संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०१
सिद्धियों के प्रदान करने वाला है ।४। वैषुवायन कालों में और पुण्य समयों में यह सिद्धि के देने वाला— सब पापों का विनाशक और पञ्च पर्वों में कीर्त्ति का दाता है ।५। उस समय में रण में अपने सहोदरों को मरे हुए सुनकर भंड महान् शोक से समाविष्ट हो गया था और उस भंडासुर ने बड़ा भारी विलाप किया था ।६। विकीर्ण केशों वाला वह मूच्छित होकर भूमि पर गिर गया था और भाइयों के दुःख से कशित होकर कुछ भी आश्वासन उसने प्राप्त नहीं किया था ।७।
पुनः पुनः प्रलपन्कुटिलाक्षेण भूरिशः । आश्वास्यमानः शोकेन युक्तः कोपमवाप सः ॥८ फालं वहन्नतिक्रूरं भ्रमद्भ्रुकुटिभीषणम् । अंगारपाटलाक्षश्च निःश्वसन्कृष्णसर्पवत् ॥९ उवाच कुटिलाक्षं द्राक्समस्तपृतनापतिम् । क्षिप्रं मुहुर्मुहुः स्पृष्ट्वा धुन्वानः करवालिकाम् ॥१० क्रोधहुंकारमातन्वन्गर्जन्नुत्पातमेघवत् ॥११ ययैव दृष्ट्या मायाबलाद्युद्धे विनाशिताः । भ्रातरो मम पुत्राश्च सेनानाथाः सहस्रशः ॥१२ तस्याः स्त्रियाः प्रमत्तायाः कण्ठोत्थैः शोणितद्रवैः । भ्रातृपुत्रमहाशोकवह्निं निर्वापयाम्यहम् ॥१३ गच्छ रे कुटिलाक्ष त्वं सज्जीकुरु पताकिनीम् । इत्युक्त्वा कठिनं वर्म वज्रपातसहं महत् ॥१४
वह बार-बार प्रलविलाप कर रहा था तब कुटिलाक्ष ने उसको आश्वासन दिया था । जब बहुत कुछ समझाया तो शोक से युक्त उसने क्रोध किया था ।८। उसने अत्यन्त क्रूर फाल को ग्रहण किया था और अपनी भ्रुकुटियों को तिरछी करके बहुत ही भीषण हो गया था । उसकी आँखें अङ्गारों के समान रक्त हो गयी थीं और वह काले सर्प की तरह फुङ्कारें मार रहा था ।९। फिर सब सेनाओं के स्वामी कुटिलाक्ष से शीघ्र ही बोला था और बार-बार खड्ग को छूकर उसे घुमाता जा रहा था ।१०। वह क्रोध से हुङ्कार कर रहा था और उत्पात के समय में होने वाले मेघों के समान
४०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गर्ज रहा था। १२। जिस दुष्टा ने माया के बल से युद्ध में मेरे भाइयों और पुत्रों को मार दिया है और सहस्रों सेनापतियों का विनाश कर दिया है उसी स्त्री के जब वह युद्ध में प्रवृत्त होगी तो उसके कण्ठ से निकले हुए रुधिर से भाई और पुत्रों के शोक की अग्नि को मैं शान्त करूँगा। १२-१३। रे कुटिलाक्ष ! चले जाओ और सेना को तैयार करो। इतना ही कहकर उसने वज्रपात को भी सहन करने वाले कठिन कवच को धारण किया था। १४।
दधानो भुजमध्येन बध्नन्पृष्ठे तथेषुधी ।
उद्दाममौर्वनिः श्वासकठोरं भ्रामयन्धनुः ॥१५
कालाग्निरिव संक्रुद्धो निर्जगाम निजात्पुरात् ।
तालजंघादिकैः सार्द्धं पूर्वद्वारे निवेशिते ॥१६
चतुर्भिर्धृतशस्त्रौघैर्धृतवर्माभिरुद्धतैः ।
पञ्चत्रिंशच्चमूनाथैः कुटिलाक्षपुरः सरैः ॥१७
सर्वसेनापतीन्द्रेण कुटिलाक्षेण स क्रुधा ।
मिलितेन च भण्डेन चत्वारिंशच्चमूवराः ॥१८
दीप्तायुधा दीप्तकेशा निर्जग्मुर्दीप्तकंकटाः ।
द्विसहस्राक्षौहिणीनां पञ्चाशीतिः पराधिका ॥१९
तदेनमन्वगादेकहेलया मथितुं द्विषः ।
भण्डासुरे विनिर्याते सर्वसैनिकसंकुले ॥२०
शून्यके नगरे तत्र स्त्रीमात्रमवशेषितम् ।
आभिलो नाम दैत्येन्द्रो रथवर्ये महारथः ।
सहस्रयुग्यसिंहाढ्यमारुरोह रणोद्धतः ॥२१
वर्म को भुजाओं के मध्यभाग से धारण करके उसने पृष्ठ में तूणीर कहा था। उद्दाम मौर्वी के निःश्वास से कठोर धनुष को घुमाते हुए कालाग्नि के समान से क्रुद्ध होकर वह अपने नगर से निकलकर चल दिया था और तालजंघादिक उसके साथ थे तथा पूर्व द्वार पर सुरक्षा के लिए भी सेनाओं को निवेशित किया था। १५-१६। चार शस्त्रों के समूहों को धारण करने वाले—कवचों को पहिन हुए और उद्धत वीर वहाँ पर थे। पैंतीस सेना-
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०३
पतियों के सहित जिनमें कुटिलाक्ष भी आगे थे वह चला था ।१७। सब सेना- पतियों का स्वामी कुटिलाक्ष के साथ वह क्रोध से युक्त हुआ था भंड को भी मिलाकर चालीस चमूवर थे ।१८। इनके आयुध परम दीप्त थे और इनके केश भी दीप्त थी ऐसे दीप्त कंकट वाले निकल गये थे दो सहस्र अक्षौहिणी सेना थी और पराधिक पिशाची थीं ।१९। शत्रु का मंथन करने को एक ही साथ उसके पीछे गये थे । भंडासुर के निकल कर जाने पर जो सभी सेनाओं से संकुल थी ।२०। उस शून्यक नगर में केवल स्त्रियाँ ही रह गयी थीं । आभिल नामक दैत्येन्द्र जो रथवर्य और महारथी था एक सहस्र युज्य सिंहों से युक्त रथ पर रणोद्धत होकर सवार हुआ था ।२१।
