माभिः प्रगन्तव्यं मन्त्रं शृणु मयोच्यते ॥४॥
गच्छ जानीहि भद्रं ते वटुरूपेण द्विजाकृतिः । ताभ्यां संभाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः ॥५॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः । साधुत्वे स्मितवक्त्रोऽभूरथ जानीहि निश्चयम् ॥६॥
तथेति वटुरूपेण गत्वा नत्वा रघूत्तमम् । कौ युवां पुरुषव्याघ्राविति पप्रच्छ मारुतिः ॥७॥
तदन्तं लक्ष्मणः प्राह पूर्ववृत्तं सचिस्तरम् । शबर्यानयनाद्रामः सख्यं कर्तुं समागतः ॥८॥
सुग्रीवनाथ तच्छ्रुत्वा स्वरूपं मारुतिस्तदा । चकार नैजं प्रकटं स्वीयं वृत्तं न्यवेदयत् ॥९॥
मत्स्कन्धमधिरूढ्वाद्य पर्वतं गन्तुमर्हथः । तथेति मारुतेः स्कन्धे मध्विनौ तौ बभूवतुः ॥१०॥
उपत्यात गिरेर्मूर्द्धिन क्षणादेव महाकपिः । वृक्षच्छायां समाश्रित्य तौ स्थितौ रामलक्ष्मणौ ॥११॥
सुग्रीवं मारुतिर्गत्वा रामवृत्तं न्यवेदयत् । ततः प्रज्वाल्य वह्निं स सुग्रीवो राघवेण हि ॥१२॥
चकार सख्यं येनेन समालिङ्ग्य परस्परम् । वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टरार्थं ददौ कपिः ॥१३॥
हर्षण महताविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे । लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं सुग्रीवं वृत्तमन्दमनः ॥१४॥
तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं सुग्रीवः स्वं न्यवेदयत् । मखे गणय्व मे वृत्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥१५॥
मयपुत्रो दुर्मदश्च किष्किन्धामेकदा गतः । कृत्वा स दीर्घशब्दं तु वालिनं समुपाद्वयत् ॥१६॥
तं श्रुत्वा निर्ययौ वाली जघान दृढमुष्टिना । दुद्राव तेन संविद्गो जगाम स्वगुहां प्रति । १७।
अनुद्रुद्राव तं वाली वालिपृष्ठे त्वहं गतः । बालो ममाह तिष्ठ त्वं बर्हिगच्छाक्यहं गुहाम् । १८।
हन्तुमन्त्राऽऽविश्य मगुहां मासमेकं न निर्ययौ। गुहाद्दान्गन्मया रक्तं निर्गतं सभिगीक्ष्य च । १९।

करके हनुमानसे कहा कि इन दोनोंको वालीने भेजा है, ऐसा ज्ञात होता है ॥ ३ ॥ ये दोनों नररूप धारण कर धनुष बाण हाथ लेकर मुझे मारने आ रहे हैं। इस कारण हम लोगोंको यहाँसे कहीं अन्यत्र भाग जाना चाहिये। अथवा तुम मेरा बात मानो और ब्राह्मणका रूप धारण करके ब्रह्मचारी बनकर उनके पास जाओ और उनके साथ बातचीत करके उनके हृदयका अभिप्राय जान लो ॥ ४ ॥ यदि उनके हृदयका विचार दूषित हो तो पहले हाथके इशारेसे संकेत करना और यदि उनका विचार उत्तम हो तो हँसकर मेरी ओर निहारना । बस यही संकेत निश्चित है, याद रखना ॥ ५ ॥ ६ ॥ तदनुसार हनुमान् 'बहुत अच्छा' कह और ब्रह्मचारीका रूप धारण करके रामके पास गये और नमस्कार करके कहा-'पुरुषोंमें सिंहके समान आप लोग दोनों कौन हैं ?' तब लक्ष्मणने उनसे अपना सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया और कहा कि शबरीके कहनेसे हम सुग्रीवके साथ मित्रता करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ यह सुनकर हनुमान्ने अपना असली स्वरूप प्रकट किया और अपना भी सब हाल कह सुनाया ॥ ९ ॥ साथ ही यह भी कहा कि आप दोनों मेरे कन्धेपर बैठकर पर्वतपर चलें । 'तथास्तु' कहकर वे दोनों मारुतिके कन्धेपर चढ़ गये । १० ॥ महाकपि हनुमान्जी कूदकर क्षणभरमें पर्वतके शिखरपर आ गये वहाँ राम-लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें बैठे ॥ ११ ॥ हनुमान्ने जाकर रामका सब समाचार सुग्रीवको कह सुनाया । पश्चात् सुग्रीवने अग्नि जलायी और उसे साक्षी बनाकर रामके साथ शीघ्र मित्रता कर ली और परस्पर वे दोनों गले मिले तब स्वयं सुग्रीवने अपने हाथोंसे वृक्षकी शाखा तोड़कर रामको बिछानेके लिये दे दी। तब सब लोग प्रसन्न हुए और बैठ गये। लक्ष्मणने अपना सब वृत्तान्त सुग्रीवको सुनाया ॥ १२-१४ ॥ वह सुनकर सुग्रीवने भी अपना सब हाल बताते हुए कहा-हे सखे ! पूर्वमें वालिने मेरे साथ जो कुछ किया है, वह सब आप सुन लें ॥ १५ ॥ एक समय मय दानवका पुत्र दुर्मद किष्किन्धा नगरीमे गया। वहाँ जाकर वह जोरसे चिल्लाया और बालिको युद्धके लिये ललकारा ॥ १६ ॥ सो सुनकर बालि बाहर आया और दुमदका बहुत जोरों एक मुक्का मारा। इससे घबराकर वह अपनी गुफाकी ओर भागा ॥ १७ ॥ उसके पीछे बालि और बालिके पीछे मैं भी भागा। वहाँ जाकर बालिने मुझसे कहा कि तुम बाहर खड़े रहो, मैं गुफाके भीतर जाता हूँ ॥ १८ ॥ यदि एक महीनेमें मैं बाहर न आऊँ तो मुझे मरा समझ लेना। ऐसा कहकर वह गुफामें चला गया। उसके कथनानुसार एक महीना बीत गया,

सर्गः ८] सारकाण्डम् ७३

सर्गः ८] सारकाण्डम् ७३

निश्चितं मनसा वाली दुर्मदेन हतस्त्विति । एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा किष्किन्धां विपुवेदिताम् ॥१६॥ गुहाद्वारे शिलामेकां निधाय दुर्मदस्य च । यन्मतो मार्गरोधार्थं किष्किन्धामगमं स्वयम् ॥१७॥ मां दृष्ट्वा रिपवः सर्वे वेगाच्चक्रुः पलायनम् । अनिच्छतं मन्त्रिणो मां तद्राज्ये समवेशयन् ॥२०॥ ततो दृष्ट्वा रिपुं वाली दृष्ट्वा मां स्वपदस्थितम् । संताड्य नगरान्मां स बहिर्न्यष्कासयत्तदा ॥२३॥ ततः स सर्वदेशेषु वादयामास दुन्दुभिम् । भूपां सुग्रीवपाता यः स वध्यो भवेदिति ॥२४॥ ततो लोकान्वरित्यज्य ऋष्यमूकं मयाऽऽश्रितः । एकदा दुन्दुभिर्नाम दैत्यो महिषरूपधृक ॥२५॥ युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत वीर्यवान् । ततो वाली समागम्य धृत्वा शृंग करेण तु ॥२६॥ हस्ताभ्यां सन्विभञ्जिच्छित्वात्रोत्थिप्याऽक्षिपद्द्रुति। पतितं तच्छिरो रात्रौ मतङ्गाश्रममात्रतः ॥२७॥ रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यामन्तःकोधादथर्षन्दधा। यद्यागतोऽसि मे वालिन् गिरिं शीघ्रं ममापये ॥२८॥ एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ । प्रतिज्ञां ते करोम्यद्य सीतां चात्र समानये ॥२९॥ यदा नीता रावणेन तदा दृष्टा मयाऽत्र खे । बद्ध्वोत्तरीये क्षिप्तानि पश्य त्वं भूषणानि हि ॥३०॥ इत्युक्त्वा दर्शयामास सुग्रीवो भूषणानि हि । तानि दृष्ट्वाऽब्रवीद्वन्धुं रामस्येव निश्चय वद ॥३१॥ न्याराण्यानि सीतायास्तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत् । न वेद्म्यहं ममस्थानं वेधयन्नुलितानि हि ॥३२॥ वदने यानि दृष्टानि मया नित्यं स्पृदह । ततो रामोऽतिमन्तुष्टो लज्जां सीतायमन्वयत् ॥३३॥ सुग्रीववचनाद्रामः प्रत्ययार्थं तदा क्षणात् । पादांगुष्ठेनाक्षिपत्तद्दुन्दुभेः शिर उत्तमम् ॥३४॥

