भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५७२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कारण यह है कि आपने तीन जन्मोंमें विधिवत् जलधेनुका दान किया है, उसीके प्रभावसे आपका दर्शन सबको आह्लादित कर रहा है। जो आपका दर्शन करेंगे, आपका ध्यान करेंगे, आपकी चर्चा सुनेंगे अथवा आप जिन्हें देखेंगे, स्मरण करेंगे उनको भी सुख-शान्ति और आनन्द होगा। जलधेनुका दान करनेवालेको हजारों जन्मोंतक कोई क्लेश नहीं होता। इससे अधिक प्रसन्नतादायक अन्य कोई कर्म नहीं है। मुने! अब आप मेरे द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि स्वीकार कर अपने धामको जाड़ये। जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण किया है, वे मेरे द्वारा नियमन करने योग्य नहीं हैं। जो भगवान् श्रीकृष्णका पूजन-व्रत करता है, नित्य उनका ध्यान करता है, उनके कृष्ण, अच्युत, अनन्त, वासुदेव आदि नामोंका निरन्तर उच्चारण करता है, वह इस लोकमें नहीं आता। जो 'अच्युतः प्रीयताम्' ऐसा कहकर दान देता है, वह मेरे लोकमें नहीं आता। वे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं और हम सभी उनके आज्ञाकारी हैं। मैं लोकोंका संयमन करता हूँ और मेरा संयमन भगवान् श्रीकृष्ण करते हैं*। यमराजका यह वचन सुनकर अग्नि, शस्त्र आदिसे पीड़ित सब नरकके जीव भगवान्की स्तुति करते हुए उनके पवित्र नामोंका स्मरण करने लगे। भगवान् विष्णुका स्मरण करते ही उस पुण्यकर्मके प्रभावसे नरककी अग्नि शीतल हो गयी। यमराजके सभी अस्त्र-शस्त्र प्रभावशून्य हो गये, अन्धकार दूर हो
गया। सर्वत्र प्रकाश छा गया। यमदूत मूर्च्छित हो गये। शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु बहने लगी। मधुर ध्वनियाँ होने लगीं। पूय और रुधिरकी नदियोंमें उत्तम गङ्गाजल प्रवाहित होने लगा। सभी जीव दुःखसे छूटकर उत्तम वस्त्र, आभूषण, माला आदिसे विभूषित हो गये तथा तीनों पापोंसे मुक्त हो गये। यह अद्भुत दृश्य देखकर धर्मराज उन निष्पाप नारकीय जीवोंका पाद्यादिसे अर्चन करने लगे और इसे भगवान् विष्णुकी महिमा समझकर उनको बार-बार प्रणाम करने लगे।
यमराज इस प्रकार स्तुति कर ही रहे थे कि उनके देखते-ही-देखते नरकके सभी जीव दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्गमें चले गये। मुद्गल-ऋषि भी यह सब चरित्र देखकर अपने धाममें चले आये और भगवान् विष्णुका प्रभाव तथा जलधेनु-दानके माहात्म्यका बार-बार स्मरण करते हुए कहने लगे—
अहो! भगवान् विष्णुकी माया बड़ी विचित्र और कठिन है, जिससे मोहित होकर प्राणी परमेश्वरको नहीं पहचान पाता। इसी कारण जीव कीट, जूँ, पतङ्ग, वृक्ष, लता, पशु, पक्षी आदि योनियोंमें भ्रमण करते हैं और अपनी मुक्तिके लिये प्रयत्न नहीं करते। यह आश्चर्य है कि मायासे मोहित व्यक्ति अपना हित नहीं पहचान पाता। विष्णुभगवान्की माया यद्यपि बड़ी ही विचित्र है, परंतु भगवान्का आश्रय ग्रहण करनेपर व्यक्ति उस मायाको दूर कर लेता है। जो व्यक्ति मानव-
- कृष्णस्तु पूजितो यैस्तु ये कृष्णार्थमुपोषिताः । यैश्च नित्यं स्मृतः कृष्णो न ते महिषयोपगाः ॥ नमः कृष्णाच्युतानन्त वासुदेवेत्युदीरितम् । यैर्भावभावितैर्विप्र न ते महिषयोपगाः ॥ दानं ददद्भिर्यैरुक्तमच्युतः प्रीयतामिति । श्रद्धापुरःसैर्विप्र न ते महिषयोपगाः ॥ स एव नाथः सर्वस्य तत्रियोगकरा वयम् । जनसंयमनश्चाहमस्मत्संयमनो हरिः ॥
(उत्तरपर्व १५३।३०—३३)
ऐसे ही 'हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः, प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः' आदि प्रायः पंद्रह श्लोक विष्णुपुराणके यमगीतामें हैं, जो प्रायः प्रतिदिन पठनीय हैं।
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- उत्तरपर्व *
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जन्म पाकर भी भगवान्की आराधना नहीं करता, उसका मनुष्यके रूपमें जन्म लेना ही व्यर्थ है। ऐसा कौन अभागा व्यक्ति होगा, जो भगवान्की आराधना नहीं करेगा, जबकि भक्तिपूर्वक थोड़ी-सी भी आराधना की जाय तो भगवान् विष्णु इस लोक तथा परलोकमें उसका कल्याण कर देते हैं। भगवान्को धन, वस्त्र, आभूषण आदि कुछ भी नहीं चाहिये। उन्हें तो मात्र हृदयकी भक्ति एवं शुद्ध प्रेम चाहिये१। इसलिये जीव! तुम भगवान्से दूर क्यों रहते हो! हजारों जन्मोंके बाद इस कर्मभूमिमें दुर्लभ मानव-रूपमें जन्म लेकर जो व्यक्ति श्रीविष्णुकी आराधना और जलधेनुका दान
नहीं करता, उस व्यक्ति का यह जन्म ही व्यर्थ है। वह व्यक्ति मायाके जालमें पड़ा रहता है। मुद्गल-ऋषिने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर कहा कि 'मनुष्यो! मैं पुकार-पुकारकर कहता हूँ कि आपलोगोंको दोनों लोकोंमें कल्याण प्राप्त करनेके लिये श्रीविष्णुभगवान्की आराधना और जलधेनुका दान करना चाहिये। नरककी यातना अति दुःखदायिनी है, इसे मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है। विचार करनेपर यह सत्य ही मालूम पड़ता है कि उस दुःखसे बचनेके लिये भगवान् विष्णुमें अपने मनको लगाना चाहिये, यही श्रेयस्कर उपाय है२।' (अध्याय १५३)
घृतधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं घृतधेनुदान और घृतधेनु-निर्माणकी विधि बता रहा हूँ, इसे आप प्रेमपूर्वक सुनें। गायके घीसे भरे हुए कलशोंको गायकी आकृतिमें बनाकर उन्हें गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर श्वेत वस्त्रसे भलीभाँति ढँक दे और दोहन-स्थानपर कांस्यकी दोहनी रख दे। पैरोंकी जगहपर ईखके डंडे, खुरकी जगहपर चाँदी, आँखके स्थानपर सोना, सींगोंके स्थानपर अगरकाष्ठ, दोनों बगलमें सप्तधान्य, गलकम्बलके स्थानपर ऊनी वस्त्र, नासिकाके स्थानपर तुरस्कदेशीय कपूर, स्तनोंके स्थानपर फल, जिह्वाके स्थानपर शर्करा, मुखके स्थानपर दूधमिश्रित गुड़, पूँछकी जगहपर रेशमी वस्त्र तथा रोओंकी जगहपर सफेद (गौर) सरसों और पीठकी जगहपर ताम्रपात्र स्थापित करे। इस प्रकारसे घृतधेनुकी रचना करे। इसी प्रकार
घृतधेनुके पास ही घृतधेनु-वत्सकी भी कल्पना करे। तदनन्तर विधिपूर्वक घृतधेनुकी प्रतिष्ठा कर भलीभाँति पूजन करे और इस प्रकार कहे— आज्यं तेजः समुद्दिष्टमाज्यं पापहरं परम्। आज्यं सुराणामाहारः सर्वमाज्ये प्रतिष्ठितम्॥ त्वं चैवाज्यमयी देवि कल्पितासि मया किल। सर्वपापापनोदाय सुखाय भव भामिनि॥
(उत्तरपर्व १५४।८-९)
'घृतको तेजोवर्धक तथा पापापहारी बतलाया गया है। देवताओंका आहार घृत ही है, सभी कुछ घृतमें ही प्रतिष्ठित है, इसलिये घृतमयी देवि! तुम मेरे द्वारा घृतकुण्डोंमें कल्पित की गयी हो, मेरे पापोंको नष्टकर मुझे आनन्द प्रदान करो।'
ऐसा कहकर दक्षिणासहित घृतधेनुका दान ब्राह्मणको दे दे और कहे कि ब्राह्मणदेवता! मेरा उपकार करनेके लिये आप इस आज्यमयी धेनुको
१-यो न वितर्द्धिविभवेन वासोभिर्न भूषणैः। तुष्यते हृदयेनैव कस्तमीशं न पूजयेत्॥ (उत्तरपर्व १५३।६५)
२-महर्षि मुद्गलप्रोक्त मुद्गलपुराण सभी उपपुराणोंमें बड़ा है और इनकी धर्मनिष्ठा एवं भक्तिकी विशिष्ट कथा महाभारतके सङ्कप्रस्थीय मुद्गलोपाख्यानमें भी अतीव आकर्षक है। धर्मकी उपेक्षाके कारण मुद्गलपुराण अब प्रायः लुप्त-सा हो रहा है। ऐसे ही गणेशपुराण भी लुप्त-सा हो रहा है। समर्थ व्यक्तियोंको इन दोनोंको प्रकाशित करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिये।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
ग्रहण करें। उस दिन घृतका ही आहार करना चाहिये। इसी विधिसे नवनीत (मक्खन)-धेनुका भी दान करना चाहिये। घृतधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति उस लोकमें निवास करता है, जहाँ घी और दूधकी नदियाँ बहती हैं। वह व्यक्ति अपने सात पीढ़ीके लोगोंका भी उद्धार कर देता है। ये
फल तो सकाम दान देनेवाले व्यक्तियोंके हैं, किंतु जो व्यक्ति निष्कामभावसे घृतधेनुका दान करता है, वह निष्कलमष होकर परम पदको प्राप्त करता है। घृत सर्वदेवमय है, इसलिये घृतके दानसे सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
(अध्याय १५४)
लवणधेनुदान-विधि
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आप इस प्रकारके दानकी विधिका वर्णन करें, जिसे करनेसे सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाय एवं सभी पापोंका नाश हो जाय और सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँ तथा व्यक्ति शुद्ध हो जाय।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सभी दानोंमें लवणधेनुका दान उत्तम है। इससे ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपत्नीगमन, विश्वासघात, क्रूरता आदि अनेक प्रकारके पापोंका आचरण करनेवाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है। वह धन, धान्य, पुत्र, पौत्र एवं सुख प्राप्त कर दीर्घायु होकर इस संसारके सुखको भोगकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। अब मैं इस लवणधेनुदानकी विधिको बता रहा हूँ—
भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर कुश बिछा दे तथा उसके ऊपर मेषका चर्म बिछा दे। उसपर पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे। चाहे कोई मनुष्य धनी हो या गरीब प्रायः एक आदक अर्थात् चार सेर लवण रखकर उसमें धेनुकी कल्पना करनी चाहिये। सुवर्णमण्डित चन्दनकाष्ठके सींग, चाँदीके खुर, ईखके पैर, फलोंके स्तन, शर्कराकी जिह्वा, चन्दनकी नासिका, सीपके कान, मोतियोंकी आँखोंकी कल्पना कर उसके कपोलमें सत्कुपिण्ड, मुखमें जौ, दोनों पार्श्वोंमें तिल और गेहूँ—इस प्रकार