सत्वरे विज्ज्वलज्वालाकालाग्निरिव दीप्तिमान् । घातको नाम वै खड्गश्चन्द्रहाससमाकृतिः ॥२२ इतस्ततश्चलंतीनां सेनानां धूलिरुत्थिता । वोढुं तासां भरं भूमिरक्षमेव दिवं ययौ ॥२३ केचिद्भूमेरपर्याप्तां प्रलेलुर्व्योमवर्त्मना । केषांचित्स्कन्धमारूढाः केचिच्चेलुर्महारथाः ॥२४ न दिक्षु न च भूचक्रे न व्योमनि च ते ममुः । दुःखदुखेन ते चेलुरन्योन्याश्लेषपीडिताः ॥२५ अत्यन्त सेनासंमर्दाद्रथचक्रैर्विचूर्णिताः । केचित्पादेन नागानां मर्दिता न्यपतन्भुवि ॥२६ इत्थं प्रचलिता तेन समं सर्वैश्च सैनिकैः । वज्रनिष्पेषसदृशो मेघनादो व्यधीयत ॥२७ तेनातीव कठोरेण सिंहनादेन भूयसा । भंडदैत्यमुखोत्थेन विदीर्णमभवज्जगत् ॥२८
वह जलती हुई ज्वाला वाले कालाग्नि के तुल्य ही दीप्ति वाला था । उसके खड्ग का नाम घातक था जो चन्द्रहास खड्ग के ही समान आकृति वाला था ।२२। इधर-उधर चलने वाली सेनाओं से धूलि उड़कर ऊपर उठ गयी थी । मानों भूमि उन सेनाओं के भार को सम्हालने में असमर्थ होकर ही आकाश में जा रही थी ।२३। उनमें कुछ तो भूमि पर स्थान न पाकर
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व्योम के ही मार्ग से चल दिये थे। कुछ महारथी कुछ लोगों के स्कन्ध पर समारूढ़ होकर चले थे। २४। जब उस भंडासुर की सेनाएँ चली थीं तो कहीं पर भी स्थान नहीं रहा था। एक दूसरे से रगड़ खाकर पीड़ित से होते हुए जा रहे थे। न तो दिशाओं में न भूमि में ओर न नभ में वे समाये थे। बड़े ही दुःख से चल रहे थे। २५। अत्यन्त सेना के संमर्द से और रथों के पहियों से चूर्ण होते हुए जा रहे थे। कुछ हाथियों के पैरों से मर्दित होकर भूमि पर गिर गये थे। २६। इस रीति से उसके साथ सभी सैनिक गमन कर रहे थे और वज्रपात के समान उनने सिंहनाद किया था। उस प्रबल और बड़े भारी सिंहनाद से एवं कठोर से जो भंड के मुख से किया गया था सम्पूर्ण जगत विदीर्ण हो गया था। २७-२८।
सागराः शोषमापन्नाश्चन्द्राकौँ प्रपलायितौ ।
उडूनि न्यपतन्व्योंम्नो भूमिर्दोलायिताभवत् ॥२९
दिङ्नागाश्चाभवंस्त्रस्ता मूर्च्छिताश्च दिवौकसः ।
शक्तीनां कटकं चासीदकांडत्रासविह्वलम् ॥३०
प्राणान्संधारयामासुः कथंचिन्मध्य आहवे ।
शक्तयो भयविभ्रश्यान्यायुधानि पुनर्दधुः ॥३१
वह्निप्राकारवलयं प्रशांतं पुनरुत्थितम् ।
दैत्येन्द्रसिंहनादेन चमूनाथधनुः स्वनैः ॥३२
क्रन्दनैश्चापि योद्धॄणामभूच्छब्दमयं जगत् ।
तेन नादेन महता भंडदैत्यविनिर्गमम् ।
निश्चित्य ललिता देवी स्वयं योद्धुं प्रचक्रमे ॥३३
अशक्यमन्यशक्तीनामाकलय्य महाहवम् ।
भंडदैत्येन दुष्टेन स्वयमुद्योगमास्थिता ॥३४
चक्रराजरथस्तस्याः प्रचचाल महोदयः ।
चतुर्वेदमहाचक्रपुरुषार्थमहाभयः ॥३५
समस्त सागर सूख गये थे। चन्द्र और सूर्य भी भाग गये थे। तारागण आकाश से गिर रहे थे और समस्त पृथ्वी काँप रही थी। २९। दिक्पाल भयभीत हो गये थे और देवगण मूच्छित हो गये थे उस समय में शक्तियों
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की सेना अकाण्डत्रास से विह्वल हो गयी थीं।३०। उस युद्ध में मध्य में किसी प्रकार से प्राणों को धारण किया था। शक्तियों ने भय से विश्रष्ट आयुधों को पुनः धारण किया था।३१। वह्नि प्राकार वलय प्रशान्त फिर उत्थित हो गया था। उस दैत्येन्द्र के सिंहनाद से और सेना यतियों के धनुषों को टङ्कारों से तथा योद्धाओं के कृन्दनों से समस्त जगत ही शाकायमान हो गया था। उस महान् नाद से भण्डासुर के समागमन का निश्चय करके ललिता देवी ने स्वयं ही युद्ध करने की इच्छा की थी।३२-३३। यह महान संग्राम शक्तियों के द्वारा नहीं किया जा सकता है ऐसा विचार करके दुष्ट भण्ड दैत्य के साथ स्वयं ही युद्ध करने के लिए उद्योग में समास्थित हुई थीं।३४। उसका चक्रराज रथ जो महान हृदय वाला था वहाँ से चल दिया था। चारों वेद उसके चक्र थे और पुरुषार्थ महान भय वाला था।३५।
आनन्दध्वजसंयुक्तो नवभिः पर्वभिर्युतः।
नवपर्वस्थदेवीभिराकृष्टगुरुधन्विभिः ॥३६॥
परार्द्धाधिकसंख्यातपरिवारसमृद्धिभिः ।
पर्वस्थानेषु सर्वेषु पालितः सर्वतो दिशम् ॥३७॥
दशयोजनमुन्नद्धश्चतुर्योजनविस्तृतः ।
महाराजीचक्रराजो रथेंद्रः प्रचलन्नभौ ॥३८॥
तस्मिन्प्रचलिते जुष्टे श्यामया दंडनाथया ।
गेयचक्रं तु बालाग्रे किरिचक्रं तु पृष्ठतः ॥३९॥
अन्यासामपि शक्तीनां वाहनानि परार्द्धशः ।
न सिंहोष्ट्रनरव्यालमृगपक्षियास्तथा ॥४०॥
गजभेरुण्डशरभव्याघ्रवातमृगास्तथा ।
एतादृशश्च तिर्यंचोऽप्यन्ये वाहनतां गताः ॥४१॥
मुहुरुच्चावचाः शक्तीर्भांडासुरवधोद्यताः ।
योजनायामविस्तारमपि तद्वारमंडलम् ।
वह्निप्राकारचक्रस्य न पर्याप्तं चमूपतेः ॥४२॥
वह रथ आनन्द की ध्वजा से युक्त था और उसमें नौ पर्व थे। नौ पर्वों पर देवियाँ स्थित थीं जिन्होंने बड़े-बड़े धनुषों को चढ़ा रक्खा था।३६।
