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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

गणपतिखण्ड ३४३

बीज, अंकुर और उसके आश्रय, स्त्री-पुरुष और नपुंसकके स्वरूपमें विराजमान तथा इनकी इन्द्रियोंसे परे, सबके आदि, अग्रपूज्य, सर्वपूज्य, गुणके सागर, स्वेच्छासे सगुण ब्रह्म तथा स्वेच्छासे ही निर्गुण ब्रह्मका रूप धारण करनेवाले, स्वयं प्रकृतिरूप और प्रकृतिसे परे प्राकृतरूप हैं। शेष अपने सहस्रों मुखोंसे भी आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। आपके स्तवनमें न पञ्चमुख महेश्वर समर्थ हैं न चतुर्मुख ब्रह्मा ही; न सरस्वतीकी शक्ति है और न मैं ही कर सकता हूँ। न चारों वेदोंकी ही शक्ति है, फिर उन वेदवादियोंकी क्या गणना ?

इस प्रकार देवसभामें देवताओंके साथ सुरेश्वर गणेशकी स्तुति करके सुराधीश रमापति मौन हो गये। मुने! जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल इस विष्णुकृत गणेशस्तोत्रका सतत पाठ करता है, विघ्नेश्वर उसके समस्त विघ्नोंका विनाश कर देते हैं, सदा उसके सब कल्याणोंकी वृद्धि होती है और वह स्वयं कल्याणजनक हो जाता है। जो यात्राकालमें भक्तिपूर्वक इसका पाठ करके यात्रा करता है, निस्संदेह उसकी सभी अभीप्सित कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। उसके द्वारा देखा गया दुःस्वप्न सुस्वप्नमें परिणत हो जाता है। उसे कभी दारुण ग्रहपीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। उसके शत्रुओंका विनाश और बन्धुओंका विशेष उत्कर्ष होता है। निरन्तर विघ्नोंका क्षय और सदा सम्पत्तिकी वृद्धि होती रहती है। उसके घरमें पुत्र-पौत्रको बढ़ानेवाली लक्ष्मी स्थिररूपसे वास करती हैं। वह इस लोकमें सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका भागी होकर अन्तमें विष्णु-पदको प्राप्त हो जाता है। तीर्थों, यज्ञों और सम्पूर्ण महादानोंसे जो फल मिलता है, वह उसे श्रीगणेशकी कृपासे प्राप्त हो जाता है—यह ध्रुव सत्य है।

नारदजीने कहा—प्रभो! गणेशके स्तोत्र तथा उनके मनोहर पूजनको तो मैंने सुन लिया, अब मुझे जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले कवचके सुननेकी इच्छा है।

श्रीनारायणने कहा—नारद! उस देवसभाके मध्य जब गणेशकी पूजा समाप्त हुई, तब शनैश्चरने सबके तारक जगद्गुरु विष्णुसे कहा।

शनैश्चर बोले—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सम्पूर्ण दुःखोंके विनाश और दुःखकी पूर्णतया शान्तिके लिये विघ्नहन्ता गणेशके कवचका वर्णन कीजिये। प्रभो! हमारा मायाशक्तिके साथ विवाद हो गया है; अतः उस विघ्नके प्रशमनके लिये मैं उस कवचको धारण करूँगा।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने कवचकी गोपनीयता और महिमा बतलाते हुए कहा—सूर्यनन्दन! दस लाख जप करनेसे कवच सिद्ध हो जाता है। जो मनुष्य कवच सिद्ध कर लेता है, वह मृत्युको जीतनेमें समर्थ हो जाता है। सिद्ध-कवचवाला मनुष्य उसके ग्रहणमात्रसे भूतलपर वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है। इस मालामन्त्रको तथा इस पुण्यकवचको धारण करनेवाले मनुष्योंके सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, बेताल आदि, बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि कवचके शब्दमात्रके श्रवणसे भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं। जैसे गरुड़के निकट सर्प नहीं जाते, उसी तरह कवचधारी पुरुषोंके संनिकट आधि (मानसिक रोग), व्याधि (शारीरिक रोग) और भयदायक शोक नहीं फटकते। इसे अपने सरल स्वभाववाले गुरुभक्त शिष्यको ही बतलाना चाहिये।

शनैश्चर! इस 'संसारमोहन' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है और स्वयं लम्बोदर गणेश देवता हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें इसका विनियोग कहा गया है। मुने! यह सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत है। 'ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा' यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। बत्तीस

३४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षरोंवाला मन्त्र सदा मेरे ललाटको बचाये। ‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गम्’ यह निरन्तर मेरे नेत्रोंकी रक्षा करे। विघ्नेश भूतलपर सदा मेरे तालुकी रक्षा करें। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं’ यह निरन्तर मेरी नासिकाकी रक्षा करे तथा ‘ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा’ यह मेरे ओठको सुरक्षित रखे। षोडशाक्षर-मन्त्र मेरे दाँत, तालु और जीभको बचावे। ‘ॐ लं श्रीं लम्बोदराय स्वाहा’ सदा गण्डस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा’ सदा कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं गं गजाननाय स्वाहा’ सदा कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं विनायकाय स्वाहा’ सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं’ कंकालकी और ‘गं’ वक्षःस्थलकी रक्षा करे। विघ्ननिहन्ता हाथ, पैर तथा सर्वाङ्गको सुरक्षित रखे। पूर्वदिशामें लम्बोदर और अग्निकोणमें विघ्ननायक रक्षा करें। दक्षिणमें विघ्नेश और नैर्ऋत्यकोणमें गजानन रक्षा करें। पश्चिममें पार्वतीपुत्र, वायव्यकोणमें शंकरात्मज, उत्तरमें परिपूर्णतम श्रीकृष्णका अंश, ईशानकोणमें एकदन्त और ऊर्ध्वभागमें हेरम्ब रक्षा करें। अधोभागमें सर्वपूज्य गणाधिप सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

शयन और जागरणकालमें योगियोंके गुरु मेरा पालन करें। वत्स! इस प्रकार जो सम्पूर्ण मन्त्रसमूहोंका विग्रहस्वरूप है, उस परम अद्भुत संसारमोहन नामक कवचका तुमसे वर्णन कर दिया। सूर्यनन्दन! इसे प्राचीनकालमें गोलोकके वृन्दावनमें रासमण्डलके अवसरपर श्रीकृष्णने मुझ विनीतको दिया था। वही मैंने तुम्हें प्रदान किया है। तुम इसे जिस-किसीको मत दे डालना। यह परम श्रेष्ठ, सर्वपूज्य और सम्पूर्ण संकटोंसे उबारनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरुकी अभ्यर्थना करके इस कवचको गलेमें अथवा दक्षिण भुजापर धारण करता है, वह निस्संदेह विष्णु ही है। ग्रहेन्द्र! हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय-यज्ञ इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। जो मनुष्य इस कवचको जाने बिना शंकर-सुवन गणेशकी भक्ति करता है, उसके लिये सौ लाख जपनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* इस प्रकार सूर्यपुत्र शनैश्चरको यह कवच प्रदान करके सुरेश्वर विष्णु चुप हो गये। तब समीपमें स्थित परमानन्दमें निमग्न हुए देवताओंने कहा। (अध्याय १३)


* संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवो लम्बोदरः स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः॥
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने। ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटो मे सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गमिति च सततं पातु लोचनम्। तालुकं पातु विघ्नेशः सततं धरणीतले॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति च सततं पातु नासिकाम्। ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम॥
दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः॥
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदाऽवतु। ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा कर्णं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ क्लीं ह्रीमिति कङ्कालं पातु वक्षःस्थलं च गम्। करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघ्ननिघ्नकृत्॥
प्राच्यां लम्बोदरः पातु आग्नेय्यां विघ्ननायकः। दक्षिणे पातु विघ्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः॥
पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शङ्करात्मजः। कृष्णांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च॥
ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्बः पातु चोर्ध्वतः। अधो गणाधिपः पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः॥
स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले। वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज॥

गणपतिखण्ड ३४५

पार्वतीको देवताओंद्वारा कार्तिकेयका समाचार प्राप्त होना, शिवजीका कृत्तिकाओंके पास दूतोंको भेजना, वहाँ कार्तिकेय और नन्दीका संवाद

तदनन्तर, पहले शंकरका वीर्य पृथ्वीपर गिरनेसे कार्तिकेयके उत्पन्न होनेकी बात आयी थी, उसीके सम्बन्धमें बात छिड़नेपर—

श्रीधर्मने कहा— भगवन्! प्रकोपके कारण रतिसे उठते हुए शंकरजीका वह अमोघ वीर्य भूतलपर गिरा था, यह मुझे ज्ञात है।

भूमिने कहा— ब्रह्मन्! उस वीर्यका वहन करना अत्यन्त कठिन था, इसलिये जब मैं उसका भार सहन न कर सकी, तब मैंने उसे अग्निमें डाल दिया; अतः मुझ अबलाको क्षमा कीजिये।

अग्निने कहा— जगन्नाथ! मैंने भी उस वीर्यका भार उठानेमें असमर्थ होकर उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। भला, दुर्बलका पुरुषार्थ ही क्या और उसका यश ही कैसा?

वायुने कहा— विष्णो! स्वर्णरेखा नदीके तटपर सरकंडोंमें गिरा हुआ वह वीर्य तुरंत ही अत्यन्त सुन्दर बालक हो गया।

श्रीसूर्यने कहा— भगवन्! कालचक्रसे प्रेरित हुआ मैं उस रोते हुए बालकको देखकर अस्ताचलकी ओर चला गया; क्योंकि मैं रातमें ठहरनेके लिये असमर्थ हूँ।

चन्द्रमाने कहा— विष्णो! उसी समय कृत्तिकाओंका समुदाय बदरिकाश्रमसे आ रहा था। उन्होंने उस रुदन करते हुए बालकको देखा और उसे उठाकर वे अपने भवनको चली गयीं।

जलने कहा— प्रभो! कृत्तिकाओंने उस रोते हुए शिशुको अपने घर लाकर और उसके भूखे होनेपर उसे अपने स्तनोंका दूध पिलाकर बढ़ाया। वह शिव-पुत्र सूर्यसे भी अधिक प्रभावशाली था।

दोनों संध्याओंने कहा— भगवन्! इस समय वह बालक छहों कृत्तिकाओंका पोष्य पुत्र है। उन्होंने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उसका 'कार्तिकेय' ऐसा नाम रखा है।

रात्रिने कहा— प्रभो! वे कृत्तिकाएँ उस बालकको आँखोंसे ओझल नहीं करती हैं। उनके लिये वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेमपात्र है; क्योंकि जो पालन करनेवाला होता है, उसीका वह पुत्र कहलाता है।

दिनने कहा— देव! जो-जो वस्तुएँ त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं और अपने स्वादके लिये प्रशंसित हैं, उन्हींको वे उस बालकको खिलाती हैं।