किन्तु वह बाहर नहीं आया । मैंने जब गुहामें निकलता हुआ रुधिर देखा तब मनमें विचार कर कि दुर्मद दानवने वालीको मार डाला । उसी समय यह सुनकर कि शत्रुने किष्किन्धाको घेर लिया है मैंने गुहाके द्वारपर एक बड़ा भारी शिलाखण्ड रख दिया और निश्चय कर लिया कि अब दुर्मदका मार्ग रुक गया है । वह यत्न करके भी बाहर नहीं निकल सकेगा । तब मैं अपनी किष्किन्धा नगरीमें चला आया ॥१६-२१॥ मुझे देखनेके साथ ही सब शत्रु भाग गये और मेरी इच्छा न रहनेपर भी मन्त्रियोंने मुझे गद्दीपर बैठा दिया ॥२२॥ पश्चात् वाली भी शत्रुको मारकर घर आया और मुझ अपने पदपर बैठा देखा ता मुझको पीटकर उसी समय नगरसे बाहर निकाल दिया । २३॥ साथ ही सब देशोंमें उसने डिण्डोरा पिटवाकर कहला दिया कि जो कोई सुग्रीवको शरण देकर क्षमा करेगा, वह मेरा अपराधी होगा और मार डाला जायगा ॥ २४ ॥ तदनन्तर सब देशोंमें घूमकर मैंने इस ऋष्यमूक गिरिका आश्रय लिया यहाँकी कथा यह है कि एक दिन दुन्दुभि नामक दैत्य भैंसका रूप धरकर रात्रिके समय बालके यहाँ गया और उसको युद्धके लिये ललकारा । तब वह आकर अपने हाथसे उसकी सींग पकड़ लिया और खींचकर उसका शिर धडसे उखाड़लिया पुनरपि दूर फेंक दिया जिससे उसका वह शिर मतङ्ग ऋषिके आश्रममें जा गिरा ॥ २५-२७ ॥ इससे मतङ्गऋषिके ऊपर भी रुधिर गिरा । तब उन्होंने कुपित होकर इस बातपर शाप दिया कि 'अरे वालिन् यदि मेरे पर्वत तथा आश्रमके पास तू आवेगा तो तुरन्त मर जायगा' ॥ २८ ॥ इस शापसे डरकर वाली यहाँ कभी नहीं आता। हे राम ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपकी भार्या हो ले आऊँगा ॥ २९ ॥ जब रावण उनको ले जा रहा था, तब यहीं बैठे हुए मैंने आकाशमें देखा था। उस समय सन्तान अपनी साड़ीमें बाँधकर कुछ आभूषण नीचे फेंक थे। वे यहाँ हैं, आप उसे देखें ॥ ३० ॥ इतना कहकर सुग्रीवने वे आभूषण दिखलाये । उन्हें देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- हे भाई ! तुम इन्हें देखकर ठीक ठीक बतलाओ कि ये जानकी के हैं या नहीं। बड़े कृतज्ञतासे जानकीके आभूषण देख ही रहा है। यह सुनकर लक्ष्मणने कहा कि मैं सबको तो नहीं पहचानता, परन्तु पाडकी अँगुलीके नूपुरके वाक्य अवश्य कह सकता हूँ कि ये सीते के ही हैं। कारण कि मैन प्रणाम करते समय केवल उनके पाँव देखे हैं-अन्य अङ्ग नहीं देखा। यह सुनकर राम प्रसन्न हुए और 'अब सीता मिल गयी' ऐसा समझा ॥ ३१-३३ । तदनन्तर सुग्रीवका विश्वास दिलानेके लिए उसी समय रामने अपने पाँवके अँगूठेसे मारकर दुन्दुभीके बड़े विशाल सिरको

७४आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

दशयोजनपर्यन्तं तथा बाणेन वै पुनः । चक्राकारान् सप्त तालान् दृष्ट्वा देहे महोः प्रभुः ॥३५॥
स्वोयांशुष्ठेन पीमितैः पदं किंचिद्विपर्य्ययम् । ऋजुं कृत्वा पन्नगं तं शेषांशेन स्थित भुवि ॥३६॥
सुग्रीवप्रत्ययार्थं हि सप्त तालान् बिभेद सः । गुहायामर्कदा तालफलादि स्थापितनि हि ॥३७॥
बलिना मम नीतानि तेन सर्पं ददर्श सः । नमश्चपञ्चापि वृक्षाश्च भविष्यन्तीति वानरः ॥३८॥
सर्पिण्याहृद्य तान् छेत्ता यस्ते हन्ता न संशयः तद् दृष्ट्वा रामसामर्थ्यं तस्मिन्प्रत्ययमाप सः ॥३९॥
सुग्रीवस्त पुनः प्राह राघवं तुष्टमानसः वालिन सुगनाधेन पुरा दत्ताऽस्ति मालिका ॥४०॥
यां दृष्ट्वा रिपवो युद्धे गनवीर्या भवन्ति हि । या पुरा कश्यपेनैव तपसा दूकरण च ॥४१॥
शिवाल्लब्धा पिता पुत्रमिन्द्रं सेनापि वालिने । प्रीत्या दत्ता मालिका सा चल कण्ठे दधान्यसौ ॥४२॥
तस्यास्त्वं दर्शनाद्राम शत्रुमग्णो भविष्यसि तत्रापायं विन्त्यस्व येन तेऽद्य जयो भवेत् ॥४३॥
तस्यैवं वचनं श्रुत्वा रामः सर्प तमब्रवीत् । यः शामन्मोचनः पूर्वं मम नालेनबिभ्य च ॥४४॥
गच्छ त्वं मम शापेन किष्किन्धायां भयालिनम् । निर्भयो निद्रितं दृष्ट्वा हर तन्मालिकां शुभाम् ॥४५॥
तथैव रामवाक्येन किष्किन्धांपेत्य पन्नगः मचकण्ठा सम्हृत्य ता मालां वायवे ददौ ॥४६॥
ततो रामाज्ञया गत्वा समाहूयाथ वालिनम् । युद्धं चकार सुग्रीवः श्रीरामोऽपि ददर्श तम् ॥४७॥
समानरूपौ तौ दृष्ट्वा मित्रघातविशङ्कया न मुमोच तदा बाणं गमः सोऽपि न्यवर्त्तत ॥४८॥
सुग्रीवो राघवं प्राह मां घातयसि वालिना । यदि मद्वधनं वाञ्छा त्वमद्य जहि मां विभो ॥४९॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य रघूत्तमः । बन्धय मास सुग्रीवकण्ठे मालां तु बन्धुना ॥५०॥


दूर फेंक दिया ॥ ३४ ॥ वह दस योजनकी दूरीपर जा गिरा। फिर आकाशमें सबने गोलाकार जमे हुए सात तालवृक्षोंको देखा तब रामने पृथ्वी पर शेषके अंशसे स्थित पन्नगके नीचेका अपना पाँवके अङ्गूठेसे दबाकर उस सर्पको सीधा किया और बाणसे उन सात वृक्षोंको एक ही बारमें काट डाला ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ऐसा करके उन्होंने सुग्रीवका विश्वास दिलाया कि राम में सहायता करने और वालीको मारनेमें समर्थ हैं। तब समयकी बात है कि वालीने अपनी गुफामे तालके कुछ फल रक्खे थे। उन्होंने नागफण कोई उठा ले गया। वालीने कहा तो उस गुहाँ फलोंको ज्योंका त्यों लाके रख दिया। तब नागाने सुग्रीवको शाप दे दिया कि सा तेरो ऊपर सात ताल वृक्ष उगेंगे ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तब सर्पने भो कहा कि जो इन वृक्षोंको काटेगा, वही तुम मारेगा -इसमें सन्देह नहीं है। इसी सामर्थ्यको आज राममें देखकर सुग्रीवको विश्वास हो गया ॥ ३९ ॥ तब प्रसन्न होकर सुग्रीवने कहा- पूर्वसमयमें इन्द्रने वालीको एक माला दी थी, ४० ॥ जिसे देखकर इसके शत्रु युद्धमें बलहीन हो जाते हैं। कठिन तपस्या तय करनेपर वह माला कश्यपको शिवजीसे मिली थी। कश्यपजी से वह अनमोल पुत्र इन्द्रको दी और इन्द्रने वालीको अर्पण की। प्रीतिपूर्वक अर्पित की हुई उस मालाको बाली सदा गलेमें पहिने रहता है ॥ ४१, ४२ ॥ हे राम ! उसको देखकर शायद आप भी कर्महीन हो जावेंगे। अतएव इस विषयमें कोई उपाय सोचिए जिससे आपकी विजय हो ॥ ४३ ॥ सुग्रीवके इन वचनोंको सुनकर राम, जिसको बाणके द्वारा सात तालवृक्षोंको काटकर शापसे मुक्त किया था उस सर्पसे कहा कि तुम मेरे कथनानुसार किष्किन्धा-में जाकर रात्रिके समय जब कि बाली सोता रहे तब इसके गलदेशसे उस सुन्दर मालाको चुरा लाओ ॥ ४४ । । ४५ । 'तथास्तु' कहकर वह साँप रामके आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नगरीमें गया और चुपचाप से उस मालाको चुराकर इन्द्रको दे आया ॥ ४६॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे सुग्रीवने बालीके पास जाकर उसको युद्ध के लिये ललकारा और युद्ध किया। उस युद्धको राम देख रहे थे किन्तु उन दोनों भाइयोंको समान रूपवान् देख धोखेसे कहीं मित्र सुग्रीव ही न मारा जाय इस आशङ्काके कारण रामने बालीपर बाण नहीं छोड़ा। तब सुग्रीव रामके पास लौट आया और रामसे बोला कि मुझे आप वालीके हाथों क्यों मरवाना चाहते हैं? यदि मुझे मारनेकी ही इच्छा हो तो हे विभो ! आप ही मार डाल ॥ ४७-४९ ॥ सुग्रीवके इस वचनको सुनकर

