भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९३ चला जाता है। इसलिये उत्तम विचारसम्पन्न धर्मज्ञ गृहस्थ पहले देवता आदि सबकी सेवा करके फिर आश्रितवर्गका भरण-पोषण करनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता है। जिसके घरमें माता नहीं है और पत्नी पुंश्चली है, उसे वनवासी हो जाना चाहिये; क्योंकि उसके लिये वह गृह वनसे भी बढ़कर दुःखदायक है। वह दुष्टा सदा पतिसे द्वेष करती है और उसे विष-तुल्य समझती है। वह उसे भोजन तो देती नहीं; उलटे सदा डाँट- फटकार सुनाती रहती है। व्रजेश! अब गृहस्थ-पत्नियोंका जो सदाचार श्रुतिमें वर्णित है, उसे श्रवण करो। गृहिणी नारी पतिपरायणा तथा देव-ब्राह्मणकी पूजा करनेवाली होती है। उस शुद्धाचारिणीको चाहिये कि प्रातःकाल उठकर देवता और पतिको नमस्कार करके आँगनमें गोबर और जलसे लीपकर मङ्गल-कार्य सम्पन्न करे। फिर गृह-कार्य करके स्नान करे और घरमें आकर देवता, ब्राह्मण और पतिको नमस्कार करके गृहदेवताकी पूजा करे। इस प्रकार सती नारी घरके सारे कार्योंसे निवृत्त होकर पतिको भोजन कराती है और अतिथि-सेवा करनेके पश्चात् स्वयं सुखपूर्वक भोजन करती है। पुत्रोंको चाहिये कि वे पिताको स्नान कराकर उनकी पूजा करें। यों ही शिष्योंको गुरुका पूजन करना चाहिये। पुत्र और शिष्यको सेवककी भाँति उनके आज्ञानुसार सारा कार्य करना उचित है। पिता और गुरुमें कभी मनुष्य-बुद्धि नहीं करनी चाहिये। पिता, माता, गुरु, भार्या, शिष्य, स्वयं अपना निर्वाह करनेमें असमर्थ पुत्र, अनाथ बहिन, कन्या और गुरु-पत्नीका नित्य भरण- पोषण करना कर्तव्य है। तात! इस प्रकार मैंने सबके उत्तम धर्मका वर्णन कर दिया। व्रजेश! स्त्री-जाति तो वस्तुतः शुद्ध है। उसमें वे सारी पतिव्रताएँ और भी पावन मानी जाती हैं। सृष्टिके आदिमें ब्रह्माने एक ही प्रकारसे सारी जातियोंकी रचना की थी। वे सभी उत्तम बुद्धिवाली पवित्र नारियाँ प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं। जब केदार-कन्याके * शापसे वह धर्म नष्ट हो गया, तब ब्रह्माने कुपित होकर पुनः स्त्री- जातिका निर्माण किया और उसे तीन भागोंमें विभक्त कर दिया। उनमें पहली उत्तमा, दूसरी मध्यमा और तीसरी अधमा कही जाती है। धर्मसम्पन्ना उत्तमा स्त्री पतिकी भक्त होती है। वह प्राणोंपर आ बीतनेपर भी अपकीर्ति पैदा करनेवाले जार पुरुषको नहीं स्वीकार करती। जो गुरुजनोंद्वारा यत्नपूर्वक रक्षित होनेके कारण भयवश जार पुरुषके पास नहीं जाती और अपने पतिको कुछ-कुछ मानती है, वह कृत्रिमा नारी मध्यमा कही जाती है। नन्दजी ! ऐसी नारियोंका सतीत्व जहाँ स्थानाभाव है, समय नहीं मिलता है और प्रार्थना करनेवाला जार पुरुष नहीं है; वहीं स्थिर रह सकता है। अत्यन्त नीच कुलमें उत्पन्न हुई अधमा स्त्री परम दुष्टा, अधर्मपरायणा, दुष्ट स्वभाववाली, कटुवादिनी और झगड़ालू होती है। वह सदा उपपतिकी सेवा करती है और अपने पतिकी नित्य भर्त्सना करती रहती है, उसे दुःख देती है और विष-तुल्य समझती है। उसका पति भले ही भूतलपर रूपवान्, धर्मात्मा, प्रशंसनीय और महापुरुष हो; परंतु वह उपाय करके उपपतिद्वारा उसे मरवा डालती है। उसकी प्रीति बिजलीकी चमक और जलपर खिंची हुई रेखाके समान क्षणभङ्गुर होती है। वह सदा अधर्ममें तत्पर रहकर निश्चित रूपसे कपटपूर्ण वचन ही बोलती है। उसका मन न तो व्रत, तपस्या, धर्म और गृहकार्यमें ही लगता है और न गुरु तथा देवताओंकी ओर ही झुकता है।

  • केदार-कन्याका उपाख्यान इसी खण्डमें अन्यत्र देखना चाहिये।

६९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नन्दजी ! इस प्रकार तीन भेदोंवाली स्त्रीजातिकी कथा मैंने कह दी, अब विभिन्न प्रकारके भक्तोंका लक्षण सुनिये। तृणकी शय्याका प्रेमी भक्त सांसारिक सुखोंके कारणोंका त्याग करके अपने मनको मेरे नाम और गुणके कीर्तनमें लगाता है। वह मेरे चरणकमलका ध्यान करता है और भक्तिभावसहित उसका पूजन करता है। देवगण उस निष्काम भक्तकी अहैतुकी पूजाको ग्रहण करते हैं। ऐसे भक्त अणिमा आदि सारी अभीष्ट सिद्धियोंकी तथा सुखके कारणभूत ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा देवत्वकी कामना नहीं करते। उन्हें हरिकी दासताके बिना सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य आदि चारों मुक्तियोंकी अभिलाषा नहीं रहती और न वे निर्वाण-मुक्ति तथा अभीप्सित अमृत-पानकी ही स्पृहा करते हैं। उन्हें मेरी अतुलनीय निश्चल भक्तिकी ही लालसा रहती है। ब्रजेश्वर ! उन श्रेष्ठ सिद्धेश्वरोंमें स्त्री-पुरुषका भेद नहीं रहता और न समस्त जीवोंमें भिन्नता रहती है। वे दिगम्बर होकर भूख-प्यास आदि तथा निद्रा, लोभ, मोह आदि शत्रुओंका त्याग करके रात-दिन मेरे ध्यानमें निमग्न रहते हैं। नन्दजी ! यह मेरे सर्वश्रेष्ठ भक्तके लक्षण हैं। अब मध्यम आदि भक्तोंका लक्षण श्रवण करो। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मके प्रभावसे पवित्र हुआ गृहस्थ कर्मोंमें आसक्त न होकर सदा पूर्वकर्मका उच्छेदक कर्म ही करता है; वह यत्नपूर्वक कोई दूसरा कर्म नहीं करता; क्योंकि उसे किसी कर्मकी कामना ही नहीं रहती। वह मन, वाणी और कर्मसे सदा ऐसा चिन्तन करता रहता है कि जो कुछ कर्म है, वह सब श्रीकृष्णका है, मैं कर्मका कर्ता नहीं हूँ। ऐसा भक्त मध्यम श्रेणीका होता है। जो उससे भी नीची कोटिका है; वह श्रुतिमें प्राकृतिक अर्थात् अधम कहा गया है। उत्तम कोटिका भक्त अपने हजारों पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है। उसे स्वप्नमें भी यमराज अथवा यमदूतका दर्शन नहीं होता। मध्यम कोटिका भक्त अपनी सौ पीढ़ियोंका तथा प्राकृत भक्त पचीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। तात ! इस प्रकार मैंने आपके आज्ञानुसार तीन प्रकारके भक्तोंका वर्णन कर दिया। अब सावधानतया ब्रह्माण्डकी रचनाका आख्यान श्रवण कीजिये। नन्दजी ! भक्तलोग यत्न करनेपर ब्रह्माण्ड- रचनाका प्रयोजन जान लेते हैं। मुनियों, देवताओं और संतोंको बड़े दुःखसे कुछ-कुछ ज्ञात होता है। पूर्णरूपसे विश्वका ज्ञान तो अनन्तस्वरूप मुझको, ब्रह्मा और महेश्वरको है। हमारे अतिरिक्त धर्म, सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेद, वेदमाता सावित्री, स्वयं सर्वज्ञा राधिका-ये लोग भी विश्व-रचनाका अभिप्राय जानते हैं, इनके अतिरिक्त और किसीको पता नहीं है। उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न सभी विद्वान् इसके वैषम्यार्थको पूर्णरूपसे जाननेमें असमर्थ हैं। जैसे आकाश और आत्मा नित्य हैं; उसी प्रकार दसों दिशाएँ नित्य हैं। जैसे प्रकृति नित्य है, वैसे ही विश्वगोलक नित्य है। जैसे गोलोक नित्य है, उसी तरह वैकुण्ठ भी नित्य है। एक समयकी बात है। जब मैं गोलोकमें रास- क्रीड़ा कर रहा था, उसी समय मेरे वामाङ्गसे एक षोडशवर्षीया नारी प्रकट हुई। वह अत्यन्त सुन्दरी बाला रमणियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उसके शरीरका रंग श्वेत चम्पकके समान गौर था। उसकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाको लज्जित कर रही थी। वह रत्नाभरणोंसे भूषित थी और उसके अङ्गपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ी शोभा पा रही थी। उसके सभी अङ्ग मनोहर और कोमल थे तथा उसका प्रसन्नमुख मन्द-मन्द मुस्कानसे सुशोभित था। उसके चरणोंका अधोभाग सुन्दर महावरसे उद्भासित हो रहा था। वह सुन्दर नेत्रोंवाली सौन्दर्यशालिनी बाला गजेन्द्रकी-सी

६३- केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९५

चाल चल रही थी। उस कामिनीने रासक्रीड़ाके अवसरपर प्रकट होकर मुझे आगेसे पकड़ लिया। इसी कारण पुरातत्त्ववेत्ताओंने उसका ‘राधा' नाम रखा और उसकी पूजा की। उसकी प्रकृति परम प्रसन्न थी; इसलिये वह ईश्वरी ‘प्रकृति' कहलायी। समस्त कार्योंमें समर्थ होनेके कारण वह ‘शक्ति' नामसे कही जाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा, सर्वरूपा और सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; सम्पूर्ण मङ्गलोंके दानमें दक्ष होनेके कारण वह ‘सर्वमङ्गला' है। वह वैकुण्ठमें ‘महालक्ष्मी' और मूर्तिभेदसे ‘सरस्वती' है। वेदोंको उत्पन्न करनेके कारण वह ‘वेदमाता' नामसे प्रसिद्ध है। वह ‘सावित्री' और तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाली ‘गायत्री' भी है। पूर्वकालमें उसने दुर्गका संहार किया था; इसी कारण वह ‘दुर्गा' नामसे विख्यात है। यह सती प्राचीनकालमें समस्त देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थी, इसीसे यह ‘आद्याप्रकृति' कहलाती है। यह समस्त असुरोंका मर्दन करनेवाली, सम्पूर्ण आनन्दकी दाता, आनन्दस्वरूपा, दुःख और दरिद्रताका विनाश करनेवाली, शत्रुओंको भय प्रदान करनेवाली और भक्तोंके भयकी विनाशिका है। वही ‘सती' रूपसे दक्षकी कन्या हुई और पुनः हिमालयसे उत्पन्न होकर ‘पार्वती' कहलाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा है। पृथ्वी उसकी एक कला है। तुलसी और गङ्गा उसीकी कलासे उत्पन्न हुई हैं। यहाँतक कि सम्पूर्ण स्त्रियोंका आविर्भाव उसकी कलासे ही हुआ है। तात! जिस शक्तिसे सम्पन्न होकर मैं बारंबार सृष्टि-रचना करता हूँ, उसे रासके मध्य स्थित देखकर मैंने उसके साथ क्रीड़ा की। उस समय रासमण्डलमें उन दोनोंके शरीरसे जो पसीनेकी बूँदें भूतलपर गिरीं, उनसे एक मनोहर सरोवर उत्पन्न हो गया, जो राधाके नामके सदृश था (अर्थात् उसका नाम राधासरोवर हुआ)। उस सरोवरसे जो पसीनेकी धारा वेगपूर्वक नीचे विश्व-गोलकमें गिरी, उससे सारा ब्रह्माण्डगोलक जलसे भर गया। ब्रजेश्वर! पहले-पहल सब कुछ जलमग्न था; उस समय सृष्टि नहीं हुई थी। तब शृङ्गारके समाप्त होनेपर मैंने राधामें वीर्यका आधान किया। तत्पश्चात् श्रीराधिकाने गर्भ धारण करके दीर्घकालके बाद एक परम अद्भुत डिम्ब प्रसव किया। उसे देखकर देवीको क्रोध आ गया; तब उन्होंने उसे पैरसे नीचे विश्व-गोलकमें ढकेल दिया। तात! वह जलमें गिर पड़ा और सबका आधारस्वरूप ‘महान् विराट्' हो गया। तब अपनी संतानको जलमें पड़ा हुआ देखकर मैंने राधाको शाप दे दिया। विभो! मेरे शापके कारण राधा संतानहीन हो गयी। ब्रजेश्वर! इसलिये जिस डिम्बसे कलाका आश्रय लेकर वह महान् विराट् पैदा हुआ था, उसीसे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्यान्य जो देवियाँ और स्त्रियाँ हैं; वे सभी क्रमशः कला, कलांश और कलांशके अंशसे उत्पन्न हुई हैं।

