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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

६७६ भावप्रकाशनिघण्टुः कठूमर के संस्कृत नाम-काकोदुम्बरिका, फल्गु, मलयु और जघनेफला ये सब हैं। कठूमर-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, मलस्तम्भ करनेवाला (मल को बाँधने वाला), शीतल एवम्-कफ, पित्त, व्रण, श्वेतकुष्ठ, पाण्डु, अर्श तथा कामला रोग को दूर करने वाला है। [१०] ६. कठूमर हिं०-कठूमर, कट (ठ) गुलरिया, कठगूलर। बं०-काठडुमुर। म०-भुई उम्बर, बोखाड़ा। गु०-टेडउँबरो। ते०-ब्रह्म मेडिचेट्टु। ता०-पेअट्टिस। ले०-Ficus hispida Linn. (फाइकस हिस्पिडा)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। कठूमर भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह नदी नालों के किनारे अधिकतर होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का शीघ्र बढ़ने वाला होता है। किन्तु कहीं-कहीं पथरीली भूमि का वृक्ष बड़ा झाड़ सा दिखाई पड़ता है। इसकी कोमल टहनियों पर सूक्ष्म रोवें होते हैं। पत्ते-विपरीत, लम्बे, किञ्चित् अंडाकार, जड़ की ओर गोलाकार, नोकदार और दन्तुर होते हैं। आकार में वे एक समान नहीं होते बल्कि, छोटे बड़े हुआ करते हैं। वे साधारणतः ४ इञ्च तक चौड़े तथा ९ इञ्च लम्बे होते हैं और पत्रदण्ड-१॥ इञ्च तक लम्बा होता है। नई शाखाओं के पत्ते १२ इञ्च तक लम्बे एवं सूक्ष्म रोवेंदार होते हैं। स्पर्श में वे रूखे और खुरदरे होते हैं। फल-हलके हरे या पीत हरिताभ गूलर के समान लगते हैं। इस कारण इसको "उदुम्बरफल" तथा "जंगली गूलर" कहते हैं। देखने में फलों का आकार अंजीर के समान होता है इस कारण इसे जंगली अंजीर भी कहते हैं। फलों के ऊपर सूक्ष्म रोवें होते हैं। इसकी छाल एवं फल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में टैनिन, सैपोनिन एवं एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके फल एवं छाल वामक तथा विरेचक हैं और छाल अल्प मात्रा में पौष्टिक है। (१) इसका उपयोग यकृद्वृद्धि में करते हैं। इससे कामला में भी लाभ होता है। (२) फलों को कूटकर तथा पकाकर शोथ, गाँठ आदि पर बाँधते हैं। (३) विषमज्वर में छाल का चूर्ण दूध के साथ देते हैं। (४) श्वित्र के लिए सुश्रुत (चि० अ० ९) में प्रयोग दिया है जिसमें गूलर तथा कठगूलर के मूल का सुखोष्ण क्वाथ पिलाकर रोगी को धूप में बैठाते हैं जिससे श्वित्र पर फोड़े आ जाते हैं। उनको फोड़कर उस पर चीते या हाथी का चमड़ा जला, तैल में मिलाकर लेप का विधान है। अथ प्लक्षः (पाखर। तस्य नामानि गुणाँश्चाह) प्लक्षो जटी पर्कारी च पर्कटी च स्त्रियामपि ॥ ११ ॥ प्लक्षः कषायः शिशिरो व्रणयोनिगदापहः। दाहपित्तकफास्र१घ्नः शोथहा रक्तपित्तहृत् ॥ १२ ॥ पाखर के संस्कृत नाम-प्लक्ष, जटी, पर्कारी, पर्कटी (यह स्त्रीलिङ्गी भी होता है) ये सब हैं। पाखर-कषाय रसयुक्त, शीतल एवम् व्रण, योनिसम्बन्धी रोग, दाह, पित्त, कफ, रक्तविकार, शोथ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला है। [११-१२] १. कफामघ्नः इति पाठ०।

वटादिवर्गः ६७७ ७. पाकर हिं०-पाकर, पाखर, पिलखन, पकरिया, पकरी। बं०-पाकी, पाकुर। म०-पाईट, पिंपरी वृक्ष। गु०-पीप, पीपर। क०-बसारी। ते०-जुब्बि। ता०-कुरुगु। ले०-Ficus infectoria Roxb. (फाइकस् इन्फेक्टोरिया)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। पाकर के वृक्ष-बड़, पीपर के समान जंगल और ग्रामों में बड़े-बड़े होते हैं। पत्ते-४-५ इञ्च लम्बे, आम के पत्तों के समान पर इनसे चौड़े होते हैं। इनकी शाखायें सघन और छाया उत्तम होती है। फल-पत्तों के डंडियों पर छोटे- छोटे पीपर वृक्ष के फल के समान लगते हैं। ये पकने पर सफेद या कुछ लाल एवं बिन्दुकित होते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीत, व्रणरोपक, रक्तपित्तघ्न एवं योनिरोग नाशक हैं। इसकी छाल का क्वाथ गण्डूष, व्रणप्रक्षालन एवं डूश के लिए काम में लाया जाता है। अथ शिरीषः (सिरस)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शिरीषो भण्डिलो भण्डी भण्डीरश्च कपीतनः। शुकपुष्पः शुकतरुर्मृदुपुष्पः शुकप्रियः ॥१३॥ शिरीषो मधुरोऽनुष्णास्तिक्तश्च तुवरो लघुः। दोषशोथविसर्पघ्नः कासव्रणविषापहः ॥१४॥ सिरस के संस्कृत नाम-शिरीष, भण्डिल, भण्डी, भण्डीर, कपीतन, शुकपुष्प, शुकतरु, मृदुपुष्प और शुकप्रिय ये सब हैं। सिरस-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, लघु एवम्-वातादिक दोष, शोथ, विसर्प, कास (खाँसी), व्रण तथा विष को दूर करने वाला है। [१३-१४] ८. सिरस हिं०-सिरस, सिरिस। बं०-शिरीषगाछ। म०-शिरस, चिचोला। गु०-सरसडो, काकीयो सरस। क०- वागेमर। ते०-दिरसन। ता०-वाकै। ले०-Albizzia lebbeck Benth. (आल्बीजिया लेबेक्)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है तथा लगाया भी जाता है। सिरस के वृक्ष-बड़े-बड़े और सघन होते हैं। पत्ते-इमली के पत्तों के समान, उपपक्ष (Pinnae) २ से ४ जोड़े; पत्रक-३/४-२ १/४ इञ्च लम्बे, ६ से ८ जोड़े, तिर्यक् कड़े एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। प्रधान पर्णवृन्त के आधार पर एक बड़ी ग्रन्थि होती है। पुष्प-सवृन्त, हरिताभ पीत, मुण्डक (Heads) में आते हैं। फली-६ से १२ इञ्च लम्बी, ३/४-१ १/२ इञ्च चौड़ी, पतली, हलके पीले रंग की होती है जिनमें ६-१० बीज होते हैं। इसके वृक्ष से एक प्रकार का बबूर के गोंद के समान गोंद निकलता है जो पानी में डालने से गल जाता है। नोट-शीरीष की एक अन्य जाति होती है जिसे ले०-आ० ऑडोरेटिस्सिमा (A. odoratissima), काला शिरीष कहते हैं। इसमें उपपक्ष २ से ५ जोड़े; पत्रक १/२- १ १/४ इञ्च लम्बे, ६ से २४ जोड़े वृन्तहीन होते हैं। इसमें प्रधान पर्णवृन्त तथा ऊपर के १-२ उपपक्ष के वृन्त के आधार पर ग्रन्थि होती है। पुष्प-धूसर, अवृन्त एवं सशाख मुण्डक में आते हैं। फली-६-१२ इञ्च लम्बी, १-१ १/४ इञ्च चौड़ी, पारभासक या चमकीली एवं ८-१२ बीजों से युक्त होती है।