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परार्ध से अधिक संख्या वाले परिवारों की समृद्धियों से समस्त पर्व स्थानों में सब दिशाओं में उसकी सुरक्षा भी थी ।३७। वह रथ दश योजन ऊँचा और चार योजन चौड़ा था। ऐसा वह महाराज्ञी का चक्रराज रथेन्द्र गमन करता हुआ शोभित हुआ था ।३८। श्यामा और दण्डनाथा के द्वारा सेवित वह रथ रवाना हुआ था। उस बाला के आगे गेय चक्र था ।३६। अन्य शक्तियों के भी वाहन परार्द्ध के नृसिंह—उष्ट्र—नर—व्याल—मृग—पक्षी और हय थे ।४०। हाथी—भेरूण्ड—व्याघ्र—वात—मृग ऐसे और तिर्यक योनि वाले भी उनके वाहन थे ।४१। बार-बार उच्चावच शक्तियाँ भंडासुर के वध करने के लिए उद्यत हुई थीं। उसका द्वारमंडल भी योजन आयाम विस्तार वाला था जो वह्निप्राकार चक्र के सेनापति को पर्याप्त नहीं था। ।४२।
ज्वालामालिनिका नित्या द्वारस्यात्यंतविस्तुतिम् ।
विततान समस्तानां सैन्यानां निर्गमैषिणी ॥४३॥
अथ सा जगतां माता महाराज्ञी महोदया ।
निर्जगामाग्निपुरतो वरद्वारात्प्रतापिनी ॥४४॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पतिताः पुष्पवृष्टयः ।
महामुक्तातपत्रं तद्दिवि दीप्तमदृश्यत ॥४५॥
निमित्तानि प्रसन्नानि शंसकानि जयश्रियाः ।
अभवंल्ललितासैन्ये उत्पातास्तु द्विषां बले ॥४६॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं सेनयोरुभयोरपि ।
प्रसर्पद्विशिखैः स्तोमबद्धान्धतमसच्छटम् ॥४७॥
हन्यमानगजस्तोमसृतशोणितबिंदुभिः ।
ह्रीयमाणशिरश्छन्नदैत्यश्वेतातपत्रकम् ॥४८॥
न दिशो न नभो नापो न भूमिर्न च किंचन ।
दृश्यते केवलं दृष्टं रजोमात्रं च मूर्च्छितम् ॥४९॥
ज्वाला मालिनिका नित्या ने द्वारकी अत्यन्त विस्तुति को विस्तृत किया था। यह समस्त सेनाओं की निर्गम की चाहने वाली थी ।४३। इसके उपरान्त जगतों की माता महोदया महाराज्ञी प्रतापिनी वरद्वार से अग्निपुर
४०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस नदी में थे । चक्र से कटे हुए करियों के समुदाय ही उसमें कूर्मों की परम्परा थीं ।५१। शक्तियों के द्वारा ध्वस्त महान् दैत्यों के गलगण्ड ही उस नदी में शिलोच्चय थे । जिनके काण्ड विलून होगये हैं ऐस चमर जो उसमें थे वे ही फेन थे ।५२। तीक्ष्ण जो असियां थीं वे ही बल्लरी थीं जिनके कारण उस नदी की तटभूमि निविड़ हो रही थी । दैत्यों के नेत्रों के श्रेणियाँ ही मुक्ति सम्पुट थे जिससे वह नदी भासुर थी ।५३। दैत्य वाहनों के समुदाय ही उस शोणित की नदी में सैकड़ों नक्र और मछलियाँ थीं जिनसे वह घिरी हुई थी । दोनों सेनाओं का युद्ध होने पर वहाँ रुधिर की नदी प्रवाहित हो रही थी ।५४। इसके अनन्तर श्री ललिता देवी और भण्ड का युद्ध हुआ था । उसमें अस्त्रों और प्रत्यस्त्र का ऐसा संक्षोभ हुआ था कि समस्त दिशायें तुमुलि कृत हो गयीं थीं ।५६।
धनुर्ज्यातलटंकारहुंकारैरतिभीषणः । तूणीरवदनात्कृष्टधनुर्वरविनिःसृतैः । विमुक्तैर्विशिखैर्भीमैराहवे प्राणहारिभिः ॥५७
हस्तलाघववेगेन न प्राज्ञायत किंचन । महाराज्ञीकरांभोजव्यापारं शरमोक्षणे । शृणु सर्वं प्रवक्ष्यामि कुम्भसंभव सङ्गरे ॥५८
संधाने त्वेकधा तस्य दशधा चापनिर्गमे । शतधा गगने दैत्यसैन्यप्राप्तौ सहस्रधा । दैत्यांगसंगे संप्राप्ताः कोटिसंख्याः शिलीमुखाः ॥५९
परांधकारं सृजती भिदती रोदसी शरैः । मर्माभिनत्प्रचंडस्य महाराज्ञी महेषुभिः ॥६०
वहत्कोपारुणं नेत्रं ततो भंडः स दानवः । ववर्ष शरजालेन महता ललितेश्वरीम् ॥६१
अन्धतामिस्रकं नाम महास्त्रं प्रमुमोच सः । महातरणिबाणेन तन्नुनोद महेश्वरी ॥६२
पाखंडास्त्रं महावीरो भंडः प्रमुमुचे रणे । गायत्र्यस्त्रं तस्य नुत्त्यै ससर्ज जगदम्बिका ॥६३॥
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४०६
वह युद्ध धनुष की डोरी की टंकारों और हुङ्कारों से अत्यन्त भीषण हो गया था। तूणीर से निकालकर खींचे हुए धनुषों से छोड़े गये महान् भयंकर बाणों से जो युद्ध में प्राणों के हरण करने वाले थे वह रण बहुत ही भयानक था ।५७। शरों के छोड़ने में महाराज्ञी के कर कमलों का व्यापार हाथ की सफाई के वेग से कुछ भी नहीं जाना गया था । हे कुम्भ सम्भव ! संग्राम में जो हुआ था उस सबको मैं बतलाऊँगा—आप श्रवण कीजिए ।५८। वे बाण ऐसे थे कि सन्धान के समय में एक ही प्रकार का था—वही चाप से निकलने पर दश प्रकार का हो जाता था—गगन में सौ प्रकार का—दैत्यों की सेना में प्राप्त होने पर सहस्र प्रकार का होना था और दैत्यों के अङ्गों के संगम में सम्प्राप्त होकर करोड़ों प्रकार का हो जाता था ।५९। परान्धकार का सृजन करती हुई और रोदसी को शरों से भेदन करती हुई महाराज्ञी ने विशाल बाणों से प्रचण्ड के मर्मों का भेदन कर दिया था ।६०। भंड ने क्रोध से लाल नेत्रों को वहन करते हुए उस दैत्य ने बड़े भारी शरों के जालों की ललितेश्वरी के ऊपर वर्षा की थी ।६१। उसने अन्ध तामिस्र नाम वाले महास्त्र को छोड़ा था । महेश्वरी ने महातरणि बाण से उसको काट दिया था ।६२। महावीर भंड ने रण में पाखण्डास्त्र को छोड़ा था उसके निवारण के लिए जगदम्बा ने गायत्र्यस्त्र को छोड़ दिया था ।६३।
