भारतकोश
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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

प्रकाशक : परिमल पब्लिकेशन्स २७/२८ शक्ति नगर दिल्ली - ११०००७ दूरभाष : २३८४५४५६, ४७०१५१६८ ई-मेल : order@parimalpublication.com © डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ISBN : 978-81-7110-386-7 (सेट) 978-81-7110-387-4 (भाग- १) प्रथम संस्करण : वर्ष २०११ मूल्य - १८५०.०० रुपये (भाग १-२) मुद्रक विशाल कौशिक प्रिंटर्स नजदीक जी.टी.बी. हॉस्पिटल, जगतपुरी विस्तार, दिल्ली-११००९३

Parimal Sanskrit Series No. 113 Bhuvanadevācārya’s Sūtrasantānaguṇakīrtiprakāśāparanāmadheyā APARĀJITAPṚCCHĀ (Treatise of Housing, Architecture, Mathematics, Iconography, Music and Dance etc.) [Along with Sanskrit Text & ‘Mohanabodhinī’ Hindi commentary] Vol. I (Sūtra : 1-138) MKatyayana Translated & Edited with scholarly notes by Dr. Shri Krishna ‘Jugnu’ Prof. Bhanwar Sharma PARIMAL PUBLICATIONS DELHI

Published by PARIMAL PUBLICATIONS Office : 27/28, Shakti Nagar, Delhi-110007 (INDIA) Retail Outlet : 22/3, Shakti Nagar, Delhi-110007 (INDIA) ph. : +91-11-23845456, 47015168 e-mail : order@parimalpublication.com url : http://www.parimalpublication.com © Dr. Shrikrishna ‘Jugnu’ All rights reserved. No part of this publication may be reproduced or transmitted in any form or by any means, electronic or mechanical, including photocopy, recording or any information storage and retrieval system, without permission in writing from the authors. First Edition : Year 2011 ISBN : 978-81-7110-386-7 (Set) 978-81-7110-387-4 (Vol. I) PRICE : Rs. 1850.00 (Set of 2 Vols.) <u>Printed at</u> Vishal Kaushik Printers Near G.T.B. Hospital, Jagat Puri Vistar, Delhi-93

अलख, आनन्द, लक्ष्मी अध्यात्म गुरु एवं माता-पिता की स्मृति में शिल्पशास्त्र के अनुवाद का यह पुष्प... – भँवर शर्मा परम श्रद्धेय पिताश्री एवं सद्गुरु नित्यलीलालीन पण्डिततुल्य श्रीमद् मोहनलालजी चौहान की पुण्य स्मृति में... – श्रीकृष्ण

उपोद्घात कला किसी भी सभ्यता और संस्कृति की जीवन्त साक्ष्य होती है। मानवीय मन्तव्य और मनन के मूर्त-स्वरूप के रूप में कला ही किसी क्षेत्र की विरासत और थाती को स्वर देती प्रतीत होती है। कलारूपों ने ही किसी भूखण्ड और उसके कालखण्ड के मानकीकरण का आदर्श प्रस्तुत किया है। ज्यों-ज्यों कला में निखार आता गया, वह आदिम राहों से निकलकर लोक की पगडण्डी पर अग्रसर होती हुई अभिजननीय शास्त्रोचित राजमार्ग के निर्देशक-स्तम्भ के रूप में सम्मान प्राप्त करती चली गई। इस प्रकार हम कल्पनाओं की प्रसूती से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की यात्रा का अवलोकन करते आए हैं। देववाद के विकास के साथ ही कलाओं के प्रवर्त्तनकर्ता के रूप में शिल्पदेव विश्वकर्मा का आविर्भाव कुछ ऐसे ही सोपानों से होकर सम्मान के सिंहासन तक पहुँचा है। वेदों में यह कामना की गई है कि हम सुखकर, रमणीय और ऐश्वर्ययुक्त स्थान प्राप्त करें। हमारी प्राप्तियाँ और प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ धन-वैभव का आप रक्षण करें। हमें सदैव कल्याणकारी साधनों- उपस्करों से सुरक्षित रखें : वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या। पाहि क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥ (ऋग्वेद 7, 54, 3) वैदिक काल में यद्यपि इस मान्यता के बीजों को देखा जा सकता है किन्तु उत्तरवैदिक काल में स्पष्टतः शिल्प के देवता के रूप में विश्वकर्मा सुस्थापित हुए हैं। यद्यपि कई विद्वानों ने दो-तीन विश्वकर्माओं की मान्यताओं का विचार भी दिया है किन्तु इसमें दो मत नहीं हो सकते हैं कि कलाओं के रूपों में ज्यों-ज्यों विकास हुआ, विश्वकर्मा की परम्परा को बल मिला और एक अजस्र धारा के रूप में यत्र- तत्र ही नहीं, सर्वत्र उनकी उपस्थिति को स्वीकारा गया। पुराणों में सर्वत्र ईश्वरीय रचनाओं के लिए विश्वकर्मा का स्मरण किया गया है, चाहे वह सूर्य को उचित स्वरूप देने का ही विचार क्यों न हो। प्रभासपुत्र के रूप में विश्वकर्मा की मत्स्यपुराणोक्त विचारधारा के मूल में ऐसा जान पड़ता है कि धातु-रत्नादि के व्यापार के लिए आने-जाने वालों ने प्रभास-सौराष्ट्र ही नहीं, मेवाड़ क्षेत्र को भी बहुत प्रतिष्ठा और समृद्धि प्रदान की और वहाँ जिस शिल्पी समुदाय की उन्नति हुई, वह विश्वकर्मा की परम्परा का पोषणकर्ता सिद्ध हुआ। यह परम्परा मौर्यकाल से ही देखने में आती है क्योंकि तब थल ही नहीं, जल स्थापत्य तक का वहाँ विकास हो चुका था। ज्यों-ज्यों इस समुदाय का महत्व बढ़ा, वह अनेक क्षेत्रों में शासकों ही

