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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।

अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-

लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः । मन्दारौ ज्ञरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥ भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम, ३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५ भाव में बुध, सूर्य। ६-भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह॥५६॥ मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्किलग्नकाः । सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥ ७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह रेखाप्रद हैं॥५७॥ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहान्          भौमस्याष्टकवर्गः रे. सं. ३९

मं.बु.बृ.शु.श.सू.चं.ल.
१०
११११११
१११२१२१०१०
११११
१०१०
११११
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|  ।।१२        |   ।।।।१०    |  ।।।९       |  ।।मं.११  |
|              |             |             |           |
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|  ।।।९        |  ।।।।।२     |  ।।।।।।श८   |  ।।।६     |
|              |             |             |           |
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|  ।।।।च३      |  ।।सू.४     |  ।।।बु५वृ   |  ।।।बु५वृ |
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(कुण्डली चक्र में राशियों के अनुसार रेखाएँ एवं ग्रह स्थिति अंकित हैं)

अथ बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-

लग्नमन्दारशुक्रज्ञा लग्नारेन्दुसितार्कजाः । शुक्रज्ञौ लग्नचन्द्रार्की, सितारज्ञार्किभार्गवाः ॥५८॥ बुध से १ भाव में लग्न, शनि, भौम, शुक्र, बुध ये ५ रेखाप्रद हैं। २ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, शुक्र, शनि ये ४ रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शुक्र बुध रेखा देने वाले हैं। ४ भाव में लग्न, चंद्र, शनि, शुक्र, भौम ये रेखाप्रद हैं। ५ भाव में बुध, सूर्य, शुक्र रेखाप्रद हैं॥५८॥ जीवज्ञार्केन्दुलग्नानि भूमिपुत्रशनैश्चरौ । तौ च लग्नेन्दुशुक्रार्या मन्दारार्कज्ञभार्गवाः ॥५९॥

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७ लग्नम्न्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः । ६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम, बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।। बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. स. ५४ . बुधस्याष्टकवर्गः

बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.ल.
११
१२११
१२१०
१०१११०
१११०१०११
१२११११११

[बुधस्याष्टकवर्ग चक्र:] तनु/लग्न: ।।।।बु ५ वृ; द्वितीय: ।।।।सू. ४; तृतीय: ।।।शु. ३ चं; चतुर्थ: ।।।। २, ।।।।।। ४; पंचम: ।।।।| ६; षष्ठ: ५, ।।।।। ।७; सप्तम: ।।।।।। ७ श; अष्टम: ।।। ९; नवम: ।।।। १०; दशम: ।।।।।। मं ११; एकादश/द्वादश: ।।।।| १२ अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- गुरोर्लग्नेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।। गुरु से १ । ४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।। चन्द्रशुक्रौ च दुश्चिक्ये मन्दार्यार्काः शनिव्यये । सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।। २ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।। लग्नार्याऽर्केन्दवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः । धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।। माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः । ७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य, भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव

६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः । मन्दारौ झरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥ भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम, ३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५ भाव में बुध, सूर्य। ६ भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह ॥५६॥ मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्कि लग्नकाः । सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥ ७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७ लग्नमन्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः । ६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम, बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।। बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. स. ५४ बुधस्याष्टकवर्गः

बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.ल.
११
१२११
१२१०
१०१११०
१११०१०११
१२११११११

[कुण्डली विवरण:

  • १ भाव (सिंह): ।।।। बु ५ बृ
  • २ भाव (कर्क): ।।।। सू. ४
  • ३ भाव (मिथुन): ।।। शु. ३ चं
  • ४ भाव (वृष): ।।।। २
  • ५ भाव (मेष): ।।।।। १
  • ६ भाव (मीन): ।।।। १२
  • ७ भाव (कुम्भ): ।।।।। मं ११
  • ८ भाव (मकर): ।।।। १०
  • ९ भाव (धनु): ।।। ९
  • १० भाव (वृश्चिक): ।।।।। ७ श
  • ११ भाव (तुला): ।७
  • १२ भाव (कन्या): ।।।।। ६] अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- गुरोर्लग्रेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।। गुरु से १।४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।। चन्द्रशुक्रौ च दुश्क्रिक्ये मन्दार्यार्काःशनिर्व्यये । सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।। २ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।। लग्नार्याऽर्केदवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः । धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।। माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः । ७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य, भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव

६०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, लग्न रेखाप्रद हैं। १० भाव में गुरु, बुध, सूर्य, शुक्र, लग्न ये रेखाप्रद हैं। शुक्र से १ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र ये ३ रेखाप्रद हैं। २ भाव में भी लग्न, शुक्र, चन्द्र रेखाप्रद हैं।।६२।। गुरुभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. सं. ५६ गुरोरष्टकवर्गः

बृ.शु.श.सू.चं.मं.बु.ल.
१२
१०११
१११०
१०१११०
१११०१११०
११११

[गुरोरष्टकवर्ग चक्रम्]

  • लग्न (१): ।।।। बु ५ वृ
  • द्वितीय (२): ।।।। सू. ४
  • तृतीय (३): ।।। शु. ३ चं
  • चतुर्थ (४): ।।।।।।। ४
  • पञ्चम (५): ।।।।। २
  • षष्ठ (६): ।।।।। १२
  • सप्तम (७): ।।।।।। मं ११
  • अष्टम (८): ।।।। १०
  • नवम (९): ।।। ९
  • दशम (१०): ।।।।।।।। १०
  • एकादश (११): ।।।।।। ८ श
  • द्वादश (१२): ।।।।। ६

अथ भृगोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- लग्नशुक्रेन्दवस्ते ते ज्ञार्कारास्ते ज्ञवर्जिताः ।।६३।। ३ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र, बुध, शनि, भौम ये ६ ग्रह रेखाप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, शुक्र, चंद्र, भौम, सूर्य ये रेखाप्रद हैं।।६३।। सुतभे लग्नशशिजशशांकायर्किभार्गवाः । ज्ञारौ शून्यं सिताकेंदुगुरुलग्नशनैश्चराः ।।६४।। ५ भाव में लग्न, चंद्र, बुध, गुरु, शनि, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। ६ भाव में बुध, भौम रेखाप्रद हैं। ७ भाव में शून्यरेखा। ८ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, गुरु, लग्न, शनि ये रेखाप्रद हैं।।६४।। सर्वे रविं बिना शुक्रगुरुमन्दाश्च मानभे । सर्वे कुजेन्दुरवयः क्रमाद्भृगुसुतस्य च ।।६५।। ९ भाव में चंद्र, भौम, गुरु, बुध, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में शुक्र, शनि रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद हैं। १२ भाव में भौम, चंद्र, सूर्य ये रेखाप्रद हैं।।६५।।

४. अष्टकवर्ग, सुदर्शन चक्र, शान्ति-विधान, ग्रह-जाप एवं होरा शास्त्र उपसंहार

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०९ भृगुभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. सं. ५२ भृगोरष्टकवर्गः

शु.शं.सू.चं.मं.बु.बृ.ल.
११
१२
१०
११११११
१०१२
११
१०११११
१११२

अथ शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- शनेः रवितनू सूर्यो लग्नेन्दुकुजसूर्यजाः । लग्नाकौ जीवमन्दाराः सर्वे सूर्य बिना क्षते ॥६६॥ शनि से १ भाव में सूर्य, लग्न ये दोनों रेखाप्रद हैं। २ भाव में सूर्य। ३ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि रेखाप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, सूर्य रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शनि, भौम रेखाप्रद हैं। ६ भाव में चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं।।६६।। अंर्कोऽर्कजौ बुधोऽर्कारितनुज्ञाः सकलाश्चताः । कुजज्ञगुरुशुक्राश्च क्रमात्स्थानमिदं विदुः ॥६७॥ ७ भाव में सूर्य। ८ भाव में सूर्य, बुध रेखाप्रद हैं। ९ भाव में बुध। १० भाव में सूर्य, भौम, लग्न, बुध रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद है। १२ भाव में भौम, बुध, गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं।।६७।। शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे सं. ३९ शनेरष्टकवर्गः