अन्धास्त्रमसृजद्भंडः शक्तिदृष्टिविनाशनम् ।
चाक्षुष्मतमहास्त्रेण शमयामास तत्प्रसः ॥६४॥
शक्तिनाशाभिधं भंडो मुमोचास्त्रं महारणे ।
विश्वावसोर्वास्त्रेण तस्य दर्पमपाकरोत् ॥६५॥
अन्तकास्त्रं ससर्जाच्चैः संक्रुद्धो भंडदानवः ।
महामृत्युञ्जयास्त्रेण नाशयामास तद्बलम् ॥६६॥
सर्वास्त्रस्मृतिनाशाख्यमस्त्रं भंडो व्यमुञ्चत ।
धारणास्त्रेण चक्रेशी तद्बलं समनाशयत् ॥६७॥
भयास्त्रमसृजद्भंडः शक्तीनां भीतिदायकम् ।
अभयंकरमैन्द्रास्त्रं मुमुचे जगदम्बिका ॥६८॥
महारोगास्त्रमसृजच्छक्तिसेनासु दानवः ।
राजयक्ष्मादयो रोगास्ततोऽभूवन्सहस्रशः ॥६९॥
४१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तन्निवारणसिद्ध्यर्थं ललिता परमेश्वरी ।
नामत्रयमहामन्त्रमहास्त्रं सा मुमोच ह ॥७०॥
भंड ने दृष्टि के विनाशक अन्धास्त्र का प्रहार किया था। देवी ने चाक्षुष्मन्महास्त्र के द्वारा उसका शमन कर दिया था ।६४। उस महाररण में भंड ने शक्ति नाशक नाम वाले अस्त्र को छोड़ा था उसका दर्प विश्वावसु अस्त्र के प्रयोग से दूर कर दिया था ।६५। भंड दानव ने अन्तकास्त्र को छोड़ा था और बहुत क्रोधित हुआ था। उसके बल को देवी ने महामृत्युञ्जयास्त्र से दूर कर दिया था ।६६। फिर भंड ने सब अस्त्रों की स्मृति के विनाश करने वाले अस्त्र को छोड़ा था, चक्रेशी ने धारणास्त्र के द्वारा उसका विनाश कर दिया था ।६७। शक्तियों को भय देने वाले भयास्त्र का प्रयोग भंड ने किया था और जगदम्बिका ने अभयंकर ऐन्द्रास्त्र को छोड़ दिया था ।६८। दानव ने शक्तिसेनाओं में महारोगास्त्र छोड़ दिया था जिससे राजयक्ष्मा आदि सहस्रों रोग होते थे । उसके निवारण की सिद्धि के लिए परमेश्वरी ललितादेवी ने नाम त्रय महामन्त्र महास्त्र का प्रयोग किया था । ।६६-७०।
अच्युतश्चाप्यनंतश्च गोविन्दस्तु शरोत्थिताः ।
हुंकारमात्रतो दग्ध्वा रोगांस्ताननयन्मुदम् ॥७१
नत्वा च तां महेशानीं तद्भक्तव्याधिमर्दनम् ।
विधातुं त्रिषु लोकेषु नियुक्ताः स्वपदं ययुः ॥७२
आयुर्नाशनमस्त्रं तु मुक्तवान्भंडदानवः ।
कालसंकर्षणीरूपमस्त्रं राज्ञी व्यमुञ्चत ॥७३
महासुरास्त्रमुद्दामं व्यसृजद्भंडदानवः ।
ततः सहस्रशो जाता महाकाया महाबलाः ॥७४
मधुश्च कैटभश्चैव महिषासुर एव च ।
धूम्रलोचनदैत्यश्च चंडमुण्डादयोऽसुराः ॥७५
चिक्षुभश्चामरश्चैव रक्तबीजोऽसुरस्तथा ।
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च कालकेया महाबलाः ॥७६
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४११
धूम्राभिधानाश्च परे तस्मादस्त्रात्समुत्थिताः । ते सर्वे दानवश्रेष्ठाः कठोरैः शस्त्रमण्डलैः ॥७७॥
उस महेशानी को नमस्कार करके उसके भक्तों ने व्याधि मर्दन को करने के लिए तीनों लोकों में नियुक्त अपने स्थान को चले गये थे । शरों से उत्थित अच्युत-अनन्तर और गोविन्द हुङ्कार मात्र से ही रोगों को दग्ध करके उनको प्रसन्न किया था ।७१-७२। इसके उपरान्त उस महान् भीषण युद्ध स्थल में पराक्रमी फिर भण्ड ने आयुर्नाशन अस्त्र छोड़ा था और राज्ञी ने काल संकर्षिणी रूप अस्त्र को प्रयुक्त किया था ।७३। भंड दानव ने उद्दाम महासुरास्त्र को छोड़ दिया था । उससे सहस्रों ही महाकाय और महाबली उत्पन्न हो गये थे । मधु-कैटभ- महिषासुर-धूम्रलोचन और चंड-मुंड प्रभृति असुर थे ।७४-७५। चिक्षुम-चामर-रक्तबीज-निशुम्भ और महान् बलवान कालकेय थे ।७६। दूसरे धूमाभिधान वाले उस अस्त्र से उत्थित हो गये थे । वे सभी श्रेष्ठ दानव कठोर शस्त्रों के मंडलों से प्रहार कर रहे थे ।७७।
शक्तीसेना मर्दयन्तो नर्दन्तश्च भयंकरम् । हाहेति क्रन्दमानाश्च शक्तयो दैत्यमर्दिताः ॥७८॥ ललितां शरणं प्राप्ताः पाहि पाहीति सत्वरम् । अथ देवी भृशं क्रुद्धा रुषाट्टहासमातनोत् ॥७९॥ ततः समुत्थिता काचिद्दुर्गा नाम यशस्विनी । समस्तदेवतेजोभिर्निर्मिता विश्वरूपिणी ॥८०॥ शूलं च शूलिना दत्तं चक्रं चक्रिसमर्पितम् । शंखं वरुणदत्तञ्च शक्तिं दत्तां हविर्भुजा ॥८१॥ चापमक्षयतूणीरौ मरुद्दत्तौ महामृधे । वज्रिदत्तं च कुलिशं चषकं धनदार्पितम् ॥८२॥ कालदण्डं महादण्डं पाशं पाशधरार्पितम् । ब्रह्मदत्तां कुण्डिकां च घण्टामैरावतार्पिताम् ॥८३॥ मृत्युदत्तौ खड्गखेटौ हारं जलधिनार्पितम् । विश्वकर्मप्रदत्तानि भूषणानि च बिभ्रती ॥८४॥