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नहीं, सामन्तों और सर्वसामान्य द्वारा भी ससम्मान निमन्त्रित किया जाने लगा और ये शिल्पी अपने साथ अपनी कलाओं को ले गए। इसलिए पश्चिमी भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में 10वीं सदी तक की अनेक निर्मितियों में अद्भुत एकता का दर्शन होता है। विक्रम की पहली सदी पूर्व सम्पादित माने जाने वाले भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनेक स्थलों के गहन अवगाहन के आधार पर यह प्रतीत होता है कि जिन दिनों रत्न-धातु आदि के व्यापारियों और विक्रेताओं के लिए अगस्तिमत जैसे ग्रन्थ सम्मान्य थे, तब ही विश्वकर्मा का कोई विशाल ग्रन्थ अस्तित्व में आ चुका था और उनमें जनोपयोगी समस्त शिल्प सामग्रियों के संयोजन से लेकर निर्माण और न्यास तक की विधियों को विस्तार से वर्णन था। भरताचार्य ने उसी आधार पर नाट्यशाला सहित वास्तुकर्म की विधि को उद्धृत किया, इन्द्रध्वज सहित रत्नाभूषणों, आयुधों का निर्माण-निरूपण को अङ्गीकार किया। यह निश्चित ही पश्चिमी भारत में रचा गया था क्योंकि जितने प्रकार के भूरूपों भाषाओं, भूवासी-जातियों की भूषाओं का उसमें प्राथमिकताओं के साथ वर्णन है, वह विविधता इस क्षेत्र में प्रथमतया विद्यमान रही है। इसी आधार पर मैंने 'वास्तुतन्त्र' जिसे बाद में विश्वकर्मप्रकाश नाम दिया गया, के आद्यरूप की रचना इसी क्षेत्र में होना स्वीकारा है, गर्गसंहिता के वास्तु विषयक अध्याय और उसी आधार पर रचित 'बृहत्संहिता', 'विष्णुधर्मोत्तरपुराण', 'मत्स्यपुराण' इत्यादि भी इस विचार का पोषण करने वाले हैं। इसी क्षेत्र में 'जयपृच्छा' का प्रणयन हुआ जिसके विस्तृत रूप में 'प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय' और 'समराङ्गणसूत्रधार' का सम्पादन हुआ और इसी विषय-वस्तु के आश्रय में 12वीं सदी में अपराजितपृच्छा का प्रणयन हुआ। यह ग्रन्थ मूलतः भारतीय शिल्पियों के उस सोच और सङ्कल्प का सजीव साक्ष्य है जबकि सोमनाथ मंदिर पर हमला हो चुका था और पश्चिम से लेकर सिन्धु-सागर सङ्गम तक के प्रदेश के अनेक शिल्पधाम आक्रान्ताओं की चपेट में आ चुके थे। मानवीय क्रूरता ही नहीं, अकाल जैसी प्राकृतिक त्रासदियों से भी तत्कालीन भारत के अनेक प्रदेश आहत हो रहे थे, नगरों की स्थिति भयावह थी अथवा पतनोन्मुखी हो चुकी थी, ऐसे में जल संरक्षण, जीर्णोद्धार जैसी आवश्यकताओं के साथ ही आस्थाओं के केन्द्र-स्थलों के शिलान्यास सहित विविध देव स्वरूपों की प्रतिष्ठा सुखद हो सकती थी। गुरु-शिष्य जैसे सम्बन्धों की स्थापना और संहार के देवता शिव का सहायक स्वरूप अभीष्ट था। शिल्पियों ने भारतीय ज्ञान-सम्पदा सहित कला के प्रत्येक स्वरूप को संरक्षित करने का सङ्कल्प

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किया— अपराजितपृच्छा के सूत्र सर्वत्र यह संकेत करते चलते हैं। सोलंकी ही नहीं, गुहिल कला के विकास में इस ग्रन्थ का बड़ा योगदान रहा। गुहिल राजाओं के शिल्पी तो प्रायः इसी ग्रन्थ के निर्देशों के अनुसरणकर्ता रहे। महाराणा कुम्भा के शिल्पी मण्डन के रचनाकर्म पर इस ग्रन्थ का सर्वत्र प्रभाव परिलक्षित होता है। इस ग्रन्थ के प्रारम्भिक अंशों को प्रकाश में लाने का कार्य 'बृहच्छिल्पशास्त्र' के प्रणेता जगन्नाथ अम्बाराम सोमपुरा, वढवाण ने 1933 ई. में किया किन्तु, श्लोक प्रायः अशुद्ध थे। इसे समग्रतः प्रकाशित करने का श्रेय गायकवाड़ ओरियण्टल इंस्टिट्यूट, बडोदरा को जाता है। 1950 ई. में जूनागढ़ रियासत के अभियन्ता श्रीमान् पोपटभाई अम्बाशंकर मंकड़ ने दो पाण्डुलिपियों के आधार पर इसका पाठ तैयार किया। श्री मंकड़ जोधपुर-मारवाड़ में मुख्य अभियन्ता रहे और हैदराबाद में मुख्याधिकारी रहे थे। उन्हें सिविल अभियान्त्रिकी का अच्छा अनुभव था। उन्होंने बहुत धैर्य और परिश्रम के साथ इसका पाठ तैयार किया और विस्तृत भूमिका लिखी किन्तु इसके कुछ ही स्थलों को स्पष्ट कर पाए, इसका अनुवाद नहीं हुआ। इस दिशा में कोई प्रयास भी कहीं नहीं हुआ, हाँ कुछ विद्वानों ने इस पर शोधपत्र अवश्य लिखे और प्रो. लालमणि दुबे ने इसका आलोचनात्मक अध्ययन किया; विगत साठ वर्षों से विद्वज्जगत को इस ग्रन्थ के अनुवाद की प्रतीक्षा रही है। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत के अधिकांश तकनीकी ग्रन्थ प्रकाशन के बाद अनूदित नहीं हुए। ऐसा क्यों ? एक दिन यह प्रश्न मैंने उदयपुर के शिल्पी परिवार में जाये-जन्मे आदरणीय प्रोफेसर श्री भँवरलालजी शर्मा से इस रूप में किया कि कई लोगों के पास प्राचीन वैज्ञानिक, तकनीकी ग्रन्थ हैं किन्तु अर्थ क्यों नहीं करते ? उन्होंने सहजता से कहा कि प्रथमतः इसकी शब्दावली का लुप्त होना है और फिर यह भी कटु सच है कि ऐसे ग्रन्थों का मिलना और अपने पास होना तो गौरवस्पद समझा जाता है किन्तु अध्येता को नहीं देने की मानसिकता ने इन ग्रन्थों को ताक में ही सजाये रखा; पुस्तकालयों से ऐसे ग्रन्थ सबसे पहले गायब हुए और यहाँ तक भी हुआ कि भाई ने भाई तक को अपने ऐसे ग्रन्थ नहीं दिखाए, भले ही उन्हें बाद में दीमक ने अपना आहार बना डाला... । इसी विचार ने हम दोनों को उद्विग्न कर दिया और संकल्प किया कि हमें ऐसे तकनीकी ग्रन्थों का अनुवाद करना चाहिए। मैं सूत्रधार मण्डन, चक्रपाणि मिश्र, सूत्रधार नाथा, सूत्रधार गोविन्द, बहुरी महाराणा आदि के कोई डेढ़ दर्जन ग्रन्थों पर कार्य कर चुका था किन्तु अपराजितपृच्छा को देखकर ही भय लगता था कि इतना बड़ा ग्रन्थ कैसे अनूदित होगा किन्तु बहुत सुनियोजित रूप से इसका अर्थ हुआ,

