अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना जनमेजय उवाच उत्तङ्कः केन तपसा संयुक्तो वै महामनाः । यः शापं दातुकामोऽभूद् विष्णवे प्रभविष्णवे ।। १ ।। जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! महात्मा उत्तंक मुनिने ऐसी कौन-सी तपस्या की थी, जिससे वे सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् विष्णुको भी शाप देनेका संकल्प कर बैठे? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच उत्तङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय । गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत् किंचिदपूजयत् ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुके सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी ।। २ ।। सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथः । औत्तङ्कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्नुयामेति भारत ।। ३ ।। भरतनन्दन! जब वे गुरुकुलमें रहते थे, उन दिनों सभी ऋषिकुमारोंके मनमें यह अभिलाषा होती थी कि हमें भी उत्तंकके समान गुरुभक्ति प्राप्त हो ।। ३ ।। गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय । उत्तङ्केऽभ्यधिका प्रीतिः स्नेहश्चैवाभवत् तदा ।। ४ ।। जनमेजय! गौतमके बहुत-से शिष्य थे, परंतु उनका प्रेम और स्नेह सबसे अधिक उत्तंकमें ही था ।। स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा । सम्यक् चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ।। ५ ।। उत्तंकके इन्द्रियसंयम, बाहर-भीतरकी पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवासे गौतम बहुत प्रसन्न रहते थे ।। ५ ।। अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञातवानृषिः । उत्तङ्कं परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत ।
तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् ॥ ६ ॥ उन महर्षिने अपने सहस्रों शिष्योंको पढ़ाकर घर जानेकी आज्ञा दे दी; परंतु उत्तङ्कपर अधिक प्रेम होनेके कारण वे उन्हें घर जानेकी आज्ञा नहीं देना चाहते थे। तात! क्रमशः उन महामुनि उत्तंकको वृद्धावस्था प्राप्त हुई ॥ ६ ॥ न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः । ततः कदाचिद् राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ ॥ ७ ॥ उत्तङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत् । किंतु वे गुरुवत्सल महर्षि यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लानेके लिये वनमें गये और वहाँसे काठका बहुत बड़ा बोझ उठा लाये ॥ ७ १/२ ॥ स तद्भाराभिभूतात्मा काष्ठभारमरिंदम ॥ ८ ॥ निचिक्षेप क्षितौ राजन् परिश्रान्तो बुभुक्षितः । तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा ॥ ९ ॥ ततः काष्ठैः सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये। उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था। वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे। जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी ॥ ८-९ १/२ ॥ ततः स भारनिष्पिष्टः क्षुधाविष्टश्च भारत ॥ १० ॥ दृष्ट्वा तां वयसोऽवस्थां रुरोदार्तस्वरस्तदा । भारत! भारसे तो वे पिस ही गये थे, भूखने भी उन्हें व्याकुल कर दिया था। अतः अपनी उस अवस्थाको देखकर वे उस समय आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १० १/२ ॥ ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभानना ॥ ११ ॥ जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना । पितुर्नियोगाद् धर्मज्ञा शिरसावनता तदा ॥ १२ ॥ तब कमलदलके समान प्रफुल्ल मुखवाली विशाललोचना परम सुन्दरी धर्मज्ञ गुरुपुत्रीने पिताकी आज्ञा पाकर विनीत भावसे सिर झुकाये वहाँ आयी और अपने हाथोंमें उसने मुनिके आँसू ग्रहण कर लिये ॥ तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभिः । न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही ॥ १३ ॥ उन अश्रुबिन्दुओंसे उसके दोनों हाथ जल गये और आँसुओंसहित पृथ्वीसे जा लगे। परंतु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओंके धारण करनेमें असमर्थ हो गयी ॥ १३ ॥ गौतमस्त्वब्रवीद् विप्रमुत्तङ्कं प्रीतमानसः ।