ब्रजेश! उस महान् विराट्ने मेरे द्वारा दिये गये अंगुष्ठामृतका पान किया और फिर स्वकर्मानुसार स्थावर-रूप होकर वह जलमें शयन करने लगा। योगबलसे जल ही उसकी शय्या और उपाधान था तथा उसके रोमकूप सदा जलसे भरे रहते थे। पुनः उनमें ‘क्षुद्र विराट्' शयन करने लगा। उस क्षुद्र विराट्की नाभिसे सहस्रदल कमल उत्पन्न हुआ। उस कमलपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने जन्म लिया; इसी कारण वे कमलोद्भव कहे जाते हैं। वहाँ आविर्भूत होकर वे ब्रह्मा चिन्ताग्रस्त हो यों सोचने लगे—'यह देह किससे उत्पन्न हुई है तथा मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु कहाँ हैं?' इसी चिन्तामें वे तीन लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके भीतर चक्कर काटते रहे। तत्पश्चात् पाँच लाख दिव्य वर्षोंतक उन्होंने तपस्याद्वारा मेरा स्मरण किया, तब मैंने उन्हें मन्त्र प्रदान किया, जिसका वे पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको काबूमें करके

६९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नियतरूपसे सात लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके अंदर जप करते रहे। इसके बाद मुझसे वर पाकर उन सृष्टिकर्ताने सृष्टिकी रचना की। मेरी मायाके बलसे ब्रह्माने प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, नौ ग्रह, आठ वसु, तीन करोड़ देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, भूत-प्रेत आदि राक्षस एवं चराचर जगत्की रचना की। उन्होंने प्रत्येक विश्वमें क्रमशः सात स्वर्ग, सात सागरोंसे संयुक्त स्वर्णभूमिवाली सप्तद्वीपवती पृथ्वी, अन्धकारमय स्थान, सात पाताल तथा इनसे युक्त ब्रह्माण्डका निर्माण किया। प्रत्येक विश्वमें चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यक्षेत्र भारत और इन गङ्गा आदि तीर्थोंकी सृष्टि की। ब्रजेश्वर ! महाविष्णुके शरीरमें जितने रोमकूप हैं, क्रमशः उतने ही असंख्य विश्व हैं। उन विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें वैकुण्ठ है, जो निराश्रय है तथा मेरी इच्छासे जिसका निर्माण हुआ है। वेद भी उसका वर्णन करके पार नहीं पा सकते। निश्चय ही कुयोगियों तथा भक्तिहीनोंके लिये उसका दर्शन दुर्लभ है। इससे ऊपर गोलोक है। वह परम विचित्र आश्रयस्थान वायुके आधारपर टिका हुआ है। मेरी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय अविनाशी लोकका निर्माण हुआ है। वह शतशृङ्ग पर्वत, पुण्यमय वृन्दावन, रमणीय रासमण्डल तथा विरजा नदीसे युक्त है। विरजा अमूल्य रत्नसमूहों, हीरा, माणिक्य तथा कौस्तुभ आदि असंख्य मणियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी मनोहर है। उस गोलोकमें प्रत्येक महल अमूल्य रत्नोंके बने हुए हैं। उसमें ऐसा मनोहर परकोटा है, जिसे विश्वकर्माने भी नहीं देखा है। वे महल गोपियों, गोपगणों तथा कामधेनुओंसे परिवेष्टित हैं। वहाँ रास-मण्डल असंख्यों कल्पवृक्षों, पारिजातके तरुओं, सरोवरों तथा पुष्पोद्यानोंसे समावृत है। वह गोपों, मन्दिरों, रत्नप्रदीपों, पुष्प-शय्याओं, कस्तूरी- कुङ्कुमयुक्त सुगन्धित चन्दनके गन्धों, क्रीडोपयुक्त भोगपदार्थों, सुवासित जल और पान-बीड़ाओं, रमणीय सुगन्धियुक्त धूपों, पुष्पमालाओं और रत्नजटित दर्पणोंसे भरा-पूरा है। अमूल्य रत्नाभरणों तथा अग्नि-शुद्ध वस्त्रोंसे अलंकृत राधाकी दासियाँ सदा उसकी रक्षा करती रहती हैं। नवयौवनसम्पन्न तथा अनुपम सौन्दर्यशाली गजेन्द्रोंकी सेना क्रमशः उसे घेरे हुए है। ब्रजराज ! वह रमणीय तथा चन्द्रमण्डलके समान गोल है। उस विस्तृत मण्डलकी रचना बहुमूल्य रत्नोंद्वारा हुई है। वह कस्तूरी-कुङ्कुमयुक्त सुन्दर एवं सुगन्धित चन्दनसे समर्चित है। वह फल-पल्लवयुक्त मङ्गल-कलशों, दही और खीलों, पत्तों, कोमल दूर्वाङ्कुरों, फलों, असंख्य केलेके मनोहर खम्भों तथा रेशमी सूत्रमें बँधे हुए कोमल चन्दन-पल्लवोंकी वन्दनवारोंसे आच्छादित है और चन्दनयुक्त पुष्पमालाओं एवं आभूषणोंसे विभूषित है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ शतशृङ्ग पर्वत मनको खींचे लेता है। वह अत्यन्त सुन्दर है। वेद भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। वह हीरेके हारसे युक्त होनेके कारण रमणीय है तथा मनोहर परकोटेकी तरह उस गोलोकको चारों ओरसे घेरे हुए है। वहाँ चन्दनके वृक्षोंसे युक्त रमणीय वृन्दावन है, जो कल्पवृक्षों, सुन्दर मन्दार-पुष्पों, कामधेनुओं, शोभाशाली मनोहर पुष्पवाटिकाओं, रमणीय क्रीड़ा-सरोवरों और परम सुन्दर क्रीड़ाभवनोंसे सुशोभित है। उसके एकान्तमें रास-क्रीड़ाके योग्य अत्यन्त सुन्दर स्थान है, जो चारों ओरसे गोलाकार है। रक्षकरूपमें नियुक्त हुई असंख्यों सुन्दरी गोपिकाएँ उसकी रक्षा करती हैं। वहाँ कोकिल कूकते रहते हैं तथा भौंरोंका गुंजार होता रहता है। उसीके एकान्त स्थलमें एक रमणीय अक्षयवट है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई विशाल है। सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला वह अक्षयवट गोपियोंके लिये कल्पवृक्ष है। वहाँ राधाकी दासियाँ

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९७ क्रीड़ा करती रहती हैं। विरजाके तटप्रान्तके जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु उसे पवित्र करती रहती है। उस अक्षयवटके नीचे वृन्दावनमें विनोद करनेवाली मेरे प्राणोंकी अधिदेवता वह राधा असंख्यों दासीगणोंके साथ क्रीड़ा करती है। वही राधा इस समय वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई है। ब्रजेश ! ब्रह्मादि देवता, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और सिद्धगण गुण, बल, बुद्धि, ज्ञानयोग और विद्याद्वारा उसकी पूजा करते हैं। तात ! यह मेरी प्रिया मेरे ही समान है; अतः सब तरहसे वन्दनीया है। नन्दजी ! इस प्रकार मैंने यथोचित एवं परिमित रूपसे ब्रह्माण्डोंका वर्णन कर दिया। अब पुनः आपकी और क्या सुननेकी इच्छा है ? (अध्याय ८४) चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन नन्दजीने कहा - महाभाग ! अब चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका तथा समस्त प्राणियोंके कर्मविपाकका वर्णन कीजिये । श्रीभगवान् बोले- तात ! मैं चारों वर्णोंके वेदोक्त भक्ष्याभक्ष्यका यथोचितरूपसे वर्णन करता हूँ, उसे सावधान होकर श्रवण करो। मनुका कथन है कि लोहेके बर्तनमें जलपान, उसमें रखा हुआ गौका दूध-दही-घी, पकाया हुआ अन्न भ्रष्ट्रादिक (भुना हुआ पदार्थ), मधु, गुड़, नारियलका जल, फल, मूल आदि सभी पदार्थ अभक्ष्य हो जाते हैं। जला हुआ अन्न तथा गरमाया हुआ बदरीफल या खट्टी काँजीको भी अभक्ष्य कहा गया है। काँसेके बर्तनमें नारियलका जल और ताम्रपात्रमें स्थित मधु तथा घृतके अतिरिक्त सभी गव्य पदार्थ (दूध-दही आदि) मदिरा-तुल्य हो जाते हैं। ताम्रपात्रमें दूध पीना, जूठा रखना, घीका भोजन करना और नमकसहित दूध खाना तुरंत ही अभक्ष्यके समान पापकारक हो जाता है। मधु मिला हुआ घी, तेल और गुड़ अभक्ष्य है तथा शास्त्रके मतानुसार गुड़मिश्रित अदरक भी अभक्ष्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पीनेसे अवशिष्ट जल, माघमासमें मूली और शय्यापर बैठकर जप आदिका सदा परित्याग कर दे। उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको दिनमें दो बार तथा दोनों संध्याओंमें और रात्रिके पिछले पहरमें भोजन नहीं करना चाहिये। पीनेका जल, खीर, चूर्ण, घी, नमक, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, गुड़, दूध, मट्ठा तथा मधु - ये एक हाथसे दूसरे हाथपर ग्रहण करनेसे तत्काल ही अभक्ष्य हो जाते हैं। श्रुतिकी सम्मतिसे चाँदीके पात्रमें रखा हुआ कपूर अभक्ष्य हो जाता है। यदि परोसनेवाला व्यक्ति भोजन करनेवालेको छू दे तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है - यह सभीको सम्मत है। ब्राह्मणोंको भैंसका दूध, दही, घी, स्वस्तिक और माखन नहीं खाना चाहिये। रविवारको अदरक सभीके लिये अभक्ष्य है। ब्राह्मणोंके लिये बासी अन्न, जल और दूध निषिद्ध है। असंस्कृत नमक और तेल अभक्ष्य है; परंतु अग्निद्वारा संस्कृत पवित्र व्यञ्जन सभीके खाने योग्य है। एक हाथसे धारण किया हुआ, गँदला, कृमियुक्त और अपवित्र जल अपेय होता है - यह सर्वसम्मत है। श्रीहरिको निवेदित किये बिना कोई भी पदार्थ ब्राह्मणों, यतियों, ब्रह्मचारियों, विशेष करके वैष्णवोंको नहीं खाना चाहिये। तात ! जिस-किसी वस्तुमें अथवा मधु, दूध, दही, घी और गुड़में यदि चींटियाँ पड़ गयी हों तो उसे कभी नहीं खाना चाहिये। ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पका हुआ शुद्ध फल, जिसे पक्षीने काट दिया हो अथवा उसमें कीड़े पड़ गये हों तथा कौवेद्वारा उच्छिष्ट किया हुआ पदार्थ सभीके लिये अभक्ष्य होता है। घी अथवा तेलमें पकाया हुआ