सर्गः ८ ] सारकाण्डम् [ ७५

पुनस्तं प्रेषयामास सोऽपि वालिनमाह्वयत् । ततः श्रुत्वा ययौ वाली तं ताराऽप्रार्थयत्तदा ॥५१॥
सुग्रीवस्याङ्कितेन भ्राता रामः समागतः । चकार मैत्रीं किं तेन मा कुरुष्वाद्य संगरम् ॥५२॥
गच्छ नत्वा रमानायं बन्धुं मानय सादरम् । यौवराज्यपदं देहि तन्मे वचनं शृणु ॥५३॥
तत्तारावचनं श्रुत्वा वाली तां श्लक्ष्णमब्रवीत् । जानाम्यहं राघवं न नररूपधरं हरिम् ॥५४॥
तस्य हस्तान्मुक्तिमस्मि गच्छामि परमं पदम् । तूष्णीं त्वं तिष्ठ तारेऽत्र सुग्रीवं भज मन्मदा ॥५५॥
यदा त्वया म सुग्रीवः कल्पितां गति विधेये । तदा त्वत्पाणिग्राहस्यानुष्यं गच्छामि भामिनि ॥५६॥
अत एव मालिका मे गुञ्जाऽऽभूषयदस्य सन्प्रिये । अद्याहं रामबाणेन पातिष्यामि रणाङ्गणे ॥५७॥
अद्य धन्याऽस्म्यहं तारे धन्यौ नौ पितरौ मम । योग्यं श्री रामहस्तेन मरिष्यामि रणाङ्गणे ॥५८॥
एवमाश्वास्य तां मार्गं ययौ वाली त्वरान्वितः । दृष्ट्वा वाली महोत्पातान् सन्तोषं परमं ययौ ॥५९॥
चकार बन्धुना युद्धं तदा बाणेन राघवः । वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा पातयामास तं भुवि ॥६०॥
ततस्तारा समागत्य शुशोच वालिनं प्रति । रामं दृष्ट्वा रमानायं तदा प्राह स गद्गदः ॥६१॥
वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा मय्याऽर्के तद्दिने हृदि । स्वाद्य दृष्ट्वा जनं मम जातो महोदयः ॥६२॥
किं मयाऽपकृतं ते हि त्वया यन्माऽसि पातितः । रामः प्राह वालिनं त्वं रूमाया लम्पटः सदा । ६३।
बन्धुभार्यां गृहे स्थाप्य बन्धु हन्तुं त्वमिच्छसि । दूषणं म्ना समालोक्य मया त्वन्माऽसिपातितः ॥६४॥
यथा त्वया रुमा भुक्ता तथा तारां तव प्रियाम् । भोक्ष्यत्यद्य हि सुग्रीवो वचनान्मे कपीश्वर । ६५।
यद्यपि त्वं दुराचारो निहतोऽसि रणे मया । तथापि भिल्लरूपेण द्वापरान्तेऽथवाऽथ मन ॥६६॥
भित्त्वा प्रभासे बाणेन पूर्ववैरेण वानर । तदा मद्धस्तमरणान्मोक्ष कारणान्मोक्षवाग् ॥६७॥
मुक्तिं गच्छसि त्वं वालिन शुभां जन्मान्तराद्धि हि । ततः प्राह पुनर्वाली मद्धस्तव्यथदुह्यास्तम् ॥६८॥


तब रामने भाई लक्ष्मणके द्वारा उस (द्वन्द्वयुद्धके लिए सुग्रीवको भेजा) । तदनन्तर पुनः लंका युद्ध करनेके लिये नगाड़ा बजवाकर फिर बाली को ललकारा । सुग्रीव का वह नाद सुनकर ताराने प्रार्थनापूर्वक कहा कि, हे नाथ! आपके एक सुग्रीव ही नहीं, बल्कि उनके साथ राम इस समय आये हैं । इसलिये आप प्रभावक साथ मित्रता कर और उनके लिए यौवराज्य पद देकर उनके चरणोंकी वन्दना कर और मेरा कहना मानकर भाई को अपना सादर युवराज पद प्रदान करो ॥५३॥ तारा की बात सुनकर बालीने कहा कि, हे प्रिये ! यदि साक्षात् श्रीभगवान् राम आये हैं तो उनके हाथों यदि मुझे मृत्यु मिले तो परमपद प्राप्त करूंगा । तू यहाँ पर चुपचाप बैठकर उसका ध्यान करना हे प्रिये ! जब तुम सुग्रीवके साथ सोवोगी, तब मैं उसका फलक भोग करूंगा ॥५६॥ अरे भामिनि ! देखो, आज गुंज माला से सजकर सुग्रीव आया है इससे मैं समझता हूँ कि मैं अवश्य ही रामके बाणसे मारा जाऊंगा । ५७ ॥ हे तारे ! मैं तथा मेरे दोनों पितर धन्य हैं कि जो आज श्रीरामके हाथों मरूँगा ॥५८॥ इस प्रकार ताराको समझाकर बाली युद्धके लिये बढ़ा और बहुत उत्पातोंको देखकर प्रसन्न हुआ ॥५९॥ तब अपने भाई सुग्रीवके साथ युद्ध किया । तब श्रीरामने वृक्षकी ओटमें खड़े हो गये और बाली को बाणसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया । तब तारा आकर पति के लिये अत्यन्त विलाप करने लगी। वालीने अपने नगरके स्वामी रामचन्द्रजीको देखकर गद्गद कंठसे कहा - ॥ ६१ ॥ हे नाथ ! आपने जो बाण मुझको मारा है उससे मेरे हृदय में आज आपके दर्शन हुए इससे मेरे लिये तो यह महान् अभ्युदयकी बात है, परन्तु इसपर आपका भारी अपयश होगा ॥६२॥ दूसरा बात यह है कि मैंने आपका कौनसा अपराध किया था, जो आपपर मुझ मारा ? रामने कहा - तू सदा मद्य देवात्मा रुमा में लिप्त रहता था ॥ ६३ । तू छोटे भाईकी पत्नीको अपने घरमें रखकर भाईको मार डालना चाहता था। यह दुराचार देखकर मैंने तुझे मारा है तो भी तू अंतमें भील होकर तू पूर्ववैरको स्मरण करके प्रभासक्षेत्रमें अपने बाणसे मुझे पोढ़ावेगा। तब मरण

७८आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

सीतायुक्तं त्वया पूर्वं क्षणेन रावणेन हि। दत्ताऽभविष्यत्सीताद्य मया तव मया तदा ॥६९॥
अधुना प्रार्थयामि त्वामङ्गदं परिपालय इत्युक्त्वा स तदा वाली जहौ प्राणान् रणाङ्गणे ॥७०॥
अङ्गदेन तदा रामः कारयामास संस्कियाम्। अथ रामं च सुग्रीवो राज्यार्थं प्रार्थयत्तदा ॥७१॥
तमन्तमेव राजानं चकार लक्ष्मणेन सः। अथ वार्षिकमासांश्च वस्तुं रामोऽविचिन्तयत् ॥७२॥
प्रवर्षंणगिरेः प्राप्यशिखरे स्फाटिकोद्भवाम्। रम्यां दृष्ट्वा गुहां रामः पत्रपुष्पसमन्विताम् ॥७३॥
निनाय वार्षिकांन् मासान् चतुरः श्रीरघूद्वहः। एकदा लक्ष्मणः स्नात्वा यावद्रामं समन्ततः ॥७४॥
सात्त्विक्या सीतया युक्तमपश्याद्रामे निर्गतः। सौमित्रिणा वन्दिता सा पुनरंशे लयं ययौ ॥७५॥
एवं नासीत्तदा सीताविप्रयोगो राघवस्य हि। सुग्रीवोऽथ पुरीमध्ये चकार राज्यमुत्तमम् ॥७६॥
एकदा हनुमद्वाक्याद्वानरान् समाह्वयत्। प्रवर्षंणगिरौवसन्तों तांश्च द्वे रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो दृष्ट्वा प्राप्तं शरद्मृतुम्। क्रोधेन प्रेषयामास सुग्रीवाय लक्ष्मणं च सः ॥७८॥
सोऽपि गत्वाऽथ किष्किन्धां भीषयामास वानरान्। आगतं लक्ष्मणं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ॥७९॥
मारुतिं प्रेषयामास सान्त्वनार्थं हि लक्ष्मणम्। स गत्वा तं सान्त्वयित्वा किष्किन्धामानयत्तदा ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे तारां प्रेषयामास वानरः साऽपि गत्वा मध्यकक्ष्यां प्रस्थितं तं ददर्श ह ॥८१॥
लक्ष्मणं सान्त्वयामास वचोभिर्मधुरैर्निजैः। समाहूतानि सैन्यानि समर्थे प्लवगेन हि ॥८२॥
सुग्रीवे च वृथा कोपो मा कार्याऽद्य हि देवर ततो लक्ष्मणहस्ते सा गृत्वा राजगृहं ययौ ॥८३॥
दृष्ट्वा सुग्रीवराजस्तस्मादासन्त् चचाल सः, सुग्रीवं लक्ष्मणः प्राह विस्मृतोऽपि रघूत्तमम् ॥८४॥
वाली येन हतो वीरः स वाणस्त्वां प्रतीक्षत। त्वमद्य वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः ॥८५॥


हाथों मरनेसे आपके सम्बन्धरहित शुभ गतिको प्राप्त हुआ। वालीने फिर कहा-यदि आप मेरे पास आते तो मैं तुरन्त आपका संशाका बना रवाना तथा रावणन संशाको लाकर छीन आपकेम आपको दे देता । ६४-६९ ॥ अपुनु अब में प्रार्थना करता हूँ कि आप अङ्गनदकी रक्षा कीजिएगा। इतना कहकर वालीने उसी समय रणाङ्गणमें प्राण छोड़ दिया ॥ ७० ॥ तदनन्तर रामने अङ्गदसे उसका क्रियाकर्म कराया। बादमें सुग्रीवने रामसे वह राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना की ॥ ७१ ॥ तब रामने लक्ष्मणको भेजकर सुग्रीवको वहाँ- का राजा बना दिया अब राम वरषाऋतुमें कहीं चातुर्मास निवास करनेका विचार करने लगे ॥७२॥ तद्नुसार उन्होंने वहाँ प्रवर्षणगिरिके उस शिखरपर सुन्दर पत्तों-पुष्पोंकी लताओंसे वेष्टित एक रमणीक गुफा देखी ॥ ७३ ॥ बस, राम वहाँ रहकर धोमार्क चार महीने बिताने लगे। एक दिन लक्ष्मण स्नान करके जब आये तो रामको मनोहरायसी सीताके युक्त देखा। लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम किया तैसे ही सीता अपने पति रामके वामाङ्गमें विलीन हो गई ॥ ७४-७५ ॥ इस तरह उस समय भी रामसे सीताका वियोग नहीं हुआ था। उधर सुग्रीव अपना पुरमें उत्तम रीतिसे राज्य करने लगा, ॥७६॥ एक बार हनुमान्के कहनेपर सुग्रीवने वानरोंको बुलवाया। उस समय राम-लक्ष्मण प्रवर्षणगिरिपर रहते थे। ॥७७॥ तथा रामने शरदऋतुको प्राप्त देखा तो क्रोधसे लक्ष्मणको सुग्रीवके पास मदयाताका स्मरण दिलाने लिये भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर किष्किन्धाके वानरोंको डराना आरम्भ किया। लक्ष्मणका आय सुनकर सुग्रीव भी भयसे विह्वल हो उठा ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ उसने लक्ष्मणको शान्त करनेके लिय हनुमान्‌को भेजा। उन्होन जाकर लक्ष्मणको समझाया और अपने साथ किष्किन्धामें ले आये ॥ ८० ॥ उसी समय वानर सुग्रीवने ताराको भेजा वह जाकर महलके आगेवाले दालानमें बैठ गयीं। इतनेम उसने लक्ष्मणको आत देखा ॥ ८१ ॥ ताराने अपने मधुर वचनोंसे लक्ष्मणको समझाकर शांत करते हुए कहा-हे देवरजी ! वानरोंके राजा सुग्रीवने रामके कामके लिये वानरोंको बुलवा भेजा है। आप कोप न करें। इतना कह तथा लक्ष्मणका हाथ पकड़कर भरम राजा सुग्रीवके पास ले गयी ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ उन्हें देख राजा सुग्रीव सिहासनसे उठकर खड़े हो गये। तब लक्ष्मणने सुग्रीवते कहा कि तुम रघुकुलमें उत्तम