४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वे सब शक्ति सेना का मर्दन कर रहे थे और भयानक नर्दन कर रहे थे । हा-हा-कहकर क्रन्दन करती हुई शक्तियां दैत्यों से मर्दित हो रही थीं ॥७८॥ वे सभी शक्तियां ललिता देवी की शरण में शीघ्रता से प्राप्त हुई थीं और रक्षा करो-रक्षा करो ऐसा कह रही थीं । इसके पश्चात् वह देवी क्रोध से रुष्ट हो गई थी और उसने अट्टहास किया था ॥७९॥ फिर कोई दुर्गा नाम वाली उत्पन्न हुई थी जो बहुत यशस्विनी थी । यह विश्व रूपिणी सब देवों के तेजों से निर्मित हुई थी ।८०। उसको शूली ने शूल दिया था और विष्णु ने चक्र समर्पित किया था । वरुण ने शंख दिया था और अग्नि ने शक्ति दी थी ॥८१। उस युद्ध में मरुत् ने अक्षय चाप और तूणीर किया था । वज्री ने कुलिश दिया था और धनद ने नखरु दिया था । पाशधर ने काल-दंड-महादंड और पाश दिया था । ब्रह्मा ने कुण्डिका दी थी और ऐरावत ने घण्टा दिया था ॥८२।८३। मृत्यु ने खड्ग और खेट दिया था तथा जल विधि ने हार अर्पित किया था । विश्वकर्मा ने भूषण दिये थे जिनको वह धारण कर रही थी ।८४।
अङ्गैः सहस्रकिरणश्रेणिभासुररश्मिभिः ।
आयुधानि समस्तानि दीपयंति महोदयैः ॥८५
अन्यदत्तैरथान्यैश्च शोभमाना परिच्छदैः ।
सिंहवाहनमारुह्य युद्धं नारायणी व्यधात् ॥८६
तया ते महिषप्रख्या दानवा विनिपातिताः ।
चण्डिकासप्तशत्यां तु यथा कर्म पुराकरोत् ॥८७
तथैव समरं चक्रे महिषादिमदापहम् ।
तत्कृत्वा दुष्करं कर्म ललितां प्रणनाम सा ॥८८
मूकास्त्रमसृजद्दुष्टः शक्तिसेनासु दानवः ।
महावाग्वादिनी नाम ससर्जास्त्रं जगत्प्रसूः ॥८९
विद्यारूपस्य वेदस्य तस्करानसुराधमान् ।
ससर्ज तत्र समरे दुर्मदो भण्डदानवः ॥९०
दक्षहस्ताङ्गुष्ठनखान्महाराज्ञा तिरस्कृतः ।
अर्णवास्त्रं महावीरो भण्डदैत्यो रणेऽसृजत् ॥९१
भंडासुर वध वर्णन ] । ४१३
सहस्रों किरणों की श्रेणियां सेनापुर अङ्गों से सहस्रों आयुधों आयुधों को दीप्त कर रही थीं। अन्यों के द्वारा दिये हुए परिच्छदों से यह शोभमान थी और सिंह के वाहन पर आरूढ़ होकर उस नारायणी ने युद्ध किया था। उसने वे महिष मुख्य जो दानव थे वे सब मार गिराये थे। चण्डिका ने सप्तशती में पहिले जो कर्म किया था। ८५-८७। उसी भाँति से महिष प्रभृति के मद का अपहारक युद्ध किया था। उस महान दुष्कर कर्म को करके उसने ललिता देवी को प्रणाम किया था। ८८। उस दुष्ट दानव ने शक्तियों की सेना में मूकास्त्र छोड़ा था। उसके प्रतिकार के लिए जगदम्बाने महा वाग्वादिनी नामक अस्त्र का प्रयोग किया था। ८६। उस दुष्ट दानव ने तस्कर अधम असुरों के ऊपर विद्या रूप वेद का सृजन किया था । ६०। महाराज्ञी ने दाहिने हाथ के अँगूठे के नख से उसका तिरस्कार कर दिया था। भण्ड-दैत्य ने अणवास्त्र का रण में प्रयोग किया था । ६१।
तत्रोद्दामपयः पूरे शक्तिसैन्यं ममज्ज च । अथ श्रीललितादक्षहस्ततर्जनिकानखात् । आदिकूर्मः समुत्पन्नो योजनायतविस्तरः ॥६२ धृतास्तेन महाभोगखर्परेण प्रथीयसा । शक्तयो हर्षमापन्नाः सागरास्त्रभयं जहुः ॥६३ तत्सामुद्रं च भगवान्सकलं सलिलं पपौ । हैरण्याक्षं महास्त्रं तु विजहौ दुष्टदानवः ॥६४ तस्मात्सहस्रशो जाता हिरण्याक्षा गदायुधाः । तैर्हन्यमाने शक्तीनां सैन्ये सन्त्रासविह्वले । इतस्ततः प्रचलिते शिथिले रणकर्मणि ॥६५ अथ श्रीललितादक्षहस्तमध्याङ्गुलीनखात् । महावराहः समभूच्छ्वेतः कैलाससंनिभः ॥६६ तेन वज्रसमानेन पोत्रिणाभिविदारिताः । कोटिशस्ते हिरण्याक्षा मर्द्यमानाः क्षयं गताः ॥६७ अथ भण्ड स्तवतिक्रोधाद्भ्रुकुटीं विततान ह । तस्य भ्रुकुटितो जाता हिरण्याः कोटिसंख्यकाः ॥६८
४१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वहाँ पर उद्दाम पूर्ण जल के समुदाय में शक्ति सेना को डुबा दिया था इसके अनन्तर श्री ललिता के दाहिने हाथ की तर्जनी के नख से योजन पर्यन्त आयत विस्तार से युक्त आदि कूर्म समुत्पन्न हुआ था ।६२। उस महान प्रथीय़ान भोग खर्पर से धारण किया था । शक्तियां बहुत हर्षित हुई थीं और उन्होंने सागरास्त्र का भय त्याग दिया था ।६३। उस समुद्र जल को पूर्ण रूप से भगवान् कूर्म ने जल का पान कर लिया था । दुष्ट दानव ने हैरण्याक्ष महान् अस्त्र को छोड़ा था ।६४। उससे सहस्रों हिरण्याक्ष गदा लिये हुए थे । उनके द्वारा शक्तियों के हन्यमान होने पर शक्ति सेना में संत्रास से विह्वलता हो गयी और वे रण के कर्म से शिथिल होकर इधर-उधर चलने लग गयीं थीं।६५। इसके उपरान्त श्री ललितादेवी के दक्षिण हाथ की मध्यमा अंगुलि के नख से कैलास के समान श्वेत महान वराह उत्पन्न हुए थे ।६६। उसने वज्र के समान पोत्रि से करोड़ों हिरण्याक्ष विदीर्ण कर दिये थे और मर्दित होते हुए वे सब क्षीण हो गये थे ।६७। इसके पश्चात् भंडासुर ने महान क्रोध से भौंहें तान ली थीं । उसकी भृकुटी से करोड़ों हिरण्य समुत्पन्न हुए थे ।६८।
