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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३९


लज्जावन्ती, धायके फूल, बेलगिरी, आमकी गुठलीकी गिरी और कमलकेशर अथवा बेलगिरी, मोचरस, लोध, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनके क्वाथ या कल्कको चावलोंके जलके साथ पान करनेसे पित्त-कफातिसार और रक्तज अतिसार शीघ्र दूर होता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥

कुटजादि ।

कुटजातिविषामुस्तं हरिद्रापर्णिनीद्वयम् ।
सक्षौद्रशर्करं शस्तं पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ ५१ ॥

पित्त कफातिसारवाले रोगियोंको कुडेकी छाल, अतीस, नागरमोथा, हल्दी, दारुहल्दी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी इनके क्वाथमें शहद और मिश्री डालकर पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ५१ ॥

वातश्लेष्मातिसार-चिकित्सा ।

चित्रकादि ।

चित्रकातिविषामुस्तं बला बिल्वं सनागरम् ।
वत्सकत्वक्फलं पथ्या वातश्लेष्मातिसारनुत् ॥ ५२ ॥

चीता, अतीस, नागरमोथा, खिरटी, बेलगिरी, सोंठ, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और हरड इनका क्वाथ वात और कफके अतिसारको नष्ट करता है ॥ ५२ ॥

त्रिदोषातिसार-चिकित्सा ।

वराहस्नेहमांसाम्बुसदृशं सर्वरूपिणम् ।
कृच्छ्रसाध्यमतीसारं विद्याद् दोषत्रयोद्भवम् ॥ ५३ ॥

त्रिदोषातिसारमें वातादि तीनों दोषोंके लक्षण प्रकट होते हैं। इसमें मल सूअरकी चर्बी और मांस मिश्रित जलकी समान होता है । यह त्रिदोषज अतीसार अत्यन्त कष्टसाध्य होता है ॥ ५३ ॥

समङ्गादि-कषाय ।

समङ्गाऽतिविषा मुस्ता विश्वं ह्रीबेरधातकी ।
कुटजत्वक्फलं बिल्वं क्वाथः सर्वातिसारनुत् ॥ ५४ ॥

लज्जावन्ती, अतीस, नागरमोथा, सोंठ, सुगन्धवाला, धायके फूल, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और बेलगिरी इनका क्वाथ पान करनेसे सर्व प्रकारका अतीसार दूर होता है ॥ ५४ ॥

पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।

२४० | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-


पञ्चमूली-बलादि ।

पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।
पाठाभूनिम्बबर्हिष्ठकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ ५५ ॥
सर्वजं हन्त्यतीसारं ज्वरं चापि तथा वमिम् ।
सशूलोपद्रवं श्वासं कासं चापि सुदुस्तरम् ॥ ५६ ॥

पञ्चमूल (पित्ताधिक्यमें स्वल्प पंचमूल और वात-कफाधिक्यमें बृहत्पंचमूल लेना चाहिये), खिरैंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, पाठ, चिरायता, सुगन्ध-वाला, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनका क्वाथ शीतल करके पान करनेसे त्रिदोषज अतिसार, ज्वर, वमन, शूल आदि उपद्रवोंसहित दुस्तर श्वास और कास-विकार दूर होते हैं ॥ ५६ ॥

पुटपक्वौषधप्रयोगविधि ।

अवेदनं सुसंपक्वं दीप्ताग्नेः सुचिरोत्थितम् ।
नानावर्णमतीसारं पुटपाकैरूपाचरेत् ॥ ५७ ॥

यदि प्रदीप्ताग्निवाले रोगीके बहुत दिनोंका पुराना, पीडारहित, परिपक्व और अनेक वर्णका अतिसार (रोग) हो तो उसकी अतिसाररोगमें कहीहुई पुटपाककी औषधियोंसे चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥

कुटज-पुटपाक ।

स्निग्धं घनं कुटजवल्कलजन्तवजग्ध-
मादाय तत्क्षणमतीव च कुट्टयित्वा ।
जम्बूपलाशपुटतण्डुलतोयसिक्तं
बद्धं कुशेन च बहिर्घनपङ्कलिप्तम् ॥ ५८ ॥
सुस्विन्नमेतदवपीड्य रस गृहीत्वा
क्षौद्रेण युक्तमतिसारवते प्रदद्यात् ।
कृष्णात्रिपुत्रमतिपूजित एष योगः
सर्वातिसारहरणे स्वयमेव राजा ॥ ५९ ॥


१ "स्वरसस्य गुरुत्वेन पुटपाकं पलं पिबेत् । पुटपाकस्य पाकोऽयं बहिराङ्गारवर्णता ॥"
पुटपाककी विधि यह है कि-जब पुटपाकका बाहरसे लालरंग होजाय, तब उसको पका हुआ जान-कर निकाल लेवे । फिर उसमेसे रसको निकालकर एकएक पलकी मात्रासे पानकरे ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४१


चिकनी मोटी और जिसको कीड़ोंने न खाया हो, ऐसी कुड़ेकी जड़की छालको लेकर तत्क्षण खूब बारीक कूटकर चावलोंके जलमें पीसलेवे । फिर उसको जामुनके पत्तोंमें लपेटकर और कुशासे बाँधकर उसके ऊपर गाढ़ी मिट्टीका लेप करके सुखालेवे । पश्चात् जब पककर शीतल होजाय तब उसमेंसे रसको निकाल लेवे । इस रसमें शहद मिलाकर अतिसारवाले रोगीको सेवन कराना चाहिये । यह प्रयोग सर्वप्रकारके अतिसाररोगको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण योगोंका राजा है । यह योग कृष्णात्रेयमुनिका कहा हुआहै । ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

श्योनाकपुटपाक ।

त्वक्पिण्डं दीर्घवृत्तस्य काश्मरीपत्रवेष्टितम् ।
मृदाऽवलिप्तं सुकृतमङ्गारेष्ववकूलयेत् ॥ ६० ॥
स्विन्नमुद्धृत्य निष्पीड्य रसमादाय यत्नतः ।
शीतीकृतं मधुयुतं पाययेदुदरामये ॥ ६१ ॥

अरलूकी जड़की छालको कूट पीसकर गोलासा बनालेवे । फिर उसको कुम्मेरके पत्तोंमें लपेटकर और ऊपरसे मिट्टीका लेप कर मन्द मन्द अग्निसे पुटपाक करना चाहिये । जब पककर शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर उसमेंसे रसको निचोड़ लेवे । उस रसको उचित मात्रासे शहदमें मिलाकर उदररोगोंमें सेवन करानेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ६० ॥ ६१ ॥