६७८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका एक अन्यभेद श्वेत शिरीष पाया जाता है। यह आ० प्रोसेरा (A. procera) है। इसकी छाल श्वेत या हरित श्वेत, उपपक्ष ३-६ जोड़े एवं पत्रक ५-११ जोड़े, १ से २ १/४ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-मुण्डक काले शिरीष की तरह होते हैं। फली-४-८ इञ्च × १/२ - १ इञ्च, भूरी एवं ८-१२ बीज युक्त होती है। इसे मराठी में किन्हइ कहते हैं तथा इसे प्राचीनों का कटभी या किणिही मानना उचित है ऐसा श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है। शिरीष की छाल एवं बीज का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, सेफोनिन एवं टैनिन ७-११% होता है। गुण और प्रयोग—यह उष्ण, तिक्त, कषाय, त्रिदोषघ्न, विषघ्न, त्वक् दोषहर, कासहर, पौष्टिक, बाजीकर एवं ग्राही है। (१) शुक्रस्तंभन के लिये पुष्पों का प्रयोग करते हैं। वीर्य गाढ़ा करने के लिये इसके बीजों को दूध एवं शर्करा के साथ देते हैं। छाल का चूर्ण घृत के साथ शरीर को पुष्ट बनाने के लिये उपयोगी है। (२) छाल के क्वाथ में कुल्ला करने से दाँत मजबूत होते हैं। (३) गंडमाला में बीजों का लेप किया जाता है तथा खिलाते भी हैं। (४) रतौंधी में पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा स्वरस आँख में लगाते हैं। मात्रा—छाल का चूर्ण ३ से ६ माशा; बीजचूर्ण १ से २ माशा; पुष्प या पत्रस्वरस १ से २ तोला। अथ क्षीरिवृक्षपञ्चकं त्वक्पञ्चकञ्च । तयोर्लक्षणं तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । पञ्चैते क्षीरिणो वृक्षास्तेषां त्वक्पञ्चवल्कलम् ।।१५।। “क्षीरिवृक्ष-पञ्चक" से प्रसिद्ध वृक्षों के हिन्दी नाम—बरगद, गूलर, पीपल, पारीष और पाकर इन्हीं पाचों क्षीरिवृक्षों के समुदाय को क्षीरिवृक्ष-पञ्चक समझना चाहिये। एवम् इन्हीं पाँचों के वल्कल को “पञ्चवल्कल" समझना चाहिये। [१५] ❖ केचित्तु पारीषस्थाने शिरीषं, वेतसं परे, वा वदन्तीति विशेषः ।।१५।। यहाँ पर मूल में कोई विद्वान् पारीष के स्थान में शिरीष तथा और दूसरे विद्वान् वेतस का पाठ मानते हैं। यह विशेष समझना चाहिये। [१५] क्षीरिवृक्षा हिमा वर्ण्या योनिरोगव्रणापहाः । रूक्षाः कषाया मेदोघ्ना विसर्पामयनाशनाः ।।१६।। शोथपित्तकफास्रघ्नाः स्तन्या भग्नास्थियोजकः । त्वक्पञ्चकं हिमं ग्राहि व्रणशोथविसर्पजित् ।।१७।। तेषां पत्रं हिमं ग्राहि कफवातास्रनुल्लघु । विष्टम्भाध्मानजित्तिक्तं कषायं लघु लेखनम् ।।१८।। क्षीरिवृक्ष पञ्चक—कषाय रसयुक्त, शीतल, वर्ण को उत्तम करने वाले, रूक्ष, दुग्धवर्धक, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाले एवम् योनिरोग, व्रण, मेद, विसर्प, शोथ, पित्त, कफ तथा रक्तविकार के नाशक हैं। पञ्चवल्कल (उक्त क्षीरिवृक्षों की छाल)—शीतल, ग्राही एवम् व्रण, शोथ तथा विसर्पनाशक है। क्षीरिवृक्षपत्र—तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, लघु, किंचित् लेखन एवम् कफ, वात, रक्तविकार, विष्टम्भ और आध्मान को दूर करने वाले होते हैं। [१६-१८] अथ शालः (साखू) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शालस्तु सर्जकाश्यर्याश्वकर्णकाः शस्यशम्बरः । अश्वकर्णः कषायः स्याद् व्रणस्वेदकफक्रिमीन् ।। ब्रध्नविद्रधिबाधिर्ययोनिकर्णगदान् हरेत् ।।१९।।

वटादिवर्गः ६७९ साखू के संस्कृत नाम-शाल, सर्ज, कार्श्य, अश्वकर्णक और शात्यशम्बर ये सब हैं। साखू-कषायरसयुक्त एवम्-व्रण, स्वेद, कफ, क्रिमि, ब्रध्न, विद्रधि, बहरापन एवं योनि तथा कर्णसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला है। [१९] ९. शाल हिं०-शाल, साल, साखु, सखुआ। बं०-शालगाछ, तलूरा। म०-रालचा वृक्ष। गु०-शलवृक्ष, रालनुं झाड़। ते०-जलरि चेट्टु, इनुमद्धि। ता०-कुंगिलियम्। उरिया-सल्व। नेपा०-सकब। अं०-The Sal Tree (दि साल ट्री)। ले०-Shorea robusta Gaertn. f. (शोरिया रोबेस्टा)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी)। शाल के वृक्ष बहुत बड़े विशाल होते हैं। ये हिमालय पहाड़, सतलज नदी से आसाम तक, मध्य हिन्दुस्तान के पूर्वीभाग, बंगाल के पश्चिमी भाग और छोटा नागपुर के जंगलों में होते हैं। इसके पत्ते-६-१० × ४-६ इञ्च एवं बड़े अंडाकार-आयताकार होते हैं। फूल-पीले रंग के झुमकों में वसन्त ऋतु में लगते हैं और फल-छोटे होते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और बड़े काम की होती है। इसके गोंद को राल कहते हैं। फल वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में पक जाते हैं। शालसार ताजा काट कर निकालने पर लाल या सफेद दोनों तरह का होता है जिनमें से श्वेत शाल अच्छा माना जाता है। शाल के निर्यास को राल कहते हैं जिसका कर्पूरादि वर्ग में वर्णन किया जा चुका है। नोट-यद्यपि भा० प्र० में अश्वकर्ण, शाल का पर्याय एवं अजकर्ण, सर्जक का पर्याय दिया है तथापि ये चार भिन्न वृक्ष हो सकते हैं क्योंकि सुश्रुत सालसारादिगण में साल, अजकर्ण एवं अश्वकर्ण नामक ३ वृक्ष तथा चरक में कषाय स्कन्ध में साल, सर्ज, अश्वकर्ण एवं अजकर्ण नामक ४ वृक्षों का वर्णन मिलता है। इस दृष्टि से अश्वकर्ण यह डिप्टेरोकार्पस ऑलेटस् (Dipterocarpus alatus), हिं०-गर्जन एवं अजकर्ण यह टर्मिनेलिया टोमेण्टोसा (Terminalia tomentosa), हिं०-असन हो सकता है। अथ शालभेदः (सर्जकः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सर्जकोऽन्योऽजकर्णः स्याच्छालो मरिचपत्रकः ॥२०॥ अजकर्णः कटुस्तिक्तः कषायोष्णो व्यपोहति। कफपाण्डुश्रुतिगदान् मेहकुष्ठविषव्रणान् ॥२१॥ सर्ज (यह साखू का भेद है) के संस्कृत नाम-सर्जक, अजकर्ण, शाल और मरिचपत्रक ये सब हैं। सर्ज-कटु तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्ण एवम् कफ, पाण्डु, कर्णसम्बन्धी रोग, प्रमेह, कुष्ठ, विष तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [२०-२१] १०. सर्जक हिं०-बड़ा साल। बं०-कुन्द्रो। म०-सफेद डामर, चन्ड्रस। गु०-धूप। क०-दमर। ते०-तेल्लदामरमु। ता०-बेल्ल कुनुरिकम्। यूना०-संद्रस, सुंदरस। ले०-Vateria-indica Linn. (वेटेरिया इण्डिका)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी)। यह पश्चिम भारत और दक्षिण हिन्दुस्तान के जंगलों में बहुत होता है। इसका वृक्ष- बहुत हरा-भरा और सुहावना दिखाई पड़ता है। पत्ते-४ से १० इञ्च तक लम्बे तथा ३॥ इञ्च तक चौड़े, जड़ की ओर गोलाकार और अंडाकार होते हैं। फूल-आध से पौन इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-२-२॥ इञ्च लम्बे गोल होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६८० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ शल्लकी (सलई) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शल्लकी गजभक्ष्या च सुवहा सुरभी रसा । महेरुणा कुन्दुरुकी वल्लकी च बहुस्रवा ।।२२।। शल्लकी तुवरा शीता पित्तश्लेष्मातिसारजित् । रक्तपित्तव्रणहरी पुष्टिकृत्समुदीरिता ।।२३।। सलई के संस्कृत नाम- शल्लकी, गजभक्ष्या, सुवहा, सुरभि, रसा, महेरुणा, कुन्दुरुकी, वल्लकी और बहुस्रवा ये सब हैं । सलई- कषाय रसयुक्त, शीतल, पुष्टिकारक, एवम्-पित्त, कफ, अतिसार, रक्तपित्त तथा व्रण को दूर करने वाली कही हुई है । [२२-२३] ११. सालई हिं०- सालई, सलई । बं०- सलै । म०- सालई वृक्ष । गु०- शालेडुं, धूपडो, सालेडा । कुमाऊँ- अदुंकु । गोंड- सल्ल । संताल- साल्गा । क०- मादिमर । ता०- कुंदुरुकम् । मा०- सेलो । ते०- परंगिसाम्राणि । ले०- Boswellia serrata Roxb. (बॉस्वे़लिया सेरेटा) । Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी) । यह पश्चिम हिमालय के नीचे के जंगलों में, मध्य भारत, बिहार से राजपूताना तक, दक्षिण और कोंकण आदि प्रान्तों में होता है । आसाम तथा बंगाल में नहीं होता । सालई का वृक्ष- ३० फीट तक ऊँचा होता है । शाखाएँ- नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं । छाल- रक्ताभपीत या हरित श्वेत, चिकनी और कागज के समान छूटने वाली होती है । संयुक्त पत्तियाँ शाखाओं के अग्र पर दलबद्ध रहती हैं। पत्रक- आमने-सामने वा कुछ अन्तर देकर, ८ से १५ जोड़े होते हैं जो लम्बे, नीम के पत्तों के समान भालाकार या रेखाकार तथा दन्तमय धारवाले होते हैं । पुष्प- छोटे एवं श्वेत रंग के होते हैं । पुष्प के बाह्य कोश एवं आभ्यंतरकोश के दल ५-५; पुंकेशर ५ बड़े और ५ छोटे होते हैं । फल- मांसल और तीन धार वाला होता है जो पकने पर तीन भागों में फटता है । रासायनिक संगठन- इसकी छाल में चीरा लगाने से एक तरह का गोंद निकलता है जिसे 'सलईगूगल' कहते हैं । प्राचीनों ने इसी को कुन्दुरु लिखा है लेकिन आजकल बाजार में बिकने वाला कुन्दुरु इसी जाति के विदेशी वृक्ष, बॉ० फ्लोरिबंडा का गोंद है जो अरब एवं अफ्रीका से आता है । 'कुन्दुरु एवं सलई गूगल' का वर्णन पहले कर्पूरादि वर्ग में (पृष्ठ २१२) किया जा चुका है । गुण और प्रयोग- सलई की छाल शीतल, पुष्टिकर, ग्राही तथा त्वच्य होती है । इसका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, रक्तपित्त, अर्श, कुष्ठ एवं व्रण में किया जाता है । (१) अतिसार में इसकी छाल, शर्करा तथा मधु का उपयोग किया जाता है । रक्तातिसार में इसे दूध में घिसकर शहद मिलाकर पिलाते हैं । (२) श्वास में इसके चूर्ण को घृत एवं मधु के साथ चटाया जाता है । (३) अन्य द्रव्यों के साथ इसके क्वाथ से व्रण-प्रक्षालन किया जाता है । (४) सलई के फल तथा फूल का उपयोग कफविकार, वातविकार, अर्श, कुष्ठ तथा अरुचि में किया जाता है । मात्रा- त्वक्चूर्ण ३-६ माशा । अथ शिंशपा (शीसम) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शिंशपा पिच्छिला श्यामा कृष्णसारा च सा गुरु । कपिला सैव मुनिभिर्भस्मगर्भैतिकीर्तिता ।।२४।।

