संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इसके अनन्तर परमाधिक क्रुद्ध हुए और उन्होंने ब्रह्मास्त्र अभिसन्धान किया था ।८। महान बली पुष्कराक्ष ने भी उसी समय में ब्रह्म अस्त्र का ही प्रयोग करके उसको निकृष्ट कर दिया था। तब वह इतना क्रोधित हो गया था जैसे दण्ड से आहत सर्प हो जाया करता है ऐसा जब परशुराम ने उसको देखा था ।६। फिर उष्ण श्वास लेते हुए राम ने अपना महान घोर परशु ले लिया था और उसकी ओर दौड़े थे। धनुर्धारी पुष्कराक्ष ने वहाँ पर दौड़ते हुए परशुराम के ऊपर पाँच बाण छोड़े थे जो परम दीप्त उरगों के ही समान थे। उसने एक-एक बाण से परशुराम के शरीर का वेधन किया था और एक हृदय में—एक शिर में दो भुजाओं में और एक शिखा में मारकर इनका भेदन कर दिया था तथा बहुत ही आतुर करके स्तम्भित कर दिया था। वह राम इस प्रकार से प्रपीड़ित हो गये थे और युद्ध स्थल में पुष्कराक्ष ने उनको जहाँ तहाँ रोक दिया था ।१०-१२। पर क्षण भर स्थित रहकर बहुत ही बहुत अधिक बल से दौड़कर उन्होंने फिर उस पुष्कराक्ष के मस्तक में अपने परशु का प्रहार किया था और चोटी से लेकर पैरों तक उसके दो टुकड़े कर दिये थे ।१३। दो खण्डों में कटकर उसके भूमि पर निपतित हो जाने पर जो भी मनुष्य वहाँ पर देख रहे थे उनको तथा देवलोक में देवों को बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ था कि इतने बड़े बलशाली को किस तरह से टुकड़े कर मार गिराया है ।१४।
विदार्य रामस्तं क्रोधात्पुष्कराक्षं महाबलम् ।
तत्सैन्यमदहत्क्रुद्धः पावको विपिनं यथा ॥१५
यतो यतो धावति भार्गवेन्द्रो मनोऽनिलौजाः प्रहरन्परश्वधम् ।
ततस्ततो वाजिरथेभमानवा निकृत्तगात्राः शतशो निपेतुः ॥१६
रामेण तत्रातिबलेन संगरे निहन्यमानास्तु परश्वधेन ।
हा तात मातस्त्वति जल्पमाना भस्मीबभूवुः
सुविचूर्णितास्तदा ॥१७
मुहूर्त्तमात्रेण च भार्गवेण तत्पुष्कराक्षस्य बलं समग्रम् ।
अनेकराजन्यकुलं हतेश्वरं हतं नवाक्षौहिणिकं भृशातुरम् ॥१८
पतिते पुष्कराक्षे तु कार्त्तवीर्यार्जुनः स्वयम् ।
आजगाम महावीर्यः सुवर्णरथमास्थितः ॥१६
परशुराम द्वारा कार्त्तवीर्य-वध ] [ ३१६
नानाशस्त्रसमाकीर्णं नानारत्नपरिच्छदम् ।
दशनल्वप्रमाणं च शतवाजियुतं नृपः ॥२०
युते बाहुसहस्रेण नानायुधधरेण च ।
बभौ स्वर्लोकमारोक्ष्यन्देहांते सुकृती यथा ॥२१
परशुराम ने क्रोध करके उस महाबली पुष्कराक्ष को विदीर्ण करके फिर क्रुद्ध होकर उसकी जो परम विशाल सेना थी उसको भी भस्मीभूत करके जला दिया जिस तरह से दावाग्नि बड़े भारी वन को जला दिया करता है ।१५। मन और वायु के सदृश ओज वाले परशुराम जहां-जहां पर भी दौड़कर जाते थे और अपने फरशा से प्रहार कर रहे थे वहीं-वहीं पर अश्व-रथ-हाथी और मानव सैनिक कट-कटकर छिन्न भिन्न शरीर वाले सैकड़ों ही गिर गये थे ।१६। अत्यन्त बल वाले राम ने वहां युद्ध भूमि में अपने परशु से जिनको मारकर गिरा दिया था अथवा अधमरे होकर गिर गये थे वे उस समय में मूर्च्छित होकर पड़े हुए चीत्कार कर रहे थे और हे तात ! हे माता ! हम मर रहे हैं—यह कहते हुए भस्मीभूत हो गये थे ।१७। मुहूर्त्त मात्र में ही अर्थात् दो घड़ियों के समय में भार्गव ने उस पुष्कराक्ष की सम्पूर्ण सेना को तथा बहुत से राजाओं के समुदाय को जिनके स्वामी निहत सो गये हैं एवं अत्यन्त आतुर नौ अक्षौहिणी सैन्य को निहत कर दिया था ।१८। जब यह देखा गया था कि पुष्कराक्ष जैसा महाबली मर गया तो कार्त्तवीर्यार्जुन जिसका महान बल-वीर्य था स्वयं एक सुवर्ण से निर्मित रथ पर समास्थित होकर वहाँ पर युद्ध करने के लिए समागत हो गया था ।१९। उसका वह ऐसा रथ था जिसमें अनेक भाँति के शस्त्र भरे हुए थे और विविध भाँति के रत्नों का परिच्छद था। उसका प्रमाण दशनल्व था और उसमें सौ अश्व लगे हुए थे ।२०। वह राजा भी अनेक आयुध धारी सहस्र बाहुओं से युक्त था। उसकी उस समय में ऐसी शोभा हो रही थी जैसे कोई पुण्यात्मा देह के अन्त समय में स्वर्गलोक को जा रहा होवे ।२१।
पुत्रास्तस्य महावीर्या शतं युद्धविशारदाः ।
सेनाः संव्यूह्य संतस्थुः संग्रामे पितुराज्ञया ॥२२
कार्त्तवीर्यस्तु बलवान्रामं दृष्ट्वा रणाजिरे ।
कालांतकयमप्रख्यं योद्धुं समुपचक्रमे ॥२३
३२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दक्षे पंचशतं बाणान्वामे पंचशतं धनुः । जग्राह भार्गवेंद्रस्य समरे जेतुमुद्यतः ॥२४ बाणवर्षं चकाराथ रामस्योपरि भूपते । यथा बलाहको वीर पर्वतोपरि वर्षति ॥२५ बाणवर्षेण तेनाजौ सत्कृतो भृगुनन्दनः । जग्राह स्वधनुर्दिव्यं बाणवर्षं तथाऽकरोत् ॥२६ तावुभौ रणसंहृप्तौ तदा भार्गवहहयौ । चक्रतुर्युद्धमतुलं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥२७ ब्रह्मास्त्रं च स भूपालः संदधे रणमूर्द्धनि । वधाय भार्गवेंद्रस्य सर्वशस्त्रास्त्रधृग्बली ॥२८