दाडिम-पुटपाक ।

दाडिमस्य फलं पिष्ट्वा पचेत् पुटविधानतः ।
तद्रसं मधुसंमिश्रं पिबेत् सर्वातिसारनुत् ॥ ६२ ॥

कच्चे अनारके फलको पीसकर पूर्वोक्त विधिसे पुटपाक करे । फिर उसके रसको निकालकर दो तोले परिमाण लकर मधुके साथ मिश्रितकर सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है ॥ ६२ ॥

कुटज-लेह ।

शतं कुटजमूलस्य क्षुण्णं तोयार्मणे पचेत् ।
क्वाथे पादावशेषेऽस्मिन् लेहं पूते पुनः पचेत् ॥ ६३ ॥
सौवर्चलयवक्षारविडसैन्धवपिप्पली ।
धातकीन्द्रयवाजाजीचूर्णं दत्त्वा पलद्वयम् ॥ ६४ ॥

१६

२४२भैषज्यरत्नावलो ![ अतिसार-

लिह्याद्बदरमात्रं तु पीतं क्षौद्रेण संयुतम् ।
पक्कापक्कमतीसारं नानावर्णं सवेदनम् ॥
दुर्वारं ग्रहणीरोगं जयेच्चैव प्रवाहिकाम् ॥ ६५ ॥

कुडेकी जड़ की छाल १०० पल लेकर और उसको अच्छीतरह कूटकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाईभाग जल शेष रहजावे, तब उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथको दुबारा मन्द मन्द अग्निसे पकावे । पककर जब वह अवलेहके समान होजाय, तब उसमें कालानमक, जवाखार, विरिया संचरनमक, सैंधानमक, पीपल, धायके फूल, इन्द्रजौ और जीरा इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण दो दो पल मिलादेवे । प्रतिदिन एक एक तोले परिमाण लेकर शहदके साथ सेवन करे तो यह अवलेह पक्व, अपक्व, अनेक वर्णवाले और वेदनायुक्त अतिसार दुःसाध्य संग्रहणी और प्रवाहिकारोगको शीघ्र नष्ट करताहै ॥

कुटजाष्टकावलेह ।

तुलामथार्द्रां गिरिमल्लिकायाः संक्षुद्य पक्त्वा रसमाददीत ।
तस्मिन् सुपूते पलसम्मितानि श्लक्ष्णानि पिष्ट्वा सह शाल्मलेन ॥६६॥
पाठां समङ्गामतिविषां समुस्तां बिल्वं च पुष्पाणि च धातकीनाम् ।
प्रक्षिप्य भूयो विपचेत्तु तावद् दर्वीप्रलेपः स्वरसं तु यावत् ॥ ६७ ॥
पीतस्त्वसौ कालविदा जनेन मण्डेन वाऽजापयसाथवापि ।
निहन्ति सर्वं त्वतिसारमुग्रं दोष ग्रहण्या विविधं च रक्तम् ॥ ६८ ॥
कृष्णं सितं लोहितपीतकं वा पित्तं तथाऽर्शांसि सशोणितानि ।
असृग्दरं चैवमसाध्यरूपं निहन्त्यवश्यं कुटजाष्टकोऽयम् ॥ ६९ ॥

कुडेकी जडकी गीली छालको सौ पल लेकर ओखलीमें कूटलेवे । फिर उसको एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें मोचरस, पाठ, लज्जावन्ती, अतीस, नागरमोथा, बेलगिरी और धायके फूल इन औषधियोंको खूब बारीक पीसेहुए चार चार तोले प्रमाण चूर्णको डालकर तबतक मन्दमन्द अग्निसे पकावे जबतक कि वह स्वरस करछीसे चिपकने न लगे । फिर देश, काल और दोषोंका विचार-


१-तुलाद्रव्ये जलद्रोणो द्रोणे द्रव्यं तुला मता ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४३


कर इस अवलेहको उचित मात्रासे माँड अथवा बकरीके दूधके साथ सेवन करें। यह कुटजाष्टक अवलेह सर्वप्रकारके भयंकर अतिसार, संग्रहणी, नानाप्रकारके रक्त-विकार, काला, सफेद, लाल, पीले और पित्तज अतिसार, बवासीर, रुधिरकी बवासीर और असाध्य रक्तप्रदररोगको भी अवश्य नष्ट करता है ॥ ६६–६९ ॥

दुग्ध-पानविधि ।

जीर्णेऽमृतोपमं क्षीरमतीसारे विशेषतः ।
छागं तद्भेषजैः सिद्धं पेयं वा वारिसाधितम् ॥ ७० ॥

विशेषकर पुराने अतिसारमें बकरीके दूधको अतिसारनाशक औषधियोंके साथ पकाकर अथवा केवल जलके साथ पकाकर देनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ७० ॥

शोथातीसार-चिकित्सा ।

शोथघ्नीन्द्रयवाः पाठाश्रीफलातिविषाघनाः ।
क्वथिताः सोषणाः पीता। शोथातीसारनाशनाः ॥ ७१ ॥

पुनर्नवा, इन्द्रजौ, पाठ, बेलगिरी, अतीस और नागरमोथा इनका काथ, काली मिरचोंका चूर्ण बनाकर उसमें डालकर पान करनेसे शोथातीसार नष्ट होता है ७१

विडङ्गातिविषामुस्तं दारु पाठा कलिङ्गकम् ।
मरिचेन समायुक्तं शोथातीसारनाशनम् ॥ ७२ ॥

वायविडङ्ग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठ और इन्द्रजौ इनके काथमें काली-मिरचोंका चूर्ण डालकर पान करनेसे शोथयुक्त अतीसार नष्ट होता है ॥ ७२ ॥

भय-शोकज अतीसार-चिकित्सा ।

भयशोकसमुद्भूतौ ज्ञेयौ वातातिसारवत् ।
तयोर्वातहरी काया हर्षणाश्वासनैः क्रिया ॥ ७३ ॥

भय और शोकसे उत्पन्नहुए अतिसारोंको वातज अतिसारकी समान जानना चाहिये। अतः उक्त दोनों प्रकारके अतीसारोंमें वातनाशक चिकित्सा एवं हर्षजनक धैर्यप्रदान आदि कार्य करे ॥ ७३ ॥

पृश्निपर्ण्यादि ।

पृश्निपर्णीबलाबिल्वधान्यकोत्पलनागरैः ।
विडङ्गातिविषामुस्तदारुपाठाकलिङ्गकैः ॥
मरिचेन समायुक्तः शोकातीसारनाशनः ॥ ७४ ॥

२४४भैषज्यरत्नावली ।[ अतिसार-

पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी, धनियाँ, कुमोदिनी (नीलोफर), सोंठ, वायविडंग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठ और इन्द्रजौ इनके क्वाथमें कालीमिर्चोंका चूर्ण मिलाकर सेवन करनेसे शोकजनित अतिसार दूर होता है ॥ ७४ ॥