वटादिवर्गः ६८१ शिंशपा कटुका तिक्ता कषाया शोषहारिणी । उष्णवीर्या हरेन्मेदःकुष्ठश्वित्रवमिक्रिमीन् ।। वस्तिरुक्प्रणदाहास्त्रबलासान् गर्भपातिनी ।।२५।। शीसम के संस्कृत नाम—शिंशपा, पिच्छिला, श्यामा और कृष्णसारा ये सब हैं। यदि वही शीसम भारी एवं कपिल (भूरा) रंग का हो तो उसका संस्कृत नाम— 'भस्मगर्भा' है। शीसम—कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, गर्भ गिराने वाला एवम्-शोष, मेद, कुष्ठ, श्वेतकुष्ठ, वमन, क्रिमि, वस्तिसम्बन्धी रोग, व्रण, दाह, रक्तविकार और कफ का नाशक है। [२४-२५] १२. शीसम हिं०—सीसम; कपिलवर्ण—शीसम, शीशो, शीसव। बं०—शिसु। म०—शिसव। गु०—सीस। क०—अगरू गिड़। ते०—सिंसुप। ता०—गेट्टे। ले०—Dalbergia sissoo Roxb. (डालबर्जिया सिस्सू)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। सीसो के वृक्ष—प्रायः सब प्रान्तों में लगाये जाते हैं तथा पश्चिम हिमालय में ४००० फीट तक, नेपाल की तराई, सिक्किम तथा ऊपरी आसाम के जंगलों में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष बड़ा और विशाल हुआ करता है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है। इसके लकड़ी से बहुत सुन्दर सन्दूक, पलङ्ग, प्रभृति अनेक वस्तुएँ तैयार होती हैं। इसके पत्ते—गोल, नोकदार, बेर के पत्तों के समान पर इनसे कुछ बड़े तथा पाढ़ी के पत्तों के समान होते हैं। ये चिकने और ऊपर से चमकीले होते हैं। फूल—बहुत छोटे-छोटे गुच्छों में और फली—लम्बी, पतली और चिपटी होती है। बीज—छोटे-छोटे और चिपटे होते हैं। इसकी लकड़ी श्यामता और ललाई लिये भूरे रंग की दृढ़ होती है। इसकी एक अन्य जाति डा० लेटिफोलिया (D. latifolia Roxb.) होती है जिसकी लकड़ी भी फर्नीचर बनाने के काम में आती है जिसे अंग्रेजी में इंडियन रोजवुड (Indian Rosewood) कहते हैं। रासायनिक संगठन—लकड़ी के सार में ५.३५% गाढ़ा तेल होता है। फली में टैनिन २% होता है। गुण और प्रयोग—इसकी लकड़ी चर्मरोग एवं वमन में लाभदायक है। इसके पत्तों का क्वाथ सोजाक में देते हैं। इसका तेल व्रणशोधन है एवं कुष्ठ, कृमि, वातविकार एवं कफनाशक है। मात्रा—सार-लकड़ी ५ से ७ माशा। अथ ककुभः (अर्जुन)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ककुभोऽर्जुननामाख्यो नदीसर्जश्च कीर्त्तितः । इन्द्रद्रुर्वीरवृक्षश्च वीरश्च धवलः स्मृतः ।।२६।। ककुभः शीतलो हृद्यः क्षतक्षयविषास्त्रजित् । मेदोमेहव्रणान् हन्ति तुवरः कफपित्तहृत् ।।२७।। अर्जुन के संस्कृत नाम—ककुभ, अर्जुन के संज्ञावाचक सभी शब्द (जैसे अर्जुन, गाण्डीवी, पार्थ, धनञ्जय, कर्णारि आदि), नदीसर्ज, इन्द्रद्रु, वीरवृक्ष, वीर और धवल ये सब हैं। अर्जुन—कषाय रसयुक्त, शीतल, हृद्य (हृदय को हितकर) एवम्-क्षत, क्षय, विष, रक्तविकार, मेद, प्रमेह, व्रण (प्रमेह सम्बन्धी व्रण), कफ तथा पित्त का नाशक होता है। [२६-२७] १३. अर्जुन हिं०—अर्जुन, कहू, कोइ। बं०—अर्जुन गाछ। म०—अर्जुन, अर्जुन सादड़ा। गु०—अर्जुन। पं०—जुमरा। ते०—तेल्लमद्दि। क०—मन्त्रि। ता०—मरुदमरम्। ले०—Terminalia arjuna W. & A. (टर्मिनेलिया अर्जुन)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रेतेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

६८२ भावप्रकाशनिघण्टुः यह सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है किन्तु हिमालय की तराई, छोटा नागपुर, मध्यभारत, बंबई एवं मद्रास में अधिक होता है। इसका वृक्ष-६०-७० फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अमरूद के पत्ते के समान ३ से ६ इञ्च तक लम्बे, छोटी- छोटी टहनियों पर कहीं विपरीत और कहीं एकान्तर लगे रहते हैं। हलके पीले रंग के नन्हें-नन्हें फूलों के घनहरे से आते हैं। फल-कमरख के समान ५ पहल वाले, १-१॥ इञ्च लम्बे एवं कुछ अंडाकार होते हैं। [१३] इसकी छाल का प्रयोग किया जाता है। यह मोटी, चिकनी, गुलाबीपन लिये धूसर या श्वेताभ होती है तथा पतले परतों में छूटती है। बाजार में इसके टुकड़े चपटे या कुछ मुड़े हुवे, ६ इञ्च या अधिक लम्बे, ४ इञ्च चौड़े एवं ०.१- ०.४ इञ्च मोटे मिलते हैं। अन्दर से यह हलकी धूसर एवं सूक्ष्म धारीदार होती है। भग्न छोटा तथा गुलाबीपन लिये हुए; स्वाद कषाय रहता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में जल-विलेय चूने (Calcium) के लवण बहुत (२५%) होते हैं। इसके अतिरिक्त टैनिन १५.८%, रवेदार पदार्थ अर्जुनाइन, शर्करा, अल्प मात्रा में मैग्नेशियम् के लवण, रंजक द्रव्य एवं सेन्द्रीय अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-अर्जुन शीतवीर्य, कफ-पित्तशामक, हृद्य, हृदयोत्तेजक, रक्तसांग्राहिक, शोणितास्थापन, शोथघ्न, संधानीय एवं व्रणरोपण। इसका उपयोग हृदय के विकार, क्षतक्षय, कास, विष, रक्तविकार, रक्तपित्त, प्रमेह, ज्वर एवं व्रण में किया जाता है। (१) हृदय के सभी प्रकार के रोगों में इसकी छाल को दूध में क्षीरपाक विधि से पकाकर देना चाहिये। (२) रक्तपित्त में इसको देने से रक्तवाहिनियों का संकोच होकर तथा इसमें के चूने के कारण रक्त का जमने का कार्य बढ़ने से लाभ होता है। (३) व्रण, अस्थि भग्न, शोथ आदि में इसका बाह्य एवं आभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। नोट-अर्जुन के कर्मों के विषय में प्राचीन एवं नवीन आचार्यों में पर्याप्त मतभिन्नता है। आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि इसका प्रभाव केवल इसमें के चूना एवं सेन्द्रीय अम्लों के कारण है। इस सम्बन्ध में विस्तृत अनुसंधान आवश्यक है। संभव है अर्जुन यह टर्मिनेलिया से अतिरिक्त अन्य कोई वृक्ष हो। इस दृष्टि से आगे तिनिश के साथ वर्णित जारूल वृक्ष के विषय में विचार आवश्यक है जिसे कहीं-कहीं अर्जुन कहा गया है। मात्रा-त्वक् १/२ से १ तोला क्षीरपाक बनाकर; चूर्ण १ से ३ माशा। अथ बीजकः (विजयसार) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बीजकः पीतसारश्च पीतशालक इत्यपि। बन्धूकपुष्पः प्रियकः सर्जकश्चासनः स्मृतः ।।२८।। बीजकः कुष्ठवीसर्पश्वित्रमेहगुद १क्रिमीन् । हन्ति श्लेष्मास्रपित्तञ्च त्वच्यः केश्यो रसायनः ।।२९।। विजयसार के संस्कृत नाम-बीजक, पीतसार, पीतशालक, बन्धूकपुष्प, प्रियक, सर्जक और असन ये सब हैं। विजयसार-त्वचा के लिये हितकर, बालों को उत्तम बनाने वाला, रसायन एवम्-कुष्ठ, वीसर्प, श्वेतकुष्ठ, प्रमेह, गुदा के कृमि, कफ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त को दूर करने वाला है। [२८-२९] १. व्रणक्रिमीन् इति पाठा०।

