भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
परिवारेण तमानीय सम्मानितवान् । ततः क्रमेण विद्वन्मण्डले च समा- याते सा भोजपरिषद्रागिव रेजे । तब फिर प्रातः काल कालिदास ने बल्लाल भूपाल से अनुमति ली और मालव देश में आकर राजा की क्रीडावाटिका में ठहर गया। तब वहां उसे आया जान राजा अपने बड़े परिवार के साथ स्वयं जाकर उसे ले आया और उसका संमान किया। फिर धीरे-धीरे विद्वन्मंडली के आ जाने पर वह भोज की सभा पहिले की भाँति सुशोभित हो गयी। :---:०:---: ( २४ ) काव्यक्रीडा ततः सिंहासनमलङ्कुर्वाणं भोजं द्वारपाल आगत्य प्रणम्याह—'देव, कोऽपि विद्वाञ्जालन्धरदेशादागत्य द्वार्यास्ते' इति । राजा—'प्रवेशय' इ- त्याह । स च विद्वानागत्य सभायां तथाविधं राजानं जगन्मान्यान्कालि- दासादीन्कविपुङ्गवान्वीक्ष्य बद्धजिह्व इवाजायत । सभायां किमपि तस्य मुखान्न निःसरति । तदा राज्ञोक्तम्—'विद्वन्, किमपि पठ' इति । तत्पश्चात् सिंहासन को सुशोभित करते भोज से द्वारपाल आकर और प्रणाम करके बोला—'महाराज, जालंधर देश से एक विद्वान् आकर द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' वह विद्वान् सभा में आया और उस प्रकार के राजा और जगन्मान्य कालिदास आदि कवि श्रेष्ठों को देख मानो उसकी जीभ ही बँध गयी। सभा में उसके मुंह से कुछ निकला ही नहीं। तो राजा ने कहा—'हे पंडित, कुछ पढ़ो।' स आह— आरनालगलदाहशङ्कया सन्मुखादपगता सरस्वती । तेन वैरिकमलाकरग्रहव्यग्रहस्त न कवित्वमस्ति मे ॥ २८८ ॥ राजा तस्मै महिषीशतं ददौ । वह बोला—तीखी-खट्टी, पतली लपसी पीने से गला जल जाने की आशंका से सरस्वती मेरे मुख से निकल गयीं; हे शत्रु-लक्ष्मी के केश-ग्रह में व्यग्र हाथों वाले महाराज, इस कारण मुझ में कवित्व-नहीं रहा। राजा ने सौ भैंसें दीं। :--:--:
४. दानशीलता, नीति-सुभाषित व उपसंहार
१४८ भोजप्रबन्धः अन्यदा राजा कौतुकाकुलः सीतां प्राह—'देवि, सुरतं पठ' इति। सीता प्राह— सुरताय नमस्तस्मै जगदानन्दहेतवे। आनुषङ्गि फलं यस्य भोजराज भवादृशाम् ॥ २८६ ॥ ततस्तुष्टो राजा तस्यै हारं ददौ। किसी दूसरी वार कौतुक में भर कर राजा ने सीता से कहा—देवि, सुरत का वर्णन करो।' सीता ने कहा— जगदानंदसुहेतु सुरत को नमस्कार है, जिसके गौणफल भोज, आप जैसे जनमें हैं। (जगत् के आनंद के कारण स्वरूप सुरत को नमस्कार है, जिसका गौण फल हे मोजराज, आप जैसों की उत्पत्ति है।) तुष्ट होकर राजा ने उसे हार दे दिया। ततो राजा चामरग्राहिणीं वेश्यामवलोक्य कालिदासं प्राह-'सुकवे, वेश्यामेनां वर्णय' इति। तामवलोक्य कालिदासः प्राह— 'कचभारात्कुचभारः कुचभाराद्भीतिमेति कचभारः। कचकुचभाराज्जघनं कोऽयं चन्द्रानने चमत्कारः' ॥ २६० ॥ तत्पश्चात् चँवर डुलाने वाली वेश्या को देखकर राजा ने कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस वेश्या का वर्णन करो।' उसे देख कालिदास ने कहा— केशों के बोझ से स्तनों का भार और स्तन भार से केशों का भार डर रहा है और केश और कुच--इन दोनों के भार से जघन स्थल डर रहा है; हे चंद्रमुखी, यह कैसा चमत्कार है। भोजस्तुष्टः सन्स्वयमपि पठति-- 'वदनात्पदयुगलीयं वचनादधरश्च दन्तपङ्क्तिश्च। कचतः कुचयुगलीयं लोचनयुगलं च मध्यतस्त्रसति' ॥ २६१ ॥ संतुष्ट होकर भोज ने स्वयं भी पढ़ा:— मुख से दोनों पैर और वचन से ओठ और दांत डर रहे हैं और केशों से दोनों कुच; और मध्य भाग (कमर) से दोनों नेत्र डर रहे हैं। —:०:—
· भोजप्रबन्धः १४६
( २५ ) अदृष्टपरहृदयबोद्धा कालिदासः अन्यदा भोजो राजा धारानगर एकाकी विचरन्कस्यचिद्विप्रवरस्य गृहं गत्वा तत्र काञ्चन पतिव्रतां स्वाङ्के शयानं भर्तारमुद्वहन्तीमपश्यत्। ततस्तस्याः शिशुः सुप्तोत्थितो ज्वालायाः समीपमगच्छत् । इयं च पति- धर्मपरायणा स्वपतिं नोत्थापयामास। ततः शिशुं च वह्नौ पतन्तं ना- गृहात्। राजा चाश्चर्यमालोक्यातिष्ठत् । दूसरी बार धारा नगर में राजा अकेले विचरण करते हुए किसी ब्राह्मण श्रेष्ठ के घर पहुँच गया; वहां उसने एक पतिव्रता नारी को अपनी गोद में सिर धर सोये स्वामी को लिये हुए देखा। तभी उसका छोटा बच्चा सोते से जाग कर जलती आग के पास जा पहुँचा। उस पतिधर्म परायणा (पति-सेवा में लगी) ने अपने पति को (गोद से) नहीं हटाया। आग में गिरते बच्चे को भी नहीं पकड़ा। राजा यह अनोखी बात देखकर रुक गया। ततः सा पतिधर्मपरायणा वैश्वानरमप्रार्थयत्—'यज्ञेश्वर ! त्वं सर्वकर्मसाक्षी सर्वधर्मज्ञानासि। मां पतिधर्मपराधीनां शिशुमगृह्णन्तीं च जानासि। ततो मदीयेशिशुमनुगृह्य त्वं मा दह' इति। ततः शिशुर्ये- ज्ञेश्वरं प्रविश्य तं च हस्तेन गृहीत्वार्धघटिकापर्यन्तं तत्रैवातिष्ठत् । तब उस पति धर्म का पालन करती नारी ने अग्नि देव से प्रार्थना की— 'हे यज्ञ के स्वामी, सब कर्मों के देखने वाले आप सब धर्मों के ज्ञाता हैं। पति धर्म का पालन करने से पराधीन हुई मैं अपने बच्चे को नहीं पकड़ पा रही हूँ— यह भी जानते हैं। तो मेरे बच्चे पर अनुग्रह करके आप इसे न जलायें।' तो वह बच्चा अग्नि में प्रविष्ट होकर और उसे हाथ से पकड़ कर घड़ी भर वहीं रहा। ततो नारोदीत्प्रसन्नमुखश्च शिशुः, सा च ध्यानारूढातिष्ठत् । ततो यदृच्छया समुत्थिते भर्तरि सा झटिति शिशुं जग्राह च परं धर्ममालोक्य विस्मयाविष्टो नृपतिराह—'अहो, मम समं भाग्यं कस्यास्ति, यदीदृश्यः पुण्यस्त्रियोऽपि मन्नगरे वसन्ति' इति।
१५० भोजप्रबन्धः तो वह बच्चा रोया नहीं और प्रसन्न मुख रहा और वह स्त्री ध्यान में लीन रही । तदनंतर स्वेच्छया स्वामी के जाग उठने पर उसने झट से बच्चे को ले लिया । धर्म की उस परमता को देख आश्चर्य में पड़े नरपति ने कहा—'अरे, मेरे जैसा भाग्य किसका है कि ऐसी पुण्यस्त्रियां मेरे नगर में निवास करती हैं !' ततः प्रातः सभायामागत्य सिंहासन उपविष्टो राजा कालिदासं प्राह—'सुकवे, महदाश्चर्यं मया पूर्वेद्यू रात्रौ दृष्टमस्ति' इत्युक्त्वा राजा पठति—'हुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' । तत्पश्चात् प्रातः काल सभा में आकर सिंहासन पर बैठे राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, बीती रात मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा है;' यह कहकर राजा ने पढ़ा—'चंदन-लेप-समान सुशीतल आग हो गयी ।' कालिदासस्ततश्चरणत्रयं झटिति पठति— 'सुतं पतन्तं प्रसमीक्ष्य पावके न बोधयामास पतिं पतिव्रता । तदाभवत्तत्पतिभक्तिगौरवाद्वहुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' ॥ २६२ ॥ राजा च स्वाभिप्रायमालोक्य विस्मितस्तमालिङ्गय पादयोः पतति स्म । तो कालिदास ने झट से श्लोक के शेष तीन चरण पढ़ दिये-- 'बच्चा गिरता देख आग में पतिव्रता ने पति को नहीं जगाया । रखने को पति-भक्ति-मान चंदन-लेप समान सुशीतल आग हो गयी । और अपना अभिप्राय पूर्ण देख राजा ने विस्मित हो उसका आलिंगन किया और चरणों में गिर पड़ा । एकदा ग्रीष्मकाले राजान्तःपुरे विचरन्धर्मतापतप्त आलिङ्गनादिकम- कुर्वंस्ताभिः सह सरससंलापाद्युपचारमनुभूय तत्रैव सुप्तः । ततः प्रातरु- त्थाय राजा सभां प्रविष्टः कुतूहलात्पठति— 'मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव ।' एक बार ग्रीष्म ऋतु में राजा रनिवास में विचर रहा था; ग्रीष्म ऋतु की धूप के ताप से तप्त होने के कारण आलिंगन-आदि न करके वह रानियों से रस पूर्ण वार्तालाप आदि में आनन्द उठाता वहीं सो गया । फिर प्रातःकाल उठकर सभा में पहुँच कर राजा ने कुतूहल के कारण पढ़ा—
जब हवा वहने की वात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। भवभूतिराह— 'उरगी शिशवे क्षुधुक्षवे स्वामदिशत्फूत्कृतिमाननानलेन। मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव' ॥ २६३ ॥ राजा प्राह— 'भवभूते, लोकोक्तिः सम्यगुक्ता' इति। भवभूति ने कहा— नागिन ने भूखे बच्चे को मुँह की श्वास-वायु से अपनी फुंकारी दी। जब हवा बहने की बात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। (अर्थात् वायु-पान कराके अपने बच्चे का पालन-पोषण किया)। राजाने कहा— 'हे भवभूति, आपने अच्छी लोकोक्ति कही।' ततोऽपाङ्गेन राजा कालिदासं पश्यति। ततः स आह— 'अबलासु विलासीनोऽभवन्नयनैरेव नवोपगूहनानि। मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव' ॥ २६४ ॥ तदा राजा स्वाभिप्रायं ज्ञात्वा तुष्टः कालिदासं विशेषेण सम्मानितवान्। तब फिर राजा ने कनखी से कालिदास को संकेत दिया। तो उसने कहा— विलासी व्यक्तियों ने नेत्रों से ही नारियों में नवीन आलिंगन का अनुभव किया। जब हवा बहने की बात तक नहीं थी, ऐसे समय में भी बढ़ाया ही। (अर्थात् आनंद-वृद्धि की।) तो राजा अपना अभिप्राय समझ कर संतुष्ट हुआ और कालिदास को विशेष रूप से संमानित किया। अन्यदा मृगयापरवशो राजात्यन्तमार्तः कस्यचित्सरोवरस्य तीरे निविडच्छायस्य जम्बूवृक्षस्य मूलमुपाविशत्। तत्र शयाने राज्ञि जम्बो- रुपरि बहुभिः कपिभिर्जम्बूफलानि सर्वाण्यपि चालितानि। तानि सशब्दं पतितानि पश्यन्घटिकामात्रं स्थित्वा श्रमं परिहृत्य उत्थाय तुरङ्गमवर- मारुह्य गतः। एक और बार आखेट में लीन हो राजा अत्यंत थक कर किसी तालाब के किनारे घनी छायादार जामुन के पेड़ के नीचे बैठा था। वहाँ लेटे राजा पर जामुन के ऊपर के बहुत-से बंदरों ने सभी जामुनें झाड़ डालीं। एक घड़ी
१५२ भोजप्रबन्धः तक उन जामुनों को 'गुड़् प्-गुड़् प्' करके गिरती देखता राजा थकावट वीत जाने पर उठकर घोड़े पर चढ़ चला गया । ततः सभायां राजा पूर्वानुभूतकपिचलितफलपतनरवमनुकुर्वन्सम- स्यामाह- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' । तत आह कालिदासः- 'जम्बूफलानि पक्वानि पतन्ति विमले जले । कपिकम्पितशाखाभ्यो गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' ॥ २६५ ॥ तो सभा में पहिले अनुभूत बंदरों द्वारा झाड़ी जाने से हुए जामुनों के गिरने के ( 'गुड़् प्-गुड़् प्' ) शब्द का अनुकरण करते हुए राजा ने एक समस्या कही- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गलु' । तो कालिदास ने कहा- वानरदल के द्वारा कंपित शाखाओं से निर्मल जल में-पके हुए गिरते जंबूफल 'गुलु गुग्गुलु-गुग्गुलुगुग्गुलु ।' राजा तुष्ट आह- 'सुकवे, अदृष्टमपि परहृदयं कथं जानासि । साक्षा- च्छारदासि' इति मुहुर्मुहुः पादयोः पतति स्म । संतुष्ट हो राजा ने कहा- 'हे सुकवि, तुम अनदेखे भी दूसरे के हृदय को कैसे जान लेते हो ? तुम साक्षात् शारदा हो,' और पैरों पर गिर पड़ा । एकदा धारानगरे प्रच्छन्नवेषो विचरन्कस्यचिद्वृद्धब्राह्मणस्य गृहं राजा मध्याह्नसमये गच्छंस्तत्र तिष्ठति स्म । तदा वृद्धविप्रो वैश्वदेवं कृत्वा काकवलिं गृह्णन्गृहान्निर्गत्य भूमौ जलशुद्धायां निक्षिप्य काकमाह्वयति स्म । तत्र हस्तचिस्फोटालनेन हाहेतिशब्देन च काकाः समायाताः । तत्र कश्चित्का- कस्तारं रारटीति स्म । तच्छ्रुत्वा तत्पत्नी तरुणी भीतेव हस्तं निजोरसि निधाय 'अये मातः' इति चक्रन्द । एक बार धारा नगर में गुप्त वेष में विचरण करता हुआ राजा किसी ब्राह्मण के घर में दोपहरी के समय जाते हुए ठहरा हुआ था । उस समय बूढ़ा ब्राह्मण 'वैश्वदेव' ( देवताओं के निमित्त प्रातः सायम्, विशेषतः मध्याह्न समर्पित खाद्य सामग्री-वलिवैश्वदेव कर्म ) करके कौओं के निमित्त वलि लेकर घर से निकला और ( वलि को ) जल से स्वच्छ की गई भूमि पर रखकर कौए को बुलाने लगा । तालियां बजाने और
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'हाउ-हाउ' शब्द करने से वहां कौए आ गये । उनमें एक कौआ बड़े जोर से 'कांव-कांव' करने लगा । उसे सुन बूढ़े ब्राह्मण की तरुणी पत्नी जैसे डर कर हाथ को अपनी छाती पर रख चिल्ला पड़ी—'हाय मैया !'।
ततो ब्राह्मणः प्राह—'प्रिये साधुशीले, किमर्थं बिभेषि'—इति। सा प्राह—'नाथ ! मादृशीनां पतिव्रतास्त्रीणां कर्कशनिश्रवणं न सह्यम् । 'साधुशीले, तथा भवेदेव' इति विप्र आह।
तो ब्राह्मण बोला-'भली-भोली प्यारी, क्यों डर रही हो?' वह बोली— 'स्वामी, मुझ जैसी पतिव्रता स्त्रियों से कर्कश शब्द सुनना सहा नहीं जाता।' ब्राह्मण ने कहा—'हे सुचरिते, ऐसा तो होता ही रहता है।'
ततो राजा तच्चरितं सर्वं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत्—'अहो, इयं तरुणी दुःशीला नूनम् । यतो निर्व्याजं बिभेति । स्वपातिव्रत्यं स्वयमेव कीर्तयति च । नूनमियं निर्भीका सती अत्यन्तं दारुणं कर्म रात्रौ करोत्येव । एवं निश्चित्य राजा तत्रैव रात्रावन्तर्हित एवातिष्ठत् ।
तो उसका सारा आचरण देख कर राजा ने विचारा—'अरे, निश्चय ही यह तरुणी दुष्ट चरित्र की है; क्योंकि अकारण ही डर रही है और अपने पातिव्रत का स्वयम् ही कीर्तन कर रही है । निश्चय ही यह निर्भय होकर रात में अत्यंत कठोर कर्म करती ही होगी।' ऐसा निश्चय करके राजा वहीं रात को छिप कर रह गया ।
अथ निशीथे भर्त्तरि सुप्ते सा मांसपेटिकां वेश्याकरेण वाहयित्वा नर्मदातीरमगच्छत् । राजाप्यात्मानं गोपयित्वानुगच्छति स्म । ततः सा नर्मदां प्राप्य तत्र समागतानां ग्राहाणां मांसं दत्त्वा नदीं तीर्त्वा परतीरस्थेन शूलाग्रारोपितेन स्वमनोरमेण सह रमते स्म ।
इसके बाद रात में पति के सो जाने पर वह मांस की पिटारी को एक वेश्या के हाथों उठवाकर नर्मदा के किनारे पहुँची । अपने को छिपाये राजा ने भी उसका पीछा किया । तदनंतर वह नर्मदा में पैठी और वहां आये मगर- मच्छों को मांस देकर नदी पार कर दूसरे किनारे पर स्थित सूली की नोक पर चढ़ाये गये अपने मनचीते पुरुष के साथ रमण करने लगी ।
१५४ भोजप्रबन्धः तच्चरित्रं दृष्ट्वा राजा गृहं समागत्य प्रातः सभायां कालिदासमालोक्य प्राह—'सुकवे, शृणु— 'दिवा काकरुताद्भीता' ततः कालिदास आह— 'रात्रौ तरति नर्मदाम्' । ततस्तुष्टो राजा पुनः प्राह— 'तत्र सन्ति जले ग्राहाः' ततः कविराह— 'मर्मज्ञा सैव सुन्दरी' ॥ २६६ ॥ ततो राजा कालिदासस्य पादयोः पतति । उसका चरित्र देख घर पहुँच कर राजाने सबेरे सभा में कालिदास को देखकर कहा—'हे सुकवे, सुनो— 'डरती दिन में 'कांव-कांव' से' तो कालिदासने कहा— 'तैर नर्मदा जाती रात ।' तब संतुष्ट हो राजाने फिर कहा— 'पानी में हैं मगर वहाँ तो' तो कवि ने कहा— 'मर्म सुंदरी को सब ज्ञात' तो राजा कालिदास के पैरों-पड़ा । एकदा धारानगरे विचरन्वेश्यावीथ्यां राजा कन्दुकलीलातत्परां तद्भ्र- मणवेगेन पादयोः पतितावतंसां काञ्चन सुन्दरीं दृष्ट्वा सभायामाह— 'कन्दुकं वर्णयन्ते कवयः' इति । एक बार धारानगर में वेश्या-गली में घूमते राजा ने कंदुकक्रीड़ा में लीन और उसके घूमने के वेग से जिसके कान का आभूषण पैरों पर गिर गया था, ऐसी, एक सुंदरी को देखकर सभा में कहा—'कविजन, कंदुक का वर्णन करें।' तदा भवभूतिराह—
भोजप्रबन्धः १५५ 'विदितं ननु कन्दुक ते हृदयं प्रमदाधरसङ्गमलुब्ध इव । वनिताकरतामरसाभिहतः पतितः पतितः पुनरुत्पतसि' ॥ २६७ ॥ तो भवभूति ने कहा- हे कंदुक, तुम्हारे हृदय की भावना ज्ञात ही है--तुम सुंदरी के अधर का संग करने के लोभी प्रतीत होते हो, इसी से सुंदरी के कर कमल से ताडित होने पर गिर-गिर कर पुनः पुनः उछलते हो । ततो वररुचिः प्राह- एकोऽपि त्रय इव भाति कन्दुकोऽयं कान्तायाः करतलरागरक्तरक्तः । भूमौ तच्चरणनखांशुगौरगौरः स्वस्थः सन्नयनमरीचिनीलनीलः' ॥ २६८ ॥ तब वररुचि ने कहा- सुंदरी की हथेली की लालिमा से लाल-लाल, धरती पर गिरा होने की अवस्था में उसके चरण-नखों के किरणजाल से शुभ्र और सामान्य स्थिति में आँखों की पुतलियों की नीलिमा से नीला-नीला-यह कंदुक एक होने पर भी तीन जैसा प्रतीत होता है। ततः कालिदास आह- 'पयोधराकारधरो हि कन्दुकः करेण रोषादभिहन्यते मुहुः । इतीव नेत्राकृतिभीतमुत्पलं स्त्रियः प्रसादाय पपात पादयो.' ॥ २६६ ॥ तब कालिदास ने कहा- क्योंकि इस कंदुक ने सुंदरी के पयोधरों का आकार-धारण किया, अतएव बार-बार यह उस सुंदरी के कर-द्वारा रोष के कारण ताडित किया जाता है। इसी से यह नयनों के आकार से डरे कमल के समान कर्ण भूषण सुंदरी को प्रसन्न करने के निमित्त पैरों पर गिर पड़ा है। तदा राजा तुष्टस्त्रयाणामक्षरलक्षं ददौ । विशेषेण च कालिदासम्- दृष्टावतंसकुसुमपतनयोद्धारं सम्मानितवान् । तब राजा ने संतुष्ट होकर तीनों को प्रत्यक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं ।
१५६ भोजप्रबन्धः कालिदास को अनदेखे आभूषण कर्णफूल के पतन का ज्ञाता होने के कारण विशेष रूप से संमानित किया । ( २६ ) अष्टषोधय अन्याः कथाः ततः कदाचिच्चित्रकर्मावलोकनतत्परो राजा चित्रलिखितं महाशेषं दृष्ट्वा 'सम्यगलिखितम्' इत्यवदत् । तदा कश्चिच्छिवशर्मा नाम कविः शेषमिषेण राजानं स्तौति- अनेके फणिनः सन्ति भेकभक्षणतत्पराः । एक एव हि शेषोऽयं धरणीधारणक्षमः ॥ ३०० ॥ तदानीं राजा तदभिप्रायं ज्ञात्वा तस्मै लक्षं ददौ । कभी चित्रकारी देखने में लगे राजा ने चित्र में बने महाशेष नाग को देख कर कहा कि अच्छा चित्र बना है । तो कवि शिवशर्मा नामक कवि ने शेष- नाग के व्याज से राजा की स्तुति की-- मेढकों को खाने में लगे बहुत-से हैं धरती पर साँप । किंतु धरणी-धारणा में शक्त एक ही शेषनाग फणिराज । (मेंढकों को खाने में लगे रहने वाले तो अनेक सर्प हैं, परंतु धरती को धारने में समर्थ एक यह शेष नाग ही है । ) तब उसका अभिप्राय जान कर उस समय राजा ने उसे एक लाख मुद्राएँ दीं । कदाचिद्धेमन्तकाले समागते ज्वलन्तीं (१) हसन्तीं संसेवयन् राजा कालिदासं प्राह-'सुकवे, हसन्तीं वर्णय' इति । ततः सुकविराह-- 'कविमतिरिव बहुलोहा संघटितचक्रा प्रभातवेलेव । हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूसानलोपेता' ॥ ३०१ ॥ राजाक्षरलक्षं ददौ । कभी हेमंत ऋतु के आ जाने पर जलती अँगीठी पर तापते हुए राजा ने कालिदास से कहा-'हे सुकवि, अँगीठी का वर्णन करो।' तब सुकवि ने कहा- यह हंसती जैसे कवि की बुद्धि बहुलोहा (बहुल+ऊहा=अनेक प्रकार की कल्पना करने वाली ) होती है, वैसे ही बहुलोहा (बहुत सा लोहा है
भोजप्रबन्धः १५७ जिसमें) है; जैसे प्रभात काल सुघटित चक्र अर्थात् चकई-चकवा का संघटन (मिलाप) करने वाला होता है, वैसे ही सुघटितचक्रा अर्थात् भली चक्राकार (गोल) बनी है; और जिस प्रकार शिवजी की मूर्ति विधूमानल (विधु+ उमा+अनल) अर्थात् चंद्रमा, पार्वती और तृतीय नेत्र की ज्वाला से युक्त है उसी प्रकार विधूमानल अर्थात् धूमरहित अग्नि से सुशोभित है । राजा ने अक्षर-अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं । एकदा भोजराजोऽन्तगृहे भोगाईस्तुल्यगुणाश्चतस्रो निजाङ्गना अप- श्यत्। तासु च कुन्तलेश्वरपुत्र्यां पद्मावत्यामृतुस्नानम्, अङ्गराजस्य पुत्र्यां चन्द्रमुख्यां क्रमप्राप्तिम्, कमलानाम्न्यां च द्यूतपणजयलब्धप्राप्तिम्, अग्र- महिष्यां च लीलादेव्यां दूतीप्रेषणमुखेनाह्वानं च, एवं चतुरो गुणान्दृष्ट्वा तेषु गुणेषु न्यूनाधिकभावं राजाप्यचिन्तयत् । तत्र सर्वत्र दाक्षिण्यनिधी राज-राजः श्रीभोजस्तुल्यभावेन द्वित्रिघटिकापर्यन्तं विचिन्त्य विशेषानाव- धारणेन निद्रां गतः । प्रातश्चोत्थाय कृताह्निकः सभामगात् । एक बार भोजराज ने अंतः पुर में संमोग योग्य, समान गुणों वाली अपनी चार पत्नियों को देखा । उनमें कुंतलाधिपति की पुत्री पद्मावती मासिक ऋतु-स्नानकर चुकी थी, अंगराज की बेटी चंद्रमुखी की नियत पारी थी, कमला नाम की रानी ने जुए की बाजी में राजा को जीतकर उपलब्ध किया था । और पट्टरानी लीलादेवी ने दूती भेजकर स्वयं उन्हें आमंत्रित किया था । इस प्रकार इन चारों योग्यता के आधारों को देखकर उन गुणा धारों में कौन छोटा है, कौन बड़ा-यह राजा विचार करने लगा । सब में दक्षिणता रखनेवाला 'दक्षिणनायक' (तुल्यानुरागी) राजराजेश्वर श्री भोज समान भाव से दो-तीन घड़ी तक विचार करके भी किसी विशिष्टता की अवधारणा न करने के कारण सो गया । और सुबह उठकर दैनिक कार्य करके सभा में पहुँचा । तत्र च सिंहासनमलङ्कुर्वाणः श्रीभोजः सकलविद्वत्कविमण्डलमण्डनं कालिदासमालोक्य 'सुकवे, इमां त्र्यक्षरोनतुरीयचरणां समस्यां शृणु।' इत्युक्त्वा पठति-'अप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः।' इति पठित्वा राजा कालिदासमाह-'सुकवे, एतत्समस्यापूरणं कुरु' इति ।
१५८ भोजप्रबन्धः वहाँ सिंहासन को सुशोभित करते श्री भोज ने समस्त विद्वानों और कवियों की मंडली के श्रृंगार कालिदास को देखकर कहा—'सुकवे, तीन अक्षर कम चतुर्थ चरण वाली इस 'समस्या' को सुनो' और पढ़ा—'किकर्तव्य विमूढ़ विता दीं, घड़ियां दो-तीन।' यह पढ़कर राजा ने कालिदास से कहा—'हे सुकवि, इस समस्या की पूर्ति करो।' ततः कालिदासस्तस्य हृदयं करतलामलकवत्पश्यंस्त्रयक्षराधिक- चरणत्रयविशिष्टां तां समस्यां पठति--देव, स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोऽङ्गराजस्वसु- र्द्यूते रात्रिरियं जिता कमलया देवी प्रसाद्याधुना । इत्यन्तःपुरसुन्दरीजनगुणे न्यायाधिकं ध्यायता देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः॥ ३०२॥ तदा राजा स्वहृदयमेव ज्ञातवतः कालिदासस्य पादयोः पतति स्म । कविमण्डलं च चमत्कृतमजायत । तब राजा के हृदय को हथेली पर रखे आँवले के सदृश-देखते कालिदास ने शेष तीन चरण और (चतुर्थ चरण के शेष) तीन अक्षरों से विशिष्ट उस समस्या को पढ़ा— कुंतलराजसुता ऋतुस्नाता, अंगराजदुहिता का वार; कमला जीती रात द्यूत में, 'देवी' की करनी मनुहार; अंतःपुर की सुंदरियों के गुण-परिवीक्षण में हो लीन— किं कर्तव्य विमूढ़ विता दीं राजा ने घड़ियाँ दो-तीन । तब राजा अपने मन को ही जान लेने वाले कालिदास के पैरों पड़ा और कवि मंडली चमत्कृत हो गयी । एकदा राजा धारानगरे विचरन्क्वचित्पूर्णकुम्भं धृत्वा समायान्तीं पूर्णचन्द्राननां कञ्चिद्दृष्ट्वा तत्कुम्भजले शब्दं च कञ्चन श्रुत्वा 'नूनमेव तस्याः कण्ठग्रहेऽयं घटो रतिकूजितमिव कूजित' इति मन्यमानः सभायां कालिदासं प्राह--'कूजितं रतिकूजितम्' इति ।
- एक बार धारा नगर में विचरण करते राजा भोज ने किसी स्थान पर भरे घड़े को लेकर आती एक पूर्ण चंद्रमा के समान मुखवाली स्त्री को देखा
और उस घड़े में जल में उत्पन्न होती ध्वनि को सुनकर यह मान लिया कि सुंदरी के द्वारा पकड़ कर लिये जाते (इस प्रकार आलिंगित) इस घटकी ध्वनि रति-समय सुंदरी के द्वारा किये जाते कूजन शब्द के समान है और सभा में जाकर कालिदास ने कहा—'कूजित रति कूजित है।' कविराह— 'विदग्धे सुमुखे रक्ते नितम्बोपरि संस्थिते । कामिन्याश्लिष्टसुगले कूजितं रतिकूजितम्' ॥ ३०३ ॥ तदा तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ; ननाम च । कवि ने कहा—खूब पके, सुंदर मुँहवाले, लाल, कमर पर रखे हुए; गले लगे कामिनि के घट का यह कूजित रति कूजित है ॥ तब संतुष्ट होकर राजा ने प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दीं और प्रणाम किया । एकदा नर्मदायां महाह्रदे जालकैर्वकः शिलाखण्ड ईदृङ्गं शिष्टाचारः कश्चिद्दृष्टः । तैश्च परिचिन्तितम्—'इदमत्र लिखितमिव किञ्चिद्भाति । नूनमिदं राजनिलटं नेयम्' इति बुद्ध्या भोजसंसि समानीतम् । एक बार नर्मदा की गहरी जलराशि में जाल डालने वाले मछेरों ने घिसे-मिटे अक्षरों वाला एक शिला का खंड देखा । उन्होंने सोचा—'यह इस पर कुछ लिखा-सा प्रतीत होता है । निश्चय ही इसे राजा के पास ले जाना उचित है ।' ऐसा निश्चय करके वह शिलाखंड भोज की सभा में ले आये । तदाकर्ण्य भोजः प्राह—'पूर्वं भगवता हनुमता श्रीमद्रामायणं कृतम् । तदत्र ह्रदे प्रक्षेपितमिति श्रुतमस्ति । ततः किमिदं लिखितमित्यवश्यं विचार्यमिति लिपिज्ञानं कार्यम् ।' मछेरों की बात सुनकर भोज ने कहा—'प्राचीन काल में भगवान् हनुमान ने श्रीमद् रामायण की रचना की थी । ऐसा सुना गया है कि उसे उन्होंने यहीं जल राशि में फेंक दिया था । सो यह क्या लिखा है, इस पर अवश्य विचार होना चाहिए और एतदर्थ इसकी लिपि की जानकारी करानी चाहिए ।'
१६० भोजप्रबन्धः जतुपरीक्षयाक्षराणि परिज्ञाय पठति । तत्र चरणद्वयमानुपूर्व्याल्लब्धम्- ‘अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ततोः भोजः प्राह-‘एतस्य पूर्वार्धं कथ्यताम्' इति । चपड़े (लाख) की विधि द्वारा परीक्षा करके अक्षरों के ज्ञात होने पर पढ़ा उसमें दो चरण अनुक्रम से मिले— मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का ! तब भोज ने कहा—'इसका पूर्वार्ध कहें।' तदा भवभूतिराह-- क्व नु कुलमकलङ्कमायताक्ष्याः । क्व नु रजनीचरसङ्गमापवादः । अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥ ३०४ ॥ तब भवभूति ने कहा--- कहाँ तो निष्कलंक कुल विशाल नयना का, कहाँ मिला अपवाद निशाचर के संग का; मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये, हाय, कर्मजाल का ! ततो भोजस्तत्र ध्वनिदोषं मन्वानस्तदेव पूर्वार्धमन्यथा पठति स्म-- ‘क्व जनकतनया क्व रामजाया क्व च दशकन्धरमन्दिरे निवासः । अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥ तो भोज ने उसमें ध्वनि दोष मान कर उस पूर्वार्ध को दूसरे प्रकार से पढ़ा— कहाँ जनक तनया और राम की पत्नी कहाँ, और कहाँ रहना दशकंधर के महल का ! मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को, पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का ! ततो भोजः कालिदासं प्राह--'सुकवे, त्वमपि कविहृदयं पठ' इति । स प्राह--
भोजप्रबन्धः १६१ 'शिवशिरसि शिरांसि यानि रेजुः शिव शिव तानि लुठन्ति गृध्रपादे । अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥३०६॥ तब भोज ने कालिदास से कहा—'सुकवे, तुम भी ( रामायण के ) कवि के हृदय का भाव पढ़ो ।' कालिदास ने कहा— जो सिर सुशोभित थे शिवजी के मस्तक पर शिव-शिव, गृध्र-चरणों में लुठित होना उनका ! मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का ! ततस्तस्य शिलाखण्डस्य पूर्वपुटे जतुशोधनेन कालिदासपठितं तमेव दृष्ट्वा राजा भृशं तुतोष । तदनंतर उस शिला खंड के पहिले भाग में जतु शोधन क्रिया के द्वारा कालिदास के पढ़े गये ही पदों को देखकर राजा अत्यंत संतुष्ट हुआ । —:०:— ( २७ ) ब्रह्मराक्षसनिवारणम् कदाचिद्भोजेन विलासार्थं नूतनगृहान्तरं निर्मितम् । तत्र गृहान्तरे गृहप्रवेशात्पूर्वमेकः कश्चिद्ब्रह्मराक्षसः प्रविष्टः । स च रात्रौ तत्र ये वसन्ति तान्भक्षयति । ततो मान्त्रिकान्समाहूय तदुच्चाटनाय राजा यतते स्म । स चाऽगच्छन्नेव मान्त्रिकानेव भक्षयति। किञ्च स्वयं कवित्वादिकं पूर्वा- भ्यस्तमेव पठंस्तिष्ठति । एवं स्थिते तत्रैव रक्षसि राजा 'कथमस्य निवृत्तिः' इति व्यचिन्तयत् । एक समय भोज ने आनंद-विलास के लिए एक और नया घर बनवाया । उस दूसरे घर में गृह प्रवेश से पहिले ही एक ब्रह्मराक्षस प्रविष्ट हो गया । रात में जो वहाँ रहते थे, वह उन्हें खा जाता था । तो राजा ने मंत्रवेत्ताओं को बुलाकर उसे भगाने का प्रयत्न किया; किंतु ब्रह्म राक्षस वहाँ से न जाकर मांत्रिकों को ही खा जाता और इसके अतिरिक्त राक्षस होने से पहिले की स्थिति में अभ्यस्त काव्य आदि का पाठ करता हुआ जमा रहता । राक्षस के ११ भो०
१६२ भोजप्रबन्धः उस प्रकार वहीं जमे रहने पर राजा चिंता करने लगा कि इससे कैसे छुटकारा मिले ? तदा कालिदासः प्राह—'देव, नूनमयं राक्षसः सकलशास्त्रप्रवीणः सुकविश्व भाति । अतस्तमेव तोषयित्वा कार्यं साधयानि । मान्त्रि- कास्तिष्ठन्तु । मम मन्त्रं पश्य' इत्युक्त्वा स्वयं तत्र रात्रौ गत्वा शेते स्म । तो कालिदास ने कहा—'महाराज, यह राक्षस निश्चय ही संपूर्ण शास्त्रों का विज्ञाता और सुकवि प्रतीत होता है। इसलिए उसको प्रसन्न करके ही कार्य सिद्ध करूँगा । मंत्रवेत्ता ठहरें, आप मेरा मंत्र देखिए।' ऐसा कह रात में वहाँ जाकर स्वयं सो गया । प्रथमयामे ब्रह्मराक्षसः समागतः स चापूर्वं पुरुषं दृष्ट्वा प्रतियास- मेकैकां समस्यां पाणिनिसूत्रमेव पठति । येनोत्तरं तद्धृदयगतं नोक्तम्, 'अयं न ब्राह्मणः, अतो हन्तव्यः' इति निश्चित्य हन्ति । तदानीमपि पूर्ववदयमपूर्वः पुरुषः । अतो मया समस्या पठनीया । न चेद्वक्ति सदृशमुत्तरं तस्यास्तदा हन्तव्य इति । बुद्ध्या पठति— 'सर्वस्य द्वे' इति । पहिले पहर में ब्रह्म राक्षस आया करता था और नये पुरुष को देखकर प्रत्येक पहर में एक-एक समस्या के रूप में पाणिनि का सूत्र ही पढ़ा करता था । जो उसका मनचीता उत्तर न देता, यह विचार कर कि 'यह ब्राह्मण नहीं है, इसे मार डालना चाहिए,' उसे मार डालता । 'नया पुरुष आया है, इसलिए मुझे समस्या पढ़नी चाहिए। यदि ठीक उत्तर न दे तो मार डालना चाहिए'—कालिदास के वहाँ होने पर भी यही विचार कर उसने पढ़ा— 'सब के दो'— तदा कालिदासः प्राह— 'सुमतिकुमती सम्पदापत्तिहेतू' इति । ततः स गतः । तो कालिदास ने कहा— 'कारण संपद्-विपद् की सुमति-कुमति ही सदा हुआ करती हैं।' तो वह चला गया ।
[Header] भोजप्रबन्धः १६३ पुनरपि द्वितीयामे समागत्य पठति— 'वृद्धो यूना' इति । फिर दूसरे पहर में आकर उसने पढ़ा— 'बूढ़े को युवक'— दिं कविराह— 'सहपरिचायात्त्यज्यते कामिनीभिः। इति । तो कवि ने कहा— 'ने परिचय हो जाने पर कामिनियाँ सदा छोड़ दिया करती हैं।' तृतीयामे स राक्षसः पुनः समागत्य पठति— 'एको गोत्रे' इति । तीसरे पहर में उस राक्षस ने फिर आकर पढ़ा— 'एक ही गोत्र में'-- ततः कविराह— 'प्रभवति पुमान्यः कुटुम्बं बिभर्ति' इति । तो कवि ने कहा-- 'पुरुष ऐसा होता है, जिससे कुटुंब का पालन हुआ करता है।' ततश्चतुर्थयामे आगत्य स राक्षसः पठति— 'स्त्री पुंवच्च' इति । तत्पश्चात् चौथे पहर में आकर उस राक्षस ने पढ़ा-- 'स्त्री पुरुषतुल्य'-- ततः कविराह-- 'प्रभवति यदा तद्धि गेहं विनष्टम्' ॥ ३०७ ॥ इति । तो कवि ने कहा-- 'जिस घर में हो जाती, वह घर विनाश को प्राप्त हुआ करता है।' ततः स राक्षसो यामचतुष्टयेऽपि स्वाभिप्रायमेव ज्ञात्वा तुष्टः प्रभात- समय समागत्य तमाश्लिष्य प्राह—'सुमते, तुष्टोऽस्मि । किं तवाभीष्टम्' इति । कालिदासः प्राह—'भगवन्, एतद्गृहं विहायान्यत्र गन्तव्यम्' इति । सोऽपि तथा' इति गतः। अनन्तरं तुष्टो भोजः कविं बहु मानितवान् ।
१६४ भोजप्रबन्धः तो वह राक्षस चारों ही पहरों में अपना मनचीता भाव जानकर संतुष्ट हुआ और प्रभात काल में आकर कालिदास का आलिंगन करके.बोला--'हे सुबुद्धि शाली, मैं संतुष्ट हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है ?' कालिदास ने कहा— 'भगवन्, इस घर को छोड़कर और स्थान पर चले जाइए।' वह भी 'ठीक' है, यह कह चला गया। इसके बाद संतुष्ट भोज ने कवि का बहुत संमान किया। ---:०:--- ( २८ ) मल्लिनाथस्य दारिद्र्यनिवारणम् एकदा सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे सकलभूपालशिरोमणौ द्वार- पाल आगत्य प्राह—'देव, दक्षिणदेशात्कोऽपि मल्लिनाथनामा कविः कौपीनावशेषो द्वारि वर्तते। राजा—'प्रवेशय' इत्याह। एक बार समस्त पृथ्वी-पतियों के शिर की मणि के समान ( श्रेष्ठ ) श्री भोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल आकर बोला—'महाराज, दक्षिण देश से आया कोई कौपीन मात्र धारी मल्लिनाथ नामक कवि द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रवेश दो।' ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञया चोपविष्टः पठति -- 'नागो भाति मदेन खं जलधरैः पूर्णेन्दुना शर्वरी शीलेन प्रमदा जवेन तुरगा नित्योत्सवैर्मन्दिरम्। वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः सत्पुत्रेण कुलं त्वया वसुमती लोकत्रयं भानुना' ॥३०८॥ तब कवि ने आकर 'कल्याण हो' कहा और राजा की आज्ञा से बैठ कर पढ़ा-- मद से हाथी शोभित होता है, आकाश जलधर बादलों से, रात्रि पूर्ण चंद्र से, नारी शील से, घोड़ा वेग से, मंदिर प्रतिदिन के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदियाँ हंसों के जोड़ों से, सभा पंडितों से, कुल सपूत से, धरती आपसे और तीनों लोक सूर्य से शोभित होते हैं। ततो राजा प्राह--'विद्वन्, तवोद्देश्यं किम्' इति। तब राजा ने कहा--'हे विद्वान्, तुम्हारा उद्देश्य क्या है?',
भोजप्रबन्धः १६५ ततः कविराह-- 'अम्बा कुप्यति न मया न स्नुषया सापि नाम्बया न मया । अहमपि न तया न तया वद राजन्कस्य दोषोऽयम्' ॥३०६॥ इति । राजा च दारिद्रयदोषं ज्ञात्वा कविं पूर्णमनोरथं चक्रे । तब कवि ने कहा-- माँ क्रोध करती है, पर न मुझ पर न अपनी पतोहू ( मेरी पत्नी ) पर; और वह ( मेरी पत्नी ) भी न माँ पर क्रोध करती है, न मुझ पर; और मैं न माँ पर क्रोध करता हूँ, न पत्नी पर; तो हे राजा, आप ही कहो कि यह दोष किसका है ? और राजा ने दरिद्रता का दोष समझा और कवि का मनोरथ पूर्ण कर दिया । ---: ० :--- ( २६ ) राज्ञः सर्वस्वदानम् एकदा द्वारपाल आगत्य राजानं प्राह--'देव, कविशेखरो नाम महाकविर्द्वारि वर्तते । राजा--'प्रवेशय' इत्याह । एक बार द्वारपाल आकर राजा से बोला--'महाराज, कवि शेखर नाम का महाकवि द्वार पर उपस्थित है ।' राजा ने कहा--प्रविष्ट कराओ ।' ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा पठति-- 'राजन्दौवारिकादेव प्राप्तवानस्मि वारणम् । मदवारणमिच्छामि त्वत्तोऽहं जगतीपते' ॥ ३५० ॥ तब कवि ने आकर स्वस्ति' कहा और पढ़ा-- हे राजा, वारण ( बाधा ) मुझे द्वारपाल से ही प्राप्त हो चुका है; हे जगत् के स्वामी, मैं तुम से मद युक्त वारण ( हाथी ) चाहता हूँ । तदा प्राङ्मुखस्तिष्ठन्नराजाऽतिसन्तुष्टस्तं प्राग्देशं सर्वं कवये दत्तं मत्वा दक्षिणाभिमुखोऽभूत् । ततः कविश्चिन्तयति--'किमिदम् । राजा मुखं परावृत्य मां न पश्यति' इति ।
१६६ भोजप्रबन्धः उस समय पूर्व की ओर (कवि की ओर) मुख करके बैठे राजा ने अत्यंत संतुष्ट हो 'पूर्व का संपूर्ण देश मैंने कवि को दे दिया'—यह मान लिया और दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ गया। तो कवि ने सोचा—'यह क्या है कि राजा मुँह फेर कर बैठ गया और मेरी ओर देखता भी नहीं?' ततो दक्षिणदेशे समागत्याभिमुखः कविः पठति-- 'अपूर्वेयं धनुर्विद्या भवता शिक्षिता कथम्। मार्गणौघः समायाति गुणो याति दिगन्तरम् ॥ ३११ ॥ ततो राजा दक्षिणदेशमपि मनसा कवये दत्त्वा स्वयं प्रत्यङ्मुखोऽभूत्। तब दक्षिण की ओर आ राजा के संमुख हो कवि ने पढ़ा--आपने यह अनोखी धनुर्विद्या कहाँ से सीखी है कि वाण-समूह तो आता है पर प्रत्यंचा (धनुष की डोरी) दूसरी ओर चली जाती है, अर्थात् मार्गणौघ (याचक समूह) के आते ही गुण (कृपा) दूसरी ओर हो जाती है। तो दक्षिण देश भी कवि को देने का मन में संकल्प कर राजा स्वयम् पश्चिम को मुख करके बैठ गया। कविस्तत्रागत्य प्राह-- 'सर्वज्ञ इति लोकोऽयं भवन्तं भाषते मृषा। पदमेकं न जानीषे वक्तुं नास्तीति याचके' ॥ ३१२ ॥ ततो राजा तमपि देशं कवेर्दत्तं मत्वोदङ्मुखोऽभूत्। कवि उधर आकर बोला-- आपको यह संसार व्यर्थ ही सर्वज्ञ कहता है; आप तो याचक से 'नहीं है' यह एक शब्द भी कहना नहीं जानते। तो राजा ने वह (पश्चिम) देश भी कवि को देकर उत्तर की ओर मुख कर लिया। कविस्तत्राप्यागत्य प्राह-- 'सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं कथ्यसे बुधैः। नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः' ॥ ३१३ ॥ ततो राजा स्वां भूमिं कविदत्तां मत्वोत्तिष्ठति स्म।