उस कार्त्तवीर्य के पुत्र भी सो थे जो महान वीर्य वाले थे और युद्ध करने की विद्या में महान पण्डित थे । वे भी सब अपने पिता की आज्ञा से सेनाओं का संग्रह करके संग्राम में समवस्थित हो गये थे ।२२। उस बलवान कार्त्तवीर्य ने रणभूमि में जब परशुराम को देखा था उसको उनका स्वरूप ऐसा प्रतीत होता था मानों वह कालान्तक यम ही होवें फिर भी वह युद्ध करने को प्रस्तुत हो गया था ।२३। भार्गव को युद्ध में जीतने के लिए उसके दाहिनी ओर पाँच सौ बाण थे और वामभाग में पाँच सौ धनुष थे ।२४। हे भूपते ! उस सहस्रार्जुन ने परशुराम के ऊपर बाणों का प्रक्षेप ऐसा किया था जैसे मेघ वृष्टि कर रहे होवें । जिस प्रकार बलाहक मेघ किसी पर्वत पर धुआंधार जल की वर्षा किया करते हैं ।२५। उसने बाणों की वर्षा के द्वारा ही उस रणभूमि में भृगुनन्दन का सत्कार किया था । उसने अपना दिव्य धनुष ग्रहण किया था । और उसी भाँति से बाणों की थी ।२६। वे दोनों ही कार्त्तवीर्य और भार्गव राम उस समय में रण करके के दर्प वाले थे और उन दोनों ने अनुपम युद्ध किया था जो बड़ा ही तुमुल और रोम हर्षण था उस रण के प्राङ्गण में उस राजा ने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया था । वह राजा सभी शस्त्रों और अस्त्रों के धारण करने वाला और बलवान था जिसने के वध के ही लिए इस अस्त्र का प्रयोग किया था ।२८।
रामोऽपि वायुं पस्पृश्य ब्राह्मं ब्राह्माय संदधे । ततो व्योम्नि सदा सक्त द्वे चाप्यस्त्रे नराधिप ॥२६
परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३२१
ववृधाते जगत्प्रान्ते तेजसा ज्वलनार्कवत् ।
त्रयो लोकाः सपाताला दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥३०
ज्वलदस्त्रयुगं तप्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम् ।
रामस्तदा वीक्ष्य जगत्प्रणाशं जगन्निवासोक्त-
मथास्मरत्तदा ॥३१
रक्षा विधेयाऽद्य मयाऽस्य संयमो निवारणीयः
परमांशधारिणा ।
इति व्यवस्य प्रभुरुग्रतेजा नेत्रद्वयेनाथ तदस्त्रयुग्मम् ॥३२
पीत्वातिरामं जगदाकलय्य तस्थौ क्षणं ध्यानगतो महात्मा ।
ध्यानप्रभावेण ततस्तु तस्य ब्रह्मास्त्रयुग्मं विगतप्रभावम् ॥३३
पपात भूमौ सहसाऽथ यत्क्षणं सर्वं जगत्स्वास्थ्यमुपाजगाम ।
स जामदग्न्यो महतां महीयान्स्रष्टुं तथा
पालयितुं निहंतुम् ॥३४
विभुस्तथापीह निजं प्रभावं गोपायितुं लोकविधिं चकार ।
धनुर्द्धरः शूरतमो महस्वान्सदग्रणीः संसदि तथ्यवक्ता ॥३५
इधर परशुराम जी ने भी जल का उपस्पर्शन करके ब्रह्मास्त्र के निराकरण करने के लिए ब्रह्मास्त्र का ही सन्धान किया था । हे नराधिप ! उस समय में वे दोनों अस्त्र सदा ही अन्तरिक्ष में प्रसक्त हो गये थे ।२६। वे दोनों ही तेज से जाज्वल्यमान सूर्यों के समान जगत्प्रान्त में विशेष रूप से बढ़ रहे थे । उस समय में पाताल के सहित तीनों लोक इस महान अद्भुत अस्त्रों के पारस्परिक संघर्ष को देख रहे थे ।३०। वे दोनों ब्रह्मास्त्र जाज्वल्य-मान थे और सभी लोग उनके तेज से संतप्त हो रहे थे । उस समय में इसका उपसंयम सभी ने माना था । परशुराम ने भी तब सम्पूर्ण जगत का प्रकृष्ट नाश देखकर उसी समय में जगन्निवास के कथन का स्मरण किया था ।२१। आज मेरे द्वारा किसी भी रीति से सुरक्षा करनी चाहिए और इसका संयम करके निवारण करना ही चाहिए क्योंकि मैं तो परमांश का अर्थात् प्रभु के ही अंश का धारण करने वाला हूँ जिसकी यह सृष्टि है । यह निश्चय करके अतीव उग्र तेज वाले प्रभु ने अपने दोनों नेत्रों से उन दोनों
३२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नेत्रों से उन दोनों अस्त्रों का पान कर लिया था ।३२। जगत के कल्याण का विचार करके ही उनका पान किया और फिर महान आत्मा वाले उनने क्षण भर के लिए ध्यान में अवस्थित होकर चुपचाप वे खड़े रह गये थे । इसके उपरान्त उनके ध्यान के प्रबल प्रभाव से वे दोनों ही ब्रह्मास्त्र प्रभाव हीन हो गये थे ।३३। फिर इसके अनन्तर वह दोनों अस्त्रों का जोड़ा भूमि पर गिर गया था ।३४। वह परशुराम तो महान पुरुषों में भी परम महान थे और इस संसार के सृजन-पालन और निहंतन करने में पूर्ण समर्थ थे । ।३४। वे साक्षात् विभु थे तो भी अपने वास्तविक प्रभाव को छिपाने के ही लिए इस लौकिक विधान को किया करते थे जिससे लोग उनके असली स्वरूप को न पहिचान पावें । वह ऐसा ही सबकी दृष्टि में दर्शित किया करते थे कि वे बड़े धनुर्धारी-विशिष्टशूर-तेजस्वी-सभा में प्रमुख और संसद में तथ्य के बोलने वाले हैं ।३५।
कलाकलापेषु कृतप्रयत्नो विद्यासु शास्त्रेषु बुधो विधिज्ञः एवं नृलोके प्रथयन्स्वभावं सर्वाणि कल्यानि करोति नित्यम् ।।३६
सर्वे तु लोका विजितास्तु तेन रामेण राजन्यनिषूदनेन । एवं स शमः प्रथित प्रभावः प्रशामयित्वा तु तदस्त्रयुग्मम् ।।३७
पुनः प्रवृत्तो निधनं प्रकर्तुं रणांगणे हैहयवंशकेतोः । तूणीरतः पत्रियुगं गृहीत्वा पुंखे निधायाथ धनुर्ज्यकायाम् ।।३८
आलक्ष्य लक्ष्यं नृपकर्णयुग्मं चकर्त्तचूडामणिहर्तुकामः । स कृत्तकर्णो नृपतिर्महात्मा विनिर्जिताशेषजगत्प्रवीरः ।।३६
मेने निजं वीर्यमिह प्रणष्टं रामेण भूमीश तिरस्कृतात्मा । क्षणं धराधीशतनुर्विवर्णा गतानुभावा नृपतेर्बभूव ।।४०
लेख्येष सञ्चित्रकरप्रयुक्ता सुदीनचित्तस्य विलक्ष्यतेंऽग ।