रक्तातिसार-चिकित्सा ।

गुडेन खादितं बिल्वं रक्तातीसारनाशनम् ।
आमशूलविबन्धघ्नं कुक्षिरोगविनाशनम् ॥ ७५ ॥
बेलकी गिरीको गुडके साथ खानेसे रक्तातीसार तथा आम, शूल, मलकी बद्धता और कुक्षिरोग ये सब नष्ट होते हैं ॥ ७५ ॥

शल्लकीबदरीजाम्बूपियालाम्रार्जुनत्वचः ।
पीताः क्षीरेण मध्वाढ्याः पृथक् शोणितनाशनाः ॥ ७६ ॥
सालईकी जडकी छाल, बेरीकी छाल, जामुनकी छाल, चिरौंजीकी छाल, आमकी छाल या अर्जुनकी छाल इनमेंसे किसी एककी छालको पीसकर दूध और शहदके साथ मिलाकर पान करनेसे रक्तातिसार दूर होता है । ये प्रत्येक छाल रक्तस्रावको बन्द करनेवाली हैं ॥ ७६ ॥

पीतं मधुसितायुक्तं चन्दनं तण्डुलाम्बुना ।
रक्तातीसारजिद्रक्तपित्ततृड्दाहमेहनुत् ॥ ७७ ॥
शहद, मिश्री और लालचन्दन इनको समानभाग लेकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे रक्तातीसार, रक्तपित्त, तृषा, दाह और प्रमेहरोग नष्ट होता है ॥ ७७ ॥

कषायो मधुनां पीतस्त्वचा दाडिमवत्सकात् ।
सद्यो जयेदतीसारं सरक्तं दुर्निवारकम् ॥ ७८ ॥
अनारकी छाल और कुडेकी छालके क्वाथको शहदके साथ पान करनेसे दुर्जय रक्तातीसार तत्काल दूर होता है ॥ ७८ ॥

जम्ब्वाम्रामलकानां तु पल्लवानथ कुट्टयेत् ।
संगृह्य स्वरसं तेषामजाक्षीरेण योजयेत् ॥
तं पिबेन्मधुना युक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥ ७९ ॥
जामुन, आम और आमलेके पत्तोंको कूटकर उनका स्वरस निकालकर बकरीके दूध और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे रक्तातीसार निवारण होता है ॥ ७९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४५


बिल्वं छागपयःसिद्धं सितामोचरसान्वितम् ।
कलिङ्गचूर्णसंयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥ ८० ॥
बकरीके दूधमें बेलगिरीको पकाकर उसमें मिश्री, मोचरस और इन्द्रजौका चूर्ण डालकर पान करनेसे रक्तातीसार नष्ट होता है ॥ ८० ॥

ज्येष्ठाम्बुना तण्डुलीयं पीतं च ससितामधु ।
पीत्वा शतावरीकल्कं पयसा क्षीरभुग् जयेत् ॥
रक्तातिसारं पीत्वा वा तथा सिद्धं घृतं नरः ॥ ८१ ॥
चौलाईकी जडको चावलोंके पानीके साथ पीसकर उसमें मिश्री और शहद मिलाकर पान करनेसे रक्तातीसार नष्ट होता है। शतावरके कल्कको बकरीके दूधके साथ पान करनेसे और उसपर दूधके साथ भोजन करनेसे अथवा शतावरके क्वाथ और कल्कके द्वारा सिद्ध किये हुए घृतको पान करनेसे रक्तातीसार दूर होता है ॥ ८१ ॥

कुटजत्वक्कृतः क्वाथो घनीभूतः सुशीतलः ।
लेहितोऽतिविषायुक्तः सर्वातीसारनुद् भवेत् ॥ ८२ ॥
कुडेकी छालके क्वाथको पकाकर अवलेहकी समान गाढा बनालेवे। जब पक-कर शीतल होजाय तब उसमें अतीसका चूर्ण मिलाकर चाटनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है ॥ ८२ ॥

कुटजस्य पलं ग्राह्यमष्टभागजले शृतम् ।
तथैव विपचेद् भूयो दाडिमोदकसंयुतम् ॥ ८३
यावच्चैव लसीकाभं शृतं तमुपकल्पयेत् ।
तस्यार्द्धकर्षं तक्रेण पिबेद्रक्तातिसारवान् ॥
अवश्यमरणीयोऽपि मृत्योर्याति न गोचरम् ॥ ८४ ॥
कुडेकी छालको ४ तोले लेकर आठगुने जलमें पकावे और चतुर्थांश जल शेष रक्खे। फिर उस क्वाथको छानकर और उसमें अनारका रस डालकर फिर पूर्वोक्त विधिसे पकावे। जब वह पाक अवलेहके समान गाढा होजाय तब उतारलेवे। पश्चात् उसको एक तोला परिमाण मट्ठेके साथ मिलाकर सेवन करनेसे मृत्युके मुखमें पतित हुआ भी रक्तातिसारवाला रोगी अवश्य आरोग्य लाभ करता है ॥ ८३ ॥ ८४ ॥

२४६ भैषज्यरत्नावली । [अतिसार-

कल्कस्तिलानां कृष्णानां शर्कराभागसंयुक्तः ।
आजेन पयसा पीतः सद्यो रक्तं नियच्छति ॥ ८५ ॥
कालेतिलोंको पीसकर उसमें चौथाई भाग खाँड मिलाकर बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे रक्तातिसार तत्काल दूर होता है ॥ ८५ ॥

निष्क्वाथ्य मूलममलं गिरिमल्लिकायाः
सम्यक् पलद्वितयमम्बु चतुःशरावे ।
तत्पादशेषसलिलं खलु शोषणीय
क्षीरे पलद्वयमिते कुशलैरजायाः ॥ ८६ ॥
प्रक्षिप्य माषकानष्टौ मधुनस्तत्र शीतले ।
रक्तातिसारी तं लीढ्वा नैरूज्यमधिगच्छति ॥ ८७ ॥
कुडेकी शुद्ध छालको ८ तोले लेकर ४ शराव ( ६४ तोले ) जलमें पकावे । जब चौथाई जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर उसको ८ तोले प्रमाण बकरीके दूधमें मिलाकर और ८ माशे शहद डालकर पान करनेसे रक्तातिसारवाला रोगी शीघ्रही आरोग्य लाभ करता है ॥ ८६ ॥ ८७ ॥

