भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
४३० भावप्रकाशनिघण्टुः हो वहीं पर प्रियंगु के लिये कंगु का उपयोग किया जा सकता है अन्यथा प्रियंगु से कर्पूरादिवर्गोक्त प्रियंगु ही लेना उचित है। कुछ लोगों ने कंगु से पार्थक्य करने के लिये इसको गंधप्रियंगु लिखा है लेकिन भावप्रकाशकार ने यहाँ पर प्रियंगु तथा गंधप्रियंगु दो द्रव्यों का उल्लेख किया है। यहाँ पर इन दोनों के गुण समान बतलाये हैं। धान्यवर्गोक्त कंगु, जिसका एक पर्याय प्रियङ्गु है, उसके तथा यहाँ पर उल्लिखित प्रियङ्गु के गुण समान नहीं हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। निम्नलिखित वर्णन केवल यहीं पर वर्णित प्रियंगु का है कंगु (धान्य) का नहीं। यहाँ पर उपर्युक्त श्लोकों में जिन दो द्रव्यों का उल्लेख किया गया है, उनके लिये गंधप्रियंगु नाम देना ठीक है। हो सकता है कि प्रियङ्गु के संदिग्ध द्रव्य रहने के कारण दो विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का उपयोग भावप्रकाशकार के समय होता रहा हो, जिनमें से एक में गंध हो तथा दूसरे में गंध न हो या बहुत कम हो अथवा एक ही प्रकार के दो क्षुप हों जिनमें से एक में गंध हो और दूसरा निर्गंध हो, जिसका आगे स्पष्टीकरण होगा। आजकल इसी उपर्युक्त 'प्रियंगु, गंधप्रियंगु' के लिये तीन प्रकार के द्रव्यों का उपयोग किया जा रहा है। बंबई की तरफ घऊँला नाम से प्रूनस् महालिब् (Prunus mahaleb) की फलमज्जा बिकती है, जिसका उपयोग प्रियंगु के रूप में वहाँ पर करते हैं। बंबई प्रान्त में श्वेतचंदन, घऊँला एवं कपूरकचरी को जल में पीस कर सुगंधित लेप के लिये प्रयोग किया जाता है। चरक ने रक्तपित्त में दाहशांति के लिये चन्दन और प्रियंगु के लेपन से उपलिप्त स्त्रियों के स्पर्श का विधान किया है। १ यह मज्जा छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूमवर्ण की, स्वाद में तिक्त एवं सुगन्धित होती है। दूसरा द्रव्य ॲग्लेइआ रॉक्सबर्धियाना (Aglaia roxburghiana) के फल हैं जो कुछ गोल, छोटे, निंब फल सदृश एवं सूखने पर सिकुड़नदार दिखलाई देते हैं। इनका व्यवहार बहुत दिनों से होता आ रहा है लेकिन इसमें गंध नाम मात्र की होती है। तीसरा द्रव्य कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला (Callicarpa macrophylla) नामक गुल्म (झाड़ी) की पुष्प कलिकायें हैं जो छोटी-छोटी कंगुनी धान्य सदृश होती हैं। इसका वर्णन अभिनव बूटी दर्पण में है लेकिन वहाँ पर इसका लेटिन नाम नहीं लिखा है। इसके लेटिन नाम के साथ इसका वर्णन श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'वनौषधिदर्शिका' एवं 'बिहार की वनस्पतियाँ' इन पुस्तकों में किया है। मूल श्लोक एवं अन्य निघंटुओं में दिये हुए फलिनी, कृष्णपुष्पी, गन्धफला, कृशांगी, महिलाह्वया, पर्णभेदनी आदि इसके रूपपरिचयात्मक पर्याय इससे कुछ मिलते होने के कारण इसको प्रियंगु मानते हैं। एक बात ध्यान देने की है कि इसकी झाड़ी या गुल्म होता है। यह लता नहीं है। पुष्प भी श्वेत वर्ण के होते हैं। श्रीमान् बाबू भीमचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित 'दि एकॉनॉमिक बोटॅनी ऑफ इण्डिया' से 'अभिनव बूटी दर्पण' में कुछ अंश उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि 'नेपाल, चटगाँव तथा पूर्व बंगाल के कुछ भागों में इसी का व्यवहार प्रियंगु के रूप में लोग करते हैं। नेपाल में दयालो तथा श्वेतदयालो नाम से उपयोग में लाई जाने वाली लताओं का वर्णन उपर्युक्त लता से ठीक मिलता है। श्वेतदयालो तथा दयालो एक ही समान हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि श्वेतदयालो गन्धयुक्त होती है एवं इसके पत्ते कुछ बड़े, अधिक श्वेत तथा स्पर्श में खुरदरे होते हैं। इससे मालूम होता है कि भावप्रकाशोक्त प्रियंगु तथा गन्धप्रियंगु यह दयालो तथा श्वेतदयालो हैं। जिला गढ़वाल और अल्मोडा में दहिया के नाम से यह प्रसिद्ध है तथा कुमाऊँ प्रान्त के वैद्य इसको प्रियंगु मानते हैं।' इन तीन द्रव्यों के अतिरिक्त मेंहदी के फूल, कुमुदनी, सरसों के फूल, मालकांगुनी एवं गोंदनी आदि को भी कुछ लोग प्रियंगु मानते हैं। चरक में संधानीय, शोणितास्थापन, पुरीष संग्रहणीय एवं मूत्रविरजनीय गणों में तथा सुश्रुत में अञ्जनादि, एलादि तथा प्रियंग्वादिगणों में प्रियंगु का उल्लेख है। चरक ने रक्त और पित्त की अतिवृद्धि को शान्त करने वालों में गन्धप्रियंगु को श्रेष्ठ माना है (च० सू० अ० २५) उपर्युक्त तीन द्रव्यों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा है। १. प्रियङ्गुकाचन्दनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणं च वराङ्गनानाम्। (च. चि. अ. ४)
कर्पूरादिवर्गः ४३१ प्रियंगु - १ (फूलप्रियंगु) हिं०-प्रियंगु । फूलप्रियंगु, गन्धप्रियंगु, बुंडुड, बूढीघासी, डइया, दहिया। बं०-मधुरा। नेपा०-दयालो, श्वेतदयालो । पं०-सुमाली । ले०-Callicarpa macrophylla Vahl (कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला वाह.)। Fam. Verbenaceae (ह्वर्बिनेसी) । यह जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों तथा खुले हुये जंगल और परती भूमि में होता है। यह नेपाल, देहरादून के जलप्राय स्थानों, बंगाल तथा बिहार के अनेक स्थानों में पाया जाता है। बलिया स्टेशन के अहाते में लगे हुए इसी प्रकार के एक क्षुप का उल्लेख चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय से प्रकाशित 'सचित्र अभिनव बूटीदर्पण' में किया हुआ है। इसका गुल्म-४ से ८ फीट ऊँचा और तूल रोमश होता है। शाखाएँ-अनियमित रूप से फैली रहती हैं। पत्ते- ५ से १० इंच लम्बे, अंडाकार या अंडाकार-भालाकार, लम्बाग्र, ऊपर चिकने, नीचे तूलरोमश एवं किनारा गोल दन्तुर होता है। पुष्प-गुलाबी, सघन द्विविभक्त १ से ३ इंच व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-सफेद एवं .१२-.१८ इंच व्यास के होते हैं। डालियाँ पुष्पगुच्छों के बोझ से झुक जाती हैं। इसकी छोटी-छोटी प्रियंगु धान्य सदृश पुष्प कलिकाएँ फूल प्रियंगु के नाम से मिलती हैं। इनमें मसलने पर गन्ध भी होती है। शास्त्रीय गन्धप्रियंगु यही मालूम होती है। ग्रामीण लोग गठिया में इसकी पत्तियों से सेंक करते हैं। प्रियंगु - २ (घऊँला) हिं०-प्रियंगु, महालिव । म०-गडुला, गावल। गु०-घऊँला । अ०-महलिव । Prunus Mahaleb Linn. (प्रूनस् महालिब् लिन.) । Fam. Rosaceae (रोज़ेसी) । यह बलोचिस्तान में पाया जाता है। इसका गुल्म अनेक फैली हुई तथा सीधी शाखाओं से युक्त होता है। पत्ते- कुछ लम्बाई लिये अंडाकार एवं दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के; फल-छोटे, अंडाकार एवं नोकीले होते हैं। घऊँला नाम से प्रियंगु की मज्जा बंबई के बाजार में बिकती है। यह छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूम वर्ण की, कड़वी और सुगंधित होती है। सुगंधि लेप में श्वेतचन्दन तथा कपूर कचरी के साथ इसका उपयोग बंबई प्रान्त में लोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में अल्प मात्रा में पद्मकाष्ठ में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहने के कारण इसका उपयोग सावधानी के साथ करना चाहिये। इसके अतिरिक्त इसमें काउमॅरिन् (Coumarin), सॅलीसिलिक् एसिड (Salicylic acid) एवं ॲमिग्डॅलिन् (Amygdalin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, वेदनाहर, दीपन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग पीड़ायुक्त कुपचन, आमाशय के क्षत तथा आमाशय के अर्बुद में करते हैं। मात्रा-२-५ रत्ती। प्रियंगु - ३ हिं०-प्रियंगु । कं०-तेतिलकामि । ले०-Aglaia roxburghiana Miq. (ॲग्लेइआ राक्स बर्घियाना