ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
११८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्य- कर्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत-करघा आदि साधनोंका संग्रह आवश्यक देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस विचित्र जगत्की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये बिना ही दहीरूपमे परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक शक्तिसे जगत्का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य शक्तिसे ही जगत्की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस प्रकार करती है—‘उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।’ (श्वेता० ६।८) सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें सङ्कल्पपूर्वक विचित्र रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार) पूर्वक जगत्की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं, ऐसे लोगोंको साधन- सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य है, इसलिये वह जगत्का कर्ता कैसे हो सकता है?’ इसपर कहते हैं— देवादिवदपि लोके ॥ २ । १ । २५ ॥
सूत्र २५-२६ ] अध्याय २ ११९
सूत्र २५-२६ ] अध्याय २ ११९ लोके=लोकमे; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=( बिना उपकरण- के ) भी; ( कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है ) । व्याख्या—जैसे लोकमे देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवाञ्छित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं* उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने सङ्कल्प- मात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमे प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् परमेश्वर- को इस जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमे क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातको दृढ करनेके लिये शङ्का उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २ । १ । २६ ॥ कृत्स्नप्रसक्तिः=( ब्रह्मको जगत्का कारण माननेपर ) वह पूर्णरूपसे जगत्- के रूपमे परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा, वा=अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः=उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोसे विरोध होगा। व्याख्या—पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्का कारण माना जायगा तो उसमे दो दोष आवेगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्के आकारमे परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगद्रूपमे परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमे ही स्थित है, परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योकि श्रुति 'उसे निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरञ्जन बताती है,† दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोसे विभूषित करती है‡। ऐसी दशा- मे पूर्णत ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन
- देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमे भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसङ्ग । † निष्क्रियं निष्कलं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । ( श्वेता० ६ । १९ ) ‡ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । ( मु० उ० २ । १ । २ )
पादन किया है । (देखिये श्वेताश्वतर ६। १६—१९ तथा मुण्डक
१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध-इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं— श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २ । १ । २७ ॥ तु=किंतु (यह दोष नहीं आता क्योंकि); श्रुतेः=श्रुतिसे (यह सिद्ध है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकाररूपसे स्थित है); शब्द- मूलत्वात्=ब्रह्मका स्वरूप कैसा है ? इसमे वेद ही प्रमाण है (इसलिये वेद जैसा वर्णन करता है, वैसा ही उसका स्वरूप मानना चाहिये)। व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो दोष उपस्थित किये है, वे सिद्धान्तपक्षपर लागू नहीं होते; क्योंकि वह श्रुतिपर आधारित है । श्रुतिने जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्- की उत्पत्ति बतायी है, उसी प्रकार निर्विकार रूपसे ब्रह्मकी स्थितिका भी प्रति- पादन किया है । (देखिये श्वेताश्वतर ६। १६—१९ तथा मुण्डक १। १। ९) अतः श्रुतिप्रमाणसे यही मानना ठीक है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकार रूपसे नित्य स्थित है। वह अवयवरहित और निष्क्रिय होते हुए ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके लिये कोई बात असम्भव नहीं है। वह मन-इन्द्रिय आदिसे अतीत है, इनका विषय नहीं है। उसकी सिद्धि कोरे तर्क और युक्तिसे नहीं होती। उसके लिये तो वेद ही सर्वोपरि निर्भ्रान्त प्रमाण है। वेदने उसका स्वरूप जैसा बताया है, वैसा ही मानना चाहिये। वेद उस परब्रह्मको अवयवरहित बतानेके साथ ही यह भी कहता है कि 'वह सम्पूर्णरूपेण जगत्के आकारमें परिणत नहीं होता।' यह समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्मके एक पादमें स्थित है, शेष अमृतस्वरूप तीन पाद परमधाममें स्थित हैं,*
- तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३ । १२ । ६)
सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १२१
सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १२१ ऐसा श्रुतिने स्पष्ट शब्दोमे वर्णन किया है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमे पूर्वोक्त दोनो ही दोष नहीं प्राप्त होते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको युक्तिसे भी दृढ़ करते हैं— आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥ २ । १ । २८ ॥ च=इसके सिवा ( युक्तिसे भी इसमे कोई विरोध नहीं है ); हि=क्योंकि; आत्मनि=( अवयवरहित ) जीवात्मामे; च=भी; एवम्=ऐसी; विचित्राः=विचित्र सृष्टियाँ ( देखी जाती हैं ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रमें ब्रह्मके विषयमे केवल श्रुति-प्रमाणकी गति बतायी गयी, सो तो है ही, उसके सिवा, विचार करनेपर युक्तिसे भी यह बात समझने आ सकती है कि अवयवरहित परब्रह्मसे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्थामे इस अवयवरहित निर्विकार जीवात्मासे नाना प्रकारकी विचित्र सृष्टि होती देखी जाती है; यह सबके अनुभवकी बात है । योगी लोग भी स्वयं अपने स्वरूपसे अविकृत रहते हुए ही अनेक प्रकारकी रचना करते हुए देखे जाते हैं। महर्षि विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी धेनु नन्दिनी आदिमे अद्भुत सृष्टि-रचनाशक्तिका वर्णन इतिहास-पुराणोमे जगह-जगह पाया जाता है। जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीवकोटिके लोग भी स्वरूपसे अविकृत रहकर विचित्र सृष्टि-निर्माणमे समर्थ हो सकते हैं, तब परब्रह्ममें ऐसी शक्तिका होना तो कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं है। विष्णुपुराणमे प्रश्न और उत्तरके द्वारा इस बातको बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।*
- निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः । कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ ( वि० पु० १ । ३ । १ ) मैत्रेय पूछते हैं, 'मुने ! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है, उसे सृष्टि आदिका कर्ता कैसे माना जा सकता है ?' शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ ( वि० पु० १ । ३ । २-३ ) पराशर मुनि उत्तर देते हैं—'तपस्वियोंमे श्रेष्ठ मैत्रेय ! समस्त भावपदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञानकी विषय हैं, ( साधारण मनुष्य उनको नहीं समझ सकता ) अग्निकी उष्णता-शक्तिकी भाँति ब्रह्मकी भी सर्गादिरचना-रूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं।'
१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध—इतना ही नहीं, निरवयव वस्तुसे विचित्र सावयव जगत्की सृष्टि सांख्यवादी स्वयं भी मानते हैं । अतः— स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । २९ ॥ स्वपक्षदोषात्=उनके अपने पक्षमे ही उक्त दोष आता है, इसलिये; च=भी ( परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का कारण मानना ठीक है ) । व्याख्या—यदि सांख्यमतके अनुसार प्रधानको जगत्का कारण मान लिया जाय तो उसमे भी अनेक दोष आवेगे; क्योकि वह वेदसे तो प्रमाणित है ही नहीं; युक्तिसे भी, उस अवयवरहित जड प्रधानसे इस अवयवयुक्त सजीव जगत्की उत्पत्ति माननेमे विरोध आता है; क्योंकि सांख्यवादी भी प्रधानको न तो सीमित मानते है, न सावयव । अतः उनके मतमें भी प्रधानका जगत्रूपमे परिणत होना स्वीकार करनेपर पूर्वकथित सभी दोष प्राप्त होते हैं । अतः यही ठीक है कि परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सम्बन्ध—सांख्यादि मतोंकी मान्यतामें दोष दिखाकर अब पुनः अपने सिद्धान्तको निर्दोष सिद्ध करते हुए कहते हैं— सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥ २ । १ । ३० ॥ च=इसके सिवा, वह परा देवता ( परब्रह्म परमेश्वर ); सर्वोपेता = सब शक्तियोंसे सम्पन्न है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिके वर्णनमें ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या—वह परमात्मा सब शक्तियोसे सम्पन्न है, ऐसी बात वेदमे जगह- जगह कही गयी है । जैसे—'सत्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । २ ) अर्थात् 'वह ब्रह्म सत्यसङ्कल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित और मानरहित है ।' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ( मु० उ० १ । १ । ९ ) 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वर- से यह विराट्रूपं जगत् और नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न होते हैं ।'
सूत्र २९—३२ ] अध्याय २ १२३
सूत्र २९—३२ ] अध्याय २ १२३ तथा उस परब्रह्मके शासनमे सूर्य-चन्द्रमा आदिको दृढ़तापूर्वक स्थित बताया जाना, (बृ० उ० ३ । ८ । ९) उसमे ज्ञान, बल और क्रियारूप नाना प्रकारकी स्वाभाविक शक्तियोका होना, (श्वेता० ६ । ८) जगत्के कारण- का अनुसन्धान करनेवाले महर्षियोंद्वारा उस परमात्मदेवकी आत्मभूता शक्तिका दर्शन करना (श्वेता० १ । ३) इत्यादि प्रकारसे परब्रह्मकी शक्तियोको सूचित करनेवाले बहुत-से वचन वेदमे मिलते हैं, जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका है। इस तरह अनेक विचित्र शक्तियोसे सम्पन्न होनेके कारण उस परब्रह्म परमात्मासे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना अयुक्त नहीं है। श्रुतिमे जो ब्रह्मको अवयवरहित बताया गया है, वह उसके स्वरूपकी अखण्डता बतलानेके उद्देश्य- से है, उसकी शक्तिरूप अंशोके निषेधमे उसका अभिप्राय नहीं है; इसलिये परमात्मा ही इस जगत्का कारण है, यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—पुनः शङ्का उठाकर उसका निराकरण करते हैं— विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम् ॥ २ । १ । ३१ ॥ ( श्रुतिमे उस परमात्माको ) विकरणत्वात्=मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे रहित बताया गया है, इसलिये, न=( वह ) जगत्का कारण नहीं है; चेत्=यदि; इति=ऐसा कहो; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या—यदि कहो, 'ब्रह्मको शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे रहित कहा गया है; (श्वेता० ६ । ८) इसलिये वह जगत्का बनानेवाला नहीं हो सकता' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इसका उत्तर पहले 'सर्वोपेता च तद्दर्शनात्' ( २ । १ । ३० ) इस सूत्रमे परब्रह्मको सर्वशक्तिसम्पन्न बताकर दे दिया गया है। तथा श्रुतिने भी स्पष्ट शब्दोमे यह कहा है कि वह परमेश्वर हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियोसे रहित होकर भी सबका कार्य करनेमे समर्थ है (श्वेता० ३ । १९)। इसलिये ब्रह्म ही जगत्का कारण है, ऐसा माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—अब पुनः दूसरे प्रकारकी शङ्का उपस्थित करते हैं— न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ २ । १ । ३२ ॥ न=परमात्मा जगत्का कारण नहीं हो सकता; प्रयोजनवत्त्वात्=क्योकि प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रयोजनसे युक्त होता है ( और परमात्मा पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित है )।
१२४ वेदान्त-दर्शन [पाद १ व्याख्या-ब्रह्मका इस विचित्र जगत्की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्की रचना करना आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्का कर्ता नहीं है; क्योंकि जगत्मे प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता। अतः परब्रह्मको जगत्का कर्ता नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध-पूर्वोक्त शङ्काका उत्तर देते हैं— लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥ २। १ । ३३ ॥ तु=किन्तु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो); लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है। व्याख्या-जैसे लोकमे देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, जिनका जगत्से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महा- पुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्का हित साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमे समर्थ न होनेके कारण केवल लीलामात्र ही है। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं है तथा उन कर्मोंमे कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है; इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वर- के कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है, तथापि परमेश्वरकी यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना प्रयोजन इस जगत्की रचना आदि कार्य होना उचित ही है। *
- भगवान् केवल सङ्कल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५
सूत्र ३३-३४ ] अध्याय २ १२५ सम्बन्ध-यदि परब्रह्म परमात्माको जगत्का कारण माना जाय तो उसमें विषमता ( राग-द्वेषपूर्ण भाव ) तथा निर्दयताका दोष आता है; क्योंकि वह देवता आदिको अधिक सुखी और पशु आदिको अत्यन्त दुखी बनाता है तथा मनुष्योंको सुख-दुःखसे परिपूर्ण मध्यम स्थितिमें उत्पन्न करता है । जिन्हें वह सुखी बनाता है, उनके प्रति उसका राग या पक्षपात सूचित होता है और जिन्हें दुखी बनाता है, उनके प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि एवं निर्दयता प्रतीत होती है । इस दोषका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति ॥ २ । १ । ३४॥ वैषम्यनैर्घृण्ये = ( परमेश्वरमे ) विषमता और निर्दयताका दोष; न = नहीं आता; सापेक्षत्वात् = क्योंकि वह जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर सृष्टि करता है; तथा हि = ऐसा ही; दर्शयति = श्रुति दिखलाती है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन ।' ( बृह० उ० ३ । २ । १३ ) अर्थात् 'निश्चय ही यह जीव पुण्य-कर्मसे पुण्य- शील होता—पुण्य-योनिमे जन्म पाता है और पाप-कर्मसे पापशील होता—पाप- योनिमे जन्म ग्रहण करता है ।' 'साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ ) अर्थात् 'अच्छे कर्म करनेवाला अच्छा होता है— सुखी एवं सदाचारी कुलमे जन्म पाता है और पाप करनेवाला पापात्मा होता है—पापयोनिमे जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है ।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही परमात्मा उनको कर्मा- नुसार अच्छी-बुरी ( सुखी-दुखी ) योनियोमे उत्पन्न करते है । इसलिये अच्छे न्यायाधीशकी भाँति निष्पक्षभावसे न्याय करनेवाले परमात्मापर विषमता और निर्दयता- रचनामे समर्थ है । उनकी इस अद्भुत शक्तिको देखकर, सुनकर और समझकर भगवदीय सत्ता और उनके गुण-प्रभावपर श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने और उनकी शरणमें जानेसे मनुष्य अनायास ही इस भव-बन्धनसे मुक्त हो सकता है । भगवान् सबके सुहृद् हैं, उनकी एक- एक लीला जगत्के जीवोंके उद्धारके लिये होती है; इस प्रकार उनकी दिव्य लीलाका रहस्य समझमें आ जानेपर मनुष्यका जगत्मे प्रतिक्षण घटित होनेवाली घटनाओके प्रति राग-द्वेषका अभाव हो जाता है; उसे किसी भी बातसे हर्ष या शोक नहीं होता । अतः साधकको इसपर विशेष ध्यान देकर भगवान्के भजन-चिन्तनमे संलग्न रहना चाहिये ।