सप्तधान्य उस लवणधेनुके अङ्गोंमें स्थापित करे। इसी प्रकार ताप्रसे पीठ, गुडपिण्डसे अपान-देश, कम्बलसे पूँछका, अंगूरसे चार स्तनोंका, मधुर फलों एवं मधुसे योनिदेशकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त सामग्रियोंसे लवणधेनुकी रचनाकर सेरभर नमकके मानसे उसके वत्सकी कल्पना करे। धेनु तथा बछड़ेको वस्त्र-आभूषण आदिसे अलंकृत करे। तदनन्तर स्वयं स्नान कर देवताओं और ब्राह्मणकी पूजा करे। स्त्री-पुत्रके साथ गायकी पूजा एवं प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे—
लवणे वै रसाः सर्वे लवणे सर्वदेवताः।
सर्वदेवमये देवि लवणाख्ये नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १५५।१८)
‘लवणमें सभी रस निहित हैं। सभी देवताओंका निवास लवणमें रहता है, इसलिये सर्वदेवमयी लवणधेनु! आपको मेरा नमस्कार है।’
अनन्तर दक्षिणाके साथ वह धेनु ब्राह्मणको समर्पित कर दे। राजन्! लवणधेनुका दान करनेसे सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा और सभी यज्ञों तथा दानोंका भी फल प्राप्त हो जाता है। इस विधिसे जो व्यक्ति रसमयी लवणधेनुका दान करता है, उसे सौभाग्य, सुख, आरोग्य, सम्पत्ति, धन-धान्यकी प्राप्ति होती है तथा वह प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। (अध्याय १५५)
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- उत्तरपर्व *
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सुवर्णधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सुवर्णधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। पचास पल (प्रायः तीन किलो), पचीस पल अथवा जितनी भी सामर्थ्य हो उस मानमें शुद्ध सुवर्णसे रत्नजटित सुन्दर कपिला सुवर्णधेनुकी रचना करनी चाहिये। उसके चतुर्थशसे उसका वत्स बनाये। गलेमें चाँदीकी घंटी लगाये, रेशमी वस्त्र ओढ़ाये, इसी प्रकार हीरेके दाँत, वैदूर्यका गलकम्बल, ताँबेके सींग, मोतीकी आँखें और मूँगेकी जीभ बनाये। कृष्णमृगचर्मके ऊपर एक प्रस्थ गुड रखकर उसके ऊपर सुवर्णधेनुको स्थापित करे। अनेक प्रकारके फलयुक्त आठ कलश, अठारह प्रकारके धान्य, छाता, जूता, आसन, भोजन-सामग्री, ताँबेका दोहनपात्र, दीपक, लवण, शर्करा आदि स्थापित करे। तदनन्तर स्नान कर सुवर्णधेनुकी प्रदक्षिणा कर उसकी भलीभाँति पूजा करे। पूजनके अनन्तर प्रार्थनापूर्वक उस सुवर्णधेनुको दक्षिणा तथा सभी उपस्करणोंके साथ ब्राह्मणको दान करे।
राजन्! गौके जिस अङ्गमें जो देवता, मनु एवं तीर्थ निवास करते हैं वे इस प्रकार हैं*—नेत्रोंमें सूर्य और चन्द्रमा, जिह्वामें सरस्वती, दाँतोंमें मरुद्रण, कानोंमें अश्विनीकुमार, सींगके अग्रभागमें रुद्र और ब्रह्मा, ककुदमें गन्धर्व और अप्सराएँ, कुक्षिमें चारों समुद्र, योनिमें गङ्गा, रोमकूपोंमें ऋषिगण, अपानदेशमें पृथ्वी, आँतोंमें नाग, अस्थियोंमें पर्वत, पैरोंमें चतुर्विध पुरुषार्थ, हुंकारमें चारों वेद, कण्ठमें रुद्र, पृष्ठभागमें मेरु और समस्त शरीरमें भगवान् विष्णु निवास करते हैं। इस प्रकार यह सुवर्णधेनु सर्वदेवमयी और परम पवित्र है।
जो व्यक्ति सुवर्णधेनुका दान करता है, वह मानो सभी प्रकारके दान कर लेता है। इस कर्मभूमिमें यह दान बहुत दुर्लभ है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक काञ्चनधेनुका दान करना चाहिये। इससे संसारसे उद्धार हो जाता है और कीर्ति तथा शान्तिकी प्राप्ति होती है एवं उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और अन्तमें उसे शिवलोककी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १५६)
रत्नधेनुदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं गोलोक प्राप्त करानेवाले अत्युत्तम रत्नधेनुदानकी विधि बता रहा हूँ। किसी पुण्य दिनमें भूमिको पवित्र गोबरसे लीपकर उसमें धेनुकी कल्पना करे। पृथ्वीपर कृष्णमृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके ऊपर विधिपूर्वक
संकल्पसहित रत्नमयी धेनु स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुखमें इक्यासी पद्मरागमणि तथा चरणोंमें पुष्पराग स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलक, उसकी दोनों आँखोंमें सौ मोती, दोनों भौंहोंपर सौ मूँगा और दोनों कानोंकी जगह दो सीपें लगाये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये।
- नेत्रयोः सूर्यशशिनी जिह्वायां तु सरस्वती। दन्तेषु मरुतो देवाः कर्णयोश्च तथाश्चिनी ॥
शुङ्गाग्रयो सदा चास्या देवी रुद्रपितामही। गन्धर्वाप्सरसश्चैव ककुर्देशं प्रतिष्ठिताः ॥
कुक्षौ समुद्राश्चत्वारो योनी त्रिपथगामिनी ॥
ऋषयो रोमकूपेषु अपाने वसुधा स्थिता। अन्नेषु नागा विज्ञेयाः पर्वताश्चास्थिषु स्थिताः ॥
धर्मकामार्थमोक्षास्तु पादेषु परिसंस्थिताः। हुंकारे च चतुर्वेदाः कण्ठे रुद्राः प्रतिष्ठिताः ॥
पृष्ठभागे स्थितो मेरुर्विष्णुः सर्वशरीरगः। एवं सर्वमयी देवी पावनी विश्वरूपिणी ॥ (उत्तरपर्व १५६। १६-२०)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदूर्य (बिल्लौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)-की लड़ियोंसे युक्तकर तथा दोनों नाकोंकी सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियोंसे रचनाकर कर्पूर और चन्दनसे चर्चित करे। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रत्नोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा स्तनोंके पास ताँबेकी दोहनी रखनी चाहिये।
इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनाना
चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये—‘देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, चन्द्रमा, ब्रह्मा, तथा विष्णु—ये सभी तुम्हें देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त है, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा शीघ्र ही उद्धार करो।’ इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी पूजा तथा परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम करके उस रत्नधेनुका दान ब्राह्मणको दक्षिणाके साथ करे, अन्तमें क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह शिवलोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है तथा पुनः बहुत समयके बाद इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है और उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय १५७)
उभयमुखी धेनु-दानका माहात्म्य
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—प्रभो! उभयमुखी अर्थात् प्रसवके समयमें गौका दान किस प्रकार करना चाहिये और उसके दानका क्या फल है। इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उभयमुखी गौ-दानका संयोग बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। जबतक बछड़ेके पैर प्रसवके समय भीतर हों और केवल सिर बाहर दिखलायी दे, उस समय वह गौ मानो साक्षात् सप्तद्वीपवती पृथ्वी है। ऐसी उभयमुखी गौके दानके फलका वर्णन शक्य नहीं। यज्ञ और दान करनेसे जो फल प्राप्त नहीं होता, वह फल
केवल उभयमुखी धेनुके दानसे ही प्राप्त हो जाता है और दाताका उद्धार हो जाता है। सींगोंको स्वर्णसे, खुरोंको चाँदीसे तथा पूँछको मोतीकी मालाओंसे अलंकृतकर जो उभयमुखी धेनुका दान करता है, वह गौ और बछड़ेके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्षतक स्वर्गमें पूजित होता है तथा अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो व्यक्ति सुवर्णसहित उभयमुखी धेनुका दान करता है, उसके लिये गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाता है। दुर्बल, अङ्गहीन गौ और दक्षिणासे रहित दान नहीं करना चाहिये।
(अध्याय १५८)
१-इतने बहुमूल्य रत्नोंका दान करनेके उल्लेखसे लोभ, धूर्तता या असम्भावनाकी कल्पनाकर चकित नहीं होना चाहिये, क्योंकि पूर्ण धर्माचरण, देवाराधन और ईमानदारी तथा परस्पर उपकारकी भावनासे भारत ऐसा ही समृद्ध था कि कोई वस्तु दाम लेकर नहीं बेची जाती थी। इस बातको ‘कल्याण’ के ‘हिन्दू संस्कृति-अङ्क’ से लेकर १९६८ के कई साधारण अङ्कोंमें बार-बार प्रमाणोंद्वारा सिद्ध किया गया है।
२-अन्य पुराणोंमें भी इसका महत्त्व आया है और इसकी परिक्रमासे सप्तद्वीपवती पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य बतलाया गया है।
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- उत्तरपर्व *
५७७
गोसहस्रदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—जनार्दन! आप गोसहस्रदानका विधान बतायें। यह किस समय किस विधिसे किया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रजेश्वर! गौएँ सम्पूर्ण संसारमें पवित्र हैं और गौएँ ही उत्तम आश्रयस्थान हैं। संसारकी आजीविकाके लिये ब्रह्माजीने इनकी सृष्टि की है। तीनों लोकोंके हितकी कामनासे गौकी सृष्टि प्रथम की गयी है। इनके मूत्र और पुरीषसे देवमन्दिर भी पवित्र हो जाते हैं औरोंके लिये तो कहना ही क्या! गौएँ काम्य यज्ञोंकी मूलाधार हैं, इनमें सभी देवताओंका निवास है। गोमयमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास है। ब्राह्मण और गौ—दोनों एक ही कुलके दो रूप हैं। एकमें मन्त्र अधिष्ठित हैं और एकमें हविष्य-पदार्थ। इन्हीं गौओंके पुत्रोंके द्वारा सारे संसार और देवताओंका भरण-पोषण होता है। राजन्! आप ऐसी विशिष्ट गुणमयी गौके दानका विधान सुनें। एकमात्र सर्वगुण तथा सर्वलक्षणसम्पन्न गौका दान करनेपर समस्त कुटुम्ब तर जाता है, फिर यदि अधिक गौएँ दानमें दी जायें तो उनके माहात्म्यके विषयमें क्या कहा जाय?