श.सू.चं.मं.बु.बृ.शु.ल.
११
१११११२
१११०१०१२
१११११०
१०१२१२११
११

६१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ लग्नस्य भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- अथ स्थानं प्रवक्ष्यामि लग्नस्य द्विजपुंगव ॥६८॥ हे मैत्रेय! रेखा को ही स्थान कहते हैं। लग्न के रेखाप्रद ग्रहों को कह रहा हूँ॥६८॥ आर्किज्ञशुक्रगुर्वाराः सौम्य देवेज्यभार्गवाः । हित्वा सौम्यगुरु शेषाः सूज्ञेज्यभृगुसूर्यजाः ॥६९॥ लग्न भाव में शनि, बुध, शुक्र, गुरु, भौम ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। २ भाव में बुध, गुरु, शुक्र ये रेखाप्रद हैं॥६९॥ तथा जीवभृगुवुधौ सर्वे शुक्रं बिना क्षते । जीव एकस्तथा द्यूने मृतौ सौम्यभृगू तथा ॥७०॥ ३ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र, शनि रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं। ६ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शनि लग्न रेखाप्रद हैं।

अष्टकवर्गाध्यायः । ६११ करणं विन्दुवत्प्रोक्तं स्थानं रेखा तथोच्यते । मुनिदिग्वसुवेदादिगिष्वद्र्यष्टनवेषवः ॥७२॥ रूद्रार्का वर्गाणामेषाद्द्विविषयेऽष्टवायवः । पंक्तिस्वरेषवः सूर्याद्गिर्गुणा प्रोच्यते बुधैः ॥७३॥ करण का स्वरूप विन्दु (शून्य) का है और स्थान का स्वरूप रेखा के (।) सदृश है। मेषादि राशियों का क्रम से ७।१०।८।४।१०।५।७।८।९।५।११।१२ ये गुणक हैं। और सूर्यादि ग्रहों को ५।५।८।५।१०।७।५ ये गुणक हैं॥७२- ७३॥ राशिगुणकबोधकचक्रम्।

मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.राशयः
१०१०१११२गुणकः
ग्रहगुणकबोधकचक्रम्।
सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ग्रहाः
:---::---::---::---::---::---::---::---:
१०.५गुणकः
करणस्थान लेखनविधिः-
नव रेखालिखेदूर्ध्वास्तिर्यग्रेखास्त्रयोदश ।
तदा तु षण्णवतिः स्युः ग्रहयोगे पदानि च ॥७४॥
नव रेखा ऊर्ध्वाधर (खड़ी) और तेरह रेखा आड़ी (तिरछी) लिखने से ९६
कोष्ठ का चक्र ग्रहों के योग के लिये बन जाते हैं॥७४॥
तस्याशुभस्य विन्यस्य चाष्टवर्गं ततः क्रमात् ।
त्रिकोणेकाधिपत्यस्य कुर्याच्छोधनकं बुधः ॥७५॥
पूर्वोक्त अशुभ सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम में सम्पर्क रखनेवाले पूर्वोक्त पापग्रहों
का अष्टवर्ग रखकर त्रिकोण और एकाधिपत्य शोधन करें। त्रिकोण स्थान ३ होते
हैं अर्थात् १।५।९ इसी का संशोधन करना॥७५॥
इति पाराशर होरायामुत्तरभागे प्रथमोध्यायः।