श्रीमान् शर्मा साहब ने बहुत मनोयोग से इसके कई सूत्रों के भाव को ग्रहण किया और मैंने इसकी विषय वस्तु सहित आधारभूत ग्रन्थों पर ध्यान दिया। उनके द्वारा अनुवाद रूप में यह प्रथम ग्रन्थ था किन्तु मुझे अनेक स्थलों के अनुवाद को लेकर भय था और जब समराङ्गणसूत्रधार का अनुवाद सम्पन्न हुआ तो आत्मविश्वास हो गया कि इसका अनुवाद ठीक हो गया है। समराङ्गण. का सम्पादन-अनुवाद करते - करते ही इस ग्रन्थानुवाद का संशोधन भी होता चला गया। इसलिए इसके प्रकाशन में भी किञ्चित विलम्ब हुआ, अन्यथा यह अनुवाद 2007 ई. में ही प्रकाशित हो जाता। मैं मानता हूँ कि भगवान् विश्वकर्मा ने ही स्वयं इस ग्रन्थ की गुत्थियों को खोला है क्योंकि अनेक स्थल ऐसे थे जो बहुत जटिल थे और प्रकाशित पाठ में अनेकत्र त्रुटियाँ थी, कई स्थलों पर प्रश्नवाचक चिह्न थे। इसे एक प्रकार से पुनर्सम्पादित किया गया है। पाठकों और विद्वानों को ऐसा सर्वत्र प्रतीत होगा, इसमें कई श्लोक नए भी जुड़े हैं जिन्होंने खण्डित पाठ की पूर्ति की है, इस सम्बन्ध में भूमिका में चर्चा की गई है और सूत्रस्थलों पर भी यथोचित पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं। मैं श्रीमान् शर्मा साहब का आभार मानूँ या उनको धन्यवाद दूँ, कह नहीं पा रहा हूँ। यह तो अनुग्रह ही है कि विश्वकर्मा-वंशज स्वयं इस महत् कार्य में सूत्रधार बने। मैं उनके ऋणि होने की बात कहता हूँ तो वे कहते हैं कि आपके अभियान के साथ जुड़कर मुझे अपना जीवन सार्थक होता प्रतीत हो रहा है। उनकी पहल ने इस ग्रन्थ के अनुवादोद्धार की दिशा में एक सशक्त ताल दी तो मैंने और मेरे परिवार के सदस्यों ने भी कदम बढ़ाए। अनुदित स्वरूप को मैंने उत्स ढूँढ़कर पूर्णतः शास्त्र- सम्मत स्वरूप देने के लिए जीतोड़ प्रयास किया है, मेरी कनिष्ठ पुत्री अनुकृति चौहान ने इसका मूलपाठ टंकित किया तो इसकी टिप्पणियों को खोजने का श्रम ज्येष्ठ पुत्री आयुष्मति अनुभूति चौहान और अनुज अरविन्द चौहान ने किया है। सहधर्मिणी पुष्पा चौहान भी बहुत मददगार रही, पुत्र गौरव चौहान ने भी सहयोग किया। यह एक समूह-श्रम ही कहा जाएगा। मैं परिजनों के स्नेहाधीन और श्रीमान् शर्मा साहब के अनुग्रह से अभिषिंचित हूँ। इस क्रम में मैं बड़ौदा ऑरियण्टल इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. मुकुन्दलालजी वाडेकर का भी आभार मानता हूँ कि जिन्होंने इसके अनुवाद की सदिच्छा प्रकट की और प्रोत्साहन दिया। उन्होंने इस ग्रन्थ की मातृकाओं के पृष्ठ भी उपलब्ध करवाए और यह कहा कि इस अनुवाद से इस ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापन और अभ्यास का कार्य आगे बढ़ेगा। मैं डूंगरपुर (राजस्थान) के वयोवृद्ध शिल्पी श्रीमान्

xi रघुनाथजी सोमपुरा का भी आभार मानता हूँ जिन्होंने अपने संग्रह से इसकी एक मातृका उपलब्ध करवाई। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के अधिकारियों के प्रति भी धन्यवाद, जहाँ से इसकी खण्डित मातृका मिली। मनीषी आदरणीय डॉ० महेन्द्र जी भानावत सदैव की तरह मेरे प्रेरक बने रहे, उनके प्रति आभार। इसके प्रकाशन की पहल करने के लिए परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली के संस्थापक संस्कृतविद् श्रीमान् कन्हैयालालजी जोशी का स्मरण करता हूँ, जिन्होंने इसकी पाण्डुलिपि देखकर सन्तोष किया और कहा था कि इसका प्रकाशन निश्चित ही गौरवशाली कार्य होगा। वे गत दिनों नित्यलीलालीन हो गए, उन स्मृतिशेष, यशात्मकाय के प्रति मैं श्रद्धावनत हूँ...। उनके पुत्र चि. श्री परिमल जोशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। वे इसका पहला संस्करण बहुत समर्पित भाव से प्रकाशित कर रहे हैं। वे धन्यवादार्ह है। इस ग्रन्थ का पाठ तैयार करने में जिन ग्रन्थों की सामग्री का सहयोग लिया और चित्रादि का उपयोग हुआ, उनके लेखकों, सम्पादकों और प्रकाशकों का आभार। इस ग्रन्थ की जो भी अच्छाइयाँ हैं, वे आनन्द-कन्द-नन्द-नन्दन प्रभुप्रवर श्रीनाथजी की कृपा का प्रसाद है और जो त्रुटियाँ हों, वे मुझ अल्पज्ञ की हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि विद्वज्जनों के बीच इस ग्रन्थानुवाद को आदर और सम्मान मिलेगा तथा शोधजगत में इसकी विषय-वस्तु पर पुनः वैज्ञानिक शोधानुसन्धान होगा... 40 राजश्री कॉलोनी, विनायकनगर, विदुषां वशंवद उदयपुर (राजस्थान) श्रीकृष्ण 'जुगनू' राधाष्टमी विक्रम संवत् 2067 15 सितम्बर, 2010 ईस्वी

भारतीय कला ग्रन्थ और अपराजितपृच्छा भारतीय कला के मूल ग्रन्थों में अपराजितपृच्छा का अप्रतिम स्थान माना जाता है। नाट्यशास्त्र के लिए जो विश्वकर्मीय शास्त्र द्वितीय अध्याय से लेकर कई स्थलों पर उपस्कारक रहा, उसी प्रकाशमयी परम्परा की कीर्ति-रश्मियाँ अपराजितपृच्छा तक पहुँची जिसके आधार पर मध्यकाल में विश्वकर्मीयशिल्प, ज्ञानप्रकाश दीपार्णव, वृक्षार्णव, वास्तुसार समुच्चय, स्तम्भराज जैसे अनेक शिल्प ग्रन्थों की रचना हुई और सूत्रधार मण्डन, उसके अनुज सूत्रधार नाथा और मण्डन के पुत्र सूत्रधार गोविन्द आदि कृत लगभग दो दर्जन ग्रन्थों की रचनाएँ हुईं। भुवनदेवाचार्य कृत अपराजितपृच्छा केवल ग्रन्थ नहीं है बल्कि हजारों सूत्रधारों, शिल्पकारों के कार्य- सम्पादन का निर्देशक रहा है। इसलिए इसे शिल्पी समुदाय में गुरु-गौरव का स्थान प्राप्त है। विशेषकर, उत्तर और पश्चिमी भारत में इस ग्रन्थ के आधार पर अष्टांग वास्तु रचनाओं का न्यास-विन्यास हुआ है। सूत्रधार समुदाय में इस ग्रन्थ के पूजन- सबद के उच्चारण के बाद अपने कार्य के श्रीगणेश की परम्परा रही है, ऐसा गौरव सम्भवतः अन्य किसी शिल्प-ग्रन्थ को नहीं मिला। ग्रन्थ का स्वरूप विशिष्टताएँ : यह ग्रन्थ केवल वास्तु-स्थापत्य पर आधारित नहीं है बल्कि इसमें कई विषयों का वर्णन है और 12वीं सदी के समय के पश्चिम भारत में प्रचलित विभिन्न सामाजिक परम्पराओं तथा आवश्यकताओं सहित राजाज्ञाओं अथवा शासकोचित संकल्पों का भी सम्यक् विवरण प्रस्तुत करता है। अपराजित के प्रश्न पर विश्वकर्मा ने स्थल-स्थल पर ऐसे निर्देश किए हैं जो तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं और अनुकरण योग्य प्रवृत्तियों का द्योतक है। 'शस्यावतार सूत्र' में नित्य सुकाल के ध्येय से जल की बचत के लिए गाँव-गाँव जलाशयों की श्रृंखला खड़ी करने के मूल में रचनाकार समकालीन स्थितियों का सन्दर्भ ही प्रस्तुत करता है। संयोग से यह निर्देश कालजयी हो गया है। इसके पठन-पाठन और निर्देशों को राजा-प्रजा के लिए अनुकरण योग्य बनाने के उद्देश्य की पूर्ति का ग्रन्थकार ने सूत्र-दर-सूत्र ध्यान रखा है। विषय-विवरण के पार्थक्य के परम्परित 'अध्याय' संज्ञा के विपरीत 'सूत्र' नामकरण के मूल में भी यह ध्येय लक्षित है। इसमें सूत्र वह है जो श्लोक रूपेण मुक्ताओं को पिरोये हुए है और वह सूत्र अपने-आप में गुर (टिप्स, नियम) का स्वरूप लिए हुए है। चरक ने सूत्र को गम्भीरता के साथ किसी वेद की शाखा, विद्या, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और तन्त्र के पर्याय और समानार्थी के रूप में स्वीकृत