वटादिवर्गः ६८३ नोट-निघंटुओं ने बीजक एवं असन को एक वृक्ष माना है किन्तु ये दोनों भिन्न हैं। असन यह शाल या सर्जभेद है जिसका ले० नाम टर्मिनेलिया टोमेण्टोजा (Terminalia tomentosa) है। बंबई की तरफ 'असाना' नाम से ब्रिडेलिया मॉण्टेना (Bridelia montana Willd.) को ग्रहण किया जाता है। १४. विजैसार हिं०-विजयसार, विजेसार, विजैसार । बं०-पियाशाल, पीतशाल । म०-बिबला । गु०-वीयों । ते०-वेगि । क०-होन्नेमर । मा०-बिजैसार । अ०-दम्म उल अखवैन हिन्दी । अं०-Indian Kino tree (इण्डियन् काइनो ट्री) । ले०-Pterocarpus marsupium Roxb. (टेरोकार्पम् मार्सुपियम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह दक्षिण भारत, बिहार और पश्चिमी प्रायद्वीप में होता है। इसका वृक्ष-सुन्दर बहुत बड़ा किन्तु अचिरस्थायी होता है। छाल-तिहाई इञ्च मोटी, पीताभ धूसर रंग की खुरदरी होती है। पत्ते-पक्षवत् एवं ५-७ पत्रक युक्त जो आयताकार या अंडाकार, ३-५ इञ्च लम्बे, कुण्ठित या नताग्र, ऊपरी तल पर चमकीले एवं प्रधान शिराएँ अनेक एवं स्पष्ट होती हैं। फूल-चौथाई इञ्च के घेरे में किंचित् पीले या सफेद मंजरियों में आते हैं। फलियाँ-१-२ इञ्च व्यास, में, गोल एवं चिपटी होती हैं जिसमें छोटे बीज होते हैं। छाल में घाव करने से लाल रस निकलता है जो कुछ दिनों में सूखकर काला और कड़ा हो जाता है। इसको उबाल कर सुखाकर काम में लाते हैं। इसको मलाबार काइनो (Malabar kino) कहते हैं। यह गाढ़े लाल रंग के, चमकीले, पहलदार टुकड़ों में होता है। इसे किनारे से देखने से मानिक की तरह लाल पारदर्शक दिखलाई देता है। इसको तोड़ने से भूरे रंग का चूरा निकलता है तथा सतह चमकीली होती है। इसे चबाने से यह दाँत में चिपकता है तथा लार, लाल हो जाती है। इसमें गंध नहीं होती तथा स्वाद कषाय रहता है। रखने से इसका कषायत्व कम हो जाता है। इसके गोंद एवं काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-गोंद में काइनो टैनिक एसिड (Kino tannic acid) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, कफपित्तशामक, रसायन एवं प्रमेहनाशक है। इसका उपयोग प्रमेह, कुष्ठ, चर्मरोग, रक्तपित्त एवं रक्तविकार में किया जाता है। इसका गोंद तीव्र संग्राहक है एवं छाल ग्राही है। (१) अतिसार, प्रवाहिका में गोंद खिलाते हैं। दाँत के दर्द में दाँत में इसे रखते हैं। (२) प्रमेह में इसके काण्डसार का क्वाथ पिलाते हैं। (३) पत्तों का लेप शोथ एवं त्वचा के रोगों पर किया जाता है। मात्रा-गोंद २ से ८ रत्ती; चूर्ण ३ से ६ माशा; क्वाथ ५ से १० तोला। अथ खदिरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह खदिरो रक्तसारश्च गायत्री दन्तधावनः । कण्टकी बालपत्रश्च बहुशल्यश्च यज्ञियः ।।३०।। खदिरः शीतलो दन्त्यः कण्डूकासारुचिप्रणुत् ।।३१।। तिक्तः कषायो मेदोघ्नः कृमिमेहज्वरव्रणान् । श्वित्रशोथामपित्तास्रपाण्डुकुष्ठकफान् हरेत् ।।३२।। खैर के संस्कृत नाम-खदिर, रक्तसार, गायत्री, दन्तधावन, कण्टकी, बालपत्र, बहुशल्य और यज्ञिय ये सब हैं। खैर-तिक्त तथा कषायरसयुक्त, शीतल, दाँतों के लिए हितकर एवम् खुजली, खाँसी, अरुचि, मेद, कृमि, प्रमेह, ज्वर, व्रण, श्वेतकुष्ठ, शोथ, आम, पित्त, रक्तविकार, पाण्डु, कुष्ठ तथा कफ को दूर करने वाला है। [३०-३२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६८४ भावप्रकाशनिघण्टुः १५. खैर हिं०-खैर, कत्था। बं०-खयेर गाछ। म०-खैर, काय। गु०-खेर, काथो। ते०-चंद्र। ता०-करंगालि। अं०-Black Catechu (ब्लैक कॅटेच्यू)। ले०-Acacia catechu Willd (अॅकेसिया कटेच्यू)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह भारत में अनेक स्थानों पर होता है। पंजाब, उत्तर पश्चिम हिमालय, मध्यभारत, बिहार, गंजम, कोंकण एवं दक्षिण में विशेष रूप से शुष्क जंगलों में होता है। इसका वृक्ष-मध्यम प्रमाण का, काँटेदार होता है। छाल-गहरे धूसराभ भूरे रंग की, १/२ इञ्च मोटी एवं लम्बे परतों में छूटने वाली तथा अन्दर से भूरी या लाल होती है। शाखाएँ-पतली होती हैं। काँटे युग्म, टेढ़े, चमकीले भूरे या काले एवं ये उपपत्रों के रूपान्तर होते हैं। पत्र-१०-१५ से० मी० लम्बे एवं वृन्त पर काँटे तथा ४-५ ग्रन्थियाँ होती हैं। उपपक्ष २०-६०, ३.८-५ से० मी० लम्बे होते हैं। पत्रक प्रत्येक उपपक्ष पर ६०-१०० की संख्या में, ४.५- ६ x १.२५ मि० मी० बड़े, रेखाकार तथा अवृन्त होते हैं। पुष्प-छोटे, श्वेताभ या हलके पीले, ५-१० से० मी० लम्बी मंजरियों में आते हैं। आभ्यन्तर कोश बाह्य कोश से लगभग दूना रहता है। फली-५-७.५ से० मी० लम्बी, १-१.६ से० मी० चौड़ी, चिपटी, पतली, धूसर, चमकीली एवं उसका अग्र नोकीला त्रिकोणाकार एवं मूल संकुचित होकर ३-६ मि० मी० लम्बा, नाल सदृश हो गया रहता है। बीज-३-१० की संख्या में रहते हैं। इसके अन्य भेदों का वर्णन स्वतन्त्र किया गया है। कुछ पुराने वृक्षों के काष्ठ के अन्दर दरारों में एक रवेदार या चूर्ण रूप में कृष्णाभ श्वेत पदार्थ जमा पाया जाता है जिसे खदिरसार (खेरसाल) कहते हैं। यह बहुत महँगा होता है तथा खाँसी एवं गले के विकारों में काम में आता है। खैर के सार (अन्दर की लकड़ी) भाग को जल के साथ उबालकर कत्था निकालते हैं जो प्रधान रूप से दो प्रकार का होता है। प्रथम धूसर रंग का खाने के या औषध के काम आता है तथा दूसरा लाली लिये भूरा या हलका नारंगी विभिन्न उद्योगों में, एक तीसरा प्रकार बम्बई की तरफ सुपाड़ी से बनाया हुआ भी मिलता है। एक चौथा कत्था विदेशी वृक्ष अंकेरिया गम्बीर (Uncaria gambir Roxb. Fam. Rubiaceae) से प्राप्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके अन्दर की लकड़ी में कैटेचिन (Catechin) एवं कैटेचूटैनिक ॲसिड (Catechu- tannic acid) होते हैं जिनमें से इसका कषायत्व दूसरे वाले द्रव्य के कारण होता है जो कत्थे में करीब ५०% होता है। गुण और प्रयोग-खैर शीत, ग्राही, कफ, शुक्र को सुखाने वाला, रक्तपित्त-प्रशमन एवं पाचन है। इसका प्रयोग कुष्ठ, चर्मरोग, खाँसी तथा गला, मुख, मसूढ़े की शिथिलता, अतिसार, प्रमेह, रक्तविकार एवं व्रण में किया जाता है। कत्थे में भी यही गुण हैं। (१) कुष्ठ में इसको खिलाते हैं तथा इससे स्नानादि भी कराते हैं। (२) संग्रहणी, अतिसार तथा खट्टी डकार में कत्था उपयोगी है। (३) खाँसी विशेष रूप से शुष्क कास में इसको मुँह में चूसने के लिये देते हैं। कफ युक्त खाँसी में इससे कफ कम होता है। (४) मसूढ़े से खून आता हो तो इसके क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। (५) मुख में छाले पड़ गये हों तब कत्थे को चूसने को देते हैं। मात्रा-त्वक् चूर्ण १ से ३ माशा; कत्था ३ से ६ रत्ती; क्वाथ ५ से १० तोला।