मिक्,)। Fam. Meliaceae (मेलियॅसी) । यह पश्चिमी प्रायद्वीप में कोंकण और मिदनापूर से दक्षिण की ओर सिलोन तक ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका साधारण वृक्ष होता है। छाल किंचित् खाकी रंग की और चिकनी होती है। लकड़ी मजबूत तथा चमकीले लाल रंग की होती है। पत्ते-पक्षवत् पत्ते ३-१० इञ्च लम्बे और उनके पत्रक संख्या में ५, १ १/२ से ५ १/२ इञ्च लम्बे, पतले अंडाका-प्रासवत् और चिकने होते हैं। पुष्प-व्यास में १ इञ्च से कम, पीताभ और पत्ती के बराबर लम्बी मञ्जरियों में होते हैं जो पत्र कोण के ऊपर निकलती हैं। फल-कुछ-कुछ गोल, निम्बफल सदृश, १/४-३/४ इञ्च व्यास के, रोमश तथा हरिण के रंग के रहते हैं जो सूखने पर भूरे रंग के सिकुड़नदार तथा आकार में छोटे हो जाते हैं। इसमें १ या २ बीज रहते हैं जो चिपटे करीब १/२ इञ्च लम्बे (ताजी अवस्था में) तथा एक तरफ से उन्नतोदर रहते हैं। बीज का स्वाद खट्टा तथा कसैला रहता है। ताजी अवस्था में इसमें सुगन्ध रहती है जो सूखने पर नहीं रहती। इसके फलों का उपयोग बहुत दिनों से प्रियंगु के नाम से किया जा रहा है। हो सकता है कि भावप्रकाशकार ने प्रियंगु का जो फल लिखा है वह यही हो। गुण और प्रयोग-यह शीतल एवं ग्राही होता है। इसका उपयोग ज्वर, पित्त तथा शोथयुक्त रोगों में किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। अथ रेणुका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह रेणुकाराजपुत्री च नन्दिनी कपिला द्विजा। भस्मगन्धा पाण्डुपुत्री स्मृता कौन्ती हरेणुका ।।१०५।। रेणुका कटुका पाके तिक्ताऽनुष्णा कटुर्लघुः। पित्तला दीपनी मेध्या पाचनी गर्भपातिनी। बलासवातकृच्चैव१ तृट्कण्डूविषदाहनुत् ।।१०६।। रेणुका के नाम तथा गुण-रेणुका, राजपुत्री, नन्दिनी, कपिला, द्विजा, भस्मगन्धा, पाण्डुपुत्री, कौन्ती तथा हरेणुका ये सब पर्यायवाची शब्द रेणुका के हैं। रेणुका-पाक में कटुरसयुक्त, किंचित् उष्णवीर्य, तिक्त तथा कटुरसयुक्त और लघु होती है एवम् यह पित्तजनक, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पाचक, गर्भ गिराने वाली, कफ तथा वातकारक होती है। यह तृषा, खुजली, विष और दाह को दूर करती है। [१०५-१०६] ४२. रेणुका रेणुका एक संदिग्ध औषध है। रेणुक बीज नाम से होने वाली निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फल बिकते हैं। लेकिन संभवतः ये फल शास्त्रीय रेणुका नहीं हैं। शास्त्रीय रेणुका शायद पिप्पलीवर्ग की पाइपर ऑरेण्टिएकम् वाल् (Piper aurantiacum Wall.) के फल हैं। कुछ लोग निर्गुण्डी के बीज को ही रेणुका कहते हैं जो उसके प्रतिनिधि हो सकते हैं। चरक में शिरोविरेचन एवं वमनोपग गणों में रेणुक बीज का पाठ है। ग्रहणी के मध्वरिष्ट में एवं व्रणपीडन रूप में रेणुका का उल्लेख है। चरक, सुश्रुत तथा रा० नि० इसको गर्भपातक नहीं मानते। सुश्रुत में हरेणुका का उल्लेख एलादिगण, पिप्पल्यादिगण में तथा रेणुका का उल्लेख कटुवर्ग में एवं भगंदर, नाड़ी, उपदंश व्रण तथा विष में इसका प्रयोग किया गया है। यहाँ पर वर्णन विदेश से आने वाले निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फलों का किया गया है। हिं०-रेणुका, रेणुक, संभालू का बीज। गु०-हरेणु। म०-रेणुक बीज। इरा०-पंजनगुस्त। अ०-अथलक्। ले०-Vitex agnus- castus Linn. (वाइटेक्स एग्नस्-कास्टस् लिन.)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनॅसी)। १. बलासवातवैकल्य इति पाठ०। तृष्णादाहविषक्लैव्यकफवातविनाशिनी॥ (नि. र.) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
कर्पूरादिवर्गः ४३३ यह बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय प्रदेश आदि प्रदेशों में होता है। देहरादून के 'वैज्ञानिक बाग' में यह लगाया हुआ है। इसका गुल्म या वृक्ष होता है जिसकी शाखाएँ चौपहल होती हैं। **पत्ते—**लम्बे पत्रनाल से युक्त, करतलाकार संयुक्त, पत्रक पाँच कभी-कभी सात भी, भालाकार और लम्बे नोक वाले होते हैं। **फल—**साधारण मटर के बराबर, अंडाकृति तथा धूसर वर्ण के होते हैं। बाह्य दल एवं वृन्त इसमें लगा रहता है। ये फल बहुत कड़े रहते हैं तथा काटने पर इसके अन्दर चार खण्ड दिखलाई देते हैं जिनमें एक-एक छोटा चिपटा बीज रहता है। भारतीय निर्गुण्डी के फल से ये फल करीब आधे छोटे होते हैं। **रासायनिक संगठन—**इसमें कास्टाइन (Castine) नामक एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील दाहजनक पदार्थ, अम्लद्रव्य एवं तैल, ये पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**ईरानी रेणुक बीज स्तम्भन, शोथघ्न, आनुलोमिक, मूत्रजनन एवं उत्तेजक हैं। प्लीहावृद्धि तथा यकृत रोग के कारण उत्पन्न जलोदर में इसको देते हैं। हिचकी में छोटी पीपल के साथ इसको खिलाते हैं। **मात्रा—**४ र०-१ मा०। अथ ग्रन्थिपर्णम् (गठिवन)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिपर्णं ग्रन्थिकञ्च काकपुच्छञ्च गुच्छकम् । नीलपुष्पं सुगन्धञ्च कथितं तैलपर्णकम् ॥१०७॥ ग्रन्थिपर्णं तिक्ततीक्ष्णं कटूष्णं दीपनं लघु । कफवातविषश्वासकण्डूदौर्गन्ध्यनाशनम् ॥१०८॥ **गठिवन के नाम तथा गुण—**ग्रन्थिपर्ण, ग्रन्थिक, काकपुच्छ, गुच्छक, नीलपुष्प, सुगन्ध और तैलपर्णक ये सब संस्कृत नाम गठिवन के हैं। **गठिवन—**तिक्त तथा कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा लघु होता है। यह कफ, वात, विष, श्वास, खुजली और दुर्गन्ध इन सबों को दूर करनेवाला होता है। [१०७-१०८] ४३. गठिवन गठिवन का स्वरूप भी संदिग्ध ही है। आगे स्थौणेयक तथा चोरक नामक दो ग्रन्थिपर्ण के भेद दिये हुये हैं वे भी संदिग्ध ही हैं। कुछ विद्वान् इन तीनों नामों का एक दूसरे का पर्याय मानते हैं। तालीसपत्र के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में से एक द्रव्य का स्थानिक नाम थुनेर होने से कुछ विद्वान् उसे ही स्थौणेयक मानते हैं। इस तरह यदि ग्रन्थिपर्ण एवं चोरक को थुनेर सजातीय माना जाय तो ये सब द्रव्य तालीसपत्र (थुनेर) के वर्ग के हो जाते हैं। श्री शालिग्राम जी ने इसे आसाम की ओर बहुत उत्पन्न होने वाली तृण जाति की गाँठदार सुगन्धित वनस्पति माना है जिसमें पत्ते अंगुली के समान लम्बे-लम्बे और फूल नीले गुच्छों में आते हैं। कुछ लोग वनतुलसी को गठिवन मानते हैं। श्री डॉ० वा० ग० देसाई ने ग्रन्थितृण नाम से एक वनस्पति का वर्णन किया है। उसके गुण शास्त्रीय ग्रन्थिपर्ण से मिलते नहीं फिर भी सादृश्य होने से उसका संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया जाता है। **सं०—**ग्रन्थितृण। **हिं०—**केस्त्री, मचोटी। **पं०—**मचूटि, केस्तु। **काश्मी०—**द्रोब। **सिं०—**एंद्राणी। इरा०— इझार, बंदुक। **अं०—**Knot-grass (नॉट्-ग्रास)। ले०—Polygonum aviculare Linn. (पॉलिगोनम् एविक्युलेरे लिन.)। Fam. Poly-gonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह काश्मीर से कुमाऊँ तक ६ से १२ हजार फीट की ऊँचाई में होता है। इसका छोटा सा क्षुप होता है। जड़— लम्बी, कुछ काष्ठमय एवं चिमड़ी होती है तथा उससे अनेक उपमूल निकले रहते हैं। **शाखाएँ—**बहुत सी, जमीन पर फैली हुई एवं गोल होती हैं। इसकी टहनियों की ग्रंथियाँ बहुत गाँठदार होती हैं तथा वहीं से पत्र निकलते हैं। पत्र— ३१ भावं.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