६१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ द्वितीयोऽध्यायः भावसाधनम् - लग्नं सुखात् सुखं कामात् कामं खात् खं च लग्नतः । त्र्यंशमेकद्विगुणितं युज्याल्लग्नादिषु क्रमात् ॥१॥ लग्न को सुख भाव से घटाना, सुख भाव को सातवें भाव से, सातवें भाव को दशम भाव से और दशम भाव को लग्न से घटाकर शेष का तृतीयांश लेकर क्रम से १ और २ से गुणकर पूर्व के भावों में जोड़ने से आगे के दो भाव हो जाते हैं। अर्थात् लग्न को सुखभाव से घटाकर शेष का तृतीयांश एक से गुणकर लग्न में जोड़ने से द्वितीय भाव और तृतीयांश को २ से गुणकर लग्न में जोड़ने से तृतीय भाव होता है॥१॥ पूर्वापरयुतेरर्ध संधिः स्याद्द्वयोर्द्वयोः । एवं द्वादशभावास्तु भवन्ति च ससंधयः ॥२॥ पूर्वभाव और आगे के भाव का योग कर आधा करने से भाव का संधि होती है। इस प्रकार संधि के सहित १२ भाव होते हैं॥२॥ उदाहरण-जैसे संवत् २०१३ श्रावण कृष्ण १३ शनिवासरे पुनर्वसुभे प्रथमचरणे इष्टम ३२।२८।३० जन्मलग्नम् ९।१७।५०।१४। स्पष्टग्रह । जन्माङ्कम् । | सू. | चं | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | | ३ | २ | १० | ४ | ४ | २ | ७ | | १८ | २२ | १२ | ५ | १२ | २ | ३ | | २६ | ३० | ३२ | २२ | ५ | ३ | ४० | | ३४ | ४७ | ८ | ५९ | ५० | ५ | ५२ | [जन्माङ्क चक्र (कुण्डली): प्रथम भाव (लग्न): १०; द्वितीय भाव: ११ मं; तृतीय भाव: १२; चतुर्थ भाव: १; पञ्चम भाव: के २; षष्ठ भाव: शु ३ चं; सप्तम भाव: सू. ४; अष्टम भाव: बु ५ बृ; नवम भाव: ६; दशम भाव: ७; एकादश भाव: रा ८ श; द्वादश भाव: ९] भावस्पष्ट का उदाहरण- सुख भाव राश्यादि १।१।२९।४ इसमें लग्न राश्यादि ९।१७।५०।१४ को घटाया तो शेष ३।१३।३८।५० शेष रहा इसमें तीन से भाग देने से लब्धि राश्यादि १।४।३२।५६ हुई इसे लग्न में जोड़ने से राश्यादि १०।२२।२३।१० धनभाव हुआ। पुनः लब्धि को २ से गुणा देने से राश्यादि २।९।५।५३।२० हुआ इसे लग्न में जोड़ने से राश्यादि ११।२६।५६।७ यह सहजभाव हुआ। लग्न और धनभाव को जोड़कर आधा करने से ४।५।६।४२ यह दोनों भावों के बीच की संधि हुई। इसी प्रकार अन्य भावों का भी साधन करना चाहिये। लग्न से ६ भावों में ६ राशि जोड़ने से शेष ६ भाव और उनकी संधियां हो जाती हैं शेष चक्र में स्पष्ट है।

. * बु.: सू. चं. बृ. शु. श. * बृ.: सू. चं. बु. शु. श. * शु.: सू. चं. बु. बृ. * श.: मं. बु. बृ. * Row: शत्रवः (labeled vertically at right: शत्रवः) * सू.: मं. श. * चं.: मं. शु. * मं.: सू. चं. बु. बृ. शु. * बु.: मं. (Wait! What is below मं.? Is there a बु.? Wait! Look at that cell: under मं. there is बु.? Wait, look at column 4 under शत्रवः: Top is मं. Bottom is बु. WAIT! Why would बु. be there? Wait, let's look at the planetary positions in this chart!) Where are the planets located in this horoscope? Let's check the previous/next context or calculate from the Bhava positions: Sun is in 10s (Kumb

६१४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ दृष्टिवलसाधनम् – दृश्याद्विशोध्य द्रष्टारं षड्राशिभ्योऽधिकंभवेत् । दिग्भ्यो विशोध्य द्वाभ्यां तु भागीकृत्य चदृष्टयः ॥३।। जो ग्रह जिस ग्रह को देखता हैं उसे द्रष्टा कहते हैं; जिसे देखता हैं उसे दृश्य कहते हैं। दृश्य ग्रह में द्रष्टाग्रह को घटा देना शेष राशि स्थान में ६ से अधिक बचे तो उसे १० में घटाकर शेष में दो से भाग देने से दृष्टि होती है।।३।। द्रष्टाग्रह।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
सू.<br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br><br>४५<br>४५
चं.<br><br><br><br><br>२०<br><br><br><br><br><br><br><br>३५<br>
मं.<br>४७<br>५८<br>५०<br><br><br><br>५६<br>२६<br>५९<br>२२<br>२४<br>४६<br>५६<br>
बु.<br><br><br><br>२६<br>४५<br>४१<br><br><br><br><br>१८<br>५९<br>५४<br>३६
बृ.<br><br><br>१०<br>१०<br><br><br><br><br><br><br>२५<br>४७<br>३९<br>४०
शु.<br><br><br><br><br>४०<br>२९<br><br><br><br><br><br><br>४५<br>१८
श.<br>३७<br>५२<br><br><br>१९<br>५६<br>४२<br>१७<br>११<br><br><br><br><br>
शुभ-<br>योग<br><br><br>१६<br>३६<br>४६<br>१२<br><br><br><br><br>५०<br><br>३४<br>४१
पाप-<br>योग<br>२५<br>५०<br>५०<br><br>१९<br>५६<br>३८<br>४३<br>१०<br>२२<br>३४<br>४६<br>४१<br>५०