ज्वलदादित्यवद्दीप्ता दीपप्रहरणाश्च ते ।
अमर्द्यञ्छक्तिसैन्यं प्रह्लादं चाप्यमर्द्यन् ।।६६
यः प्रह्लादोऽस्ति शक्तीनां परमानन्दलक्षणः ।
स एव बालको भूत्वा हिरण्यपरिपीडितः ।।१००
ललितां शरणं प्राप्तस्तेन राज्ञी कृपामगात् ।
अथ शक्त्या नन्दरूपं प्रह्लादं परिरक्षितुम् ।।१०१
दक्षहस्तानामिकाग्रं धुनोति स्म महेश्वरी ।
तस्माद् धूतसटाजालः प्रज्वलल्लोचनत्रयः ।।१०२
सिंहास्यः पुरुषाकारः कंठस्याधो जनार्दनः ।
नखायुधः कालरुद्ररूपी घोराट्टहासवान् ।।१०३
सहस्रसंख्यदोर्दण्डो ललिताज्ञानुपालकः ।
हिरण्यकशिपुन्सर्वान्भंडभ्रुकुटिसंभवान् ।।१०४
क्षणाद्विदारयामास नखैः कुलिशकर्कशैः ।
अमुञ्चल्ललिता देवी प्रतिभंडमहासुरम् ।।१०५
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४१५
वे जलते हुए आदित्य के समान दीप्त थे और दीपों के प्रहरणों से उद्धत थे। उसने शक्तियों की सेना का मर्दन किया था और प्रह्लाद का भी मर्दन किया था ।९६। जो प्रह्लाद शक्तियों का था वह परमानन्द लक्षण वाला ही था। वह ही एक बालक होकर हिरण्याक्ष के द्वारा परिपीड़ित हुआ था ।१००। वह ललिता के शरण में प्राप्त हो गया था। राज्ञी ने उस पर कृपा की थी। इसके पश्चात् शक्तियों के आनन्द स्वरूप प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए ।१०१। ललिता देवी ने दाहिने हाथ की अनामिका को हिलाया था। उससे जटाओं के जाल को हिलाने वाले—तीन नेत्रों से युक्त जो जाज्वल्यमान थे—सिंह के मुख वाले—पुरुषाकार और कण्ठ के नीचे जनार्दन—कारुद्र के रूप वाले—नखों के आयुधों से संयुत घोर अट्टहास वाले उत्पन्न हुए थे ।१०२-१०३। उनकी भुजाएँ सहस्रों की संख्या में थीं और वे ललिता की आज्ञा के पालक थे। जो भण्ड की भौंहों से समुत्पन्न हिरण्यकशिपु थे ।१०४। उन सबको क्षणभर में कुलिश के समान कर्कश नखों से विदीर्ण कर दिया था। फिर ललिता देवी ने सब देवों के विनाशक एक महान् घोर बलीन्द्रास्त्र को प्रत्येक भंड महासुर के प्रति छोड़ा था ।१०५।
तदस्त्रदर्पनाशाय वामनाः शतशोऽभवन् । महाराज्ञीदक्षहस्तकनिष्ठाग्रान्महौजसः ॥१०६ क्षणे क्षणे वर्धमानाः पाशहस्ता महाबलाः । बलींद्रानस्त्रसंभूतान्वध्नंतः पाशबन्धनैः ॥१०७ दक्षहस्तकनिष्ठाग्राज्जाताः कामेशयोषितः । महाकाया महोत्साहास्तदस्त्रं समनाशयन् ॥१०८ हैहयास्त्रं समसृजद्भंडदैत्यो रणाजिरे । तस्मात्सहस्रशो जाताः सहस्रार्जुनकोटयः ॥१०६ अथ श्रीललितावामहस्तांगुष्ठनखादितः । प्रज्वलन्भार्गवो रामः सक्रोधः सिंहनादवान् ॥११० धारया दारयन्नेतान्कुठारस्य कठोरया । सहस्रार्जुनसंख्यातान्क्षणादेव व्यनाशयन् ॥१११
४१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथ क्रुद्धो भंडदैत्यः क्रोधाद्धंकारमातनोत् ।
तस्माद्धंकारतो जातश्चंद्रहासकृपाणवान् ॥११२
फिर महादेवी के दाहिने हाथ की कनिष्ठिका के नख के अग्रभाग से महान् ओज वाले वामन सैकड़ों ही उसके दर्प के विनाश करने के लिए हुए थे जो छोड़े गये थे ।१०६। एक-एक क्षण में बढ़े हुए—हाथों में पाश लिये हुए महा बलवान् अस्त्र से समुत्पन्न बलीन्द्रों को पाशों बन्धनों से बाँधते हुए थे ।१०७। दाहिने हाथ की कनिष्ठा के अग्रभाव से कामेशयोषित् उत्पन्न हुई थीं जिनके विशाल शरीर थे और महान उत्साह था अस्त्र का उन्होंने विनाश कर दिया था ।१०८। भंडदैत्य ने फिर उस संग्राम में हैहयास्त्र छोड़ा था। उससे सहस्रों ही सहस्रार्जुन समुत्पन्न हो गये थे ।१०६। इसके पश्चात् ललिता के अंगुष्ठ के अग्रभाग से क्रोधयुक्त प्रज्वलित सिंहनाद वाले भार्गव राम प्रकट हुए थे ।११०। उन्होंने कठोर परशु की धार से इन सब सहस्रों सहस्रार्जुनो को विदीर्ण करके एक ही क्षण में विनष्ट कर दिया था ।१११। इसके पश्चात् भंड दैत्य ने क्रोध से हुङ्कार की थी। उस हुङ्कार से चन्द्रहास कृपाणवान् उत्पन्न हो गया था ।११२।
सहस्राऽक्षौहिणीरक्षः सेनया परिवारितः ।
कनिष्ठं कुम्भकर्णं च मेघनादं च नन्दनम् ।
गृहीत्वा शक्तिसैन्यं तदतिदूरममर्दयत् ॥११३
अथ श्रीललितावामहस्ततर्जनिकानखात् ।
कोदण्डरामः समभूल्लक्ष्मणेन समन्वितः ॥११४
जटामुकुटवान्वल्लीबद्धतूणीरपृष्ठभूः ।
नीलोत्पलदलश्यामो धनुर्विस्फारयन्मुहुः ॥११५
नाशयामास दिव्यास्त्रैः क्षणाद्राक्षससैनिकम् ।