४३४ भावप्रकाशनिघण्टुः एकान्तर, शल्याकृति, अखण्ड, धूसर रंग के एवं १ इञ्च से छोटे होते हैं। पुष्प-श्वेत या लाल रंग के होते हैं। फल- त्रिकोणयुक्त, हरे एवं अग्रपर सूक्ष्म झुर्रीदार, चमकीले एवं काले होते हैं। सिन्ध में बीजों को बीजबंद कहते हैं। बला के बीजों को भी अनेक स्थानों में बीजबंद कहा जाता है। चिकित्सा में इसके मूल, पंचाग एवं बीजों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोलिगोनिक् अम्ल तथा सुगन्धित तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, आनुलोमिक, ज्वरघ्न एवं कफघ्न है। बीज सं्रसन, मूत्रजनन एवं वामक होते हैं। (१) अश्मरी या मूत्रकृच्छ्र में इसके पंचाग के क्वाथ या मूल रस का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बहुत लाभ होता है। (२) जीर्ण अतिसार में मूल रस या पंचाग रस देते हैं। (३) विषमज्वर में मूल रस का उपयोग करते हैं। (४) फुप्फुस विकारों में विशेष कर श्वसनिका शोथ एवं कुकास में पंचाग क्वाथ पिलाते हैं। (५) सूखी हुई जड़ को पीसकर लगाने से वेदना कम होती है। विसर्प, बस्तिपीड़ा एवं आँव की पीड़ा में पत्तों का लेप किया जाता है। अथ स्थौणेयकम्। (ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः, ईषत्सुगन्धं 'थुनेर' इति लोके प्रसिद्धम्) तस्य नामानि गुणांश्चाह स्थौणेयकं बर्हिबर्हं शुकबर्हञ्च कुक्कुरम्। शीर्णरोमशुकञ्चापि शुकपुष्पं शुकच्छदम्।।१०९।। स्थौणेयकं कटु स्वादु तिक्तं स्निग्धं त्रिदोषनुत् ।।११०।। मेधाशुक्रकरं रुच्यं रक्षोघ्नं ज्वरजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठास्रतृड्दाहद्दौर्गन्ध्यतिलकालकान् ।।१११।। 'गठिवन' के ही भेद में थोड़ी सुगन्ध से युक्त जो 'थुनेर' नाम से लोक में प्रसिद्ध औषध है, उसके नाम तथा गुण-स्थौणेयक, बर्हिबर्ह, शुकबर्ह, कुक्कुर, शीर्णरोम, शुक, शुकपुष्प और शुकच्छद ये सब संस्कृत नाम 'थुनेर' के हैं। थुनेर-कटु, तिक्तरस युक्त, स्वादिष्ट, स्निग्ध, तीन दोषों को दूर करने वाला, मेधा तथा शुक्र को बढ़ाने वाला, रुचिकारक, रक्षोग्रहनाशक एवं ज्वर, कृमि, कुष्ठ, रक्तविकार, तृषा, दाह, दुर्गन्ध और तिलकालक नामक रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है। [१०९-१११] ४४. थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थिपर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि० अ० ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि० अ० २३), बलातैल में (चि० अ० २८) एवं मदनफल उत्कारिकामोदक योग में (क० अ० १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण) सू० अ० ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०-Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्युनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०-भांट, सं०-कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे
कर्पूरादिवर्गः ४३५ क्षुप—प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं । प्रत्येक भाग कटु एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं । बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है । आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है । इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है । **गुण और प्रयोग—**भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम, आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है । तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है । बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है । केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं । उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठे में पीस कर देते हैं । त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं । अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेउर' इति नेपालदेशे भवेत् तस्य नामानि गुणाँश्चाह **निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पत्रः क्षे
४३६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ तालीसपत्रम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तालीसमुक्तं पत्राढ्यं धात्रीपत्रञ्च तत्स्मृतम् ।। १९४ ।। तालीसं लघु तीक्ष्णोष्णं श्वासकासकफानिलान् । निहन्त्यरुचिगुल्मामवह्निमान्द्यक्षयामयान् ।। १९५ ।। तालीसपत्र के नाम तथा गुण-तालीस, पत्राढ्य और धात्रीपत्र से संस्कृत नाम 'तालीसपत्र' के हैं । तालीसपत्र- लघु, तीक्ष्ण और उष्णवीर्य होता है एवं यह-श्वास, खाँसी, कफ, वात, अरुचि, गुल्म, आम, अग्नि की मन्दता और क्षयरोग इन सबों को दूर करता है । [१९४-१९५] ४६. तालीसपत्र तालीसपत्र-यह नाम विभिन्न वर्गों के पत्तों को भिन्न स्थानों में दिया हुआ दिखलाई देता है। पहले लोग प्राचीनामलक-फ्लॅकोर्टिआ कॅटाफ्रॅक्टा राक्स (Flacourtia cataphracta Roxb.) के पत्तों को तालीसपत्र कहा करते थे। दक्षिण में कहीं-कहीं तमालपत्र-सिर्नमोमम् तमाल (Cinnamomum tamal) के पत्रों को तालीसपत्र कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य टेक्सस् बॅकेटा (Taxus bacata) के पत्तों का व्यवहार तालीस पत्र के नाम से करते हैं। इसे कुछ लोग स्थौणेयक भी मानते हैं। बंगाल के वैद्य एविस् वेबिआना (Abies webbiana) के पत्तों का व्यवहार तालीसपत्र के रूप में करते हैं। नेपाल एवं पञ्जाब के कुछ वैद्य तालीसफर, रोडोडेण्ड्रोन अन्थोपोगोन (Rhododendron anthopogon) के पत्तों का व्यवहार करते हैं जिसकी २, ३ अन्य उपजातियाँ भी होती हैं। प्राचीनामलक का वर्णन आगे फलवर्ग में आया है तथा तमाल पत्र का वर्णन पहले (पृष्ठ २२८) किया जा चुका है। यहाँ पर बाकी तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। चरक में दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है। सुश्रुत में शिरोविरेचकगण में इसका पाठ है। तालीसपत्र के शास्त्रीय गुण इस प्रकार दिये हुए हैं-यह तिक्त, कटु, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, शिरोविरेचन तथा कफ, वात, कास, श्वास, क्षय, वमन, अरुचि, गुल्म, आम, अग्निमांद्य और कृमि का नाश करने वाला है। तालीसपत्र- १ हिं०-तालीसपत्र, थूनो, बिमीं। गढ़०-थुनेर। काश्मी०-पोस्टिल। बंब०-तालीसपत्र, वर्मी। बं०-बिमीं। नेपा०-तेहीरे। खासि०-दिंगरुहेर्। अ०-जर्नब। अं०-Himalayan yew (हिमालयन् यू)। ले०-Taxus baccata Linn. (टॅक्सस् बॅकेटा लिन.)। Fam. Taxaceae (टॅक्सॅसी)। हिमालय के काश्मीर, पूर्वी पञ्जाब का पहाड़ी प्रदेश, गढ़वाल, अफगानिस्तान तथा अपर वर्मा आदि स्थानों में ६- १०. हजार फीट की ऊँचाई पर इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं-कहीं १०० फीट तक ऊँचे झोपड़ाकृतिक वृक्ष होते हैं। इसका स्तंभ छोटा किन्तु उसकी गोलाई १०, १२ फीट होती है। छाल-पतली, किंचित् लालीयुक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-दृढ़, बाहरी भाग सफेद तथा अंदर का भाग रक्ताभ श्वेत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले रहते हैं। ये १-१।। इञ्च लम्बे, दशांमांश इञ्च चौड़े, रेखाकार, कड़े, चिपटे, नोकीले, ऊपरी पृष्ठ पर गहरे रंग के और अधःपृष्ठ पर हलके पीले या मुरचई रंग के होते हैं। शिरा एक और पत्रनाल छोटा होता है। पत्तियों से विशेषतः सूखने पर एक प्रकार की गंध आती है। लालकोष में घिरा हुआ हरिताभ बीज होता है जो शीर्ष पर खुला रहता है। पहाड़ी लोग इसको छाल से एक प्रकार का चाय सदृश पानक बनाकर पीते हैं और इसके फलों को खाते हैं। यद्यपि युक्तप्रान्त, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य तालीसपत्र के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं तथापि थुनेर नाम से इसके स्थौणेयक होने की अधिक संभावना है। विमीं नाम से उत्तरी भारत में आर्तव प्रवर्तक एवं शामक औषध के रूप में तथा अपस्मार, अपतंत्रक तथा नाड़ीदौर्बल्य आदि में इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA
कर्पूरादिवर्गः ४३७ रासायनिक संगठन-इसके बीज तथा पत्र में एक विषैला द्रव्य है जो बीज के ऊपर के लालकोष में नहीं होता । इसमें टॅक्सीन (Taxine) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है । गुण और प्रयोग-तालीसपत्र अवसादक, उद्वेष्ठननिरोधि, आर्तवजनन, वातानुलोमक, कफनिःसारक एवं बल्य है । इसकी क्रिया कुछ डिजिटॅलिस् के समान होती है । अल्प मात्रा में प्रयोग करने पर नाड़ी एवं श्वास की गति कम होती है । मध्यम मात्रा में श्वास बढ़ता है तथा हृत्स्पन्द होता है । इससे गर्भाशय का संकोच होता है । गर्भपात कराने के लिए प्रयुक्त करने पर गर्भपात नहीं होता लेकिन मृत्यु हो सकती है । बड़ी मात्रा से विषैला परिणाम होने से चक्कर, वमन, आक्षेप, नशा, आँखों की पुतलियों का विस्फार, मंदश्वास एवं श्वसनकृच्छ्र होकर मृत्यु होती है । विषैले परिणाम से आमाशय, आँत तथा वृक्कों में शोथ भी हो जाता है । डिजिटॅलिस् के समान इसका संचायी प्रभाव नहीं होता । अपस्मार आदि आक्षेप युक्त व्याधियों में इसका प्रयोग किया जाता है । शुष्क कास, श्वासनलिका के जीर्णशोथ एवं तमक श्वास आदि में देने से खाँसी की तकलीफ कम हो जाती है । प्रसूता को इसका फांट दिया जाता है । बस्तिशोथ में भी इससे लाभ होता है । मात्रा-१-२ रत्ती । तालीसपत्र-२ हिं०, बं०-तालीसपत्र । गढ़०-चिलिराघ । काश्मी०-बादर, बुदुल । कनवार-स्पुन । नेपा०-गोञिअ सुलह । कुमा०-राघ । भूता०-दुमशिंग । अं०-Himalayan Siver Fer (हिमालयन् सिल्वर फर) । ले०- Abies webbiana Lindl. (एबिस् वेबिआना लिंड) । Fam. Pinaceae (पिर्नेसी) । इसके ऊँचे सदाहरित वृक्ष हिमालय पर सिक्किम, भूटान के प्रदेश में ९ से १३ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं । इसके वृक्ष-१५० फीट तक ऊँचे एवं स्तम्भ की गोलाई ३० फीट तक होती है । छाल-खाकी युक्त भूरे रंग की और खुरदरी होती है । नवीन शाखाएँ प्रायः सूक्ष्म और भूरे रोमों से ढकी हुई रहती है । शाखाएँ प्रायः झुकी हुई रहती हैं । पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे, दशांश इञ्च चौड़े, पतले, रेखाकार और काण्ड से पेचदार क्रम से निकले हुये परन्तु देखने में केवल दो कतारों में निकले हुए से मालूम होते हैं । इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला तथा गहरे रंग का होता है और अधःपृष्ठ पर मध्यशिरा के दोनों ओर दो-दो सफेद धुँधली रेखाएँ होती हैं । पते नताग्र होते हैं और अग्र पर प्रायः दो तीक्ष्ण और कठोर नोक निकले रहते हैं । फल-लंब गोल या आयताकार, २-४ इञ्च का और पकने पर गहरे बैंगनी रंग का होता है । बीज-करीब इञ्च का षष्ठांश लम्बा होता है । इस जाति में मोरिण्डा नामक, ले०-एबिस् पिण्ड्रो (Abies pindrow) वृक्ष भी होता है जो इससे बहुत मिलता जुलता है । इसमें नवीन शाखाएँ रोमरहित और पत्तियाँ २-३ इञ्च लम्बी, दो कतारों में निकली हुई और दो दिशाओं में फैली हुई रहती हैं । एबिस् वेबिआना में वे ऊपर की ओर हर दिशा में फैली हुई रहती हैं । इसके फल भी दूसरे की अपेक्षा छोटे और मोटे होते हैं । ये जौनसार में प्रायः १० हजार फीट के नीचे (दववन, मुंडाली आदि में) पाये जाते हैं । प्रायः पूर्वी भारत में एबिस् वेबिआना के ही पत्र तालीशपत्र के नाम से बेचे जाते है । बंगाल के वैद्य इसी का व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफनिःसारक, ग्राही एवं बल्य है । इसका उपयोग जीर्ण श्वास, कास, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, अरुचि एवं बस्तिविकार में किया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
४३८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) तालीसादि चूर्ण १०-२० रत्ती की मात्रा में श्वास, कास, रक्तपित्त, अग्निमांद्य एवं अतिसार आदि में दिया जाता है। बच्चों के श्वसनी फुफ्फुस पाक में १ १/२ रत्ती चूर्ण तथा कस्तूरी वटी १ रत्ती की ६ मात्रा बना कर हर ४ घण्टे पर देने से लाभ होता है। (२) इसके पत्तों का स्वरस ५-१० बूँद जल या दुग्ध के साथ बच्चों के दंतोद्भेद के समय होने वाले ज्वर एवं कफविकार आदि में दिया जाता है। बंगाल में प्रसूता को बल्य औषध की तरह इसे देते हैं। (३) स्वरभंग, जीर्णश्वसनिका शोथ, राजयक्ष्मा तथा अन्य कफविकारों में इसके क्वाथ या फांट का उपयोग करते हैं। (४) इसके पत्तों का चूर्ण मधु एवं वासा स्वरस के साथ कास, श्वास तथा रक्तष्ठीवन में दिया जाता है। मात्रा-१-२ माशा। तालीसपत्र- ३ इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनमें से २, ३ के पत्तों का प्रयोग तालीसपत्र के स्थान पर नेपाल तथा पञ्जाब के कुछ वैद्य करते हैं। इनका संक्षेप में वर्णन किया गया है। (क) हिं०-तालीसर, तालीसपर। काश्मी०-तजत्सुम। झेलम०-निचनी, रतनकाट, नेरा। पं०-तालिखी। ले०-Rhododendron anthopogon D. Don. (रोडोडेण्ड्रॉन् एन्थोपोगोन् डी. डोन)। Fam. Ericaceae (एरिकेसी)। यह हिमालय में १०-१४ हजार फीट की ऊँचाई पर कश्मीर से भूटान तक उत्पन्न होता है। इसके सदा हरित गंधयुक्त छोटे-छोटे क्षुप १ से १।। फीट ऊँचे होते हैं। शाखाओं पर वल्क पत्र और खुरदरापन होता है। पत्ते-सनाल, १-१।। इञ्च लम्बे, अंडाकार या चौड़े आयताकार, ऊपरी पृष्ठ पर चमकदार और अधःपृष्ठ पर भूरे रोमावरण से युक्त होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों का गुच्छा लगता है। फूल-किंचित् पीले आते हैं। फल- बहुत छोटे और अंडाकार होते हैं। बीज-बहुत सूक्ष्म तथा दीर्घवृत्ताकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक माना जाता है। पत्ते-उत्तेजक तथा सुगंधित होते हैं। इसके चूर्ण के नस्य से छींकें आती हैं। ऐसी धारणा है कि हिमालय के पूर्वभाग में अधिक ऊँचाई पर चढ़ते समय शिरःशूल तथा हल्लास उत्पन्न करने वाली वनस्पतियों में से एक यह हो। मात्रा-२-८ रत्ती। (ख) गढ़वाल-सिमारस। ने०, हि०-चैरैलु। काश्मी०-गग्गर। कुमाऊँ-चिमुल। ले०-Rhododendron campanulatum D. Don. (रोडोडेण्ड्रॉन् कम्पैनुलैटम् डी. डोन)। यह भी हिमालय में कश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका गुल्म-कुछ बड़ा; पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, दीर्घवृत्ताकार, आयताकार तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। नीचे के पृष्ठ पर दालचीनी रंग के सघन रोमों से शिराएँ ढकी रहती हैं। पुष्प-बैंगनी या नीलापन लिये श्वेत रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते बकरियों के लिये विषैले समझे जाते हैं। अर्धावभेदक तथा प्रतिश्याय में तम्बाकू के साथ इसके पत्तों का नस्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। जीर्ण आमवात, फिरंग तथा गृध्रसी में इसके पत्तों का आभ्यन्तरिक उपयोग किया जाता है। नेपाल में इसके पञ्चाङ्ग का प्रयोग जीर्ण ज्वर तथा राजयक्ष्मा में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