अथ द्वितीयोऽध्यायः। ६१५ दृग्बलचक्र।

सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ग्रह
°°°°°°°अंश
२१३३१७१८क.
२७२१४८४१३५२०१३विक
ऋ.ऋ.ध.ऋ.ऋ.ध.ध.सं.
शराधिके विनाराशिं भागाद्विघ्नाश्च दृष्टयः ।
वेदाधिके त्यजेद्भूताद्भागाद्दृष्टिस्त्रिभाधिके ॥४॥
यदि शेष ५ से अधिक बचे तो राशि को छोड़कर शेष अंशादि को दूना करने
से दृष्टि होती है। चार से अधिक शेष बचे तो ५ में घटा दे शेष राशि को छोड़कर
अंशादि दृष्टि होती है॥४॥
विशोध्यार्णवतो द्वाभ्यां लब्धस्त्रिंशद्युतं भवेत् ।
कराधिके विनाराशिं भागास्तिथियुतं भवेत् ॥५॥
यदि शेष तीन से अधिक बचे तो उसे चार राशि में घटाकर दो से भाग देकर
लब्ध में ३० जोड़ देने से दृष्टि होती है। शेष दो से अधिक हो तो राशि को छोड़कर
अंश में १५ जोड़ देने से दृष्टि होती है॥५॥
रूपाधिके बिना राशिं भागा द्वाभ्यांविभाजिताः ।
त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे क्रमादथ ॥६॥
शरवेदा खरामाश्च तिथयो योजिताः क्रमात् ।
शनिदेवेज्य भौमानामादौ दृष्टिः स्फुटा भवेत् ॥७॥
यदि द्रष्टा दृश्य का अन्तर एक से अधिक हो तो राशि को छोड़कर अंशादि
को २ से भाग देने से लब्धि तुल्य दृष्टि होती है। शनि की तृतीय दशम दृष्टि हो
तो ४५, गुरु के त्रिकोण दृष्टि में ३० और मंगल के चतुरस्र (४।८) दृष्टि में दृष्टि
फल में १५ और जोड़ देने से स्पष्ट दृष्टि होती है॥६-७॥
उदाहरण- जैसे द्रष्टा सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ दृश्य भौम राश्यादि
१०।१२।३२।८ दृश्य में द्रष्टा को घटाने से शेष राश्यादि ६।२४।५।३४ हुआ
यह ६ से अधिक है अतः इसे १० में घटाने से शेष राश्यादि ३।५।५४।२६
हुआ राशि का अंश बनाकर अंश जोड़कर २ से भाग देने लब्धि ०।४७।५८ यह
भौम पर सूर्य की दृष्टि हुई इसी प्रकार अन्य ग्रहों का दृष्टि साधन करना शेष चक्र
से स्पष्ट है।
उच्चबल साधन।
नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् ।
भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं फलमुच्चबलं भवेत् ॥८॥

६१६ • वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ग्रह में उसके नीच राश्यादि को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक हो तो १२ राशि में घटाकर शेष का अंश बनाकर उसमें तीन का भाग देने से फल उच्चबल होता है॥८॥ उदाहरण- जैसे सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ इसका नीच राश्यादि ६।१० है इसको सूर्य में घटाने से शेष राश्यादि ९।८।२६।३४ बचा यह ६ राशि से अधिक इसलिये इसे १२ राशि में घटाने से शेष २।२१।३३।२६ बचा इसमें राशि का अंश बनाकर ३ से भाग देने से २७।११।८ यह सूर्य का उच्चबल हुआ शेषचक्र में स्पष्ट हैं। उच्चबलचक्र।