जब उस सभामें उन सब लोगोंने प्रसन्नमनसे श्रीहरिसे यों कहा, तब उनके उस कथनको सुनकर मधुसूदन संतुष्ट हो गये। पुत्रका पूरा समाचार पाकर पार्वतीका मन हर्षसे खिल उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न, बहुत-सा धन और विभिन्न प्रकारके सभी वस्त्र दिये। तत्पश्चात् लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, मेना आदि सभी महिलाओंने तथा विष्णु आदि सभी देवताओंने ब्राह्मणोंको धन दिया।

श्रीनारायण कहते हैं— मुने! पुत्रका समाचार मिल जानेपर जब विष्णु, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतोंने पार्वतीसहित शंकरको प्रेरित किया, तब उन्होंने लाखों क्षेत्रपाल, भूत, बेताल, यक्ष, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी और भैरवोंके साथ महान् बल-पराक्रमसम्पन्न वीरभद्र,


मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि। परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसंकटतारणम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। ग्रहेन्द्र कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छङ्करात्मजम्। शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

( १३ । ७८-९७ )

३४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

विशालाक्ष, शंकुकर्ण, कबन्ध, नन्दीश्वर, महाकाल, वज्रदन्त, भगन्दर, गोधामुख, दधिमुख आदि दूतोंको, जो धधकती हुई आगकी लपटके समान उद्दीप्त हो रहे थे, भेजा। उन सभी शिव-दूतोंने, जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित थे, शीघ्र ही जाकर कृत्तिकाओंके भवनको चारों ओरसे घेर लिया। उन्हें देखकर सभी कृत्तिकाओंका मन भयसे व्याकुल हो गया। तब वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त होते हुए कार्तिकेयके पास जाकर कहने लगीं।

कृत्तिकाओंने कहा— बेटा कार्तिकेय! असंख्यों कराल सेनाओंने भवनको चारों ओरसे घेर लिया है और हमें पता भी नहीं है कि ये किसकी हैं।

तब कार्तिकेय बोले— माताओ! आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये। मेरे रहते आपको भय कैसा? यह कर्मभोग दुर्निवार्य है, इसे कौन हटा सकता है। इसी बीच सेनापति नन्दिकेश्वर भी वहाँ कार्तिकेयके समक्ष उपस्थित हुए और कृत्तिकाओंसे बोले।

नन्दिकेश्वरने कहा— भ्राता! संहारकर्ता सुरश्रेष्ठ शंकर और माता पार्वतीद्वारा भेजे गये शुभ समाचारको मुझसे श्रवण करो। कैलासपर्वतपर गणेशके माङ्गलिक जन्मोत्सवके अवसरपर सभामें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता उपस्थित हैं। वहाँ गिरिराजकिशोरीने जगत्का पालन करनेवाले विष्णुको सम्बोधित करके उनसे तुम्हारे अन्वेषणके लिये कहा। तब विष्णुने तुम्हारी प्राप्तिके निमित्त क्रमशः उन सभी देवोंसे पूछा। उनमेंसे प्रत्येकने यथोचित उत्तर भी दिया। उन्हींमें धर्म-अधर्मके साक्षी धर्म आदि सभी देवताओंने परमेश्वरको तुम्हारे यहाँ कृत्तिकाओंके भवनमें रहनेकी सूचना दी। प्राचीनकालमें शिव- पार्वतीकी जो एकान्त क्रीड़ा हुई थी, उसमें देवताओंद्वारा देखे जानेपर शम्भुका शुक्र भूतलपर गिर पड़ा था। भूमिने उस शुक्रको अग्निमें और अग्निने उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। वहाँसे इन कृत्तिकाओंने तुम्हें पाया है। अब तुम अपने घर चलो। वहाँ तुम्हें सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी प्राप्ति होगी, विष्णु देवताओंको साथ लेकर तुम्हारा अभिषेक करेंगे और तब तुम तारकासुरका वध करोगे। तुम विश्वसंहर्ता शंकरके पुत्र हो, अतः ये कृत्तिकाएँ तुम्हें उसी तरह नहीं छिपा सकतीं, जैसे शुष्क वृक्ष अपने कोटरमें अग्निको गुप्त नहीं रख सकता। तुम तो विश्वमें दीप्तिमान् हो। इन कृत्तिकाओंके घरमें तुम्हारी उसी प्रकार शोभा नहीं हो रही है, जैसे महाकूपमें पड़े हुए चन्द्रमा शोभित नहीं होते। जैसे सूर्य मनुष्यके हाथोंकी ओटमें नहीं छिप सकते, उसी तरह तुम भी इनके अङ्गतेजसे आच्छादित न होकर जगत्‌को प्रकाशित कर रहे हो। शम्भुनन्दन! तुम तो जगद्व्यापी विष्णु हो, अतः इन कृत्तिकाओंके व्याप्य नहीं हो, जैसे आकाश किसीका व्याप्य नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही सबका व्यापक है। तुम विषयोंसे निर्लिप्त योगीन्द्र हो तथा विश्वके आधार और परमेश्वर हो। ऐसी दशामें कृत्तिकाओंके भवनमें तुम सर्वेश्वरका निवास होना उसी प्रकार सम्भव नहीं है, जैसे क्षुद्र गौरैयाके उदरमें गरुड़का रहना असम्भव है। तुम भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह तथा गुणों और तेजोंकी राशि हो। देवगण तुम्हें उसी तरह नहीं जानते जैसे योगहीन पुरुष ज्ञानसे अनभिज्ञ होता है। जैसे मोहितचित्तवाले भक्तिहीन मनुष्योंको हरिकी उत्कृष्ट भक्तिका ज्ञान नहीं होता, उसी तरह ये कृत्तिकाएँ तुम्हें कैसे जान सकती हैं; क्योंकि तुम अनिर्वचनीय हो। भ्राता! जो लोग जिसके गुणको नहीं जानते, वे उसका अनादर ही करते हैं; जैसे मेढक एक साथ रहनेवाले कमलोंका आदर नहीं करते।

कार्तिकेयने कहा— भ्राता! जो भूत, भविष्यत्, वर्तमान—तीनों कालोंका ज्ञान है, वह सब मुझे ज्ञात है। तुम भी तो ज्ञानी हो; क्योंकि मृत्युञ्जयके आश्रित हो। ऐसी दशामें तुम्हारी क्या प्रशंसा की

५२- पुष्करमें तप करते हुए इन्द्रको श्रीविष्णुका प्रकट होकर मनोवाञ्छित वर, कवच और मन्त्र प्रदान करना

गणपतिखण्ड ३४७


जाय। भाई! कर्मानुसार जिनका जिन-जिन योनियोंमें जन्म होता है, वे उन्हीं योनियोंमें निरन्तर रहते हुए निर्वृति लाभ करते हैं। वे चाहे संत हों अथवा मूर्ख हों, जिन्हें कर्मभोगके परिणामस्वरूप जिस योनिकी प्राप्ति हुई है, वे विष्णुमायासे मोहित होकर उसी योनिको बहुत बढ़कर समझते हैं। जो सनातनी विष्णुमाया सबकी आदि, सर्वस्व प्रदान करनेवाली और विश्वका मङ्गल करनेवाली हैं, उन्हीं जगज्जननीने इस समय भारतवर्षमें शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया है और दारुण तपस्या करके शंकरको पतिरूपमें प्राप्त किया है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारी सृष्टि कृत्रिम है, अतएव मिथ्या ही है। सभी श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए हैं और समय आनेपर केवल श्रीकृष्णमें ही विलीन हो जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके विधानमें मैं नित्य होते हुए भी मायासे आबद्ध होकर जन्म-धारण करता हूँ, उस समय प्रत्येक जन्ममें जगज्जननी पार्वती मेरी माता होती हैं। जगत्में जितनी नारियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिसे उत्पन्न हुई हैं। उनमेंसे कुछ प्रकृतिकी अंशभूता हैं तो कुछ कलात्मिका तथा कुछ कलांशके अंशसे प्रकट हुई हैं। ये ज्ञानसम्पन्ना योगिनी कृत्तिकाएँ प्रकृतिकी कलाएँ हैं। इन्होंने निरन्तर अपने स्तनके दूध तथा उपहारसे मेरा पालन-पोषण किया है। अतः मैं उनका पोष्य पुत्र हूँ और पोषण करनेके कारण ये मेरी माताएँ हैं। साथ ही मैं उन प्रकृतिदेवी (पार्वती)-का भी पुत्र हूँ; क्योंकि तुम्हारे स्वामी शंकरजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ हूँ। नन्दिकेश्वर! मैं गिरिराजनन्दिनीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, अतः जैसे वे मेरी धर्ममाता हैं, वैसे ही ये कृत्तिकाएँ भी सर्वसम्मतिसे मेरी धर्म-माताएँ हैं; क्योंकि स्तन पिलानेवाली (धाय), गर्भमें धारण करनेवाली (जननी), भोजन देनेवाली (पाचिका), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवताकी पत्नी, पिताकी पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहिन, पुत्रवधू, पत्नीकी माता (सास), माताकी माता (नानी), पिताकी माता (दादी), सहोदर भाईकी पत्नी, माताकी बहिन (मौसी), पिताकी बहिन (बुआ) तथा मामी—ये सोलह मनुष्योंकी वेदविहित माताएँ कहलाती हैं।* ये कृत्तिकाएँ सम्पूर्ण सिद्धियोंकी ज्ञाता, परमैश्वर्यसम्पन्न और तीनों लोकोंमें पूजित हैं। ये क्षुद्र नहीं हैं, बल्कि ब्रह्माकी कन्याएँ हैं। तुम भी सत्त्वसम्पन्न तथा शम्भुके पुत्रके समान हो और विष्णुने तुम्हें भेजा है; अतः चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। वहाँ देवसमुदायका दर्शन करूँगा। (अध्याय १४-१५)


कार्तिकेयका नन्दिकेश्वरके साथ कैलासपर आगमन, स्वागत, सभामें जाकर विष्णु आदि देवोंको नमस्कार करना और शुभाशीर्वाद पाना

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! शंकरसुवन कार्तिकेय नन्दिकेश्वरसे यों कहकर शीघ्र ही कृत्तिकाओंको समझाते हुए नीतियुक्त वचन बोले।

कार्तिकेयने कहा— माताओ! मैं देवसमुदाय, बन्धुवर्ग तथा माताको देखना चाहता हूँ; अतः शंकरजीके निवासस्थानपर जाऊँगा, इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा प्रदान करें। सारा जगत्, शुभदायक जन्म-कर्म, संयोग-वियोग सभी दैवके


* स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया। अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भकन्याभगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः। मातृर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च। जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(१५। ३८—४०)