६९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मिष्ठान्न तथा पीठक, यदि उसे शूद्रने बनाकर तैयार किया हो तो वह शूद्रोंके ही खाने योग्य होता है, ब्राह्मणोंके लिये नहीं। जो अपवित्र हैं, उन सबके अन्न-जलका परित्याग कर देना चाहिये। अशौचान्तके दूसरे दिन सब शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। ब्रजेश्वर ! इस प्रकार मैंने अपनी जानकारीके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका वर्णन कर दिया। पिताजी ! श्रुतिके मतानुसार कर्मोंका विपाक बड़ा दुष्कर होता है। इस विषयमें क्रमशः चारों वेदोंमें चार प्रकारके मत बतलाये गये हैं; उनका सारभूत रहस्य मैं कह रहा हूँ, सुनिये। चाहे अरबों कल्प बीत जायें तो भी भोग किये बिना कर्मका क्षय नहीं होता; अतः अपने द्वारा किया हुआ शुभ-अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है*। तीर्थों और देवताओंके सहयोगसे मनुष्योंकी भी कुछ सहायता हो जाती है; परंतु तात ! जो मुझसे विमुख है, उसे निश्चय ही उसके द्वारा किये गये प्रायश्चित्त उसी प्रकार पवित्र नहीं कर सकते, जैसे नदियाँ मदिराके घड़ेको पावन नहीं कर सकतीं। न तो उत्तम कर्मसे दुष्कर्मका नाश होता है और न दुष्कर्म करनेसे सुकर्म ही नष्ट होता है। यहाँतक कि यज्ञ, तप, व्रत, उपवास, तीर्थस्नान, दान, जप, नियम, पृथ्वीकी परिक्रमा, पुराण-श्रवण, पुण्योपदेश, गुरु और देवताकी पूजा, स्वधर्माचरण, अतिथि-सत्कार, ब्राह्मणोंका पूजन एवं विशेषतया उन्हें भोजन करानेसे भी दुष्कर्मका विनाश नहीं होता। ब्राह्मणको जो दिया जाता है, वह पूर्णरूपसे प्राप्त होता है; क्योंकि ब्राह्मण क्षेत्ररूप है और वह दान बीजके समान है। तात ! मनुष्य एक कर्मद्वारा स्वर्गको प्राप्त कर लेता है; परंतु मोक्ष कर्मसे नहीं मिलता। वह तो मेरी सेवासे सुलभ होता है। पुण्यकर्म करनेसे स्वर्ग, दुष्कर्म करनेसे नरक तथा कुत्सित कर्म करनेसे व्याधि और नीच योनिमें जन्म प्राप्त होता है, तत्पश्चात् वह पवित्र होता है। जो इच्छानुसार छोटे-बड़े पाप करनेवाला तथा गोहत्यारा है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने वर्षोंतक दन्दशूक नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ वह सर्पके डसनेके कारण विषकी ज्वालासे तृषित एवं पीड़ित होता है तथा आहार न मिलनेसे उसका पेट सट जाता है। तत्पश्चात् उस कुण्डसे निकलकर गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह गौकी योनिमें उत्पन्न होता है। तदनन्तर एक लाख वर्षतक वह कोढ़ी और चाण्डाल होता है, इसके बाद मनुष्य होता है। उस समय वह कर्मानुसार कुष्ठरोगयुक्त ब्राह्मण होता है। तब एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह नीरोग तथा पवित्र हो जाता है। गो-हत्या करनेवाला निश्चय ही उतने वर्षोंतक गौ होता है, जितने उस गौके शरीरमें रोएँ होते हैं। ब्रह्मघाती उनसे भी चौगुने वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है, तदनन्तर उससे चौगुने वर्षोंतक म्लेच्छ होता है। तत्पश्चात् उनसे चौगुने वर्षोंतक अंधा होकर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वहाँ चार लाख विप्रोंको भोजन करानेसे वह उस महान् पातकसे मुक्त होकर पवित्र नेत्रयुक्त और यशस्वी हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो स्त्रीकी हत्या करनेवाला है, उसे वेदमें महापातकी कहा गया है। वह उस स्त्रीके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें वास करता है। वहाँ उसे कीड़े काटते रहते हैं, आहार नहीं मिलता और नरक-यातना भोगनी पड़ती है। तदनन्तर वह पापी उतने ही वर्षोंतक जगत्में जन्म लेता है। वहाँ वह कर्मानुसार पापपरायण तथा राजयक्ष्मासे ग्रस्त रहता है। फिर सौ वर्षोंतक

  • नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ (८५। ३६)

१०२- वृन्दाद्वारा धर्मको अपनी गोदमें कर जीवनदानकी चेष्टा तथा धर्मपत्नी मूर्तिका उसे (धर्मको) जीवित करनेकी श्रीविष्णुसे प्रार्थना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९९ एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे शुद्ध होकर वह विद्वान् एवं तपःपरायण विप्र होता है। उस जन्ममें वह भी कुछ बचे-खुचे पापोंको भोगता है तथा सोना दान करनेसे शुद्ध हो जाता है। भ्रूणहत्या करनेवाला महापापी शुनीमुख नामक नरकमें जाता है। वहाँ वह सौ वर्षोंतक सूक्ष्म शस्त्रद्वारा पीड़ित किया जाता है। फिर उसे निश्चय ही सौ वर्षोंतक घोड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। इसके बाद वह पापी अपने कर्मके फलस्वरूप दादके रोगसे युक्त वैश्य होता है और पचास वर्षोंतक वह कष्ट भोगकर पुनः स्वर्णदानसे शुद्ध होता है। इसके बाद अपने कुलमें उत्पन्न होनेपर भी वह नीरोग होता है और फिर पवित्र ब्राह्मण होकर जन्म लेता है। युद्धके बिना क्षत्रियको मारनेवाला ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय तप्तशूल नरकमें जाता है। वहाँ उसे एक हजार वर्षतक तपाये हुए लोहेसे काढ़ेकी भाँति पकाया जाता है और वह आर्तनाद करता है। तदनन्तर वह सौ वर्षोंतक मदमत्त गजराज होता है। इसके बाद सौ वर्षोंतक रक्तदोषयुक्त शूद्र होता है। वहाँ वह हाथी दान करनेसे रोगमुक्त होकर फिर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वैश्य और शूद्रकी हत्या करनेवाला वैश्य तथा वैश्यकी हिंसा करनेवाला शूद्र-ये निश्चय ही समान पापके भागी होते हैं। इन्हें सौ वर्षोंतक कृमिकुण्ड नामक नरकमें वास करना पड़ता है। वहाँ कीड़ोंके काटनेसे वह महान् दुःखी होता है। इसके बाद वह कृमिरोगसे युक्त होकर सौ वर्षोंतक किरात होता है। व्रजेश्वर ! तदनन्तर वह पचास वर्षोंतक मन्दाग्नियुक्त, दुर्बल, कृशोदर, गरीब ब्राह्मण होता है। फिर तीर्थमें घोड़ेका दान करनेसे उसकी मुक्ति हो जाती है। तात! चारों वर्णोंमें किसी भी वर्णका मनुष्य जो पीपलका वृक्ष काटता है, वह ब्रह्महत्याके चौथाई पापका भागी होता है और उसे निश्चय ही असिपत्र नामक नरकमें जाना पड़ता है। झूठी गवाही देनेवाले, कृतघ्न, अतिकृतघ्न, विश्वासघाती, मित्रघाती और ब्राह्मणोंका धन हरण करनेवाला- ये महापापी कहलाते हैं। इन्हें हजारों वर्षोंतक कुम्भीपाकमें रहना पड़ता है। वहाँ वे रात-दिन खौलते हुए तेलसे संतप्त किये जाते हैं, उन्हें व्याधियाँ घेरे रहती हैं और सर्पाकार जन्तु काटता रहता है। तदनन्तर वह पापी हजार करोड़ जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक सूअर और सौ जन्मोंतक हिंसक पशु होनेके बाद रोगग्रस्त शूद्र होता है। उस जन्ममें वह मन्दाग्नि तथा ज्वरसे पीड़ित रहता है तथा सौ पल सोना दान करके अवश्य ही शुद्ध हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो मनुष्य वस्त्र चुरानेवाला, गव्य (दूध-दही-घी)- की चोरी करनेवाला, चाँदी और मुक्ताका अपहरण करनेवाला तथा शूद्रके धनको लूट लेनेवाला होता है; वह सौ वर्षोंतक मूत्रकुण्डका भोग करके पुनः हजार वर्षोंतक बगुलेकी योनिमें उत्पन्न होता है- यह ध्रुव है। व्रजराज ! तदनन्तर वह सौ वर्षोंतक शूद्रजातिमें जन्म लेता है। वहाँ वह पापी कुष्ठरोगसे युक्त होता है और उसके घावसे मवाद निकलती रहती है। तत्पश्चात् थोड़ा-बहुत कोढ़से युक्त होकर ब्राह्मण होता है और छः पल सोना दान करनेसे पवित्र होकर रोगमुक्त हो जाता है। जो खजाना लूटनेवाला, फल चुरानेवाला तथा खेल- ही-खेलमें धनका अपहरण करनेवाला है, वह भूतलपर यक्ष होता है। फिर सौ वर्षोंतक नीलकण्ठ पक्षी होता है। तत्पश्चात् भारतभूमिपर काले रंगवाला शूद्र होता है। फिर जन्म- जन्मान्तरके बाद अधिक अङ्गोंवाला ब्राह्मण होता है। वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पुनः ब्राह्मण होकर मुक्त हो जाता है। पके हुए पदार्थोंकी चोरी करनेवाला निश्चय ही पशुयोनिमें उत्पन्न होता है। वहाँ वह सात जन्मोंतक जिसका अण्डकोश गन्धयुक्त होता है तथा जिसे कस्तूरी नामसे पुकारा जाता है; वह कस्तूरी-मृग होकर पुनः एक