वटरोह तु संपिष्य श्लक्ष्णं तण्डुलवारिणा ।
तत्पिबेत् तक्रसंयुक्तमतीसाररुजापहम् ॥ ८८ ॥
बड़के अंकुरोंको चावलोंके पानीके साथ खूब बारीक पीसकर मट्ठेके साथ पान करनेसे अतीसाररोग दूर होता है ॥ ८८ ॥

तण्डुलजलपिष्टाङ्कोटमूलकर्षाद्धपानमपहरति ।
सर्वातिसारग्रहणीरोगसमूहं महाघोरम् ॥ ८९ ॥
अङ्कोट ( ढेरा ) वृक्षकी जडको आठ माशे लेकरः चावलोंके जलमें पीसकर पीनेसे सब प्रकारके भयङ्कर अतीसार, संग्रहणी आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ ८९ ॥

विशल्यकरणीक्वाथश्चाथवा कुक्कुटद्रजः ।
वारयेच्छोणितस्रावं रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ९० ॥
विशल्यकरणी ( रकपतिया घास ) का क्वाथ अथवा कुकुरौंदेका रस पान करतेही रक्तस्राव और प्रबल रक्तातिसार नष्ट होता है ॥ ९० ॥

पीत्वा सशर्करं क्षौद्रं चन्दनं तण्डुलाम्बुना ।
दाहं तृष्णां प्रमेहं च सद्यो रक्तं नियच्छति ॥ ९१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४७

मिश्री, शहद और चन्दनका चूर्ण इनको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे दाह, तृषा, प्रमेह और रक्तातिसार शीघ्र दूर होता है ॥ ९१ ॥

नवनीतं मधुयुतं लिह्वेद्वा सितया सह ।
नागकेशरसंयुक्तं रक्तसंग्रहणं परम् ॥
मधुपादं सितार्द्धांशं नवनीतं चतुर्गुणम् ॥ ९२ ॥

नैनीघीको शहदके साथ या मिश्रीके साथ किंवा नागकेशरके साथ सेवन करनेसे अथवा शहद १ भाग, मिश्री २ भाग और नैनीघी ४ भाग सबको एकत्र मिलाकर खानेसे रक्तस्राव बन्द होता है ॥ ९२ ॥

रसाञ्जनादिचूर्ण ।

रसाञ्जनं चातिविषां कुटजस्य फलत्वचम् ।
धातकीं शृङ्गबेरं च पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥
क्षौद्रयुक्तं प्रणुदति रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ९३ ॥

रसौंत, अतीस, इन्द्रजौ, कुडकी छाल, धायके फूल और सोंठ इनके चूर्णको समान भाग लेकर चावलोंके जलमें पीसकर शहदके साथ सेवन करनेसे प्रबल रक्तातिसार नष्ट होता है ॥ ९३ ॥

नारायणचूर्ण ।

गुडूची वृद्धदारं च कुटजस्य फलं तथा ।
बिल्वं चातिविषा चैव भृङ्गराजं च नागरम् ॥ ९४ ॥
शक्राशनस्य चूर्ण च सर्वमेकत्र मेलयेत् ।
चूर्णमेतत्समं ग्राह्यं कुटजस्य त्वचोऽपि च ॥ ९५ ॥
गुडेन मधुना वापि लेहयेद् भिषजां वरः ।
शोथं रक्तमतीसारं चिरजं दुर्जयं तथा ॥ ९६ ॥
ज्वरं तृष्णां च कासं च पाण्डुरोगं हलीमकम् ।
मन्दानलं प्रमेहं च गुदजं च विनाशयेत् ॥
एतन्नारायणं चूर्ण श्रीनारायणभाषितम् ॥ ९७ ॥

गिलोय, विधारा, इन्द्रजौ, बेलगिरी, अतीस, भाँगरा, सोंठ और भाँग इन सबके चूर्णको समान भाग लेवे और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर भाग कुडेकी छालका चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिलालेवे । इस चूर्णको पुराने गुड अथवा शहदके साथ

२४८भैषज्यरत्नावली ।[ अतिसार-

सेवन करनेसे सूजन तथा बहुत पुराना और दुस्साध्य रक्तातिसार, ज्वर, तृषा, खाँसी, पाण्डुरोग, हलीमक, मन्दाग्नि, प्रमेह और गुदाके समस्त रोग शीघ्र नष्ट होतेहैं। इस नारायणचूर्णको श्रीनारायणने कहा है ॥ ९४-९७ ॥

गुदापाकमें विधि ।

गुददाहे प्रपाके वा पटोलमधुकाम्बुना ।
सेकादिकं प्रशंसन्ति छागेन पयसाऽपि वा ॥
गुदभ्रंशे प्रकर्त्तव्या चिकित्सा तत्प्रकीर्त्तिता ॥ ९८ ॥

अतिसारके कारण गुदामें दाह अथवा पाक होनेपर पटोलपात और मुलहठीक काथ अथवा बकरीके दूधसे गुदाद्वारको सिंचन करना चाहिये और गुदभ्रंशरोगमें कहीहुई चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ९८ ॥

साधारणातिसार-चिकित्सा ।

बिल्वादि ।

बिल्वचूतास्थिनिर्यूहः पीतः सक्षौद्रशर्करः ।
निहन्याच्छर्द्यतीसारं वैश्वानर इवाहुतिम् ॥ ९९ ॥

बेल और आमकी गुठलीके काथमें खांड और शहद डालकर पान करनेसे वमनयुक्त अतीसार निवारण होताहै ॥ ९९ ॥

पटोलादि ।

पटोलयवधन्याकक्वाथः पीतः सुशीतलः ।
शर्करामधुसंयुक्तश्छद्यतीसारनाशनः ॥ १०० ॥

परवल, जौ और धनियां इनके शितिल क्वाथमें मधु और खांड मिलाकर पान करनेसे वमन और अतीसाररोग नष्ट होताहै ॥ १०० ॥

प्रियंग्वादि ।

प्रियंग्वञ्जनमुस्ताख्यं पाययेत्तु यथाबलम् ।
तृष्णातीसारच्छर्दिघ्नं सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ॥ १ ॥

फूलप्रियंगु, रसौंत और नागरमोथा इनके चूर्णको शहद और चावलोंके पानीके साथ मिलाकर जठराग्निके बलानुसार पान करानेसे तृषा, अतिसार, वमन आदि उपद्रव दूर होते हैं ॥ १०१ ॥

जम्ब्वादि ।

जम्ब्वाम्रपल्लवोशीरवटशुङ्गावरोहकम् ।
रसः क्वाथोऽथवा चूर्णं क्षौद्रेण सह योजितम् ॥ २ ॥