३४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण अधीन है। दैवसे बढ़कर दूसरा कोई बली नहीं है। वह दैव श्रीकृष्णके वशमें रहनेवाला है; क्योंकि वे दैवसे परे हैं। इसीलिये संतलोग उन ऐश्वर्यशाली परमात्माका निरन्तर भजन करते हैं। अविनाशी श्रीकृष्ण अपनी लीलासे दैवको बढ़ाने और घटानेमें समर्थ हैं। उनका भक्त दैवके वशीभूत नहीं होता—ऐसा निर्णीत है। इसलिये आपलोग इस दुःखदायक मोहका परित्याग कीजिये और जो सुखदाता, मोक्षप्रद, सारसर्वस्व, जन्म- मृत्युके भयके विनाशकर्ता, परमानन्दके जनक और मोह-जालके उच्छेदक हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवगण जिनका निरन्तर भजन करते हैं, उन गोविन्दकी भक्ति कीजिये। इस भवसागरमें मैं आपलोगोंका कौन हूँ और आपलोग मेरी कौन हैं? संसार-प्रवाहका वह सारा कर्म फेनकी भाँति पुञ्जीभूत हो गया है। (वस्तुतः कोई किसीका नहीं है।) संयोग अथवा वियोग—यह सब ईश्वरकी इच्छासे ही होता है। यहाँतक कि सारा ब्रह्माण्ड ईश्वरके अधीन है, वह भी स्वतन्त्र नहीं है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। सारी त्रिलोकी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर है, फिर भी मायासे मोहित चित्तवाले लोग इस अनित्य जगत्में मायाका विस्तार करते हैं; परंतु जो श्रीकृष्णपरायण संत हैं, वे जगत्में रहते हुए भी वायुकी भाँति लिप्त नहीं होते। इसलिये माताओ! आपलोग मोहका परित्याग करके मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये। यों कहकर ऐश्वर्यशाली कार्तिकेयने उन कृत्तिकाओंको नमस्कार किया और फिर मन- ही-मन श्रीहरिका स्मरण करते हुए शंकरजीके पार्षदोंके साथ यात्राके लिये प्रस्थान किया। इसी बीच उन्होंने वहाँ एक उत्तम रथको देखा। वह बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसे विश्वकर्माने भलीभाँति निर्माण किया था, उसमें स्थान- स्थानपर माणिक्य और हीरे जड़े गये थे, जिससे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। पारिजात- पुष्पोंकी मालावलीसे वह सुशोभित था। मणियोंके दर्पण तथा श्वेत चँवरोंसे वह अत्यन्त उद्भासित हो रहा था और चित्रकारीयुक्त रमणीय क्रीडा- भवनोंसे वह भलीभाँति सुसज्जित था। वह मनोहर तो था ही, उसका विस्तार भी बड़ा था। उसमें सौ पहिये लगे थे। उसका वेग मनके समान था और श्रेष्ठ पार्षद उसे घेरे हुए थे। उस रथको पार्वतीने भेजा था। उस रथपर कार्तिकेयको चढ़ते देखकर कृत्तिकाओंका हृदय दुःखसे फटा जा रहा था। उनके केश खुल गये थे और वे शोकसे व्याकुल थीं। सहसा चेतना प्राप्त होनेपर अपने सामने स्कन्दको देख वे अत्यन्त शोकके कारण ठगी-सी रह गयीं; फिर वहीं भयवश उन्मत्तकी भाँति कहने लगीं। कृत्तिकाओोंने कहा—हाय! अब हमलोग क्या करें, कहाँ चली जायें ? बेटा ! हमारे आश्रय तो तुम्हीं हो। इस समय तुम हमलोगोंको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? यह तुम्हारे लिये धर्मसङ्गत बात नहीं है। हमलोगोंने बड़े स्नेहसे तुम्हें पाला-पोसा है, अतः तुम धर्मानुसार हमारे पुत्र हो। भला, उपयुक्त पुत्र मातृवर्गोंका परित्याग कर दे—यह भी कोई धर्म है? यों कहकर सभी कृत्तिकाओोंने कार्तिकेयको छातीसे चिपका लिया और पुत्र- वियोगजन्य दारुण दुःखके कारण वे पुनः मूर्च्छित हो गयीं। मुने ! तत्पश्चात् कुमार कार्तिकेयने आध्यात्मिक वचनोंद्वारा उन्हें समझाया और फिर उनके तथा पार्षदोंके साथ वे उस रथपर सवार हुए। मुने ! यात्राकालमें उन्होंने अपने सामने साँड़, गजराज, घोड़ा, जलती हुई आग, भरा हुआ सुवर्ण-कलश, अनेक प्रकारके पके हुए फल, पति-पुत्रसे युक्त स्त्री, प्रदीप, उत्तम मणि, मोती, पुष्पमाला, मछली और चन्दन—इन माङ्गलिक वस्तुओंको, वामभागमें शृगाल, नकुल, कुम्भ और शुभदायक शवको तथा दक्षिणभागमें राजहंस,

गणपतिखण्ड ३४९


मयूर, खञ्जन, शुक, कोकिल, कबूतर, शङ्खचिल्ल (सफेद चील), माङ्गल्यिक चक्रवाक, कृष्णसार-मृग, सुरभी और चमरी गौ, श्वेत चँवर, सवत्सा धेनु और शुभ पताकाको देखा। उस समय नाना प्रकारके बाजोंकी मङ्गलध्वनि सुनायी पड़ने लगी, हरिकीर्तन तथा घण्टा और शङ्खका शब्द होने लगा। इस प्रकार मङ्गल-शकुनोंको देखते तथा सुनते हुए कार्तिकेय आनन्दपूर्वक उस मनके समान वेगशाली रथके द्वारा क्षणमात्रमें ही पिताके मन्दिरपर जा पहुँचे। वहाँ कैलासपर पहुँचकर वे अविनाशी वट-वृक्षके नीचे कृत्तिकाओं तथा श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ कुछ देरके लिये ठहर गये। उस नगरके राजमार्ग बड़े मनोहर थे। उनपर चारों ओर पद्मराग और इन्द्रनीलमणि जड़ी हुई थी। समूह-के-समूह केलेके खंभे गड़े थे, जिनपर रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दनके पल्लवोंकी बन्दनवार लटक रही थी। वह पूर्ण कुम्भोंसे सुशोभित था। उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। असंख्यों रत्नप्रदीपों तथा मणियोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह सदा उत्सवोंसे व्याप्त, हाथोंमें दूब और पुष्प लिये हुए वन्दियों और ब्राह्मणोंसे युक्त तथा पति-पुत्रवती साध्वी नारियोंसे समन्वित था। समस्त मङ्गल-कार्य करके पार्वती देवी लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, तुलसी, रति, अरुन्धती, अहल्या, दिति, सुन्दरी तारा, अदिति, शतरूपा, शची, संध्या, रोहिणी, अनसूया, स्वाहा, संज्ञा, वरुण-पत्नी, आकूति, प्रसूति, देवहूति, मेनका, एक रंग तथा एक प्रकृतिवाली मैनाक-पत्नी, वसुन्धरा और मनसादेवीको आगे करके वहाँ आयीं। तदनन्तर देवगण, मुनिसमुदाय, पर्वत, गन्धर्व तथा किन्नर सब-के-सब आनन्दमग्न हो कुमारके स्वागतमें गये। महेश्वर भी नाना प्रकारके बाजों, रुद्रगणों, पार्षदों, भैरवों तथा क्षेत्रपालोंके साथ वहाँ पधारे। तत्पश्चात् शक्तिधारी कार्तिकेय पार्वतीको निकट देखकर हर्षगद्गद हो गये। उस समय वे तुरंत ही रथसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगे। तब पार्वतीने कार्तिकेयको देखकर लक्ष्मी आदि देवियों, मुनि-पत्नियों और शिव आदि सभीसे यत्नपूर्वक परम भक्तिके साथ सम्भाषण किया और उन्हें अपनी गोदमें उठाकर वे चूमने लगीं। फिर शंकर, देवगण, पर्वत, शैलपत्नियों, पार्वती आदि देवियों तथा सभी मुनियोंने कार्तिकेयको शुभाशीर्वाद दिया। तदनन्तर कुमार गणोंके साथ शिव-भवनमें आये। वहाँ सभाके मध्यमें उन्होंने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको देखा। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। धर्म, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु आदि देवता उन्हें घेरे हुए थे। उनका मुख प्रसन्न था तथा उसपर थोड़ी-थोड़ी मुसकानकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे। उनपर श्वेत चँवर डुलाया जा रहा था और देवेन्द्र तथा मुनीन्द्र उनका स्तवन कर रहे थे। उन जगन्नाथको देखकर कार्तिकेयके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद

३५०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मा, धर्म, देवताओं और हर्षित मुनिवरोंमें प्रत्येकको प्रणाम किया और उनका शुभाशीर्वाद पाया। फिर बारी-बारीसे सबसे कुशल-समाचार पूछकर वे एक रत्नसिंहासनपर बैठे। उस समय पार्वतीसहित शंकरने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान किया।
(अध्याय १६)


कार्तिकेयका अभिषेक तथा देवताओंद्वारा उन्हें उपहार-प्रदान

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! तदनन्तर जगदीश्वर विष्णुने प्रसन्नमनसे शुभ मुहूर्त निश्चय करके कार्तिकेयको एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और कौतुकवश नाना प्रकारके झाँझ-मँजीरा तथा यन्त्रमय बाजे बजवाये। फिर अमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों घड़ोंसे, जो वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलोंसे परिपूर्ण थे, कार्तिकेयको हर्षपूर्वक स्नान कराया। तत्पश्चात् कार्तिकेयको प्रसन्नमनसे बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित किरीट, दो माङ्गलिक बाजूबंद, अमूल्य रत्नोंके बने हुए बहुत-से आभूषण, अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो दिव्य वस्त्र, क्षीरसागरसे उत्पन्न हुई कौस्तुभमणि और वनमाला दी। ब्रह्माने यज्ञसूत्र, वेद, वेदमाता गायत्री, संध्या-मन्त्र, कृष्ण-मन्त्र, श्रीहरिका स्तोत्र और कवच, कमण्डलु, ब्रह्मास्त्र तथा शत्रुविनाशिनी विद्या प्रदान की। धर्मने दिव्य धर्मबुद्धि और समस्त जीवोंपर दया समर्पित की। शिवने परमोत्कृष्ट मृत्युञ्जय-ज्ञान, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान, निरन्तर सुख प्रदान करनेवाला परम मनोहर तत्त्वज्ञान, योगतत्त्व, सिद्धितत्त्व, परम दुर्लभ ब्रह्मज्ञान, त्रिशूल, पिनाक, फरसा, शक्ति, पाशुपतास्त्र, धनुष और संधान-संहारके ज्ञानसहित संहारास्त्र अर्पित किया। वरुणने श्वेत छत्र और रत्नोंकी माला, महेन्द्रने गजराज, अमृतसागरने अमृतका कलश, सूर्यने मनके समान वेगशाली रथ और मनोहर कवच, यमने यमदण्ड और अग्निने बहुत बड़ी शक्ति प्रदान की। इसी प्रकार अन्यान्य सभी देवताओंने भी हर्षपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र उन्हें भेंट किये। कामदेवने हर्षमग्न होकर उन्हें कामशास्त्र और क्षीरसागरने अमूल्य रत्न तथा रत्नोंके बने हुए विशिष्ट नूपुर दिये। पार्वतीका मन तो उस समय परमानन्दमें निमग्न था, उन्होंने मुस्कराते हुए महाविद्या, सुशीलाविद्या, मेधा, दया, स्मृति, अत्यन्त निर्मल बुद्धि, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, धृति, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति और श्रीहरिकी दासता प्रदान की। नारद! प्रजापतिने देवसेनाको, जो रत्नाभरणोंसे विभूषित, परम विनीत, उत्तम शीलवती, मनको हरण कर लेनेवाली अत्यन्त सुन्दरी थी, जिसे विद्वान् लोग शिशुओंकी रक्षा करनेवाली महाषष्ठी कहते हैं, वैवाहिक विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक कार्तिकेयके अर्पित कर दिया। इस प्रकार कुमारका अभिषेक करके सभी देवता, मुनिगण और गन्धर्व जगदीश्वरोंको प्रणाम करके अपने-अपने घर चले गये।