६४- सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना

७०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जन्मतक गन्धक होता है। फिर गलितकुष्ठवाला तथा वह कुलटा रौरवकी यातना भोगकर सात शूद्र होता है। तत्पश्चात् अवशिष्ट रोगसे युक्त जन्मोंतक क्रमशः विधवा, वन्ध्या, अस्पृश्या, दुर्बल ब्राह्मण होता है, वहाँ वह छः पल सोना जातिहीना और नकटी होती है। लाल पदार्थकी दान करनेसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है। धान्यकी चोरी करनेवाला रक्तदोषसे युक्त होता है। आचारहीन चोरी करनेवाला सात जन्मोंतक दुःखी और मनुष्य यवन, हिंसक, लँगड़ा, दीक्षाहीन वङ्खर, कृपण होता है। वह सौ वर्षोंतक विष्ठाके कुण्डमें कुदृष्टि डालनेवाला काना, अहंकारी कर्णहीन, यातना भोगकर उस भयसे मुक्त होता है। स्वर्णका वेदकी निन्दा करनेवाला बहरा, बात काटनेवाला अपहरण करनेवाला मानव कोढ़ी और पतित गूँगा, हिंसक केशहीन, मिथ्यावादी दाढ़ीरहित, होता है तथा स्वर्ण-दान ग्रहण करनेवाला विष्ठाके दुष्ट वचन बोलनेवाला दन्तहीन, सत्यको छिपानेवाला कुण्डमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रात-दिन जिह्वाहीन, दुष्ट अंगुलिरहित तथा ग्रन्थकी चोरी विष्ठा खानेके बाद व्याध होता है, फिर रक्तविकारयुक्त करनेवाला मूर्ख एवं रोगी होता है। घोड़ेका दान शूद्र होता है। उस जन्ममें पापका उपभोग करके लेनेवाला तथा घोड़ा चुरानेवाला लालामूत्र नामक वह पुनः अवशिष्ट रोगयुक्त ब्राह्मण होता है और नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रहकर फिर स्वर्ण-दान करनेसे मुक्त हो जाता है। घोड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। हाथीका दान अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेवाला पापी लेनेवाला तथा हाथी-चोर एक हजार वर्षोंतक असंख्य वर्षोंतक पूर्वोक्त रौरव तथा महाभयंकर विष्ठाके कुण्डमें रहकर फिर हाथी होता है। कुम्भीपाकमें जाता है। इसके बाद हजार वर्षोंतक तत्पश्चात् शूद्रके घर जन्म लेता है। छागका वह कुलटा स्त्रियोंकी योनिका कीड़ा और लाख प्रतिग्रही और चोर मनुष्य सौ वर्षोंतक पूयकुण्डमें वर्षोंतक विष्ठाका कीट होता है। उससे पशुयोनिमें वास करके फिर चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् और पशुयोनिसे क्षुद्र जन्तुओंमें जन्म लेता है। एक वर्षतक छागकी योनिमें पैदा होता है। वहाँ तत्पश्चात् म्लेच्छ और फिर नीच शूद्र होता है। शत्रुके शस्त्रद्वारा काटे जानेसे मुक्त होकर ब्राह्मण इसके बाद वह व्याधिग्रस्त ब्राह्मण होता है और होता है। जो दान की हुई वस्तुका अपहरण पुनः ब्राह्मण होकर क्रमशः तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे करता है तथा वाग्दान करके पुनः उस बातको शुद्ध हो जाता है; परंतु पापके कारण उसका वंश पलट देता है; वह म्लेच्छयोनिमें जन्म लेता है नहीं चलता। फिर एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन और वहाँ कष्ट भोगकर नरकमें जाता है। कराकर वह पवित्र हो जाता है और पुत्र प्राप्त कर ब्रजेश ! जो (दूसरेको न देकर) अकेले ही लेता है। क्रोधी मनुष्य सात जन्मोंतक गदहा होता मिठाइयाँ गप कर जाता है, वह निश्चय ही है और जो मानव झगड़ालू होता है, उसे सात कालसूत्र नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक जन्मोंतक कौआ होना पड़ता है। लोहेकी चोरी यातना भोगकर फिर हजार वर्षोंकी आयुवाला करनेवाला संतानहीन, मषी चुरानेवाला कोकिल, प्रेत होता है। इसके बाद वह एक जन्मतक अञ्जनका चोर शुक और मिठाई चुरानेवाला मक्खी, एक जन्ममें चींटी, एक जन्ममें भ्रमर, कीड़ा होता है। तात! ब्राह्मण और गुरुसे द्वेष एक जन्ममें मधुमक्खी, एक जन्ममें बर्रै, एक करनेवाला सिरका कीट-जूँ होता है। पुंश्चली जन्ममें डाँस, एक जन्ममें मच्छर, एक जन्ममें स्त्रीका भोग करके पुरुष रौरव नरकमें जाता है दुर्गन्धयुक्त कीट और एक जन्ममें खटमल होनेके और फिर सौ वर्षोंतक निरर्थक कीट होता है बाद दुर्बुद्धि एवं रोगग्रस्त शूद्र होता है। फिर

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०१

उससे मुक्त होकर ब्राह्मण हो जाता है। तेलकी चोरी करनेवाला तेली तीन जन्मोंतक सिरका कीट-जूँ होता है। जो दुष्ट क्षेत्रकी सीमा-मेड़को नष्ट करनेवाला, भूमिचोर, हिंसक तथा दान की हुई भूमिको वापस ले लेनेवाला है, वह अवश्यमेव कालसूत्र नरकमें जाता है। वहाँ भूख-प्याससे पीड़ित होकर साठ हजार वर्षोंतक कष्ट भोगता है। तत्पश्चात् विष्ठाका कीड़ा होकर उत्पन्न होता है। इसके बाद एक जन्ममें असत् शूद्र होता है और उसके बाद शुद्ध हो जाता है। इसलिये विद्वान्को चाहिये कि वह यह सब जानकर यत्नपूर्वक इनसे सावधान रहे। लाल वस्त्रको चुरानेवाला एक जन्ममें लाल रंगका कीड़ा होता है। फिर एक जन्ममें शूद्र होता है; इसके बाद शुद्ध होकर ब्राह्मण हो जाता है। जो ब्राह्मण तीनों कालकी संध्याओंसे हीन है तथा जो मनुष्य प्रातःकाल, संध्या-समय और दिनमें सोता है, यज्ञोपवीतकी चोरी करता है, अशुद्ध संध्या करता है और वेद-वेदाङ्गका निन्दक है; उसके लिये स्वर्गका मार्ग निरुद्ध हो जाता है अर्थात् वह नरकगामी होता है और तीन जन्मोंतक पतित होता है। जो शूद्र होकर ब्राह्मणीके साथ व्यभिचार करता है; वह निश्चय ही कुम्भीपाकमें जाता है। वहाँ कष्ट झेलता हुआ तीन लाख वर्षोंतक यातना भोगता है। वह रात-दिन भयंकर खौलते हुए तेलमें जलता रहता है। तत्पश्चात् वह पापी कुलटा नारियोंकी योनिका कीड़ा होता है। वहाँ साठ हजार वर्षोंतक उस योनिका मल ही उसका आहार होता है। फिर क्रमशः एक लाख जन्मोंतक वह चाण्डाल होता है। फिर एक जन्ममें घावयुक्त कोढ़वाला शूद्र होता है। इसके बाद शुद्ध होकर व्याधियुक्त ब्राह्मण होता है; फिर तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे शुद्ध हो जाता है। जो मानव देवताकी उचित पूजा न करके उन्हें अपवित्र नैवेद्य समर्पित करता है, वह असत् शूद्र होता है।

ब्रजेश्वर! जो मिट्टी, भस्म और गोबरके पिण्डोंसे अथवा बालुकासे शिवलिङ्गका निर्माण करके एक बार भी उसका पूजन करता है, वह कल्पपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। तत्पश्चात् वह भूमिका स्वामी एवं महाविद्वान् ब्राह्मण होता है। सौ लिङ्गोंका पूजन करनेसे मनुष्य भारतवर्षमें राजा होता है। एक हजार लिङ्गपूजनसे उसे निश्चित फलकी प्राप्ति होती है। वह चिरकालतक स्वर्गमें निवास करके अन्तमें भारतभूमिपर राजेन्द्र होता है। दस हजार लिङ्ग-पूजनसे राजाधिराज और एक लाख लिङ्ग-पूजनसे चक्रवर्ती सम्राट् हो जाता है। अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन करनेसे उसका अतिरिक्त फल मिलता है। तीर्थस्नान, दान, ब्रह्मभोज, नारायणार्चन आदि कर्मसे वह ब्राह्मणवंशमें पैदा होता है, फिर अतिरिक्त तपस्याके प्रभावसे वह ब्राह्मण विद्वान् तथा जितेन्द्रिय वैष्णव हो जाता है। फिर अनेक जन्मोंके पुण्यफलसे वह भारतभूमिपर जन्म लेता है। उसके चरण-स्पर्शसे ही वसुन्धरा तत्काल पवित्र हो जाती है। ऐसे जीवन्मुक्त वैष्णव तीर्थोंको तीर्थत्व प्रदान करते हैं और अपने हजारों पूर्वजोंको पावन बना देते हैं। ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। जो अत्यन्त क्रूर, दुराचारी तथा देव-ब्राह्मणका द्वेषी होता है; वह हजार वर्षोंतक जहरीला साँप होता है। व्रजनाथ! जो नारी कुलटा स्त्रियोंके लम्पटोंकी दूती होती है; वह सौ वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें रहकर फिर छिपकली होती है। एक जन्मतक छिपकली होनेके बाद तीन जन्मोंतक हरिण, एक जन्ममें भैंसा, एक जन्ममें भालू, एक जन्ममें गैंडा और तीन जन्मोंतक सियारकी योनिमें उत्पन्न होती है। जो दूसरेके तड़ागका तथा भलीभाँति बोयी हुई दूसरेकी खेतीका दान करता है, वह मगरकी जातिमें उत्पन्न होकर तीन जन्मोंतक कछुआ होता है। एकादशी-व्रतको न रखनेवाला ब्राह्मण पतित हो जाता है। फिर अपने आहारसे दूना भोजन

६५- श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा ब्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना

७०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दान करके वह उस पापसे मुक्त होता है। जो अधम मानव मेरे जन्मदिन—भाद्रपदमासकी कृष्णाष्टमीको भोजन करता है, उसे निःसंदेह त्रिलोकीमें होनेवाले सभी पापोंको भोगना पड़ता है। इस प्रकार सभी नरकोंका भोग करनेके पश्चात् वह चाण्डाल होता है। इसी तरह शिवरात्रि और श्रीरामनवमीके दिन भी समझना चाहिये। जो शक्तिहीन होनेके कारण उपवास करनेमें असमर्थ हो, उसे हविष्यान्नका भोजन करना चाहिये और मेरा पुण्य महोत्सव सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये। इससे वह पापमुक्त होकर शुद्ध हो जाता है। इसके लिये यत्नपूर्वक मेरे नामोंका संकीर्तन करना चाहिये। जो देव-मूर्तियोंकी चोरी करता है, वह सात जन्मोंतक अंधा, दरिद्र, रोगग्रस्त, बहरा और कुबड़ा होता है। जो नराधम ब्राह्मण और देव-प्रतिमाको देखकर उन्हें नमस्कार नहीं करता; वह जबतक जीता है तबतक अपवित्र यवन होता है। जो ब्राह्मणको आया हुआ देखकर उठकर स्वागत नहीं करता; वह निश्चितरूपसे महापापी होता है। जो शिवका द्वेषी तथा देव-प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका-निर्वाह करनेवाला है, वह सात जन्मतक मुर्गा होता है। जो अज्ञानी पितरों और देवताओंके वेदोक्त पूजनका विनाश करता है, वह पापी रौरव नरकमें जाता है। वहाँ एक हजार वर्षतक यातना भोगनेके पश्चात् तीन जन्मोंतक तीर्थकाक होता है। फिर तीन जन्मोंतक किसी तीर्थमें सियारकी योनिमें उत्पन्न होकर मुर्देकी लाश खाता है। ब्रजेश्वर ! वही पापी तीन जन्मोंतक तीर्थोंमें शवकी रक्षा तथा कर्मानुसार मुर्दोंकी कफनखसोटी करता है। जो मूर्ख नित्य दम्भपूर्वक देवताकी पूजा करके भक्तिपूर्वक गुरुका पूजन नहीं करता और न उन्हें अन्न प्रदान करता है; वह पापी देवताके शापसे दुःखी, देवल (देवप्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला) और भयंकर देवद्रोही होता है; उसे पूजाका फल नहीं मिलता।