कस्मात् तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मनः । स स्वैरं ब्रूहि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १४ ॥ फिर गौतमने प्रसन्नचित्त होकर विप्रवर उत्तंकसे पूछा—‘बेटा! आज तुम्हारा मन शोकसे व्याकुल क्यों हो रहा है? मैं इसका यथार्थ कारण सुनना चाहता हूँ। ब्रह्मर्षे! तुम निःसंकोच होकर सारी बातें बताओ’ ॥ १४ ॥ उत्तङ्क उवाच भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया । भवद्भक्तिगतेनेह भवद्भावानुगेन च ॥ १५ ॥ जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे । शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथाः ॥ १६ ॥ उत्तंकने कहा—गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा। आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला। मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी ॥ १५-१६ ॥ भवता त्वभ्यनुज्ञाताः शिष्याः प्रत्यवरा मम । उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों और हजारों शिष्य आपकी सेवामें आये और अध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गये (केवल मैं ही यहाँ पड़ा हुआ हूँ) ॥ १७ ॥ गौतम उवाच त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव । व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ ॥ १८ ॥ गौतमने कहा—विप्रवर! तुम्हारी गुरुशुश्रूषासे तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। इसीलिये इतना अधिक समय बीत गया तो भी मेरे ध्यानमें यह बात नहीं आयी ॥ १८ ॥ किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव । अनुज्ञां प्रतिगृह्य त्वं स्वगृहान् गच्छ मा चिरम् ॥ १९ ॥ भृगुनन्दन! यदि आज तुम्हारे मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहाँसे अपने घरको चले जाओ ॥ १९ ॥ उत्तङ्क उवाच गुर्वर्थं कं प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम । तमुपाहृत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो ॥ २० ॥
उत्तंकने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये। उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ ॥ २० ॥ गौतम उवाच दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्द्भिरुच्यते । तव ह्याचरतो ब्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशयः ॥ २१ ॥ गौतमने कहा—ब्रह्मन्! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है। तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह । युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ॥ २२ ॥ ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज । एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम् ॥ २३ ॥ भृगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती ॥ २२-२३ ॥ ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम् । गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्विनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले— ॥ २४ ॥ कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थं विनियुङ्क्ष्व माम् । प्रियं हितं च काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ॥ २५ ॥ ‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ ॥ २५ ॥ यद् दुर्लभं हि लोकेऽस्मिन् रत्नमत्यद्भुतं महत् । तदानयेयं तपसा न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ २६ ॥ ‘इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान् रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है’ ॥ २६ ॥ अहल्योवाच परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ । पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम् ॥ २७ ॥ अहल्या बोली—निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ॥ २७ ॥
वैशम्पायन उवाच उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद् वचः । आज्ञापयस्व मां मातः कर्तव्यं च तव प्रियम् ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! गुरुपत्नीकी बात सुनकर उत्तंकने फिर कहा —‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये—मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना है’ ॥ २८ ॥ अहल्योवाच सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले । ते समानय भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ॥ २९ ॥ अहल्या बोली—बेटा! राजा सौदासकी रानीने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। उनके ला देनेसे तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी ॥ २९ ॥ स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय । गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥ ३० ॥ जनमेजय! तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये ॥ ३० ॥ स जगाम ततः शीघ्रमुत्तङ्को ब्राह्मणर्षभः । सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक नरभक्षी राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा सौदाससे उन मणिमय कुण्डलोंकी याचना करनेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥ ३१ ॥ गौतमस्त्वब्रवीत् पत्नीमुत्तङ्को नाद्य दृश्यते । इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा ॥ ३२ ॥ उनके चले जानेपर गौतमने पत्नीसे पूछा—‘आज उत्तंक क्यों नहीं दिखायी देता है?’ पतिके इस प्रकार पूछनेपर अहल्याने कहा—‘वह सौदासकी महारानीके कुण्डल ले आनेके लिये गया’ ॥ ३२ ॥ ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् । शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥ ३३ ॥ यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा—‘देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजा सौदास शापवश राक्षस हो गये हैं। अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे’ ॥ ३३ ॥ अहल्योवाच अजानन्त्या नियुक्तः स भगवन् ब्राह्मणो मया । भवत्प्रसादान्न भयं किंचित् तस्य भविष्यति ॥ ३४ ॥
अहल्या बोली— भगवन्! मैं इस बातको नहीं जानती थी, इसीलिये उस ब्राह्मणको ऐसा काम सौंप दिया। मुझे विश्वास है कि आपकी कृपासे उसे वहाँ कोई भय नहीं प्राप्त होगा ।। ३४ ।। इत्युक्तः प्राह तां पत्नीमेवमस्त्विति गौतमः । उत्तङ्कोऽपि वने शून्ये राजानं तं ददर्श ह ।। ३५ ।। यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा—‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ उधर उत्तंक निर्जन वनमें जाकर राजा सौदााससे मिले ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कुण्डलाहरणे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें कुण्डलाहरणविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना वैशम्पायन उवाच स तं दृष्ट्वा तथाभूतं राजानं घोरदर्शनम् । दीर्घश्मश्रुधरं नृणां शोणितेन समुक्षितम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा सौदास राक्षस होकर बड़े भयानक दिखायी देते थे। उनकी मूँछ और दाढ़ी बहुत बड़ी थी। वे मनुष्योंके रक्तसे रँगे हुए थे ।। १ ।। चकार न व्यथां विप्रो राजा त्वेनमथाब्रवीत् । प्रत्युत्थाय महातेजा भयकर्ता यमोपमः ।। २ ।। उन्हें देखकर विप्रवर उत्तंकको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्हें देखते ही महातेजस्वी राजा सौदास, जो यमराजके समान भयंकर थे, उठकर खड़े हो गये और उनके पास जाकर बोले— ।। २ ।। दिष्ट्या त्वमसि कल्याण षष्ठे काले ममान्तिकम् । भक्ष्यं मृगयमाणस्य सम्प्राप्तो द्विजसत्तम ।। ३ ।। ‘कल्याणस्वरूप द्विजश्रेष्ठ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि दिनके छठे भागमें आप स्वयं ही मेरे पास चले आये। मैं इस समय आहार ही ढूँढ़ रहा था’ ।। ३ ।। उत्तङ्क उवाच राजन् गुर्वर्थिनं विद्धि चरन्तं मामिहागतम् । न च गुर्वर्थमुद्युक्तं हिंस्यमाहुर्मनीषिणः ।। ४ ।। उत्तंक बोले—राजन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं गुरुदक्षिणाके लिये घूमता- फिरता यहाँ आया हूँ। जो गुरुदक्षिणा जुटानेके लिये उद्योगशील हो, उसकी हिंसा नहीं करनी चाहिये, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ।। ४ ।। राजोवाच षष्ठे काले ममाहारो विहितो द्विजसत्तम । न शक्यस्त्वं समुत्स्रष्टुं क्षुधितेन मयाद्य वै ।। ५ ।। राजाने कहा—द्विजश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें मेरे लिये आहारका विधान किया गया है। यह वही समय है। मैं भूखसे पीड़ित हो रहा हूँ। इसलिये मेरे हाथोंसे तुम छूट नहीं सकते ।। ५ ।।
उत्तङ्क उवाच एवमस्तु महाराज समयः क्रियतां तु मे । गुर्वर्थमभिनिर्वर्त्य पुनरेष्यामि ते वशम् ॥ ६ ॥ उत्तंकने कहा—महाराज! ऐसा ही सही, किंतु मेरे साथ एक शर्त कर लीजिये। मैं गुरुदक्षिणा चुकाकर फिर आपके वशमें आ जाऊँगा ।। ६ ।। संश्रुतश्च मया योऽर्थो गुरवे राजसत्तम । त्वदधीनः स राजेन्द्र तं त्वां भिक्षे नरेश्वर ॥ ७ ॥ राजेन्द्र! नृपश्रेष्ठ! मैंने गुरुको जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही अधीन है; अतः नरेश्वर! मैं आपसे उसकी भीख माँगता हूँ ।। ७ ।। ददासि विप्रमुख्येभ्यस्त्वं हि रत्नानि नित्यदा । दाता च त्वं नरव्याघ्र पात्रभूतः क्षिताविह । पात्रं प्रतिग्रहे चापि विद्धि मां नृपसत्तम ॥ ८ ॥ पुरुषसिंह! आप प्रतिदिन बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको रत्न प्रदान करते हैं। इस पृथ्वीपर आप एक श्रेष्ठ दानीके रूपमें प्रसिद्ध हैं और मैं भी दान लेनेका पात्र हूँ। नृपश्रेष्ठ! आप मुझे प्रतिग्रहका अधिकारी समझें ।। ८ ।। उपाहृत्य गुरोरर्थं त्वदायत्तमरिंदम । समयेनेह राजेन्द्र पुनरेष्यामि ते वशम् ॥ ९ ॥ शत्रुदमन राजेन्द्र! गुरुका धन जो आपके ही अधीन है, उन्हें अर्पित करके मैं अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार फिर आपके अधीन हो जाऊँगा ।। ९ ।। सत्यं ते प्रतिजानामि नात्र मिथ्या कथंचन । अनृतं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १० ॥ मैं आपसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ, इसमें किसी तरह मिथ्याके लिये स्थान नहीं है। मैं पहले कभी परिहासमें भी झूठ नहीं बोला हूँ, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता हूँ ।। १० ।। सौदास उवाच यदि मत्तस्तवायत्तो गुर्वर्थः कृत एव सः । यदि चास्मि प्रतिग्राह्यः साम्प्रतं तद् वदस्व मे ॥ ११ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मन्! यदि आपकी गुरुदक्षिणा मेरे अधीन है तो उसे मिली हुई ही समझिये। यदि आप मेरी कोई वस्तु लेनेके योग्य मानते हैं तो बताइये, इस समय मैं आपको क्या दूँ? ।। ११ ।। उत्तङ्क उवाच प्रतिग्राह्यो मतो मे त्वं सदैव पुरुषर्षभ ।
सोऽहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ १२ ॥ उत्तंकने कहा—पुरुषप्रवर! आपका दिया हुआ दान मैं सदा ही ग्रहण करनेके योग्य मानता हूँ। इस समय मैं आपकी रानीके दोनों मणिमय कुण्डल माँगनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ १२ ॥ सौदास उवाच पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे उचिते मणिकुण्डले । वरयार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ॥ १३ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मर्षे! वे मणिमय कुण्डल तो मेरी रानीके ही योग्य हैं। सुव्रत! आप और कोई वस्तु माँगिये, उसे मैं आपको अवश्य दे दूँगा ॥ १३ ॥ उत्तङ्क उवाच अलं ते व्यपदेशेन प्रमाणा यदि ते वयम् । प्रयच्छ कुण्डले मह्यं सत्यवाग् भव पार्थिव ॥ १४ ॥ उत्तंकने कहा—पृथ्वीनाथ! अब बहाना करना व्यर्थ है। यदि आप मुझपर विश्वास करते हैं तो वे दोनों मणिमय कुण्डल आप मुझे दे दें और सत्यवादी बनें ॥ १४ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तस्त्वब्रवीद् राजा तमुत्तङ्कं पुनर्वचः । गच्छ मद्द्वचनाद् देवीं ब्रूहि देहीति सत्तम ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा फिर उत्तंकसे बोले —‘साधुशिरोमणे! आप रानीके पास जाइये और मेरी आज्ञा सुनाकर कहिये। आप मुझे कुण्डल दे दें ॥ १५ ॥ सैवमुक्ता त्वया नूनं मद्वाक्येन शुचिव्रता । प्रदास्यति द्विजश्रेष्ठ कुण्डले ते न संशयः ॥ १६ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! रानी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं। जब आप उनसे इस प्रकार कहेंगे, तब वे मेरी आज्ञा मानकर दोनों कुण्डल आपको दे देंगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ उत्तङ्क उवाच क्व पत्नी भवतः शक्या मया द्रष्टुं नरेश्वर । स्वयं वापि भवान् पत्नीं किमर्थं नोपसर्पति ॥ १७ ॥ उत्तंक बोले—नरेश्वर! मैं कहाँ आपकी पत्नीको ढूँढ़ता फिरूँगा? मुझे क्योंकर उनका दर्शन हो सकेगा? आप स्वयं ही अपनी पत्नीके पास क्यों नहीं चलते? ॥ सौदास उवाच
तां द्रक्ष्यति भवानद्य कस्मिंश्चिद् वननिर्झरे । षष्ठे काले न हि मया सा शक्या द्रष्टुमद्य वै ॥ १८ ॥ सौदासने कहा—ब्रह्मन्! उन्हें आज आप वनमें किसी झरनेके पास देखेंगे। यह दिनका छठा भाग है (मैं आहारकी खोजमें हूँ), अतः इस समय मैं उनसे नहीं मिल सकता ॥ १८ ॥ वैशम्पायन उवाच उत्तङ्कस्तु तथोक्तः स जगाम भरतर्षभ । मदयन्तीं च दृष्ट्वा स ज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ १९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतभूषण! राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंक मुनि महारानी मदयन्तीके पास गये और उनसे अपने आनेका प्रयोजन बतलाया ॥ १९ ॥ सौदासवचनं श्रुत्वा ततः सा पृथुलोचना । प्रत्युवाच महाबुद्धिमुत्तङ्कं जनमेजय ॥ २० ॥ जनमेजय! राजा सौदासका संदेश सुनकर विशाललोचना रानीने महाबुद्धिमान् उत्तंक मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २० ॥ एवमेतद् वद ब्रह्मन् नानृतं वदसेऽनघ । अभिज्ञानं तु किंचित् त्वं समानयितुमर्हसि ॥ २१ ॥ 'ब्रह्मन्! आप जो कहते हैं, वह ठीक है। अनघ! यद्यपि आप असत्य नहीं बोलते हैं, तथापि आप महाराजके ही पाससे उन्हींका संदेश लेकर आये हैं, इस बातका कोई प्रमाण आपको लाना चाहिये ॥ २१ ॥ इमे हि दिव्ये मणिकुण्डले मे देवाश्च यक्षाश्च महर्षयश्च । तैस्तैरुपायैरपहर्तुकामा- श्छिद्रेषु नित्यं परितर्कयन्ति ॥ २२ ॥ 'मेरे ये दोनों मणिमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष और महर्षि लोग नाना प्रकारके उपायोंद्वारा इसे चुरा ले जानेकी इच्छा रखते हैं और इसके लिये सदा छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं ॥ २२ ॥ निक्षिप्तमेतद् भुवि पन्नगास्तु रत्नं समासाद्य परामृशेयुः । यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च निद्रावशाद् वा परिधर्षयेयुः ॥ २३ ॥ 'यदि इन कुण्डलोंको पृथ्वीपर रख दिया जाय तो नाग लोग इसे हड़प लेंगे। अपवित्र अवस्थामें इन्हें धारण करनेपर यक्ष उड़ा ले जायँगे और यदि इन्हें पहनकर नींद लेने लग