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किया है : तत्रायुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्यनर्थान्तरम् ॥ (चरक. सूत्रस्थान 30, 31) इस प्रकार इसके अर्थ-गाम्भीर्य को लक्षित किया जा सकता है। इस ग्रन्थ में भारत में प्राचीन काल से ही चली आ रही वैज्ञानिक कलाओं का सम्यक् विवेचन मिलता है, चूँकि विश्वकर्मा ही इन कारू व चारू कलाओं के प्रवर्त्तक माने जाते हैं, अतः वे ही इसमें प्रवक्ता के स्वरूप में हैं। ग्रन्थ पूरी तरह उद्देश्यमूलक है और ग्रन्थकार ने इसकी संकल्पना के मूल में कलाओं के संरक्षण सहित उनके सम्पादन का विचार अपने सम्मुख रखा है। यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, समकालीन समाज में जो कुछ कौतुक था अथवा जिन बातों को लेकर जन-मन में कुतूहल था, वह सब इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य है। यह कारू-कर्मनों का ही मैन्युअल नहीं है, बल्कि पुराविदों के लिए पौराणिक प्रसंगों की पूर्ति का प्रकाशपुंज है; दैवज्ञों के लिए साक्षात् ज्योतिर्ज्ञान है; सूत्रधारों के लिए स्थापत्य-शास्त्र है, मूर्तिकारों के लिए प्रतिमाशास्त्र, चित्रकारों के लिए चित्रकर्मशास्त्र है; तन्त्रज्ञों के लिए तन्त्रागम हैं; पटवों-आभूषणकर्मियों के लिए प्रसाधनीय आभरण-निर्देशिका, गजपालकों और अश्वपालकों के लिए पशुपालन है; सिकलीगरों-शस्त्रकारों के लिए आयुध-ज्ञानावली और गायकों-वादकों, नट-शैलूषों के लिए गान्धर्व-ज्ञानकोश है— जो जिस ज्ञानानुशासन का पण्डित है, यह उसके पूर्णतः पठन-पाठन योग्य प्रमाण-पुस्तक है, क्योंकि सब कोई विश्वकर्मा की सन्तान है और इससे उनके गुण-कौशल में अभिवृद्धि होती है, यह उनके लिए गुणमञ्जरी है। विषय-वस्तु के आधार पर इस ग्रन्थ में लोक-मान्यताओं सहित कई शास्त्रों का स्वरूप दिखाई देता है और उसे निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. पुरागमशास्त्र : ग्रन्थरम्भ में गन्धमादन पर्वत के वर्णन से लेकर अट्ठासी तपस्वियों की तपश्चर्या, विश्वकर्मा के दिव्याश्रम और उनके स्वरूप का वर्णन और सूत्रधारों के लिए ज्ञातव्य विषयों का विवरण देते हुए ग्रन्थकार ब्रह्माण्डोत्पत्ति से अपने विषयों का चयन और उनका सम्यक् परिपाक करता हुआ बढ़ता है। इस क्रम में पातालों, द्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, ऊर्ध्वाध लोकों का वर्णन एकदम पौराणिक शैली में करता है। इसमें प्रकृति, गुण, विप्रादि वर्णों, उनके गोत्रों, संसारावतरण और लोकों सहित जम्बूद्वीप, नव-वर्षों में निवास करने वाली प्रजा का वर्णन ज्ञेय है। इसके अन्तर्गत गन्धर्वादि संस्थान, संसारभूत ग्रामोत्पत्ति, गर्भ विकास, पञ्चतत्त्व, पञ्चगुण, गर्भविज्ञान, अठारह गुण-दोष, शिव-शक्ति ब्रह्मज्ञान और गीता के

xiv महत्त्वपूर्ण विषयों के प्रतिपादन के साथ ही सत्त्व-रज-तम गुणों के लक्षणों का वर्णन भी ज्ञातव्य है। देश जाति, कुल, स्थान, वर्ण भेद तत्कालीन स्थितियों का द्योतक है। 2. कल्प व अवतारशास्त्र : इस क्रम में कल्पान्त क्रम, कल्प के देवता, पञ्चलिंग, हरिक्षेत्र, मत्स्यादि दस अवतारों का वर्णन, एकादश रुद्र, विश्वकर्मा, बारह शिवरात्रि निर्णय, शिव पूजन विधि व माहात्म्य वर्णित है। इसी में विश्वकर्मावतार के साथ ही पृथु-पृथ्वी संवाद में पृथ्वी की रचना और जय-विजय-सिद्धार्थ पृच्छा और अपराजित के प्रश्न से पुनः पौराणिक विषयों का वर्णन ज्ञेय है। इसमें सप्तद्वीप, सागर, पर्वत, महाशैल, भारत के ग्रामों, नृपराज्यों का प्रमाण, महावन, उपवन एवं वनयात्रा का रोचक विवरण है। 3. ज्योतिषशास्त्र : इस क्रम में विष्णु व लिंगादि महापुराणों के अनुसार ग्रहादि ध्रुव मण्डल, सूर्यादि नव ग्रहों के बिम्बों के मान, ग्रहादिकों की ध्रुव प्रदक्षिण गति, काल-संख्या प्रमाण, तिथियों, कलाओं, पक्ष, मास, ऋतु, साठ संवत्सरों, युगों के भेद, चौदह मन्वन्तर का वर्णन और फिर ज्योतिष पञ्चाङ्ग वासना के अन्तर्गत आवश्यक निर्देश एवं नष्ट ध्रुवक ज्ञात करना, तिथि भुक्ति, संक्रांति, दिन नक्षत्र, महा नक्षत्र भुक्ति, योग निकालना, करण, सात वार, तिथि, अश्विनी आदि नक्षत्रों, योगों के नाम, अवकहॊडा ज्योतिष चक्र, नक्षत्र देवताओं के नाम, योनि वैर, आठ वर्ण, सूर्यादि ग्रहों की दशाओं के फलाफल, चन्द्रमा की बारह अवस्था व उसके फल और ज्योतिष लक्षण वर्णित है। 4. गणित-मपितशास्त्र : ग्रन्थ में संख्याओं की गणना व पहचान दी गई है वहीं गणित शब्द निघण्टु आया है। शिलामान निकालने, वृत्तफल, गोलफल, अष्टकोण फल, षट्कोण क्षेत्रफल, धनुषाकार क्षेत्रफल, त्रिकोणादि आकार सहित पिण्ड के क्षंत्रफल को निकालने के सूत्र दिए गए हैं। आयादि वास्तु-गणित भी ज्ञातव्य है। 5. वास्तुशास्त्र : इस क्रम में मानव वास्तु और देववास्तु का प्रधानता से वर्णन अवलोकनीय है। इसमें क्रमशः भूमि परीक्षण, शकुन निरीक्षण, ग्रह पूजा, वास्तुपूजा, आचार्यादि पूजन, सूत्रधार परीक्षा, भूपरिग्रह, कीलकारोपण, कूर्मप्रमाणपद प्रतिष्ठा, वास्तु की उत्पत्ति का आख्यान, देवता न्यास, सोलह सन्धि, अष्टाङ्ग, अष्टसूत्र पञ्चक्षेत्र का वास्तु स्वरूप एवं वास्तुदेवता निघण्टु ज्ञेय है। इसमें स्वस्तिकादि विभिन्न वास्तु क्षेत्रों, उनके पदों की संख्या, स्थान, चतुरश्रादि क्षेत्र व उनके प्रयोजन, वास्तु मर्म निर्णय, दिव्पालादि वास्तुदेव पूजा-बलि कर्मयुक्ति,