ब्रजेश्वर ! (हाथसे) दीपको बुझानेवाला सात जन्मोंतक जुगुनू होता है। जो इष्टदेवको निवेदन किये बिना ही खाता है तथा मछलीका अत्यन्त लोभी है; वह मछरंगा पक्षी होता है तथा सात जन्मोंतक बिलावकी योनिमें जन्म धारण करता है। बोरा चुरानेवाला कबूतर, माला हरण करनेवाला आकाशचारी पक्षी, धान्यकी चोरी करनेवाला गौरैया और मांसचोर हाथी होता है। विद्वानोंके कवित्वपर प्रहार करनेवाला सात जन्मतक मेढक होता है। जो झूठे ही अपनेको विद्वान् कहकर गाँवकी पुरोहिती करता है; वह सात जन्मोंतक नेवला, एक जन्ममें कोढ़ी और तीन जन्मोंतक गिरगिट होता है। फिर एक जन्ममें बर्र होनेके बाद वृक्षकी चींटी होता है। तत्पश्चात् क्रमशः शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण होता है। चारों वर्णोंमें कन्या बेचनेवाला मानव तामिस्र नरकमें जाता है और वहाँ तबतक निवास करता है, जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति रहती है। इसके बाद वह मांस बेचनेवाला व्याध होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्ममें जो जैसा होता है, उसीके अनुसार उसे व्याधि आ घेरती है। मेरे नामको बेचनेवाले ब्राह्मणकी मुक्ति नहीं होती—यह ध्रुव है। मृत्युलोकमें जिसके स्मरणमें मेरा नाम आता ही नहीं; वह अज्ञानी एक जन्ममें गौकी योनिमें उत्पन्न होता है। इसके बाद बकरा, फिर मेढ़ा और सात जन्मोंतक भैंसा होता है। जो मानव महान् षड्यन्त्री, कुटिल और धर्महीन होता है; वह एक जन्ममें तेली होकर फिर कुम्हार होता है। जो झूठा कलंक लगानेवाला और देवता एवं ब्राह्मणका निन्दक होता है, वह एक जन्ममें सोनार होकर सात जन्मोंतक धोबी होता है। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कुत्सित आचरणवाले तथा पवित्रतासे रहित होते हैं, उन्हें

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०३ दस हजार वर्षोंतक म्लेच्छयोनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो पुरुष कामभावसे स्त्रियोंकी कटि, स्तन और मुखकी ओर निहारता है, वह दूसरे जन्ममें दृष्टिहीन और नपुंसक होता है। जो ब्राह्मण ज्ञानहीन होते हुए आभिचारिक कर्म करनेवाला तथा हिंसक होता है; वह इस प्रकार दस हजार वर्षोंतक अन्धतामिस्र नरकमें वास करता है। तत्पश्चात् कर्मके भोगके अनुसार वह ब्राह्मण शूद्र होता है। जो शास्त्रज्ञ ज्योतिषी लोभवश झूठ बोलता है; वह सात जन्मोंतक वानरोंका सरदार होता है- यह ध्रुव है। तत्पश्चात् वह धर्महीन पापी अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें उत्तम बुद्धिसम्पन्न परम धर्मात्मा ब्राह्मण होता है। अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाला ब्राह्मण अग्निसे भी बढ़कर पवित्र और अत्यन्त तेजस्वी होता है, उससे देवगण सदा डरते रहते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, तीर्थोंमें पुष्कर, पुरियोंमें काशी, ज्ञानियोंमें शंकर, शास्त्रोंमें वेद, वृक्षोंमें पीपल, तपस्याओंमें मेरी पूजा तथा व्रतोंमें उपवास सर्वश्रेष्ठ है; उसी तरह समस्त जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। समस्त पुण्य, तीर्थ और व्रत ब्राह्मणके चरणोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मणकी चरणरज शुद्ध तथा पाप और रोगका विनाश करनेवाली होती है। उनका शुभाशीर्वाद सारे कल्याणोंका कारण होता है। तात! इस प्रकार मैंने अपनी जानकारी तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आपसे कर्मविपाकका वर्णन कर दिया। अब जो अवशिष्ट है, उसे श्रवण करो। इस कर्मविपाकको सुनकर उस वाचकको सोना, चाँदी, वस्त्र और पान देना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये उस ब्राह्मणको तुरंत सौ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गायें, चाँदी, वस्त्र और ताम्बूल दक्षिणारूपमें समर्पित करे। (अध्याय ८५) केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन नन्दजीने पूछा - प्रभो! आपने स्त्रियोंके प्रसङ्गसे केदार-कन्याका प्रस्ताव करके कर्मविपाकका वर्णन किया। अब विस्तारपूर्वक केदार-कन्याका चरित्र बतलाइये। वह केदार-कन्या कौन थी? भूपाल केदार कौन थे? किसके वंशमें उनका जन्म हुआ था? यह विवरणसहित मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये। श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी ! सृष्टिके आदिमें ब्रह्माके पुत्र स्वायम्भुव मनु हुए। उनकी स्त्रीका नाम शतरूपा था, जो स्त्रियोंमें धन्या और माननीया थी। उन दोनोंके प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र हुए। उत्तानपादके पुत्र महायशस्वी ध्रुव हुए। ध्रुवके पुत्र नन्दसावर्णि और नन्दसावर्णिके पुत्र केदार हुए। स्वयं श्रीमान् केदार विष्णु-भक्त तथा सातों द्वीपोंके अधिपति थे। उनकी रक्षाके लिये वे प्रतिदिन राजदरबारमें सुन्दर रूप- रंगवाली, सीधी, नौजवान गायें, जिनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था, ब्राह्मणोंको दान करते थे। प्रातःकालसे लेकर सायंकालतक ब्राह्मणोंको भोजन कराते थे; दुःखियों और भिक्षुकोंको यथोचित धन देते थे और स्वयं राजा विष्णु-भक्तिपरायण हो इन्द्रियोंको काबूमें करके फल-मूलका आहार करते हुए सब कुछ मुझे समर्पित करके रात- दिन मेरा जप करते थे। तदनन्तर लक्ष्मी अपनी कलासे कामिनियोंमें श्रेष्ठ कमलनयनी कन्याके रूपमें उनके यज्ञकुण्डसे प्रकट हुईं। उनके शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध किया हुआ वस्त्र था और वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन्होंने राजासे यों कहा- 'महाराज! मैं आपकी कन्या हूँ।' तब राजाने भक्तिपूर्वक उसकी

७०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भलीभाँति पूजा की और उसे अपनी पत्नीको समर्पित करके वे चुपचाप खड़े हो गये। तदनन्तर वह कन्या हर्षपूर्वक विनती करके और माता- पिताकी आज्ञा ले तपस्या करनेके लिये यमुना- तटपर स्थित रमणीय पुण्यवनको चली गयी। वह वृन्दाका तपोवन था; इसीलिये उसे 'वृन्दावन' कहते हैं। वहाँ तपस्या करके उसने वरोंमें श्रेष्ठ मुझको वररूपसे वरण किया। तब ब्रह्माने उसे वरदान दिया कि 'कुछ कालके पश्चात् तू कृष्णको प्राप्त करेगी'। फिर ब्रह्माजीने उसकी परीक्षाके लिये धर्मको एक परम सुन्दर तरुण ब्राह्मणके रूपमें उसके पास भेजा। वहाँ जाकर धर्मने कहा- मनोहरे ! तुम किसकी कन्या हो ? तुम्हारा क्या नाम है? यहाँ एकान्तमें तुम क्या कर रही हो? यह मुझे बतलाओ। सुन्दरि ! तुम क्या चाहती हो और किसलिये यह तपस्या कर रही हो? तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह वरदान माँगो। वृन्दा बोली - विप्रवर! मैं केदारराजकी कन्या हूँ, मेरा नाम वृन्दा है। मैं इस वृन्दावनमें वास करती हुई एकान्तमें तपस्या कर रही हूँ और श्रीहरिको अपना पति बनानेकी चिन्तामें हूँ। अतः ब्राह्मण ! यदि तुम्हारेमें ऐसा वरदान देनेकी शक्ति हो तो मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो; अन्यथा यदि तुम असमर्थ हो तो अपने रास्ते जाओ। तुम्हें यह सब पूछनेसे क्या लाभ ? धर्मने कहा- वृन्दे ! जो इच्छारहित, तर्कणा करनेके अयोग्य, ऐश्वर्यशाली, निर्गुण, निराकार और भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; उन परमात्माको पति बनानेके लिये लक्ष्मी और सरस्वतीके अतिरिक्त दूसरी कौन स्त्री समर्थ हो सकती है? वैकुण्ठशायी चतुर्भुज भगवान्‌की ये ही दो भार्याएँ हैं। गोलोकमें भी जो द्विभुज, वंशी बजानेवाले, किशोर गोप- वेषधारी, परिपूर्णतम श्रीकृष्ण हैं; उनकी पत्नी स्वयं परात्परा महालक्ष्मी राधा हैं। वे परमब्रह्म- स्वरूपिणी राधा उन श्यामसुन्दरकी, जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, ऐश्वर्यशाली, शमपरायण और परम सौन्दर्यशाली हैं, जिनका सुन्दर शरीर करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यकी निन्दा करनेवाला, अमूल्य रत्नाभरणोंसे विभूषित, सत्यस्वरूप और अविनाशी है तथा जो रमणीय पीताम्बर धारण करनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; सदा सेवा करती रहती हैं। वे श्रीकृष्ण द्विभुज और चतुर्भुज-रूपसे दो रूपोंमें विभक्त हैं। वे स्वयं चतुर्भुज-रूपसे वैकुण्ठमें और द्विभुज-रूपसे गोलोकमें वास करते हैं। पचीस हजार युग बीतनेके बाद इन्द्रका पतन होता है, ऐसे चौदह इन्द्रोंका शासनकाल लोकोंके विधाता ब्रह्माका एक दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। ऐसे तीस दिनका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षतक ब्रह्माकी आयु समझनी चाहिये। उन ब्रह्माकी आयुसमाप्ति, जिनका एक निमेष होता है, सनक आदि महर्षि जिनकी जीवनपर्यन्त सेवा करते रहते हैं, परंतु करोड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी जो विभु साध्य नहीं होते। सहस्रमुखधारी शेषनाग अरबों-खरबों कल्पोंतक जिनकी भक्तिपूर्वक रात-दिन सेवा तथा नाम- जप करते रहते हैं; परंतु वे परात्पर, दुराराध्य, हितकारी भगवान् साध्य नहीं होते। जो ब्रह्मा वेदोंके उत्पादक, विधाता, फलदाता और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; वे प्रत्येक जन्ममें उन ब्रह्मस्वरूप अविनाशी सनातनदेवका सदा अपने चारों मुखोंद्वारा स्तवन करते रहते हैं; परंतु वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, कालके काल तथा अन्तकके अन्तक उन भगवान्‌को सिद्ध नहीं कर पाते। वृन्दे! जो अपनी कलासे रुद्ररूप धारण करके जगत्‌का संहार करते हैं, पाँचों मुखोंसे उनकी स्तुति करते हैं, जिनसे बढ़कर भगवान्‌को दूसरा कोई प्रिय नहीं है; उनके द्वारा जब भगवान्