सू.चं.म.बु.बृ.शु.श.ग्रह
°°°°°°°अंश
२७४३५५४६४९३८५५कला
२१३०४७५२१९४६विक
सप्तवर्गज बल साधन
मूलत्रिकोणस्वर्क्षाधिमित्रमित्रसमारिषु ।
अधिशत्रुगृहे चापि स्थितानां क्रमशोबलम् ॥९॥
भूताब्धयः खरामाश्च नखास्तिथिर्दिशो युगाः ।
ग्रह अपने मूलत्रिकोण राशि में हो तो ४५, अपने राशि में हो तो ३०, अपने
अधिमित्र की राशि में हो तो २०, अपने मित्र की राशि में हो तो १५, सम की
राशि में हो १०, शत्रु की राशि में हो तो ४ और अधिशत्रु की राशि में हो तो
२ बल प्राप्त करता है॥९॥ स्पष्टार्थ चक्र को देखिये।
सप्तवर्गजबलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
:---::---::---::---::---::---::---::---:
१५<br>१०<br>१०<br>२०<br>२०<br>१०<br>१०<br>ग्रहबल
२०<br>३०<br>१०<br>२०<br>२०<br>१०<br><br>होराबल
१०<br><br><br>२९<br>३०<br>२०<br>१०<br>द्रेष्काबल
१०<br><br>३०<br>३०<br>१०<br>२०<br>१०<br>सप्तमांबल
२०<br><br>१०<br>२०<br>२०<br>३०<br><br>नवमांबल
<br>१५<br>१०<br>२०<br>१५<br>२०<br>१५<br>द्वादशांबल
१५<br>२०<br>१०<br>१५<br>३०<br>१५<br>१०<br>त्रिंशांशबल
४३<br>९५<br>८२<br>१४५<br>१४५<br>१३५<br>५९<br>वलैक्यबल.

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१७

गेहाङ्गम्।

  • लग्नम् (१०)
  • द्वितीयम् (११) : मं.
  • तृतीयम् (१२)
  • चतुर्थम् (१)
  • पञ्चमम् (२)
  • षष्ठम् (३) : चं., शु.
  • सप्तमम् (४) : सू.
  • अष्टमम् (५) : बु., वृ.
  • नवमम् (६)
  • दशमम् (७)
  • एकादशम् (८) : श.
  • द्वादशम् (९)

होराङ्गम्।

  • लग्नम् (५) : बु., मं., शु., वृ.
  • द्वितीयम् (६)
  • तृतीयम् (७)
  • चतुर्थम् (८)
  • पञ्चमम् (९)
  • षष्ठम् (१०)
  • सप्तमम् (११)
  • अष्टमम् (१२)
  • नवमम् (१)
  • दशमम् (२)
  • एकादशम् (३)
  • द्वादशम् (४) : सू., चं., श.

द्रेष्काणाङ्गम्।

  • लग्नम् (२)
  • द्वितीयम् (३) : मं., शु.
  • तृतीयम् (४)
  • चतुर्थम् (५) : बु.
  • पञ्चमम् (६)
  • षष्ठम् (७) : सू.
  • सप्तमम् (८) : श.
  • अष्टमम् (९) : वृ.
  • नवमम् (१०)
  • दशमम् (११) : चं.
  • एकादशम् (१२)
  • द्वादशम् (१)

सप्तमांशांगम्।

  • लग्नम् (८) : चं.
  • द्वितीयम् (९)
  • तृतीयम् (१०)
  • चतुर्थम् (११)
  • पञ्चमम् (१२)
  • षष्ठम् (१) : मं.
  • सप्तमम् (२) : श.
  • अष्टमम् (३) : शु.
  • नवमम् (४)
  • दशमम् (५)
  • एकादशम् (६) : बु.
  • द्वादशम् (७) : वृ., सू.