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आचार्य-सूत्रधार पूजा निर्णय, वास्तु परिभ्रमणादि गुण-दोष, प्रशस्त मास, प्राची साधन, आय-व्ययादि विचार, मेरु आदि छन्द और विकाश संख्या, विविध प्रकार के गृह, शाल, राजवेश्म, नगरों के प्रमाण, वहाँ निवेश योग्य रचनाओं की विधि, प्राकार के ऊपर स्थापनीय सूर्य यन्त्र, भैरवादि यन्त्र, विविध पुर-कूट-खेटक, ग्रामादि के स्वरूप और जलस्रोतों की रचना का वर्णन ज्ञेय है। इसी प्रकार त्रिविध राजालय, महामण्डलेश्वरादि के राजगृहों के प्रमाण, प्रतोली, एक से लेकर पाँच पोलें, धारागृह, जलयन्त्र, वेद्यशाला, ध्रुवादि षोडश गृह, गृहों के छह प्रकार के छन्द, हवेलियों के गुणदोष, एक से लेकर दशशाल भवन, शुद्धा-सम्बद्धा-संयुता, परिभ्रम चार शालाएँ, छन्दभिन्ना, सम्पुटा, प्रतिक्रम जैसी अन्य शालाएँ, गृहमाला, गृहनाभि, गृहसंघट्ट, गृहाण आदि चार गृह भेद, खण्ड, पाण्डु, वाजिपूर्ण, तृणच्छन्द, पट्टक नामक गृहकर्म षट्च्छन्द, बत्तीस देवताओं के पदानुसार द्वार के शुभाशुभ, राश्यानुसार द्वारमुख और महाराज प्रसादायतन निवेश, राजपुर-ब्रह्मपुर-शूद्रपुर के प्रमाण नामक सूत्रों में मनुष्य वास्तु का विवेचन है। इसी प्रकार देववास्तु के अन्तर्गत त्रैलोक्य दीक्षा का वर्णन, वैराज्यादि पाँच नागर प्रासाद, प्रासादों की संख्या, चौदह प्रकार के प्रासादों की उत्पत्ति, स्वस्तिकादि द्राविड प्रासादों की उत्पत्ति और उनके लक्षण, रुचकादि लतिन प्रासाद के भेद, उनकी उत्पत्ति व संख्या, वराट प्रासाद, विमान प्रासाद, केसरी प्रासाद, मिश्रक प्रासाद, भूमिज प्रासाद, विमान नागर प्रासाद, विमान पुष्पक प्रासाद, वलभी प्रासादों की उत्पत्ति, सिंहावलोकन प्रासाद, दारुज प्रासाद एवं फांसनाकार प्रासादों की उत्पत्ति का वर्णन ज्ञातव्य है। इसी प्रकार नागर-द्राविड-भूमिज-वराट-विमान प्रासादों के लक्षण, मिश्रक-सान्धार-विमाननागरादि प्रासाद और उनके प्रमाण, प्रासाद हर्म्य भेद, द्वार मान, प्रतोली मान, शिवतीर्थोदक का वर्णन, देवता प्रदक्षिणा, जीर्ण वास्तु चालन पर शुभाशुभता, वृष प्रकार दृष्टिस्थान, जीर्णवास्तु गुणदोष, प्रासाद देशानुक्रम, न्यूनाधिक लक्षण, सप्तपुण्याह व उनका माहात्म्य, चौदह शान्तियाँ, चौदह प्रकार की जगती, शिवालय, ब्रह्मालय, विष्णुवालय, सूर्यालय, गौर्यालय, जिनालय के साथ-साथ बलाणक के मान व भेद, भिट्ट का मान व लक्षण, पीठ का मान इत्यादि अनेक विषयों का वर्णन अवलोकनीय है। इसी में कलाओं का विचार बहुत वैज्ञानिक रूप से दिया गया है। प्रासादों के विभिन्न अङ्गों के विवरण सहित यज्ञ-मण्डप विचार, मण्डल विधि, प्रतिष्ठा के लिए रत्नादि न्यास, महोत्सव, प्रासादाङ्गों में देवताओं का न्यास और सात प्रकार के मठों का वर्णन भी ज्ञातव्य है।

XVI 6. कृषिशास्त्र : इसके अन्तर्गत जलाशय माहात्म्य, कलियुग और लोकोत्तर प्रश्न, सुभिक्ष-दुर्भिक्ष लक्षण, कलियुग में तारण के लिए शस्योद्भव, जलोत्थान यन्त्र और जल बचत के निर्देश अध्ययन-अनुसरण के योग्य हैं। 7. पशुपालनशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत भद्रादि जातियों के गज और उनके उत्पत्ति एवं विहार योग्य वन तथा अश्व और उनकी विप्रादि प्रजातियों सहित दन्तिन्यादि गजशालाएँ एवं अश्वशाला बनाने के नियमों के निर्देश ज्ञातव्य है। यह वर्णन परम्परित रूप से संहिता ग्रन्थों के अनुसार मानक है। शस्यावतार सूत्र में बैलों की महिमा भी आई है। 8. शिल्पशास्त्र : राजोपस्कारक वस्तुओं के अन्तर्गत आसन व मसूरक, गदिका एवं पट्टगदी, राजच्छत्र, सिंहासन, नौ प्रकार के रथ, नन्दादि सभाष्टक लक्षण, चतुर्विध वेदी, कवच-आयुध आदि का निर्माण निर्देश ज्ञातव्य है। 9. प्रतिमाशास्त्र : इस शास्त्र के अन्तर्गत लिङ्गार्चादि उपयोगी शिलाओं के लक्षण, हस्त-कम्बी प्रमाण, परमाणु प्रमाण, उत्तम-मध्यम-अधम हस्त मान, कम्बिका के वास्तु देवता, उत्तम-मध्यम-अधम कम्बिका और उसका पूजन, शल्यदोष, विविध प्रकार के लिङ्गों व उनकी पीठिकाओं के लक्षण और शिव सहित विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, देवियों और जिन देवताओं उनके लाञ्छनों, यक्षों, शासन देवी- देवताओं की प्रतिमाओं का वर्णन भी ज्ञातव्य है। स्वच्छन्द भैरव के अवतार व उनके रूप-आयुधों का वर्णन पठनीय है। इसी प्रकार प्रतिमाओं के ताल-मान, पूजा-मन्त्र आदि का विवरण भी पठनीय है। 10. चित्रशास्त्र : इसके अन्तर्गत चित्रों व पत्रों की उत्पत्ति, पत्रजाति, कण्टकभेद जीव सूत्र निर्णय, जातिक्रम छन्द से आठ कण्टक, पत्राकारादि का वर्णन, पट्ट, पत्र, वर्तना निर्णय, लेपकर्म विधि, गुरु-शिष्य सम्बन्ध व उनके लक्षण, रूपालङ्कार संयुत् चित्रकर्म कथन, षोडश व्यालों, स्त्री-पुरुष के लक्षण आदि ज्ञातव्य है। 11. आयुध-आभरणशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत कवच और आयुधों की संख्या एवं लक्षणादि का वर्णन तथा सोलह आभूषणों का वर्णन ज्ञातव्य है। 12. गान्धर्वशास्त्र : नाट्य शास्त्रसम्मत इस विषयानुशासन में ताल एवं वादित्र लक्षण, ताल के प्रकार, वाद्यों के प्रकार, सात स्वर, राग और रागिनियाँ, चौदह प्रकार के गीतों के दोष और नौ प्रकार के ताण्डव नृत्यों का वर्णन पठनीय है।