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४९

छर्दिं ज्वरमतीसारं मूर्च्छां तृष्णां च दुर्जयाम् । नाशयत्यचिराद्धन्ति स्रुतिं वाऽनेकहेतुकाम् ॥ ३ ॥ जामुन और आमके कोमल पत्ते, खस, बडके, अंकुर और वडकी डाढी इन सबका स्वरस, क्वाथ अथवा चूर्ण मधुके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वमन, ज्वर, अतीसार, मूर्च्छा और दुस्तर तृषा दूर होती है। यह योग अनेक कारणोंसे उत्पन्न-हुए रक्तस्रावको शीघ्र नष्ट करता है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥

वत्सकादि ।

सवत्सकः सातिविषः सबिल्वः सोदीच्यमुस्तश्च कृतः कषायः । सामे सशूले सहशोणिते च चिरप्रवृत्तेऽपि हितोऽतिसारे ॥ ४ ॥ इन्द्रजौ, अतीस, बेलगिरी, सुगन्धवाला और नागरमोथा इनका क्वाथ आम और शूलयुक्त पुराने रक्तातिसारमें विशेष हितकारी ह ॥ १०४ ॥

नाभिप्रलेप ।

कृत्वाऽऽलवालं सुदृढं पिष्टरामलकैर्भिषक् । आर्द्रकस्य रसेनाथ पूरयेन्नाभिमण्डलम् ॥ नदीवेगोपमं घोरमतीसारं विनाशयेत् ॥ ५ ॥ वैद्य, आमलोंको पीसकर उनके द्वारा रोगीकी नाभिके चारों ओर गोलगोल थाँवलासा बनाकर उसमें अदरखके रसको भरदेवे। इससे नदीके वेगके समान भयंकर अतीसार शीघ्र दूर होता है ॥ १०५ ॥

तथा जातीफलं पिष्ट्वा नाभौ दद्यात् प्रलेपनम् । दुर्निवारमतीसारं वारयत्यनिवारितम् ॥ ६ ॥ जायफलको पीसकर नाभिपर प्रलेप करनेसे असाध्य अथवा कष्टसाध्य अतिसार भी दूर होता है ॥ १०६ ॥

आम्रस्य वल्कलं पिष्टं काञ्जिकेन प्रयत्नतः । नाभिं संलेपयेत्तेन कल्केन मतिमान् भिषक् ॥ नदीवेगोपमं घोरमतीसारं निवारयेत् ॥ ७ ॥ आमकी छालको काँजीम पीसकर नाभिके चारों ओर प्रलेप करनेसे नदीके समान वेगवाला अतीसार भी नष्ट होता है ॥ १०७ ॥

प्रवाहिका-चिकित्सा ।

बालं बिल्वं गुडं तैलं पिप्पली विश्वभेषजम् । लिह्याद्वाते प्रतिहते सशूले सप्रवाहिके ॥ ८ ॥

२६० भैषज्यरत्नावली । [ अतिसार-

वातज और शूलयुक्त प्रवाहिकारोगमें कच्चे बेलका सूखा गूदा, गुड, तिलका तैल, पीपल और सोंठ इन सबको एकत्र मिलाकर सेवन करना हितकारी है ॥ १०८ ॥

पयसा पिप्पलीकल्कः पीतो वा मरिचोद्भवः । त्र्यहात् प्रवाहिकां हन्ति चिरकालानुबन्धिनीम् ॥ ९ ॥

पीपलके कल्क या काली मिरचाक कल्कको दूधके साथ सेवन करनेसे बहुत दिनोंकी पुरानी प्रवाहिका तीन दिनमें शमन होती है ॥ १०९ ॥

कल्कः स्याद्बालबिल्वानां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः साराम्लस्नेहाढ्यः सद्यो हन्यात् प्रवाहिकाम् ॥ ११० ॥

कच्चे बेलकी गिरीका कल्क और उसके समान तिलोंका कल्क लेकर दहीकी मलाई, खट्टा और स्नेहयुक्त करके पान करनेसे प्रवाहिकारोग शीघ्र नष्ट होता है १०

बिल्वौषणं गुडं लोध्रं तैलं लिह्यात् प्रवाहणे ॥ ११ ॥

प्रवाहिका रोगीके लिये बेलगिरी कालीमिरच, गुड, लोध और तिलका तेल इन सबको समान भाग लेकर और मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥ ११ ॥

दध्ना ससारेण समाक्षिकेन भुञ्जीत निस्सारकपीडितस्तु । सुतप्तरूप्यक्वथितेन वापि क्षीरेण शीतेन मधुप्लुतेन ॥ १२ ॥

मलाईसहित दहीके साथ शहद मिलाकर भक्षण करनेसे अथवा तपाई हुई चाँदीको बुझाकर उस दूधको शीतल करके और उसमें शहद मिलाकर पान करनेसे प्रवाहिकारोग दूर होता है ॥ १२ ॥

तासामतीसारवदादिशेच्च लिङ्गं क्रमं चामविपक्वतां च ॥ १३ ॥

प्रवाहिका रोगके लक्षण, चिकित्सा एवं आम और पक्वलक्षण अतीसारकी समान जानने चाहिये ॥ १३ ॥

अहिफेनयोग ।

अहिफेनं सुसंभृष्टं खर्परे मृदुवह्निना । हिक्कातीसारशमनं भेषजं नास्त्यतः परम् ॥ १४ ॥

अफीमको मिट्टीके पात्रमें मन्दअग्निसे अच्छे प्रकार भूनकर उचित मात्रासे प्रयोग करनेसे हिचकी और अतिसाररोग शमन होता है ॥ १४ ॥

अहिफेनवटिका ।

अहिफेनं सखर्जूरं घृष्ट्वा गुञ्जैकमात्रकम् । रक्तस्रावमतीसारमतिवृद्धं विनाशयेत् ॥ १५ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २५१


अफीम और खजूर ( छुहारा ) इन दोनोंको बराबर भाग लेकर एकत्र खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ! इन गोलियोंको सेवन करनेसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ अतीसार और रक्तस्राव दूर होता है ॥ १५ ॥

जातीफलादिवटी ।

जातीफलं च खर्जूरमहिफेनं तथैव च ।
समभागानि सर्वाणि नागवल्लीरसेन च ॥ १६ ॥
वल्लमात्रा वटी कार्या देया तक्रानुपानतः ।
अतीसारं जयेद् घोरं वैश्वानर इवाहुतिम् ॥ १७ ॥

जायफल, खजूर ( छुहारा ) और अफीम इनको समानभाग लेकर पानके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । एक एक गोली मठेके साथ देनेसे भयंकर अतिसार इस प्रकार नष्ट होजाता है, जिस प्रकार अग्नि आहुतिको तत्काल भस्म कर देती है ॥ १६ ॥ १७ ॥