जाय तो देवतालोग बलात् छीन ले जायँगे ॥ २३ ॥ छिद्रेष्वेतेष्विमे नित्यं ह्रियते द्विजसत्तम । देवराक्षसनागानामप्रमत्तेन धार्यते ॥ २४ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! इन छिद्रोंमें इन दोनों कुण्डलोंके खो जानेका भय सदा बना रहता है। जो देवता, राक्षस और नागोंकी ओरसे सावधान होता है, वही इन्हें धारण कर सकता है ॥ २४ ॥ स्यन्देते हि दिवा रुक्मं रात्रौ च द्विजसत्तम । नक्तं नक्षत्रताराणां प्रभामाक्षिप्य वर्ततः ॥ २५ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! ये दोनों कुण्डल रात-दिन सोना टपकाते रहते हैं। इतना ही नहीं, रातमें ये नक्षत्रों और तारोंकी प्रभाको भी छीन लेते हैं ॥ २५ ॥ एते ह्यामुच्य भगवन् क्षुत्पिपासाभयं कुतः । विषाग्निश्वपदादेभ्यश्च भयं जातु न विद्यते ॥ २६ ॥ ‘भगवन्! इन्हें धारण कर लेनेपर भूख-प्यासका भय कहाँ रह जाता है? विष, अग्नि और हिंसक जन्तुओंसे भी कभी भय नहीं होता है ॥ २६ ॥ ह्रस्वेन चैते आमुक्ते भवतो ह्रस्वके तदा । अनुरूपेण चामुक्ते जायेते तत्प्रमाणके ॥ २७ ॥ ‘छोटे कदका मनुष्य इन कुण्डलोंको पहने तो छोटे हो जाते हैं और बड़ी डील- डौलवाले मनुष्यके पहननेपर उसीके अनुरूप बड़े हो जाते हैं ॥ २७ ॥ एवंविधे ममैते वै कुण्डले परमार्चिते । त्रिषु लोकेषु विज्ञाते तदभिज्ञानमानय ॥ २८ ॥ ‘ऐसे गुणोंसे युक्त होनेके कारण मेरे ये दोनों कुण्डल तीनों लोकोंमें परम प्रशंसित एवं प्रसिद्ध हैं। अतः आप महाराजकी आज्ञासे इन्हें लेने आये हैं, इसका कोई पहचान या प्रमाण लाइये’ ॥ २८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंक मुनिका उपाख्यानविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना वैशम्पायन उवाच स मित्रसहमासाद्य अभिज्ञानमयाचत । तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! रानी मदयन्तीकी बात सुनकर उत्तंकने महाराज मित्रसह (सौदास)-के पास जाकर उनसे कोई पहचान माँगी। तब इक्ष्वाकुवंशियोंमें श्रेष्ठ उन नरेशने पहचानके रूपमें रानीको सुनानेके लिये निम्नांकित सन्देश दिया ॥ १ ॥ सौदास उवाच न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः । एतन्मे मतमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले ॥ २ ॥ सौदास बोले— प्रिये! मैं जिस दुर्गतिमें पड़ा हूँ, यह मेरे लिये कल्याण करनेवाली नहीं है तथा इसके सिवा अब दूसरी कोई भी गति नहीं है। मेरे इस विचारको जानकर तुम अपने दोनों मणिमय कुण्डल इन ब्राह्मणदेवताको दे डालो ॥ २ ॥ इत्युक्तस्तामुत्तङ्कस्तु भर्तुर्वाक्यमथाब्रवीत् । श्रुत्वा च सा तदा प्रादात् ततस्ते मणिकुण्डले ॥ ३ ॥ राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंकने रानीके पास जाकर पतिकी कही हुई बात ज्यों-की-त्यों दोहरा दी। महारानी मदयन्तीने स्वामीका वचन सुनकर उसी समय अपने मणिमय कुण्डल उत्तंक मुनिको दे दिये ॥ ३ ॥ अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत् । किमेतद् गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥ उन कुण्डलोंको पाकर उत्तंक मुनि पुनः राजाके पास आये और इस प्रकार बोले —'पृथ्वीनाथ! आपके गूढ़ वचनका क्या अभिप्राय था, यह मैं सुनना चाहता हूँ' ॥ ४ ॥ सौदास उवाच प्रजानिसर्गाद् विप्रान् वै क्षत्रियाः पूजयन्ति ह । विप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति वै ॥ ५ ॥