xvii इस प्रकार अनेकानेक शास्त्रीय विषयों की पृष्ठभूमि पर इस अपराजितपृच्छा का न्यास-विन्यास हुआ है। लोकावश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसमें यथेष्ट शास्त्रीय निर्देशों से पूर्णता प्रदान की गई है। रचनाकार इस ग्रन्थ की संकल्पना से लेकर समाहार तक पूरी तक केन्द्रीय-चित्त रहा है। उसके ध्येय में अबोध शिल्पी से लेकर पाण्डित्य-प्रतिभा सम्पन्न सृजन तक के लिए इसकी उपादेयता सिद्ध करना रहा है और इसमें वह सर्वाङ्गतया सफल रहा है। नामकरण, आशय और पृष्ठभूमि : जैसा कि कहा गया है कि अपराजितपृच्छा अनेक शास्त्रों का सूत्रित-स्वरूप है। इससे ग्रन्थकार के अध्ययन-आसमान का अवज्ञान तो होता ही है जो कि बहुत विस्तृत एवं व्यापक है, साथ ही उसके विषय चयन और उसे सूत्रित करने के कौशल का बोध होता है— एक गुरुकुल के परिवेश रूप में वह ग्रन्थ की संकल्पना करता है और जनता की ओर से की जाने वाली जिज्ञासाओं को वह अपराजित के मुख से प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करता है और उनका उत्तर-प्रत्युत्तर स्वयं विश्वकर्मा प्रस्तुत करते हैं। अपराजित के प्रश्नों के कारण ही यह 'पृच्छा' संज्ञाभिधान लिए हुए है। प्रश्न या पृच्छा की परम्परा हमारे यहाँ ब्राह्मण और उपनिषद-काल से तो रही है ही उत्तर- बौद्धकाल में ग्रन्थों के नामकरण के रूप में भी ज्ञातव्य है। 'मिलिन्दपञ्ह' ग्रन्थ तो बहुत प्रसिद्ध है ही जिसमें भिक्षु नागसेन और मिलिन्द का संवाद है, इसमें मिलिन्द जिसे यवन मिनेण्डर के रूप में पहचाना गया है, के प्रश्नों का विवरण मात्र नहीं है बल्कि उसके प्रश्नों का समाधान इसका मुख्य विषय है, इसी ग्रन्थ में लक्खणपञ्ह, विमतिच्छेदकपञ्ह, मेण्डकपञ्ह, योगिकथापञ्ह, अनुमानपञ्ह और ओपम्मकथापञ्ह जैसे प्रश्नों की श्रृंखला है और इन सबमें मिलिन्द के अनेक प्रश्नों का समाधान है। (विशेष विवरण : आर. डी. वाडेकर सम्पादित मिलिन्दपञ्ह, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई, 1940 ई.) शब्दकोशों में 'प्रच्छ जिज्ञासायाम् + गुरोश्च हल:' के रूप में इस शब्द पर विचार हुआ है। अमरकोश में इसे प्रश्न का पर्याय कहा है। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 3, पृष्ठ 224) चरक के सूत्रस्थान में कहा गया है कि शास्त्र में जो विषय जिस प्रकार से कहा गया है, उसे उसी रूप में विधिपूर्वक पूछना प्रश्न कहलाता है : पृच्छा तन्त्राद्यथाप्रायं विधिना प्रश्न उच्यते। प्रश्नार्थो युक्तिमांस्तस्य तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ (चरकसंहिता सूत्र. 30, 69) भरत के नाट्यशास्त्र में आया है कि जब कोई जिज्ञासुभाव से अपनी अभीष्ट वस्तु की तलाश करते हुए अनुनय-विनयपूर्वक प्रश्न करता हो तो उसे पृच्छा

xviii समझना चाहिए : यत्रान्वेषणमर्थानां वाक्यैरभ्यर्थनापरैः। जिज्ञासुः पृच्छति परं सा पृच्छा त्वभिधीयते॥ (नाट्य. 17, 32; एवं नाटक लक्षणरत्नकोश, 179) कतिपयों का यह मत भी है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं से या दूसरे से प्रश्न करते हुए किसी भावना एवं रस से पूर्ण तथ्य को कहता हो तो उसे पृच्छा समझना चाहिए : यत्र भावरसोपेतमात्मानमथवा परम्। पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्युच्यते यथा ॥ (तत्रैव) इस प्रकार अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्न ही नहीं है अपितु उसके प्रश्नों का सारगर्भित समाधान है। इसमें अपराजित पुत्र के रूप में और विश्वकर्मा पिता के रूप में हैं। जैसे पिता वात्सल्य भाव के साथ अपने पुत्र की प्रत्येक जिज्ञासा के शमन का प्रयत्न करता है, वैसा ही प्रयास इसमें हुआ है। अपराजित निश्चित ही गुणग्राहक होकर उभरते हैं। यह इसके 'सूत्रसन्तान गुणकीर्ति' के नाम को भी सार्थक करता है। फिर, यहाँ सूत्रसन्तान से आशय सूत्रधार है— वह नाटक से लेकर स्थापत्य शास्त्र तक अपनी ज्ञानात्मक धारणा के लिए प्रसिद्ध है, उनका ज्ञानकोश केवल कल्पना तक सीमित नहीं हैं बल्कि वह कलम और करनी की करामात दिखाने में सुकान्त होता है। भरताचार्य की परिभाषा पर विचार करें तो सूत्रसन्तान या सूत्रधार वह है जो चारों प्रकार के वाद्यों के वादन में प्रवीण होता है, जिसे अनेकानेक व्यावहारिक कार्यों का अनुभव होता हैं, जिसे अनेक धार्मिक परंपराओं और धर्मों- मतों का व्यवहार विदित हो, जो नीति व अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो, वेशोपचार का जानकार हो, जिसे कामशास्त्र का व्यवस्थित ज्ञान हो, पात्रों की अनेक प्रकार की गतियों व उनके रङ्गमञ्च पर चलने के परम्परागत आचार का जिसे भली प्रकार परिचय हो, जिसे रस और भावों का पूर्णतः ज्ञान हो, प्रस्तुति-प्रदर्शन में जो दक्ष हो, सभी शिल्प और कलाओं का सम्यक् वेत्ता हो, जिसे पदों व छन्दों का विभाग विदित हो, जो अनेक शास्त्रों का जानकार हो, जिसे ग्रह, नक्षत्र आदि विज्ञानों की तत्त्वतः जानकारी हो, जिसे शारीर-शास्त्र तथा शारीरिक गतियों का व्यवस्थित ज्ञान हो, जो पृथ्वी पर विद्यमान द्वीप, वर्ष, पर्वत, वहाँ के निवासीगण और उनके उचित आचार-विचार, वेशभूषा आदि का प्रामाणिक ज्ञान रखता हो, जिसे अनेक राजवंशों की परंपराओं व इतिवृत्त का ज्ञान हो, जिसने शास्त्रों में प्रतिपादित गुण, आचार और कार्यों का व्यवस्थित रूप से श्रवण किया हो और उन तत्त्वों को सम्यक् रूप से हृदयङ्गम किया हो और इन्हीं तत्त्वों का जो दूसरों को शिक्षण या उपदेश देने में भी समर्थ हो तो इन गुणों से युक्त पुरुष सूत्रधार होता है : चतुरातोद्य कुशलः नानाकर्मसु शिक्षितः। नानापाषण्डकार्यज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्ववित्॥ वेशोपचारनिपुणः