वटादिवर्गः ६८५ अथ श्वेतखदिरः (पपरिया कत्था) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह खदिरः श्वेतसारोऽन्य कदरः सोमवल्कलः । कदरो विशदो वर्ण्यो मुखरोगकफास्रजित् ।।३३।। सफेद खैर के संस्कृत नाम- श्वेतखदिर, श्वेतसार, कदर और सोमवल्कल ये सब हैं। सफेद खैर- विशद गुणयुक्त, वर्ण को उत्तम बनाने वाला एवम्- मुखरोग, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाला है। [३३] १६. सफेद खैर हिं०- सफेद खैर, पपरिया खैर। बं०- श्वेत खदिर। म०- पांढरा खैर। गु०- गोरंड, खैर धोला सार वालो। क०- विलिय तर्जि, विलियर्ति। ते०- तेल चंड। ता०- कोविल। ले०- Acacia suma Kurg. (अॅकेसिया सुमा)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह बंगाल, बिहार एवं पश्चिम प्रायद्वीप आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष- खदिर वृक्ष के समान ही होता है। इसमें केवल छाल सफेद तथा शाखाएं टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। आभ्यन्तर कोश बाह्य कोश से अधिक बड़ा नहीं होता। सफेद खैर का एक अन्य भेद A. ferruginea (अँ. फेरूजिनिया), गुजरात, बरार तथा दक्षिण में मिलता है। गुण और प्रयोग- यह खदिर के समान ही होने से उसी की तरह इसके भी गुण कर्म हैं। अथ इरिमेदः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह इरिमेदो विट्खदिरः कालस्कन्धोऽरिमेदकः। इरिमेदः कषायोष्णो मुखदन्तगदाःस्रजित् । हन्ति कण्डूविषश्लेष्मकृमिकुष्ठविषव्रणान् ।।३४।। दुर्गन्ध खैर के संस्कृत नाम- इरिमेद, विट्खदिर, कालस्कन्ध और अरिमेदक ये सब हैं। दुर्गन्ध खैर- कषायरसयुक्त, उष्ण एवम्- मुख तथा दाँत सम्बन्धी रोग, रक्तविकार, खुजली, विष, कफ, कृमि, कुष्ठ, विष-व्रण को दूर करने वाला है। [३४] १७. दुर्गन्ध खैर हिं०- दुर्गन्ध खैर, गन्धबबुल, गुआ-बबूल। बं०- गुया बाबला। म०- गुआबाभूल, घाणेरा खैर। गु०- गन्धिलो खर, हरिमेद। अं०- The Cassie Flower (दी केसी फ्लावर)। ले०- Acacia farnesiana Willd. (अॅकेसिया फार्नेसियाना। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है तथा लगाया भी जाता है। इसका वृक्ष- छोटा या झाड़ बड़ा १५ फीट तक काँटेदार होता है। छाल- हलके भूरे रंग की खुरदरी होती है। कांटे मुलायम चौथाई से आध इञ्च लम्बे सीधे होते हैं। पत्ते- उपपक्ष ४-८ जोड़े, १/२-१ इञ्च या १ १/२ इञ्च लम्बे और प्रत्येक उपपक्ष में पत्रक १०-२० जोड़े एवं पर्णवृन्त छोटा तथा एक ग्रंथि से युक्त होता है। पुष्प गुच्छ- १-१ १/२ इञ्च लम्बे आते हैं। पुष्प- गहरे नारंग वर्ण के सुगन्धित होते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, टेढ़ी, अस्फोटी और लम्बगोल होती है। इसकी जड़ तथा जड़ की छाल में तीव्र दुर्गन्ध होने के कारण इसे विट्खदिर कहा जाता है। यह नवंबर से मार्च तक पुष्पित होता है तथा इसके पुष्पों का सुगन्ध भी निकाला जाता है। इससे गोंद भी प्राप्त होता है। बिलायती बबूल, रेंवा (Acacia leucophloea Willd.) को भी कुछ हरिमेद मानते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

तक मालूम पड़ता है। Wait, line 21 ends with exclamation mark or danda? Look at line 21:पड़ता है !orपड़ता है।? Look at the symbol after पड़ता है: It's a vertical stroke with a dot at the bottom: !` (an exclamation mark!).

*   ****: `रोहीतक नाम से व्यवहार में लाया जाने वाला अन्य वृक्ष अमूरा रोहीतक (Amoora rohituka W. & A.);`
    Check: semicolon at end: `;`

*   ****: `मेलिएसी (Fam. Meliaceae) है। यह उत्तर प्रदेश में गोंडा से पूर्व की तरफ, बंगाल, आसाम तक एवं दक्षिण में`
    Check: `गोंडा` or `गोंड़ा`? It's `गोंडा`.

*   ****: `पाया जाता है। इसका वृक्ष—छोटा, सुन्दर, शाखाएँ नीचे झुकी हुई। पत्ते—पक्षवत् १-३ फीट लम्बे; पत्रक ४-७ जोड़े,`
    Check: semicolon after लम्बे: `;`
    `पत्रक ४-७ जोड़े,` (with hyphen).

*   ****: `३-९ × १ १/२ - ४ इञ्च बड़े, अखण्ड, चिकने, तीक्ष्णाग्र, कुछ-कुछ लम्बाग्र

वटादिवर्गः ६८७ चरक चि० अ० १३ में रोहितक लता का उल्लेख है जिससे ऐसा मालूम पड़ता है कि कोई ऐसी लता भी थी जिसका उपयोग रोहीतक नाम से किया जाता था । गुण-कर्म—रोहीतक तिक्त, कषाय, शीत, कफ-पित्तशामक, सारक एवं यकृत्, प्लीहा, गुल्म एवं उदररोग को दूर करने वाली है । इसका यकृत् तथा प्लीहा वृद्धि में विशेष उपयोग किया जाता है । मात्रा—त्वक्चूर्ण १ से ३ माशा; क्वाथ में ½-१ तोला । अथ बब्बूलः (बबूर) । तस्य नामानि गुणांश्चाह बब्बूलः किङ्किरातः स्यात्किङ्किराटः सपीतकः ॥३६॥ स एव कथितस्तज्जैराभाष्टपद्मोदिनी । बब्बूलः कफनुद् ग्राही कुष्ठकृमिविषापहः ॥३७॥ बबूर के संस्कृत नाम—बब्बूल, किङ्किरात, किङ्किराट, सपीतक तथा आभाष्टपदभोदिनी ये सब द्रव्य-गुण के जानने वालों ने बतलाये हैं । बबूर—ग्राही एवम्-कफ, कुष्ठ, क्रिमि तथा विष का नाशक है । [३६-३७] ९९. बबूल हिं०—बबूर, बबूल, कीकर । बं०—बाबला । म०—बाभूल । गु०—बाबल । क०—पुलई । ते०—नल्लतुम्म । ता०—करू बेलमरम् । फा०—मुगिलाँ । अ०—अमुगिलाँ । ले०—Acacia arabica Willd. (अकेसिया अरेबिका) । Fam. Leguminosae (लेग्यु-मिनोसी) । यह सिंध तथा डेक्कन का आदिवासी होते हुए भी अब सभी स्थानों में पाया जाता है । इसका वृक्ष—मध्यमाकार का, कंटक युक्त, होता है । छाल—गहरे भूरे या काले रंग की एवं लम्बाई में फटी हुई होती है । पत्ते—संयुक्त; उपपक्ष ४-९ जोड़े, २.५ से० मी० लम्बे; पत्रक १०-२५ जोड़े, ३-६ × १.२-२ मि० मी० बड़े, रेखाकार होते हैं । पुष्प—चमकीले पीले, गोल एवं मधुर गन्धि होते हैं । फली—३-६ इञ्च लम्बी, ०.५ इञ्च चौड़ी, माला की तरह बीच-बीच में सिकुड़ी हुई, टेढ़ी, मृदु रोमश एवं ८-१२ बीजों से युक्त होती है । काँटे सीधे, नुकीले तथा पर्णवृन्त के नीचे जोड़ी में आते हैं । इसका गोंद विभिन्न आकार एवं नाप के टुकड़ों में, भूरा, लाल या हल्का पीला, गन्धहीन, स्वादहीन एवं अपने से दुगने जल में पूर्णतः घुलनशील होता है । इसका गोंद, छाल एवं फली का उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—गोंद में अरैबिक् ॲसिड के साथ बने चूना तथा मॅग्नेशियम् के लवण होते हैं । इसकी छाल में १२% तथा फली में २०% तक टैनिन होता है । गुण और प्रयोग—इसका गोंद स्नेहन, ग्राही तथा पौष्टिक है । मुख के छाले, शुष्क कास, गले का सूखना आदि में इसको चूसने से लाभ होता है । मूत्रकृच्छ्र, अतिसार तथा मधुमेह में इसको खिलाते हैं । इसकी छाल संग्राहक है । इसके क्वाथ के गण्डूष से मुखरोग, दाँत हिलना तथा गले की शिथिलता में लाभ होता है । इसकी फली का चूर्ण चीनी मिलाकर स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि में देते हैं । मात्रा—फली चूर्ण ३ से ६ माशा; गोंद ३ से ६ माशा । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६८८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथारिष्टकः (रीठा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह अरिष्टकस्तु मङ्गल्यः कृष्णवर्णोऽर्थसाधनः । रक्तबीजः पीतफेनः फेनिलो गर्भपातनः ।। अरिष्टकस्त्रिदोषघ्नो ग्रहजिद् गर्भपातनः ।। ३८ ।। रीठा के संस्कृत नाम—अरिष्टक, मङ्गल्य, कृष्णवर्ण, अर्थसाधन, रक्तबीज, पीतफेन, फेनिल और गर्भपातन ये सब हैं। रीठा—त्रिदोषनाशक, ग्रहबाधा को दूर करने वाला एवम् गर्भ को गिराने वाला है ।। [३८] २०. रीठा हिं०—रीठा। बं०—रीठेगाछ। म०—रीठा, रिठा। गु०—अरीठा। ते०—कुंकुडु। क०—कुकुटे कायि। ता०— पोत्रान कोट्टर। अ०—बुन्दक हिन्दी। फा०—फुन्दुके फारसी। अं०—Soap nut Tree of North India (सोपनट ट्री ऑफ नार्थ इण्डिया)। ले०—Sapindus mukorossi Gaertn. (सेपिण्डस् मुकोरोसी)। Fam. Sapindaceae (सेपिण्डेसी)। उत्तर पश्चिम भारत, बंगाल तथा आसाम में इसके लगाये पेड़ पाये जाते हैं तथा हिमालय में ४००० फीट तक यह होता है। इसका वृक्ष—सुन्दर होता है। पत्ते—संयुक्त, शाखाग्र पर समूहबद्ध एवं पत्रक—१०-१६, २-६ × ३/४-२ १/४ इञ्च बड़े, भालाकार, आयताकार, एकान्तर या न्यूनाधिक विपरीत, तीक्ष्णाग्र या कुंठिताग्र, चिकने एवं आधार पर तिर्यक् होते हैं। पुष्प—मंजरियों में १/४ इञ्च व्यास के एवं श्वेत या बैंगनी रंग के होते हैं। फल—मांसल, पीत या हलके भूरे, कुछ गोलाई लिये हुए, ३/८ इञ्च व्यास के तथा पानी में डालने से फेन उत्पन्न करने वाले होते हैं। इसकी एक जाति से० ट्राइफोलिएट्स् (S. trifoliatus Linn.) दक्षिण तथा पश्चिम भारत में गाँवों के आसपास होती है और बंगाल तथा अन्य स्थानों में लगाये हुए इसके पेड़ पाये जाते हैं। इसमें पत्रक—२-३ जोड़े, ३-७ × १- ४ इञ्च, भालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र एवं ऊपर की ओर चमकीले होते हैं। पुष्प—मटमैले श्वेत होते हैं। फल— २-३ खण्ड युक्त, मांसल, कच्चे में रक्ताभ पीत रोमों से आवृत तथा पकने पर चिकना तथा झुर्रीदार होता है। एक अन्य जाति से० इमार्जिनैट्स् (S. emarginatus Vahl.) जिसे पहले से० ट्राइफोलिएट्स् का पर्याय मानते थे अब स्वतन्त्र जाति मानी जाती है। इसके वृक्ष—छायादार होते हैं। पत्रक—२-३ जोड़े, आयताकार या अंडाकार, कभी-कभी अभिलट्वाकार, कुंठित या द्विविभक्त अग्रवाले और २ १/२-६ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प—श्वेत एवं फल— पकने पर २, ३ खण्डों के होते हैं। रीठे के फलों का उपयोग रेशमी, सूती और मूल्यवान कपड़ों के धोने के लिये किया जाता है। चिकित्सा में