पूर्णचन्द्रोदयरस ।

शुद्धं च तालकं लौहं गगनं च पलं पलम् ।
कर्पूरं पारदं गन्धं प्रत्येकं वटकोन्मितम् ॥ १८ ॥
जातीकोषं मुरापत्रं शठी तालीशकेशरम् ।
व्योषं चोचं कणामूलं लवङ्गं पिचुसम्मितम् ॥ १९ ॥

शुद्धहरिताल, लोहा और अभ्रक ये प्रत्येक चार चार तोले, कपूर, पारा और शुद्धगन्धक ये प्रत्येक एकएक तोला एवं जावित्री, कपूरकचरी, तेजपात, कचूर, तालीसपत्र, केशर, सोंठ, पीपल, मिरच, दारचीनी, पीपलामूल और लौंग ये प्रत्येक दो-दो तोले लेवे । सबको एकत्र खरल करके एक शीशीमें भरकर रख देवे॥१८॥१९॥

भक्षयेत् प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः ।
नानारूपमतीसारं ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ॥ १२० ॥
अम्लपित्तं तथा शूलं शूलं च परिणामजम् ।
रसायनवरश्चायं वाजीकरण उत्तमः ॥ १२१ ॥

इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल गुरु और इष्टदेवका पूजन कर दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करे तो यह अनेक प्रकारके अतिसार, सब प्रकारकी संग्रहणी, अम्लपित्त, शूल और परिणामशूलको नष्ट करता है । यह चूर्ण अतिश्रेष्ठ रसायन और उत्तम वाजीकरण औषधि है ॥ १२० ॥ १२१ ॥

२५२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-

बृहद्गगनसुन्दररस ।

पारदं गन्धकं चाभ्रं लौहं चापि वराटकम् ।
रूप्यं चातिविषां कर्षं समभागं प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥
धान्यशुण्ठीकृतक्वाथैर्भावयेच्च पृथक् पृथक् ।
गुञ्जाप्रमाणां वटिकां कारयेत् कुशलो भिषक् ॥ २३ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, अभ्रक, लोहा, कौडी और चाँदी इन सबकी भस्म और अतीस इन प्रत्येक औषधिको दो दो तोले लेकर धनिये और सोंठके क्वाथमें अलग-अलग भावना देवे । फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ २२ ॥ २३ ॥

भक्षयेत् प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः ।
दग्धबिल्वं गुडेनैव कुर्यात्तदनुपानकम् ॥ २४ ॥
अजादुग्धेन वा पेयं जम्बूत्वक्साधितं रसम् ।
अतीसारे ज्वरे घोरे ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥ २५ ॥
सामे सशूले रक्ते च पिच्छास्रावे भ्रमे तथा ।
शोथे रक्तातिसारे च संग्रहग्रहणीषु च ॥ २६ ॥

इस रसकी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गुरु और इष्टदेवका पूजन कर एक एक गोली भक्षण करे और ऊपरसे भुनेहुए बेलको गुडके साथ अथवा बकरीके दूधकों किंवा जामुनकी छालके क्वाथको अनुपानरूपसे सेवन करे । इसके सेवनसे अतिसार, ज्वर, ग्रहणी, अरुचि, आम, शूल, रक्तस्राव, भ्रम, सूजन, रक्तातिसार और प्रबल ग्रहणी रोग नष्ट होता है ॥ २४–२६ ॥

लोकनाथरस ।

भस्म सूतस्य भागैकं चत्वारः शुद्धगन्धकात् ।
क्षिप्तवा वराटिकागर्भे टङ्कणेन निरुध्य च ॥ २७ ॥
भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पाच्यं स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ।
लोकनाथरसो नाम क्षौद्रर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ २८ ॥
नागरातिविषामुस्तदेवदारुवचान्वितम् ।
कषायमनुपानं तु सर्वातीसारनाशनः ॥ २९ ॥

पारेकी भस्म १ भाग, शुद्ध गन्धक ४ भाग लेकर दोनोंको एक कौडीमें भरकर उसके मुखको सुहागेसे बन्द करके मूषायंत्रमें रखकर पुटपाकविधिसे पकावे । जब पककर स्वांगशीतल होजाय तब कौडीको निकालकर पीसलेवे ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६३

पश्चात् इस लोकनाथनामक रसको चार चार रत्तीकी मात्रासे शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु और वच इनके क्वाथको पीवे तो इससे सब प्रकारके अतिसार नष्ट होते हैं ॥ २७–२९ ॥

बृहच्चिन्तामणिरस ।

शुद्धसूतं मृतं ताम्रं गन्धकं प्रतिकार्षिकम् ।
चूर्णयेद्विषकषार्द्धं विषाद्धं तिन्तिडीफलम् ॥ १३० ॥
मर्दयेत् खल्लमध्ये तु चाम्ब्लेन गोलकीकृतम् ।
गर्ते षडङ्गुलं कुर्यात् सर्वतो वर्त्तुलं शुभम् ॥ ३१ ॥
नागवल्ल्याः क्षिपेत् पत्रमादौ पात्रे च गोलकम् ।
आच्छाद्य तच्च पत्रेण रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ ३२ ॥
स्वांगशीतं समुद्धृत्य सपत्रं च विशेषतः ।
कर्षाद्धं मरिचं दत्त्वा कर्षाद्धं तिन्तिडीफलम् ॥ ३३ ॥
गुञ्जामितां वटीं कुर्याच्चिन्तामणिरसो महान् ।
अतीसारे त्रिदोषोत्थे संग्रहग्रहणीगदे ॥
अनुपानं विधातव्यं यथादोषानुसारतः ॥ ३४ ॥

शुद्धपारा, ताँबेकी भस्म और शुद्धगन्धक यह प्रत्येक औषधि एकएक कर्ष शुद्ध मीठातेलिया ८ माशे और इमलीका गूदा ३ माशे लेवे । इन सबको एकत्र खरल करके गोलासा बनालेवे । फिर छः अंगुल गहरे और चारोंओरसे गोल ऐसे एक उत्तम पात्रको लेकर उसमें एक नागरवेलका पान रक्खे और पानके ऊपर उक्त गोलेको रखकर दूसरे पानसे उसे ढकदेवे । फिर अच्छेप्रकारसे उसके मुखको बन्द करके गजपुटमें रखकर पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब निकालकर पानोंसहित उसको पीसलेवे । पश्चात् उसमें कालीमिरच और इमलीका आठ आठ माशे चूर्ण डालकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको त्रिदोषज अतिसार और संग्रहणीरोगमें यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करना चाहिये । इसको बृहच्चिन्तामणिरस कहते हैं ॥ १३०–३४ ॥