सर्गः ८ ] मारकाण्डेयम् ७७


ईदृशमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा । उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ॥८६॥
रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः । इत्युक्त्वा तं पूजयित्वा सुग्रीवेण स मारुतिः ॥८७॥
चकार लक्ष्मणं शांतं सुग्रीवोऽथ ययौ वानरैः । गत्वा स राघवं नत्वा दर्शयामास वानरान् ॥८८॥
राघव न तदा प्राह सुग्रीवं प्लवगाधिपः । देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥८९॥
अत्र यूथाधिपतयः पञ्चानन्दप्रख्याः स्मृताः । ततो ऽऽज्ञाप्य सीताशुद्ध्यर्थन्तन् दिदेश सः ॥९०॥
दिक्षु सर्वासु विविधान् वानरान् प्रेष्य सत्वरम् । ययौँ दिश जाम्बवन्तंङ्गदं वायुनन्दनम् ॥९१॥
नल सुषेण शरभ मैंदं सम्प्रेषयत्तदा । मासादूर्द्धाद्विनिवर्त्तध्व नाचेद्दण्ड्या भविष्यथ ॥९२॥
ततो रामो मुद्रिकां स्वां ददौ मारुतिसत्करे । मन्नामाक्षरयुक्तेयं सीतायै दीयतां रहः ॥९३॥
ततो रामो निज मन्त्रं ददौ तस्मै हनूमते । तन्मन्त्रस्य लक्षमिते कृत्वा तु जपलेखने ॥९४॥
लब्ध्वासामर्थ्यमतुलं लङ्कां गन्तुं स मर्कटः । नत्वा रामं परिक्रम्य जगाम कपिभिः सह ॥९५॥
वदन्तं राघवः प्राहः चित्रकूटे पुरा कृतम् । मनःशिलायास्तिलकं सीताभाले विनिर्मितम् ॥९६॥
पद्धयोः पद्मवन्त्यादि सीतायै कथयन् रहः । ततस्ते प्रार्थना मन्वे पश्चिमादपु दिक्षु च ॥९७॥
कपयस्ते समायान्ता न दृष्टा सेति ते ब्रुवन् । तथाङ्गदाद्याः प्लवगाः सीतार्थं वभ्रमुर्वने ॥९८॥
अन्विष्य वणथेष्विति राक्षसग्राम्छशोध्यन् । साश्रास्त्यास्तेवराच्छृङ्गैः गुहाद्वारान्निर्गतान् ॥९९॥
जलार्थं प्रप्रविष्टे स्ते गुहायां वानरोत्तमाः । तस्या जान्न गच्छन्तमूष्णों दिनान्यष्टादशैव हि ॥१००॥
तत्रिक्रान्तार्त्तन निस्तर वभ्रमन्तु इतस्ततः । तत्र रत्नमयं दिव्य गेहे दृष्ट्वा स्त्रयं शुभाम् ॥१०१॥


शायद भूल गये हो। =४ । जिस बाणसे तारा मारा गया था, उसी बाण सुग्रीव की प्रतिक्षा कर रहा
है आज मैं तुम्हें मारकर जल का बिम्ब बना दूंगा है जो तुम्हारा मद भंजन दूँगो । लक्ष्मण जब स प्रकार
अत्यन्त कठोर बचन कहन लगे तब हनुमानने कहा कि आप एम कठोर बचन क्यों मुखसे निकाल रहे हैं ?
। ८५ ॥ रामके काजके लिये सुग्रीव रात दिन सचेत रहता है इतना कहकर मारुति रामने लक्ष्मणको पूजा
करवाया और उनका शान्त करवाया। पश्चात् स्वयं वानरोंको लेकर रामके निकट गया । जहाँ जा कर
सुग्रीवने सिरझुकाकर रघुनाथजीके आगे कहा- हे दैव देखिए, वानरगणकी भारी सेना आ रहा है
। ८६ । इसमें अठारह पद्म सेनापति हैं। तदनन्तर राजाज्ञा अनुसार सीताकी खोज करनेके
लिये सब दिशाओमें बहुतसे वानरोंको उसी समय भेज दिया। उनमेंसे जाम्बवान्, अंगद, हनुमान्, नल
व सुषेण तथा मैंदको दक्षिण दिशामें भेजा और कह दिया कि एक मासके भीतर सीताकी सुधि लेकर लौट
आना, नहीं तो तुम सबको भण्ड किया जायगा । ६०-९२ । तब रामचन्द्रजीने हनुमान्‌के हाथमें
मुद्रिका दीया। जिसपर कि राम नाम अंकित अपनी नामके सीताको देना। ९३। बादमें अपना मंत्र
हनूमानको दिया। जिसके कि एक लाख मन्त्र जप तथा लिखकर हनुमान् अतुल सामर्थ्य प्राप्त
करेंगे। पश्चात् हनुमान्ने रामको प्रणाम किया और परिक्रमा करके कपियोंके साथ चल दिये ॥९४।६५ ॥
जाते समय रामने चित्रकूटमें किया हुआ एक चरित्र हनूमान्को बताते हुए कहा कि एक समय मैंने सीताके
कण्ठमें मैनाशिलाका तिलक तथा कागलोचन बकवन्ध्याका उपाय की था। उस बातको तुम सीतासे
एकान्तमें कहना। जिससे कि उनका तुम्हारे विश्वास हो जाय। इसके बाद वानर विभिन्न दिशाओ के
गए दिये । ९६-९७॥ कुछ कालके बाद बहुतसे वानरोने आकर सुग्रीवसे कहा कि हमको सीता
नहीं दिखाई दी, उधर अङ्गदके साथपर भी सीताकी खोजमें ढूंढते वानर इधर-उधर भ्रमण कररहे थे । ९८
उन्होंने शांति खोजनेके बहुतसे पक्षी देखे ॥ ६८ । ९६ । यह देखकर प्यासमें पीडित वानरोंमें उत्तम वे वानर
जलकी अभिलाषासे उस गुफामें घुसे, उसमें जाते जाते उन्हें अठारह दिन बित गये । १०० । वे उस
अन्धकारमें इधर उधर भटकने लगे अचानक वही उन्हे रत्नमय दिव्य दो भवन तथा उनमें एक सुन्दरी स्त्री दिखायी

७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

संप्रालब्ध्वा निजं वृत्तं स्वदूतं श्रोतुमद्यताः । ताम्पूज्य कथयामास चंतं वृत्तं तु योगिनी ॥१०२॥
हेमानाम्र्ना सुता विश्वकर्मणः सा महेश्वरम् । नृत्त्येन तोषयामास ददौ तस्यै पुरं महत् ॥१०३॥
अत्र स्थित्वा चिरं काल यदा गंतुं समुद्यता । मां मां प्राहात्र रामस्य प्रतीक्षां कुरु गच्छति ॥१०४॥
सभार्य्यश्चाथ रामस्य कृत्वा पूजनमुत्तमम् । इत्युक्त्वा सा दिवं याता राघव गम्यते मया ॥१०५॥
स्वयंप्रभेति नाम्नाऽहं हेमायाः परिचारिका। अधुना बत युष्माकं साहाय्यं किं करोम्यहम् ॥१०६॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मत्वा स्वोयदिनाव्ययम् । तामुचुर्वानराः सर्वे नस्त्वं कुरु गुहाद्बहिः ॥१०७॥
इत्युक्ता सा व्यनैषीत् तैः सहैव ययौ बहिः । तद्विलाच्छादितैयायैनयैर्नावर्तनान्मुदा । १०८॥
न ज्ञातं च तया केन मार्गेण च बहिः कृतम् । साऽपि गत्वा पूज्य रामं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥१०९॥
ततस्ते वानरा ज्ञात्वा गुहाद्वा स्वदिनाव्ययम् । विषण्णाः सागरं दृष्ट्वा तस्थूः प्रायोपवेशने ॥११०॥
जटायोः कीर्तनं चक्रू गमकार्य्यं कृतं पुरा । तच्छ्रुत्वाऽथ म सपातिः तांन्दंत गः समुद्यतः ॥१११॥
तेभ्यः श्रुत्वा मुनिं वोचेद्दर्शनार्थमं जलोत्थित् तेषां श्रुत्वा पृथङ्कन मोतातून न्यवेदयत् । ११२॥
शतराजनमध्ये ऽथैलंकायां वर्ततेऽधुना । अशोकवनिकायां तु न.र्शाऽलंब तां प्रपश्यथ । ११३॥
अह पक्षविहीन ऽस्मि मया गन्तुं न शक्यते गृध्रत्वाद्दूरदृष्ट्वाऽहं सीता म' दृश्यते गिरौ ॥११४।
भ्रात्रा जटायुषा पूर्वमुड्डीयाहं बलाद्रविम् । प्रष्टुकामस्तदा तप्तश्भानो बंधुमथा मखे ॥११५॥
पक्षभ्यां भस्मसाञ्जातो मे पक्षी पतितावुभौ । जटायुः स मपक्षश्च गतो देशान्तरं पुनः ॥११६॥
अहं तदा वसन्हसँश्चन्द्रशर्माणमुत्तमम् । मुनिं नत्वा तदा तस्मै निजवृत्तं निवेदितम् । ११७।