१२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ का दोष नहीं लगाया जा सकता है। स्मृतियोमे भी जगह-जगह कहा गया है कि जीवको अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार सुख-दुःखकी प्राप्ति होती है। जैसे 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।' (गीता १४ । १६) अर्थात् 'पुण्यकर्मका फल सात्त्विक एवं निर्मल बताया गया है।' इसी प्रकार भगवान्ने अशुभ कर्ममे रत रहनेवाले असुर-स्वभावके लोगोको आसुरी योनिमे डालनेकी बात बतायी है।* इन प्रमाणोंसे परमेश्वरमे उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा अभाव सिद्ध होता है; अतः उन्हे जगत्का कारण मानना ठीक ही है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें कही गयी बातपर शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ २ । १ । ३५ ॥ चेत्=यदि कहो; कर्माविभागात्=जगत्की उत्पत्तिसे पहले जीव और उनके कर्मोंका ब्रह्मसे विभाग नहीं था, इसलिये; न=परमात्मा कर्मोंकी अपेक्षासे सृष्टि करता है, यह कहना नहीं बन सकता; इति न=तो ऐसी-बात नहीं है; अनादित्वात्=क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। व्याख्या—यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति होनेसे पहले तो एकमात्र सत्स्वरूप परमात्मा ही था† यह बात उपनिषदोमे बार-बार कही गयी है। इससे सिद्ध है कि उस समय भिन्न-भिन्न जीव और उनके कर्मोंका कोई विभाग नहीं था; ऐसी स्थितिमे यह कहना नहीं बनता कि जगत्कर्ता परमात्माने जीवोके कर्मोंकी अपेक्षा रखकर ही भोक्ता, भोग्य और भोग-सामग्रियोके समुदायरूप इस विचित्र जगत्की रचना की है; जिससे परमेश्वरमे विषमता और निर्दयताका दोष न आवे। तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि जीव और उनके कर्म अनादि है। श्रुति कहती है, 'धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' परमात्माने पूर्व कल्पके अनुसार सूर्य,
- अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् । क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ (गी० १६ । १८-१९) 'जो अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोधका आश्रय ले अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमे अन्तर्यामीरूपसे स्थित मुझ परमेश्वरसे द्वेष रखते हैं, निन्दा करते हैं; उन द्वेषी, क्रूर, अशुभकर्मपरायण नीच मनुष्योंको मैं निरन्तर संसारमे आसुरी योनियोंमे ही डालता हूँ।' † 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १)
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७ चन्द्रमा आदि जगत्की रचना की। इससे जड-चेतनात्मक जगत्की अनादि सत्ता सिद्ध होती है। प्रलयकालमें सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो जानेपर भी उसकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। उपर्युक्त श्रुतिसे ही यह बात भी सिद्ध है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले भी वह अव्यक्त रूपसे उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें है, उसका अभाव नहीं हुआ है। 'लीङ् श्लेषणे' धातुसे लय शब्द बनता है। अतः उसका अर्थ संयुक्त होना या मिलना ही है। उस वस्तुका अभाव हो जाना नहीं। जैसे नमक जलमें घुल-मिल जाता है, तो भी उसकी सत्ता नहीं मिट जाती। उसके पृथक् स्वादकी उपलब्धि होनेके कारण जलसे उसका सूक्ष्म विभाग भी है ही। उसी प्रकार जीव और उनके कर्म प्रलयकालमें ब्रह्मसे अविभक्त रहते हैं तो भी उनकी सत्ता एव सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको जीवोंके शुभाशुभ कर्मानुसार विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जीव और उनके कर्म अनादि हैं, इसमें क्या प्रमाण है ? इसपर कहते हैं— उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ २ । १ । ३६ ॥ च=इसके सिवा ( जीव और उनके कर्मोंका अनादि होना ); उपपद्यते=युक्तिसे भी सिद्ध होता है; च=और; उपलभ्यते= ( वेदों तथा स्मृतियोंमें ) ऐसा वर्णन उपलब्ध भी होता है । व्याख्या—जीव और उनके कर्म अनादि हैं, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है; क्योकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायगा तो प्रलयकालमें परमात्माको प्राप्त हुए जीवोंके पुनरागमन माननेका दोष प्राप्त होगा। अथवा प्रलयकालमें सब जीव अपने आप मुक्त हो जाते हैं, यह स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र और उनमें बताये हुए सब साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो सर्वथा अनुचित है। इसके सिवा श्रुति भी बारंबार जीव और उनके कर्मोंको अनादि बताती है। जैसे—'यह जीवात्मा नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता।'* तथा 'वह यह प्रत्यक्ष जगत् उत्पन्न होनेसे पहले नाम-रूपसे प्रकट नहीं था, वही
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । ( क० उ० १ । २ । १८ )