ततः स राजा निजवीर्यवैभवं समस्तलोकाधिकतां प्रयातम् ।।४१
विचित्य पौलस्त्यजयादिलब्धं शोचन्निवासीत्स जयाभिकांक्षी । दध्यौ पुनर्मीलितलोचनो नृपो दत्तं तमात्रेयकुलप्रदीपम् ।।४२
परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३२३
जितनी भी कलायें हैं उन सबके ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने वाले हैं तथा समस्त विद्याओं में एवं शास्त्रों में बुध है और विधि के ज्ञाता हैं। इसी रीति से लोक में अपने प्रभाव एवं स्वभाव को दिखलाते हुए सभी कल्पों नित्य किया करते हैं। ३६। क्षत्रियों का निषूदन करने वाले परशुराम ने समस्त लोकों को जीत लिया है इस प्रकार से ही परशुराम प्रथित प्रभाव वाले थे। उन्होंने उसी समय में उन दोनों ब्रह्मास्त्रों को प्रशामित कर दिया था। ३७। फिर वे उस रण भूमि में हैहय वंश के केतु कार्त्तवीर्य का निधन करने के लिये युद्ध में प्रवृत्त हो गये थे। तूणीर से दो बाणों को लेकर धनुष की प्रत्यञ्चा को खींचकर उसमें बाणों को चढ़ाया था। ।३८। नृप की चूड़ामणि का हरण करने की कामना वाले रामने लक्ष्य पर निशाना लगाकर नृप के दोनों कानों को काट गिराया था। जिस कार्त्तवीर्य ने जगत् में समस्त महान् वीरों को पराजित कर लिया था वह महात्मा जब कटे हुए कानों वाला हो गया था तो अपने मन में भयभीत हो गया था तो अपने मन में भयभीत हो गया था। ३९। उस समय में यह मान लिया था कि हे भूमीश ! वह राम के द्वारा तिरस्कृत आत्मा वाला होगया है और अब उसका वीर्य-विक्रम सब नष्ट होगया है। हे नृपते ! एक ही क्षण में उनका शरीर विवर्ण होकर भूमि पर गिर गया था और उनके सभी अनुभाव विगत हो गये थे। ४०। उसके अनन्तर उस कार्त्तवीर्य राजाने देखा था कि समस्त लोकों में अधिकता को प्राप्त होने वाला अपने वीर्यविक्रम से सर्वथा गया हुआ है और उस दीनचित्त वाले का शरीर किसी अच्छे चित्रकार के द्वारा निर्मित चित्र के ही समान हो गया है। ४१। वह अपने विजय की आकाङ्क्षा वाला राजा यही चिन्तन करके कि मैंने पौलस्त्य रावण जैसे बलवान् पर भी विजय प्राप्त की थी अब मेरी क्या दशा हो रही है-यही सोच करता हुआ वह वहाँ पड़ा था। फिर उस राजा ने अपने दोनों नेत्र मूंद लिये थे और आत्रेय कुल के प्रदीप दत्तात्रेय का उसने ध्यान किया था। ४२।
यस्य प्रभावानुगृहीत ओजसा तिरश्चकारा-
खिलयोकपालकान् ।
यदास्य हृद्येष महानुभावो दत्तः प्रयातो न हि दर्शनं तदा ॥४३
खिन्नोऽतिमात्रं धरणीपतिस्तदा पुनः पुनर्ध्यानपथं जगाम ।
३२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स ध्यायमानोऽपि न चाजगाम दत्तो मनोगोचरमस्य राजन् ॥४४ तपस्विनो दांततमस्य साधोरनागसो दुष्कृतिकारिणो विभुः । एवं यदात्रे स्तनयो महात्मा दृष्टो न ध्यानपथे नृपेण ॥४५ तदाऽतिदुःखेन विदूयमानः शोकेन मोहेन युतो बभूव । तं शोकमग्नं नृपति महात्मा रामो जगादाखिलचित्तदर्शी ॥४६ मा शोकभावं नृपते प्रयाहि नैवानुशोचंति महानुभावाः । यस्ते वरायाभवमादिसर्गे स एव चाहं तव सादनाम ॥४७ समागतस्त्वं भव धीरचित्तः संग्रामकाले न विषादचर्चा । सर्वो हि लोकः स्वकृतं भुनक्ति शुभाशुभं दैतकृतं विपाके ॥४८ अन्यो न कोऽप्यस्य शुभाशुभस्य विपर्ययं कर्तुमलं नरेश । यत्तौ सुपुण्यं बहुजन्मसंचितं तेनेहं दत्तस्य वराहंपात्रम् ॥४६
जिस दत्तात्रेय के प्रभाव एवं अनुग्रह से मैंने इतना अधिक अनुपम ओज प्राप्त किया था कि उससे मैंने समस्त लोकपालों का भी तिरस्कार कर दिया था ओर वे भी मेरे सामने नहीं पड़ते थे। जिस समय में यह यह महापुरुष मेरे हृदय में विराजमान थे वे महानुभाव भी अब मेरे हृदय का त्याग करके प्रयाण कर गये हैं क्योंकि उस समय में उनके भी दर्शन नहीं हो रहे थे ।४३। वह राजा कात्र्तवीर्य बहुत ही अधिक खिन्न हो गया था और बार-बार ध्यान करता था। हे राजन् ! बहुत ही अच्छी तरह से ध्यान किये गये भी वे दत्तात्रेय इस राजा के मन में गोचर नहीं हुए थे ।४४। दत्तात्रेय मुनि उसके ध्यान में इसीलिए समागत नहीं हुए थे क्योंकि वे तो विभु थे और यह जानते थे कि यह परमाधिक दमन शील-तपस्वी-निरपराध साधु जमदग्नि के साथ भी इसने परम-दुष्कृत किया है। इसी कारण से राजा के द्वारा बार-बार ध्यान करने पर भी महान् आत्मा वाले अत्रि के पुत्र उसके ध्यान में नहीं आये थे और उस राजा को उनका दर्शन प्राप्त नहीं हुआ था ।४५। उस समय में यह कात्र्तवीर्य अत्यधिक दुःख से
परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३२५