प्राचीन कालमें महाराज नहुष और महामति ययातिने भी सहस्रों गौओंका दान किया था, जिसके प्रभावसे वे ब्रह्म-स्थानको प्राप्त हो गये। पुत्रकी कामनासे देवी अदितिने भी गङ्गाजीके तटपर अपार गोदान किया था, जिसके फलस्वरूप उन्होंने तीनों लोकोंके स्वामी नारायण (भगवान् वामन—उपेन्द्र)—को पुत्ररूपमें प्राप्त किया।
राजन्! ऐसा सुना जाता है कि पितृगण इस प्रकारकी गाथा गाते हैं—क्या मेरे कुलमें ऐसा
कोई पुण्यात्मा पुत्र होगा, जो सहस्रों गौओंका दान करेगा, जिसके पुण्यकर्मसे हम सब परमसिद्धिको प्राप्त कर सकेंगे अथवा हमारे कुलमें सहस्रों गोदान करनेवाली कोई दुहिता (कन्या) होगी, जो अपने पुण्य-कर्मके आधारपर मेरे लिये मोक्षकी सीढ़ी तैयार कर देगी?
राजन्! अब मैं शास्त्रोक्त सार्वकामिक गोसहस्रदानरूप यज्ञकी विधि बता रहा हूँ। दाता किसी तीर्थस्थान अथवा गोष्ठ या अपने घरपर ही दस अथवा बारह हाथका लम्बा-चौड़ा एक सुन्दर मण्डप बनवाये। उसमें तोरण लगाये जायें। उसके चारों दिशाओंमें चार दरवाजे लगाये जायें। मण्डपके मध्यमें चार हाथकी एक सुन्दर बेदी बनाये। इस बेदीके पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण)—में एक हाथके प्रमाणकी ग्रहवेदीका निर्माण करे। ग्रहयज्ञके विधानसे उसपर क्रमसे ग्रहोंकी स्थापना करे। सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी अर्चना करनी चाहिये। यज्ञके लिये ऋत्विजोंका वरण, पुनः वेदीके पूर्वोत्तर-भागमें एक शिव-कुण्डका निर्माण कर द्वार-प्रदेशमें पल्लवोंसे सुशोभित दो-दो कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और उनमें पञ्चरत्न डाल देना चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। तुलापुरुषदानके समान इसमें भी लोकपालोंके निमित्त बलि-नैवेद्य प्रदान करना चाहिये। सहस्रों गौओंमेंसे सवत्सा दस गौओंको अलग कर उन्हें वस्त्र और माला आदिसे खूब अलंकृत कर ले। इन दसों गौओंके मध्य जाकर विधिपूर्वक सबकी पूजा करे। इनके गलेमें सोनेकी घंटी, ताँबेके दोहनपात्र, खुरोंमें चाँदी और मस्तकको सुवर्ण-तिलकसे अलंकृतकर सींगोंमें भी सोना लगा दे।
१-यासां मूत्रपुरीषेण देवतायतनायपि । शुचीनि समजयन्त किं भूतमधिकं ततः ॥ (उत्तरपर्व १५९।३)
२-दुहिता वा कुले काचिद् गोसहस्रप्रदायिनी । सोपानः सुगतिर्दत्तो भविष्यति न संशयः ॥ (उत्तरपर्व १५९।१४)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गोमाताके चतुर्दिक् चमर डुलाना चाहिये। इसी प्रसंगमें मुनियोंने सुवर्णमय नन्दिकेश्वर (वृषभ)-को लवणके ऊपर रखकर अथवा प्रत्यक्ष वृषभके भी दानका विधान बतलाया है। इस प्रकार दस-दस गौके क्रमसे गौसहस्र या गौशत दान करना चाहिये। यदि संख्यामें सम्पूर्ण गौएँ उपलब्ध न हो सकें तो दस गौओंकी पूजा कर शेष गौओंकी परिकल्पना कर उनका दान करना चाहिये१।
तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस प्रकार उच्चारण करे—‘विश्वमूर्तिस्वरूप विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूप गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीसों भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपा२ माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागमें रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभागमें रहें, गौएँ नित्य मेरे चारों ओर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ३। चूँकि तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो!’ इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामग्रियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर
दे तथा उन दसों गौओंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गौ प्रत्येक ऋत्विजको समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणोंको दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये, क्योंकि वह दोषप्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोन्नत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने।
यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस गौसहस्रदानसे पुरुष अपने इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। गोदानमें गौ, पात्र, काल एवं विधिका विशेषरूपसे विचार करना चाहिये। (अध्याय १५९)
वृषभदानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—जनार्दन! आपकी हृदयमें एक कौतूहल है। तीनों लोकोंमें यह प्रसिद्धि अमृतमयी वाणीसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, मेरे है कि गौओंका स्वामी—गोपति (वृषभ)
१-भविष्यपुराणमें बार-बार गौओंकी अपार महिमा और गौसहस्रदान आदिकी विधिका निर्देश यही सूचित करता है कि भारत गो-भक्त देश था और यहाँ दूध-दहीकी सचमुच नदियाँ बहती थीं। कृष्णके व्रजमें गो-चारणकी कथा और वहाँकी अद्भुत गो-सम्पत्तिकी कथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज जो भारत कंगाल-सा बन गया है तथा रत्नदान, सुवर्णशृङ्खली सहस्र गोदान आदिकी बातें कल्पना-सी लगती होंगी, वह सब शास्त्रोंकी उपेक्षा और गो-भक्ति-शून्यताका ही परिणाम है।
२-वाजसने० ८।४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।
३-गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः। गावो मे सर्वतः सन्तु गावां मध्ये वसाय्यहम्॥ (उत्तरपर्व १५९।३३)
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- उत्तरपर्व *
५७९
गोविन्दस्वरूप है, अतः प्रभो! ऐसे महनीय वृषभदानका फल बतानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! सुनिये, यह वृषभदान पवित्रोंमें पवित्रतम और दानोंमें सबसे उत्तम दान है। एक स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट वृषभके दानका फल दस धेनुओंके दानसे अधिक है। हृष्ट-पुष्ट, युवा, सुन्दर, सुशील, रूपवान् और ककुद्मान् एक ही शुभ लक्षणसम्पन्न वृषभके दानसे उस दान करनेवाले व्यक्तिके सभी कुलोंका उद्धार हो जाता है। पुण्यपर्वके दिन वृषभकी पूछमें चाँदी लगाकर तथा भलीभाँति उसे अलंकृत कर दे, तदनन्तर दक्षिणाके साथ उस वृषका दान ब्राह्मणको देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारकः। अष्टमूर्तरधिष्ठानमतः पाहि सनातन॥
(उत्तरपर्व १६०।९)
इस विधिसे वृषभदान करनेवाले व्यक्तिके सात जन्म पहलेके किये गये समस्त पाप इसके
प्रभावसे उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं और अन्तमें वह व्यक्ति वृषभयुक्त कामचारी दिव्य विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें चला जाता है। महीपते! उस वृषभके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने हजार वर्षतक वह गोलोकमें पूजित होता है, इसके बाद गोलोकसे अवतीर्ण होकर इस लोकमें उत्तम कुलीन ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वह व्यक्ति यज्ञ करनेवाला, महान् तेजस्वी और सभी ब्राह्मणोंद्वारा पूजित होता है। महाराज! आपने जो यह पूछा कि यह उत्तम वृषभदान किसे करना चाहिये, उसके विषयमें मैं बतला रहा हूँ। जो ब्राह्मण शान्तिचित्त, जितेन्द्रिय, वेदवेत्ता, अहिंसक और प्रतिग्रहसे डरनेवाला, मनुष्योंका उद्धार करनेमें समर्थ तथा गृहस्थ हो। उसे दृढ़, पुष्ट, बलवान्, भारवहन करनेमें समर्थ और सब गुणोंसे युक्त उत्तम वृष प्रदान करना चाहिये। इस प्रकारसे एक वृषभका दान दस धेनुदानसे भी अधिक फलप्रद है। (अध्याय १६०)
कपिलादानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—जगत्पते! अब आप कपिलादानका माहात्म्य बतलानेकी कृपा करें, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाला एवं दानोंमें परम पुण्यप्रद है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महामते! इस सम्बन्धमें प्राचीन कालमें विनताश्वने भगवान् वाराह एवं धरणीदेवीके जिस संवादको मुझे बताया था उसे आप सुनें। धरणीदेवीके पूछनेपर भगवान् वाराहने कहा कि 'भद्रे! कपिला गौके दान करनेसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है तथा यह परम पवित्र है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने सम्पूर्ण तेजोंका सार एकत्र कर यज्ञोंमें अग्निहोत्रकी सम्पन्नताके लिये कपिला गौकी रचना की थी। कपिला गौ पवित्रोंको
पवित्र करनेवाली, मङ्गलोंका मङ्गल तथा परम पूज्यमयी है। तप इसीका रूप है, व्रतोंमें यह उत्तम व्रत, दानोंमें उत्तम दान तथा निधियोंमें यह अक्षय निधि है। पृथ्वीमें गुप्त रूपसे या प्रकट रूपसे जितने पवित्र तीर्थ हैं एवं सम्पूर्ण लोकोंमें द्विजातियोंद्वारा सायंकाल और प्रातःकाल अग्निहोत्र आदि हवनकी जो भी क्रियाएँ हैं, वे सभी कपिला गायके घृत, क्षीर तथा दहीसे होती हैं। भामिनि! कपिलाके सिर और ग्रीवामें सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उसके गले एवं मस्तकके गिरे हुए जलको श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करता है, वह पवित्र हो जाता है और उसी क्षण उसके पाप भस्म हो जाते हैं।