दी ॥ १०१ ॥ उसके वृत्तान्तका सुनकर अभिप्रायमे वानरोंने कहा— अपना वृत्तान्त सुनाओ, तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है? यह वातिका उन सबका सम्मान करके कहने लगी—॥ १०२ ॥ विश्वकर्माकी हेमा-नामक प्रसिद्ध एक कन्या थी। उसने जब महादेवजीको तृप्तिकरके प्रसन्न किया, तब उन्होंने उसको यह बड़ा भारी नगर दिया ॥ १०३ ॥ वहां बहुत कालतक निवास करके जब वह जाने लगी, तब उसने मुझको कहा कि यहाँ बहुत कालतक निवास करती हुई तुम रामके आगमनकी प्रतीक्षा करो । १०४ ॥ उन रामका उत्तम प्रकारसे पूजन करके बाद तुम भी चले आना, इतना कहकर वह चली गयी। इसी कारण अब मैं भी रामके पास जाना चाहती हूँ ॥ १०५ ॥ तथा हेमाकी मैं स्वयंप्रभा नामकी दासी हूँ। अब आप लोग यह कहे कि मैं आप लोगोंका कौनसा सहायता करूँ ॥ १०६ ॥ उसको इस बातको सुन तथा बहुत दिन व्यय अर्थात हुआ देखकर वे सब उसी बोले कि हमको इस बिलसे बाहर कर दो ॥ १०७ ॥ यह सुनकर उसने उन सबको अथवा अपना आंख मून्दने किए कहा। उसो अवसर वानरोंका यह नहीं मालूम हुआ पाय कि उसने किस प्रकार किस मार्गमें बाहर कर दिया। वह भी रामके पास चली गयी तथा उनका पूजा करके स्वर्ग सिधारी ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ उस बिलसे बाहर अपने अत्यधिक दिनोंका व्यय देख उदाम हो समुद्रके किनारे गये और अनशन करके बैठ गये ॥ ११० ॥ बानरोंका इसप्रकार शोक देख प्रायोपवेशके दरम्यान जटायुका चरित्र चल पढा। वहा रहनेवाला संपाती जो उनका चचेरा भाई (पितृव्य-पुत्र) था, वह उनके मुखसे रामके कार्यके लिये जटायुका मरण तथा प्रशंसा सुनकर भाई संपाती, रूपान्तरित होकर समुद्रतटपर गया। पश्चात् उन वनेचरोंका वृत्तान्त सुनकर अपकार्य तथा समाचार कह सुनाया और वह ॥ १११ ॥ ११२ । यहाॅसे समुद्रको पार करके सौ योजनपर लङ्कामें तुम उन्हें देख सकते हो । ११३ । मैं पंख-रहित हूँ। इस कारण वहाँतक नहीं जा सकता, गृध्रकी दृष्टि तेज होती है। अतएव मैं सौ क्या पर्वतपर बैठी हुई लङ्कामें यहाँसे देख रहा हूँ ॥ ११४ ॥ मेरे पंख न होनेका कारण यह है कि मैं एक बार अपने बलके दर्पसे भाई जटायुके साथ उड़कर सूर्यका स्पर्श करनेके लिए आकाशमें उड़ा। रश्मि सूर्यका प्रभाव जटायु जलने लगा। तब मैंने अपनी पांखोंसे ढककर उसकी रक्षा की। जिससे कि मेरे दोनों पांख भस्म हो गयीं और मैं तथा जटायु दोनों उसरस गिर पड़े, जटायु उस ओर सपक्षा था। उससमय दुःखीने मैंने चन्द्रशर्मा नामक मुनिके

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९


तदा मां स मुनिः प्राह यदा त्वं वानरोत्तमान् । सीताशुद्धिं कथयसि तदा पक्षौ भविष्यतः ॥ १२८ ॥
पश्यतां निर्गतौ पक्षौ कोमलौ मां क्षणादिह । यदा नीता रावणेन पुरा सीता विहायसा ॥ १२९ ॥
मत्पुत्रेण तदा दृष्टा कथितं चापि मां तदा धिक्कृतः स मया क्रोधान्मा त्वया न विमोचिता ॥ १३० ॥
तदागम्य गतः क्रोधादद्यापि न समागतः । इत्युक्त्वा तान् कपीन् पृष्ट्वा स भवादिगतेस्तदा ॥ १३१ ॥
अथ ते वानराः सर्वं प्रोचुः स्वं स्वं बलं तदा । न कोऽपि गमने शक्तः शतयोजनसागरे ॥ १३२ ॥
तदा स जांबवान् वृद्धः स्तुत्वा तं मारुतिं मुहुः । जन्मकर्मादि संश्राव्य लङ्कां गंतुं दिदेश तम् ॥ १३३ ॥
सोऽपि श्रुत्वा समुद्योगं चकाराथ पवनसुतः । निजभंगद्भूमिसंगतं कृत्वा सस्मार राघवम् ॥ १३४ ॥
एवं गिरीन्द्रे प्रोक्तं किष्किन्धाविषये कृतम् । यत्नि रावरेणेशं पुरा पापप्रणाशनम् ॥ १३५ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( हनुमान्का लंकामें जाकर सीताका पता लगाना और लंका जलाना )

श्रीशिव उवाच

अथ उड्डीय हनुमान् ययावाकाशवर्त्मना । तद्दृष्ट्वा नभले ज्ञातुं सुरसां नागमातरम् ॥ १ ॥
प्रेषयामासुस्स्वर्गाः सा शीघ्रं तत्पुरो ययौ । तदा सा मारुतिं प्राह विश त्वं वदनं मम ॥ २ ॥
स प्राह रघुवीरस्य कार्यं कृत्वा विशाम्यहम् । दृष्ट्वा तस्यास्तु निर्बन्धं व्यवर्धत तदा कपिः ॥ ३ ॥
विवर्धितं तथाऽप्यास्यं तदा सूक्ष्मो बभूव ह । अङ्गुष्ठमात्रस्तन्मया स वक्त्रे गत्वा विनिर्गतः ॥ ४ ॥


पास जाकर प्रणाम किया और अपना वृत्तांत उन्हें सुनाया । १२५-१२७॥ तब मुनिने कहा कि जब तुम वानरोंको सीताकी खबर सुनाओगे । उसी समय तुम्हारे पांख पुनः जम जायेंगे। १२८। देखो, मेरे शरीर-से ये कोमल पांखे क्षणभरमें निकल आयीं उस समय जब रावण सीताको आकाशमार्गसे ले जा रहा था ॥ १२९॥ उसी समय मेरे पुत्रने उनका देखा था और मुझसे कहा। तब मैंने उसका बहुत धिक्कारा और कहा--अरे दुष्ट ! तूने सीताको छुड़ाया क्यों नहीं ? १३०॥ तब वह कुपित होकर मेरे पाससे चला गया और आजतक नहीं लौटा। इतना कह तथा वानरसे पूछकर संपाती भी वहांसे चला गया ॥ १३१ ॥ तब वानरलोग परस्पर एक दूसरेसे अपना-अपना बल पूछा तो पता लगा कि सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघनेके लिये कोई समर्थ नहीं है । १३२ । तब वृद्ध जाम्बवान्ने हनुमान्को बारंबार प्रशंसा की। उनका जन्म तथा बल कह सुनाया और उन्हें लङ्का जानेकी आज्ञा दिया ॥ १३३॥ हनुमान्जी भी जाम्बवान्के वचन सुन तथा अपना पुरुषार्थ स्मरण करके पर्वतपर चढ़कर कूदनेको उद्यत हुए । अपने भारसे उन्होंने पर्वतको जमीनपर धसा दिया और रामका स्मरण करने लगे ॥ १३४ ॥ हे गिरिजेन्द्र, इस प्रकार पहिले किया हुआ रामचंद्रका किष्किन्धाचरित्र मैंने तुमको सुना दिया। जो कि श्रवणमात्रसे पापोंका नाश कर देता है ॥ १३५ ॥ इति वाशत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रे भाषाटीकायामष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

शिवजी बोले--तदनन्तर हनुमान् उड़कर आकाशमार्गसे लंकाको चले यह देखकर उनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये देवताओंने नागोंकी माता सुरसाको भेजा। वह शीघ्र मार्गमें हनुमान्जीके सामने आकर खड़ी हो गयी और मुख फाड़कर हनुमान्से कहने लगी कि तू आकर मेरे मुखमें प्रवेश कर मैं तुझे खाऊँगी ॥ १॥ २॥ हनुमान्ने उत्तर दिया कि मैं श्रीरामका कार्य संपादन करके फिर आकर तुम्हारे मुखमें प्रवेश करूँगा। परन्तु उसका अधिक आग्रह देखकर कपिने अपना शरीर बढ़ाया ॥ ३ ॥ यह देखकर सुरस ने भी अपनी काया और अधिक बढ़ायी । तब हनुमान् अंगुष्ठमात्रका सूक्ष्म रूप धरके उसके मुखमें प्रविष्ट होकर