विशेष परितप्त हो रहा था और शोक एवं मोह से भी युक्त हो गया था। जब वह इस रीति से राजा शोक में मग्न हो रहा था तो सबके चित्तों की गति के देखने वाले महात्मा राम ने उससे कहा था ॥४६॥ हे राजन् ! अब तुम इतने अधिक शोक को मत करो। जो महानुभाव होते हैं वे कभी भी ऐसा शोक नहीं किया करते हैं आदि सर्ग में जो तुझे वरदान देने के लिए हुआ था वही मैं अब तेरे सादन करने के लिए हुआ है ।४७। वही तू यहाँ पर समागत हुआ है। अब तुम चित्त में धैर्य धारण करो। यह तो संग्राम करने का समय है। इसमें विषाद करने की तो कोई चर्चा का अवसर ही नहीं आना चाहिए। तुम तो ज्ञानी हो यह भी भली भाँति समझते ही हो कि सभी प्राणी अपने किये हुए ही कर्मों का योग चाहे वह शुभ हो या अशुभ हो विपाक हो जाने पर दैव के द्वारा किये हुए का भोगा करते हैं। ।४८। हे नरेश ! इस शुभ और अशुभ का विपर्यय करने के लिये अन्य कोई भी सामर्थ्य नहीं रखता है। जो कुछ भी बहुत से जन्मों में किये गये पुण्य कर्मों का सञ्चय था उसी का यह प्रभाव था कि भगवान् दत्तात्रेय महा-मुनि का इस लोक में तुम वरदान के योग्य पात्र बन गये थे। तात्पर्य यही है कि सभी फलाफल किये हुए कर्मों के ही अनुसार हुआ करते हैं यह सभी कर्माधीन हैं जिस का विचार कोई भी नहीं किया करता है ॥४९॥
जातो भवानद्य तु दुष्कृतस्य फलं प्रभुंक्ष्व त्वमिहार्जितस्य।
गुरुविमत्यापकृतस्त्वया मे यतस्ततः
कर्णनिकृन्तनं ते ॥५०॥कृतं मया पश्य हरंतमोजसा चूडामणिं मामपहृत्य ते यशः।
इत्येवमुक्त्वा स भृगुर्महात्मा नियोज्य वाणं च
विकृष्य चापम् ॥५१॥चिक्षेप राज्ञः स तु लाघवेन च्छित्त्वा मणिं राममुपाजगाम।
तद्वीक्ष्य कर्मास्य मुनेः सुतस्य स चार्जुनो
हैहयवंशधर्त्ता ॥५२॥समुद्यतोऽभूत्पुनरप्युदायुधस्तं हंतुमाजो द्विजमात्मशत्रुम्।
शूलशक्तिगदाचक्रखड्गपट्टिशतोमरैः ॥५३॥
३२६ ] [ कालिका पुराण
नानाप्रहरणैश्चान्यैराजघान द्विजात्मजम् । स रामो लाघवेनैव संप्रक्षिप्तान्यनेन च ॥५४ शूलादीनि चकत्ताशु मध्य एव निजाशुगैः । स राजा वायुं पस्पृश्य ससर्जाग्नेयमुत्तमम् ॥५५ अस्त्रं रामो वारुणेन शमयामास सत्वरम् । गांधवं विदधे राजा वायव्येनाहनद्विभुम् ॥५६
आज आपको यह परम दुष्कृत का ही फल प्राप्त हुआ है। अब यहाँ पर जो भी पाप किया है उसका फल भोगिए क्योंकि यह दुष्कृत आपने ही जो अर्जित किया है फिर इसका फल भी आप ही को भोगना है। आपने मेरे गुरु जमदग्नि का अपमान करके बड़ा भारी अपकार किया है। यही कारण है कि आपके कानों का कृन्तन हुआ है ।५०। तुम्हारे यश का अप-हरण करके मैंने ओज से तुम्हारी चूड़ामणि का अपहरण किया है यह तुम देख लो। इतना कहकर उन महात्मा भृगु ने बाण चढ़ाकर धनुष की प्रत्यञ्चा को खींच लिया था ।५१। उन्होंने उस राजा के ऊपर उस बाण का प्रक्षेप किया था और बड़े ही लाघव से उस मणि का छेदन किया था जिससे कि वह मणि परशुराम के समीप में उपागत हो गयी थी। उस मुनि-कुमार के इस कर्म का अभिवीक्षण करके वह हैहय के वंश के धारण करने वाले सहस्रार्जुन युद्ध को तैयार हो गया था ।५२। वह कार्त्तवीर्य राजा आयुध ग्रहण करके युद्ध में उस द्विज सुत को जिसको वह अपना शत्रु सम-झता था मारने के लिये समुद्यत हो गया था। शूल-शक्ति-गदा-चक्र-खङ्ग-पट्टिट और तोमर तथा अन्यन्य नाना प्रकार के प्रहरणों से उस कार्त्तवीर्य द्विजवर के पुत्र परशुराम पर प्रकार किये थे किन्तु परशुराम ने उनके द्वारा जो भी अस्त्रों का प्रक्षेप किया गया था वे सब बहुत ही लाघव से उन सबको काट दिया था और जब तक वे अस्त्र लक्ष्य तक पहुँचने भी नहीं पाये थे तभी तक बीच में ही अपने बाणों के द्वारा उन सबको राम ने काटकर शीघ्र ही गिरा दिया था। उस राजा ने भी जल का उपस्पर्शन करके फिर अपने उत्तम आग्नेय अस्त्र को छोड़ दिया था ।५३-५५। रामने अपने वारुण अस्त्र के द्वारा शीघ्र ही उस आग्नेय अस्त्र का शमन कर दिया था। फिर राजा ने गान्धर्व अस्त्र को छोड़ा था और वायव्य अस्त्र से विभु परशुराम के ऊपर प्रहार किया था ।५६।
परशुराम द्वारा कार्तवीर्य वध ] [ ३२७
नागास्त्रं गारुडेनापि रामश्चिच्छेद भूपते ।
दत्तेन दत्तं यच्छूलमव्यर्थं मंत्रपूर्वकम् ॥५७
जग्राह समरे राजा भार्गवस्य वधाय च ।
तच्छूलं शतसूर्याभमनिवार्यं सुरासुरैः ॥५८
चिक्षेप राममुद्दिश्य समग्रेण बलेन सः ।
मूर्ध्नि तद्भार्गवेंद्रस्याथ निपपात महीपते ॥५९
तेन शूलप्रहारेण व्यथितो भार्गवस्तदा ।
मूर्च्छांमवाप राजेंद्र पपात च हरिं स्मरन् ॥६०
पतिते भार्गवे तत्र सर्वे देवा भयाकुलाः ।
समाजग्मुः पुरस्कृत्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥६१
शंकरस्तु महाज्ञानी साक्षान्मृत्युंजयः प्रभुः ।
भार्गवं जीवयामास संजीवन्या स विद्यया ॥६२
रामस्तु चेतनां प्राप्य ददर्श पुरतः सुरान् ।
प्रणनाम च राजेंद्र भक्त्या ब्रह्मादिकांस्तु तान् ॥६३
हे भूपते ! अपने गरुड़ अस्त्र के द्वारा उस नागास्त्र का छेदन कर दिया था । दत्तात्रेय महामुनि ने जो एक शूल इस कार्तवीर्य को प्रदान किया था वह अव्यर्थ था अर्थात् उस का प्रयोग कभी भी व्यर्थ एवं असफल नहीं हुआ करता था । इस का प्रयोग मन्त्रोच्चारण के ही साथ हुआ करता था ।५७। इस शूल का ग्रहण राजा कार्तवीर्य ने परशुराम जी के वध करने के लिए किया था । वह शूल बड़ा ही तेज से युक्त था-सैकड़ों सूर्यों की आभा के ही समान उसकी आभा थी और यह ऐसा था कि जिसका प्रयोग किसी प्रकार से भी निवारित नहीं किया जा सकता था और सुर तथा असुर कोई भी उसको विफल नहीं कर सकते थे ।५८। उस कार्तवीर्य ने अपने सम्पूर्ण बल के द्वारा परशुराम का उद्देश्य करके इसको फेंका था। हे महीपते ! वह शूल भार्गवेन्द्र के मस्तक पर गिरा था ।५६। उस शूल के प्रहार से उस समय में परशुराम बहुत व्यथित हो गये थे और हे राजेन्द्र ! उनको इसके प्रबल प्रहार से मूर्च्छा हो गयी थी । वे श्री हरि का स्मरण करते हुए भूमि पर गिर गये थे ।६०। वहाँ पर जिस समय में भृगु वंशोद्भूत परशु-राम भूमि पर गिर गये थे उस समय में समस्त देवगण महान् भय से