कर्पूरादिवर्गः ४३९ (ग) गढ़वाल-सिमरिस। भोटिया-त्सुलसुमा। यू०, हि०-तालीसफर। ले०-Rhododendron lepidotum Wall. (रोडोडेण्ड्रॉन् लेपिडोटम् वाल.)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा तथा गन्धयुक्त होता है। पत्ते-३/४ इञ्च से १॥ इञ्च लम्बे, प्रायः विनाल, ऊपर से लट्वाकार और कुण्ठिताग्र या भालाकार और कुछ नोकीले और अधःपृष्ठ श्वेत या मुरचई रंग के रोमावरण से ढका हुआ रहता है। फूल-लाल, बैंगनी या पीले, ३-४ के गुच्छों में या अकेले रहते हैं। फल-छोटे, ५ धारीयुक्त होते हैं तथा बीज छोटे-छोटे अंडाकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण (क) के समान ही हैं। अथ कङ्कोलं सुगन्धिद्रव्यम् 'सीतलचीनी' इति लोके। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कङ्कोलं१ कोलकं प्रोक्तं तथा कोषफलं स्मृतम्। कङ्कोलं लघु तीक्ष्णोष्णं तिक्तं हृद्यं रुचिप्रदम्। आस्यदौर्गन्ध्यहृद्रोगकफवातामयान्ध्यहृत् ।।१९६।। 'कङ्कोल नामक' सुगन्ध द्रव्य जो कि शीतल चीनी नाम से प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण-कङ्कोल, कोलक और कोषफल ये सब संस्कृत नाम 'शीतलचीनी' के हैं। शीतलचीनी-लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तिक्त रस युक्त, हृदय को हितकर तथा रुचिकारक होती है। यह मुख की दुर्गन्धता, हृद्रोग, कफ तथा वातरोग और आन्ध्य (आँखों से न दीखना) इन सबों को दूर करती है। [१९६] ४७. शीतलचीनी हिं०-शीतलचीनी, कबाबचीनी, कङ्कोल, शीतलमिर्च। बं०-कबाबचीनी, सुगन्धमरिच। म०-कङ्कोल, कापूरचीनी। गु०-चणकबाब। क०-गन्धमेणसु। ते०-चलवमिरियालु। ता०-वाल्मिलगु। फा०-कबाबह, कबाबचीनी। अ०- हब्बुलू ऊरूस, कबाबेसीनी। अं०-Cubebs (क्यूबेब्स); Tailed Pepper (टेल्ड पेपर)। ले०-Piper cubeba Linn. f. (पाइपर क्यूबेबा लिन.)। Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी)। शीतलचीनी-यह एक लता जाति की वनस्पति का पूर्ण रूप से विकसित किन्तु अपक्व अवस्था में सुखाया हुआ फल है, जो काली मरिच के समान होता है। यह जावा, सुमात्रा तथा बोर्निओं में होती है। लङ्का में इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में विशेष कर मैसूर में इसकी कुछ उपज की जाती है। इसकी आरोही बहुवर्षायु लता होती है। कांड-चिकना, लचीला एवं जोड़दार होता है। पत्ते-अखंड, सवृन्त, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार, नोकीले, गोल या हृद्त् पर्णतलवाले, चर्मवत् तथा चिकने होते हैं। शिराएँ बहुत होती हैं। पुष्प-अद्विलिंगी तथा अवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-गोल, अष्ठिफल होते हैं जिनमें आधार की तरफ डंठल लगा रहता है। हरी अवस्था में ही इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है। यह अपक्व फल काली मिर्च के समान, गोल, झुर्रीदार गहरे भूरे रंग के एवं करीब ४ मि० मि० व्यास के सूखे हुए होते हैं। इसके शिखर पर त्रिकोणयुक्त कुक्षि लगी रहती है तथा आधार पर ४ मि० मि० लम्बा डंठल रहता है। इसके अन्दर एक बीज रहता है। इसको चबाने से मनोरम तीक्ष्ण मसालेदार विशिष्ट गन्ध आती है; स्वाद कडुवा, चरपरा १. कक्कोलं इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४४० भावप्रकाशनिघण्टुः तथा जीभ ठंडी मालूम पड़ती है। औषध में इन्हीं फलों का व्यवहार किया जाता है। कुछ लोग इसके दो भेद मानते हैं। छोटे तथा पतले छिलके वाले फलों को शीतलचीनी एवं बड़े तथा मोटे छिलके वाले फलों को कबाबचीनी कहा जाता है। वास्तव में एक ही लता के यह फल होते हैं। प्राचीन काल से मुखशुद्धि के लिये पान के साथ या स्वतन्त्र रूप में तथा मसालों में इसका प्रयोग किया जाता रहा है। रासायनिक संगठन-कबाबचीनी में उड़नशील तैल ५-२०%, क्यूबैबिन् (Cubebin, C₂₀ H₂₀ O₆), राल, तैल, स्टार्च, गोंद, क्यूबैबिक् एसिड (Cubebic acid) करीब ०.९६% तथा कॅल्शियम ऑक्सॅलेट, फॉस्फेट एवं मॅलेट तथा मॅग्नेशियम् मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें के प्रधान गुणकारी तत्त्व उड़नशील तैल एवं क्यूबैबिक् एसिड हैं। पुराने कबाबचीनी द्वारा निकाले तैल में गंधहीन एवं पारदर्शक एक प्रकार का कर्पूर (Camphor of cubeb, C₁₅ H₂₆ O) पाया जाता है। इसमें का उड़नशील तैल स्वच्छ, हलके पीताभ या नीलाभ हरित रंग का, विशिष्ट गंधयुक्त एवं उष्ण कर्पूरवत् स्वादवाला होता है। इस तैल में प्रधान रूप में टर्पेन्स् (Terpenes) एवं सेस्क्वि टर्पेन्स् (Sesquiterpenes) पाये जाते हैं। भारतीय कबाबचीनी में भी उपर्युक्त तैल से मिलता-जुलता उड़नशील तैल पाया जाता है। तैल को शीत तथा प्रकाशहीन स्थान में बन्द बोतलों में रखना चाहिये। परीक्षा-किसी श्वेत पात्र में कबाबचीनी का चूर्ण रखकर उस पर १ बूंद गंधक का तेजाब रखकर ऊपर से देखने से नीलारुण (Purple) रंग दिखलाई देता है। अच्छी कबाबचीनी में सिकुड़े हुये अविकसित फल १०% से अधिक, कांड ५% से अधिक, इनको छोड़कर अन्य पदार्थ २% से अधिक, राख ८% से अधिक एवं अम्ल में न घुलने वाली राख २% से अधिक न होनी चाहिये। गुण और प्रयोग-कबाबचीनी उष्ण, उत्तेजक, कफघ्न, वातघ्न, प्रतिदूषक (Antiseptic), मूत्रजनक, दीपन, पाचन, रुचिकर, वृष्य, तृष्णा शामक तथा मुख की दुर्गन्ध एवं जड़तानाशक है। इसमें स्थानिक प्रक्षोभक गुणों के कारण यह श्लेष्मकला के लिये उत्तेजक है। प्रचूषण के पश्चात् इसके कार्यकारिसत्व का उत्सर्ग वृक्क एवं श्वसनसंस्थान द्वारा होता है। मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पाचनक्रिया विकृत कर देती है। त्वचा की उत्तेजना से कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न होती है। (१) प्रतिदूषक एवं मूत्रल औषध की तरह इसे पुराने सोजाक में देते हैं। ३०-६० रत्ती चूर्ण दुग्ध के साथ या २ १/२ रत्ती फिटकिरी के साथ दिन में ३ बार देते हैं। इससे बस्तिशोथ में भी लाभ होता है। (२) श्वसन संस्थान के विकारों में प्रतिदूषक एवं उत्तेजक कफनिःसारक रूप में खदिरादि गुटिका जैसी चूसने की गोली बनाकर उसे चूसने को दिया जाता है। गले की शिथिलता तथा मुखपाक आदि में भी इससे लाभ होता है। गायक गला साफ करने के लिये इसको चूसते हैं। खाँसी आदि में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाते हैं। इसका धूम्रपान श्वास में लाभदायक है। (३) नाक के श्लेष्मा को कम करने के लिये इसके नस्य का उपयोग किया जाता है। (४) इसके तैल को मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग, बस्तिशोथ, सोजाक तथा सोजाक की पुरानी अवस्था में शर्करा के साथ या गोंद के साथ इमल्शन बनाकर या कॅपसूल में रख कर प्रयोग करते हैं। जीर्ण श्वसनिका शोथ में इसको उष्ण जल में डालकर उसकी वाष्प सूँघी जाती है। मात्रा-चूर्ण १-४ माशा। तैल ५-२० बूँद।
कर्पूरादिवर्गः ४४१ अथ गन्धकोकिला गन्धमालती च। तयोर्गुणानाह स्निग्धोष्णा कफहत्तिक्ता सुगन्धा गन्धकोकिला। गन्धकोकिलया तुल्या विज्ञेया गन्धमालती।।१९७।। ४८. गन्धकोकिला एवं गन्धमालती ये दोनों ही संदिग्ध गन्ध द्रव्य हैं। बाजार में गन्धकोकिला नाम से एक प्रकार के फल बिकते हैं जो देखने में हवुषा के समान किन्तु कुछ चिपटे होते हैं। गन्धमालती नाम से एक प्रकार की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं जो रेशेदार किंचित् बादामी रंग के होते हैं। आगे पुष्पवर्ग में मालती (जाती, चमेली) एवं स्वर्णजाती का वर्णन आया है। मालती (रतेड) नामक एक अन्य लता होती है जिसे कुछ लोगों ने गंधमालती लिखा है। इसकी एक अन्य उपजाति भी पाई जाती है। निघंटुकारों ने जो जातिभेद लिखा है वह संभवतः यही रतेड हो या यह यहाँ पर वर्णित गन्धमालती हो। गन्धमालती (रतेड) का लैटिन नाम (Aganosma caryophyllata G. Don.) (अँगनोस्मा कॅरियोफाइलॅटा जी० डोन) एवं इसी के भेद A. calycina A. DC. का (अँ० कॅलिसिना ए० डी० सी०) है जिनका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। ले०-Aganosma caryophyllata G. Don. (अँगनोस्मा कॅरियोफाइलॅटा जी. डोन.)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। हि०, बं०-मालती। संथा०-रतेड़। यह बंगाल, मुंगेर, उत्तरी सरकार एवं दक्षिण में होता है। इसकी लता-विस्तार में फैलने वाली तथा आरोही होती हैं। पत्ते-लट्त्वाकार या अंडाकार ३-५.५ × १.