वटादिवर्गः ६८९ (१) श्वास, कास आदि में कफ निकालने के लिये इसको वामक रूप में देते हैं। (२) अर्धावभेदक तथा श्वास में इसका नस्य लाभदायक है। (३) अफीम की विषाक्तता में वमन कराने के लिये इसका पानी देते हैं। (४) इसका लेप कुष्ठ, कण्डू, संधिशोथ, विस्फोट, गण्डमाला एवं बिच्छू, गोजर तथा मधुमक्खी काटने पर किया जाता है। मात्रा-कफघ्न ५ से १० रत्ती; वामक १ से २ ड्राम। अथ पुत्रजीवः (पितौजिया) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पुत्रजीवो गर्भकरो यष्टीपुष्पोऽर्थसाधकः ॥३९॥ पुत्रजीवो गुरुर्वृष्यो गर्भदः श्लेष्मवातहृत् । सृष्टमूत्रमलो रूक्षो हिमः स्वादुः पटुः कटुः ॥४०॥ पितौजिया के संस्कृत नाम-पुत्रजीव, गर्भकर, यष्टीपुष्प और अर्थसाधक ये सब हैं। पितौजिया-स्वादिष्ट, कटु तथा लवण रस युक्त, गुरु, वृष्य (वीर्यवर्धक), गर्भदायक, मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति कराने वाला, रूक्ष तथा शीतल है। एवम् कफ तथा वात को नष्ट करने वाला है। [३९-४०] २१. पितौजिया हिं०-जियापोता, पितौजिया। बं०-जिया पुन्ता। म०-पुत्र जीव। गु०-पुत्र जीवक। क०-पुत्र जीव। ते०- कुहुरु जीवि। ले०-Putranjiva roxburghli Wall. (पुत्रञ्जीव रॉक्सबरघाई)। Fam. Euphorbiaceae (यूफर्बिएसी)। पितौजिया-इस देश के गरम प्रान्तों में पाया जाता है। यह जंगली और बागों में भी लगाया हुआ पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और बारहो मास हरा-भरा सुहावना दीखाई पड़ता है। शाखायें प्रायः लटकी हुई रहती हैं। छाल-कालापन युक्त खाकी रंग की होती है। पत्ते-द्विपंक्ति, चमकदार, प्रासवत् या आयताकार एवं पत्रतट प्रायः लहरदार होता है। पुष्प-पुंपुष्प पीताभ तथा स्त्री पुष्प हरिताभ होते हैं। फल-झर बेर के आकार के, श्वेताभ तथा स्थायी कुक्षिवृन्त से युक्त होने के कारण नोकीले होते हैं। जिनके लड़के पैदा होते हो मर जाया करते हैं वे लोग इसके गुठलियों की माला पहनते हैं। गुण और प्रयोग-ज्वर तथा प्रतिश्याय में पत्र तथा फलों का क्वाथ पिलाते हैं। गुठलियों को घिसकर शिरःशूल में लगाया जाता है। फोड़े आदि पर लेप करने से वेदना कम होती है। सभी प्रकार के विषों में इसकी मज्जा को शीत जल में पीसकर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं। अथेङ्गुदः (हिङ्गोद) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह इङ्गुदोऽङ्गारवृक्षश्च तिक्तकस्तापसद्रुमः। इङ्गुदः कुष्ठभूतादिग्रहव्रणविषक्रिमीन् ।। हन्त्युष्णः श्वित्रशूलघ्नस्तिक्तकः कटुपाकवान् ॥४१॥ हिङ्गोद के संस्कृत नाम-इङ्गुद, अङ्गारवृक्ष, तिक्तक और तापसद्रुम ये सब हैं। हिङ्गोद-तिक्तरसयुक्त, विपाक में कटुरसयुक्त, उष्ण एवं कुष्ठ, भूतादि-ग्रहबाधा, व्रण, विष, क्रिमि, श्वेतकुष्ठ तथा शूल का नाशक है। [४१] ४७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६९० भावप्रकाशनिघण्टुः २२. हिंगोट हिं०-हिंगोट हिंगन, इंगुजा। बं०-हिंगोन। म०-हिंगण। गु०-इङ्गोरीओ। क०-इङ्गलंगिद। ते०-गरा, गारि। ता०-नन्जुन्द। ले०-Balanites roxburghii Planch. (बेलेनाईटीस् रॉक्सबरघाई)। Fam. Simarubaceae (सिमेरूबेसी)। यह भारत के शुष्क भागों में दक्षिण-पूर्व पंजाब एवं दिल्ली से सिक्किम, बंगाल, मध्य भारत बम्बई तथा दक्षिण में होता है। इसका वृक्ष-या गुल्म करीब २० फीट तक होता है। शाखाओं पर मजबूत, सीधे, पर्णयुक्त, पत्रकोणीय या पत्रों के पार्श्व में कांटे होते हैं। पत्ते-द्विपत्रक एवं अवृन्त; पत्रक-अंडाकार, अभिलट्वाकार या अभि-प्रासवत्, ३/८-१ १/४ इञ्च बड़े होते हैं। पुष्प-हरिताभ पीत एवं सुगन्धित होते हैं। फल-अष्ठिल, अंडाकार, १ ३/८-२ ३/८ इञ्च लम्बे, हलकी ५ धारियों वाले एवं पकने पर हलके पीले होते हैं। गूदा मधुर, १/४ इञ्च मोटा एवं उग्रगन्धि होता है। गुठली में एक बीज तैल युक्त होता है। बीज में ४३% पीले रंग का स्वादहीन तेल होता है। इसके गूदे को खाया जाता है तथा सिल्क को साफ करने के काम आता है। रासायनिक संगठन-फल के गूदे में ७.२% सॅपोनिन पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल तथा फल का गूदा कफघ्न, कृमिघ्न, कुष्ठघ्न एवं विरेचक होता है। अपक्व फल तीव्र विरेचक होता है। पुराने कफ विकारों में गूदे को खिलाते हैं। व्रण तथा अग्निदग्ध व्रण पर इसका तेल लगाते हैं। मात्रा-गूदा १-५ रत्ती कफघ्न; १०-३० रत्ती विरेचक। अथ झिङ्गिनी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह जिङ्गिनी झिङ्गिनी झिङ्गी सुनिर्यासा प्रमोदिनी ॥४२॥ जिङ्गिनी मधुरा सोष्णा कषाया योनिशोधिनी। कटुका व्रणहृद्रोगवातातीसारहृत् पटुः ॥४३॥ जिङ्गिनी के संस्कृत नाम-जिङ्गिनि, झिङ्गनी, झिङ्गी, सुनिर्यासा तथा प्रमोदिनी ये सब हैं। जिङ्गिनी-मधुर, कटु, कषाय तथा लवण रसयुक्त, उष्ण, योनि शोधक एवम्-व्रण, हृद्रोग, वात तथा अतीसार को दूर करने वाली है। [४२-४३] २३. जिंगिनी हिं०-जिंगना, जिंगन। म०-मोयी, मुयी। गु०-मवेडी, शिंपटी। क०-उडी मरम। बं०-जिओल। ते०- गमपेना। ले०-Odina woodier Roxb. (ओडिना वुडियर)। Fam. Anacardiaceae (अॅनाकार्डिएसी)। यह इस देश में प्रायः गरम प्रान्तों में अधिक पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और वह अधिक दिन तक नहीं ठहरता। इसके स्तम्भ से एक प्रकार का गोंद निकलता है। पत्ते-पक्षवत्, मोटे एवं टहनियों के अग्र पर दलबद्ध रहते हैं। पत्रक-५-९, विपरीत, लम्बाग्र, लट्वाकार और तिरछे फलक मूल वाले होते हैं। पुष्प-छोटे, पीताभहरित तथा एकलिंग होते हैं एवं दोनों प्रकार के पुष्पों की मंजरियाँ पृथक्-पृथक् रहती हैं। फल-१/२ इञ्च लम्बे, टेढ़े, आयताकार, चिपटे एवं गुठलीदार होते हैं। काण्ड में स्टार्च बहुत होता है इससे इसे हाथी बड़े चाव से खाते हैं। इसकी डालियों को गाड़ देने से लग जाती है। औषध में गोंद तथा छाल का उपयोग करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