xix कामशास्त्रविचक्षणः। नानागतिप्रचारज्ञ रसभावा विशारदः॥ नाट्यप्रयोगकुशलो नानाशिल्पसमन्वितः। पदच्छन्दोविधानज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥ ग्रहनक्षत्रतत्त्वज्ञो देहव्यापारपण्डितः। पृथिवी द्वीपवर्षाणां पर्वतानां जनस्य च॥ प्रमाणाचरितज्ञश्च राजवंशप्रसूतिवित्। श्रोता शास्त्रार्थकार्याणां श्रुत्वा चैवावधारकः ॥ अवधार्य प्रयोक्ता च शक्तश्चैवोपदेशने। एवं गुणस्तथाचार्यः सूत्रधारो विधीयते ॥ (नाट्यशास्त्रम् 35, 66- 71) देखा जाए तो भरतोक्त ये सारे ही विषय अपराजितपृच्छा में विद्यमान हैं। निश्चित ही यह सूत्रसन्तान-गुणकीर्तिप्रदायक है। रचनाकाल और रचना स्थल : अपराजितपृच्छा के रचनाकाल को लेकर विद्वानों में निश्चित ही उहापोह की स्थिति रही है। इस ग्रन्थ के बड़ौदा संस्करण के सम्पादक, जूनागढ़ रियासत सहित जोधपुर और हैदराबाद व अन्य म्यूनिसिपलिटीज में इंजीनियर रहे श्री पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड; स्थापत्य शास्त्र के विद्वान मधुसूदन अमीभाई ढाकी, एम. पी. वोरा आदि ने इस समस्या के निस्तारण की दिशा में अपने कतिपय प्रयास किए हैं और इन्हीं मतों की समीक्षा इस ग्रन्थ के शोधार्थी प्रो. लालमणि दुबे ने भी की है। श्री मंकड ने माना है कि इसका रचनाकाल 12वीं और 13वीं सदी के मध्य रखा जाना उचित है। (अपराजित. बड़ौदा, भूमिका पृष्ठ 12) श्रीवोरा और श्रीढाकी ने कतिपय उद्धरणों के आधार पर इसके रचनाकाल के पुनर्निर्धारण का प्रयास किया व कहा कि पीठ के जाड्यकुम्भ, वाजीपीठ जैसी गुजरात के देवालयों के निर्माण में प्रचलित इस पीठ की परम्परा इसे 12वीं सदी में प्रवर्तित बताती है क्योंकि सोमनाथ में 1169 ई. की ऐसी रचनाएँ सामने आई हैं। इसी प्रकार 1140 में सिद्धपुर-गुजरात में बने रुद्रमातरालय में यह विधान परिलक्षित होता है। भित्ति में मञ्जिका, शिरावटी और कूटछाद्य जैसी रचनाएँ 11वीं सदी से पहले सामने नहीं आती और इनका वर्णन अपराजितपृच्छा में हुआ है। इस आधार पर इस ग्रंथ का रचनाकाल 12वीं सदी कल्पित किया जा सकता है। इसी प्रसङ्ग में केसरादि, श्रीधरादि, सुरटर्वादि, सागरतिलकादि और मेरु शैली के मन्दिर गुजरात व राजस्थान में इसी काल में दिखाई देते हैं। (द डेट ऑफ अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बडौदा, भाग 9, पृष्ठ 426-431) यही नहीं, साधारण शैली के चार स्तम्भों वाले प्राग्ग्रीव मण्डप एवं कई स्तम्भों वाले सभागारों का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वैसे 11वीं सदी से ही बनने आरम्भ होते हैं। घट-पल्लवों से युक्त स्तम्भों का विधान जो कि इस ग्रन्थ में आया है, वह 12वीं सदी के बाद दिखाई नहीं देता है, ऐसे में भी इस ग्रन्थ का

xx रचनाकाल 12वीं सदी के समापन से पूर्व का ही निर्धारित होता है। यही स्थिति मण्डपादि में स्वास्तिकाकार संवराणाओं की हैं जो कि उक्त अवधि में ही गुजरात, राजस्थान सहित मध्य भारत में प्रचलित रही हैं। चतुर्भुजी दिक्पालों की मूर्तियाँ और उनमें आयुध-न्यास का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वह 11वीं सदी और अधिकतम 12वीं सदी में गुजरात में निर्मित देवालयों में ही सामने आता है। (उपर्युक्त) उक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि यह ग्रन्थ 11वीं-12वीं सदी के मध्य आकार ले चुका था। चूँकि इस ग्रन्थ पर 'समराङ्गणसूत्रधार' का पूरा प्रभाव है, ऐसे में यह ग्रन्थ समराङ्गण के रचयिता धाराधिप भोजराज (1010-1053 ई.) के बाद ही अस्तित्व में आया होगा। प्रो. ढाकी ने अपराजितपृच्छा पर समराङ्गणसूत्रधार के प्रभाव की चर्चा अपने एक आलेख में की है (द इन्फ्लुएंस ऑफ समराङ्गणसूत्रधार ऑन अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, भाग 10, पृष्ठ 231- 234) किन्तु, यह भी प्रतीत होता है कि समराङ्गण व अपराजित दोनों ही ग्रन्थों के सामने कोई अन्य विश्वकर्मीय ग्रन्थ भी रहा होगा और उसी से इन ग्रन्थकारों ने सामग्री और विषय को उद्धृत किया है। समराङ्गणसूत्रधार के पहले ही अध्याय में विश्वकर्मीय ग्रन्थ-परम्परा का उल्लेख किया गया है और अपराजितकार ने भी जय, विजय, सिद्धार्थ आदि के नाम से ग्रन्थों के विद्यमान रहने और उनके विषयों की सूची भी दी है। बहुत सम्भव है कि उस काल में कोई विश्वकर्मीय मत-ग्रन्थ प्रधान स्रोत के रूप में या आदर्श के रूप में सबके लिए ज्ञातव्य था। हालांकि भुवनदेवाचार्य ने कहीं भी समराङ्गणसूत्रधार का स्पष्टतः उल्लेख नहीं किया है, हाँ अनेकत्र विश्वकर्मा के मुख से भी 'आद्य विश्वकर्मा' का उल्लेख अवश्य करवाया है। यह विश्वकर्मीय ग्रन्थ कहीं विश्वकर्मा प्रकाश या वास्तुतन्त्र प्रतीत होता है तो कहीं-कहीं 'जयपृच्छा' (विद्यमान अहमदाबाद संस्करण से भिन्न और 10वीं सदी में प्रचलित आधारभूत पाठ जिसे भोज, सूत्रधार नकुल, हेमाद्रि पण्डित, महाराणा कुम्भा आदि ने उद्धृत किया है) का प्रभाव जान पड़ता है। स्कन्दपुराण, बृहद्देशी, नारदपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, लिङ्गपुराण, नन्दीकेश्वरपुराण, शिवधर्म और शिवधर्मोत्तर, सुप्रभेदादि शैवागम आदि का प्रभाव भी अनेकत्र दिखाई देता है। स्कन्दपुराण के श्लोक ग्रन्थकार ने 'स्कन्दागम' के नाम से स्मरण भी किए गए हैं। भुवनदेवाचार्य की यह सूचना भी महत्वपूर्ण है कि उस काल तक छिन्न-भिन्न हो चुके स्कन्दपुराण को पुनर्संस्कारित किया जा रहा था। वास्तव में यह वही काल है जबकि पाटन-