१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ पीछे प्रकट किया गया।' (बृ० उ० १ । ४ । ७) 'परमात्माने शरीरकी रचना करके उसमें इस जीवात्माके सहित प्रवेश किया।' (तै० उ० २ । ७) इत्यादि । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और यह जगत् अनादि सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार स्मृतिमें भी स्पष्ट कहा गया है कि 'पुरुष (जीवसमुदाय) और प्रकृति (स्वभाव, जिसमें जीवोंके कर्म भी संस्काररूपमें रहते हैं)—इन दोनोंको ही अनादि समझो।' (गीता १३ । १९) इस प्रकार जीव और उनके कर्म अनादि सिद्ध होनेसे उनका विभक्त होना अनिवार्य है; अतः कर्मोंकी अपेक्षासे परमेश्वरको इस विचित्र जगत्का कर्ता माननेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—अपने पक्षमें अविरोध (विरोधका अभाव) सिद्ध करनेके लिये आरम्भ किये हुए इस पहले पादका उपसंहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं— सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥ सर्वधर्मोपपत्तेः=(इस जगत्कारण परब्रह्ममे) सब धर्मोकी सङ्गति है, इसलिये; च=भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)। व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना सङ्गत है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है। इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमे आनेवाले दोषोंका निराकरण करते हुए अन्तमे जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस जगत्की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते; किन्तु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं। पहला पाद सम्पूर्ण
सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्का कारण मानना
दूसरा पाद सम्बन्ध—पहले पादमें प्रधानतासे अपने पक्षमें प्रतीत होनेवाले समस्त दोषोंका खण्डन करके यह निश्चय कर दिया कि इस जगत्का निमित्त और उपादानकारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब दूसरोंद्वारा प्रतिपादित जगत्- कारणोंको स्वीकार करनेमें जो-जो दोष आते हैं, उनका दिग्दर्शन कराकर अपने सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये दूसरा पाद आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम दस सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है— रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥ २ । २ । १ ॥ च=इसके सिवा; अनुमानम्=जो केवल अनुमान है (वेदद्वारा जिसकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता सिद्ध नहीं होती), वह प्रधान; न=जगत्का कारण नहीं है; रचनानुपपत्तेः=क्योंकि उसके द्वारा नाना प्रकारकी रचना सम्भव नहीं है। व्याख्या—प्रधान या प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह जड है। कब, कहाँ किस वस्तुकी आवश्यकता है, इसका विचार जड प्रकृति नहीं कर सकती, अतएव उसके द्वारा ऐसी विशिष्ट रचना नहीं प्रस्तुत की जा सकती, जिससे किसीकी आवश्यकता पूर्ण हो सके। इसके सिवा, चेतन कर्ताकी सहायताके बिना जड वस्तु स्वयं कुछ करनेमे समर्थ भी नहीं है। गृह, वस्त्र, भाँति-भाँतिके पात्र, हथियार और मशीन आदि जितनी भी आवश्यक वस्तुएँ हैं, सबकी रचना बुद्धियुक्त कुशल कारीगरके द्वारा ही की जाती है। जड प्रकृति स्वयं उक्त वस्तुओंका निर्माण कर लेती हो, ऐसा दृष्टान्त कहीं नहीं मिलता है। फिर जो पृथिवी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि विविध एवं अद्भुत वस्तुओंसे सम्पन्न है; मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और तृण आदिसे सुशोभित है तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि आध्यात्मिक तत्त्वोंसे अलंकृत हैं; जिसके निर्माण-कौशलकी कल्पना बड़े-बड़े बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत जगत्की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है। वे० द० ९—
१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का कारण है । सम्बन्ध—अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं— प्रवृत्तेश्च ॥ २ । २ । २ ॥ प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध नहीं होता ( इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है ) । व्याख्या—जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड प्रकृतिमे प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योकि साम्यावस्थामे स्थित सत्त्व, रज और तम—इन तीनो गुणोका नाम प्रधान या प्रकृति है,* उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है । कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है । सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं— पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २ । २ । ३ ॥ चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति ( जड प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है ); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका सहयोग है ( अतः केवल जडमे प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्की रचना असम्भव है ) । व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने आप गायके थनमे उतर आता है † तथा अचेतन जल लोगोके उपकारके लिये अपने आप नदी-निर्झर आदिके रूपमे बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमे प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमे भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा
- सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । ( सा० सू० १ । ६१ ) † अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य । ( सां० सू० ३ । १७० )