मर्दयामास पौलस्त्यं कुम्भकर्णं च सोदरम् ।
लक्ष्मणो मेघनादं च महावीरमनाशयत् ॥११६
द्विविदास्त्रं महाभीममसृजद्भंडदानवः ।
तस्मादनेकशो जाताः कपयः पिंगलोचनाः ॥११७
क्रोधेनात्यंतताम्रास्याः प्रत्येकं हनुमत्समाः ।
भण्डासुर वध वर्णन ] [ ४१७
व्यनाशयच्छक्तिसैन्यं क्रूरकेंकारकारिणः ॥११८
अथ श्रीललितावामहस्तमध्यांगुलीनखात् । आविर्बभूव तालांकः क्रोधमध्यारुणेक्षणः ॥११९
वह सहस्रों राक्षसों की सेना से घिरा हुआ था। छोटा भाई कुम्भकर्ण और नन्दन मेघनाद को लेकर उसने शक्तियों की सेना को दूर तक मर्दित कर दिया था ॥११३। इसके अनन्तर ललिता देवी के बाँये हाथ की कनिष्ठिका के अग्रभाग से लक्ष्मण के सहित कोदण्डराम उत्पन्न हुए थे ॥११४। वह श्रीराम जटा और मुकुट धारी थे जिनके पृष्ठ पर तूणीर था—वे नीलकमल के समान श्याम वर्ण के थे और बार-बार धनुष को विस्फारित कर रहे थे ॥११५। उन्होंने एक ही क्षण में दिव्यास्त्रों से राक्षसों की सेना का विनाश कर दिया। कुम्भकर्ण भाई को और पोलस्त्य को मर्दित कर दिया था। लक्ष्मण ने मेघनाद को जो महान वीर था विनष्ट कर दिया था ॥११६। भंड ने फिर द्विविदास्त्र को उत्पन्न किया था। उससे अनेक कपिगण पिङ्गलोचनों वाले उत्पन्न हो गये थे ॥११७। वे क्रोध से अत्यन्त ताम्रमुखों वाले थे और सभी हनुमान के तुल्य थे। वे क्रूर केङ्कारकारी थे और उन्होंने शक्तियों की सेना का विनाश किया था। ११८। इसके उपरान्त श्री ललिता के बाँये हाथ की मध्यमा के नख से तालाङ्क आविर्भूत हुआ था जो क्रोध से अरुण लोचनों वाला था ॥११६।
नीलांवरपिनद्धांगः कैलासाचलनिर्मलः । द्विविदास्त्रसमुद्भूतान्कपीन्सर्वान्व्यनाशयन् ॥१२०
राजासुरं नाम महत्ससर्जास्त्रं महाबलः । तस्मादस्त्रात्समुद्भूता बहवो नृपदानवाः ॥१२१
शिशुपालो दन्तवक्त्रः शाल्वः काशीपतिस्तथा । पौंड्रको वासुदेवश्च रुक्मी डिंभकहंसको ॥१२२
शम्बरश्च प्रलंबश्च तथा बाणासुरोऽपि च । कंसश्चाणूरमल्लश्च मुष्टिकोत्पलशेखरौ ॥१२३
अरिष्टो धेनुकः केशी कालियो यमलार्जुनौ । पूतना शकटश्चैव तृणावर्तादयोऽसुराः ॥१२४
४१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नरकाख्यो महावीरो विष्णुरूपी मुरासुरः । अनेके सह सेनाभिरुत्थिताः शस्त्रपाणयः ॥१२५ तान्विनाशयितुं सर्वान्वासुदेवः सनातनः । श्रीदेवीवामहस्ताब्जानामिकानखसंभवः ॥१२६
नीले वस्त्रसे उसका अङ्गपिनद्ध था और कैलासके समज निर्मल था । द्विविदास्त्र से उत्पन्न समस्त कपियों का उसने विनाश कर दिया था ।१२०। उस महा बलवान ने राजासुर नामक महान अस्त्र को छोड़ा था । उस अस्त्र से बहुत से भूत दानव समुत्पन्न हुए थे ।१२१। उनमें शिशुपाल दन्त वक्त्र-शाल्व-काशीपति-पौण्ड्रक-वासुदेव-रुक्मीडिम्भक हंसक थे ।१२२। शम्बर-प्रलम्ब-बाणासुर भी था । कंस-चाणूर मल्ल-मुष्टिक-उत्पल शेखर थे ।१२३। अरिष्ट-धेनु-ककेशी-कालिय-यमलार्जुन-पूतना-शकर-तृणावर्त्त आदि असुर सभी थे ।१२४। महावीर नरक ओर विष्णुरूपी मुर असुर था । ऐसे बहुत से हथियारों को हाथों में लेकर सेनाओं के साथ आविर्भूत हो गये थे ।१२५। उन सबके विनाश करने के लिए श्री देवी के बाँये हाथ की अनामिका के नख से संभूत सनातन वासुदेव प्रकट हुए थे ।१२६।
चतुर्व्यूहं समातेने चत्वारस्ते ततोऽभवन् । वासुदेवो द्वितीयस्तु संकर्षण इति स्मृतः ॥१२७ प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च ते सर्वे प्रोद्यतायुधाः । तानशेषान्दुराचारान्भूमेर्भारप्रवर्तकान् ॥१२८ नाशयामासुरुर्वीशवेषच्छन्नान्महासुरान् ॥१२९ अथ तेषु विनष्टेषु संक्रुद्धो भंडदानवः । धर्मविप्लावकं घोरं कल्यस्त्रं सममुञ्चत ॥१३० ततः कल्यस्त्रतो जाता आंध्राः पुण्ड्राश्च भूमिपाः । किराताः शवरा हूणा यवनाः पापवृत्तयः ॥१३१ वेदविप्लावका धर्मद्रोहिणः प्राणिहिंसकाः । वर्णाश्रमेषु सांकर्यकारिणो मलिनांगकाः ।
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४१६
ललिताशक्तिसैन्यानि भूयोभूयो व्यमर्दयन् ॥१३२
अथ श्रीललितावामहस्तपद्मस्य भास्वतः।
कनिष्ठिकानखोद्भूतः कल्किर्नाम जनार्दनः ॥१३३
वे चारों ने चतुर्व्यूह बनाया था जो फिर हुए थे। उनमें वासुदेव—दूसरे संकर्षण थे। १२७। तीसरे प्रद्युम्न और चौथे अनिरुद्ध थे। ये सभी आयुधों से समुद्यत थे। इन्होंने उन दुराचारियों को जो भूमि पर भार के प्रवर्त्तक थे। १२८। वे राजा के रूप में छिपे हुए महासुर थे उन सबका विनाश कर दिया था। १२९। इन सबके विनष्ट होने पर भण्डासुर बहुत क्रुद्ध हुआ था और फिर उसने धर्म के विप्लावक घोर कलि के अस्त्र को छोड़ा था। १३०। उससे आन्ध्र और पुण्ड्र राजा उत्पन्न हुए थे। किरात-शवर-हूण और यवन पापवृत्ति वाले उत्पन्न हुए। १३१। ये सब वेदों के विप्लावक—धर्मद्रोही और प्राणियों के हिंसक थे। इनके अङ्ग मलिन थे तथा वर्णाश्रमों में सांकर्य करने वाले थे। इन्होंने ललिता शक्ति की सेनाओं का बार-बार विमर्दन किया था। १३२। इसके पश्चात् ललिता के वाम कर कमल से जो प्रज्वलित कनिष्ठका के नख से उत्पन्न कल्कि नामक जनार्दन प्रभु हुए थे। १३३।