६६- श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०५

साध्य नहीं होते, तब दूसरेकी क्या बात है? वृन्दे! जो सर्वशक्तिस्वरूपा, दुर्गतिनाशिनी, परमब्रह्म-स्वरूपिणी, ईश्वरी, मूलप्रकृति, नारायणी, विष्णुमाया, वैष्णवी और सनातनी हैं, जिनकी मायासे भ्रमणशील जगत् सदा चक्कर काटता रहता है, वे दुर्गा भी जिन देवकी भक्तिपूर्वक रात-दिन स्तुति करती रहती हैं। गजानन गणेश और छः मुखवाले स्वामीकार्तिक भी भक्तिसहित यथाशक्ति जिनका स्तवन करते हैं। जिनकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी और ज्ञानियोंके गुरुके गुरु हैं, जिन गणेशसे बढ़कर सिद्धेन्द्र, देवेन्द्र, योगीन्द्र और ज्ञानियोंके गुरुओंमें कोई विद्वान् नहीं है, जो गणोंके स्वामी और देवताओंके अधिपति हैं; वे भगवान् गणेश जिनका ध्यान करते हैं। परमेश्वरी सरस्वती जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। लक्ष्मी रात-दिन जिनके चरणकमलकी सेवा करती हैं। जिनके कटाक्षसे सारा जगत् परिपूर्णतम एवं कल्याणमय है। जिनके भयसे वायु चलती है; जिनके भयसे सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं, अग्नि जलाती है और मृत्यु प्राणियोंमें विचरण करती है। जिनकी सेवा करनेसे पृथ्वी सबकी आधार-स्वरूपा तथा धनकी भण्डार हो गयी है। सुन्दरि! जिनसे भयभीत होकर समुद्र और पर्वत निश्चलरूपसे अपनी-अपनी मर्यादामें स्थित रहते हैं। जिनके चरणकमलकी सेवासे गङ्गादेवी तीर्थोंकी साररूपा, पवित्र, मुक्तिदायिनी और लोकोंको पावन करनेवाली हो गयी हैं। जिनके स्मरण और सेवनसे तुलसीदेवी पवित्र हो गयी हैं तथा नवग्रह और दिक्पाल जिनके प्रतापसे डरते रहते हैं। सारे ब्रह्माण्डोंमें जो-जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्यान्य सुरेश्वर, शेष आदि तथा मुनिगण हैं; उनमेंसे कुछ परमात्मा श्रीकृष्णके कलास्वरूप, कुछ अंशरूप और कुछ कलांशरूप हैं। कल्याणि! तुम उन्हीं परमेश्वरको, जो प्रकृतिसे परे हैं, अपना पति बनाना चाहती हो, परंतु वे गोलोकमें केवल राधिकाद्वारा साध्य हैं; दूसरा कोई कभी भी उन्हें सिद्ध नहीं कर सकता। इतना कहकर छद्मवेषधारी धर्मने उसकी परीक्षाके लिये प्रचुर भोगसुखका प्रलोभन दिया और अपनेको ही पतिरूपमें स्वीकार करनेका अनुरोध किया। फिर धर्म उसकी ओर बढ़े। व्रजेश! उनका विचार केवल उसके सतीत्वको जानना था। उनकी यह चेष्टा देखकर उस राजकन्याके मुख और नेत्र क्रोधसे वक्र हो गये। तब वह हितकारक, सत्य, योगयुक्त, यशस्कर एवं धर्मार्थ वचन बोली।

श्रीवृन्दाने कहा— महाभाग! धैर्य धारण कीजिये। आप तो जातियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणोंका स्वभाव तपोमूलक, सत्यपरक, वेदव्रती और धैर्यशाली होता है। परायी स्त्रियोंके प्रति आकर्षित होना तो अधर्मियोंका स्वभाव है। विप्रवर! अधर्मसे ही दुष्टको अमङ्गलका दर्शन होता है। तत्पश्चात् वह शत्रुपर विजय-लाभ करता है और फिर समूल नष्ट हो जाता है। जो बलपूर्वक पतिव्रताओंके साथ व्यभिचार करता है, वह मातृगामी कहलाता है और उसे तुरंत ही सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है—यह निश्चित है। जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति है, तबतक वह कुम्भीपाकमें यातना भोगता है। यमदूत उसके मस्तकपर लोहेके डंडेसे प्रहार करते हैं; वह खौलते हुए तेलमें जलाया जाता है; परंतु उसकी सूक्ष्मदेहसे प्राण विलग नहीं होते। यह क्षणिक सुख चिरकालिक दुःखका दाता और सर्वविनाशका कारण है। इसीलिये धर्मात्मा पुरुष अगम्याके गमनजन्य दुःखकी इच्छा नहीं करते; अतः ज्ञानदुर्बल ब्राह्मण! आपका कल्याण हो, मुझे क्षमा कीजिये और अपने रास्ते जाइये। जैसे दीपककी लौ देखकर पतिङ्गा निश्चय ही उसपर टूट पड़ता है; लोभी मीन और मृग काँटेके अग्रभागमें मिष्टान्नको देखकर उसे निगलना चाहता है; भूखा

७०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मनुष्य विषमिश्रित भोजनको खा जाता है और दुष्ट मुखपर छलछलाते हुए दूधवाले दूषित विषकुम्भको ग्रहण कर लेता है; उसी तरह लम्पट पुरुष परायी स्त्रियोंके मनोहर मुखकमलको, जो विनाशका कारण है, देखकर मोहवश भ्रान्त हो जाता है। स्त्रियोंका सुन्दर मुख, दोनों नितम्ब तथा स्तन काम-वासनाके आधार, नाशके कारण और अधर्मके स्थान हैं। जो लार और मूत्रसे संयुक्त है, जिसमेंसे दुर्गन्ध निकलती है, जो पाप तथा यमदण्डका कारण है, स्त्रियोंका वह मूत्रस्थान (योनि) नरककुण्डके सदृश है। ब्राह्मण ! एकान्त देखकर जो तुम मेरी धर्षणा करना चाहते हो तो यहीं समस्त देवता, लोकपाल, कर्मोंके शासक तथा साक्षी जाज्वल्यमान धर्म, स्वयं श्रीहरिद्वारा नियुक्त दण्डकर्ता यमराज, स्वयं धर्मात्मा श्रीकृष्ण, ज्ञानरूपी महेश्वर, दुर्गा, बुद्धि, मन, ब्रह्मा, इन्द्रियाँ तथा देवगण उपस्थित हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियोंमें उनके कर्मोंके साक्षीरूपसे वर्तमान रहते हैं; अतः अज्ञानी ब्राह्मण ! कौन-सा स्थान गुप्त है और कौन-सा रहस्यमय ? विप्र ! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे क्षमा कर दो और जाओ। मैं तुम्हें भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ; परंतु ब्राह्मण अवध्य होते हैं। अतः वत्स ! तुम सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। द्विज ! तपस्या करते हुए मुझे एक सौ आठ युग बीत गये। अब न तो मेरे पिताका गोत्र ही रह गया है और न मेरे माता- पिता ही हैं। सबके अन्तरात्मास्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णद्वारा स्थापित धर्म नित्य मेरी रक्षामें तत्पर है। सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, ब्रह्मा, शम्भु, भगवती दुर्गा-ये सभी सदा मेरी देख-भाल करते हैं। जिन्होंने हंसोंको श्वेत, शुकोंको हरा और मयूरोंको रंग-बिरंगा बनाया है; वे ही मेरी रक्षा करेंगे। सभी देवता अनाथों, बालकों तथा वृद्धोंकी सर्वदा रक्षा करते हैं, अतः नारी समझकर धर्म मेरा परित्याग करके नहीं जा सकते। इसके बाद श्रीवृन्दाने पतिव्रत-धर्मकी महिमा और दुराचारकी निन्दा करके कोपप्रकाशपूर्वक शाप दे दिया—'दुराचार ! तुम्हारा नाश हो जाय। पापिष्ठ ! तुम नष्ट हो जाओ।' इतना कहकर जब पुनः शाप देनेको उद्यत हुई तब स्वयं सूर्यने उसे यत्न करके रोक दिया। इसी बीच वहाँ ब्रह्मा, शिव, सूर्य और इन्द्र आदि देवता आ पहुँचे। सबने उससे क्षमा माँगी और 'धर्म तुम्हारी परीक्षाके लिये आया था। उसमें तनिक भी पापबुद्धि नहीं थी। धर्मके नाशसे जगत्के सनातनधर्म- रूप जीवनका नाश हो जायगा' यह कहकर धर्मको जीवनदान देनेकी प्रार्थना की। तब वृन्दाने कहा—देव! मैं नहीं जानती थी कि ये ब्राह्मणवेषधारी धर्म हैं और मेरी परीक्षा करनेके लिये आये हैं। इसी कारण मैंने क्रोधवश इनका नाश किया है। अब आप लोगोंकी कृपासे मैं अवश्य धर्मको जीवन-दान दूँगी। ब्रजेश्वर ! यों कहकर वह वृन्दा पुनः बोली—'यदि मेरी तपस्या सत्य हो तथा मेरा विष्णुपूजन सत्य हो तो उस पुण्यके प्रभावसे ये विप्रवर यहाँ शीघ्र ही दुःखरहित हो जायें। यदि मुझमें सत्य वर्तमान हो और मेरा व्रत सत्य तथा तप शुद्ध हो तो उस पुण्य तथा सत्यके प्रभावसे ये ब्राह्मण कष्टरहित हो जायें। यदि नित्यमूर्ति सर्वात्मा नारायण तथा ज्ञानात्मक शिव सत्य हैं तो ये द्विजवर संतापरहित हो जायें। यदि ब्रह्म सत्य हो, सभी देवता और परमा प्रकृति सत्य हों, यज्ञ सत्य हो और तप सत्य हो तो इन ब्राह्मणका कष्ट दूर हो जाय।'-इतना कहकर सती वृन्दाने धर्मको अपनी गोदमें कर लिया और उन कलारूपको देखकर वह कृपापरवश हो रुदन करने लगी। इसी बीच धर्मकी भार्या मूर्ति, जो शोकसे व्याकुल थी, सिरके बल विष्णुके चरणपर गिर पड़ी और यों बोली।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०७

मूर्तिने कहा—हे नाथ! आप तो करुणासागर हैं। दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। कृपामूर्ति जगन्नाथ! मेरे पतिदेवको शीघ्र जीवित कर दीजिये; क्योंकि जो नारी पतिसे हीन हो जाती है, वह इस भवसागरमें पापिनी समझी जाती है। उसकी दशा नेत्रहीन मुख और प्राणरहित शरीरके समान हो जाती है। माता-पिता, भाई-बन्धु और पुत्र तो परिमित सुख देनेवाले होते हैं, सर्वस्व प्रदान करनेवाला तो सामर्थ्यशाली पति ही होता है। इतना कहकर मूर्ति देवी वहाँ खड़ी हो गयीं और विलाप करने लगीं। तब भगवान् जो सर्वात्मा एवं प्रकृतिसे परे हैं; वृन्दासे बोले।

श्रीभगवान्ने कहा—सुन्दरि! तुमने तपस्याद्वारा ब्रह्माकी आयुके समान आयु प्राप्त की है। वह अपनी आयु तुम धर्मको दे दो और स्वयं गोलोकको चली जाओ। वहाँ तुम तपस्याके प्रभावसे इसी शरीरद्वारा मुझे प्राप्त करोगी। सुमुखि! गोलोकमें आनेके पश्चात् वाराहकल्पमें तुम राधाकी छायाभूता वृषभानुकी कन्या होओगी। उस समय मेरे कलांशसे उत्पन्न हुए रायाण गोप तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे। फिर रासक्रीड़ाके अवसरपर तुम गोपियों तथा राधाके साथ मुझे प्राप्त करोगी। जब राधा श्रीदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट होंगी, उस समय वे ही वास्तविक राधा रहेंगी। तुम तो उनकी छायास्वरूपा होओगी। विवाहके समय वास्तविक राधा तुम्हें प्रकट करके स्वयं अन्तर्धान हो जायँगी और रायाण गोप तुम छायाको ही ग्रहण करेंगे; परंतु गोकुलमें मोहाच्छन्न लोग तुम्हें 'यह राधा ही है'—ऐसा समझेंगे। उन गोपोंको तो स्वप्नमें भी वास्तविक राधाके चरणकमलका दर्शन नहीं होता; क्योंकि स्वयं राधा मेरी गोदमें रहती हैं और उनकी छाया रायाणकी भार्या होती है।

इस प्रकार भगवान् विष्णुके वचनको सुनकर सुन्दरी वृन्दाने धर्मको अपनी आयु प्रदान कर दी। फिर तो धर्म पूर्णरूपसे उठकर खड़े हो गये। उनके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति चमक रही थी और उनका सौन्दर्य पहलेकी अपेक्षा बढ़ गया था। तब उन श्रीमान्ने परात्पर परमेश्वरको प्रणाम किया।