३२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समाकुल हो गये थे और वे सब ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर को अपने आगे करके वहाँ पर समागत हो गये थे ।६१। भगवान् शङ्कर तो महाज्ञानी थे और मृत्यु के ऊपर भी विजय प्राप्त करने वाले साक्षात् प्रभु थे । उन्होंने तुरन्त ही अपनी संजीवनी विद्या से भार्गव को जीवन प्रदान करके जीवित कर दिया था ।६२। परशुराम जी को जब चेतना प्राप्त हो गयी थी तो सम्हलकर खड़े हुए थे और उन्होंने अपने आगे सभी सुरगणों को देखा था । हे राजेन्द्र ! उन्होंने ब्रह्मा आदिक उन महान् देवों के चरणों में बड़े ही भक्ति के भाव से प्रणाम किया था ।६३।
ते स्तुता भार्गवेन्द्रेण सद्योऽदर्शनमागताः ।
स रामो वार्युपस्पृश्य जजाप कवचं तु तत् ॥६४
उत्थितश्च सुसंरब्धो निर्दहन्निव चक्षुषा ।
स्मृत्वा पाशुपतं चास्त्रं शिवदत्तं स भार्गवः ॥६५
सद्यः संहृतवांस्तत्तु कार्त्तवीर्यं महाबलम् ।
स राजा दत्तभक्तस्तु विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम् ।
प्रविष्टो भस्मसाज्जातं शरीरं बाहुनन्दन ॥६६
भार्गवेन्द्र के द्वारा उनकी स्तुति की गयी थी और फिर वे सभी सुर-गण तुरन्त ही अन्तर्हित हो गये थे । उन परशुराम प्रभु ने जल का आचमन करके उस समय में उस कवच का जप किया था ।६४। और भली भाँति संरब्ध होकर वे उठ खड़े हुए थे । उस समय में उनके नेत्रों में ऐसा अद्भुत तेज हो गया था जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे चक्षु से सब को दग्ध ही कर रहे होंवे । उन भार्गव ने भगवान् शिव के द्वारा कृपा करके प्रदान किये पाशुपत अस्त्र का स्मरण किया था ।६५। उस पाशुपत अस्त्र ने महान् बलवान् उस कार्त्तवीर्य को तुरन्त ही संहृत कर दिया था अर्थात् मार गिराया था । वह राजा दत्तात्रेय महामुनि का परम भक्त था और भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र में प्रविष्ट हो गया था और सहस्रों बाहुओं के द्वारा आनन्द करने वाले उसका शरीर भस्मसात् हो गया था ।६६।
—x—
भार्गव चरित्र वर्णन (१) ] [ ३२६
भार्गव चरित्र वर्णन (१)
वसिष्ठ उवाच—
दृष्ट्वा पितुर्वधं घोरं तत्पुत्रास्ते शतं त्वरा ।
वारयामासुरत्युग्रं भार्गवं स्वबलैः पृथक् ॥१
एकैकाक्षौहिणीयुक्ताः सर्वे ते युद्धदुर्मदाः ।
संग्रामं तुमुलं चक्रुः संरब्धास्तु पितुर्वधात् ॥२
रामस्तु दृष्ट्वा तत्पुत्राञ्छूरान्रणविशारदान् ।
परश्वधं समादाय युयुधे तैश्च संगरे ॥३
तां सेनां भगवान्रामः शताक्षौहिणिसंमिताम् ।
निजघान त्वरायुक्तो मुहूर्तद्वयमात्रतः ॥४
निःशेषितं स्वसैन्यं तु कुठारेणैव लीलया ।
दृष्ट्वा रामेण ते सर्वे युयुधुर्वीर्यसंमताः ॥५
नानाविधानि दिव्यानि प्रहरंतो महौजसः ।
परितो मंडलं चक्रुर्भागर्वस्य महात्मनः ॥६
अथ रामोऽपि बलवांस्तेषां मंडलमध्यगः ।
विरेजे भगवान्साक्षाद्यथा नाभिस्तु चक्रगा ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—उसके पुत्रों ने जब यह महान् घोर अपने पिता का वध देखा था तो उन सौ पुत्रों ने पृथक्-पृथक् अपने सैन्य बलों लेकर अतीव उग्र भार्गव का वारण किया था ।१। वे सभी युद्ध करने में अत्यन्त दुर्मद थे और सबके साथ एक-एक अक्षौहिणी सेना थी । अपने पिता के वध हो जाने से वे अत्यन्त ही क्रोध में भरे हुए थे और उन्होंने तुमुल संग्राम किया था ।२। परशुराम जी ने देखा था कि उसके सभी पुत्र बड़े शूरवीर हैं और रण करने में बहुत कुशल हैं तब उन्होंने अपना फर्शा उठा लिया था और उन सबके साथ युद्ध क्षेत्र में घोर युद्ध किया था ।३। भगवान् राम ने सौ अक्षौहिणियों से संयुत उस समग्र सेना को बड़ी ही त्वरा से युक्त होकर दो ही मुहूर्त्त के समय में विहनन करके मार गिराया था ।४। महान् वीर्य से संमत उन्होंने जब यह देखा था कि परशुराम ने अपने कुठार के
३३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्वारा खेल ही खेल में लीला से ही बिना कुछ अधिक आयास किये सम्पूर्ण अपनी सेना को मारकर समाप्त कर दिया है तो सबने बड़ा भारी घोर युद्ध किया था ।५। महान् आत्मा वाले भार्गव के चारों ओर विविध प्रकार के दिव्य अस्त्रों के द्वारा प्रहार करते हुए उन महान् ओज वालों ने सबने एक मण्डल सा बना लिया था अर्थात् सब ओर से घेर कर बीच में दे लिया था ।६। इसके अनन्तर महान् बलशाली परशुराम भी उन सबके मण्डल (घेरा) में मध्य में स्थित होकर वह साक्षात् भगवान् परम सुशोभित हुए थे जिस तरह से समस्त नाड़ियों के चक्र के मध्य में स्थित नाभि शोभा दिया करती है ।७।
नृत्यन्निवाजौ विरराज रामः शतं पुनस्ते परितो भ्रमंतः ।