वटादिवर्गः ६९१ गुण और प्रयोग-इसका गोंद स्नेह्न तथा संग्राहक है। छाल संग्राहक एवं व्रणरोपण है। (१) छाल का क्वाथ पिलाने से प्यास दूर होती है। इससे कुल्ला करने से गले की शिथिलता, खाँसी तथा दंतपीड़ा दूर होती है। इसको अतिसार में देते हैं। (२) छाल के क्वाथ से सिद्ध तेल पुरानें व्रण पर लगाते हैं। (३) पत्तों को उबालकर शोथ पर बाँधते हैं। (४) छाल का स्वरस हथियार से कटे व्रण पर डालने से शीघ्र रोपण होता है। (५) इसका गोंद अतिसार में देते हैं। मोच आदि में इसको नारियल के पानी में पीसकर लेप करते हैं। अथ तमालः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तमाल उक्तस्तापिच्छः कालस्कन्धोऽमितद्रुमः । लोकस्कन्धो नीलध्वजो नीलतालश्च स स्मृतः ।। तमालः शालवद्वेद्यो दाहविस्फोटहृत् पुनः ।।४३।। तमाल के संस्कृत नाम-तमाल, तापिच्छ, कालस्कन्ध, अमितद्रुम, लोकस्कन्ध, नीलध्वज और नीलताल ये सब हैं। तमाल-गुणों में साखू की भाँति समझना चाहिये, किन्तु विशेषतः यह दाह तथा विस्फोट का नाशक है। [४४] नोट-कर्पूरादिवर्ग में तमालपत्र का वर्णन किया जा चुका है किन्तु यह उससे भिन्न वृक्ष है। जिस वृक्ष का नीचे वर्णन किया जा रहा है उसे दक्षिण में तमाल कहते हैं। वास्तव में यही तमाल है कि नहीं इस सम्बन्ध में अभी अनुसंधान की आवश्यकता है। २४. तमाल हिं०-तमाल। बं०-तमाल गाछ। ते०-पसुपुवर्णे। म०-तमाल वृक्ष, गु०-तमाल। ता०-पुमक्की। क०-जारिगेहुल। अं०-Indian Gamboge Tree (इण्डियन गॅम्बोज ट्री)। ले०-Garcinia morella Desr. (गार्सिनिया मोरेला)। Fam. Guttiferae (गट्टिफेरी)। तमाल-पूरब बंगाल के जंगलों में, खासिया पहाड़ एवं प० घाट में उत्तर किनारा से दक्षिण में ट्रावनकोर तक, ३००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा सदाहरित होता है और शाखाएँ फैली हुई होती हैं। पत्ते-३ से ५ × १ १/२ से २ १/२ इञ्च, अंडाकार, भालाकार एवं दोनों तरफ क्रमशः संकुचित होते हैं। फूल-एकलिंगी जिनमें पुंपुष्प की अपेक्षा स्त्री पुष्प बड़े होते हैं। फल-गोल, ३/४ इञ्च व्यास में, चारखण्ड युक्त एवं बीज-४, गहरे भूरे, अण्डाकार या वृक्काकार होते हैं। गॅम्बोज (Gamboge)-तमाल वृक्ष की छाल में घाव करने से एक पीले रंग का तरल राल जैसा पदार्थ प्राप्त होता है जिसे सूखने पर गॅम्बोज (Gamboge) कहते हैं। यह भूरे पीले रंग के टुकड़ों में प्राप्त होता है तथा इसका स्वाद कुछ कटु होता है। जल के साथ इसका पीला घोल (इमल्शन) बनता है जो अमोनिया मिलाने से स्वच्छ एवं गहरे नारंग रक्त वर्ण का हो जाता है। इसे गोटगनबा भी कहा जाता है। इसकी अन्य जातियों से भी प्राप्त होता है किन्तु वह निकृष्ट श्रेणी का होता है। भारत में अपने यहाँ के वृक्षों से इसका संग्रह कम किया जाता है और अधिकतर बजार में बिकने वाला गॅम्बोज स्याम, कम्बोडिया आदि से आता है। यह गा० हॅनबुरी (G. hanburyi) नामक जाति जो स्याम में होती है उससे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

६९२ भावप्रकाशनिघण्टुः निकाला जाता है। दस वर्ष पुराने वृक्ष की छाल में, वर्षा ऋतु में, कुन्तल (Spiral) चीरा लगाते हैं तथा नीचे बाँस के टुकड़े लगा देते हैं जिसमें इसे संग्रह कर फिर पतले बाँसों में १ महीना रखते हैं, जिससे यह जम जाता है। बाद में इन्हें आग पर गरम करते हैं जिससे बाँस चटक कर यह अलग हो जाता है। यह २-५ से० मी० व्यास के लम्बे, बेलनाकार, रक्ताभ पीत या भुरापन लिये नारंग वर्ण के टुकड़ों में होता है जिसकी सतह पर बाँस के अन्दर की धारियों के निशान दिखलाई देते हैं। कभी-कभी यह अंदर से पोला होता है। इसे बाजार में उसारे रेवन्द कहा जाता है किन्तु यह रेवन्द चीनी (हीअम् एमोडी-Rheum emodi नामक गुल्म की मूल) का उसारा (सत्व) नहीं हैं। इसे कुछ विद्वान् कंकुष्ठ भी मानते हैं। औषध के अतिरिक्त इसका रंग के लिये उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में ३०% गाढ़ा स्नेह होता है। यह भूरापन लिये पीला होता है तथा खाद्य के रूप में काम में आता है। इसके बीजावरण, काण्डत्वक्, पत्र तथा फलों में एक पीला रंजक द्रव्य मोरेलीन (Morellin, C₃₃, H₃₈ O₇) पाया जाता है जो पूयोत्पादक दण्डाणु, माइक्रोकोकस् पायोजेनीज हेराइट्टी ऑरियस् (Micrococcus pyogenes var. aureus) का नाशक है। गैम्बोज में मुख्यतया राल तथा गोंद जैसे पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-गैम्बोज तीक्ष्ण विरेचन है। इससे पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इसकी क्रिया इन्द्रायण के फल की तरह होती है। इसे कृमिघ्न भी मानते हैं। रक्तभाराधिक्य में शीघ्र विरेचन कराने की आवश्यकता होने पर इसे देते हैं। जलोदर, अनार्तव तथा कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से पाचन संस्थान के अंगों पर तीव्र प्रक्षोभक क्रिया होकर मरोड़, वमन आदि होकर मृत्यु भी हो सकती है। १ ड्राम मात्रा से मृत्यु हुई है। मात्रा-१/४-१/२ गुंजा सुगन्धि द्रव्य के साथ। अथ तूणी। तस्या नामगुणानाह तूणी तुन्नक आपीनस्तुणिकः कच्छकस्तथा। कुठेरकः कान्तलको नन्दीवृक्षश्च नन्दकः ।।४५।। तूणी रक्तः कटुः पाके कषायो मधुरो लघुः । तिक्तो ग्राही हिमो वृष्यो व्रणकुष्ठास्रपित्तजित् ।।४६।। तून के संस्कृत नाम-तूणी, तुन्नक, आपीन, तुणिक, कच्छक, कुठेरक, कान्तलक, नन्दीवृक्ष और नन्दक ये सब हैं। तून-कषाय, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, रक्तवर्ण, लघु, ग्राही, शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम् व्रण, कुष्ठ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त का नाशक है। [४५-४६] २५. तून हिं०-तुन, तून, तूनी, महानिम। बं०-तूनगाछ। म०-तूणी, कूरक। गु०-तूणी। ता०-तूनमरम्। ते०- नन्दि वृक्षमु। क०-बिलिगंधगिरि। अं०-The Toon (दि तून)। ले०-Cedrela toona Roxb. (सेड्रेला तून)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में ४००० फीट तक, आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, पश्चिमी घाट एवं दक्षिण प्रायद्वीप में होता है। इसका वृक्ष-ऊँचा या मध्यम ऊँचाई का, ७०-१०० फीट तक होता है। पत्ते-सदल पर्ण, १-२ १/२ फीट लम्बे; पत्रक ५-१२ जोड़े, भालाकार या आयताकार-भालाकार, ३-७ इन्च लम्बे, अखण्ड, सवृन्त तथा तिरछे फलक मूल वाले होते हैं। पुष्प-छोटे, सुगंधित तथा नवीन टहनियों पर निकलते हैं। फली-१ इन्च तक लम्बी आयताकार होती है।

वटादिवर्गः ६९३ बीज-दोनों सिरों पर सपक्ष होते हैं। इसकी लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम आती है। छाल तथा पुष्प का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन-फूलों में लाल रंजक द्रव्य निकटॅन्थिन् (Nyctanthin, C₁₅ H₁₈ O₃) होता है जो पारिजाता के रंजक द्रव्य के समान होता है। छाल में टेनिक एसिड, कडुवी राल, साइट्रिक एसिड, स्टार्च तथा अन्य द्रव्य होते हैं। इसमें कोई क्षाराभ नहीं पाया जाता है। राख में चूना (Calcium) काफी होता है। काष्ठ में ०.४४% स्वर्ण पीत रंग का उड़नशील तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही, बल्य, पौष्टिक एवं अल्प प्रमाण में ज्वर प्रतिबंधक है। पुष्प गर्भाशय संकोचक है। (१) बच्चों के जीर्ण अतिसार आदि में छाल का प्रयोग करते हैं। विषम ज्वर में दस्त होते हों तो इसको दिया जाता है। (१) गर्भाशय की शिथिलता के कारण यदि अत्यार्तव हो तो पुष्प या छाल का फांट देते हैं। (३) छाल का लेप या चूर्ण व्रण पर लगाने से व्रण का संकोचन अच्छा होता है। मात्रा-छाल २ १/२ तोला फांट बनाकर काली मिर्च के साथ। अथ भूर्जपत्रः (भोजपत्र) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भूर्जपत्रः स्मृतो भूर्जश्चर्मी बहुलवल्कलः । भूर्जो भूतग्रहश्लेष्मकर्णरुक्पित्तरक्तजित् ।।४७।। कषायो राक्षसघ्नश्च मेदोविषहरः परः ।।४८।। भोजपत्र के संस्कृत नाम-भूर्जपत्र, भूर्ज, चर्मी तथा बहुलवल्कल ये सब हैं। भोजपत्र-कषाय रसयुक्त एवम् भूतग्रहबाधा, कफ तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, पित्त, रक्तविकार तथा राक्षसबाधा का नाशक है और विशेषतः यह मेद तथा विष को दूर करने वाला है। [४७-४८] २६. भोजपत्र हिं०-भोजपत्र, भूजपत्र, भोजपत्तर। बं०-भूजिपत्र। म०-भूर्जपत्र। ते०-भोजपत्रमु। अं०-Himalayan Silver Birch (हिमालयन् सिल्वर बर्च)। ले०-Betula utilis D. Don. (बेटुला यूटिलिस्)। Fam. Betulaceae (बेटुलेसी)। यह गरम हिमालय में काश्मीर में ७ से १२ हजार फीट तक और सिक्कम में ९ से १४ हजार फीट तक और भूटान में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-४०-६५ फीट तक ऊँचा होता है। छाल-चिकनी, चमकीली, सफेद या किञ्चित् लाली युक्त सफेद, आड़े धब्बेदार (Lenticel) पर्त के पर्त, कागज के समान एक साथ सटी रहती है और वह आसानी से पृथक्-पृथक् हो जाती है। पत्ते-२-३ इञ्च तक लम्बे, १ १/२ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, लम्बाग्र, दन्तुर एवं नये पत्ते पीत रालीय बिन्दुओं से युक्त होने के कारण चिपचिपे होते हैं। फूल-बारीक मञ्जरियों में आते हैं और फल-काष्ठवत् गोल होते हैं। वृक्ष की छाल को ही भोजपत्र कहते हैं। प्राचीन काल में इनका लिखने के काम में प्रयोग किया जाता था। इसकी एक अन्य जाति बे. अल्नाइडीस (B. alnoides Buch.) होती है जिसके पेड़ १०० फीट तक ऊँचे होते हैं। छाल मोटे परतों में छूटती है तथा धब्बे छोटे होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें बेटुलिन (Betulin) तथा उड़नशील तैल पाया जाता है।