भुवनेश्वर रस ।

सैन्धवं त्रिफलां चैव यमानीं बिल्वपेशिकाम् ।
गृहधूमं गृहीत्वा च प्रत्येकं समभागिकम् ॥ ३५ ॥

२५४भैषज्यरत्नावली ।[अतिसार -

जलेन मर्दयित्वा तु माषमात्रां वटीं चरेत् ।
खादेत्तोयानुपानेन सर्वातीसारशान्तये ॥ ३६ ॥

सेंधानमक, हरड, आमला, बहेडा, अजवायन, बेलगिरी और घरका धुआँ इन सबको समानभाग लेकर जलके साथ खरलकर एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एकएक गोली जलके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार शान्त होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

जातीफलरस ।

पारदाभ्रकसिन्दूरं गन्धं जातीफलं समम् ।
कुटजस्य फलं चैव धूर्त्तबीजानि टङ्कणम् ॥ ३७ ॥
व्योषं मुस्ताऽभया चैव चूतबीजं तथैव च ।
बिल्वकं सर्ज्जबीजं च दाडिमीफलवल्कलम् ॥ ३८ ॥
एतानि समभागानि निक्षिपेत् खल्लमध्यतः ।
विजयास्वरसेनैव मर्दयेत् श्लक्ष्णचूर्णितम् ॥ ३९ ॥
गुञ्जाफलप्रमाणां तु वटिकां कारयेद् भिषक् ।
एकां कुटजमूलत्वक्कषायेण प्रयोजयेत् ॥ ४० ॥

शुद्धपारा, अभ्रक, रससिन्दूर, शुद्ध गन्धक, जायफल, इन्द्रजौ, धतूरेके बीज सुहागा, साँठ पीपल, मिरच, नागरमोथा, हरड, आमकी गुठली, बेलगिरी, शालके बीज, अनारदाने और अनारका वक्कल इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर भाँगके रसमें खूब बारीक खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एकएक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल कुडेकी जडकी छालके काथके साथ सेवन करे ॥ ३७-४० ॥

आमातिसारं हरति कुरुते वह्निदीपनम् ।
मधुना बिल्वशुण्ठ्या च रक्तग्रहणिकां जयेत् ॥ ४१ ॥
शुण्ठीधान्यकयोगेन चातिसारं निहन्त्यसौ ।
जातीफलरसो ह्येष ग्रहणीगदहारकः ॥ ४२ ॥

यह रस आमातिसारको नष्ट करता है और जठराग्निको दीपन करता है । इस रसको शहद और बेलगिरीके साथ सेवन करनेसे रक्तजग्रहणी दूर होती है । साँठ और धनियेके काथके साथ सेवन करनेसे अतिसार एवं जायफलके काथके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी रोग नष्ट होता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६१


अभयनृसिंहरस ।

दरदं च विषं व्योषं जीरकं टङ्कणं समम् ।
गन्धकं चाभ्रकं चैव भागैकं शुद्धसूतकम् ॥ ४३ ॥
आफूकं सर्वतुल्यं स्यान्मर्दयेन्निम्बुकद्रवैः ।
एकैकं भक्षयेच्चानु जीरकं मधुना सह ॥ ४४ ॥
त्रिदोषोत्थमतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम् ।
सर्वरूपमतीसारं संग्रहग्रहणीं जयेत् ।
रसोऽभयनृसिंहोऽयमतीसारे सुपूजितः ॥ ४५ ॥

सिंगरफ, शुद्ध मीठा तेलिया, सोंठ, पीपल, मिरच, जीरा, सुहागा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक और शुद्धपारा ये सब समान भाग और अफीम सबके बराबर भाग लेवे । फिर सबको नींबूके रसमें खरल कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन १-१ गोली शहदके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार, ज्वरसहित व ज्वररहित अतिसार और संग्रहणीरोग नष्ट होता है । यह अभयनृसिंहनामक रस अतिसाररोगकी परमोत्तम औषधि है । ॥ ४३-४५ ॥


आनन्दभैरवरस ।

दरदं मरिचं टङ्कममृतं मागधी समम् ।
श्लक्ष्णपिष्टं तु गुञ्जैकं रसमानन्दभैरवम् ॥ ४६ ॥
लेहयेन्मधुना चानु कुटजस्य फलत्वचः ।
चूर्णितं कर्षमात्रं तु त्रिदोषोत्थातिसारजित् ॥ ४७ ॥
दध्यन्नं दापयेत् पथ्यं दध्याजं तक्रमेव च
पिपासायां जलं देयं विजया च हिता निशि ॥ ४८ ॥

सिंगरफ, मिरच, सुहागा, शुद्धमीठा तेलिया और पीपल इनको समान भाग लेकर खूब बारीक पीसकर जलमें खरलकरके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस आनन्दभैरव नामक रसकी एक एक गोली मधुके साथ सेवन करें, और ऊपरसे इन्द्रजौ तथा कुडेकी जड़की छालके चूर्णको एकएक तोला परिमाण लेकर शहदके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार नष्ट होता है । इसपर बकरीके दूध, दही और मट्ठेके साथ भातका पथ्य देवे । प्यास लगनेपर जल पान करना और रात्रिमें भाँगको सेवन कराना उपयोगी है ॥ ४६-४८ ॥

२९६भैषज्यरत्नावली ।[ अतिसार-

कर्पूररस ।

हिङ्गुलं चाहिफेनं च मुस्तकेन्द्रयवं तथा ।
जातीफलं च कर्पूरं सर्वं संमर्द्य यत्नतः ॥
जलेन वटिका कार्या द्विगुञ्जापरिमाणतः ॥ ४९ ॥
ज्वरातिसारिणे चैव तथाऽतीसाररोगिणे ।
ग्रहणीषट्प्रकारे च रक्तातीसार उल्बणे ॥ १५० ॥

हिंगुल, अफीम, नागरमोथा, इन्द्रजौ, जायफल और कपूर इन सबको समान भाग लेकर जलमें उत्तमप्रकारसे खरलकरके दोदो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह कर्पूररस ज्वरातिसारवाले तथा साधारण अतिसारवाले रोगीके लिये एवं छः प्रकारकी संग्रहणी और प्रबलरक्तातिसारमें हितकारी है ॥ ४९ ॥ १५० ॥

बर्बूरारिष्ट ।

तुलाद्वयं च बर्बूरं चतुर्द्रोणे जले पचेत् ।
द्रोणशेषे रसे शीते गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ॥ ५१ ॥
धातकीं षोडशपलां कृष्णां द्विपलिको तथा ।
जातीफलानि कक्कोलं त्वगेलापत्रकेशरम् ॥ ५२ ॥
लवङ्गं मरिचं चैव पलिकान्युपकल्पयेत् ।
मासं भाण्डे स्थितस्त्वेष बब्बूरारिष्टको जयेत् ।
क्षयं कुष्ठमतीसारं प्रमेहश्वासकासकान् ॥ ५३ ॥