५-४ इञ्च बड़े, पर्णशिराएँ रक्ताभ, आमने-सामने के पत्ते कभी-कभी छोटे-बड़े एवं फलक का आधार तिरछा होता है। पुष्प- बड़े, श्वेत, सुगंधित तथा समस्त काण्डज गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल नीचे पतला किन्तु ऊपर चौड़ा रहता है। फली-दो-दो, अग्र पर जुड़ी हुई एवं ४ से १४ इञ्च लम्बी तथा अग्र की ओर क्रमशः संकुचित रहती है। गुण और प्रयोग-यह वामक है। इसके पत्तों का पैत्तिक विकारों में प्रयोग करते हैं। पानी से अंगुलियों के बीच जब पक जाता है तब इसकी अग्र्य कलिकाओं का स्वरस लगाया जाता है। इसके पुष्पों का नेत्र विकारों में प्रयोग करते हैं। अथ लामज्जकम्। (उशीरवत् पीतच्छवितृणविशेषः)। तस्य नामगुणानाह लामज्जकं सुनालं स्यादमृणालं लवं१ लघु। इष्टकापथकं सेव्यं नलदञ्चावदातकम् ।।१९८।। लामज्जकं हिमं तिक्तं लघु दोषत्रयास्रजित्। त्वगामयस्वेदकृच्छ्रदाहपित्तास्ररोगनुत् ।।१९९।। 'लामज्जक' जो कि 'वीरण' घास की भाँति पीत वर्ण का एक विशेष तृण होता है उसके नाम तथा गुण-लामज्जक, सुनाल, अमृणाल, लव, लघु, इष्टकापथक, सेव्य, नलद और अवदातक ये सब संस्कृत नाम 'लामज्जक' के हैं। लामज्जक-तिक्तरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होता है एवं यह त्रिदोष, रक्तविकार, चर्मरोग, पसीना, मूत्रकृच्छ्र, दाह और रक्तपित्त इन सबों को दूर करता है। [१९८-१९९] ४९. लामज्जक लामज्जक भी संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे खस की तरह का पीतवर्ण का तृणविशेष मानते हैं। कुछ ग्रंथकारों का कहना है कि जब तक इसका निर्णय नहीं हो जाता तब तक लामज्जक के स्थान पर खस का व्यवहार करना १. लयमिति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४४२ भावप्रकाशनिघण्टुः चाहिये । कुछ नवीन ग्रन्थकारों ने लामज्जक का ले० नाम Cymbopogon jwarankusa (साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश) लिखा है। श्रीयुत् यादव जी अपनी द्रव्यगुणविज्ञान पुस्तक में लिखते हैं कि यह (साइम्बो-ज्वरांकुश) यूनानी औषध विक्रेताओं के यहाँ इजखिर नाम से बिकता है तथा इजखिर उष्णवीर्य द्रव्य होने से इसे लामज्जक नहीं मान सकते। वे इसे भूतृण मानते हैं। बाजार में एक पीतवर्ण का खस मिलता है। हो सकता है कि उसका लैटिन नाम ज्ञात न हो या वह खस का ही भेद हो लेकिन लामज्जक के स्थान पर उसका प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ निम्नलिखित वर्णन साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश का किया गया है- हिं०-लखवी, लामज्जक, करनकुश, घाटजारी। मिर्जापुर-इन्द्रबगई। बं०-कारांकुस। म०-पिवलावाला। पं०-बुर, इमरंकुश। गु०-पिलो वालो। ते०-पासनगड्डि। ता०-कामाट्चिपिल्लु। क०-करिलावचा। अ०- इजखिर। इरा०-गुंगियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एण्ड्रोपोगॉन् ज्वरान्कुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साइम्बोपोगॉन् ज्वरान्कुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लम्बे, ०.२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लम्बे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डण्डी निकली रहती है। जड़-लम्बी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगन्धित तथा पीले रंग की होती है। इसके पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तवजनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचाग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के क्वाथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचाग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा- १/४-१/२ तोला। अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह एलवालुकमैलेयं सुगन्धि हरिवलुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच्¹ मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥१२१॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भाँति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण-एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धित, हरिवलुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्थत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कटुरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, १. कपित्थफल इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः ४४३
व्रण, वमन, प्यास, खाँसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ, मूत्ररोग और कृमिरोग, इन सबों को दूर करती है। [१२०-१२१] ५०. एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेमानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अर्शोक्त अभयारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजकारिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, ॲलोज् (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रुन्स् सिरेसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डॉ० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् को एल्वालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आध्मान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक-१ हिं०-आलूवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरॅसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर (तीक्ष्णाग्रगोल दाँत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्माकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ रत्ती। एलवालुक-२ हिं०-बालुका साग। बं०-बालुक। म०-व(वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै। ते०-एसकदन्तिकुर। ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडॅसी)। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती है। इसके क्षुप-छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लम्बे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-बाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में वालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचाग का व्यवहार किया जाता है।
४४४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं । इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचाग, सुगंधित, आनुलोमक एवं कृमिघ्न है । कृमिरोग में इसके पंचाग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं । हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं । अथ कैवर्तीमुस्तकम् (केवटी मोथा) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुटन्नटं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्तीमुस्तकानि च ।। १२२ ।। मुस्तावत्पेलवपुरं¹ शुकाभं² स्याद्वितुन्नकं ।। १२३ ।। वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ।। १२४ ।। 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुटन्नट, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटीमोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण-यह मोथा की भाँति, कोमल दलकोश तथा शुक की भाँति वर्ण से युक्त होता है । केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है । [१२२- १२४] ❖ 'केवटीमोथा'-'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग मुस्ताकृतिः ।। १२२- १२४ ।। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भाँति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं । [१२२-१२४] ५१. केवटीमोथा कैवर्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है । मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है । केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं । इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है । इसलिये इन्हें कैवर्तमुस्तक माना जा सकता है । डॉ० देसाई ने ले०-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. ॲमॅरेन्थ्येसी) का संस्कृत नाम शितवार, वितुन्नक लिखा है । इसे हिं० में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है । शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है । शितिवार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं । सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है । शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है । इसका क्षुप समस्त भारत में होता है । यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते-एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली-दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं । पत्तों का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है । बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं । १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं । बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है । मात्रा-१/२-१ तोला । १. पुटमिति पाठा० । २. शुक्राभमिति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