नवमांशांगम्।

  • लग्नम् (३)
  • द्वितीयम् (४) : श., वृ.
  • तृतीयम् (५)
  • चतुर्थम् (६)
  • पञ्चमम् (७) : शु.
  • षष्ठम् (८)
  • सप्तमम् (९)
  • अष्टमम् (१०) : मं.
  • नवमम् (११)
  • दशमम् (१२) : सू.
  • एकादशम् (१) : चं.
  • द्वादशम् (२) : बु.

द्वादशांगम्।

  • लग्नम् (६)
  • द्वितीयम् (७) : बु.
  • तृतीयम् (८)
  • चतुर्थम् (९) : श.
  • पञ्चमम् (१०) : सू., वृ.
  • षष्ठम् (११)
  • सप्तमम् (१२) : चं.
  • अष्टमम् (१)
  • नवमम् (२)
  • दशमम् (३) : शु.
  • एकादशम् (४) : मं.
  • द्वादशम् (५)

त्रिंशांशांगम्।

  • लग्नम् (१२)
  • द्वितीयम् (१) : शु.
  • तृतीयम् (२) : श., चं.
  • चतुर्थम् (३) : सू.
  • पञ्चमम् (४)
  • षष्ठम् (५)
  • सप्तमम् (६)
  • अष्टमम् (७)
  • नवमम् (८)
  • दशमम् (९) : मं., वृ.
  • एकादशम् (१०)
  • द्वादशम् (११) : वृ.

६१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युग्मायुग्मबल- द्वाविन्दुशुक्रौ युग्मांशे तिथिरोजांशगाः परे ।।१०।। चन्द्रमा और शुक्र समराशि या समराशि के नवांश में हों तो १५ बल अर्थात् दोनों में हो तो ३० बल पाते हैं, अन्य ग्रह सूर्य, भौम, बुध, गुरु, शनि ये विषम राशि या विषम राशि के नवांश में हों तो १५ बल पाते हैं।।१०।। युग्मायुग्मबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
१५१५१५१५१५कला
विकला

केन्द्रादि द्रेष्काणबल- केन्द्रादिषुस्थिता लग्नात्षष्टिस्त्रिंशत्तिथिः क्रमात् । आदिमध्यावसानेषु द्रेष्काणेषु स्थिताः क्रमात् ।।११।। केन्द्रादि अर्थात् केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में ग्रह हो तो क्रम से ६०, ३० १५ बल पाता है।।११।। पुंन्नपुंसकयोषाख्या दद्युस्तिथिबलं ग्रहाः । स्वषड्वर्गगतास्त्रिंशदेवं स्थानबलं विदुः ।।१२।। पुरुष ग्रह (सूर्य, भौम, गुरु) प्रथम द्रेष्काण में, नपुंसक ग्रह (बुध, शनि) दूसरे द्रेष्काण में और स्त्रीग्रह (चंद्र, शुक्र) तीसरे द्रेष्काण में १५ बल पाते हैं। विशेष- यदि ग्रह अपने षड्वर्ग में हों तो द्रेष्काण में ३० बल पाता है। इस प्रकार पूर्व के सभी बलों को मिलाने से ग्रह का स्थान बल होता है।।१२।।