रेजुश्च गोपीगणमध्यसंस्थः कृष्णो यथा ताः
परितो भ्रमंत्यः ॥८
तदा तु सर्वे द्रुहिणप्रधानाः समागताः स्वस्वविमानसंस्थाः ।
समाकिरन्नन्दनमाल्यवर्षैः समंततो राममहीनवीर्यम् ॥६
यः शस्त्रपादादुदतिष्ठत ध्वनिहुंकारगर्भो
दिवमस्पृशत्स वै ।
तीर्यंत्रिकस्येव शरक्षतानि भांतीव यद्वन्नखदंतपाताः ॥१०
क्रंदंति शस्त्रैः क्षतविक्षतांगा गायंति यद्वत्किल गीतविज्ञाः ।
एवं प्रवृत्तं नृपयुद्धमण्डलं पश्यंति देवा
भृशविस्मिताक्षाः ॥११
ततस्तु रामोऽवनिपालपुत्राञ्जिघांसुराजौ विविधास्त्रपूगैः ।
पृथक्चकारातिबलांस्तु मंडलाद्विच्छिद्य पंक्तिं
प्रभुरातचापः ॥१२
एकैकशस्तान्निजघान वीराञ्छतं तदा पंच
ततः पलायिताः ।
शूरो वृषास्यो वृषशूरसेनौ जयध्वजश्चापि
विभिन्नधैर्याः ॥१३
भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३१
महाभयेनाथ परीतचित्ता हिमाद्रिपादांतरकाननं च । पृथग्गतास्ते सुपरीप्सवो नृपा न कोऽपि कांस्विददृशे भृशार्त्तः ॥१४
उस संग्राम भूमि में परशुराम नृत्य करते हुए जैसे परमाधिक शोभा को प्राप्त हुए थे और एक सौ वे कार्त्तवीर्य के पुत्र फिरते हुए चारों ओर शोभित हो रहे थे। उस समय में उन सब की शोभा ऐसी ही रही थी जैसी नित्य विहार स्थल वृन्दावन की निकुञ्जों में व्रजाङ्गना गोपियों के समुदाय के मध्य में महारास के समय में भगवान् श्री कृष्ण विराजमान थे और उनके चारों ओर गोपाङ्गनाएँ परिभ्रमण कर रही थीं उनकी शोभा हो रही ।८। उस समय सब जिनमें द्रुहिण प्रमुख थे अपने-अपने विमानों पर समवस्थित होकर वहाँ पर समागत हो गये थे और उन अहीनवीर्य वाले परशुराम के ऊपर सब ओर से नन्दन वन के कमनीय कुसुमों की वर्षा कर रहे थे ।६। इस प्रकार जो शस्त्रों का पात उनके ऊपर हो रहा था तब वे परशुराम उस शरों की वृष्टि में उठकर खड़े हो गये थे और उनकी ध्वनि हुङ्कार करने वाली थी तब ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे स्वर्ग का ही स्पर्श कर रहे होवें। उनके शरों के क्षत ऐसे मालूम हो रहे थे जैसे नृत्यगीत करने वाले के दन्तों और नखों के पातों के ही चिन्ह दिखाई दे रहे हों ।१०। वे शस्त्रों से क्षत विक्षत अङ्गों वाले क्रन्दन कर रहे थे मानों कोई गीतों के गान में विज्ञ पुरुष गान कर रहे होंवे। इसी रीति से उन नृपों के साथ युद्ध का मण्डल प्रवृत्त हुआ था जिसको देवगण अत्यन्त विस्मित नेत्रों वाले होकर देख रहे थे ।११। इसके अनन्तर प्रभु राम ने धनुष ग्रहण करके विविध अस्त्रों के समुदाय से उन राजा के पुत्रों का रण में हनन करने की इच्छा वाला होकर यद्यपि वे अतीव बलवान् थे तो भी उनको उस मण्डल से विच्छिन्न करके पंक्ति से पृथक् कर दिया था ।१२। वे सौ वीर थे उनमें से एक-एक को पकड़कर उन्होंने मार डाला था। उस समय में केवल उनमें से पाँच ही बच गये थे जो वहाँ से भाग गये थे। उन पाँचों का धैर्य टूट गया था। उनके नाम शूर-वृषास्य-वृष-शूरसेन और जयध्वज ये थे ।१३। वे पाँचों नृप पृथक् होकर ही चले गये थे और वे सब नृप अपने प्राणों के बचाने की इच्छा वाले थे। उन में से अत्यन्त आर्त्त होकर किसी ने भी किन को भी वहाँ नहीं देखा था। तात्पर्य यह है कि सबको अपनी रक्षा की पड़ी थी और कोई भी किसी को न देख पाया था ।१४।
३३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
रामोऽपि हत्वा नृपचक्रमाजी राज्ञ. सहाय्यार्थमुपागतं च ।
समन्वितोऽसावकृतव्रणेन सस्नौ मुदाऽऽगत्य च
नर्मदायाम् ॥१५
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा संपूज्य वृषभध्वजम् ।
प्रतस्थे द्रष्टुमूर्वीशं शिवं कैलासवासिनम् ॥१६
गुरुपत्नीमुमां चापि सुतौ स्कन्दविनायकौ ।
मनोयायी महात्माऽसावकृतव्रणसंयुतः ॥१७
कृतकार्यो मुदा युक्तः कैलासं प्राप्य तत्क्षणम् ।
ददर्श तत्र नगरीं महतीमलकाभिधाम् ॥१८
नानामणिगणाकीर्णभवनैरुपशोभिताम् ।
नानारूपधरैर्यक्षैः शोभितां चित्रभूषणैः ॥१९
नानावृक्षसमाकीर्णैर्वनैश्चोपवनैर्युताम् ।
दीर्घिकाभिः सुदीर्घाभिस्तडागैश्चोपशोभिताम् ॥२०
सर्वतोऽप्यावृतां बाह्ये सीतयालकनंदया ।
तत्र देवांगनास्नानमुक्तकुंकुमपिंजरम् ॥२१
भगवान् परशुराम ने भी उस रण में उस सम्पूर्ण नृपों के चक्र का हनन कर दिया था तथा जो राजा की सहायता करने के लिये वहाँ उपागत हुआ था उसका भी हनन कर डाला था। फिर यह अकृतव्रण के साथ रहकर नर्मदा नदी के समीप में समागत हुए थे और उस नदी में इन्होंने स्नान किया था ।१५। वहाँ पर स्नान करके अपना दैनिक कृत्य समाप्त किया था तथा फिर भगवान् वृषभध्वज का भली भांति अर्चन किया था। इसके उपरान्त कैलाश के निवासी प्रभु शिव का दर्शन प्राप्त करने के लिये वहाँ से परशुराम जी ने प्रस्थान किया था ।१६। अपने मन के ही समान शीघ्र गमन करने वाले परशुराम जी अपने पालित अकृतव्रण शिष्य के साथ गुरु पत्नी जगदम्बा उमा देवी–और उनके दोनों पुत्र स्कन्द और विनायक के दर्शनार्थ वह महात्मा वहाँ पर गये थे ।१७। अपने सम्पूर्ण कार्यों में सफल होकर समस्त क्षत्रिय शत्रुओं को निहत करके बड़ी ही प्रसन्नता से युक्त होते हुए उसी क्षण में कैलास गिरि पर पहुँच गये थे और भगवान् शङ्कर की अलका
भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३३३
नाम वाली नगरी को देखा था जो नगरी बहुत ही विशाल थी ।१८। उस नगरी की छटा का वर्णन किया जाता है—उस नगरी में अनेक भवन ऐसे बने हुए थे जो नाना भाँति के रत्नों से संयुत थे, उन भवनों की शोभा से वह परम सुशोभित थी। उसमें बहुत से यक्ष विद्यमान थे जो विचित्र प्रकार के भूषणों के धारण करने वाले तथा विविध स्वरूपों वाले थे । इनसे भी उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ।१९। उस नगरी में बहुत तरह के वन और उपवन थे जिनमें अनेक प्रकार के वृक्ष थे। वह नगरी अनेक विशाल वापियों (बावड़ियों) से तथा तालाबों से भी परम सुशोभित थी ।२०। उस पुरी का बाहिरी सब ओर से सीता और अलकनन्दा नाम वाली सुन्दर सरिताओं से समावृत था । वहाँ पर देवों की अङ्गनाएँ स्नान कर रही थीं जिससे उनके अङ्गों में लगा हुआ कुंकुम छूटकर उनके जल में प्रवाहित हो रहा था ।२१।
तृषाविरहिताश्चांभः पिबन्ति करिणो मुदा । यत्र संगीतसंनादा श्रूयन्ते तत्र तत्र ह ।।२२ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं सहकारिभिः । तां दृष्ट्वा भार्गवो राजन्मुदा परमया युतः ।।२३ ययौ तदूर्ध्वं शिखरं यत्र शैवपरं गृहम् । ततो ददर्श राजेंद्र स्निग्धच्छायं महावटम् ।।२४ तस्याधस्ताद्धरावासं सुसेव्यं सिद्धसंयुतम् । ददर्श तत्र प्राकारं शतयोजनमंडलम् ।।२५ नानारत्नाचितं रम्यं चतुर्द्वारं गणावृतम् । नन्दीश्वरं महाकालं रक्ताक्षं विकटोदरम् ।।२६ पिंगलाक्षं विशालाक्षं विरूपाक्षं घटोदरम् । मंदारं भैरवं बाण रुरुं भैरवमेव च ।।२७ वीरकं वीरभद्रं च चंडं भृङ्गि रिटि मुखम् । सिद्धेंद्रनाथरुद्रांश्च विद्याधरमहोरगान् ।।२८
उन सरिताओं में तृषा से विरहित करी बड़े ही आनन्द से उनका जल पी रहे थे । वहाँ पर जहाँ-तहाँ संगीत की परम मधुर ध्वनियाँ सुनाई दे रही थी ।२२। वहाँ पर बहुत से गन्धर्व गण अप्सराओं को अपने साथ में
३३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
लिए हुए निरन्तर रंगरेलियां कर रहे थे। भार्गव श्री परशुराम जी ने जिस समय में उस परम सुन्दर पुरी का अवलोकन किया उनको अत्यन्त हर्ष हुआ था ।२३। इसके अनन्तर वे उसके ऊपर गये थे जिस शिखर पर भगवान् शिव का परम सुरम्य निवास करने का गृह था। हे राजेन्द्र ! वहाँ पर एक महान विशाल बहुत ही घनी छाया वाला वट का वृक्ष उन्होंने देखा था ।२४। उस वट वृक्ष के नीचे एक आवास गृह बना हुआ था जो भली भाँति सेवन करने के योग्य था और बड़े-बड़े महान् सिद्धगणों से समन्वित था। वहाँ पर उसका एक प्रकार (बहार दीवारी) उन्होंने देखा था जिसका मण्डल (घेरा) एक सौ योजन वाला था ।२५। उस नगर में अनेक प्रकार के रत्न खचित हो रहे थे तथा परम रम्य और चार प्रधान द्वारों से वह समन्वित था। वहाँ पर गण सब ओर थे। अब उन प्रधान गणों में नन्दीश्वर-महाकाल-रक्ताक्ष और विकटोदर थे ।२६। इनके अतिरिक्त पिंगलाक्ष-विरूपाक्ष-घटोदर-मन्दार-भैरव-बाण-रुरु-भैरव भी थे ।२७। उन गणों में वीरभद्र-चण्ड-रिटि-मुख भी थे। वहाँ पर सिद्धेन्द्र-नाथ और रुद्र थे तथा विद्याधर और महोरग भी विद्यमान थे ।२८।
भूतं तपिशाचांश्च कूष्मांडान्ब्रह्मराक्षसान् ।
वेतालान्दानवेंद्रांश्च योगीन्द्रांश्च जटाधरान् ॥२९
यक्षाँकिपुरुषांश्चैव डाकिनीयोगिनीस्तथा ।
दृष्ट्वा नंद्याज्ञया तत्र प्रविष्टोऽतर्मुदान्वितः ॥३०
ददर्श तत्र भुवनैरावृतं शिवमन्दिरम् ।
चतुर्योजनविस्तीर्णं तत्र प्राग्द्वारसंस्थितौ ॥३१
दृष्ट्वा वामे कार्त्तिकेयं दक्षे चैव विनायकम् ।
ननाम भार्गवस्तौ द्वौ शिवतुल्यपराक्रमौ ॥३२
पार्षदप्रवरास्तत्र क्षेत्रपालाश्च संस्थिताः ।
रत्नसिंहासनस्थाश्च रत्नभूषणभूषिताः ॥३३
भार्गवं प्रविशन्तं तु ह्यपृच्छञ्छिवमन्दिरम् ।
विनायको महाराज क्षणं तिष्ठेत्युवाच ह ॥३४
निद्रितो ह्युमया युक्तो महादेवोऽधुनेति च ।
ईश्वराज्ञां गृहीत्वाहंमत्रागत्य क्षणांतरे ॥३५
भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३५
वहाँ पर इन उपर्युक्त गणों के अतिरिक्त बहुत से भूत-प्रेत-पिशाच कूष्मांड-ब्रह्मराक्षस-वेताल-दानवेन्द्र और जटाजूट धारी बड़े-बड़े योगीन्द्र भी थे ।२६। वहाँ उस शिव की नगरी में यक्ष-किम्पुरुष-डाकिनी और योगिनियां भी थीं । इन सबका वहाँ पर परशुरामजी ने अवलोकन किया था । भगवान् शङ्कर के बांई ओर स्वामी कार्त्तिकेय और उनके दाँई ओर विघ्नेश्वर विनायक विराजमान थे। भार्गवेन्द्र ने उन दोनों को प्रणाम किया था क्योंकि ये दोनों शिव के पुत्र शङ्कर के ही समान पराक्रम वाले थे । इससे पूर्व परशुरामजी ने नन्दी की आज्ञा ग्रहण करके ही उस पुर के अन्दर प्रवेश किया था। अन्दर प्रवेश करने की आज्ञा पाकर उनको बहुत ही प्रसन्नता हुई थी। वहाँ पर भुवनों से सदावृत शिवजी के मन्दिर का अवलोकन किया था। यह मन्दिर चार योजन के विस्तार वाला था ।३०-३१-३२। वहाँ पर परम श्रेष्ठ पार्षद और क्षेत्रपाल भी समवस्थित थे ये लोग रत्न जटिल सिंहासनों पर रत्नों के विविध भूषणों से विभूषित होकर विराजमान थे ।३३। जिस समय में भार्गव शिव मन्दिर में प्रवेश कर रहे थे तब उन सबने इनसे पूछा था हे महाराज ! उस समय में विनायक ने उनसे यही कहा था कि एक क्षण मात्र आप यहीं पर ठहरिए ।३४। इस समय में महादेव जी अपनी प्रिय पत्नी जगदम्बा उमा के साथ शयन किये हुए हैं। मैं एक ही क्षण भर में ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके यहीं पर समागत होता हूँ ।३५।