पुनः वृन्दाने कहा—देवगण मेरे वचनको, जिसका उल्लङ्घन करना कठिन है, सावधानतया श्रवण करें। मेरा वाक्य मिथ्या नहीं हो सकता। मैंने क्रोधावेशमें जो तीन बार 'क्षयो भव', 'तुम्हारा नाश हो जाय'—ऐसा वचन कहा है और पुनः कहनेके लिये उद्यत होनेपर सूर्यने मना कर दिया था, उसका फल यों होगा—यह धर्म सत्ययुगमें जैसे पहले परिपूर्ण था, उसी तरह इस समय भी रहेगा; परंतु त्रेतामें इसके तीन पैर, द्वापरमें दो पैर और कलियुगके प्रथमांशमें एक पैर रह जायगा। कलियुगके शेष भागमें यह कलाका षोडशांशमात्र रह जायगा। सत्ययुग आनेपर यह पुनः परिपूर्ण हो जायगा। मेरे मुखसे तीन बार 'क्षय' शब्द निकला है; इसलिये उसी क्रमसे क्षय भी होगा। मनमें पुनः कहनेका विचार करनेपर

७०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सूर्यने रोक दिया था; इसी कारण यह धर्म कलियुगकी समाप्तिमें कलामय ही रह जायगा।

नन्दजी! इसी बीच देवताओंने वेगपूर्वक गोलोकसे आये हुए एक अत्यन्त सुन्दर एवं शुभ रथको देखा। उस रथका निर्माण अमूल्य रत्नोंद्वारा हुआ था। उसमें हीरेके हार लटक रहे थे और वह मणि, माणिक्य, मुक्ता, वस्त्र, श्वेत चँवर, भूषण और सुन्दर रत्नजटित दर्पणोंसे विभूषित था। उस रथको देखकर वृन्दाने हरि, शंकर, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओंको नमस्कार किया और फिर उसपर सवार हो वह गोलोकको चली गयी। तत्पश्चात् सभी देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। अब तुम्हारी पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?

(अध्याय ८६)


सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना

नन्दजीने कहा— प्रभो! आप स्वयं वेदोंके अधीश्वर हैं; अतः वेद, ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा मुनि और सिद्ध आदि आपको जाननेमें असमर्थ हैं। आप कौन हैं—यह जाननेके लिये मेरे मनमें प्रबल उत्कण्ठा है; अतः इस निर्जन स्थानमें आप अपना सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी बीच वहाँ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये सहसा पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, प्रचेतागण, वसिष्ठ, दुर्वासा, कण्व, कात्यायन, पाणिनि, कणाद, गौतम, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वायु (वोढु), पञ्चशिख, विश्वामित्र, वाल्मीकि, कश्यप, पराशर, विभाण्डक, मरीचि, शुक्र, अत्रि, बृहस्पति, गार्ग्य, वात्स्य, व्यास, जैमिनि, परिमित वचन बोलनेवाले ऋष्यशृङ्ग, याज्ञवल्क्य, शुक, शुद्ध जटाधारी सौभरि, भरद्वाज, सुभद्रक, मार्कण्डेय, लोमश, आसुरि, विटंकण, अष्टावक्र, शतानन्द, वामदेव, भागुरि, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), नारद, जाबालि, परशुराम, अगस्त्य, पैल, युधामन्यु, गौरमुख, उपमन्यु, श्रुतश्रवा, मैत्रेय, च्यवन, करथ और कर मुनीश्वर आ पहुँचे। वत्स! वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें आया देखकर श्रीकृष्ण सहसा उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर नमस्कार करनेके पश्चात् उन्हें आदरसहित रमणीय सिंहासनोंपर बैठाये। फिर श्रीकृष्णने कुशल-प्रश्नपूर्वक परस्पर वार्तालाप करके उनकी विधिवत् पूजा की और स्वयं भी उन्हींके मध्यमें आसनासीन हुए। इसी समय श्रीकृष्णको आकाशमें एक समुज्ज्वल तेजोराशि दीख पड़ी। उसे मुनियोंने भी देखा। वत्स नारद! उस तेजके अंदर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले, पञ्चवर्षीय नग्न-बालकके रूपमें सनत्कुमारजी थे। वे सहसा उस सभाके बीच प्रकट हो गये। उन्हें एकाएक सामने खड़े देखकर सभी मुनिवरोंने प्रणाम किया तथा श्रीकृष्णने भी मुस्कानयुक्त एवं स्निग्ध नेत्रोंवाले कुमारको युक्तिपूर्वक सादर सिर झुकाया। तब सनत्कुमारजी उन सबको आशीर्वाद देकर उस सभामें विराजमान हुए और उन ऋषियों तथा सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले।

सनत्कुमारने कहा— मुनिवरो! आपलोगोंका सदा कल्याण हो और तपस्याओंका अभीष्ट फल प्राप्त हो; किंतु कल्याणके कारणस्वरूप इन श्रीकृष्णका कुशल-प्रश्न निष्फल है। इस समय तो आपलोगोंका सर्वथा कुशल है; क्योंकि आप-लोग उन परमात्माका दर्शन कर रहे हैं, जो प्रकृतिसे परे होनेपर भी भक्तोंके अनुरोधसे शरीर

६७- श्रीकृष्णका उद्धवको गोकुल भेजना, उद्धवका गोकुलमें सत्कार तथा उनका वृन्दावन आदि सभी वनोंकी शोभा देखते हुए राधिकाके पास पहुँचना और राधास्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०९ धारण करते हैं; निर्गुण, इच्छारहित और समस्त तेजोंके कारण हैं तथा इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही आविर्भूत हुए हैं। श्रीकृष्णने पूछा- विप्रवर! जब सभी शरीरधारियोंके लिये कुशल-प्रश्न अभीष्ट होता है, तब भला मेरे विषयमें वह कुशल-प्रश्न क्यों नहीं है? सनत्कुमारजी बोले-नाथ! प्राकृत शरीरके विषयमें कुशल-प्रश्न करना तो सर्वदा शुभदायक है; परंतु जो शरीर नित्य और मङ्गलका कारण है, उसके विषयमें कुशल-प्रश्न निरर्थक है। श्रीभगवान्‌ने कहा- विप्रवर! जो-जो शरीरधारी है, वह-वह प्राकृतिक कहा जाता है; क्योंकि उस नित्या प्रकृतिके बिना शरीर बन ही नहीं सकता। सनत्कुमारजी बोले-प्रभो! जो शरीर रज-वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, वे ही प्राकृतिक कहे जाते हैं; किंतु जो प्रकृतिके स्वामी और कारण हैं उनका शरीर प्राकृत कैसे हो सकता है? आप तो समस्त कारणोंके आदिकारण, सभी अवतारोंके प्रधान बीज, अविनाशी स्वयं भगवान् हैं। वेद आपको सदा नित्य, सनातन, ज्योतिःस्वरूप, परमोत्कृष्ट, परमात्मा और ईश्वर कहते हैं। प्रभो! वेदाङ्ग तथा वेदज्ञ लोग भी आप मायापति निर्गुण परात्परको मायाद्वारा सगुणरूप हुआ बतलाते हैं। श्रीकृष्णने कहा- विप्रवर! इस समय मैं वसुदेवका पुत्र वासुदेव हूँ। मेरा शरीर रक्त- वीर्यके ही आश्रित है; फिर यह प्राकृत कैसे नहीं है और इसके लिये कुशल-प्रश्न अभीष्ट क्यों नहीं है? सनत्कुमारजी बोले- जिसके रोमकूपोंमें सारे विश्व निवास करते हैं तथा जो सबका निवासस्थान है, उसे 'वासु' कहते हैं; उसका देवता परब्रह्म 'वासुदेव' ऐसा कहा जाता है। उनका 'वासुदेव' यह नाम चारों वेदों, पुराणों, इतिहासों और सभी प्रथाओंमें देखा जाता है। भला, वेदमें आपके रक्तवीर्याश्रित शरीरका कहाँ निरूपण हुआ है? इसके लिये ये मुनिगण तथा धर्म सर्वत्र साक्षी हैं। इस अवसरपर वेद और सूर्य-चन्द्रमा मेरे गवाह हैं। भृगुने कहा- विप्रेन्द्र! आप ही वैष्णवोंमें अग्रगण्य हैं; आपका कहना बिलकुल सत्य है। आपका स्वागत है; सदा कुशल तो है न? किस निमित्तको लेकर आपका यहाँ आगमन हुआ है? सनत्कुमारजी बोले- श्रीकृष्ण! इस समय मैं जिस निमित्तसे अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ उसका कारण श्रवण करो और ये सभी मुनि भी उसे सुन लें। श्रीकृष्णने कहा- भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं। सर्वज्ञ ! आप तो सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आप ही विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं; अतः बताइये, किस प्रयोजनसे आप यहाँ पधारे हैं? सनत्कुमारजी बोले- भगवन्! आप धन्य हैं। लोकोंके लिये भी आप सदा मान्य हैं और समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं। विश्वमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। तदनन्तर मुनियोंके पूछनेपर सनत्कुमारजीने बताया कि मैं परम धन्य, मान्य, विधाताके भी विधाता, सर्वादि, सर्वकारक, परमात्मा, परिपूर्णतम प्रभुके दर्शनार्थ मथुरामें आया हूँ। यह सुनकर सभी देवता और मुनि हँसने लगे तथा उन्हें महान् विस्मय हुआ। नन्दजी भी आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने श्रीकृष्णके प्रति पुत्रभावका त्याग कर दिया और शोकसे व्याकुल हो वे सभाके बीच लज्जा छोड़कर रोने लगे। तब पार्वती ने 'मोहको त्याग दो'- यों कहकर उन्हें ढाढ़स बँधाया। तब श्रीनन्दजी बोले- देवेश ! जैसे कुजन्माके गृहमें स्थित अमूल्य रत्न और हीरेका मूल्य नहीं समझा जाता, उसी तरह प्रभो! मैं भी ठगा गया। भगवन्! आप प्रकृतिसे परे हैं; अतः मेरा अपराध