नारद! इसके बाद शंकरने नारायण, ब्रह्मा और धर्मकी स्तुति की और फिर धर्मका आलिङ्गन करके परमप्रिय श्रीहरिको मस्तक झुकाया। तदनन्तर शंकरद्वारा सत्कृत होकर शैलराज हिमालय गणोंसहित प्रेमपूर्वक वहाँसे बिदा हुए। इस प्रकार जो-जो लोग वहाँ आये थे, वे सभी आनन्दपूर्वक प्रस्थान कर गये। तब महेश्वर देवी पार्वतीके साथ बड़े आनन्दसे वहाँ रहने लगे। कुछ समय बीतनेके बाद शंकरने पुनः उन सभी देवोंको बुलाकर विवाह-विधिके अनुसार पुष्टिको महात्मा गणेशके हाथों समर्पित कर दिया। इस प्रकार दोनों पुत्रों तथा गणोंके साथ रहती हुई पार्वतीका मन बड़ा प्रसन्न था।

गणपतिखण्ड ३५१

वे सम्पूर्ण कामनाओंके देनेवाले स्वामीके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती थीं। नारद ! इस प्रकार मैंने देवताओंका समागम, पार्वतीको पुत्र-प्राप्ति, कुमारका अभिषेक, उनका पूजन और विवाह तथा गणेशका विवाह—यह सारा वृत्तान्त तुमसे वर्णन कर दिया। अब तुम्हारे मनमें कौन-सी अभिलाषा है? फिर और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय १७)


गणेशके शिरश्छेदनके वर्णनके प्रसङ्गमें शंकरद्वारा सूर्यका मारा जाना, कश्यपका शिवको शाप देना, सूर्यका जीवित होना और माली-सुमालीकी रोगनिवृत्ति

नारदने पूछा—महाभाग नारायण ! आप तो वेदवेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् हैं। परमेश्वर ! मैं आपसे एक बहुत बड़े संदेहका समाधान जानना चाहता हूँ। प्रभो! जो देवेश्वर महात्मा शंकरके पुत्र तथा विघ्नोंके विनाशक हैं, उन गणेश्वरके लिये जो विघ्न घटित हुआ, उसका क्या कारण है? जब परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा श्रीमान् गोलोकनाथ स्वयं ही अपने अंशसे पार्वतीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे, तब उन ग्रहाधिराज भगवान् श्रीकृष्णके मस्तकका ग्रहकी दृष्टिसे कट जाना बड़े आश्चर्यकी बात है। आप इस वृत्तान्तको मुझे बतलानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—ब्रह्मन् ! विघ्नेश्वरका यह विघ्न जिस कारणसे हुआ था, उस प्राचीन इतिहासको तुम सावधान होकर श्रवण करो। नारद ! एक समयकी बात है। भक्तवत्सल शंकरने माली और सुमालीको मारनेवाले सूर्यपर बड़े क्रोधके साथ त्रिशूलसे प्रहार किया। वह शिवके समान तेजस्वी त्रिशूल अमोघ था। अतः उसकी चोटसे सूर्यकी चेतना नष्ट हो गयी और वे तुरंत ही रथसे नीचे गिर पड़े। जब कश्यपजीने देखा कि मेरे पुत्रकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी हैं और वह चेतनाहीन हो गया है, तब वे उसे छातीसे लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओंमें हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। अन्धकार छा जानेसे सारा जगत् अंधीभूत हो गया। तब ब्रह्माके पौत्र तपस्वी कश्यपजी, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे, अपने पुत्रको प्रभाहीन देखकर शिवको शाप देते हुए बोले—'जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूलसे मेरे पुत्रका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया है, उसी तरह तुम्हारे पुत्रका मस्तक कट जायगा।' शिवजी आशुतोष तो हैं ही; अतः क्षणमात्रमें ही उनका क्रोध जाता रहा। तब उन्होंने उसी क्षण ब्रह्मज्ञानद्वारा सूर्यको जीवित कर दिया। तदनन्तर जो ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशसे उत्पन्न हैं, वे त्रिगुणात्मक भक्तवत्सल सूर्य चेतना प्राप्त करके पिताके समक्ष खड़े हुए। फिर भक्तिपूर्वक पिताको तथा शंकरको नमस्कार किया। साथ ही (पिताद्वारा दिये गये) शम्भुके शापको जानकर वे कश्यपजीपर क्रुद्ध हो गये, जिससे उन्होंने अपने विषयको ग्रहण नहीं किया और क्रोधावेशमें यों कहा—'ईश्वरके बिना यह सब कुछ तुच्छ, अनित्य और नश्वर है, अतः विद्वान्को चाहिये कि वह मङ्गलकारक सत्यको छोड़कर अमङ्गलकी इच्छा न करे। इसलिये अब मैं विषयका परित्याग करके परमेश्वर श्रीकृष्णका भजन करूँगा।' यह सुनकर देवताओंने ब्रह्माको प्रेरित किया, तब उन प्रभुने शीघ्रतापूर्वक वहाँ पधारकर सूर्यको समझाया और उन्हें इनके कार्यपर नियुक्त किया। फिर ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनन्दपूर्वक सूर्यको आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवनको चले गये। इधर सूर्य भी अपनी राशिपर आरूढ़ हुए। तत्पश्चात् माली

३५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

और सुमाली व्याधिग्रस्त हो गये। उनके शरीरमें सफेद कोढ़ हो गयी, जिससे सारा अङ्ग गल गया, शक्ति जाती रही और प्रभा नष्ट हो गयी। तब स्वयं ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा—'सूर्यके कोपसे ही तुम दोनों हतप्रभ हो गये हो और तुम्हारा शरीर गल गया है, अतः तुमलोग सूर्यका भजन करो।' फिर ब्रह्मा उन दोनोंको सूर्यका कवच, स्तोत्र और पूजाकी सारी विधि बतलाकर ब्रह्मलोकको चले गये। मुने! तदनन्तर वे दोनों पुष्करमें जाकर सूर्यका भजन करने लगे। वहाँ वे तीनों काल स्नान करके भक्तिपूर्वक उत्तम सूर्य-मन्त्रके जपमें तल्लीन हो गये। फिर समयानुसार सूर्यसे वरदान पाकर वे पुनः अपने असली रूपमें आ गये। इस प्रकार मैंने यह सारा वृत्तान्त वर्णन कर दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय १८)


ब्रह्माद्वारा माली-सुमालीको सूर्यके कवच और स्तोत्रकी प्राप्ति तथा सूर्यकी कृपासे उन दोनोंका नीरोग होना

तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर नारायण बोले—नारद! मैं श्रीसूर्यके पूजनका क्रम तथा सम्पूर्ण पापों और व्याधियोंसे विमुक्त करनेवाले कवच और स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। जब माली और सुमाली—ये दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये, तब उन्होंने स्तवन करनेके लिये शिव-मन्त्र प्रदान करनेवाले ब्रह्माका स्मरण किया। ब्रह्माने वैकुण्ठमें जाकर कमलापति विष्णुसे पूछा। उस समय शिव भी वहीं श्रीहरिके संनिकट विराजमान थे।

ब्रह्मा बोले—हरे! माली और सुमाली दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये हैं, अतः उनके रोगके विनाशका कौन-सा उपाय है—यह बतलािये।

विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! वे दोनों पुष्करमें जाकर वर्षभरतक मेरे अंशभूत व्याधिहन्ता सूर्यकी सेवा करें, इससे वे रोगमुक्त हो जायेंगे।

शंकरने कहा—जगदीश्वर! उन दोनोंको रोगनाशक महात्मा सूर्यका स्तोत्र, कवच और मन्त्र, जो कल्पतरुके समान है, प्रदान कीजिये। ब्रह्मन्! स्वयं श्रीहरि तो सर्वस्व प्रदान करनेवाले हैं और सूर्य रोगनाशक हैं। जिसका जो-जो विषय है, अपने विषयमें ये दोनों सम्पत्ति-प्रदायक हैं। इस प्रकार विष्णु और शिवकी अनुमति पाकर ब्रह्मा उन दैत्योंके घर गये। तब दैत्योंने उन्हें प्रणाम करके कुशल-समाचार पूछा और बैठनेके लिये आसन दिया। उन दैत्योंका शरीर गल गया था, उसमेंसे पीब और दुर्गन्ध निकल रही थी। आहाररहित होनेके कारण वे चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे। तब स्वयं दयालु ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा।

ब्रह्मा बोले—वत्सो! तुम दोनों कवच, स्तोत्र और पूजाकी विधिका क्रम ग्रहण करके पुष्करमें जाओ और वहाँ विनम्रभावसे सूर्यका भजन करो।

उन दोनोंने कहा—ब्रह्मन्! किस विधिसे और किस मन्त्रसे हम सूर्यका भजन करें, उनका स्तोत्र कौन-सा है और कवच क्या है—वह सब हमें प्रदान कीजिये।

ब्रह्माने कहा—वत्स! वहाँ त्रिकाल स्नान करके इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भास्करकी भलीभाँति सेवा करनेपर तुमलोग नीरोग हो जाओगे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—)'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'—इस मन्त्रसे सावधानतया सूर्यका पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक सोलह उपहार प्रदान करना चाहिये। यों ही पूरे वर्षभरतक करना होगा। इससे तुमलोग निश्चय ही रोगमुक्त हो जाओगे।

गणपतिखण्ड

३५३


पूर्वकालमें अहल्याका हरण करनेके कारण गौतमके शापसे जब इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग हो गये थे, उस संकट-कालमें बृहस्पतिजीने प्रेमपूर्वक पापयुक्त इन्द्रको जो कवच दिया था, वही अपूर्व सूर्यकवच मैं तुमलोगोंको प्रदान करता हूँ।