कर्पूरादिवर्गः ४४५ अथ स्पृक्का (असबरग)। सुगन्धिद्रव्यम् (शाकविशेषः)। 'लङ्कोइकपुरी'ति लोके च। तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः। समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोषिकेत्यपि ।। १२५ ।। स्पृक्का स्वाद्वी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत्। कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री¹ ज्वररक्तहृत् ।। १२६ ।। स्पृक्का (असबरग) जो कि सुगन्धित द्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण—स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोषिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का—स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती हैं एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है। [१२५-१२६] ५२. स्पृक्का स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु० सू० ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले० नाम मार्सिलिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेल् (Trifolium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डॉ० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलवारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०—मखमली चोधारों। म०—कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजबान, चोधारा। क०—करितुंबे। ते०—मोगबीराकु। ता०—पेथिमसरी। अं०—Malabar catmint (मॅलॅबर् केट्मिण्ट्)। ले०—Anisomeles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलवारिका र० ब्र०)। Fam. Labiatae (लेविएटी)। इसका क्षुप—अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते—मोटे, लंबगोल, कुछ शल्याकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प—हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कड़वे रहते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराभ रहता है। गुण और प्रयोग—यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा—स्वरस १/४-१/२ चम्मच। तैल-२-५ बूँद। 'पर्पटी' इति प्रसिद्धं 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम्। अथ पर्पटी (पनडी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्छ्रकवर्तिनी ।। १२७ ।। पर्पटी तुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः। विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ।। १२८ ।। १. दाहास्र इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
४४६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तर देश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण-पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जतुका, जननी, जनी, जतुकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्रवर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तरक्त और कुष्ठ को दूर करने वाली है। [१२७-१२८] ५३. पर्पटी सुगन्धित पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डॉ० देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट। गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-माली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भाँग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा-१/२-१ चम्मच। अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणांश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटि। धमन्त्यञ्जनकेशी च निर्मध्या१ सुपिरा नली ।।१२९।। नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ।।१३०।। 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य देखने में मूँगे के समान होती है और जो कि कहीं- कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण-नलिका, विद्रुमलता, कपोत चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकेशी, निर्मध्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है। [१२९-१३०] ५४. नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। १. निर्मथ्या इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः ४४७ अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् (पुण्डेरी) इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्रलं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ।।१३१।। ‘पुण्डेरी’ इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण—प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम ‘पुण्डेरी’ के हैं । पुण्डेरी—मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है । [१३१] ५५. पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है । कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है । पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है । पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क० अ० २) में कन्दविष का उल्लेख है । ‘पुण्डरीकेण रक्तत्वमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे ।’ प्रपौण्डरीक का एक नाम ‘चक्षुष्य’ होने से ‘चाकसू’ नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है । डॉ० देसाई ने चाकसू को ‘वन्यकुलत्थ’ लिखा है । वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है । कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है । निम्न वर्णन चाकसू का है । सं०—चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका । हिं०—चाक्षुस्, चाकसू । पं०—चक्सू । गु०—चीमेड । कांठि०—चमेड । म०—चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०—करुकानम् । ते०—चनुपाल विट्टलु । कं०—क्रीड, निन्द्रताछ । अ०—जश्मीजज, इब्बुस्सूदान । फा०—चश्मीजज, चशूम । ले०—Cassia absus Linn. कैसिआ एब्सस् लिन०) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है । इसके एक वर्षायु क्षुप-८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं । पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है । पत्रक—संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लम्बे, करीब-करीब कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं । पुष्प सवृन्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी मे रहते हैं । फली—चिपटी, रोमश तथा १-१ १/२ इञ्च लम्बी होती है । बीज—संख्या में पाँच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लम्बाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं । बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कड़वी मज्जा निकलती है । रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २ १/२% राख होती है । उसमें मँगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है । पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का १/२ रत्ती चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं । बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है । चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे कर्पूरादिवर्गः समाप्त ।। ❖※❖ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ गुडूच्यादिवर्गः अथ गुडूची। तस्य उत्पत्तिं नामानि गुणांश्चाह अथ लङ्केश्वरो मानी रावणो राक्षसाधिपः। रामपत्नीं बलात्सीतां जहार मदनातुरः ।।