सूत्र २-४ ] अध्याय २ १३१
सूत्र २-४ ] अध्याय २ १३१ काम करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है । शास्त्र भी इस अनुमानका समर्थक है—‘योऽप्सु तिष्ठन्••••अपोऽन्तरो यमयति ।’ ( बृह० उ० ३ । ७ । ४ ) अर्थात् ‘जो जलमे रहनेवाला है और उसके भीतर रहकर उसका नियमन करता है।’ ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्य. स्यन्दन्ते’ ( बृह० उ० ३ । - ८ । ९ ) अर्थात् ‘हे गार्गि ! इस अक्षर ( परमात्मा ) के ही प्रशासनमे पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ बहती है ।’ इत्यादि श्रुतिवाक्योसे सिद्ध होता है कि समस्त जड वस्तुओका अधिष्ठाता चेतन है। गायके थनमे जो दूध उतरता है, उसमे भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन बछड़ेका चूसना कारण है । इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावत बहता है । लोगोके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊंची भूमिपर नही चला जाता । परन्तु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर चाहें मोड़ सकते है । इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमे चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः जगत्की रचनामे प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता । सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते है— व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २ । २ । ४ ॥ च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमे प्रधानके सिवा, दूसरा कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है, इसलिये, ( और ) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये भी ( प्रधान कभी सृष्टिरूपमे परिणत होता और कभी नहीं होता है, यह बात सम्भव नहीं जान पड़ती ) । व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है । पुरुष उदासीन है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक । प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है, वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता । ऐसी स्थितिमे जड प्रधान कभी तो महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमे परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह कैसे युक्तिसंगत होगा । यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव नहीं है
१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न हो सकनेके कारण प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्की उत्पत्ति होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं— अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २ । २ । ५ ॥ अन्यत्र=दूसरे स्थानमे; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये; च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; ( प्रधानका जगत्के रूपमें परिणत होना ) न=नहीं सिद्ध होता । व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोमे घास आदिका वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके सहयोग बिना जड प्रकृति जगत्रूपमे परिणत नहीं हो सकती। जैसे तृण आदि- का दूधके रूपमे परिणत होना तभी सम्भव होता है, जब उसे ब्यायी हुई चेतन गौके उदरमे स्थित होनेका अवसर मिलता है सम्बन्ध—प्रधानसे जगत्-रचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, यह बतानेके लिये कहते हैं— अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ २ । २ । ६ ॥ अभ्युपगमे=( अनुमानसे प्रधानमे सृष्टिरचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति ) स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; अर्थाभावात्=कोई प्रयोजन न होनेके कारण ( यह मान्यता व्यर्थ ही होगी ) । व्याख्या—यद्यपि चेतनकी प्रेरणाके बिना जड प्रकृतिका सृष्टि-रचना आदि कार्यमे प्रवृत्त होना नहीं बन सकता, तथापि यदि यह मान लिया जाय कि स्वभावसे ही प्रधान जगत्की उत्पत्तिके कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है तो इसके लिये कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देता; क्योंकि सांख्यमतमें माना गया है कि प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही होती है। * परंतु उनकी
- पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। ( सांख्य-का० २१ )
सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३
सूत्र ५-७ ] अध्याय २ १३३ मान्यताके अनुसार पुरुष असङ्ग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन, निर्मल तथा नित्यशुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव है; उसके लिये प्रकृतिदर्शनरूप भोग तथा उससे विमुक्त होनारूप अपवर्ग दोनोंकी ही आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनका माना हुआ प्रयोजन व्यर्थ ही है। अतः प्रधानकी लोकरचनाके कार्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना निरर्थक है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे सांख्यमतकी मान्यतामें दोष दिखाते हैं- पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ २ । २ । ७ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; पुरुषाश्मवत्=अंधे और पंगु पुरुषो तथा लोह और चुम्बकके संयोगकी भाँति (प्रकृति-पुरुषकी समीपता ही प्रकृतिको सृष्टिरचनामें प्रवृत्त कर देती है); तथापि=तो ऐसा माननेपर भी (सांख्यसिद्धान्त- की सिद्धि नहीं होती)। व्याख्या-'जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिल जायें और अंधेके कंधेपर बैठकर पंगु उसे राह बताया करे तो दोनों गन्तव्य स्थानपर पहुँच जाते हैं तथा लोहे और चुम्बकका संयोग होनेपर लोहेमें क्रियाशक्ति आ जाती है उसी प्रकार पुरुष और प्रकृतिका संयोग ही सृष्टिरचनाका कारण है।