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५८०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
प्रातःकाल उठकर जिसने कपिला गौकी प्रदक्षिणा की, उसने मानो सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर ली। वसुन्धरे! कपिला गौकी एक प्रदक्षिणा करनेपर भी दस जन्मके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। पवित्र व्रतके आचरण करनेवाले पुरुषको कपिला गौके मूत्रसे स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मानो गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान कर चुका। भक्तिपूर्वक एक बार कपिलाके गोमूत्रसे स्नान करनेपर मनुष्यके जीवनभरके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। एक हजार गौके दानका फल एक कपिला गौके दानके समान है। गौओंकी यज्ञपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गौके दूध-दही, घृत, गोमूत्र, गोमय आदिको अपवित्र नहीं करना चाहिये। गौओंके शरीरको खुजलाना और उनकी सेवा करना परम श्रेष्ठ धर्म माना गया है। गौके भय एवं रोगकी स्थितिमें उसकी भलीभाँति सेवा करनी चाहिये। जो गौओंके चरनेके लिये हरी-भरी गोचरभूमिका दान करता है, वह दिव्य स्वर्गवासका फल प्राप्त करता है। साक्षात् ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। इस कपिला गौका जो श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करता है, वह अप्सराओंसे अलंकृत दिव्य विमानपर प्रतिष्ठित होकर स्वर्ग जाता है। सोनेके समान रंगवाली कपिला पहली श्रेणीकी है और गौर पिङ्गलवर्णवाली दूसरी श्रेणीकी। तीसरी लाल-पीले नेत्रवाली, चौथी अग्रिके समान नेत्रवाली, पाँचवीं जुहूके समान वर्णवाली, छठी घीके समान पिङ्गलवर्णवाली, सातवीं उजली-पीली, आठवीं दुग्धवर्णके समान पीली, नवीं पाटलवर्णवाली तथा दसवीं पीले पृच्छवाली*। ये सभी कपिलाएँ संसार-सागरसे उद्धार कर देती हैं, इसमें संशय नहीं। जो शुद्ध होकर कपिलाका
दान लेता है और उसका दूध पीता है, वह पतित होकर चण्डाल हो जाता है और अन्तमें नरकमें जाता है। इसलिये किसी ब्राह्मणेतरको कपिलाका दान नहीं लेना चाहिये। श्रोत्रिय, धनहीन, सदाचारी तथा अग्रिहोत्री ब्राह्मणको एक कपिला गौका दान करनेसे दाता सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।
गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि दान देनेके लिये जल्दी ही प्रसव करनेवाली धेनुका पालन करे। जिस समय वह कपिला धेनु आधा प्रसव करनेकी स्थितिमें हो जाय, उसी समय उसे ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये। जब उत्पन्न होनेवाले बछड़ेका मुख योनिके बाहर दीखने लगे और शेष अङ्ग अभी भीतर ही रहें अर्थात् अभी पूरे गर्भका उसने मोचन (बाहर) नहीं किया, तबतक वह धेनु सम्पूर्ण पृथ्वीके समान मानी जाती है। वसुन्धरे! ऐसी गायका दान करनेवाले पुरुष ब्रह्मवादियोंसे सुपूजित होकर ब्रह्मलोकमें उतने करोड़ वर्षांतक निवास करते हैं, जितनी कि धेनु और बछड़ेके रोमोंकी संख्याएँ होती हैं। सोनेसे सींग तथा चाँदीसे खुरको सम्पन्न करके कपिला गौका दान करते समय उस धेनुका पुच्छ ब्राह्मणके हाथपर रख दे। हाथपर जल लेकर शुद्ध वाणीमें ब्राह्मणसे संकल्प पढ़वावे। जो पुरुष इस प्रकार (उभयमुखी गौका) दान करता है, उसने मानो समुद्रसे घिरी तथा पर्वतों, वनों एवं रलोंसे परिपूर्ण समूची पृथ्वीका दान कर दिया—इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा मनुष्य इस दानसे निश्चय ही पृथ्वीदानके तुल्य फलका भागी होता है। वह अपने पितरोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान् विष्णुके परम धाममें पहुँच जाता है। ब्राह्मणका धन छीननेवाला, गोघाती अथवा गर्भपात करानेवाला, दूसरोंको ठगनेवाला, वेदनिन्दक, नास्तिक, ब्राह्मणोंका
- कपिलाके भेदों एवं उनकी अपार महिमाका वर्णन महाभारतके वैष्णवधर्मपर्वमें हुआ है, जो आश्वमेधिकपर्वका अन्तिम भाग है। पाणिनि-व्याकरण (५।२।९७)-के गणपाठके अनुसार कपि अर्थात् बन्दरके समान वर्णवाली गायको कपिला कहते हैं।
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- उत्तरपर्व *
५८१
निन्दक और सत्कर्ममें दोषदृष्टि रखनेवाला महान् पापी समझा जाता है। किंतु ऐसा घोर पापी भी बहुतसे सुवर्णोंसे युक्त उभयमुखी कपिलाके दानसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। दाताको चाहिये कि उस दिन खीरका भोजन करे अथवा दूधके ही सहारे रहे।
जो इस प्रकार उभयमुखी कपिला गौका दान करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर समाहितचित्तसे तीन बार भक्तिपूर्वक इस कल्प— 'गोदान-विधान' को पढ़ता है, उसके वर्षभरके
किये हुए पाप उसी क्षण इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वायुके झोंकेसे धूलके समूह। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर इस परम पावन प्रसङ्गका पाठ करता है, उस बुद्धिमान् पुरुषके अन्तरमें दिव्य संस्कार भर जाते हैं और पितर उसकी वस्तुओंको बड़े प्रेमसे ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको ब्राह्मणोंके सम्मुख इसका पाठ करता है, उसके पितर सौ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं। जो पुरुष मन लगाकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसके सौ वर्षोंके पाप नष्ट हो जाते हैं।
(अध्याय १६१)
महिषी एवं मेघी-दानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—'राजन्! अब मैं पापनाशक, पुण्यप्रद तथा आयु और सुखप्रदायक महिषीके दानकी विधि बता रहा हूँ। सूर्य-चन्द्रग्रहण, कार्तिक-पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी आदि पर्व-दिनोंमें अथवा जब भी सामर्थ्य हो, उसी समय सांसारिक दुःखकी निवृत्तिके लिये महिषी-दान करना चाहिये। शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अलंकृत महिषी उत्तम विद्वान् ब्राह्मणको देनी चाहिये। दान देनेके समय इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—
इन्द्रादिलोकपालानां या राजमहिषी शुभा। महिषीदानमाहात्म्यात् सास्तु मे सर्वकामदा॥ धर्मराजस्य साहाय्ये यस्य पुत्रः प्रतिष्ठितः। महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम॥
(उत्तरपर्व १६२।१-१०)
'जो इन्द्रादि लोकपालोंकी कल्याणकारिणी राजमहिषी है और धर्मराजकी सहायता करनेके लिये जिसका पुत्र (महिष) उनका वाहन बना हुआ है तथा जो महिषासुरकी जननी है, वह मेरे लिये वरदायिनी हो। इस महिषी-दानसे मेरी
सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जायें।'
प्रदक्षिणाके पश्चात् पृष्ठभागसे महिषीका दान करना चाहिये। वस्त्र, आभूषण और दक्षिणाके साथ महिषी ब्राह्मणको देकर विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति महिषीका दान करता है, वह इस लोक तथा परलोकमें वाञ्छित फल प्राप्त करता है।
महाराज! इसी प्रकार मेघी-दान भी सभी पापोंको दूर करनेवाला है। एक सुवर्णमयी मेघीकी प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम भूषण, रेशमी वस्त्र, चन्दन, पुष्पमाला आदिसे अलंकृतकर अथवा प्रत्यक्ष मेघीको अलंकृतकर उसका दान करना चाहिये। ग्रहण, विधुवयोग, अयनसंक्रान्ति आदि पवित्र दिनोंमें, दुःस्वप्न देखनेपर, अमावास्यामें अथवा जब भी श्रद्धा हो तब इसका दान करना चाहिये। दानके समय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-गायत्री, लक्ष्मी-नारायण तथा रति-कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, साथ ही लोकपालों और ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके बाद
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५८२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मेघीकी प्रतिमाको तिलके कलशपर स्थापित कर उसके सामने नमक रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और गृहस्थ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इस दानके प्रभावसे निःसंतानको पुत्र और निर्धनको
धन प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस दानकी विधिको सुनता है, वह भी अहोरात्रमें किये गये पापोंसे छूट जाता है।
(अध्याय १६२-१६३)
भूमिदानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले भूमिदानकी विधि बतला रहा हूँ। जो अग्निहोत्री दरिद्र-कुटुम्बी तथा वैदिक ब्राह्मणको दक्षिणासहित भूमिका दान करता है, वह बहुत समयतक ऐश्वर्यका भोग कर अन्तमें दिव्य विमानमें बैठकर विष्णुलोकको जाता है। जबतक उसके द्वारा प्रदत्त भूमिपर अंकुर उपजते रहते हैं, तबतक भूमिदाता विष्णुलोकमें पूजित होता है। भूमिदानके अतिरिक्त और कोई भी दान विशिष्ट नहीं माना गया है। पुरुषर्षभ! अन्य दान कालक्रमसे क्षीण हो जाते हैं, परंतु भूमिदानका पुण्य क्षीण नहीं होता। जो व्यक्ति सस्यसम्पन्न भूमिका दान करता है, वह जबतक भगवान् सूर्य रहेंगे, तबतक सूर्यलोकमें पूजित होता रहेगा। धन-धान्य, सुवर्ण, रत्न, आभूषण आदि सब दान करनेका फल भूमिदान करनेवाला प्राप्त कर लेता है। जिसने भूमिदान किया, उसने मानो समुद्र, नदी, पर्वत, सम-विषम स्थल, गन्ध, रस, क्षीरयुक्त ओषधि, पुष्प, फल, कमल, उत्पल आदि सब कुछ दान कर दिया। दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य भूमिदान करनेसे प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर पुनः उससे वापस नहीं लेना चाहिये। सस्यसम्पन्न भूमिका दान करनेवाले व्यक्तिके पितर प्रलयपर्यन्त संतुष्ट रहते हैं। अपनी आजीविकाके निमित्त जो पाप पुरुषसे होता है,
वे सारे पाप गोचर्म-मात्र* भूमिके दान करनेसे दूर हो जाते हैं। एक हजार स्वर्णमुद्राके दानसे जो फल बतलाया गया है, वही फल गोचर्म-प्रमाणमें भूमिका दान देनेसे प्राप्त हो जाता है। नरोत्तम! हजारों कपिला गौओंके दान करनेके समान पुण्य गोचर्म-मात्र भूमि देनेसे प्राप्त होता है। सगर आदि अनेक राजाओंने भूमिका उपयोग किया है, परंतु अपने-अपने आधिपत्यमें जिसने भी भूमिका दान किया, सभीको उसका फल प्राप्त हुआ। यमदूत, मृत्युदण्ड, असिपत्रवन, वरुणके घोर पाश और रौरवादि अनेक नरक तथा उनकी दारुण यातनाएँ भूमिदान करनेवालेके समीप नहीं आतीं। चित्रगुप्त, मृत्यु, काल, यम आदि सब भूमिदाताकी पूजा करते हैं। राजन्! भगवान् रुद्र, प्रजापति, इन्द्रादि देवता और असुरगण भूमिका दान करनेवालेकी पूजा करते हैं, स्वयं मैं भी उसकी अतीव प्रसन्नतासे पूजा करता हूँ। जिस भाँति माता अपनी संतानका और गौ जैसे अपने वत्सका दूध आदिके द्वारा पालन करती है, उसी प्रकार रसमयी भूमि भी भूमि देनेवालेकी रक्षा और पालन-पोषण करती है। जिस प्रकार जलके सेचनसे बीज अंकुरित होते हैं, उसी प्रकार भूमिदानसे सब मनोरथ अंकुरित होकर सफल सिद्ध होते हैं। जिस प्रकार सूर्यके उदय होते ही उनके प्रकाशसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भूमिके दानसे सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं।
- मध्यमस्य मनुष्यस्य व्यासेन परिसंख्या। त्रिशहण्डांश्च गोचर्म दत्त्वा स्वर्गं महीयते ॥ (उत्तरपर्व १६४।२१)
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- उत्तरपर्व *
५८३
भूमिको दान देकर वापस लेनेवालेको यमदूत वारुणपाशोंसे बाँधकर पूय तथा शोणितसे भरे कुण्डोंमें डालते हैं। अपने द्वारा दी गयी अथवा दूसरे व्यक्तिके द्वारा दी गयी भूमिका जो व्यक्ति अपहरण करता है, वह प्रलयपर्यन्त नरकाग्नियें जलता रहता है। दानमें प्राप्त भूमिके हरण हो जानेपर दुःखित व्यक्तिके रोने-कलपनेसे जितने अश्रुबिन्दु गिरते हैं, उतने हजार वर्षतक भूमिका
हरण करनेवाला नरकमें कष्ट भोगता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर जो व्यक्ति पुनः उस भूमिका हरण करता है, उसे उल्टा लटका कर कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। दिव्य हजार वर्षके बाद वह व्यक्ति कुम्भीपाकसे निकलकर इस भूमिपर जन्म लेता है और सात जन्मतक अनेक प्रकारके कष्टोंको भोगता रहता है। इसलिये भूमिका हरण नहीं करना चाहिये। (अध्याय १६४)
सुवर्णरचित भूदानकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भूमिका दान तो क्षत्रिय ही कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ही भूमिका उपार्जन करनेमें, उसका दान करनेमें और उसके पालन करनेमें समर्थ होते हैं तथा लोगोंसे न तो भूमिका दान हो सकता है, न ही उसका पालन ही हो सकता है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये जो भूमिदानके समकक्ष हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! यदि भूमिका दान सम्भव न हो तो सुवर्णके द्वारा भूमण्डलकी आकृति बनाकर और नदी-पर्वतोंको रेखाङ्कित कर उसे ही दान कर देना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त हो जाता है। अब मैं इसकी विधि बता रहा हूँ।
सूर्य-चन्द्र-ग्रहण, जन्मनक्षत्र, विषुवयोग, युगादि तिथियों तथा अयनसंक्रान्ति आदि पुण्य समयोंमें पापक्षय और यशकी प्राप्तिके लिये इस दानको करना चाहिये। अन्य भी प्रशस्त समयोंमें जब धन एकत्र हो जाय, इस दानको किया जा सकता है। एक सौ पलसे लेकर कम-से-कम पाँच पलतक अर्थात् अपनी सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी जम्बुद्वीपके आकारमें पृथ्वीकी प्रतिमा बनानी चाहिये। जिसके मध्यमें मेरु पर्वत तथा यथास्थान अन्य पर्वत अङ्कित हों। वह पृथ्वी सस्यसम्पन्न तथा लोकपालोंसे
रक्षित, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओंसे सुशोभित और सभी रत्न आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो। बाईस हाथ लम्बा-चौड़ा तोरणयुक्त चार द्वारोंवाला एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें चार हाथकी वेदी बनानी चाहिये। ईशानकोणमें वेदीपर देवताओंका स्थापन करे और अग्निकोणमें कुण्ड बनाये। पताका-तोरण आदिसे मण्डपको सजा ले। अनन्तर पञ्चलोकपाल और नवग्रहोंका षोडशोपचार पूजन करनेके बाद ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग वेदध्वनि करते हुए तथा मङ्गलघोषपूर्वक भेरी, शङ्खु इत्यादि वाद्योंकी ध्वनिके साथ उस सुवर्णमयी पृथ्वीकी प्रतिमाको मण्डपमें लाकर तिल बिछी हुई वेदीपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्न, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चँदोवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनद्वारा अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्न कर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अङ्गलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः। धात्री त्वमसि भूतानामतः पाहि वसुन्धरे॥ वसु धारयसे यस्मात् सर्वसौख्यप्रदायकम्। वसुन्धरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्॥ चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद्यस्मादनं तवाचले। अनन्तायै नमस्तुभ्यं पाहि संसारकर्दमात्॥ त्वमेव लक्ष्मीर्गोविन्दे शिवे गौरीति संस्थिता। गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा॥ बुद्धिवर्हस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता। विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात् ततो विश्वम्भरा मता॥ धृतिः क्षितिः क्षमा क्षोणी पृथिवी वसुधा मही। एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व १६५।२१—२६)
‘वसुन्धरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं और सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके सुखप्रदाता वसुओंको धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा नाम वसुन्धरा है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते, इसलिये
तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रवियें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधारूपमें स्थित हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, क्षिति, क्षमा, क्षोणी, पृथिवी, वसुधा तथा मही—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।’
इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्ति ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीकी सुवर्णमूर्तिका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा शुद्ध घंटिकाओं (घुँघरू)—से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर इस संसारमें आकर वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है।
(अध्याय १६५)
हलपंक्तिदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सर्वपापनाशक तथा सर्वसौख्यप्रद हलपंक्ति-दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे सभी प्रकारके दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। एक हलके लिये चार बैलोंकी आवश्यकता होती है और दस हलोंकी एक पंक्ति होती है। साखूकी लकड़ीसे दस हल बनवाकर उन्हें सुवर्ण-पट्ट और रलोंसे मढ़कर अलंकृत कर ले। वस्त्र, स्वर्ण, पुष्प तथा चन्दन आदिसे मण्डित तरुण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, उत्तम वृष उन हलोंमें जोतने चाहिये। बैलोंके कन्धोंपर जुआ भी रखे, साथमें
कील लगा हुआ अंकुश आदि उपकरण भी रहने चाहिये। पर्वकालमें हलपंक्तिके साथ सस्यसम्पन्न बड़ा ग्राम, छोटा ग्राम अथवा सौ निवर्तन (सौ बीघा) अथवा पचास निवर्तन भूमि देनी चाहिये। इसका दान विशेषरूपसे कार्तिकी, वैशाखी, अयनसंक्रान्ति, जन्मनक्षत्र, ग्रहण, विषुवयोगमें करे। वेदवेत्ता, सदाचारी, सम्पूर्णज्ञ अलंकृत दस ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। दस हाथ प्रमाणवाला एक मण्डप बनाकर उसमें पूर्व दिशामें एक हाथ प्रमाणवाले दो अथवा एक कुण्ड बनावे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंसे पलाशकी समिधा, घी, काला