xxi गुजरात के राजा कुमारपाल चालुक्य (1140-1174 ई.) का चरित्र भी स्कन्दपुराण में (ब्राह्मखण्ड, धर्मारण्य माहात्म्य अन्तर्गत) स्थान पा चुका था। यह सङ्केत स्कन्दपुराण के स्वरूप को लेकर विद्वानों के उन प्रश्नों का उत्तर भी देता है कि इस पुराण के दो स्वरूप है—संहितात्मक और खण्डात्मक; यह पुराण वर्तमान में खण्डात्मक (माहेश्वरखण्ड, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, आवन्त्य, नागर एवं प्रभास) ही मिलता है जबकि संहितात्मक स्कन्दपुराण से केवल 'सूतसंहिता' लब्ध होती है शेष सनत्कुमारसंहिता, शाङ्करी, वैष्णवी, ब्राह्मी एवं सौरसंहिता अनुपलब्ध है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री का कथन है कि संहितात्मक स्कन्दपुराण की एक प्रति नेपाल दरबार पुस्तकालय में 7वीं सदी की प्राप्त होती है। प्रो. पी. वी. काणे ने इस समस्या के उत्तर में कहा है कि यह स्कन्दपुराण 7वीं सदी के पूर्व नहीं रखा जा सकता है और न ही नवीं सदी के पश्चात् का हो सकता है। (धर्मशास्त्र का इतिहास खण्ड 4, पृष्ठ 428) इन मतों के विपरीत अपराजितकार के सङ्केत और कुमारपाल चरित्र का इस पुराण में मिलना इसे 12वीं सदी तक ले जाता है। कुमारपाल चालुक्य के चरित्र-मूलक ग्रन्थों पर विश्वास करें तो सहज विश्वास होता है कि गुर्जर-चालुक्य चक्रवर्ती इस नृपति के जीवन प्रसङ्गों को समकालीन और परवर्ती विद्वानों को बहुत प्रभावित किया। तभी तो अज्ञातकर्तृक ने पुरातन संक्षिप्त कुमारपालदेव चरित की रचना की, सोमतिलक सूरि ने कुमारपालदेवचरित रचा, जिनमण्डन ने कुमारपाल प्रबन्ध लिखा, किसी अन्य ने कुमारपाल-प्रतिबोध की रचना की। इसी प्रकार चतुरशीतिप्रबन्ध में कुमारपालदेवप्रबन्ध का निबन्धन किया वहीं हीरकलश, देवप्रभगणि, ऋषभदास व जिनहर्ष ने कुमारपालरास नाम से पृथक्-पृथक् काल में कृतियों का प्रणयन किया तो सोमप्रभाचार्य ने कुमारपालप्रतिबोध को उद्धृत किया। तीर्थकल्प, मोहपराजय नाटक, प्रभावकचरित्र, प्रबन्धचिन्तामणि, उपदेशतरङ्गिणी, उपदेशप्रसाद सहित कई प्रशस्तियों में कुमारपाल का वर्णन आया है। (कुमारपालचरित्र संग्रह, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, क्रमाङ्क 41) इसी प्रकार चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समीधेश्वर महादेव मन्दिर से उसका शिलालेख 1141 ई. का मिला है। उस समय तक वह शैव मतावलम्बी था और विक्रम संवत् 1216 के मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दिसम्बर 1160 ई.) को कुमारपाल ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया था, जैसा कि प्रो. पीटर पीटर्सन का मत भी है। अपराजितकार उस समय के जैनधर्म के प्रसार-प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं था। उसने यदुवंशी श्रीकृष्ण के नेमिनाथ के रूप में गिरनार-रैवताचल या उज्जयन्त पर्वत

xxii पर प्रकट होने की सूचना दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यदुवंश में माण्डलिक राजा के गुरु हेमाचार्य ने उक्त पर्वत पर नेमिनाथ या नेमनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। (कर्नल जेम्स टॉड कृत पश्चिम भारत की यात्रा, जोधपुर 1965, परिशिष्ट पृ. 540) कदाचित इसी प्रसङ्ग को अतिशयोक्ति के रूप में ग्रन्थकार ने दिया हो। इस उज्जयन्त पर्वत के श्रीनेमिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत् 1333 (1276 ई.) के ज्येष्ठ की चतुर्दशी को हुआ था। संवत् 1227 (1170 ई.) के एक अभिलेख में आया है कि तब तक नेमीश्वर तीर्थ बहुत प्रसिद्ध हो चुका था और अनेक प्रकार के ऐसे रत्नों से विभूषित था जिनको धनिक व्यापारी दूर-दूर के समुद्र-तटों से लेकर आए थे। इससे पूर्व संवत् 1204 (1147 ई.) के फाल्गुन मास की षष्ठि, बुधवार के तेजपाल और बसन्तपाल बन्धुओं द्वारा स्थापित एक लेख में कहा गया है कि पवित्रता के सागर के समान यदुवंश में इन्दु नेमीश्वर हुए जिनके चरण कमलों का अनुसरण करते हुए परमोच्च उज्जयन्ति तक चढ़कर यदुवंशियों के समूह के समूह युग-युग से नेमिनाथ के चरणों में शीश नवाते आए हैं। (वही, पृष्ठ 524-526) इस प्रकार अपराजितकार इससे पूर्व हो चुका था और तब तक गिरनार पर नेमिनाथ- तीर्थ की मान्यता का विकास हो चुका था। अन्तःसाक्ष्य के अन्तर्गत ही ग्रन्थकार ने महाग्रावभी रत्नकूट, मेरुतिलकादि संज्ञक जिन देवालयों के स्वरूपों का वर्णन किया है, वे अन्यान्य वास्तु विधियाँ 12वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक समाज में प्रचलित थी। इनमें से कई नाम वलभी संवत् 850 तद्नुसार 1169 ई. के कुमारपाल चालुक्य के एक अभिलेख में आए हैं। यथा— बस्तियों में ब्रह्मपुर, राजाओं के मण्डल, यतियों के मठ, नृपशाला, कूपिका, रौप्यप्रणाल, मण्डुकासन, पट्टशालिका, सोपान, महागृह, वापिका आदि मुख्य हैं। मन्दिरों के लिए कैलाश-शैल के समान जैसी तुलनाएँ आई हैं। मेरु के समान मन्दिर को खड़ा करवाना, जीर्णोद्धार कार्य की प्रशंसा, देवालयों पर स्वर्ण-कलश की स्थापना, जल-कुल्याएँ बनवाना और देव प्रतिमाओं के लिए सिंहासन निर्माण जैसे प्रसङ्ग तत्कालीन परम्परानुसार अपराजितपृच्छा में आए हैं। फिर, तब तक सोमनाथ-प्रभास क्षेत्र का महत्व उजागर हो चुका था। अपराजितकार ने विस्तार से सोमनाथ का वर्णन किया है। वहाँ तब शिल्पियों का बृहद् समूह विद्यमान था और उक्त मन्दिर के लिए विशिष्ट कार्य के सम्पादक होने के कारण उनकी ख्याति सोमनाथपुरवासी होने से सोमपुरा के रूप में ख्यातिलब्ध हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि संक्रमण युग में जबकि कला की काया ऐसे दौर में थी