सौदास बोले—ब्रह्मन्! क्षत्रियलोग सृष्टिके प्रारम्भकालसे ब्राह्मणोंकी पूजा करते आ रहे हैं तथापि ब्राह्मणोंकी ओरसे भी क्षत्रियोंके लिये बहुत-से दोष प्रकट हो जाते हैं ।। ५ ।। सोऽहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद् दोषमवाप्तवान् । गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान् ।। ६ ।। मैं सदा ही ब्राह्मणोंको प्रणाम किया करता था, किंतु एक ब्राह्मणके ही शापसे मुझे यह दोष—यह दुर्गति प्राप्त हुई है। मैं मदयन्तीके साथ यहाँ रहता हूँ, मुझे इस दुर्गतिसे छुटकारा पानेका कोई उपाय नहीं दिखायी देता ।। ६ ।। न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतां वर । स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम ।। ७ ।। जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर! अब इस लोकमें रहकर सुख पाना और परलोकमें स्वर्गीय सुख भोगनेके लिये मुझे दूसरी कोई गति नहीं दीख पड़ती ।। ७ ।। न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः । शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ।। ८ ।। कोई भी राजा विशेषरूपसे ब्राह्मणोंके साथ विरोध करके न तो इसी लोकमें चैनसे रह सकता है और न परलोकमें ही सुख पा सकता है। यही मेरे गूढ़ संदेशका तात्पर्य है ।। ८ ।। तदिष्टे ते मया दत्ते एते स्वे मणिकुण्डले । यः कृतस्तेऽद्य समयः सफलं तं कुरुष्व मे ।। ९ ।। अच्छा अब आपकी इच्छाके अनुसार ये अपने मणिमय कुण्डल मैंने आपको दे दिये। अब आपने जो प्रतिज्ञा की है, वह सफल कीजिये ।। ९ ।। उत्तङ्क उवाच राजंस्तथेह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम् । प्रश्नं च कंचित् प्रष्टुं त्वां निवृत्तोऽस्मि परंतप ।। १० ।। **उत्तंकने कहा—**राजन्! शत्रुसंतापी नरेश! मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा, पुनः आपके अधीन हो जाऊँगा; किंतु इस समय एक प्रश्न पूछनेके लिये आपके पास लौटकर आया हूँ ।। १० ।। सौदास उवाच ब्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः । छेत्तास्मि संशयं तेऽद्य न मेऽत्रास्ति विचारणा ।। ११ ।। **सौदासने कहा—**विप्रवर! आप इच्छानुसार प्रश्न कीजिये। मैं आपकी बातका उत्तर दूँगा। आपके मनमें जो भी संदेह होगा अभी उसका निवारण करूँगा। इसमें मुझे कुछ भी विचार करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।। ११ ।। उत्तङ्क उवाच
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः । मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥ १२ ॥ उत्तंकने कहा—राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो—सत्यवादी हो। जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ॥ १२ ॥ स भवान् मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव । स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ ॥ १३ ॥ पृथ्वीनाथ! पुरुषप्रवर! आज आपके साथ मेरी मित्रता हो गयी है, इसलिये आप मुझे अच्छी सलाह दीजिये ॥ १३ ॥ अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः । भवत्सकाशमागन्तुं क्षमं मम न वेति वै ॥ १४ ॥ आज यहाँ मेरा मनोरथ सफल हो गया है और आप नरभक्षी राक्षस हो गये हैं। ऐसी दशामें आपके पास मेरा फिर लौटकर आना उचित है या नहीं ॥ १४ ॥ सौदास उवाच क्षमं चेदिह वक्तव्यं तव द्विजवरोत्तम । मत्समीपं द्विजश्रेष्ठ नागन्तव्यं कथंचन ॥ १५ ॥ सौदासने कहा—द्विजश्रेष्ठ! यदि यहाँ मुझे उचित बात कहनी है, तब तो मैं यही कहूँगा कि ब्राह्मणोत्तम! आपको मेरे पास किसी तरह नहीं आना चाहिये ॥ १५ ॥ एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह । आगच्छतो हि ते विप्र भवेन्मृत्युर्न संशयः ॥ १६ ॥ भृगुकुलभूषण विप्र! ऐसा करनेमें ही मैं आपकी भलाई देखता हूँ। यदि आयेंगे तो आपकी मृत्यु हो जायगी। इसमें संशय नहीं है ॥ १६ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः स तदा राज्ञा क्षमं बुद्धिमता हितम् । अनुज्ञाप्य स राजानमहल्यां प्रतिजग्मिवान् ॥ १७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् राजा सौदासके मुखसे उचित और हितकी बात सुनकर उनकी आज्ञा ले उत्तंक मुनि अहल्याके पास चल दिये ॥ १७ ॥ गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्नयाः प्रियंकरः । जवेन महता प्रायाद् गौतमस्याश्रमं प्रति ॥ १८ ॥ गुरुपत्नीका प्रिय करनेवाले उत्तंक दोनों दिव्य कुण्डल लेकर बड़े वेगसे गौतमके आश्रमकी ओर बढ़े ॥ १८ ॥
यथा तयो रक्षणं च मदयन्त्याभिभाषितम् । तथा ते कुण्डले बद्ध्वा तदा कृष्णाजिनेऽनयत् ॥ १९ ॥ रानी मदयन्तीने उन कुण्डलोंकी रक्षाके लिये जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उन्हें काले मृगचर्ममें बाँधकर वे ले जा रहे थे ॥ १९ ॥ स कस्मिंश्चित् क्षुधाविष्टः फलभारसमन्वितम् । बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं ततः ॥ २० ॥ शाखामासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम । पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गवः ॥ २१ ॥ शत्रुदमन! रास्तेमें एक स्थानमें उन्हें बड़े जोरकी भूख लगी। वहाँ पास ही फलोंके भारसे झुका हुआ एक बेलका वृक्ष दिखायी दिया। ब्रह्मर्षि उत्तंक उस वृक्षपर चढ़ गये और उस काले मृगचर्मको उन्होंने उसकी एक शाखामें बाँध दिया। फिर वे ब्राह्मणपुंगव उस समय वहाँ बेल तोड़-तोड़कर गिराने लगे ॥ २०-२१ ॥ अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुषः । न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो ॥ २२ ॥ यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै । उस समय उनकी दृष्टि बेलोंपर ही लगी हुई थी (वे कहाँ गिरते हैं, इसकी ओर उनका ध्यान नहीं था)। प्रभो! उनके तोड़े हुए प्रायः सभी बेल उस मृगछालापर ही, जिसमें उन विप्रवरने वे दोनों कुण्डल बाँध रखे थे, गिरे ॥ २२ १/२ ॥ बिल्वप्रहारैस्तस्याथ व्यशीर्यद् बन्धनं ततः ॥ २३ ॥ सकुण्डलं तदजिनं पपात सहसा तरोः । उन बेलोंकी चोटसे बन्धन टूट गया और कुण्डलसहित वह मृगचर्म सहसा वृक्षसे नीचे जा गिरा ॥ २३ १/२ ॥ विशीर्णबन्धने तस्मिन् गते कृष्णाजिने महीम् ॥ २४ ॥ अपश्यद् भुजगः कश्चित् ते तत्र मणिकुण्डले । ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः ॥ २५ ॥ विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले । बन्धन टूट जानेपर उस काले मृगछालाके पृथ्वीपर गिरते ही किसी सर्पकी दृष्टि उसपर पड़ी। वह ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुआ तक्षक था। उसने मृगछालाके भीतर रखे हुए उस मणिमय कुण्डलोंको देखा। फिर तो बड़ी शीघ्रता करके वह उन कुण्डलोंको दाँतोंमें दबाकर एक बाँबीमें घुस गया ॥ २४-२५ १/२ ॥ ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह ॥ २६ ॥ पपात वृक्षात् सोद्वेगो दुःखात् परमकोपनः । स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत् तदा ॥ २७ ॥
सर्पके द्वारा कुण्डलोंका अपहरण होता देख उत्तंक मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वृक्षसे कूद पड़े। आकर एक काठका डंडा हाथमें ले उसीसे उस बाँबीको खोदने लगे ॥ २६-२७ ॥ अहानि त्रिंशद्व्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत । क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणसत्तमः ॥ २८ ॥ भरतनन्दन! ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक क्रोध और अमर्षसे संतप्त हो लगातार पैंतीस दिनोंतक बिना किसी घबराहटके बिल खोदनेके कार्यमें जुटे रहे ॥ २८ ॥ तस्य वेगमसह्यं तमसहन्ती वसुन्धरा । दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला ॥ २९ ॥ उनके उस असह्य वेगको पृथ्वी भी नहीं सह सकी। वह डंडेकी चोटसे घायल एवं अत्यन्त व्याकुल होकर डगमगाने लगी ॥ २९ ॥ ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् । नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥ ३० ॥ रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् । वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥ ३१ ॥ उत्तंक नागलोकमें जानेका मार्ग बनानेके लिये निश्चय करके धरती खोदते ही जा रहे थे कि महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर उस स्थानपर आ पहुँचे और विप्रवर उत्तंकसे मिले ॥ ३०-३१ ॥ वैशम्पायन उवाच स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः । उत्तङ्कमब्रवीद् वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै ॥ ३२ ॥ इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः । न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ॥ ३३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इन्द्र उत्तंकके दुःखसे दुःखी थे। अतः ब्राह्मणका वेष बनाकर उनसे बोले—‘ब्रह्मन्! यह काम तुम्हारे वशका नहीं है। नागलोक यहाँसे हजारों योजन दूर है। इस काठके डंडेसे वहाँका रास्ता बने, यह कार्य सधनेवाला नहीं जान पड़ता’ ॥ ३२-३३ ॥
उत्तङ्क उवाच नागलोके यदि ब्रह्मन् न शक्ये कुण्डले मया । प्राप्तुं प्राणान् विमोक्ष्यामि पश्यतस्तु द्विजोत्तम ।। ३४ ।। उत्तंकने कहा—ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोकमें जाकर उन कुण्डलोंको प्राप्त करना मेरे लिये असम्भव है तो मैं आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा ।। ३४ ।। वैशम्पायन उवाच यदा स नाशकत् तस्य निश्चयं कर्तुमन्यथा । वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युयोज ह ।। ३५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वज्रधारी इन्द्र जब किसी तरह उत्तंकको अपने निश्चयसे न हटा सके, तब उन्होंने उनके डंडेके अग्रभागमें अपने वज्रास्त्रका संयोग कर दिया ।। ३५ ।। ततो वज्रप्रहारैस्तैर्दार्यमाणा वसुन्धरा । नागलोकस्य पन्थानमकरोज्जनमेजय ।। ३६ ।।