७१० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण क्षमा कर दीजिये। अब मैं पुनः यमुना-तटपर स्थित गोकुलमें अपने घर नहीं जाऊँगा। भला, आप ही बताइये, वहाँ जाकर मैं यशोदा तथा तुम्हारी प्रेयसी राधिकाको भी क्या उत्तर दूँगा और तुम्हारे प्रेमपात्र गोपबालकोंसे क्या कहूँगा ? नारद ! इतना कहकर नन्दजी सभामें ही मूर्च्छित हो गये। तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण उसी क्षण उन्हें गोदमें लेकर समझाने लगे। (अध्याय ८७) श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा व्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना श्रीकृष्णने कहा- हे तात ! चेत करो। पिताजी ! होशमें आ जाओ। अरे ! चराचरसहित यह सारा संसार जलके बुलबुलेकी भाँति क्षणध्वंसी है; अतः महाभाग ! मोह त्याग दो और उन महाभागा मायाकी- जो परात्परा, ब्रह्मस्वरूपा, परमोत्कृष्टा, सम्पूर्ण मोहका उच्छेद करनेवाली, मुक्ति-प्रदायिनी और सनातनी विष्णुमाया हैं- स्तुति करो। नन्दजी ! त्रिपुर-वधके समय भयंकर महायुद्धमें भयभीत होनेपर शम्भुने जिस स्तोत्रद्वारा स्तवन करके महामायाके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था, वह स्तोत्रराज, जो सारे अज्ञानका उच्छेदक और सम्पूर्ण मनोरथोंका पूरक है; मैं आपको इस सभामें प्रदान करूँगा, सुनिये। श्रीनन्दजी बोले-जगदीश्वर ! तुम वेदोंके उत्पादक, निर्गुण और परात्पर हो; अतः भक्तवत्सल ! मनुष्योंके सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाश, दुःखोंके प्रशमन, विभूति, यश और मनोरथ-सिद्धिके लिये दुर्गतिनाशिनी जगज्जननी महादेवीका वह परम दुर्लभ, गोपनीय, परमोत्तम एकमात्र स्तोत्र मुझ विनीत भक्तको अवश्य प्रदान करो। श्रीभगवान्ने कहा- वैश्येन्द्र ! पूर्वकालमें नारायणके उपदेश तथा ब्रह्माकी प्रेरणासे युद्धसे भयभीत हुए भगवान् शंकरने जिसके द्वारा स्तवन किया था और जो मोह-पाशको काटनेवाला है; उस परम अद्भुत स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। नारायणने शिवको शत्रुके चंगुलमें फँसा देखकर यह स्तोत्र ब्रह्माको बतलाया; तब ब्रह्माने रणक्षेत्रमें रथपर पड़े हुए शिवको बतलाते हुए कहा- 'शंकर ! शूरवीरोंद्वारा प्राप्त हुए संकटकी शान्तिके लिये तुम उन दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका- जो आद्या, मूलप्रकृति और ब्रह्मस्वरूपिणी हैं - स्तवन करो। सुरेश्वर ! यह मैं तुमसे श्रीहरिकी प्रेरणासे कह रहा हूँ; क्योंकि शक्तिकी सहायताके बिना कौन किसको जीत सकता है?' ब्रह्माकी बात सुनकर शंकरने स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये, फिर चरणोंको धोकर हाथमें कुश ले आचमन किया। इस प्रकार पवित्र हो भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर और अञ्जलि बाँधकर वे विष्णुका ध्यान करते हुए दुर्गाका स्मरण करने लगे। श्रीमहादेवजीने कहा- दुर्गर्तिका विनाश करनेवाली महादेवि दुर्गे ! मैं शत्रुके चंगुलमें फँस गया हूँ; अतः कृपामयि ! मुझ अनुरक्त भक्तकी रक्षा करो, रक्षा करो। महाभागे जगदम्बिके ! विष्णुमाया, नारायणी, सनातनी, ब्रह्मस्वरूपा, परमा और नित्यानन्दस्वरूपिणी - ये तुम्हारे ही नाम हैं। तुम ब्रह्मा आदि देवताओंकी जननी हो। तुम्हीं सगुण-रूपसे साकार और निर्गुण-रूपसे निराकार हो। सनातनि ! तुम्हीं मायाके वशीभूत हो पुरुष और मायासे स्वयं प्रकृति बन जाती हो तथा जो इन पुरुष-प्रकृतिसे परे है; उस परब्रह्मको तुम धारण करती हो। तुम वेदोंकी माता परात्परा सावित्री हो। वैकुण्ठमें समस्त सम्पत्तियोंकी स्वरूपभूता महालक्ष्मी, क्षीरसागरमें शेषशायी नारायणकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी, स्वर्गमें

१०३- विरहविदग्धा राधाको उद्धवका प्रणाम करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७११

स्वर्गलक्ष्मी और भूतलपर राजलक्ष्मी तुम्हीं हो। तुम पातालमें नागादिलक्ष्मी, घरोंमें गृहदेवता, सर्वशस्यस्वरूपा तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका विधान करनेवाली हो। तुम्हीं ब्रह्माकी रागाधिष्ठात्री देवी सरस्वती हो और परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवी भी तुम्हीं हो। तुम गोलोकमें श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर शोभा पानेवाली गोलोककी अधिष्ठात्री देवी स्वयं राधा, वृन्दावनमें होनेवाले रासमण्डलमें सौन्दर्यशालिनी वृन्दावनविनोदिनी तथा चित्रावली नामसे प्रसिद्ध शतशृङ्गपर्वतकी अधिदेवी हो। तुम किसी कल्पमें दक्षकी कन्या और किसी कल्पमें हिमालयकी पुत्री हो जाती हो। देवमाता अदिति और सबकी आधारस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। तुम्हीं गङ्गा, तुलसी, स्वाहा, स्वधा और सती हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारे अंशांशकी अंशकलासे उत्पन्न हुई हैं। देवि! स्त्री, पुरुष और नपुंसक तुम्हारे ही रूप हैं। तुम वृक्षोंमें वृक्षरूपा हो और अंकुर-रूपसे तुम्हारा सृजन हुआ है। तुम अग्निमें दाहिका शक्ति, जलमें शीतलता, सूर्यमें सदा तेजःस्वरूप तथा कान्तिरूप, पृथ्वीमें गन्धरूप, आकाशमें शब्दरूप, चन्द्रमा और कमलसमूहमें सदा शोभारूप, सृष्टिमें सृष्टिस्वरूप, पालन-कार्यमें भलीभाँति पालन करनेवाली, संहारकालमें महामारी और जलमें जलरूपसे वर्तमान रहती हो। तुम्हीं क्षुधा, तुम्हीं दया, तुम्हीं निद्रा, तुम्हीं तृष्णा, तुम्हीं बुद्धिरूपिणी, तुम्हीं तुष्टि, तुम्हीं पुष्टि, तुम्हीं श्रद्धा और तुम्हीं स्वयं क्षमा हो। तुम स्वयं शान्ति, भ्रान्ति और कान्ति हो तथा कीर्ति भी तुम्हीं हो। तुम लज्जा तथा भोग-मोक्ष-स्वरूपिणी माया हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा और सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेवाली हो। वेदमें भी तुम अनिर्वचनीय हो, अतः कोई भी तुम्हें यथार्थरूपसे नहीं जानता। सुरेश्वरि! न तो सहस्र मुखवाले शेष तुम्हारा स्तवन करनेमें समर्थ हैं, न वेदोंमें वर्णन करनेकी शक्ति है और न सरस्वती ही तुम्हारा बखान कर सकती हैं; फिर कोई विद्वान् कैसे कर सकता है? महेश्वरि! जिसका स्तवन स्वयं ब्रह्मा और सनातन भगवान् विष्णु नहीं कर सकते, उसकी स्तुति युद्धसे भयभीत हुआ मैं अपने पाँच मुखोंद्वारा कैसे कर सकता हूँ? अतः महामाये! तुम मुझपर कृपा करके मेरे शत्रु का विनाश कर दो। करुणासहित यों कहकर रणक्षेत्रमें शिवजीके रथपर गिर जानेपर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमती दुर्गा प्रकट हो गयीं। उस समय परमात्मा नारायणने कृपापरवश हो उन्हें प्रेरित किया था। तब वे महादेवी शीघ्र ही शिवके समक्ष खड़ी हो उनके मङ्गल और विजयके लिये यों बोलीं— 'शिव! मायाशक्तिका आश्रय लेकर असुरका संहार करो*।'


* श्रीमहादेव उवाच

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि। मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि॥
विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि। ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि॥
त्वं च ब्रह्मादिदेवानाम्म्बिके जगदम्बिके। त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात्॥
मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम्। तयोः परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि॥
वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा। वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥
मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः। स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले॥
नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता। सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी॥
रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती। प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः॥
गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि। गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने॥
श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी। शतशृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च॥
दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा। देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा॥
त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती। त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः॥

७१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीदुर्गाने कहा—शंकर! तुम्हारा कल्याण हो! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वर माँग लो। चूँकि तुम समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हो; अतः मैं तुम्हें विजय प्रदान करूँगी।

श्रीमहादेवजी बोले—परमेश्वरि! तुम आद्या सनातनी शक्ति हो; अतः दुर्गे! 'दैत्यका विनाश हो जाय'—यह मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो।

भगवतीने कहा—महाभाग! तुम तो स्वयं ही भगवान् विधाता और ज्योतिर्मय परमेश्वर हो; अतः जगद्गुरो! श्रीहरिका स्मरण करो और इस दैत्यको जीत लो।

इसी बीच सर्वव्यापी विष्णुने अपनी एक कलासे वृषका रूप धारण किया और शूलपाणि शंकरके उस उग्र रथको, जिसका पहिया ऊपर उठ गया था, प्रकृतिस्थ कर दिया। तत्पश्चात् उसे अपने सिरपर उठा लिया। उन्होंने शंकरको एक मन्त्रपूत शस्त्र भी प्रदान किया। तब शंकरने उस शस्त्रको लेकर और विष्णु तथा महेश्वरी दुर्गाका ध्यान करके शीघ्र ही त्रिपुरपर प्रहार किया। उसकी चोट खाकर वह दैत्य भूतलपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंने शंकरका स्तवन किया और उनपर पुष्पोंकी वर्षा की। दुर्गाने उन्हें त्रिशूल, विष्णुने पिनाक और ब्रह्माने शुभाशीर्वाद दिया। मुनिगण हर्षमग्न हो गये। सभी देवता हर्षविभोर हो नाचने लगे और गन्धर्व-किन्नर गान करने लगे। तात! इसी अवसरपर अनुपम स्तवराज भी प्रकट हुआ—जो विघ्नों, विघ्नकर्ताओं और शत्रुओंका संहारक, परमैश्वर्यका उत्पादक, सुखद, परम शुभ, निर्वाण-मोक्षका दाता, हरि-भक्तिप्रद, गोलोकका वास प्रदान करनेवाला, सर्वसिद्धिप्रद और श्रेष्ठ है। उस स्तवराजका पाठ करनेसे पार्वती सदा प्रसन्न रहती हैं। वह मनुष्योंके लोभ, मोह, काम, क्रोध और कर्मके मूलका उच्छेदक, बल-बुद्धिकारक, जन्म-मृत्युका विनाशक, धन, पुत्र, स्त्री, भूमि आदि समस्त सम्पत्तियोंका प्रदाता, शोक-दुःखका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता तथा सर्वोत्तम है। इस स्तोत्रराजके पाठसे महावन्ध्या भी प्रसविनो हो जाती है, बँधा हुआ बन्धनमुक्त हो जाता है, दुःखी निश्चय ही भयसे छूट जाता है, रोगीका रोग नष्ट हो जाता है, दरिद्र धनी हो जाता है तथा महासागरमें नावके डूब जानेपर एवं दावाग्निके बीच घिर जानेपर भी उस मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती। वैश्येन्द्र! इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य डाकुओं, शत्रुओं तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर भी कल्याणका भागी होता है। तात! यदि गोलोककी प्राप्तिके लिये आप नित्य इस स्तोत्रका पाठ करेंगे तो यहाँ ही आपको उन पार्वतीके साक्षात् दर्शन होंगे।


स्त्रीरूपं चातिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्। वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कुररूपिणी॥
वह्नौ च दाहिकाशक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी। सूर्यतेजःस्वरूपा च प्रभारूपा च संततम्॥
गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी। शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसंघे च निश्चितम्॥
सृष्टौ सृष्टिरूपा च पालने परिपालिका। महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी॥
क्षुत्त्वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी। तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयंम्॥
शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिःकान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च। लज्जा त्वं च तथा माया भुक्तिमुक्तिस्वरूपिणी॥
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी। वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन॥
सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्तः सुरेश्वरि। वेदा न शक्ताः को विद्वान् न च शक्ता सरस्वती॥
स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णुः सनातनः। किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि॥
कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु। इत्युक्त्वा च सकरुणं रथस्थे पतिते रणे॥
आविर्बभूव सा दुर्गा सूर्यकोटिसमप्रभा। नारायणेन कृपया प्रेरिता परमात्मना॥
शिवस्य पुरतः शीघ्रं शिवाय च जयाय च। इत्युवाच महादेवी मायाशक्त्यासुरं जहि॥
(८८। १५—३८)