अश्वारूढः प्रदीप्तश्रीरट्टहासं चकार सः।
तस्यैव ध्वनिना सर्वे वज्रनिष्पेषबन्धुना ॥१३४
किराता मूच्छिता नेशुः शक्तयश्चापि हर्षिताः।
दशावतारनाथास्ते कृत्वेदं कर्म दुष्करम् ॥१३५
ललितां तां नमस्कृत्य बद्धांजलिपुटाः स्थिताः।
प्रतिकल्पं धर्मरक्षां कतुं मत्स्यादिजन्मभिः।
ललितांबानियुक्तास्ते वैकुण्ठाय प्रतस्थिरे ॥१३६
इत्थं समस्तेष्वस्त्रेषु नाशितेषु दुराशयः।
महामोहास्त्रमसृजच्छक्तयस्तेन मूर्च्छिताः ॥१३७
शांभवास्त्रं विसृज्यांबा महामोहास्त्रमक्षिणोत्।
अस्त्रप्रत्यस्त्रधाराभिरित्थं जाते महाहवे।
अस्तशैलं गभस्तीशो गन्तुमारभतारुणः ॥१३८
४२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथ नारायणास्त्रेण सा देवी ललितांबिका ।
सर्वा अक्षौहिणीस्तस्य भस्मसादकरोद्रणे ॥१३९
अथ पाशुपतास्त्रेण दीप्तकालानलत्विषा ।
चत्वारिंशच्चमूनाथान्महाराज्ञी व्यमर्दयत् ॥१४०
यह अश्व पर आरूढ़ थे और इनकी श्री प्रदीप्त थी । इनने अट्टहास किया था । उसकी वज्र के समान ध्वनि से सभी किरात बेहोश हो गये थे ।१३४। सब मूर्च्छित होकर नष्ट हो गये थे और शक्तियां हर्षित हो गयी थीं । दशावतारों के नाथों ने इस दुष्कर कर्म को करके सम्पन्न किया था ।१३५। फिर उस ललिता देवी को नमस्कार करके हाथ जोड़कर उसके आगे स्थित हो गये थे । प्रत्येक कल्प में मत्स्य आदि धर्म की रक्षा करने के लिए ललिताम्बा के द्वारा नियुक्त थे वे फिर वैकुण्ठ को चले गये ।१३६। इस रीति से समस्त अस्त्रों के विनाशित होने पर उस दुराशय ने महामोहास्त्र को छोड़ दिया था जिससे समस्त शक्तियां मूर्च्छित हो गयी थी ।१३७। जगदम्बा ने शाम्भव अस्त्र को छोड़कर उस महामोहास्त्र को नष्ट कर दिया था । इस तरह से अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों की धाराओं से महान युद्ध हुआ था । गभस्तीश अरुण अस्ताचल को जा रहा था । उस समय में ललितादेवी ने अस्त्र का प्रहार किया था ।१३८। उस देवी ललिताम्बा ने नारायणास्त्र से युद्ध में उसकी समस्त अक्षौहिणी सेनाओं को भस्मीभूत कर दिया था ।१३९। इसके अनन्तर दीप्त कालाग्नि के समान कान्ति वाले पाशुपतास्त्र से चालीस सेनानियों को महाराज्ञी ने विमर्दित कर दिया था ।१४०।
अर्थकशेषं तं दुष्टं निहताशेषबांधवम् ।
क्रोधेन प्रज्वलंतं च जगद्विप्लवकारिणम् ॥१४१
महासुरं महासत्त्वं भंडं चंडपराक्रमम् ।
महाकामेश्वरास्त्रेण सहस्रादित्यवर्चसा ।
गतासुमकरोन्माता ललिता परमेश्वरी ॥१४२
तदस्त्रज्वालयाक्रान्तं शून्यकं तस्य पट्टनम् ।
सस्त्रीकं च सबालं च सगोष्ठं धनधान्यकम् ॥१४३
भंडासुर वध वर्णन ] [ ४२१
निर्दग्धमासीत्सहसा स्थलमात्रमशिष्यत । भंडस्य संक्षयेणासीत्त्रैलोक्यं हर्षनर्तितम् ॥१४४
इत्थं विधाय सुरकार्यमनिन्द्यनीला श्रीचक्रराज- रथमंडलमंडनश्रीः । कामेश्वरी त्रिजगतां जननी वभासे विद्योतमान-
सैन्यं समस्तमपि सङ्गरकर्मखिन्नं भंडासुरप्रबलबाणकृशानुप्तप्तम् । अस्तं गते सवितरि प्रथितप्रभावा श्रीदेवता शिबिरमात्मन आनिनाय ॥१४६
यो भंडादानववधं ललितांबयेमं क्लृप्तं सकृत्पठति तस्य तपोधनेन्द्र । नाशं प्रयांति कंदनानि धृराष्टसिद्धेर्भुक्तिश्च मुक्तिरपि वर्तत एव हस्ते ॥१४७
इमं पवित्रं ललितापराक्रमं समस्तपापघ्नमशेषसिद्धिदम् । पठन्ति पुण्येषु दिनेषु ये नरा भजंति ते भाग्यसमृद्धिमुत्तमाम् ॥१४८
इसके उपरान्त वह दुष्ट एक ही शेष बच गया था और उसके सब बान्धव मर चुके थे । वह भी क्रोध से प्रज्वलित हो रहा था और इस जगत् के विप्लव को करने वाला था ।१४१। महान् प्रचण्ड महान् सत्व युक्त उस महासुर को सहस्र सूर्यों के समान वर्चस् वाले महाकामेश्वरास्त्र से परमेश्वरी ललिता ने भंड को गत प्राण कर दिया था ।१४२। उसके अस्त्र की ज्वाला से उसका शून्यक नगर भी स्त्रियों—बालों—गोष्ठों और धान्यों के सहित तुरन्त ही निर्दग्ध हो गया था। उस भंडासुर के विनाश से तीनों लोक हर्षित हुए थे ।१४३-१४४। इस प्रकार से अनिन्द्यशील वाली देवी देवों के कार्य को करके श्रीचक्रराज रथ के मंडल की श्री वह तीनों जगतों की जननी वह कामेश्वरी विजय श्री से सुसम्पन्न विद्योतमान वैभव वाली शोभित हुई थी ।१४५। समस्त सेना भी युद्ध कर्म में खिन्न हो गयी थी और