जनमेजय! उस वज्रके प्रहारसे विदीर्ण होकर पृथ्वीने नागलोकका रास्ता प्रकट कर दिया ॥ ३६ ॥ स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह । ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः ॥ ३७ ॥ उसी मार्गसे उन्होंने नागलोकमें प्रवेश किया और देखा कि नागोंका लोक सहस्रों योजन विस्तृत है ॥ ३७ ॥ प्राकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वलंकृतैः । उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा ॥ ३८ ॥ महाभाग! उसके चारों ओर दिव्य परकोटे बने हुए हैं; जो सोनेकी ईंटोंसे बने हुए हैं और मणि-मुक्ताओंसे अलंकृत हैं ॥ ३८ ॥ वापीः स्फटिकसोपाना नदीश्च विमलोदकाः । ददर्श वृक्षांश्च बहून् नानाद्विजगणायुतान् ॥ ३९ ॥ वहाँ स्फटिक मणिकी बनी हुई सीढ़ियोंसे सुशोभित बहुत-सी बावडियों, निर्मल जलवाली अनेकानेक नदियों और विहगवृन्दसे विभूषित बहुत-से मनोहर वृक्षोंको भी उन्होंने देखा ॥ ३९ ॥ तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः । पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥ ४० ॥ भृगुकुलतिलक उत्तंकने नागलोकका बाहरी दरवाजा देखा, जो सौ योजन लंबा और पाँच योजन चौड़ा था ॥ ४० ॥ नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा । निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ॥ ४१ ॥ नागलोककी वह विशालता देखकर उत्तंक मुनि उस समय दीन—हतोत्साह हो गये। अब उन्हें फिर कुण्डल पानेकी आशा नहीं रही ॥ ४१ ॥ तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः । ताम्रास्यनेत्रः कौरव्य प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ४२ ॥ इसी समय उनके पास एक घोड़ा आया, जिसकी पूँछके बाल काले और सफेद थे। उसके नेत्र और मुँह लाल रंगके थे। कुरुनन्दन! वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ॥ ४२ ॥ धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे । ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ॥ ४३ ॥ उसने उत्तंकसे कहा—विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्गमें फूँक मारो। ऐसा करनेसे ऐरावतके पुत्रने जो तुम्हारे दोनों कुण्डल लाये हैं, वे तुम्हें मिल जायँगे ॥ ४३ ॥ मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथंचन ।
त्वयैतद्धि समातीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा ॥ ४४ ॥ 'बेटा! इस कार्यमें तुम किसी तरह घृणा न करो; क्योंकि गौतमके आश्रममें रहते समय तुमने अनेक बार ऐसा किया है' ॥ ४४ ॥ उत्तङ्क उवाच कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति । यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्धयहम् ॥ ४५ ॥ उत्तंकने पूछा—गुरुदेवके आश्रमपर मैंने कभी आपका दर्शन किया है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? और आपके कथनानुसार वहाँ रहते समय पहले जो कार्य मैं अनेक बार कर चुका हूँ, वह क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ४५ ॥ अश्व उवाच गुरोर्गुरुं मां जानीहि ज्वलनं जातवेदसम् । त्वया ह्यहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजितः ॥ ४६ ॥ विधिवत् सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन । तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु मा चिरम् ॥ ४७ ॥ घोड़ेने कहा—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु जातवेदा अग्नि हूँ, यह तुम अच्छी तरह जान लो। भृगुनन्दन! तुमने अपने गुरुके लिये सदा पवित्र रहकर विधिपूर्वक मेरी पूजा की है। इसलिये मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब तुम मेरे बताये अनुसार कार्य करो, विलम्ब न करो ॥ ४६-४७ ॥
इत्युक्तस्तु तथाकार्षीदुत्तङ्कश्चित्रभानुना । घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ४८ ॥ अग्निदेवके ऐसा कहनेपर उत्तंकने उनकी आज्ञाका पालन किया। तब घृतमयी अर्चिवाले अग्निदेव प्रसन्न होकर नागलोकको जला डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४८ ॥ ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो धम्यतस्तत्र भारत । घनः प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावहः ॥ ४९ ॥ भारत! जिस समय उत्तंकने फूँक मारना आरम्भ किया, उसी समय उस अश्वरूपधारी अग्निके रोम-रोमसे घनीभूत धूम उठने लगा; जो नागलोकको भयभीत करनेवाला था ॥ ४९ ॥ तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत । नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५० ॥ महाराज भरतनन्दन! बढ़ते हुए उस महान् धूमसे आच्छन्न हुए नागलोकमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५० ॥ हाहाकृतमभूत् सर्वमैरावतनिवेशनम् । वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ॥ ५१ ॥