१।। ततस्तं बलवान् रामो रिपुं जायाऽपहारिणम्। वृतो वानरसैन्येन जघान रणमूर्धनि ।।२।। हते तस्मिन्सुरारातौ रावणे बलगर्विते। देवराजः सहस्राक्षः परितुष्टश्च राघवे ।।३।। तत्र ये वानराः केचिद्राक्षसैर्निहता रणे। तानिन्द्रो जीवयामास संसिच्यामृतवृष्टिभिः ।।४।। ततो येषु प्रदेशेषु कपिगात्रात्परिच्युताः। पीयूषबिन्दवः पेतुस्तेभ्यो जाता गुडूचिका ।।५।। गुडूची मधुपर्णी स्यादमृताऽमृतवल्लरी। छिन्ना छिन्नरूहा छिन्नोद्भवा वत्साडनीति च ।।६।। जीवन्ती तन्त्रिका सोमा सोमवल्ली च कुण्डली। चक्रलक्षणिका धीरा विशल्या च रसायनी ।।७।। चन्द्रहासा वयस्था च मण्डली देवनिर्मिता। गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी ।।८।। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी। दोषत्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम् ।।९।। कामलाकुष्ठवातास्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत् । (प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत्) ।। १०।। अब यहाँ से गुडूच्यादिवर्ग आरम्भ होता है। उसमें प्रथम 'गिलोय' की उत्पत्ति, नाम तथा गुण कहते हैं। उत्पत्ति—जबकि अभिमानी, लङ्का के राजा, राक्षसों के स्वामी रावण ने कामातुर हो श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी श्रीसीताजी को बलपूर्वक हरण किया, तब बलवान् श्रीरामचन्द्रजी ने स्त्री के हरण करनेवाले उस शत्रु (रावण) को वानरों की सेनाओं से युक्त हो युद्ध में मारा। बल से गर्वीले, देवताओं के शत्रु उस रावण के मारे जाने पर हजार नेत्रों वाले देवताओं के राजा इन्द्र, श्रीरामचन्द्रजी पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उस युद्ध में जो कोई वानर राक्षसों के द्वारा मारे गये थे उन्हें अमृत की वर्षा से सींचकर जिला दिया। उसके बाद जिन स्थानों पर वानरों के शरीर से अमृत की बूँदें पृथ्वी पर गिरीं, उनसे 'गिलाय' की उत्पत्ति हुई। नाम—गुडूची, मधुपर्णी, अमृता, अमृतवल्लरी, छिन्ना, छिन्नरुहा, छिन्नोद्भवा, वत्साडनी, जीवन्ती, तन्त्रिका, सोमा, सोमवल्ली, कुण्डली, चक्रलक्षणिका, धीरा, विशल्या, रसायनी, चन्द्रहासा, वयस्था, मण्डली और देवनिर्मिता ये सब संस्कृत नाम 'गिलोय' के हैं। गुण—गिलोय कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं विपाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, संग्राही, उष्णवीर्य, लघु, बलकारक, अग्निदीपक तथा त्रिदोष, आम, तृषा, दाह, मेह, कास, पाण्डुरोग, कामला, कुष्ठ, वातरक्त, ज्वर, क्रिमि और वमि को दूर करती है। (यह प्रमेह, श्वास, काश, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग और वात इन सबों का नाश करने वाली होती है)। [१-१०] इसके पत्तों के गुण आगे शाकवर्ग में लिखे हुए हैं। १. गिलोय हिं०-गिलोय, गुरुच, गुडुच। बं०-गुलंच, पालो (सत्व)। म०-गुलवेल, गरुड़ वेल। गु०-गलो। क०- अमरदवल्ली, अमृत वल्ली। ते०-तिप्पतीगे। ता०-शिन्दिलकोडि, अमृडवल्ली। उ०-गुलंचा। पं०-गिलो।
गुडूच्यादिवर्गः ४४९ क०-गरुड़वेल। मला०-अम्रितु। गोआ०-अमृतवेल। फा०-गिलोई, गिलोय। अ०-गिलोइ। अं०-टिनोस्पोरा। ले०-Tinospora cordifolia (Willd.) Miers (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया मायर्स)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्यर्मेसी)। गिलोय-प्रायः सब प्रान्तों के जंगल-झाड़ियों में पाई जाती है विशेषकर गरम प्रान्तों में अधिक होती है। देहरादून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत पायी जाती है। इसकी बहुवर्षायु, चिकनी एवं मांसल लता-बहुत विस्तार में वृक्षों पर फैल जाती है। शाखाओं से डोरे के समान शीरियाँ निकल कर भूमि की ओर लटकती हैं। पत्ते-पान के समान, २-४ इञ्च के घेरे में गोलाकार नुकीले, चिकने, पतले, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १-३ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। प्रायः वसन्त ऋतु में इसके पुराने पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं और ज्येष्ठ तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। उसी समय हरापन युक्त पीले रंग के अथवा केवल पीले रंग के फूलों के गुच्छे आते हैं। फल-मटर के समान होते हैं और पकने पर ये लाल हो जाते हैं। बीज-कुछ टेढ़े तथा चिकने होते हैं। इसके मूल तथा कांड का व्यवहार औषध के लिये किया जाता है। ताजी अवस्था में कांड की छाल हरी तथा मांसल रहती है तथा उस पर पतली भूरे रंग की बाह्य त्वचा रहती है जिसकी पपड़ी निकलती रहती है। इस पर छोटे- छोटे गड्ढे होते हैं। इसको काटने से अन्दर का भाग चक्राकार दिखाई देता है। ताजी एवं हरी गुडुच ज्यादा लाभप्रद होती है। गरमी में मई महीने के आखिर में इसका संग्रह करना चाहिये। प्रयोग के पूर्व इसके ऊपर की छाल खुरचकर निकाल दी जाती है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु स्वाद कड़वा होता है। इससे कुछ भिन्न इसकी एक दूसरी जाति प्रायः बड़ी (४°-९° x ८°), मृदु रोमश और प्रायः त्रिखण्ड पत्तियों वाली होती है। इसके बीज के कठोर आवरण पर छोटे-छोटे दाने होते हैं। इसे सं०-पद्मगुडूची, बं०-पद्मगुलंच, माल०, पं०-बड़ी सरसटीलत एवं ले०-Tinospora malabarica (Lam.) Miers (टिनोस्पोरा मलवारिका मायर्स) कहते हैं। दोनों के गुण और स्वरूप में स्थूल रूप से कोई अन्तर न मिलने के कारण दोनों का ही व्यवहार गुडूची के नाम से किया जाता है। इसे कुछ विद्वानों ने सुदर्शन माना है। रासायनिक संगठन-इसकी ताजी कांड त्वक् में तीन रवेदार पदार्थ, गिलोइन ग्लूकोसाइड (Giloin, C₂₃ H₃₂ O₁₀, 5H₂ O), गिलोइनिन नामक कड़वा पदार्थ (Giloinin, C₁₇ H₁₈ O₅) तथा गिलोस्टेरॉल (Gilosterol, C₂₈ H₄₈ O) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें बर्बेरिन (Berberine) एवं मोम की तरह का एक पदार्थ पाया जाता है। गुडूचीसत्व-अच्छी मोटी गुडुच बरसात के पूर्व संग्रहकर ऊपर की छाल छुड़ाकर साफ धोकर छोटे टुकड़े बना पत्थर के खरल में महीन कूट डाले। इसमें चौगुना जल डाल १२-२४ घंटा भींगने के बाद अच्छी तरह मसलकर कपड़े से छान ले। सत्व नीचे बैठने के बाद ऊपर का जल धीरे से निथार कर सत्व को सुखाकर बन्द बोतलों में रखें। कुछ लोग निथरे हुए जल में फिर से उसी गुडुच को मसल एवं उबाल कर छान लेते हैं तथा उस द्रव को पहले निकाले हुए सत्व में मिलाकर धूप में सुखा लेते हैं जिससे इसमें उष्ण जल में घुलनशील पदार्थ भी आ जाते हैं। कुछ लोग निथारे हुए जल को औटाकर स्वतन्त्र प्रयोग भी करते हैं। गुण और प्रयोग-गुडुच कड़वी, उष्ण, त्रिदोषघ्न, रसायन, बल्य, ज्वरहर, दीपन, मूत्रजनन, त्वग्रोगहर, पित्तसारक तथा विषघ्न है। नवीन, अनुसंधानों से गुडूची का व्याधिप्रतिकारक गुण व्यापक रूप में प्रमाणित हुआ है। जीर्ण पूतिकेन्द्र (Chronic septic focus) जनित विकार, जीर्ण विषमज्वर तथा यकृत् की हीनकार्यता आदि में कुछ काल तक गुडूची का प्रयोग करते रहने से अवश्य लाभ होता है। ३२ भाव.I