बृहस्पतिने कहा— इन्द्र! सुनो। मैं उस परम अद्भुत कवचका वर्णन करता हूँ जिसे धारण करके मुनिगण पवित्र हो भारतवर्षमें जीवन्मुक्त हो गये। इस कवचके धारण करनेवालेके संनिकट व्याधि भयके मारे उसी प्रकार नहीं जाती है, जैसे गरुड़को देखकर साँप दूर भाग जाते हैं। इसे अपने शिष्यको, जो गुरुभक्त और शुद्ध हो, बतलाना चाहिये परंतु जो दूसरेके दुष्ट स्वभाववाले शिष्यको देता है, वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस जगद्विलक्षण कवचके प्रजापति ऋषि हैं, गायत्री छन्द है और स्वयं सूर्य देवता हैं। व्याधिनाश तथा सौन्दर्यके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह सारस्वरूप कवच तत्काल ही पवित्र करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। 'ह्रीं ॐ क्लीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। अष्टादशाक्षर$^१$-मन्त्र सदा मेरे कपालको बचावे। 'ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरी नासिकाको सुरक्षित रखे। सूर्य मेरे नेत्रोंकी, विकर्तन पुतलियोंकी, भास्कर ओठोंकी और दिनकर दाँतोंकी रक्षा करें। प्रचण्ड मेरे गण्डस्थलका, मार्तण्ड कानोंका, मिहिर स्कन्धोंका और पूषा जंघाओंका सदा पालन करें। रवि मेरे वक्षःस्थलकी, स्वयं सूर्य नाभिकी और सर्वदेवनमस्कृत कङ्कालकी सदा देख-रेख करें। ब्रध्न हाथोंको, प्रभाकर पैरोंको और सामर्थ्यशाली विभाकर मेरे सारे शरीरको निरन्तर सुरक्षित रखें। वत्स! यह 'जगद्विलक्षण' नामक कवच अत्यन्त मनोहर तथा त्रिलोकीमें परम दुर्लभ है। इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। पूर्वकालमें पुलस्त्यने पुष्करक्षेत्रमें प्रसन्न होकर इसे मनुको दिया था, वही मैं तुम्हें दे रहा हूँ। इसे तुम जिस-किसीको मत दे देना। इस कवचकी कृपासे तुम्हारा रोग नष्ट हो जायगा और तुम नीरोग तथा श्रीसम्पन्न हो जाओगे—इसमें संशय नहीं है। एक लाख वर्षतक हविष्य-भोजनसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वह फल निश्चय ही इस कवचके धारणसे प्राप्त हो जाता है। इस कवचको जाने बिना जो मूर्ख सूर्यकी भक्ति करता है, उसे दस लाख जप करनेपर भी मन्त्रसिद्धि नहीं प्राप्त होती।

ब्रह्माने कहा— वत्स! इस कवचको धारण करके सूर्यका स्तवन करनेपर तुमलोग रोग-मुक्त हो जाओगे—यह निश्चित है। सूर्य-स्तवनका वर्णन सामवेदमें हुआ है। यह व्याधिविनाशक, सर्वपापहारी, परमोत्कृष्ट, साररूप और श्री तथा आरोग्यको देनेवाला है।

भगवन्! जो सनातन ब्रह्म, परमधाम, ज्योतीरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, त्रिलोकीके नेत्ररूप, जगन्नाथ, पापनाशक, तपस्याओंके फलदाता, पापियोंको सदा दुःखदायी, कर्मानुरूप फल प्रदान करनेवाले, कर्मके बीजस्वरूप, दयासागर, कर्मरूप, क्रियारूप, रूपरहित, कर्मबीज, ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशरूप, त्रिगुणात्मक, व्याधिदाता, व्याधिहन्ता, शोक-मोह-भयके विनाशक, सुखदायक, मोक्षदाता, साररूप, भक्तिप्रद, सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वेश्वर, सर्वरूप, सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी, समस्त लोकोंके दृष्टिगोचर, अप्रत्यक्ष, मनोहर, निरन्तर रसको हरनेवाले, तत्पश्चात् रसदाता, सर्वसिद्धिप्रद, सिद्धस्वरूप, सिद्धेश और सिद्धोंके परम गुरु हैं, उन आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। वत्स! मैंने इस स्तवराजका वर्णन कर दिया। यह गोपनीयसे भी परम गोपनीय है।$^२$ जो नित्य


१. 'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'।
२. ब्रह्मोवाच—
वं ब्रह्म परमधाम ज्योतीरूपं सनातनम्। त्वामहं स्तोतुमिच्छामि भक्तानुग्रहकारकम्॥

३५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तीनों काल इसका पाठ करता है, वह समस्त व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है। उसके अंधापन, कोढ़, दरिद्रता, रोग, शोक, भय और कलह—ये सभी विश्वेश्वर सूर्यकी कृपासे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। जो भयंकर कुष्ठसे दुःखी, गलित अङ्गोंवाला, नेत्रहीन, बड़े-बड़े घावोंसे युक्त, यक्ष्मासे ग्रस्त, महान् शूलरोगसे पीड़ित अथवा नाना प्रकारकी व्याधियोंसे युक्त हो, वह भी यदि एक मासतक हविष्यान्न भोजन करके इस स्तोत्रका श्रवण करे तो निश्चय ही रोगमुक्त हो जाता है और उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। अतः पुत्रो! तुमलोग शीघ्र ही पुष्करमें जाओ और वहाँ सूर्यका भजन करो। यों कहकर ब्रह्मा आनन्दपूर्वक अपने भवनको चले गये। इधर वे दोनों दैत्य सूर्यकी सेवा करके नीरोग हो गये। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पूछे हुए विघ्नेश्वरके विघ्नका कारण तथा सर्वविघ्नहर सूर्यकवच और सूर्यस्तवादि सुना दिये। अब तुम्हारी और क्या सुननेकी इच्छा है? (अध्याय १९)

भगवान् नारायणके निवेदित पुष्पकी अवहेलनासे इन्द्रका श्रीभ्रष्ट होना, पुनः बृहस्पतिके साथ ब्रह्माके पास जाना, ब्रह्माद्वारा दिये गये नारायणस्तोत्र, कवच और मन्त्रके जपसे पुनः श्री प्राप्त करना

तब श्रीनारायणने कहा—नारद! एक बार देवराज इन्द्र निर्जन वनमें, एक पुष्पोद्यानमें गये थे। वहाँ रम्भा अप्सरासे उनका समागम हुआ। तदनन्तर वे दोनों जलविहार करने लगे। इसी बीच मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वैकुण्ठसे कैलास जाते हुए शिष्यमण्डलीसहित वहाँ आ पहुँचे। देवराज इन्द्रने उन्हें प्रणाम किया। मुनिने आशीर्वाद दिया। फिर भगवान् नारायणका दिया हुआ पारिजात-पुष्प इन्द्रको देकर मुनिने कहा—'देवराज! भगवान् नारायणके निवेदित यह पुष्प सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। यह जिसके मस्तकपर रहेगा, वह सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा और देवताओंमें अग्रगण्य होकर अग्रपूजाका अधिकारी होगा। महालक्ष्मी छायाकी तरह सदा उसके साथ रहेगी। वह ज्ञान, तेज, बुद्धि, बल—सभी बातोंमें सब देवताओंसे श्रेष्ठ और भगवान् हरिके तुल्य पराक्रमी होगा। परंतु जो पामर अहंकारवश भगवान् श्रीहरिके निवेदित इस पुष्पको मस्तकपर धारण नहीं करेगा, वह अपनी जातिवालोंके सहित श्रीभ्रष्ट हो जायगा।' इतना कहकर दुर्वासाजी शंकरालयको चले गये। इन्द्रने उस पुष्पको अपने सिरपर न धारण करके ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। इससे इन्द्र श्रीभ्रष्ट हो गये। इन्द्रको श्रीभ्रष्ट देख रम्भा उन्हें छोड़कर स्वर्ग चली गयी। गजराज इन्द्रको नीचे गिराकर महान् अरण्यमें चला गया और हथिनीके साथ

त्रैलोक्यलोचनं लोकनाथं पापप्रमोचनम्। तपसां फलदातारं दुःखदं पापिनां सदा॥
कर्मानुरूपफलदं कर्मबीजं दयानिधिम्। कर्मरूपं क्रियारूपमरूपं कर्मबीजकम्॥
ब्रह्मविष्णुमहेशानामंशं च त्रिगुणात्मकम्। व्याधिदं व्याधिहन्तारं शोकमोहभयापहम्।
सुखदं मोक्षदं सारं भक्तिदं सर्वकामदम्॥
सर्वेश्वरं सर्वरूपं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्।
प्रत्यक्षं सर्वलोकानामप्रत्यक्षं मनोहरम्॥
शश्वद् रसहरं पश्चाद् रसदं सर्वसिद्धिदम्।
सिद्धिस্বরূপं सिद्धेशं सिद्धानां परमं गुरुम्।
स्तवराजमिति प्रोक्तं गुह्याद्गुह्यतरं परम्। (१९। ३६–४२)

गणपतिखण्ड ३५५

विहार करने लगा। उस वनमें उसके बहुत-से बच्चे हुए। इसी समय श्रीहरिने उस हाथीका मस्तक काटकर बालक (गणेश)-के सिरपर लगा दिया। वत्स! गजमुखके लगानेका प्रसङ्ग तुमको सुना दिया। इसके श्रवणसे पाप नष्ट होते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो, सो कहो।

नारदने पूछा— प्रभो! किस ब्रह्मशापके कारण वे सभी देवता श्रीभ्रष्ट हो गये थे। पुनः किस प्रकार उन्होंने उन जगज्जननी कमलाको प्राप्त किया? उस समय महेन्द्रने क्या किया? आप उस परम दुर्लभ गोपनीय रहस्यको बतलानेकी कृपा करें।

नारायणने कहा— नारद! जिसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द हो गयी थी, श्रीसे भ्रष्ट होनेके कारण जिसपर दीनता छायी हुई थी और जिसका आनन्द नष्ट हो गया था, वह इन्द्र गजेन्द्र और रम्भासे पराभूत होकर अमरावतीमें गया। मुने! वहाँ उसने देखा कि उस पुरीमें आनन्दका नामनिशान नहीं है। वह दीनतासे ग्रस्त, बन्धुओंसे हीन और शत्रुवर्गोंसे खचाखच भर गयी है। तब दूतके मुखसे सारा वृत्तान्त सुनकर वह गुरु बृहस्पतिके घर गया और फिर गुरु तथा देवगणोंके साथ वह ब्रह्माकी सभामें जा पहुँचा। वहाँ जाकर देवताओंसहित इन्द्रने तथा बृहस्पतिने ब्रह्माको नमस्कार किया और भक्तिभावसहित वेदविधिके अनुसार स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् बृहस्पतिने प्रजापति ब्रह्मासे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माने नीचे मुख करके कहना आरम्भ किया।