* पुरुषकी समीपतामात्रसे जड प्रकृति जगत्की उत्पत्ति आदिके कार्यमें प्रवृत्त हो जाती है।' सांख्यवादियोंकी कही हुई यह बात मान ली जाय तो भी इससे सांख्यसिद्धान्तकी पुष्टि नहीं होती; क्योंकि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं, एक गमनशक्तिसे रहित होनेपर भी बौद्धिक आदि अन्य शक्तियोंसे सम्पन्न है; अंधा पुरुष देखनेकी शक्तिसे हीन होनेपर भी गमन एवं बुद्धि आदिकी शक्तिसे युक्त है। एक प्रेरणा देता है तो दूसरा उसे समझकर उसके अनुसार चलता है। अतः वहाँ भी चेतनका सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार चुम्बक और लोहेको एक दूसरेके समीप लानेके लिये एक तीसरे चेतन पुरुषकी आवश्यकता होती है। चेतनके सहयोग बिना न तो लोहा चुम्बकके समीप जायगा और न उसमे क्रियाशक्ति उत्पन्न होगी। समीपता प्राप्त होनेपर भी दोनो एक-दूसरेसे सट जायेंगे, लोहेमें किसी प्रकारकी आवश्यक क्रियाका संचार नहीं होगा, अतः ये दोनो दृष्टान्त इसी बातकी पुष्टि करते हैं कि चेतनकी प्रेरणा
- पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ (सा० कारिका० २१)
१३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है, अन्यथा नहीं; परन्तु सांख्यमतमें तो पुरुष असङ्ग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं हो सकती। सम्बन्ध—अब प्रधानकारणवादके विरोधमे दूसरी युक्ति देते हैं— अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥ अङ्गित्वानुपपत्तेः=अङ्गाङ्गिभाव ( सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष ) की सिद्धि न होनेके कारण; च=भी ( केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ) । व्याख्या—पहले यह बताया गया है, सांख्यमतमे तीनो गुणोंकी साम्यावस्थाका नाम ‘प्रधान’ है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अङ्गाङ्गिभाव- की सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े हुए गुणको अङ्गी और घटे हुए गुणको अङ्ग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी विषमता ( ह्रास-वृद्धि ) को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असङ्ग और निष्क्रिय मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह ब्रह्म कारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार गुणोंका अङ्गाङ्गिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना असङ्गत है। सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं— अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥ अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ=साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान कर लेनेपर; च=भी; ज्ञशक्तिवियोगात्=प्रधानमे ज्ञान-शक्ति न होनेके कारण ( गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति उसके द्वारा नहीं हो सकती ) ।
सूत्र ८-१० ] अध्याय २ १३५
सूत्र ८-१० ] अध्याय २ १३५ व्याख्या—यदि गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग होना काल आदि अन्य निमित्तोंसे मान लिया जाय तो भी प्रधानमे ज्ञानशक्तिका अभाव तो है ही। इसलिये उसके द्वारा बुद्धिपूर्वक कोई रचना नहीं हो सकती। जैसे गृह, वस्त्र, घट आदिका निर्माण कोई समझदार चेतन कर्ता ही कर सकता है, उसी प्रकार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जीवोंके छोटे-बड़े विविध शरीर एवं अन्न आदिकी बुद्धिपूर्वक होनेवाली सृष्टि जड प्रकृतिके द्वारा असम्भव है। ऐसी रचना तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सनातन परमात्मा ही कर सकता है; अतः जड प्रकृतिको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब सांख्यदर्शनकी असमीचीनता बताते हैं— विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥ २ । २ । १० ॥ विप्रतिषेधात् = परस्पर विरोधी बातोंका वर्णन करनेसे; च = भी; असमञ्जसम् = सांख्यदर्शन समीचीन नहीं है। व्याख्या—सांख्यदर्शनमे बहुत-सी परस्पर-विरुद्ध बातोंका वर्णन पाया जाता है। जैसे पुरुषको असङ्ग^१ और निष्क्रिय^२ मानना फिर उसीको प्रकृतिका द्रष्टा^३ और भोक्ता^४ बताना, प्रकृतिके साथ उसका संयोग^५ कहना, प्रकृतिको पुरुषके लिये भोग और मोक्ष^६ प्रदान करनेवाली बताना, तथा प्रकृति और पुरुषके नित्य पार्थक्यके ज्ञानसे दुःखका अभाव ही मोक्ष^७ है; ऐसा मुक्तिका स्वरूप मानना इत्यादि। इस कारण भी सांख्यदर्शन समीचीन ( निर्दोष ) नहीं जान पड़ता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त दस सूत्रोंमे सांख्यशास्त्रकी समीक्षा की गयी। अब वैशेषिकोंके परमाणुवादका खण्डन करनेके लिये उनकी मान्यताको असंगत बताते हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं— १. असङ्गोऽयं पुरुष इति । ( सा० सू० १ । १५ ) २. निष्क्रियस्य तदसंभवात् । ( सा० सू० १ । ४९ ) ३. द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् । ( सा० सू० २ । २९ ) ४. भोक्तृभावात् । ( सां० सू० १ । १४३ ) ५. न नित्यशुद्धमुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्योगादृते । ( सा० सू० १ । १९ ) ६. पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । ( सांख्यकारिका २१ ) ७. विवेकात्रिःशेषदुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतराव्न्नेतरात् । ( सा० सू० ३ । ८४ )