८० | आनन्दरामायणे | [सर्गः २

ज्ञात्वा साऽपि बलं तस्य स्तुत्वा तं प्रययौ दिवम्. अथाब्धिवचनान्मार्गे मैनाकः पर्वतो महान् ॥ ५ ॥
जलमध्यात्प्रादुरभूद्विश्रान्त्यर्थे हनूमतः । नानामणिमयैः शृङ्गैरभ्रम्पोषपरि नगत्कुतिः ॥ ६ ॥
धृत्वा यान्तं हनूमन्तं प्राह मैनाकपर्वतः । आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि च ॥ ७ ॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् पुरा गिरीणामिंद्रेण युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥ ८ ॥
तदा दशरथेनाहं मोचितोऽस्म्यत्र संस्थितः अतस्तदुपकारं हि निस्तर्तुं निर्गतोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥
गच्छतो रामकार्यार्थं तव विश्रान्तिहेतवे तदा तं हनुमानाह रामकार्ये न मे श्रमः ॥१०।
विश्रामः स्वामिकार्येऽत्र न कर्तव्यश्च भक्षणम् । मैनाकस्त्वं पुनः प्राह स्वस्पर्शात्पावयस्व माम् ॥११
तथेति स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः । किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥१२
सिंहिकानाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता मदा। आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षती ॥१३।
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ।.१४।
एवं विचिन्त्य हनुमानधो दृष्टिं प्रसारयन् । तत्र दृष्ट्वा सिंहिकां तां तदस्ये न्यपतत्कपिः । १५।
तस्यांत्रजालं निष्कास्य तां हत्वाऽग्रे ययौ पुनः ततोऽब्धेर्दक्षिणे कूले लंकां कृत्वा तु पार्श्वतः ॥१६॥
पपात पर्लकार्या तत्र तां रावणस्वसाम् । क्रौञ्चा हन्त्वा सिंहिकावल्लङ्कां रात्रौ विवेश सः ।।१७।
तदा लङ्कापुरी नाम्नी राक्षसी तं व्यतर्जयत् । हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽजयदाहनन् १८॥
तदा स्मृत्वा ब्रह्मवाक्यं सा प्राहाश्रुमुखी हरी । ब्रह्मणोक्ता पुरा चाहं यदा त्वां धर्षयेत्कपिः १९।
तदा रामो रावणस्य वधार्थमत्र यास्यति । ज्ञातं मया रावणस्य वधं रामः करिष्यति ।.२०॥
निर्विघ्नया गच्छ लंकामशोके पश्य जानकीम् ततो विवेश हनुमाल्लङ्कां पश्यन्ययौ तदा । २१॥

पार बाहर निकल आये ॥४। तब सुरसा उनका बल जान और स्तुति करके स्वर्गको चली गयीं।
पश्चात् समुद्रके कहनेसे महान् मैनाक पर्वत जलके बीचमेंसे हनुमान्के विश्रामके लिये आधसर द का उठ
खड़ा हुआ। नाना मणिमय शिखरोंक ऊपर मनुष्यका रूप धारण करके मैनाक पर्वत शाल द्वार हनुम त्सं
बोला कि आइए और मरे अमृतकल्प फलोंको खाइए । ५-७। तब ओसू क्षणभर विश्रामकरके सुखपूर्वक
आगे जाइयेगा। पूर्वसमय पर्वतोंका इन्द्रके साथ दारुण युद्ध हुआ था ॥ ८ । उस समय राजा दशरथने मुझे
बचाया था तबसे मै यहाँ आकर रहता हूँ। मै उनके उपकारके उऋण होनेके लिये ही आपके सामने
उपस्थित हुआ हूँ । ९। सो इसलिये कि रामकार्यके लिये जाते हुए आप मेरे ऊपर विश्राम करके जायें तब
मम हनुमान्ने कहा कि क्या रामके कार्यमें मुझे श्रम होगा ? और स्वामीके कार्यमें तो सदा विश्राम ही
रहता है। इसलिये मैं यहाँ ठहरकर भोजन आदि नहीं कर सकता । तब फिर मैनाकने कहा-अच्छा, कृपया आप
अपने हाथसे स्पर्श करके तो मुझे पवित्र कर दे १०, ११। 'तथास्तु' कह हनुमान्‌ह ने उसके शिखरका छूकर
चल पड़े। जब कुछ दूर आये बहत उनकी छायाको किसी छायाग्रहने पकड़ लिया । १२। वह सिंहिका
नामकी घोर राक्षसी थी। जो सदा जलमें रहा करती थी और आकाशमार्गसे उड़ते हुए पक्षियोंकी छाया
पकड़कर खींच लेती और खा जातीथी १३। उसके पकड़नेपर बलवान् हनुमान् सोचने लग कि किसने रामके
काममें विघ्न डालकर किया भंग कर रोक दिया । १४ । यह विचारकर हनुमान्ने नीचे दृष्टि की ता सिंहिका
राक्षसीको देखकर उसके मुखम ही कूद पड़े ॥१५॥ उन्होने उसका आंत निकाल ली और उसे मार डाला।
यहाँसे आगे बढ़ तो समुद्रके दक्षिण किनारे स्थित लङ्काको बगलमें स्थित परलङ्कामे जा पहुँचे । यहाँ
रावणकी लड़की क्रौञ्चानां सिंहिकाके ही समान मारकर रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश किया ।। १६ ।। १७।
तब उन्ह लङ्का नामकी राक्षसी डाँटने लगी । हनुमन्तने उसको भी अवहेलासे बायें हाथका एक मुक्का मारा
॥ १८ । उस समय ब्रह्माके वाक्यका स्मरण करके लङ्का आँखोस आँसू भरकर बोली कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने
मुझस कहा था कि जब कोई वानर तेरा अपमान करेगा ॥ १९ ॥ तब राम रावणका वध करनेके लिए यहाँ

सर्ग ९] सारकाण्डम् [८१


ददर्श लङ्कां तां रम्यां गोपुराट्टालमण्डिताम् । दृढवीथीचतुष्काढ्यां त्रिकूटशिखरस्थिताम् ॥२२॥
पश्यन्ममन्ततः सीतां प्रतिगेहं स मारुतिः । गुहायां निद्रितं कुम्भकर्णं दृष्ट्वा भयानकम् ॥२३॥
दृष्ट्वा विभीषणं रामकीर्तने हृष्टमानसम् । दृष्ट्वा सुलोचनायुक्तं निद्रितं मेघनिःस्वनम् ॥२४॥
ययौ राजगृहं रात्री रावणं मदमि स्थितम् । दृष्ट्वा स्वयं वायुपुत्रो दीपराजीव्र्यलोकयत् । २५॥
अकरोद्वख्रहीनांस्तान् रावणादीन्त्स मारुतिः । उल्मुकेनाकरोद्दग्धं कूर्चं च रावणस्य च । २६ ।
राक्षसीः कोटिशो नग्नाः कृत्वा तोयघटान्कपिः भभंज लीलया तूष्णीं दृप्तान्पुच्छेन तर्जयन् ॥२७॥
महाऽनिविह्वलाः सर्वे प्रोचुस्तेऽथ परस्परम् । क्रुद्धाऽद्य जानकी सत्यं नः प्राणान्तमुपागतम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वा तुष्टचित्तः स ययौ रावणमन्दिरम् । अदृष्ट्वा जानकीं तत्र ययौ पुष्पकमुत्तमम् । २९।
रावणं निद्रितं दृष्ट्वा वेष्टितं स्त्रीकदम्बकैः । दृष्ट्वा मन्दोदरीं तत्र सीतेयमिति शंकितः ।' ३०।।
लक्ष्मणोक्तानि चिह्नानि पर्यस्तस्यां ददर्श न, तथापि सीतासदृशीं दृष्ट्वा व्यग्रमनास्त्वभूत् ॥३१॥

पार्वत्युवाच
कथं मन्दोदरी सीतामदृशी राक्षसीपिता । मानांशांशांशजाः सर्वाः स्त्रियश्चेति श्रुतं मया ॥३२॥

श्रीशिव उवाच
शृणुष्व कारणं देवि सीतेयं विष्णुना चिता । तेनैव विष्णुना पूर्वमियं मन्दोदरी चिता ॥३३॥
एकदा कैकसी माता रावणं प्राह दुःखिता । क्षेपोच्छुन्मोन तल्लिङ्गं गत चाद्य रसातलम् । ३४॥
शिवाराधाय मां देहि आत्मलिंगमनुत्तमम् । तन्मातृवचनं श्रुत्वा गाण्णादरदोन्मुखम् । ३५॥
मामाह रावणो वाक्यं द्वौ वरौ देहि मां प्रभो । आत्मलिंगं च मन्मात्रे पन्त्यर्थं पार्वतीं मम ॥३६ ।


आया । सो अब मैंने जान लिया कि राम रावणका नारंग ।. २० ।। तुमने लङ्काको जीत लिया। जाओ, लङ्कामे घुसकर अशोकवाटिका में जानकीको देखो। तब हनुमान् सीताको खोजते हुए लङ्कामे घुसे ।। २१ ।।
उन्होंने पुरद्वार तथा अटारियोंसे मण्डित रम्य लङ्कानगरीको देखा। वह त्रिकूट पर्वतके शिखरपर स्थित बाजारों, सड़कों तथा चौराहोंसे रमणीक लग रही थी ।। २२ ।। हनुमान् सब ओर प्रत्येक घरमें सीताको ढूँढकर गुफामें सोता हुए कुम्भकर्णको देखा ॥ २३ ॥ उन्होंने रामनामक कीर्तनसे प्रसन्नमना विभीषणको और सुलोचनाके साथ सोए हुए मेघनादको देखा ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजभवनमें जाकर रात्रिके समय सभामें स्थित रावणको देखा; यह देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने दीपकोंको बुझा दिया ।। २५ ।। हनुमान्जीने उन रावणादिको नग्न करके रावणकी दाढ़ी-मूंछ आदिको लुआठोंसे जलाकर भस्म कर दिया ।। २६ ।। करोड़ों राक्षसियोंको नग्न कर दिया; सिकवेलमे रक्खे घड़ोंको फोड़ डाला और सुपीसे उद्धतर सिपाहियोंको पूंछसे खूब पीटा ।। २७ ।।
अतिशय विह्वल होकर वे सब परस्पर कहने लगे कि सचमुच सीताजी हम लोगोंपर रुष्ट हुई है। अब हम लोगोंका प्राणान्तकाल निकट आ गया है ॥ २८ । यह सुना तो संतुष्टचित्त होकर हनुमान् रावणके महलमें गये । वहाँ भी जानकीको न देखकर पुष्पकविमानपर गये ।। २९ । वहाँ रावणको स्त्रियोंके समूहसे वेष्टित होकर सोता हुआ देखा । साथ ही मन्दोदरीको देखकर 'यही सीता है क्या ?' ऐसी शङ्का करने लगे । ३० ।। परन्तु जब लक्ष्मणके कथनानुसार सीताका मुखाकृति मिलाने लगे तो नहीं मिली । फिर भी उसको सीताके समान देखकर आश्चर्यचकित हुए । ३१ । पार्वतीजीने पूछा - हे सदाशिव ! राक्षसी मन्दोदरी सीताके सदृश कैसे थी ? मैंने तो सुना है कि संसारकी सब स्त्रिये सीताके अंशांशसे उत्पन्न हुई हैं ।। ३२ ।। श्रीशिवजी कहने लगे - एक बार रावणकी माता केकसीने दुःखित होकर रावणसे कहा कि शोपनामके उच्छ्वाससे मेरा नित्य पूजा करनेका शिवलिंग पातालमें चला गया है ।। ३३ ।। ३४ ।। सो तुम एक उत्तम शिवलिंग लाकर मुझे ला दो । माताके बचनको सुना न अपने गाननसे वरदान देनेके लिए राजी करके मुझसे रावणने कहा - हे प्रभो ! मुझको दो वर दीजिए । एकतो मेरी माताके लिए आत्मलिंग और दूसरेसे