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- उत्तरपर्व *
५८५
तिल और खीरसे व्याहितियों, पर्जन्यसूक्त, आदित्यसूक्त और रुद्रमन्त्रोंसे हवन कराये। तदनन्तर यजमान स्नानकर शुक्ल वस्त्र आदिसे अलंकृत हो सप्तधान्यके ऊपर हलपंक्तिको स्थापित करे और उसमें बैलोंको जोते। उस समय विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाना चाहिये और ब्राह्मणवर्ग वेद-पाठ करें। यजमान दानके समय पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर इन मन्त्रोंको पढ़े—
यस्माद् देवगणाः सर्वे हले तिष्ठन्ति सर्वदा।
वृषस्कन्धे संनिहितास्तस्माद्भक्तिः शिवेऽस्तु मे ॥
यस्माच्च भूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।
दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्मं चास्तु दृढा सदा ॥
(उत्तरपर्व १६६। १६-१७)
‘चूँकि बैलके कन्धेपर स्थित हलमें सभी देवगण सदा स्थित रहते हैं, अतः भगवान् शंकरमें मेरी भक्ति हो। अन्य समस्त दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाके भी तुल्य नहीं हैं, अतः धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।’ इसके बाद भूमि और हल उन ब्राह्मणोंको
दे दे। इस प्रकार जो व्यक्ति हलपंक्तिका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलोंसहित स्वर्ग जाता है। सात जन्मतक उस व्यक्तिको निर्धनता, दुर्भाग्य, व्याधि आदि दुःख नहीं भोगने पड़ते और वह पृथ्वीका अधिपति होता है। युधिष्ठिर! दान करते समय जो भक्तिपूर्वक इस दानकर्मका दर्शन करता है, वह भी जन्मभर किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस दानको महाराज दिलीप, ययाति, शिबि, निमि तथा भरत आदि सभी श्रेष्ठ राजर्षियोंने किया, जिसके प्रभावसे वे राजा आज भी स्वर्गका सुख भोग रहे हैं। इसलिये भक्तिपूर्वक सभी स्त्री-पुरुषोंको यह दान करना चाहिये। यदि दस हलपंक्तिका दान करनेमें समर्थ न हो तो पाँच, चार अथवा एक ही हलका दान करे। हलपंक्तिका दान करनेवाले हलसे जितनी मिट्टी उठती है और बैलोंके शरीरमें जितने भी रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षतक शिवलोकमें निवासकर अन्तमें पृथ्वीपर श्रेष्ठ राजा होते हैं। (अध्याय १६६)
आपाकदानके प्रसंगमें राजा हव्यवाहनकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कृपाकर आप ऐसा कोई दान बतायें, जिससे मनुष्य धन, पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न हो सके।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं इस सम्बन्धमें एक इतिहास कह रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनिये। किसी समय चन्द्रवंशमें हव्यवाहन नामक एक राजा हुआ था। उसके राज्यमें न कोई उपद्रव होता था और न कोई उसका शत्रु ही था। सभी नीरोग रहते थे। वह बड़ा प्रतापी, स्वस्थ, बली और शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाला था। परंतु पूर्वजन्मके अशुभ कर्मके प्रभावसे उसके पास कोई ऐसा मन्त्री नहीं था जो राज्यको सुचाररूपसे चला सके तथा उसे कोई पुत्र, मित्र या सहायक
बन्धु-बान्धव भी न था। उसे कभी समयसे भोजन आदि भी नहीं मिल पाता था। इस कारण वह राजा सदा चिन्तित रहता था।
एक बार उसके यहाँ पिप्पलादमुनि पधारे। राजाकी पटरानी शुभावतीने मुनिकी श्रद्धापूर्वक पाछ, अर्घ्य आदिसे पूजा की और आसनपर उन्हें बैठाकर निवेदन किया—‘मुनीश्वर! यह निष्कण्टक राज्य तो हमें मिला है, परंतु मन्त्री, मित्र, पुत्र आदि हमें क्यों नहीं प्राप्त हुए। इसका कारण बतानेकी कृपा करें।’ रानीका वचन सुनकर पिप्पलाद-मुनिने कहा—‘देवि! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फल ही अगले जन्ममें प्राप्त होते हैं, यह कर्मभूमि है, अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जिस
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५८६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पदार्थका पूर्वजन्ममें मनुष्यने सम्पादन नहीं किया है, उसे शत्रु, मित्र, बान्धव, राजा आदि कोई भी नहीं दे सकते। पूर्वजन्ममें तुमने राज्यका दान किया था, वह तुम्हें प्राप्त हो गया, परंतु तुमलोगोंने मित्र, भृत्य आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखा, अतः इस जन्ममें ये सब कैसे प्राप्त होंगे ?'
इसपर रानी शुभावती बोली—महाराज ! पूर्वजन्ममें जो हुआ वह तो बीत गया, अब इस समय आप ऐसा कोई व्रत, दान, उपवास, मन्त्र अथवा सिद्धयोग बतानेकी कृपा करें, जिससे मुझे पुत्र, धन, मित्र, भृत्य इत्यादि प्राप्त हो सकें। रानीका वचन सुनकर पिप्पलादमुनि बोले—'भद्रे ! एक आपाक नामका महादान है, जो सभी सम्पत्तियोंका प्रदायक है। श्रद्धापूर्वक कोई भी आपाकका दान करता है तो उसे महान् लाभ होता है। इसलिये तुम श्रद्धासे आपाकदान करो।' मुनिके कथनानुसार रानी शुभावतीने आपाकदान किया। फलतः उसे पुत्र, मित्र, धन और भृत्य प्राप्त हो गये।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज ! अब मैं उस आपाकदानकी विधि बता रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनें। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि ग्रह और ताराबलका विचार कर शुभ मुहूर्तमें अगर, चन्दन, धूप, पुष्प, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदिसे भार्गव (कुम्हार)-का ऐसा सम्मान करे, जिससे वह संतुष्ट हो और उससे निवेदन करे कि महाभाग ! आप विश्वकर्मास्वरूप हैं। आप मेरे लिये सुन्दर छोटे-बड़े मिट्टीके घड़े, स्थाली, कसौरे, कलश आदि पात्रोंका निर्माण करें। भार्गव भी उन पात्रोंको बनाये। तदनन्तर विधिपूर्वक एक आँवों—भट्टी लगाये। अनन्तर उन एक हजार मिट्टीके पात्रोंको आँवेंमें स्थापित कर सार्यकालके समय उसमें अग्नि प्रज्वलित करे
और रात्रिको जागरणकर वाद्य, गीत, नृत्य आदिकी व्यवस्था कर उत्सव मनाये। सुप्रभात होते ही यजमान आँवोंकी अग्नि को शान्तकर पात्रोंको बाहर निकाल ले। अनन्तर स्नानकर श्वेत वस्त्र पहनकर उनमेंसे सोलह पात्रोंको सामने स्थापित करे। रक्त वस्त्रसे उन्हें आच्छादितकर पुष्पमालाओंसे उनका अर्चन करे और ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन आदि कराकर भार्गवका भी पूजन करे। ये पात्र माणिक्य, सोने, चाँदी अथवा मिट्टीतकके हो सकते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियोंकी पूजा कर भाण्डोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये और इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए उन पात्रोंका दान करना चाहिये—
आपाक ब्रह्मरूपोऽसि भाण्डानीमानी जन्तवः । प्रदानात् ते प्रजापुष्टिः स्वर्गश्चास्तु ममाक्षयः ॥ भाण्डरूपाणि यान्यत्र कल्पितानि मया किल । भूत्वा सत्यात्ररूपाणि उपतिष्ठन्तु तानि मे ॥ (उत्तरपर्व १६७।३२-३३)
'आपाक (आँवों) ! आप ब्रह्मरूप हैं और ये सभी भाण्ड प्राणीरूप हैं। आपके दान करनेसे मुझे प्रजाओंसे पुष्टि प्राप्त हो, अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो। मैंने जितने पात्र निर्माण कराये हैं, ये सभी सत्यात्रके रूपमें मेरे समक्ष प्रस्तुत रहें।'
जिसकी इच्छा जिस पात्रको लेनेकी हो उसे वह स्वयं ही ले ले, रोके नहीं। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस आपाकदानको करते हैं, उससे तीन जन्मतक विश्वकर्मा संतुष्ट रहते हैं और पुत्र, मित्र, भृत्य, घर आदि सभी पदार्थ मिल जाते हैं। जो स्त्री इस दानको भक्तिपूर्वक करती है, वह सौभाग्यशाली पतिके साथ पुत्र-पौत्रादि सभी पदार्थोंको प्राप्त कर लेती है और अन्तमें अपने पतिसहित स्वर्गको जाती है। नरेश्वर ! यह आपाकदान भूमिदानके समान ही है।
(अध्याय १६७)
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- उत्तरपर्व *
५८७
गृहदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आप सभी शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं, अतः आप गृहदानकी विधि और महिमा बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! गार्हस्थ्यधर्मसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्यसे बढ़कर कोई पाप नहीं है। ब्राह्मणसे बढ़कर कोई पूज्य नहीं और गृहदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, घोड़ा, गौ, भृत्य आदिसे परिपूर्ण घर स्वर्गसे भी अधिक सुख देनेवाला है। जिस प्रकार सभी प्राणी माताके आश्रयसे जीवित रहते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम भी गृहस्थ-आश्रमपर ही आश्रुत हैं। अपने घर रात्रिको पैर फैलाकर सोनेमें जो सुख है, वह सुख स्वर्गमें भी नहीं। अपने घरमें शाकका भोजन करना भी उत्तम सुख है, इसलिये महाराज! सुन्दर घर बनवाकर ब्राह्मणको देना चाहिये। जो व्यक्ति शैव, वैष्णव, योगी, दीन, अनाथ, अभ्यागत आदिके लिये गृह, धर्मशाला बनाता है, उस व्यक्तिको सभी व्रत और सभी प्रकारके दान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। पक्के ईटसे सुदृढ़, ऊँचा, शुध्रवर्ण, जाली, झरोखा, स्तम्भ, कपाट आदिसे युक्त, जलाशय और पुष्प-वाटिकासे भूषित, उत्तम आँगनसे सुशोभित सुन्दर घर बनाना चाहिये। गृह कछुएकी पीठके समान ऊँचा एवं बरामदोंसे सुसज्जित होना चाहिये। उसे कई मंजिलों तथा गलियों आदिसे समन्वित होना चाहिये। लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा, लकड़ी, मृत्तिका आदिके पात्र, वस्त्र, चर्म, वल्कल, तृण, पाषाण-पात्र, रत्न, आभूषण, गाय, भैंस, घोड़ा, बैल, सभी प्रकारके धान्य, घी, तेल, गुड़, तिल, चावल, ईख, मूँग, गेहूँ, सरसों, मटर, अरहर, चना, उड़द, नमक, खजूर, द्राक्षा, जीरा, धनिया, चूल्हा, चक्की, छलनी,
ऊखल, मूसल, सूप, हाँड़ी, मथानी, झाडू तथा जलकुम्भ आदि ये सब गृहस्थके उपकरण हैं, इनको घरमें स्थापित करनेके बाद शुभ मुहूर्तमें कुलीन एवं शीलसम्पन्न, वेदशास्त्रके जाननेवाले, गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय सपत्नीक ब्राह्मणोंको बुलाकर वस्त्र, गन्ध, आभूषण, पुष्पमाला आदिसे उनका पूजन कर शान्तिकर्मके लिये उनको नियुक्त करना चाहिये। घरके आँगनमें एक मेखलासहित कुण्डका निर्माण करवाना चाहिये। ब्राह्मणोंद्वारा तुष्टि-पुष्टि प्रदान करनेवाला ग्रहयाग करे। ब्राह्मण रक्षोघ्नसूक्त पढ़नेके बाद वास्तु-पूजा कर सभी दिशाओंमें भूतबलि दे। इसके बाद यजमान पुण्य पवित्र घोषके साथ ब्राह्मणोंको दानके निमित्त बनाये गये उन घरोंमें प्रवेश कराये और वहाँ शय्याओंपर उन सपत्नीक ब्राह्मणोंको बिठलाये। जिस घरको पूर्वमें ही जिस ब्राह्मणके लिये नियत किया गया है उसे 'इदं गृहं गृहाण' 'इस गृहको ग्रहण करें' ऐसा कहकर प्रदान करे। ब्राह्मण 'स्वस्ति' कहें और 'कोऽदात्' (यजु० ७।४८) इस मन्त्रका पाठ करें। यदि सामर्थ्य हो तो एक-एक घर ब्राह्मणोंको दे अथवा एक ही घर बनवाकर एक सत्पात्र ब्राह्मणको देना चाहिये। राजन्! शीत, वायु और धूपसे रक्षा करनेवाली तृणमयी कुटी ब्राह्मणोंको देनेपर भी जब सभी कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है और स्वर्ग प्राप्त होता है तो फिर उत्तम घर दान देनेके फलका वर्णन कहँतक किया जा सकता है! गाय, भूमि, सुवर्ण आदिके दान और अनेक प्रकारके यम-नियमोंका पालन गृहदानके सोलहवें भागकी भी बराबरी नहीं कर सकते। जो व्यक्ति सभी सामग्रियोंसहित सुदृढ़ और सुन्दर घर ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १६८)
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५८८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अन्नदानकी महिमाके प्रसंगमें राजा श्वेत और एक वैश्यकी कथा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! किसी समय मुनियोंने अन्नदानका जो माहात्म्य कहा था, उसे मैं कह रहा हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें। अनघ! आप अन्नदान करें, जिससे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है। वनमें श्रीरामचन्द्रजीने दुःखी होकर लक्ष्मणसे कहा था—‘लक्ष्मण! सम्पूर्ण पृथ्वी अन्नसे परिपूर्ण है, फिर भी हमलोगोंको अन्न नहीं मिल रहा है, इससे यही जान पड़ता है कि हमलोगोंने पूर्वजन्ममें ब्राह्मणोंको कभी अन्नका भोजन नहीं कराया’।* मनुष्य जिस कर्मरूपी बीजको बोता है, जैसा कर्म करता है, वह उसीका फल पाता है। संसारमें यह ठीक ही कहा जाता है कि बिना दिये कुछ नहीं मिलता। भोजनयोग्य जिस अन्नका दान किया जाता है, वह अन्नदान परम श्रेयस्कर है। भारत! भोज्य पदार्थोंमें बहुतसे पदार्थ हैं, किंतु अन्नका दान सब दानोंसे श्रेष्ठ दान है। सत्यसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं, संतोषसे बड़ा कोई सुख नहीं और अन्नदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। ज्ञान, अनुलेपन और वस्त्रालंकारोंसे मनुष्योंको वैसी तृप्ति नहीं होती, जैसी भोजनसे होती है। इस विषयमें एक इतिहास है—
राजन्! बहुत पहले एक श्वेत नामके चक्रवर्ती राजा हुए हैं, उन्होंने अनेक यज्ञ किये और अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त की। अनेक प्रकारका दान दिये और धर्मपूर्वक राज्यपर शासन किया। राजाने अनेक प्रकारके उत्तम भोग भोगकर अन्तमें राज्यका परित्याग कर वनमें जाकर तपस्या की। अन्तमें वे दिव्य विमानमें आरूढ़ होकर स्वर्ग गये। वहाँ विद्याधर, किंनर आदिके साथ विहार करने लगे। अप्सराएँ उनकी सेवामें रहती थीं। गन्धर्व
उन्हें गीत सुनाकर रिझाते, इन्द्र भी उनका बड़ा सम्मान करते थे। राजाको दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि पहननेको तो मिलता था, परंतु भोजनके समय विमानमें बैठकर भूलोकमें आकर अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खाना पड़ता था। प्रतिदिन मांसका भोजन करनेके बाद भी पूर्वजन्मके कर्मके कारण उस पूर्वशरीरका मांस घटता नहीं था। इस प्रकार प्रतिदिन मांस-भक्षणसे व्याकुल होकर राजाने ब्रह्माजीसे कहा—‘ब्रह्मन्! आपके अनुग्रहसे मुझे स्वर्गका सुख प्राप्त हुआ है, सभी देवता मेरा आदर करते हैं। सभी सामग्री उपभोगके लिये प्राप्त होती रहती है, परंतु सभी भोगोंके रहते हुए भी यह पापिनी क्षुधा कभी शान्त नहीं होती, मुझे सदा सताती रहती है। इसी कारण मुझे अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खानेके लिये भूलोकमें जाना पड़ता है और इसमें मुझे बड़ी घृणा होती है। मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिससे मुझे उत्तम भोजन नहीं मिलता। आप कृपाकर ऐसा कोई उपाय बतायें, जिससे मेरा यह दुःख दूर हो जाय।’
ब्रह्माजी बोले—राजन्! आपने अनेक प्रकारके दान दिये हैं, बहुत-से यज्ञ किये हैं और गुरुजनोंको भी संतुष्ट किया है, परंतु ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन नहीं कराया। अन्नदान न करनेसे ही आज आपकी यह दशा हो रही है। अन्नसे बढ़कर कोई संजीवनी नहीं। अन्नको ही अमृत जानना चाहिये। इसलिये अब आप पृथ्वीपर जाकर वेदशास्त्र जाननेवाले कुलीन ब्राह्मणोंको भोजन करायें। उससे आपका यह दुःख दूर हो जायगा।
- पृथिव्यामन्नपूर्णायां वयमन्नस्य काङ्क्षिणः। सीमिन्ने नूनमस्माभिर्न ब्राह्मणमुखे हृतम् ॥ (उत्तरपर्व १६९।४)
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- उत्तरपर्व *
५८९
ब्रह्माजीका वचन सुनकर राजा श्वेतने पृथ्वीपर आकर महर्षि अगस्त्यजीको परमभक्तिसे भोजन कराया और अपने गलेकी दिव्य एकावली (माला*)-को दक्षिणाके रूपमें समर्पित किया। अगस्त्यजीको भोजन कराते ही राजा श्वेत संतुष्ट हो गये और सभी देवता वहाँ आकर अतीव आदरपूर्वक राजाको विमानमें बैठाकर स्वर्गलोक चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने जब रावणका वध कर दिया, तब वह एकावली अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीको दे दी। यह अन्नदानका ही माहात्म्य है।
मेरा वचन सत्य है कि प्राणियोंके लिये अन्नसे बढ़कर कोई उत्तम पदार्थ नहीं है। अन्न जीवोंका प्राण है। अन्न ही तेज, बल और सुख है। इसलिये अन्नदाता प्राणदाता है। भूखा व्यक्ति जिस दूसरे व्यक्तिके घर आशा करके जाता है और वहाँसे संतुष्ट होकर आता है तो भोजन देनेवाला व्यक्ति धन्य हो जाता है, उसके समान पुण्यकर्मा और कौन होगा? दीक्षा-प्राप्त स्नातक, कपिला गौ, याज्ञिक, राजा, भिक्षु तथा महोदधि—ये सब दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं। इसलिये घरपर आये भूखे व्यक्तिको जो भोजन न दे सके उसका गृहस्थाश्रम व्यर्थ है। अन्नके बिना कोई अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकता। मनुष्योंका दुष्कृत अर्थात् किया हुआ दूषित कर्म अन्नमें प्रविष्ट हो जाता है, इसलिये जो ऐसे व्यक्तिका अन्न खाता है, वह अन्न देनेवालेके दुष्कृतका ही भक्षण करता है। इसके विपरीत अमृतमय पवित्र परात्रका भोजन करनेवाले व्यक्तिका एक महीनेका किया हुआ पुण्य अन्नदाताको प्राप्त हो जाता है। जिस अन्नके दानका इतना महत्त्व है, उसका दान क्यों नहीं करते? (अर्थात् थोड़ा-बहुत अवश्य करो, करना चाहिये।) जो व्यक्ति ब्राह्मण, अतिथि आदिको भोजन आदि कराने तथा
भिक्षा देनेके पूर्व ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह केवल पाप ही भक्षण करता है। जिस व्यक्तिने दस हजार या एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया है, उसने मानो ब्रह्मलोकमें अपना स्थान बना लिया।