बबूलकी छालको २०० पल लेकर चार द्रोण जलमें पकावे । जब पककर एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर उसमें १०० पल गुड़ डाले एवं धायके फूल ६४ तोले, पीपल ८ तोले तथा जायफल, शीतलचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग और कालीमिरच इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले डालदेवे । सबको एक मिट्टीके पात्रमें भरकर और उसके मुँहको बन्द करके एक महीनेतक रखा रहने देवे तो यह बर्बूरारिष्ट सिद्ध होता है। यह अरिष्ट क्षय, कुष्ठ, सर्वप्रकारके अतिसार प्रमेह, श्वास, कास आदि व्याधियोंको नष्ट करता है ॥ ५१–५३ ॥

कुटजारिष्ट ।

तुलां कुटजमूलस्य मृद्वीकार्द्धतुलां तथा ।
मधूकपुष्पकाश्मर्य्योर्भागान् दशपलोन्मितान् ॥ ५४ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६७


चतुर्द्रोणेऽम्भसः पत्क्वा द्रोणं चैवावशेषितम् । धातक्या विंशतिपलं गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ॥ ५५ ॥ मासमात्रं स्थितो भाण्डे कुटजारिष्टसंज्ञितः । ज्वरान् प्रशमयेत्सर्वान् कुर्यात्तीक्ष्णं धनञ्जयम् । दुर्वारं ग्रहणीं हन्ति रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ५६ ॥

कुडेकी जड़की छाल सौ पल, दाख ५० पल, महुएके फूल १० पल और कुम्भे-रकी छाल १० पल लेकर चार द्रोण जलमें पकावे । जब पककर एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें धायके फूल एक सेर और गुड़ सौ पल डालकर एक उत्तम मृत्तिकाके पात्रमें भरकर और उसके मुँहको बन्द करके एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । फिर एक महीने पीछे इसको निकालकर छानलेवे । इसको कुटजारिष्ट कहते हैं । यह अरिष्ट यथोचित मात्रासे सेवन करनेपर सर्व प्रकारके ज्वर दुःसाध्य संग्रहणी और प्रबल रक्तातिसारको शीघ्र नष्ट करता है और अग्निको दीपन करता है ॥ ५४–५६ ॥

अहिफेनासव ।

तुलां मधुकमद्यस्य शुभे भाण्डे निधापयेत् । फणिफेनस्य कुडवं मुस्तकं पलसम्मितम् ॥ ५७ ॥ जातीफलं चेन्द्रयवं तथैलां तत्र दापयेत् । मासमात्रं स्थितो भाण्डे यत्नतः परिरक्षयेत् । हन्त्यतीसारमत्युग्रं विषूचीमपि दारुणाम् ॥ ५८ ॥

महुएकी मद्य सौ पल, अफीम १६ तोले एवं नागरमोथा, जायफल, इन्द्रजौ और इलायची ये प्रत्येक ४-४ तोले लेवे। सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम मिट्टीके बरतनमें भरकर और उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्द करके एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । तत्पश्चात् उसको छानकर उचित मात्रासे सेवन करे तो यह अहिफेनासव अत्यन्त भयंकर अतीसार और विषूचिकाको शमन करता है ॥

ग्रहण्यां ये रसा वाच्यास्तेऽतीसारे नियोजिताः । हन्युः सर्वमतीसारं शिवस्याज्ञा विशेषतः ॥ ५९ ॥

ग्रहणीरोगमें जो रस कहे जायंगे उन सबको विशेषकर अतिसाररोगमें भी प्रयोग करना चाहिये उनसे सर्व प्रकारके अतिसार नष्ट होते हैं ॥ ५९ ॥

१७

२५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-

अतीसारमें वर्जनीय ।

स्नानाभ्यङ्गाऽवगाहांश्च गुरुस्निग्धातिभोजनम् ।
व्यायाममग्निसन्तापमतिसारी विवर्जयेत् ॥ १६० ॥

अतिसारवाले रोगीको स्नान, तैलमर्दन, जलमें घुसकर स्नान करना एवं गुरुपाकी और स्निग्ध पदार्थोंका भोजन, अधिक भोजन, व्यायाम और अग्निका ताप यह सब तत्काल त्यागदेने चाहिये ॥ १६० ॥


अतीसारमें पथ्य ।

वमनं लङ्घनं निद्रा पुराणाः शालिषष्टिकाः ।
विलेपी लाजमण्डश्च मसूरतूवरीरसः ॥ ६१ ॥
शशैणलावहरिणकपिञ्जलभवा रसाः ।
सर्वे क्षुद्रझषाः शृङ्गी खल्लिशो मधुरालिका ॥ ६२ ॥
तैलं छागघृतक्षीरे दधि तक्रं गवामपि
दधिजं वा पयोजं वा नवनीतं गवाजयोः ॥ ६३ ॥
नवं रम्भापुष्पफलं क्षौद्रं जम्बूफलानि च ।
भव्यं महार्द्रकं विश्वं शालूकं च विकङ्कतम् ॥ ६४ ॥
कपित्थं वकुलं बिल्वं तिन्दुकं दाडिमद्वयम् ।
तालकं कश्चटदलं चाङ्गेरी विजयाऽरुणा ।
अन्नपानानि सर्वाणि दीपनानि लघूनि च ॥ ६५ ॥

वमन, लंघन, पुराने शालिधानोंके चावल और साँठीके चावल, विलेपी, खीलोंका माँड, मसूर और अरहरका यूष एवं खरगोश, कालेहिरन, लवा, हिरन और कपिञ्जल इनके मांसका रस, सर्व प्रकारकी छोटी मछलियाँ, शृंगीमछली, खल्लिश मछली, क्षुद्रमछली, गाय बकरीका घी, दूध, दही, मठा, दहीका निकाला हुआ या दूधका निकाला हुआ नैनीघी या मक्खन, केलेके नवीन फल-फूल, शहद, जामुन, लिसोडा (किसीके मतमें कमरख), अदरख, सोंठ, भसीडा, कण्टाई, कैथ, मौलसिरीके फूल, बेलगिरी, तेंदु, खट्टे-मीठे दोनों प्रकारके अनार, ताडके अनार, ताडके फल, जल चौलाई, नोनियाका शाक, भाँग, रक्तवर्णकी चौलाईका शाक एवं सर्व प्रकारके हल्के और अग्निप्रदीपक अन्न पान अतिसार रोगमें हितकर हैं ॥ ६१-६५ ॥