८२ आनंदरामायणे [ सर्ग ९

ततस्त्य वचनं श्रुत्वा त्वं दत्ताऽसि गिरीन्द्रजे । दत्त्वाऽऽत्मलिङ्गं संप्रोक्तो मया त्वं यदि रावण । ३७।
मार्गे लिङ्गं भूमिसंस्थं करोषि नह्यहं पुनः । नाग्रे गच्छामि तत्रस्थानान्येव च गमास्यहम् ॥३८
तथेति रावणश्चोक्त्वा देव्या लिङ्गेन सो ययौ । तदा त्वया स्मृतो विष्णुस्तेनाङ्गचन्दनादिना । ३९
कृत्वा मन्दोदरी नारी मयदन्त्येऽर्पिता शुभा । मां निनाय मयः शीघ्रं पाताले स्वीयमद्गृहम् ॥४०॥
ततो द्विजस्वरूपेण विष्णुः प्राह दशाननम् । प्रतारितः शिवेन त्वं दत्त्वा दुर्गां तु कृत्रिमाम् ॥४१।
पाताले मयगेहे सा गोपिताऽस्ति शिवेन हि । विचिन्वंस्ति त्वं स्वर्गलोकं भूलोकं चेति शंकया । ४२॥
स्वीयं मत्वा तु पाताल तत्र त्वं न गवेष्यसि । त्यजेमां कृत्रिमां दुर्गां पश्य तां मयमन्दिरि । ४३॥
गिरीन्द्रजां महाभाग्यां पत्नीं कृत्वा सुखं भज । तद्विप्रवचनं सत्यं मन्वा भामेत्य वै पुनः । ४४।
विहस्य रावणः प्राह ज्ञातं तेऽन्तर्गतं मया । अर्पिता कृत्रिमा देवी मांतां गोप्य स्थात्तले ॥४५॥
त्वयैवास्त्वधुना चेयं त्वहं नेष्यामि गोपिताम् । इत्युक्त्वा त्वां विसृज्याथ पाताल गन्तुमुद्यत ॥४६॥
तावन्मार्गे ह्युपशकायन्तः प्राह द्विजं तदा । आत्मलिंग क्षणं हस्ते धुरुं ध्व वचनान्मम ॥४७॥
यावन्निवर्त्य शकां स्वामहमेष्यामि वेगतः । द्विजवेषधरो विष्णुस्तदा प्राह दशाननम् । ४८
अतिक्रांते मुहूर्तेऽथ लिङ्गं स्थाप्य व्रजाम्यहम् । तथेति रावणश्चोक्त्वा तत्करे लिंगमर्पयत् । ४९।
ततो मूत्रस्य सा धाराऽखण्डिताऽभूच्चिरं प्रिये अतिक्रान्ते मुहूर्तेऽय लिंगे मार्गरगेधसि । ५०
पश्चिमे स्थाप्य भूम्यां स ययौ स्वीयम्थल हरिः ततः स रावणश्चापि मूत्रं कृत्वा यथाविधि । ५१।
लिंगं दृष्ट्वा भूमिस्यं तच्चिञ्चचालयत्तदा । तदा भूम्यां गतं लिङ्गं शिरः किंचित्चचाल न ५२॥
अभूद्गवां कर्णप्रमदर्शी तच्छिद्रस्थले । गतायां तच्छिलाश्चापि कर्णशंकूपमं कृतम् । ५३।

पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती को दे दीजिए ॥ ३५ । ३६ ॥ हे पार्वतीजी ! उसकी वरप्रार्थना सुनकर मैने तुमको उसे दे दिया और आत्मलिङ्ग भी देकर उससे कहा—हे रावण ! देख यदि तूने इस लिङ्गको मार्गमे कही भी रख दिया तो मै आगे न जाकर वही रह जाऊँगा ॥ ३७ । ३८ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर रावण देवी पार्वती तथा लिङ्कको लेकर चला गया उस समय तुमने विष्णुभगवान्का स्मरण किया तब उन्होने अपने अङ्गके चन्दन आदिसे मन्दोदरीका सुन्दरी स्त्री बनाकर मय दानवको दिया। उसे लेकर मयदानव पातालके अपने मनोहर भवनको चला गया ॥ ३९ । ४० । तब विष्णुभगवान्ने ब्राह्मणका रूप धारण करके रावणसे कहा-हे दशानन ! शिवजीने तुमको ठग लिया उन्होने यह नकली पार्वती तुमको दी है ॥ ४१ ॥ असलको तो शिवजीने पातालमे मयदानवके घरमे छिपा दिया है। उन्होंने यह सोचा कि तुम स्वर्ग तथा भूलोकमे ही खोजोगे ॥ ४२ । अपना समझकर पातालमे न खोजोगे इस कारण तुम इस कृत्रिम दुर्गाको छोड़ दो और मय-दानवके घर जाकर यथार्थ पार्वतीको ढूँढ़ निकालो । ४३ । उस अत्यन्त सुन्दर पार्वतीको पत्नी बनाकर सुख भोगो । विप्रके इस वचनको सच मानकर पुनः रावण मेरे पास आया ॥ ४४ ॥ वह हँसकर बोला कि मैने आपका हृदयगत अभिप्रायको जान लिया है। आपने असली पार्वतीको पातालमे छिपाकर मुझे नकली पार्वती दे दी है ॥ ४५ । इसको अब अपने पास ही रखिए । मै तो उस छिपी हुई पार्वतीको ही ले जाऊँगा इतना कह तथा तुमको यही छोड़कर वह पातालमे जानेके लिए उद्यत हुआ ॥ ४६ ॥ रास्तेमे लघुशङ्का करनेकी इच्छावश उसने ब्राह्मणसे कहा —हे द्विज मेरी प्रार्थना स्वीकार करके क्षणभरके लिए इस शिवलिङ्गको अपने हाथमे लिये रहो ॥ ४७ ॥ मै लघुशङ्का करके तुम्हारे पास आ रहा हूँ । द्विजवेष धारण करनेवाले विष्णुने कहा—हे दशानन ! यदि अधिक देर लगेगी तो मै लिङ्गको वहींपर रखकर चला जाऊँगा । अच्छी बात है, कहकर रावणने शिवलिङ्ग उनके हाथमें दे दिया ॥ ४८ । ४९ ॥ रावण जब लघुशङ्का करने लगा तो बहुत देर तक मूत्रकी अखण्ड धारा छूटती रही । अधिक समय बीत जानेपर मार्गके पश्चिम किनारे लिङ्गको रखकर विष्णुभगवान अपने स्थानको चले गये। उसके पश्चात् रावण भी विधिवत् मूत्रत्याग करके वहीं आया ॥ ५० ॥ ५१ । लिङ्गको जमीनपर रक्खा देखकर उसके सिरको हिलाया, परन्तु भूमिगत लिङ्गका सिर नहीं हिला

सर्गः ५ ] | सुन्दरकाण्डम् | ८३

सर्गः ५ ]सुन्दरकाण्डम्८३

सुतः कर्णोऽस्य लिंगे गोकर्णं तद्वदस्ति हि । ततः खिन्नमनाभूयो पातालं रावणो ययौ ॥५४॥
मयगेहे निरीक्ष्याय देवीं मन्दोदरीं वराम् । मयं संप्राथर्यामास ददौ तां रावणाय सः ॥५५॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य पाणिग्रहं ददौ मयः । रावणाय दृढां शक्तिममोघां शत्रुघातिनीम् ॥५६॥
दृष्ट्वा मन्दोदरा मन्द्यः प्राह मन्दोदरीमिति । तां नाम्ना रावणस्तुष्टस्त्वया स्वीयस्थलययौ ॥५७॥
ततो मात्रा धिकृतः स पुनस्तपुं मथान्वितः । गोकर्णं रावणो गत्वा तप्स्या लब्ध्वा विधेर्वरान् ॥५८॥
त्रैलोक्यं स्ववशे कृत्वा लङ्कायां राज्यमाप सः, तस्मान्सीतासमानेयं दृष्टा मन्दोदरा प्रिये ॥५९॥
लंकायां वायुपुत्रेण रावणाग्रे विनिद्रिता । मयोऽप्यासीच्च लंकायां गृहं कृत्वा यथासुखम् ॥६०॥
मयश्चैवांगयो नाम महान् वीरः प्रतापवान् । रात्रौ विनिद्रितो गेहे ब्रह्मदत्तवरन्सुधीः ॥६१॥
दशास्यहस्तात्तन्मृत्युर्विनिर्णिक्तं विचित्य च । तस्य वस्त्रं मारुतिना हतं सद्मनि वै पुरा ॥६२॥
तन्क्षिप्तमूर्ध्वपर्यङ्के रावणस्य कपिस्तदा । विभीषणस्य पर्यङ्के वसनं रावणस्य च ॥६३॥
विचिन्वत्यथ जानकीं म लङ्काया च मुहुः कपिः । ययावशोकवनिकां वृक्षप्रासादपण्डिताम् ॥६४॥
ददर्श तत्र प्रांशुं च शिंशपानाम पादपम् । तन्मूले राक्षसीमद्ध्ये ददर्शाविदिकन्यकाम् ॥६५॥
एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् । भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ॥६६॥
कृतार्थोऽहमिति प्राह दृष्ट्वा सीतां स मारुतिः । शिंशपानगशाखाग्रपल्लवाभ्यन्तरे स्थितः ॥६७॥
पुरा दृष्टानलंकारान् तस्य देहे ददर्श न । ततः किलकिलाशब्दैर्ययौ तत्र दशाननः ॥६८॥
ददर्श रावणः स्वप्ने कपिः कश्चित्समागतः । अशोकवनिकाया सा दृष्टा तेन विदेहजा ॥६९॥