१३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ २ । २ । ११ ॥ ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व ( द्व्यणुक ) तथा परिमण्डल ( परमाणु ) से; महद्दीर्घवत् = महत् एवं दीर्घ ( त्र्यणुक ) की उत्पत्ति बतानेकी भाँति; वा = ही ( वैशेषिकोंके द्वारा प्रतिपादित सभी बातें असमञ्जस—असंगत ) हैं। व्याख्या—परमाणुकारणवादी वैशेषिकोंकी मानी हुई प्रक्रिया इस प्रकार है—एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्यको और एक गुण सजातीय दूसरे गुणको उत्पन्न करता है। समवायी, असमवायी और निमित्त तीनों कारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे वस्त्रकी उत्पत्तिमे तन्तु ( सूत ) तो समवायिकारण हैं, तन्तुओंका परस्पर संयोग असमवायिकारण है और तुरी, वेमा तथा वस्त्र बुननेवाला कारीगर आदि निमित्तकारण है। परमाणुके चार भेद हैं—पार्थिव परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणोंसे युक्त हैं। इनका जो परिमाण ( माप ) है, उसे पारिमाण्डल्य कहते है। प्रलयकालमें ये परमाणु कोई भी कार्य आरम्भ न करके यों ही स्थित रहते हैं। सृष्टिकालमें कार्यसिद्धिके लिये परमाणु तो समवायिकारण बनते हैं, उनका एक दूसरेसे संयोग असमवायिकारण होता है, अदृष्ट या ईश्वर- की इच्छा आदि उसमें निमित्तकारण बनते हैं। उस समय भगवान्की इच्छासे पहला कर्म वायवीय परमाणुओंमें प्रकट होता है, फिर एक दूसरेका संयोग होता है। दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्व्यणुकरूप कार्यको उत्पन्न करते हैं। तीन द्व्यणुकोंसे त्र्यणुक उत्पन्न होता है। चार त्र्यणुकोंसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है। इस क्रमसे महान् वायुतत्त्व प्रकट होता है और वह आकाशमे वेगसे बहने लगता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओंसे अग्निकी उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओंसे जलका महासागर प्रकट होकर उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त दिखायी देता है तथा इसी क्रमसे पार्थिव परमाणुओंसे यह बड़ी भारी पृथिवी उत्पन्न होती है। मिट्टी और प्रस्तर आदि इसका स्वरूप है। यह अचल भावसे स्थित होती है। कारणके गुणोंसे ही कार्यके गुण उत्पन्न होते हैं। जैसे तन्तुओंके शुक्ल, नील, पीत आदि गुण ही वस्त्रमें वैसे गुण प्रकट करते हैं। इसी प्रकार परमाणुगत शुक्ल आदि गुणोंसे ही द्व्यणुकगत शुक्ल आदि गुण प्रकट होते हैं। द्व्यणुकके आरम्भक ( उत्पादक ) जो दो परमाणु है, उनकी वह द्वित्व संख्या द्व्यणुकमें अणुत्व और ह्रस्वत्व—इन दो परिमाणान्तरोंका आरम्भ
सूत्र ११-१२ ] अध्याय २ १३७
सूत्र ११-१२ ] अध्याय २ १३७ ( आविर्भाव ) करती है । परन्तु विभिन्न परमाणुमे जो पृथक्-पृथक् पारिमाण्डल्य- नामक परिमाण होता है, वह द्व्यणुकमे दूसरे पारिमाण्डल्यको नहीं प्रकट करता है, क्योकि वैसा करनेपर वह कार्य पहलेसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा । इसी प्रकार संहारकालमें भी परमेश्वरकी इच्छासे परमाणुओंमें कर्म प्रारम्भ होता है, इससे उनके पारस्परिक संयोगका नाश होता है, फिर द्व्यणुक आदिका नाश होते-होते पृथिवी आदिका भी नाश हो जाता है । वैशेषिकोंकी इस प्रक्रियाका सूत्रकार निराकरण करते हुए कहते हैं कि यदि कारणके ही गुण कार्यमे प्रकट होते हैं, तब तो परमाणुका गुण जो पारिमाण्डल्य ( अत्यन्त सूक्ष्मता ) है, वही द्व्यणुकमे भी प्रकट होना उचित है; पर ऐसा नहीं होता । उनके ही कथनानुसार दो परमाणुओंसे ह्रस्वगुणविशिष्ट द्व्यणुककी उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्व्यणुकोसे महत् दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुक- की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार जैसे यहाँ वैशेषिकोंकी मान्यता असङ्गत है, उसी प्रकार उनके द्वारा कही जानेवाली अन्य बाते भी असङ्गत हैं । सम्बन्ध—इसी बातको स्पष्ट करते हैं— उभयथापि न कर्मात्तस्तदभावः ॥ २ । २ । १२ ॥ उभयथा=दोनो प्रकारसे; अपि=ही; कर्म=परमाणुओंमें कर्म होना; न=नहीं सिद्ध होता; अतः=इसलिये; तदभावः=परमाणुओंके संयोगपूर्वक द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्का जन्म आदि होना सम्भव नहीं है । व्याख्या—परमाणुवादियोंका कहना है कि 'सृष्टिके पूर्व परमाणु निश्चल रहते है, उनमे कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओंका संयोग होता है और उससे जगत्की उत्पत्ति होती है।' इसपर सूत्रकार कहते हैं कि यदि उन परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार विना किसी निमित्तके अपने-आप हो जाता है, ऐसा माने तो यह असम्भव है; क्योंकि उनके मतानुसार प्रलयकालमे परमाणु निश्चल माने गये है । यदि ऐसा मानें कि जीवोंके अदृष्ट कर्मसंस्कारोंसे परमाणुओंमे कर्मका सञ्चार हो जाता है तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवोंका अदृष्ट तो उन्हींमे रहता है न कि परमाणुओंमे; अतः वह उनमे कर्मका सञ्चार नहीं कर सकता । उक्त दोनो प्रकारसे ही परमाणुओंमे कर्म होना सिद्ध नहीं होता; इसलिये परमाणुओंके मयोगये जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।