त्वया सार्द्धं प्रवेक्ष्यामि भ्रातस्तिष्ठात्र सांप्रतम् ।
विनायकश्चैवं श्रुत्वा ह्यायश्चिटं भार्गवनंदनः ॥३६
प्रवक्तुमुपचक्राम गणेशं त्वरयान्वितः ।
राम उवाच-
गत्वा ह्यंतःपुरं भ्रातः प्रणम्य जगदीश्वरौ ॥३७
पार्वतीशंकरौ सद्यो यास्यामि निजमन्दिरम् ।
कार्त्तवीर्यः सुचन्द्रश्च सपुत्रबलबांधवः ॥३८
अन्ये सहस्रशो भूपाः कांबोजाः पह्लवाः शकाः ।
कान्यकुब्जाः कोशलेशा मायावन्तो महाबलाः ॥३९
निहताः समरे सर्वे मया शम्भुप्रसादतः ।
३३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमिमं प्रणिपत्यैव यास्यामि स्वगृहं प्रति ॥४० इत्युक्त्वा भार्गवस्तत्र तस्थौ गणपतेः पुरः । प्रोवाच मधुरं वाक्यं भार्गवे स गणाधिपः ॥४१ विनायक उवाच - क्षणं तिष्ठ महाभाग दर्शनं ते भविष्यति । अद्य विश्वेश्वरो भ्रातर्भवान्या सह वर्त्तते ॥४२
मैं फिर हे भाई ! आपको साथ ही लेकर आपका प्रवेश वहाँ पर अभी करा दूँगा । अतएव यहाँ पर कुछ समय तक आप रुकिए । भार्गव नन्दन ने विनायक के इस वचन का श्रवण करके बड़ी ही शीघ्रता से युक्त होकर श्री गणेशजी से कुछ कथन करने का उपक्रम किया था । राम ने कहा— हे भाई ! आप अन्तः पुर में जाकर उन दोनों जगदीश्वरों को प्रणाम करिए अर्थात् मेरा प्रणिपात निवेदित कर दीजिए । पार्वती और शङ्कर इन दोनों को प्रणाम करके मैं तुरन्त ही अपने मन्दिर को गमन करूँगा । कार्त्तवीर्य और सुचन्द्र जो अपने पुत्रों-सैनिकों और बान्धवों के सहित थे एवं अन्य भी सहस्रों नृप जो कि काम्बोज-पहलव शक-कान्यकुब्ज-कोशले-श्वर थे जो कि बड़ी ही अधिक माया वाले और महान् बलवान् थे ।३६-३७-३८-३९। मैंने भगवान् शम्भु की ही कृपा से तथा परिपूर्ण प्रसाद से युद्ध में सबका निहनन किया है । अतएव अब मैं उन्हीं प्रभु के चरणों में प्रणाम करके फिर अपने घर को चला जाऊँगा ।४०। इतना निवेदन करके परशुराम वहाँ पर गणपति के आगे स्थित हो गये थे । फिर उन गणाधिप प्रभु ने भार्गव से बहुत मधुर स्वर में कहा था ।४१। विनायक ने कहा— हे महाभाग ! एक मात्र आप यहाँ पर ठहरिए आपको भगवान् शङ्कर का दर्शन हो जायगा । हे भाई ! आज वे विश्वेश्वर प्रभु भवानी के साथ में विद्यमान हैं ।४२।
स्त्रीपुंसोर्युक्तयोस्तात सहैकासनसंस्थयोः । करोति सुखभंगं यो नरकं स व्रजेद्ध्रुवम् ॥४३ विशेषतस्तु पितरं गुरुं वा भूपतिं द्विज । रहस्यं समुपासीनं न पश्येदिति निश्चयः ॥४४ कामतोऽकामतो वापि पश्येद्यः सुरतोन्मुखम् ।
भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३७
स्त्रीविच्छेदो भवेत्तस्य ध्रुवं सप्तसु जन्मसु ॥४५॥ श्रोणि वक्षःस्थलं वक्त्रं यः पश्यति परस्त्रियः । मातुर्वापि भगिन्या वा दुहितुः स नराधमः ॥४६॥ भार्गव उवाच- अहो श्रुतमपूर्वं किं वचनं तव वक्त्रतः । भ्रान्त्या विनिर्गतं वापि हास्यार्थमथवोदितम् ॥४७॥ कामिनां सविकाराणामेतच्छास्त्रनिदर्शनम् । निर्विकारस्य च शिशोर्न दोषः कश्चिदेव हि ॥४८॥ यास्याम्यंतः पुरं भ्रातस्तव किं तिष्ठ बालक । यथादृष्टं करिष्यामि तत्र यत्समयोचितम् ॥४९॥
हे तात ! पति और पत्नी जब एक ही आसन पर संस्थित होकर संयुक्त होवें और साथ में निरत होवें उस समय में जो कोई भी सुरत-सुख का भङ्ग किया करता है वह निश्चय ही नरक में गमन किया करता है ।४३। यह तो सर्व साधारण के लिए नियम है और विशेष रूप से हे द्विज ! जो कोई अपने पिता-गुरु अथवा भूपति को जबकि वे रहस्य में समुपसीन हों तो इनको कभी भी बाधा डालते हुए नहीं देखना चाहिए-यह निश्चित सिद्धान्त की बात है ।४४। चाहे इच्छा से या बिना ही इच्छा के कहीं पर भी सुरत क्रीड़ा में उन्मुख पति-पत्नी को जो कोई देखता है अर्थात् देखा करता है उसकी स्त्री का विच्छेद सात जन्मों तक हो जाया करता है यह परम निश्चित है ।४५। जो पराई स्त्री के श्रोणि-वक्षः स्थल और मुख को देखता है तात्पर्य यह है कि बुरी दृष्टि से देखा करता है वह चाहे अपनी माता हो-भगिनी हो या दुहिता हो इनमें कोई भी हो तो वह नरों में बड़ा ही अधम होता है ।४६। भार्गव ने कहा-आज मैंने आपके मुख से निकले हुए अपूर्व ही वचन सुने हैं । ये वचन भ्रान्ति से ही निकल गये हैं अथवा आपने हास्य के ही लिये कहे हैं ? ।४७। यह तो सब विकारों से युक्त कामियों के शास्त्र का निदर्शन है अर्थात् कामवासना से वासित अन्तःकरण वाले ही ऐसे विषय की चर्चा किया करते हैं। आप तो विकारों से रहित हैं और शिशु हैं क्या आपको ऐसा कथन करने से कोई दोष नहीं होता है ? ।४८। हे भाई ! मैं तो अन्तः पुर में जाऊँगा । आप तो बालक हैं, आपको इस बात से क्या