६९४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग—इसकी छाल का क्वाथ वातानुलोमक एवं प्रतिदूषक होता है। इसे कामला, पैत्तिक ज्वर एवं योषापस्मार में दिया जाता है। कर्णस्राव तथा विषाक्त व्रण प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। इसके पत्र उत्तेजक एवं स्तम्भन माने जाते हैं। भूतबाधा एवं ग्रह दोष में इसका धूप दिया जाता है। मात्रा—क्वाथ ५ से १० तोला; चूर्ण १-३ माशा। अथ पलाशः (ढाक) । तस्य नामानि गुणांश्चाह पलाशः किंशुकः पर्णी यज्ञियो रक्तपुष्पकः। क्षारश्रेष्ठो वातपोथो ब्रह्मवृक्षः समिद्वरः ॥४९॥ पलाशो दीपनो वृष्यः सरोष्णो व्रणगुल्मजित् । भग्नसंधानकृद् दोषग्रहण्यर्शः क्रिमीन् हरेत् ।। कषायः कटुकस्तिक्तः स्निग्धो गुदजरोगजित् ॥५०॥ ढाक के संस्कृत नाम—पलाश, किंशुक, पर्ण, यज्ञिय, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, वातपोथ, ब्रह्मवृक्ष तथा समिद्वर ये सब हैं। ढाक—कषाय, कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, वृष्य (वीर्यवर्धक), सारक, उष्ण, टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला, स्निग्ध एवम्-व्रण, गुल्म, वातादिक दोष, ग्रहणी, अर्श (बबासीर), क्रिमि तथा गुदा में उत्पन्न होने वाले रोगों को दूर करता है। [४८-५०] अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह तत्पुष्पं स्वादु पाके तु कटु तिक्तं कषायकम् ॥५१॥ वातलं कफपित्तास्रकृच्छ्रजिद ग्राहि शीतलम्। तृड्दाहशमकं वातरक्तकुष्ठहरं परम् ॥५२॥ फलं लघूष्णं मेहार्शःकृमिवातकफापहम्। विपाके कटुकं रूक्षं कुष्ठं गुल्मोदरप्रणुत् ॥५३॥ ढाक के फूल—स्वादिष्ट, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त, वातजनक, कफ-पित्त, रक्तविकार तथा मूत्रकृच्छ्रनाशक, ग्राही, शीतल, तृषा और दाह को शमन करने वाले एवम् वातरक्त तथा कुष्ठ को अत्यन्त दूर करने वाले होते हैं। ढाक के फल—लघु, उष्ण, विपाक में कटु रस युक्त, रूक्ष एवम्-प्रमेह, अर्श, कृमि, वात, कफ, कुष्ठ, गुल्म तथा उदररोग के नाशक हैं। [५१-५३] २७. ढाक हिं०—ढाक, पलाश, परास, टेसू। बं०—पलाश गाछ। म०—पलस। गु०—खाखरो। मु०—खाकरो। क०— मुत्तग। ते०—मोदुगु । ता०—पलासु । अं०—The Forest flame (दि फॉरेस्ट फ्लेम) । ले०—Butea frondosa Koen. ex Roxb. (ब्यूटिया फ्रॉण्डोसा) । Fam. Leguminosae (लेग्यूमूनोसी) । यह अत्यन्त शुष्क भागों को छोड़कर प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है और इसको वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं। इसके वृक्ष—छोटे या मध्यम ऊँचाई के होते हैं तथा समूहों में रहते हैं। पत्ते—त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक—१० से २० से० मी० चौड़े, कर्कश, ऊपर से कुछ चिकने किन्तु नीचे मृदु रोमश तथा उभरी हुई शिराओं से युक्त होते हैं। अग्र पत्रक तिर्यगायताकार, वृन्त की तरफ कुछ पतला या अभि अंडाकार, कुण्ठिताग्र या खण्डिताग्र एवं बगल के तिर्यक् अंडाकार होते हैं। पुष्प—बड़े, सुन्दर, नारंग रक्तवर्ण के होते हैं जो प्रायः पत्रहीन शाखाओं पर एकसाथ बहुत होते हैं। स्वरूप में ये दूर से सुग्गे की चोंच की तरह मालूम होने से इसे किंशुक कहा जाता है। फली—१२.५-२० × २.५-

वटादिवर्गः ६९५ ५ से० मी० बड़ी, अग्र की तरफ एक बीज युक्त होती है। बीज-चिपटे, वृक्काकांर, २५-३८ मि० मी० लम्बे, १६- २५ मि० मी० चौड़े, १.५-२.० मि० मी० मोटे, रक्ताभ भूरे, चमकीले सिकुड़नयुक्त, स्वाद में कुछ कटु एवं तिक्त तथा गंध हलकी होती है। इसका गोंद (Bengal Kino-बंगाल किनो)-रक्तवर्ण, सूखने पर कृष्णाभरक्त, भंगुर और चमकदार होता है। इसके बीज, पुष्प तथा गोंद का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-बीजों में १८% स्वादहीन तेल, अलब्यूमिनाभ द्रव्य, शर्करा तथा पुष्पों में ग्लूकोसाइड १.५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज कृमिघ्न, भेदन तथा कुष्ठघ्न हैं। पुष्प-मूत्रजनन हैं। गोंद उत्तम ग्राही है। (१) इसके ताजे, कीड़ों द्वारा न खाये हुये बीज, केचुवे (राउण्डे वर्म) के लिये सैण्टोनिन की तरह लाभप्रद होते हैं। इसका स्वाद अच्छा नहीं रहता तथा कभी-कभी इससे मिचली, पेट में दर्द या वमन हो सकता है। छिलका निकाल कर बीज देने से दस्त नहीं होता किन्तु छिलके के साथ देने से दस्त होता है। (२) बीजों को नींबू के रस के साथ घिसकर दाद आदि चर्म रोगों में लगाते हैं। (३) गोंद अतिसार, प्रवाहिका तथा भोजनोपरान्त गले में खट्टा पानी आता हो तब देते हैं। (४) फूलों का फांट शोरे के साथ मूत्रावरोध में पिलाया जाता है तथा फूलों से पेडू, कमर आदि सेंकते हैं। मात्रा-बीजपूर्ण ५-१० रत्ती, गोंद ५-१५ रत्ती। अथ शाल्मलिः (सेमर)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शाल्मलिस्तु भवेन्मोचा पिच्छिला पूरणीति च। रक्तपुष्पा स्थिरायुश्च कण्टकाढ्या च तूलिनी ॥ ५४ ॥ शाल्मली शीतला स्वाद्धी रसे पाके रसायनी। श्लेष्मला पित्तवातास्रहारिणी रक्तपित्तजित् ॥ ५५ ॥ सेमर के संस्कृत नाम-शाल्मलि, मोचा, पिच्छिला, पूरणी, रक्तपुष्पा, स्थिरायु, कण्टकाढ्या तथा तूलिनी ये सब हैं। सेमर-रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, रसायन, कफजनक एवम्-पित्त, वात, रक्तविकार या वातरक्त तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। इसके पुष्पों के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। २८. सेमर हिं०-सेमर, सेमल। बं०-शिमुल गाछ, रक्ती सिमुल। म०-कांते सांवर, लाल सांवर। गु०-शेमलो, सीमुलो। ते०-बुरूग चेट्टु। ता०-शालवधु। मा०-शेमल, सरमली। अं०-Silk Cotton Tree (सिल्क काटन ट्री)। ले०-Bombax malabaricum DC. (बॉम्बैक्स मालावारिकम्)। Fam. Bombacaceae (बाम्बेकेसी)। सेमर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के वन, उपवन और वाटिकाओं में उत्पन्न होता है। इसके वृक्ष-बहुत विशाल और मोटे हुआ करते हैं। डालियों पर छोटे-छोटे नुकीले काँटे होते हैं। सतिवन के पत्तों के समान इसके पत्ते-एक-एक डण्डी के अन्त में ५-७ फैले हुये होते हैं। फूल-लाल। पुष्पदल-मोटा, लुआवदार एवं २-३ इञ्च तक लम्बा होता है। फल-५-६ इञ्च लम्बे, लम्ब गोलाकार, काष्ठवत् एवं हरे होते हैं और उनके भीतर रेशम जैसी रूई तथा काले बीज होते हैं। इसके १-१।। साल के छोटे वृक्ष के मूल निकालकर सुखा लेते हैं जिन्हें सेमल मूसली कहा जाता है। इसके पुष्प, गोंद तथा कंद का उपयोग किया जाता है। गोंद का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA