भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२७० 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती है तथा माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है। चौथी मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। आठवीं उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु तथा रोगों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा प्रभावशाली, धनी तथा शत्रुजयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को खर्चे के बारे में कठिनाई उठानी पड़ती है तथा बाहरी सम्बन्धों से कष्ट मिलता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी हानि पहुँचती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं पर विजय मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। 'सिंह' लग्न में 'बुध' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति विवेकी, दानी, भोगी तथा धनी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से व्यवसाय तथा स्त्री के पक्ष में भी उन्नति, सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है।

२७१ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि स्थित उच्च के बुध के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि होती है। भाई-बहिनों का यथेष्ट सुख भी मिलता है। सातवीं नीच-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के बारे में अनेक संकटों तथा चिन्ताओं का शिकार बनना पड़ता है। पेट की बीमारी रहती है तथा दैनिक जीवन भी असन्तोषजनक बना रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य की उन्नति होती है तथा धर्म का पालन भी होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, धर्मात्मा, पराक्रमी, यशस्वी तथा सुखी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है तथा धन का संचय होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, व्यवसाय तथा पिता के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा लाभ मिलता है।

२७२ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। साथ ही, धन की उन्नति भी होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है। ऐसा जातक धनी, सुखी, विद्वान्, सज्जन तथा स्वार्थी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता एवं धन की शक्ति से सफलता प्राप्त करता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव में देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। कौटुम्बिक सुख की प्राप्ति कम ही होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से जातक के शारीरिक सौन्दर्य, आत्मिक बल, विवेक तथा यश की वृद्धि होती है।

२७३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित नीच के बुध के प्रभाव से जातक की आयु-पक्ष में संकटों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती है। सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन की कमी रहते हुए भी दैनिक खर्च की पूर्ति होती है तथा कौटुम्बिक सुख चिन्तनीय रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंहलग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। वह धनी, सुखी, ईमानदार, उदार, सज्जन तथा ईश्वर-भक्त होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। ऐसा जातक बड़ा यशस्वी होता है तथा निरन्तर उन्नति करता रहता है ! 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएँ मिलती हैं तथा धन तथा प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा मकान आदि का सुख भी मिलता है।

२७४ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित बुध के प्रभाव से जातक को यथेष्ट लाभ होता है तथा धन, यश एवं सुख की वृद्धि होती रहती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, यशस्वी, विद्वान् तथा सन्ततिवान् होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से धन तथा विवेक द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु झगड़े-टंटों के कारण उसे हानि भी उठानी पड़ती है। [L18

२७५ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को धन तथा कौटुम्बिक सुख की प्राप्ति होती है, परन्तु सन्तान के पक्ष से कुछ कष्ट मिलता है। पांचवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष तथा ननसाल में हानि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से मतभेद रहता है तथा व्यवसाय एवं राजकीय क्षेत्र में असन्तोष बना रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंहलग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों से मतभेद रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है। सन्तान का सुख कुछ कठिनाई से मिलता है तथा आयु का लाभ होता है। पांचवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बुद्धि बल से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ खूब होता है। ऐसा जातक प्रत्येक क्षेत्र में साहसी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है, परन्तु विद्या एवं सन्तान के पक्ष में लाभ होता है। पांचवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं शत्रु- दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय से पूर्ण लाभ नहीं होता। नवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ एवं सुख मिलता है।

२७६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की विद्या-बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। साथ ही पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। नवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने में शारीरिक सुख, मनोबल, यश, सुख तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है, परन्तु गुरु के अष्टमेश होने के कारण सुख-दुःख दोनों का अनुभव होता रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित नीच के गुरु के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से चिन्ता रहती है। विद्या तथा सन्तान का पक्ष भी दुर्बल रहता है। पुरातत्त्व की हानि होती है तथा दैनिक जीवन के सुख में भी कमी आती है। पाँचवीं दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलता मिलती है। सातवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी सम्बन्धों से श्रेष्ठ लाभ होता है तथा व्यय अधिक रहता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन एवं कुटुम्ब को सामान्य वृद्धि होती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का स्त्री से वैमनस्य रहता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियों का अनुभव होता है। विद्या तथा सन्तान के पक्ष में सामान्य सफलता मिलती है। आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ मिलता है। पाँचवीं दृष्टि से एकादशभाव को देखने से अधिक लाभ अच्छा रहता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की कुछ वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से वैमनस्य रहता है।

२७७ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व में वृद्धि होती है, परन्तु सन्तान के पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या, बुद्धि में भी कुछ कमी रहती है । पाँचवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। सातवीं मित्र दृष्टि द्वितीयभाव को देखने से जातक धन-वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमियों के साथ सफलता मिलती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है। पुरातत्त्व के क्षेत्र में सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के कारण शारीरिक प्रभाव, सुख एवं मनोबल की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है, परन्तु पराक्रम बढ़ता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि का यथेष्ट लाभ होता है, परन्तु गुरु के अष्टमेश होने के कारण हर क्षेत्र में कुछ कमी का अनुभव भी अवश्य होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता-पक्ष में हानि तथा राज्य के पक्ष में सम्मान मिलता है। विद्या, बुद्धि, सन्तान तथा पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सामान्य सुख मिलता है। नवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से परेशानी होती है तथा झगड़े-झंझटों के कारण चिंताएं घेरे रहती हैं।

२७८ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आमदनी बढ़ती है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी वृद्धि होती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से मतभेद रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पञ्चमभाव को देखने से सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का लाभ मिलता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियां आती रहती हैं। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि में स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ मिलता है। विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन आदि का सुख प्राप्त होता है। सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष से परेशानी बनी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु की विशेष शक्ति मिलती है तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है। 'सिंह' लग्न में 'शुक्र' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य, श्रृंगार, यश तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। भाई- बहिन एवं पिता से मतभेद रहते हुए भी सुख मिलता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के पक्ष में सफलता मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय में लाभ होता है।

२७६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित नीच के शुक्र के प्रभाव से जातक को धन तथा कौटुम्बिक सुखअल्प मात्रा में प्राप्त होता है। पिता, व्यवसाय, राज्य तथा पराक्रम के क्षेत्र में भी कमी बनी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्व का लाभ होता है, परन्तु ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्य- शालियों जैसा जीवन व्यतीत करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई- बहिनों का सुख मिलता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय द्वारा भी लाभ प्राप्त होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा भाग्य तथा धर्म की वृद्धि करता है। वह बड़ा चतुर, योग्य तथा परि- श्रमी भी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का माता के साथ सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु भूमि एवं भवन का लाभ प्राप्त होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ, सफलता तथा यश की प्राप्ति होती है। भाई-बहिन का सुख भी यथेष्ट मिलता है तथा रहन-सहन भी रईसों-जैसा होता है।

२८० 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में सफलता मिलती है। भाई-बहिन एवं पिता का सुख भी प्राप्त होता है। वह अपनी योग्यता एवं चातुर्य के बल पर सर्वत्र सम्मानित भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ होता है तथा राज्य- पक्ष में भी सम्मान, सुख एवं लाभ मिलता है। ऐसा व्यक्ति राजनीतिज्ञ, सुखी, धनी, यशस्वी तथा चतुर होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक बड़ा चतुर, प्रभावशाली तथा शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है। पिता के साथ सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु राज्य-पक्ष में उन्नति एवं सफलता मिलती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से सुख और लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों के बल पर सफलताएँ प्राप्त करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है तथा भाई- बहिन एवं पिता का सुख भी मिलता है। यह कुशलतापूर्वक गृहस्थी का संचालन करता है तथा यश प्राप्त करता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से जातक को शारीरिक शक्ति, प्रभाव, मनोबल तथा हिम्मत वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बहादुर तथा हुकूमत करने वाला होता है।

२६१ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित उच्च के शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरा- तत्त्व का लाभ होता है तथा भाई-बहिन एवं पिता से सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। दैनिक जीवन में वह बड़ा प्रभावशाली रहता है। राज्य-पक्ष में भी सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन के संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी बनी रहती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, सुख तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, परिश्रमी, यशस्वी, चतुर तथा हिम्मत वाला होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में स्वराशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक सफलताएँ मिलती हैं तथा यश, सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है। भाई-बहिनों का सुख भी पर्याप्त रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, मकान तथा भूमि का अच्छा सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, प्रभावशाली, परिश्रमी तथा भाग्यवान् होता है।

२८३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की आमदनी में खूब वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन एवं पिता का श्रेष्ठ सुख भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का भी विशेष लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी वाणी द्वारा सबको प्रभावित करने वाला, सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के सम्बन्ध से लाभ होता है। पिता तथा भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक शत्रु-पक्ष में चातुर्य द्वारा प्रभावशाली बना रहता है तथा अपनी हिम्मत से सभी झगड़ों में विजय प्राप्त करता है। 'सिंह' लग्न में 'शनि' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की शारीरिक कष्ट, रोगादि होते हैं, परन्तु शत्रु-पक्ष पर कुछ प्रभाव बना रहता है। तीसरी उच्च-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के लाभ, यश तथा सुख प्राप्त होता है।

२८४ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : पञ्चमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में कुछ परेशानी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्व- राशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय से सुख मिलता है। स्त्री बुद्धिमती होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश-भाव को देखने से आय में वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की वृद्धि होती है तथा सामान्य कौटुम्बिक सुख भी मिलता है। ऐसा जातक बड़ा विषयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावी रहता है तथा ननिहाल से भी शक्ति प्राप्त करता है। दैनिक खर्च के संचालन में तथा स्त्री-पक्ष से कुछ असन्तोष रहता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है, परन्तु आयु के विषय में कुछ अशान्ति रहती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक होता है, जिससे परेशानी रहती है। दसवीं उच्चदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई- बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मत से कठिनाइयों पर विजय पाता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष तथा दैनिक व्यवसाय में कठिनाइयाँ बनी रहती हैं। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है। तीसरी नीचदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की कुछ हानि होती है तथा यश में कमी आती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आ जाती है।

२८३ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में हानि-लाभ दोनों की प्राप्ति होती है। स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बाधाएँ आती हैं। तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के विषय में असन्तोष रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी में वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सुख-दुःखपूर्ण बना रहता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंहलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक के प्रभाव तथा पराक्रम में बहुत वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा स्त्री-पक्ष पर विशेष प्रभाव बना रहता है। दैनिक आमदनी भी अच्छी रहती है। तीसरी शत्रु- दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ रहती हैं। सातवीं नीचदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कमी आती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण परेशानी भी रहती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंहलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी असन्तोष रहता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष पर प्रभाव रहता है, परन्तु कुछ कठिनाइयों के साथ शत्रुओं पर विजय मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा सफलता की प्राप्ति होती है। दसवीं दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में रोग रहता है तथा सौन्दर्य में कुछ कमी आती है।

२८६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है। शत्रु-पक्ष से भी विशेष लाभ होता है। कुछ परेशानियों के साथ स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व में कमी आती है तथा आयु के विषय में भी चिन्ताएं बढ़ आती हैं। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी संबंधों से कुछ लाभ होता है। शत्रु-पक्ष से परेशानी भी मिलती है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव की देखने से धन-जन की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। दसवीं नीच- दृष्टि से नवमभाव की देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म की भी हानि होती है। ऐसा व्यक्ति स्त्री-पक्ष तथा व्यवसाय से कष्ट पाने वाला, अपयशी तथा रोगी होता है। 'सिंह' लग्न में 'राहु' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव के जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा सुख में कमी आती है तथा कभी-कभी घोर कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा साहस के सहारे आगे बढ़ता है तथा भीतरी चिन्ताओं से चिन्तित भी बना रहता है।

२८७ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी उसे घोर आर्थिक कष्ट भी उठाना पड़ता है तथा ऋण- ग्रस्त भी होना पड़ता है तो कभी आकस्मिक धन का लाभ भी होता रहता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा चालाक होता है तथा धन-वृद्धि के लिए कठिन परिश्रम करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन की ओर से कुछ कष्ट प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। वह गुप्त युक्तियों द्वारा गंभीरतापूर्वक अपनी स्वार्थ-सिद्धि करता है तथा दृढ़ निश्चयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की मातृ पक्ष से कष्ट मिलता है तथा भूमि, भवन आदि के सुख में बाधा उत्पन्न होती है। उसे परदेश में जाकर रहना पड़ता है। परन्तु वह हिम्मत, गुप्त युक्ति एवं धीरज के साथ सुख के साधनों को जुटाता तथा संकटों का सामना करता है।

२८८ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित नीच के राहु के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या की कमी रहती है। वह बुद्धि-बल से अपनी अयोग्यता को छिपाने का प्रयत्न करता है। परन्तु उसकी वाणी में विनम्रता, शिष्टता एवं सत्य का अभाव रहता है। वह गुप्त युक्तियों से स्वार्थ-सिद्धि करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक युक्ति-बल से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे शत्रुओं द्वारा अधिक परेशान भी किया जाता है। वह बड़ा हिम्मती, बहादुर, धैर्यवान् तथा साहसी होता है। झगड़े के समय वह अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करता है। उसे अपनी ननसाल के पक्ष से हानि भी उठानी पड़ती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी घोर परेशानियां आती रहती हैं, परन्तु वह बड़ी हिम्मत तथा धैर्य के साथ उनका मुकाबला करता है। कभी-कभी संकटों से बहुत घिर जाता है, किन्तु गुप्त युक्तियों द्वारा उन्हें पार कर जाता है।

२८६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु- तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है। उसके पेट के निम्न भाग में विकार रहता है तथा उसे चिन्ताएं एवं परेशानियां घेरे रहती हैं। उसे पुरातत्त्व की हानि भी उठानी पड़ती है।

'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक बार रुकावटें आती हैं तथा परेशानियां उठ खड़ी होती हैं। उसे धर्म-पालन में अरुचि रहती है। ऐसा व्यक्ति अपने भाग्य की वृद्धि के लिए अनेक प्रकार की युक्तियों का सहारा लेता है तथा धैर्यवान्, हिम्मती एवं साहसी होने के कारण परेशानियों की हटाने में कुछ सफल भी हो जाता है।

'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की पिता के सुख में कमी रहती है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परन्तु गुप्त युक्तियों के बल पर वह अनेक कठिनाइयों को पार कर जाता है तथा कुछ उन्नति भी प्राप्त कर लेता है।

२६० 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव के जातक की आमदनी में बहुत वृद्धि होती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता है। वह अपने धैर्य, साहस, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ को बढ़ाता रहता है, परन्तु कभी-कभी उसे हानि भी उठानी पड़ती है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने के लिए हर समय चिन्तित रहना पड़ता है तथा कभी-कभी घोर कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। उसे बाहरी सम्बन्धों से भी हानि पहुँचती है। परन्तु गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा साहस के बल पर वह थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है। 'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शारीरिक स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी आती है तथा कभी बाहरी चोट भी लगती है, जिसका शरीर पर स्थायी चिह्न बन जाता है। ऐसा व्यक्ति भीतर से काफी चिन्तित रहता है तथा सुख पाने के लिए कठिन परिश्रम करता है।