५४॥ उसके शिश्नाकार जगह कानके छेदकी तरह गढ्ढा हो गया। उसका सिर भी कर्णशंकुकी तरह गोल हो गया। ५४। अतएव पृथ्याक कलंक स्वरूप यह लिंग गोकर्ण नामसे विख्यात हुआ। तब खिन्नमना होकर रावण सुतलपातालको चला गया ॥ ५४ ॥ मयके घरमें सुन्दरी मन्दोदरीको देखकर मयसे रावणने प्रार्थना की। तब मयने रावणको वह कन्या दे दी। ५५। इस प्रकार मयने कन्याका विवाह करके रावणको एकदम बहुत सा वस्त्र आभूषण आदि दिया और शत्रुघातिनी, अमोघ दृढ़ शक्ति भी दी ॥ ५६ ॥ उस दवाकी कृपा दृष्टि अर्थात् मुख्य देखकर रावणने उसका नाम मन्दोदरि रखा और उसके साथ सन्तुष्ट होकर रावण अपने स्थानको चला गया ॥५७। तहां माताके धिक्कारनेपर रावण फिर गोकर्णके पास जाकर तप करने लगा। असीम अपनी तपस्याके बलसे रावणने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके तीनों लोक वशन कर लिया और लङ्कापर राज्य करने लगा, हे प्रिये पार्वती इसी कारण हनुमान्ने सीताके समान मन्दोदरीको रावणके आगे सुहाम सोई हुए देखा था । बादमें तो मय दानव भी लङ्कामें घर बनाकर सुखपूर्वक रहने लगा ॥५८-६०। प्रतापी मयके भाई मय रात्रिके समय अपने भवनमें सो रहा था । विचारशील हनुमान्ने इसके दस मुखके रावणके हाथसे मृत्यु जानकर विचारसे उसके सर्ववस्त्रोंके लेकर सम्मुखमें रावणके ऊपर और बादमें रावणके वस्त्र ले जाकर विभीषणके पलंगपर रख दिया ॥ ६१-६३ । पुन हनुमान् मुहुर्मुहु जानकीजीको खोजने लगे। खोजते-खोजते वृक्षों तथा पासादोंसे सुशोभित अशोकवनिकामें गये ॥ ६४ । वहां उन्हें एक उत्कृष्ट शिंशपा (प्रशाम) का वृक्ष दिखायी दिया। इसके नीचे राक्षसियोंके बीचमें अवनि-कन्या जानकी जीको विराजमान देखा। ६५। उस समय शुष्क तथा दीन मुख होकर मलीन वस्त्र धारण किये हुए भूमिपर सोयी हुई रोती दुःखित मनसे रामका नाम जप रही थीं । उनके सिरके बालोंमें तैल आदि पर जानेसे वेडुनि बंध गयी था ॥ ६६ । सीताके दर्शनसे अपनेको कृतार्थ समझते हुए हनुमान्‌जी उस शिंशपावृक्षकी एक शाखाके अग्रभागके पत्तोंमें छिपकर बैठ गये ॥ ६७॥ उस समय सीताके शरीरपर एक शृंगार नहीं दिखायी दिये, जिनको कि हनुमान्ने पहिले सुग्रीवके पास देखा था। इतनेमें कुछ कोलाहलके साथ रावण वहां जा पहुंचा। ६८ । क्योंकि रावणको स्वप्नमें दिखायी दिया कि कोई वानर आया है और उसने

८४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

रामहस्तान्मृतः शीघ्रं लब्धुं तां घर्षयास्यहम् । कपिर्दृष्ट्वा राघवाय निवेदयतु मत्कृतम् ॥७०॥
आगमिष्यति उल्लङ्घ्या मणौ मां निहनिष्यति । इति निश्चित्य स ययौ सीते मवेष्टितो मुदा ॥७१॥
नूपुराणां ध्वनिं श्रुत्वा सिंहलाऽऽसीद्विदेवता । रावणो जानकीमाह मा दृप्त किं विलम्बसे । ७२।
रामं वनेचरं राज्यभ्रष्टं त्यक्तगृहं जनम् । पित्रा हनं भोगहीनं यदा स्वगृहनिर्गतम् ॥७३॥
एकान्तवासिनं दिग्वस्त्रवल्कलाधारिणम् । तं त्यक्त्वा मां भजस्वाद्य त्रैलोक्येशं महाबलम् ॥७४॥
अमरौघैः सेवितं मां भवन्तं पदस्थितम् । प्रियो मन्दोदरीमुख्यास्त्वां भजिष्यन्त्यहर्निशम् ॥७५॥
मया राज्यं स्वदधीनं कृतमपि भजस्व माम् । मया स्वजीवनं वापि त्वदधीनं कृतं महत् ॥७६॥
इति नानाविधैर्वाक्यैः प्राथयामास रावणः उवाचाधोमुखी सीता निधाय तृणमन्तरे । ७७॥
राघवाद्बिभ्यता नूनं भिक्षुरूपं धृतं त्वया । रहिते राघवाभ्यां त्वं शुनीव हविराध्वरे ॥७८॥
हृतवानसि मां नीच तत्फलं प्राप्स्यसेऽचिरात् । यदा रामशराग्रविदारितवपुर्भवान् ॥
भविष्यसि रणे रामं जानीषे मानुषं तदा । ७९ ।
श्रुत्वा रक्षोधिपः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम् । वाक्यं क्रोधसमाविष्टः पुनर्वचनमब्रवीत् ॥८०॥
प्रविशो लङ्कायां त्रिदशवदनार्त्तिनिवारिणी गतोऽपि स्थाता न युधि पुरतो लक्ष्मणसहः ।
तथा यास्यन्पूर्वेष्विपदमसुनेशश्च झटिती जयः श्रीरामे स्यान्न मम बहुनाशीश्च तु भवेत् ॥८१॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । षष्ठाक्षरमपादेषु चतुर्णं चरणेष्वपि ॥८२॥
सप्तमञ्चापि चत्वारि लोप लोकामुमुं पठ । एवं तया जितो वाक्यवाग्बाणैः स दशाननः ॥८३ ।

मम अवलम्ब जानकर रावण निरन्तर मुझ से प्रेम करता ही रहता है ६९ । 'रामके हाथसे शीघ्र मरनेके लिए मैं चलकर सीताका तिरस्कार करूंगा तो मेरी दुर्दशा देखकर वह वानर रामसे कहेगा ॥ ७० ॥ सो सुनकर राम यहाँ आवेंगे और मुझे मारेंगे' ऐसा विचार करके उस त्रिकूटकी शाखा लेकर सानन्द ऊपर चल पडा ॥ ७१ ॥
नूपुरोंकी ध्वनिश्रवण कर सीताजी घबडा गयीं और उन्होंने मुख बन्द कर लिया । तब रावणने सीतासे कहा- तू मुझसे लजाती क्यों है? ॥ ७२ । वनमें भ्रमण करनेवाले, राजपद सुखजनतासे रहित, पितृहीन, मात-हीन, सदा घर निष्कासित ॥ ७३ । एकान्तवासी दिगम्बर भोग बन्कल भण्डपण्डित वृत्तक (छिन्नवेषधारी) धारण करनेवाले रामको छोडकर तू त्रिजगत्पति और महाबलवान् मुझ रावणका आश्रय ले और मुझे सेवा कर ॥ ७४ ॥ मैं अमरगणोंसे सेवित और आद्यन्तहीन होकर महान् पदपर स्थित हूँ । मेरी सेवा करनेतु मेरी मन्दोदरी आदि स्त्रिये भी रात दिन तेरी दासी बनकर रहेंगी ॥ ७५ ॥ मैने अपना राज्य तथा अपना जीवन तुझको दे दिया है । तू मेरी बनकर रहे ॥ ७६ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके वाक्यद्वारा रावण प्रार्थना करने लगा ।
तब नीचमें तिनकेका त्राट करके तथा नीच मुख किये हुए सीताने कहा-॥ ७७ ॥ अरे पापी ! बडा ढोंग हाँकता है । रामके डरसे तू भिक्षुका रूप धारण करके और श्रीरामलक्ष्मणका अनुपस्थितिम यज्ञमें जैसे कुत्ता हवि अर्थात् हव्यनया सामग्री चुराकर आदि लेकर भागे, उस प्रकार तू मुझे लेकर भग आया है। अरे नीच ! उसका फल तुझको शीघ्र मिल जायगा । जब रामके बाणसे विदारितशरीर होकर तू गिरेगा तब तुझे यह पता लग जायगा कि राम मनुष्य है या और कोई यह सुनकर राक्षसाधिप रावण कुपित होकर जानकीको कठोर वचन कहता हुआ बोला ॥ ७८-८० ॥ 'इस लङ्कामें आकर स्वर्गओकके र्भ, सुख शान्ति हो जायँगे । लक्ष्मणसहित वह राम भी मत समक्ष युद्धमें नहीं खडे रह सकेगा । यहाँ आगतो प्रधुओके सहित बहुत बडी भारी विपत्तिमे पड जागा । यहाँ उस जटाधारी रामकी जीत नही होगी और मुझे भी आनन्द न प्राप्त होगा' ॥ ८१ ॥ रावण-की इस बातको सुनकर जानकीने कहा-चारो चरणोम छठे अक्षर तथा आनेवाले चारो सप्तम अक्षरोका लोप करके तुम इसी श्लोकको फिरसे पढो । वही हल तुम लागोका होगा । कहनेका आशय यह है कि ८१वें श्लोकमेंसे चारो चरणोके प्र वि और न ये चार अक्षर निकल जानेसे यह अर्थ होगा कि लङ्कामे दशवदन रावणके ऊपर शीघ्र ही विपत्ति आ येगी अर्थात् वह झूर जायगा । लक्ष्मणके साथ राम युद्धमें मा हटेंगे ।