ब्रह्मा बोले— देवेन्द्र! तुम मेरे प्रपौत्र हो और श्रीसम्पन्न होनेसे सदा प्रज्वलित होते रहते हो। किंतु राजन्! लक्ष्मीके समान सुन्दरी शचीके पति होनेपर भी तुम आचरणभ्रष्ट हो जाते हो। जो आचरणभ्रष्ट होता है, उसे लक्ष्मी अथवा यशकी प्राप्ति कहाँसे हो सकती है? वह पापी तो सदा सभी सभाओंमें निन्दाका विषय बना रहता है। रम्भाने तुम्हें हतबुद्धि बना दिया था। इसी कारण तुमने दुर्वासाद्वारा दिये गये श्रीहरिके नैवेद्यको गजराजके मस्तकपर डाल दिया। इस समय सबके द्वारा भोगी जानेवाली वह रम्भा कहाँ है और श्रीसे भ्रष्ट हुए तुम कहाँ ? जिसके कारण तुम्हें लक्ष्मीसे रहित होना पड़ा, वह रम्भा भी तुम्हें क्षणभरमें ही त्यागकर चली गयी; क्योंकि वेश्या चञ्चला होती है। वह धनवानोंको ही पसंद करती है, निर्धनोंको नहीं तथा प्राचीन प्रेमीका तिरस्कार करके नये-नये नायकोंको खोजती रहती है। परंतु वत्स ! जो बीत गया, वह तो चला ही गया; क्योंकि बीता हुआ पुनः वापस नहीं आता। अब तुम लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक नारायणका भजन करो।

इतना कहकर नारायणपरायण ब्रह्माने इन्द्रको जगत्स्रष्टा नारायणका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दिया। तब इन्द्र देवताओं तथा गुरुके साथ पुष्करमें जाकर अपने अभीप्सित मन्त्रका जप करने लगे और कवच ग्रहण करके उसके द्वारा श्रीहरिकी स्तुतिमें तत्पर हो गये। इस प्रकार

५३- राजा कार्तवीर्यद्वारा—'युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ समर्पित कीजिये' कहनेपर जमदग्निमुनिका उसे घर लौटने और सनातन धर्मकी रक्षा करनेके लिये निर्देश देना

३५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पुण्यदायक शुभ भारतवर्षमें एक वर्षतक निराहार रहकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके हेतु उन्होंने लक्ष्मीपतिकी सेवा की। तब श्रीहरिने प्रकट होकर इन्द्रको मनोवाञ्छित वर तथा लक्ष्मीका स्तोत्र, कवच और ऐश्वर्यवर्धक मन्त्र प्रदान किया। मुने! यह सब देकर श्रीहरि तो वैकुण्ठको चले गये और इन्द्र क्षीरसागरपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने कवच धारणकर स्तोत्रद्वारा स्तवन करके लक्ष्मीको प्राप्त किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने शत्रुको जीतकर अमरावतीको अपने अधिकारमें कर लिया। इसी प्रकार सभी देवता एक-एक करके अपने इच्छित स्थानको प्राप्त हुए। (अध्याय २०-२१) श्रीहरिका इन्द्रको लक्ष्मी-कवच तथा लक्ष्मी-स्तोत्र प्रदान करना नारदजीने पूछा-तपोधन ! लक्ष्मीपति श्रीहरिने प्रकट होकर इन्द्रको महालक्ष्मीका कौन-सा स्तोत्र और कवच प्रदान किया था, वह मुझे बतलाइये। नारायणने कहा-नारद ! जब पुष्करमें तपस्या करके देवराज इन्द्र शान्त हुए, तब उनके क्लेशको देखकर स्वयं श्रीहरि वहीं प्रकट हुए। उन हृषीकेशने इन्द्रसे कहा- 'तुम अपने इच्छानुसार वर माँग लो।' तब इन्द्रने लक्ष्मीको ही वररूपसे वरण किया और श्रीहरिने हर्षपूर्वक उन्हें दे दिया। वर देनेके पश्चात् हृषीकेशने जो हितकारक, सत्य, साररूप और परिणाममें सुखदायक था, ऐसा वचन कहना आरम्भ किया। श्रीमधुसूदन बोले- इन्द्र ! (लक्ष्मी-प्राप्तिके लिये) तुम लक्ष्मी-कवच ग्रहण करो। यह समस्त दुःखोंका विनाशक, परम ऐश्वर्यका उत्पादक और सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। पूर्वकालमें जब सारा संसार जलमग्न हो गया था, उस समय मैंने इसे ब्रह्माको दिया था। जिसे धारण करके ब्रह्मा त्रिलोकीमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो गये थे। इसीके धारणसे सभी मनुलोग सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके भागी हुए थे। देवराज ! इस सर्वैश्वर्यप्रद कवचके ब्रह्मा ऋषि हैं, पङ्क्ति छन्द है, स्वयं पद्मालया लक्ष्मी देवी हैं और सिद्धैश्वर्यके जपोंमें इसका विनियोग कहा गया है। इस कवचके धारण करनेसे लोग सर्वत्र विजयी होते हैं। पद्मा मेरे मस्तककी रक्षा करें। हरिप्रिया कण्ठकी रक्षा करें। लक्ष्मी नासिकाकी रक्षा करें। कमला नेत्रकी रक्षा करें। केशवकान्ता केशोंकी, कमलालया कपालकी, जगज्जननी दोनों कपोलोंकी और सम्पत्प्रदा सदा स्कन्धकी रक्षा करें। 'ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा' मेरे पृष्ठभागका सदा पालन करे ! 'ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा' वक्षःस्थलको सदा सुरक्षित रखे। श्री देवीको नमस्कार है, वे मेरे कङ्काल तथा दोनों भुजाओंको बचावें। 'ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः' चिरकालतक निरन्तर मेरे पैरोंका पालन करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा' नितम्बभागकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा' मेरे सर्वाङ्गकी सदा रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा' सब ओरसे सदा मेरा पालन करे। वत्स ! इस प्रकार मैंने तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परमोत्कृष्ट कवचका वर्णन कर दिया। यह परम अद्भुत कवच सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरुकी अर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह सबको जीतनेवाला हो जाता है। महालक्ष्मी कभी उसके घरका त्याग नहीं करतीं; बल्कि प्रत्येक जन्ममें छायाकी भाँति सदा उसके साथ लगी रहती हैं। जो मन्दबुद्धि इस कवचको बिना जाने ही लक्ष्मीकी भक्ति करता है, उसे एक करोड़ जप

... गणपतिखण्ड ३५७ करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता*। नारायण कहते हैं— महामुने! यों जगदीश्वर श्रीहरिने प्रसन्न हो इन्द्रको यह कवच देनेके पश्चात् पुनः जगत्की हित-कामनासे कृपापूर्वक उन्हें 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो महालक्ष्म्यै हरिप्रियायै स्वाहा' यह षोडशाक्षर-मन्त्र भी प्रदान किया। फिर जो गोपनीय, परम दुर्लभ, सिद्धों और मुनिवरोंद्वारा दुष्प्राप्य और निश्चितरूपसे सिद्धिप्रद है, वह सामवेदोक्त शुभ ध्यान भी बतलाया। (वह ध्यान इस प्रकार है—) जिनके शरीरकी आभा श्वेत चम्पाके पुष्पके सदृश तथा कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान है, जो अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ीको धारण किये हुए तथा रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली, स्वस्थ और अत्यन्त मनोहर हैं, सहस्रदल-कमल जिनका आसन है, जो परम शान्त तथा श्रीहरिकी प्रियतमा पत्नी हैं, उन जगज्जननीका भजन करना चाहिये। देवेन्द्र! इस प्रकारके ध्यानसे जब तुम मनोहारिणी लक्ष्मीका ध्यान करके भक्तिपूर्वक उन्हें षोडशोपचार समर्पित करोगे और आगे कहे जानेवाले स्तोत्रसे उनकी स्तुति करके सिर झुकाओगे, तब उनसे वरदान पाकर तुम दुःखसे मुक्त हो जाओगे। देवराज! महालक्ष्मीका वह सुखप्रद स्तोत्र, जो परम गोपनीय तथा त्रिलोकीमें दुर्लभ है, बतलाता हूँ। सुनो। नारायण कहते हैं—देवि! जिनका स्तवन करनेमें बड़े-बड़े देवेश्वर समर्थ नहीं हैं, उन्हीं आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। आप बुद्धिके परे, सूक्ष्म, तेजोरूपा, सनातनी और अत्यन्त अनिर्वचनीया हैं। फिर आपका वर्णन कौन कर सकता है? जगदम्बिके ! आप स्वेच्छामयी, निराकार, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप और मन- वाणीसे परे हैं; तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ। आप चारों वेदोंसे परे, भवसागरको पार करनेके लिये उपायस्वरूप, सम्पूर्ण अन्नों तथा सारी सम्पदाओंकी अधिदेवी हैं और योगियों-योगों, ज्ञानियों-ज्ञानों, वेदों-वेदवेत्ताओंकी जननी हैं; फिर मैं आपका क्या वर्णन कर सकता हूँ! जिनके बिना सारा जगत् निश्चय ही उसी प्रकार

  • श्रीमधुसूदन उवाच- गृहाण कवचं शक्र सर्वदुःखविनाशनम्। परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनम् ॥ ब्रह्मणे च पुरा दत्तं संसारे च जलप्लुते । यद् धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः ॥ बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुता यतः । सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधिः ॥ पङ्क्तिश्छन्दश्च सा देवी स्वयं पद्मालया सुर। सिद्धैश्वर्यजपेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तितः । यद् धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ मस्तकं पातु मे पद्मा कण्ठं पातु हरिप्रिया । नासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम् ॥ केशान् केशवकान्ता च कपालं कमलालया। जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं स्कन्धं सम्प्रदा सदा ॥ ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु। पातु श्रीमर्म कङ्कालं बाहुयुग्मं च ते नमः ॥ ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे सततं चिरम् । ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम् ॥ ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वाङ्गं पातु मे सदा । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ॥ इति ते कथितं वत्स सर्वसम्पत्करं परम् । सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स सर्वविजयी भवेत् ॥ महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन । तस्य छायेव सततं सा च जन्मनि जन्मनि ॥ इदं कवचमज्ञात्वा भजेल्लक्ष्मीः सुमन्दधीः । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ( २२।५–१७)

५४- माताद्वारा युद्ध न करनेका अनुरोध किये जानेपर भी भार्गव परशुरामकी इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा

३५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वस्तुहीन एवं निष्फल हो जाता है, जैसे दूध पीनेवाले बच्चोंको माताके बिना सुख नहीं मिलता। आप तो जगत्‌की माता हैं; अतः प्रसन्न हो जाइये और हम अत्यन्त भयभीतोंकी रक्षा कीजिये। हमलोग आपके चरणकमलका आश्रय लेकर शरणापन्न हुए हैं। आप शक्तिस्वरूपा जगज्जननीको बारंबार नमस्कार है। ज्ञान, बुद्धि तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली आपको पुनः-पुनः प्रणाम है। महालक्ष्मी! आप हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी, सर्वज्ञा और सब कुछ देनेवाली हैं। आप बारंबार मेरा प्रणिपात स्वीकार करें। माँ! कुपुत्र तो कहीं-कहीं होते हैं, परंतु कुमाता कहीं नहीं होती। क्या कहीं पुत्रके दुष्ट होनेपर माता उसे छोड़कर चली जाती है? हे मातः! आप कृपासिन्धु श्रीहरिकी प्राणप्रिया हैं और भक्तोंपर अनुग्रह करना आपका स्वभाव है; अतः दुधमुँहे बालकोंकी तरह हमलोगोंपर कृपा करो, हमें दर्शन दो। वत्स! इस प्रकार लक्ष्मीका वह शुभकारक स्तोत्र, जो सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, शुभद और सम्पत्तिका आश्रयस्थान है, तुम्हें बता दिया। जो मनुष्य पूजाके समय इस महान् पुण्यकारक स्तोत्रका पाठ करता है, उसके गृहका महालक्ष्मी कभी परित्याग नहीं करतीं। इन्द्रसे इतना कहकर श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये। तब उनकी आज्ञासे देवताओंके साथ देवराज क्षीरसागरपर गये*। (अध्याय २१)


देवताओंके स्तवन करनेपर महालक्ष्मीका प्रकट होकर देवों और मुनियोंके समक्ष अपने निवास-योग्य स्थानका वर्णन करना

**नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर इन्द्र गुरु बृहस्पति तथा अन्यान्य देवोंको साथ लेकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये प्रसन्न-मनसे शीघ्र ही क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अमूल्य रत्नकी गुटिकासे युक्त कवचको गलेमें बाँधकर पुनः-पुनः उस दिव्य स्तोत्रका मन-ही-मन स्मरण


* नारायण उवाच—

देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि न क्षमाः स्तोतुमीश्वराः। बुद्धेरगोचरां सूक्ष्मां तेजोरूपां सनातनीम्॥
अत्यनिर्वचनीयां च को वा निर्वक्तुमीश्वरः॥
स्वेच्छामयीं निराकारां भक्तानुग्रहविग्रहाम्। स्तौमि वाङ्मनसोः पारं किं वाहं जगदम्बिके॥
परां चतुर्णां वेदानां पारबीजं भवार्णवे। सर्वशस्याधिदेवीं च सर्वांसामपि सम्पदाम्॥
योगिनां चैव योगानां ज्ञानानां ज्ञानिनां तथा। वेदानां च वेदविदां जननीं वर्णयामि किम्॥
यया विना जगत् सर्वमवस्तु निष्फलं ध्रुवम्। यथा स्तानान्धबालानां विना मात्रासुखं भवेत्॥
प्रसीद जगतां माता रक्षामानतिकातारन्। वयं त्वच्चरणाम्भोजे प्रपन्नाः शरणं गताः॥
नमः शक्तिस्वरूपायै जगन्मात्रे नमो नमः। ज्ञानदायै बुद्धिदायै सर्वदायै नमो नमः॥
हरिभक्तिप्रदायिन्यै मुक्तिदायै नमो नमः। सर्वज्ञायै सर्वदायै महालक्ष्म्यै नमो नमः॥
कुपुत्राः कुत्रचित् सन्ति न कुत्रचित् कुमातरः। कुत्र माता पुत्रदोषे तं विहाय च गच्छति॥
हे मातर्दर्शनं देहि स्तानान्थान् बालकानिव। कृपां कुरु कृपासिन्धुप्रियेऽस्मान् भक्तवत्सले॥
इत्येवं कथितं वत्स पद्मायाश्च शुभावहम्। सुखदं मोक्षदं सारं शुभदं सम्पदः पदम्॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं पूजाकाले च यः पठेत्। महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन॥
इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तं च तत्रैवान्तरधीयत। देवो जगाम क्षीरोदं सुरैः सार्धं तदाज्ञया॥
(२२।२७—३९)

गणपतिखण्ड ३५९

किया। फिर सब लोगोंने भक्तिभावपूर्वक कमल-वासिनी लक्ष्मीका स्तवन किया। उस समय उनके सिर भक्तिके कारण झुके हुए थे और अत्यन्त दीनतावश नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे। उनके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर सहस्रदल-कमलपर वास करनेवाली तथा सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती महालक्ष्मी तुरंत ही वहाँ प्रकट हो गयीं। मुने! उन जगन्माताकी उत्तम प्रभासे सारा जगत् व्यास हो गया। तदनन्तर जगत्का धारण-पोषण करनेवाली लक्ष्मीने देवताओंसे यथोचित हितकारक एवं साररूप वचन कहा।

श्रीमहालक्ष्मी बोलीं— बच्चो! तुमलोग ब्रह्मशापके कारण भ्रष्ट हो गये हो, अतः मेरा तुमलोगोंके घर जानेका विचार नहीं है। इस समय मैं ऐसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि मैं ब्रह्मशापसे डर रही हूँ। ब्राह्मण मेरे प्राण हैं। वे सभी सदा मुझे पुत्रसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे ब्राह्मण जो कुछ देते हैं, वही मेरी जीविकाका साधन होता है। यदि वे विप्र प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहें तो मैं उनकी आज्ञासे चल सकूँगी। वे तपस्वी मेरी पूजा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब अभाग्यका समय आ जाता है, तभी वे गुरु, ब्राह्मण, देव, संन्यासी तथा वैष्णवोंद्वारा शापित होते हैं। जो सबके कारण, ऐश्वर्यशाली, सर्वेश्वर और सनातन हैं, वे भगवान् नारायण भी ब्रह्मशापसे भय मानते हैं।

ब्रह्मन्! इसी बीच अङ्गिरा, प्रचेता, क्रतु, भृगु, पुलह, पुलस्त्य, मरीचि, अत्रि, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् सनत्कुमार, कपिल, आसुरि, वोढु, पञ्चशिख, दुर्वासा, कश्यप, अगस्त्य, गौतम, कण्व, और्व, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, मार्कण्डेय, लोमश और स्वयं भगवान् वसिष्ठ—ये सभी ब्राह्मण हर्षपूर्ण-चित्तसे वहाँ आये। वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे और उनके मुखोंपर मुस्कराहट थी। उन्होंने अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे भगवती लक्ष्मीका पूजन किया और देवताओंने उन्हें वन्य पदार्थोंका नैवेद्य समर्पित किया। फिर उन मुनीश्वरोंने हर्षके साथ उनकी स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनका आराधन किया और कहा—‘जगदम्बिके! आप देवलोक तथा मर्त्यलोकमें पधारिये।’ उनका वह वचन सुनकर जगज्जननी संतुष्ट हो गयीं और ब्राह्मणोंकी आज्ञासे निर्भय हो चलनेके लिये उद्यत होकर उनसे बोलीं।

श्रीमहालक्ष्मीने कहा— विप्रवरो! मैं आपलोगोंकी आज्ञासे देवताओंके घर जाऊँगी, किंतु भारतवर्षमें जिन-जिनके घर नहीं जाऊँगी, उनका विवरण सुनिये। पुण्यात्मा गृहस्थों और उत्तम नीतिके जानकार नरेशोंके घरमें तो मैं स्थिररूपसे निवास करूँगी और पुत्रकी भाँति उनकी रक्षा करूँगी। जिस-जिसके प्रति उसके गुरु, देवता, माता, पिता, भाई-बन्धु, अतिथि और पितर लोग रुष्ट हो जायँगे, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मिथ्यावादी, पराक्रमहीन और दुष्ट स्वभाववाला है तथा ‘मेरे पास कुछ नहीं है’ यों सदा कहता रहता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो सत्यहीन, धरोहर हड़प लेनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, विश्वासघाती और कृतघ्न है, उसके गृह में नहीं जाऊँगी। जो चिन्ताग्रस्त, भयभीत, शत्रुके चंगुलमें फँसा हुआ, महान् पापी, कर्जदार और अत्यन्त कृपण है—ऐसे पापियोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो दीक्षाहीन, शोकार्त, मन्दबुद्धि और सदा स्त्रीके वशमें रहनेवाला है तथा जो कुलटा स्त्रीका पति अथवा पुत्र है, उसके घर मैं कभी नहीं जाऊँगी। जो दुष्ट वचन बोलनेवाला और झगड़ालू है, जिसके घरमें निरन्तर कलह होता रहता है तथा जिसके घरमें स्त्रीका स्वामित्व है—ऐसे लोगोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जहाँ श्रीहरिकी पूजा और उनके गुणोंका

३६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कीर्तन नहीं होता तथा उनकी प्रशंसामें उत्सुकता नहीं है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो कन्या, अन्न और वेदको बेचनेवाला, मनुष्यघाती और हिंसक है, उसका घर नरककुण्डके समान है; अतः मैं उसके घर नहीं जाऊँगी। जो कृपणतावश माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी, गुरु, पुत्र, अनाथ बहिन और आश्रयहीन बान्धवोंका पालन-पोषण नहीं करता; सदा धन-संग्रहमें ही लगा रहता है; उसके नरक-कुण्ड-सदृश घरमें मैं नहीं जाऊँगी। जिसके दाँत और वस्त्र मलिन, मस्तक रूखा और ग्रास तथा हास विकृत रहते हैं, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्दबुद्धि मल-मूत्रका परित्याग करके उसपर दृष्टि डालता है और गीले पैरों सोता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो बिना पैर धोये सोता है; गाढ़ निद्राके वशीभूत होकर सोते समय नंगा हो जाता है तथा संध्याकाल और दिनमें शयन करनेवाला है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो पहले मस्तकपर तेल लगाकर पीछे उस तेलसे अन्य अङ्गोंका स्पर्श करता है अथवा सारे शरीरमें लगाता है उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मस्तक और शरीरमें तेल लगाकर मल-मूत्रका त्याग करता है, नमस्कार करता है और पुष्प तोड़कर ले आता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो नखोंसे तृण तोड़ता और नखोंसे भूमि कुरेदता है तथा जिसके शरीर और पैरमें मैल जमी रहती है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो अपने द्वारा अथवा पराये द्वारा दी हुई ब्राह्मणकी और देवताकी वृत्तिका अपहरण करता है, वह ज्ञानशील ही क्यों न हो, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मूर्ख कर्म करके दक्षिणा नहीं देता, वह शठ पापी और पुण्यहीन है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्त्रविद्या (झाड़-फूँक)-से जीविका चलानेवाला, ग्रामयाजी (पुरोहित), वैद्य, रसोइया और देवल (वेतन लेकर मूर्ति-पूजा करनेवाला) है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो क्रोधवश विवाह अथवा धर्मकार्यको काट देता है तथा जो दिनमें स्त्री-प्रसङ्ग करता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी।