प्राचीन कालमें वाराणसीमें देवता और ब्राह्मणोंका पूजक धनेश्वर नामका एक वैश्य रहता था। उसकी दूकानमें एक स्थानपर एक सर्पिणीने अण्डा दिया और वह उस अण्डेको छोड़कर कहीं अन्यत्र चली गयी। वैश्यने अण्डेको देखा और उसपर दयाकर उसकी रक्षा करने लगा। कुछ समय बाद अण्डेको फोड़कर कृष्ण सर्पका बच्चा बाहर निकला। उस सर्पके बच्चेको वैश्य प्रतिदिन दूध पिलाता था। वह सर्प भी वैश्यके पैरोंपर लोटता, उसके अङ्गोंको चाटता और पूरे घरमें निर्भय हो घूमता रहता। वैश्य भी भलीभाँति सर्पकी रक्षा करता। थोड़े ही समयमें वह भयंकर सर्प हो गया। किसी समयकी बात है, वह धनेश्वर गङ्गा-स्नान करनेके लिये गया था और उसका पुत्र दूकानपर बैठकर सामान बेच रहा था। उसी समय वह सर्प उस लड़केके पैरोंके बीचसे निकला, जिससे वह लड़का डर गया और उसने सर्पको ढंडेसे मारा। चोट लगते ही सर्प उछलकर वैश्यपुत्रके सिरपर बैठ गया और क्रोधित होकर कहने लगा—‘मूर्ख! मैं तुम्हारे पिताकी शरणमें हूँ और तुम्हारे पिताने ही मेरा पालन-पोषण किया है, इसलिये मैं तुम्हारा भी भला ही चाहता था, परंतु तुमने मुझे अकारण ही प्रताड़ित किया है, इसलिये अब मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा।’ सर्पके इस प्रकार कहनेके साथ ही वैश्यके घरमें दुःखी हो सब रोने लगे।
उसी समय अच्युत, गोविन्द, अनन्त आदि भगवान्के पवित्र नामोंका उच्चारण करता हुआ स्नानकर वह धनेश्वर भी घर आ गया। पुत्रकी
- महाराज श्वेतकी कथा कई स्थानोंपर है, किंतु वाल्मीकीय रामायण उत्तरकाण्डके ७७ तथा ७८ सर्गोंमें बड़ी रम्य शैली और मधुर पदावलीयोंमें वर्णित हुई है। वहाँ एकावली मालाकी जगह केयर आदि दिव्य आभूषणकी बात निर्दिष्ट है।
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५९०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वैसी स्थिति देखकर उसने सर्पसे कहा—‘पत्रग ! तुम मेरे पुत्रके मस्तकपर फण फैलाये क्यों बैठे हो ? यह ठीक ही कहा गया है कि मूर्ख मित्र और हीन जातिमें उत्पन्न प्राणीके साथ सम्बन्ध करना अपने हाथसे जलता हुआ अंगारा उठाना है१ ।’ वणिककी बात सुनकर साँपने कहा—‘धनेश्वर ! तुम्हारे पुत्रने मुझे निरपराध ही मारा है, इसलिये तुम्हारे सामने ही मैं इसका प्राण ले रहा हूँ, जिससे अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे ।’ यह सुनकर धनेश्वरने कहा—‘सर्प ! जो उपकार, भक्ति तथा स्नेह आदिको भूलकर अपने रास्तेसे भटक जाय अर्थात् अपने कर्तव्यमार्गको छोड़ दे, उसे कौन रोक सकता है, परंतु क्षणमात्र तुम इस बालकको छोड़ दो, दंश न करो, जिससे मैं ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपना और्ध्वदैहिक कर्म अपने हाथसे कर सकूँ, क्योंकि बादमें मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा ।’ सर्पने इस बातको स्वीकार कर लिया ।
तदनन्तर वैश्यने वेदवेत्ता और जितेन्द्रिय एक हजार ब्राह्मणों तथा सन्यासियों आदिको घी, पायससहित मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया । भोजनसे संतुष्ट हो ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—
वणिष्पुत्र चिरं जीव नश्यन्तु तव शत्रवः ।
अभीष्टफलसंसिद्धिरस्तु ते ब्राह्मणाज्ञया ॥
(उत्तरपर्व १६९।६३)
‘वणिष्पुत्र ! ब्राह्मणोंकी आज्ञासे तुम चिरंजीवी होओ, तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जायँ और तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जाय ।’
ऐसा कहकर ब्राह्मणोंने अक्षत और पुष्प वैश्यपुत्रके
मस्तकपर छोड़े । ब्राह्मणोंके वागवज्रसे ताड़ित होकर वह सर्प मस्तकसे गिरा और मर गया । सर्पको मरा हुआ देखकर धनेश्वरको बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा कि मैंने इस सर्पको पुत्रकी भाँति पाला था और आज यह मेरे ही दोषसे मर गया । यह बड़ा ही अनुचित हुआ । उपकार करनेवालेमें जो साधुता रखता है, उसकी साधुतामें कौन-सी विशेषता रहती है ? अर्थात् वह प्रशंसाके योग्य नहीं है, किंतु जो अपकारियोंमें साधुता रखता है, उसकी साधुता ही सराहनीय है२ ।
इस प्रकार अनेक प्रकारसे पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर वैश्यने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात्रिमें सो सका । प्रातःकाल होते ही गङ्गामें स्नान कर देवता-पितरोंका पूजन-तर्पण आदि कर घर आया और पुनः एक हजार ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन कराकर संतुष्ट किया । इसपर ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—‘धनेश्वर ! हमलोग तुमसे बहुत ही संतुष्ट हैं, इसलिये तुम वर माँगो । यह सुनकर उसने वर माँगा कि ‘यह मृत सर्प पुनः जीवित हो जाय ।’ वैश्यके यह कहनेपर ब्राह्मणोंने अभिमन्त्रित जल सर्पके ऊपर छिड़का । जलके छींटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया । यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ और नगरके लोग धनेश्वरकी प्रशंसा करने लगे ।’
महाराज ! यह सहस्र-ब्राह्मण-भोजन (अन्नदान)-का संक्षेपसे मैंने माहात्म्य वर्णन किया । जो व्यक्ति ब्राह्मणोंको और अभ्यागर्तोंको अन्न देता है, वह बहुत दिनतक संसार-सुखको भोगकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है । (अध्याय १६९)
१-मूर्ख मित्रं सम्बन्धं हीनजातिजनों हि यः । यः करोत्यनुधोऽङ्गारान् स स्वहस्तेन कर्षति ॥ (उत्तरपर्व १६९।५६)
२-उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्धिरिव्यते ॥ (उत्तरपर्व १६९।६७)
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- उत्तरपर्व *
५११
स्थालीदानकी महिमामें द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आपके द्वारा अन्नदानके माहात्म्यको सुनकर मुझे भी एक बात स्मरण आ रही है। जिसे मैंने अपनी आँखोंसे देखा है, उसे मैं आपको सुनाता हूँ। जिस समय दुर्योधन, कर्ण, शकुनि आदिने द्रुतक्रीडामें छलसे हमारे राज्यको छीन लिया और हमलोग द्रौपदीके साथ वल्लभ वस्त्र तथा मृगचर्म धारण कर वनको जा रहे थे, उस समय नगरके लोग और सदाचारी ब्राह्मण स्नेहसे हमारे साथ चलने लगे। उन्हें देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं यह सोचने लगा कि जो व्यक्ति ब्राह्मण, मित्र, भृत्य आदिका पोषण करता है, उसीका जीवन सफल है। अपना पेट तो मनुष्य, जीव, जन्तु, पशु, पक्षी सभी भर लेते हैं। अभ्यागत सुहृद्वर्ग और कुटुम्बको छोड़कर जो व्यक्ति केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीवित होते हुए भी मेरे हुएके समान है। यही सोचकर मैंने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आपलोग त्रिकालज्ञ और ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत हैं और मेरे स्नेहके वशीभूत होकर ही आये हैं। अब कोई ऐसा उपाय बतानेकी कृपा कीजिये जिससे कि भाई, बन्धु, मित्र, भृत्यसहित आपलोगोंके लिये भी भोजन आदिका प्रबन्ध हो सके, क्योंकि इस निर्जन वनमें हमें बारह वर्ष बिताना है। मेरे इस प्रकारके वचनको सुनकर मैत्रेयमुनिने मुझसे कहा कि कौन्येय! एक प्राचीन वृत्तान्त मैंने दिव्य दृष्टिसे देखा है, जिसे मैं कह रहा हूँ, आप ध्यानसे सुनें।
किसी समय एक तपोवनमें कोई दुर्भगा, दरिद्रा, ब्रह्मचारिणी ब्राह्मणी निवास कर रही थी। वह इस दशामें भी प्रतिदिन ब्राह्मणोंका पूजन
किया करती। उसकी शम-दमसे परिपूर्ण श्रद्धाको देखकर एक दिन ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर उससे कहा—‘सुब्रते! हमलोग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।’ तब ब्राह्मणीने कहा—‘महाराज! किसी व्रत अथवा दानकी ऐसी विधि बतानेकी कृपा कीजिये, जिसके करनेसे मैं पतिकी प्रिय, पुत्रवती, सौभाग्यवती, धनाढ्य तथा लोकमें प्रशंसाके योग्य हो जाऊँ।’
ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर वसिष्ठजीने कहा कि बाह्मणि! मैं तुम्हें सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले स्थालीदानकी विधि बता रहा हूँ। पाँच सौ पल, दो सौ पचास पल अथवा एक सौ पचीस पल ताँबेका पात्र बनाये या सामर्थ्य न हो तो मिट्टीकी उत्तम हाँड़ी बना ले। वह गहरी और सुदृढ़ हो। उसे मूँग तथा चावलसे बने पदार्थसे भरकर चन्दनसे चर्चित कर एक मण्डलके मध्यमें स्थापित कर ले तथा उसके समीप सब प्रकार शाक, जलपात्र, घीका पात्र रखे और पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदिसे उसका पूजन करे और इस प्रकार उस पात्रकी प्रार्थना करे—
ज्वलज्वलनपाश्र्वस्थैस्तण्डुलैः सजलैरपि। न भवेद्भोज्यसंसिद्धिर्भूतानां पिठरीं विना॥ त्वंसिद्धिः सिद्धिकामानांत्वंपुष्टिः पुष्टिमिच्छताम्। अतस्त्वां प्रणामाम्याशु सत्यं कुरु वचो मम॥ ज्ञातिबन्धुसुहृद्वर्गं विप्रे प्रेय्यजने तथा। अभुक्तवति नाश्रीयात् तथा भव वरप्रदा॥
(उत्तरपर्व १७०। २२—२४)
इसका भाव यह है कि समीप ही प्रज्वलित अग्नि हो, चावल हो तथा जल भी हो, किंतु यदि स्थाली (बटलौड़) न हो तो भोजन नहीं पकाया
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