नारद! इतना कहकर महालक्ष्मी अन्तर्धान हो गयीं। फिर उन्होंने देवताओंके गृह तथा मृत्युलोककी ओर देखा। तब सभी देवता और मुनिगण आनन्दपूर्वक महालक्ष्मीको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने वासस्थानको चले गये। उस समय उनके गृहोंको शत्रुओंने छोड़ दिया था और वे सुहृदोंसे परिपूर्ण थे। मुने! फिर तो स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार देवताओंने अपना राज्य और स्थिरा लक्ष्मीको प्राप्त किया। वत्स! इस प्रकार मैंने लक्ष्मीके उत्तम चरितका, जो सुखदायक, मोक्षप्रद और साररूप है, वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय २३)


गणेशके एकदन्त-वर्णन-प्रसङ्गमें जमदग्निके आश्रमपर कार्तवीर्यका स्वागत-सत्कार, कार्तवीर्यका बलपूर्वक कामधेनुको हरण करनेकी इच्छा प्रकट करना, कामधेनुद्वारा उत्पन्न की हुई सेनाके साथ कार्तवीर्यकी सेनाका युद्ध

नारदजीने पूछा— हरिके अंशसे उत्पन्न हुए महाभाग नारायण! आपकी कृपासे मैंने गणेशका सारा शुभ चरित सुन लिया। किंतु ब्रह्मन्! विष्णुने उस बालकके धड़पर गजराजके दो दाँतोंवाले मुखको जोड़ा था; फिर वह शिशु एकदन्त कैसे हो गया? उसका वह दूसरा दाँत कहाँ चला गया? वह प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि आप सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, कृपालु और भक्तवत्सल हैं।

गणपतिखण्ड | ३६१

नारायणने कहा—नारद! एकदन्तका चरित सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला है। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! एक समयकी बात है, राजा कार्तवीर्य शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ वह बहुत-से वन्य पशुओंका वध करके थक गया। इतनेमें सूर्यास्त हो चला, तब उस राजाने सायंकालमें सेनासहित वहीं वनमें जमदग्नि ऋषिके आश्रमके निकट पड़ाव डाल दिया और बिना कुछ खाये-पीये रात्रि व्यतीत की। प्रातःकाल राजा सरोवरमें स्नान करके पवित्र हुआ और अपने शरीरको अलंकृत करके दत्तात्रेयद्वारा दिये गये मन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करने लगा। मुनिवर जमदग्निने देखा कि राजाके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये हैं; तब उन्होंने प्रेमके साथ आदरपूर्वक कोमल वाणीसे राजाका कुशल-समाचार पूछा। तदनन्तर राजाने बड़ी उतावलीके साथ सूर्यके समान तेजस्वी मुनिको प्रणाम किया और मुनिने चरणोंमें पड़े हुए राजाको स्नेहपूर्वक शुभाशीर्वाद दिया। राजाने अपने उपवास आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया; तब मुनिने तुरंत ही डरते-डरते राजाको निमन्त्रण दे दिया। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि हर्षपूर्वक अपने आश्रमको लौट आये और वहाँ उन्होंने लक्ष्मीसदृशी माता कामधेनुसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब कामधेनु भयभीत हुए मुनिसे बोली—'मुने! मेरे रहते आपको भय कैसा? आप तो मेरे द्वारा सारे जगत्‌को भोजन करानेमें समर्थ हैं; फिर राजाकी क्या बात है? आप राजाओंके भोजन-योग्य त्रिलोकीमें दुर्लभ जिन-जिन पदार्थोंकी याचना करेंगे, वह सब मैं आपको प्रदान करूँगी।' तदनन्तर कामधेनुने अनेक प्रकारके भोजन करनेके योग्य सोने और चाँदीके बर्तन, असंख्यों भोजन बनानेके पात्र और बहुत-से स्वादिष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण बर्तन मुनिको दिये। फिर नाना प्रकारके स्वादिष्ट और पके हुए कटहल, आम, नारियल और बेलके फल प्रदान किये। नारद! स्वादिष्ट लड्डुओंकी तो असंख्य ढेरियाँ लग गयीं। जौ और गेहूँके आटेकी बनी हुई पूड़ियों और भाँति-भाँतिके पकवानोंका पर्वत तथा उत्तम-उत्तम अन्नोंका ढेर लग गया। दूध, दही और घीकी नदियाँ बह चलीं। शकरका ढेर तथा मोदकोंका पहाड़ लग गया। उत्तम धानके चिउड़ोंका पर्वत-सा ढेर लगा दिया। फिर कौतुकवश राजाओंके योग्य पूर्णतया कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और सुन्दर वस्त्राभूषण प्रदान किया। इस प्रकार सामग्रीसे सम्पन्न हो मुनिने खेल-ही-खेलमें सेनासहित राजाको मनोहर पदार्थ देकर भोजन कराया। तब जो-जो वस्तुएँ परम दुर्लभ थीं, उन्हें भरीपूरी देखकर राजाधिराज कार्तवीर्यको महान् विस्मय हुआ। फिर उन बर्तनोंको देखकर वह कहने लगा।

राजाने कहा—सचिव! जरा पता तो लगाओ कि ये दुर्लभ पदार्थ सहसा कहाँसे आ गये? ये मेरे लिये असाध्य हैं और बहुतोंका तो मैंने नाम भी नहीं सुना है।

मन्त्री बोला—महाराज! मैंने मुनिके आश्रममें सब कुछ देख लिया है, सुनिये। वहाँ तो अग्निकुण्ड, समिधा, कुश, पुष्प, फल, कृष्णमृगचर्म, स्रुवा, स्रुक्, शिष्यसमुदाय और सूर्यके तेजके आधारपर पकनेवाले अन्न आदि ही हैं। वह सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे रहित है। वहाँ मैंने यह भी देखा है कि सभी लोग जटाधारी हैं और वृक्षोंकी छाल ही उनका वस्त्र है। परंतु आश्रमके एक भागमें मैंने एक मनोहर कपिला गौको देखा है। उसके अङ्ग बड़े सुन्दर हैं। चाँदनीकी-सी उसकी कान्ति है और लाल कमलके समान उसके नेत्र हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिमती वह गौ वहाँ तेजसे उद्दीप्त हो रही थी। वही साक्षात् लक्ष्मीकी तरह सम्पूर्ण सम्पत्तियों और गुणोंकी आधार है।

३६२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तदनन्तर मन्त्रीके कहनेपर वह दुर्बुद्धि राजा मुनिसे उस गौकी याचना करनेके लिये उद्यत हो गया; क्योंकि वह उस समय सर्वथा कालपाशसे बँधा हुआ था। भला, पुण्य अथवा उत्तम बुद्धि क्या कर सकती है; क्योंकि होनहार ही सब तरहसे बली होता है। इसी कारण पुण्यवान् एवं बुद्धिमान् होकर भी राजेन्द्र कार्तवीर्य दैववश ब्राह्मणसे याचना करना चाहता है। पुण्यसे भारतवर्षमें पुण्यरूप कर्म और पापसे भयदायक पापरूप कर्म प्रकट होता है। पुण्यकर्मसे स्वर्गका भोग करके मनुष्य पुण्यस्थलमें जन्म लेते हैं और पापकर्मसे नरकका भोग करनेके पश्चात् प्राणियोंकी निन्दित योनिमें उत्पत्ति होती है। नारद! कर्मके वर्तमान रहते प्राणियोंका उद्धार नहीं होता; इसलिये संतलोग निरन्तर कर्मका क्षय ही करते रहते हैं। वही विद्या, वही तप, वही ज्ञान, वही गुरु, वही भाई-बन्धु, वही माता, वही पिता और वही पुत्र सार्थक है, जो कर्मक्षयमें सहायता करता है*। प्राणियोंके कर्मोंका शुभ-अशुभ भोग दारुण रोगके समान है, जिसे भक्तरूपी वैद्य श्रीकृष्ण-भक्तिरूपी रसायनके द्वारा नष्ट करते हैं। जगत्का धारण-पोषण करनेवाली बुद्धिदायिनी माया प्रत्येक जन्ममें सेवा किये जानेपर संतुष्ट होकर भक्तको वह भक्ति प्रदान करती है। तदनन्तर मायासे विमुग्ध हुए राजा कार्तवीर्यने यत्नपूर्वक मुनिको अपने पास बुलाया और हर्षके साथ अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उनसे विनयपूर्ण वचन कहा।

**राजा बोला—**भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाले भक्तेश! आप तो कल्पतरुके समान हैं; अतः मुझ भक्तको कामनापूर्ण करने-वाली इस कामधेनुको भिक्षारूपमें प्रदान कीजिये। तपोधन! आप-जैसे दाताओंके लिये भारतमें कोई वस्तु अदेय नहीं है। मैंने सुना भी है कि पूर्वकालमें दधीचिने देवताओंको अपनी हड्डी दे डाली थी। तपोराशे! आप तो भारतवर्षमें लीलापूर्वक भ्रूभङ्गमात्रसे समूह-की-समूह कामधेनुओंकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं।

**मुनिने कहा—**राजन्! आश्चर्य है, तुम तो उलटी बात कह रहे हो। अरे मूर्ख एवं छली नरेश! मैं ब्राह्मण होकर क्षत्रियको दान कैसे दूँगो? इस कामधेनुको परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें यज्ञके अवसरपर ब्रह्माको दिया था, अतः प्राणोंसे बढ़कर प्यारी यह गौ देने योग्य नहीं है। भूमिपाल! फिर ब्रह्माने इसे अपने प्रिय पुत्र भृगुको दिया और भृगुने मुझे दिया। इस प्रकार यह कपिला मेरी पैतृक सम्पत्ति है। यह कामधेनु गोलोकमें उत्पन्न हुई है; अतः त्रिलोकीमें दुर्लभ है। तब भला मैं लीलापूर्वक ऐसी कपिलाकी सृष्टि करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ। न तो मैं हलवाहा हूँ और न तुम्हारी सहायतासे बुद्धिमान् हुआ हूँ। मैं अतिथिको छोड़कर शेष सबको क्षणमात्रमें भस्मसात् करनेकी शक्ति रखता हूँ। अतः अपने घर जाओ और स्त्री-पुत्रोंको देखो।

मुनिके इस वचनको सुनकर राजाको क्रोध आ गया। तब वह मुनिको नमस्कार करके सेनाके मध्यमें चला गया। उस समय भाग्यने उसे बाधित कर दिया था; अतः क्रोधके कारण उसके होंठ फड़क रहे थे। उसने सेनाके निकट जाकर बलपूर्वक गौको लानेके लिये नौकरोंको भेजा। इधर शोकके कारण, जिनका विवेक नष्ट हो गया था, वे मुनिवर जमदग्नि कपिलाके संनिकट जाकर रोने लगे और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाली वह गौ, जो साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा थी, ब्राह्मणको रोते देखकर बोली।


* सा विद्या तत्तपो ज्ञानं स गुरुः स च बान्धवः। सा माता स पिता पुत्रस्तत् क्षयं कारयेत् तु यः॥
( २४। ३५)