केन्द्रादिबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
१५३०३०३०१५३०

द्रेष्काणबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
१५

उच्चबल + सप्तवर्गजबल + युग्मायुग्मबल + केन्द्रादिबल + द्रेष्काणबल = स्थान बल।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१९ स्थानबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
२५४८५७५६५९२४कला
११३०४७५२१९४०विकला
दिग्बल।
अर्कात्कुजात्सुखं जीवाज्ज्ञाच्चास्तं लग्नमार्कतः ।
मध्यलग्नं भृगोश्चंद्राद्वित्वा षड्भाधिके सति ।।१३।।
चक्राद्विशोध्य रामाप्तं भागीकृत्य च तद्बलम् ।
सूर्य और मंगल से सुखभाव को, गुरु और बुध से सप्तम भाव को, शनि
से लग्न को, शुक्र और चन्द्र से दशम लग्न को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक
हो तो।।१३।।
इसको १२ राशि में घटाकर शेष का अंश कर ३ से भाग देने से दिग्बल
होता है।।१३।।
दिग्बलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
------------------------
१५४२२६४९२५अंश
३९५९१८५०२०४८कला
१०२५५८५५१४३९विकला
कालबल नतोन्नबल।
आमध्याह्नादर्धरात्राद्विवारात्रिरिति क्रमात् ।।१४।।
अर्कभार्गवसूरीणांद्विघ्ना नाड्योर्गता दिवा ।
भौमचन्द्रशनीनां तु षष्ठिभ्यो वर्जयेदिमाः ।।१५।।
मध्याह्न से अर्धरात्रि के अन्दर इष्टकाल हो तो नत को दूना करने से सूर्य,
शुक्र और गुरु का नतवल होता हैं और इसे ६० में घटाने से मंगल, चन्द्र, शनि
का दिवावल होता है। अर्धरात्रि से मध्याह्न के अंतर का इष्टकाल हो तो उन्नत घटी
का दूना करने से चन्द्र, मंगल शनि का रात्रिवल होता है और इसे ६० में घटाने
से सूर्य, शुक्र, गुरु का रात्रिवल कलात्मक होता है और बुध का सदैव १ अंशवल
होता है।।१४-१५।।
उदाहरण- नतकाल १३।१३।३० को २ से गुण देने से २६।२७ यह
चन्द्रमा, भौम शनि का बल हुआ और उन्नत घट्यादि १६।४७।३० को दो से
गुण देने से सूर्य, गुरु, शुक्र का बल हुआ शेष चक्र में स्पष्ट है।

६२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नतोन्नतबल।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
३३२६२६३३३३२६कला
३५२७२७३५३५२७विक.
पक्षबल-
दिवाबलमिति प्रोक्तं बलं नैशं ततोऽन्यथा ।
षष्टिरेव सदाज्ञस्य चन्द्रादर्कं विशोध्य च ।।१६।।
अङ्गाधिके विशोध्यार्काद्भागीकृत्य त्रिभिर्भजेत् ।
पक्षकंबलमिन्दुज्ञशुकार्याणां तु षष्ठितः ।।१७।।
चन्द्रमा में सूर्य को घटा दे यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२
में घटाकर शेष का अंश बनाकर ३ से भाग देने से लब्ध चन्द्र, बुध, शुक्र और
गुरु का पक्षबल होता है और इसे ६० में घटा देने से शेष ग्रह-सूर्य, भौम और
शनि का पक्षबल होता है।।१६-१७।।
उदाहरण- १।२२।३०।४७ में सूर्य २।१८।२६।३४ को घटाने से शेष
११।४।४।१३ यह ६ राशि से अधिक है इसलिये इसे १२ में घटाकर शेष
०।२५।५५।४७ में ३ का भाव देने से ०।३८।३५ यह चन्द्र, बुध, शुक्र और
गुरु का पक्षबल हुआ। इसे ६० में घटाने से शेष ०।२१।२५ यह सूर्य भौम शनि
का पक्षबल हुआ। पक्षबलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
:-::-::-::-::-::-::-::-:
अंश
२१३८२१३८३८३८२१कला
२५३५२५३५३५३५२५विक.
दिवारात्रित्रिभागबल-
हित्वामन्येषामहोमानं त्रिभागीकृत्य यत्र तु ।
जन्मलग्नतदंशाधिपतेः षष्ठिबलं भवेत् ।।१८।।
आधाने चित्तप्रवेशे तु त्रिंशद्भूतार्णवा वलम् ।
ज्ञार्कमन्देन्दुशुक्राराः पतयः सर्वदागुरुः ।।१९।।
अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि का तीन-तीन भाग करने से ६ भाग होता
है इन ६ भागों के अधिपति क्रम से बुध, सूर्य, शनि, चन्द्र, शुक्र और भौम होते
हैं। अंशाधिपति अर्थात् जिस भाग में जन्मलग्न हो उसके स्वामी का ६० कला बल
होता है। गर्भाधान में ३० और चैतन्य प्रवेश में ४५ बल होता है और गुरु का

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२१ सर्वदा १ अंश बल होता है, शेष चक्र से स्पष्ट है।।१८-१९।। दिवारात्रित्रिभागबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.वृ.शु.श.ग्रह
अंश
कला
विक.
वर्षमासदिनहोरेशबल-
वर्षमासदिनेशानां तिथि स्त्रिंशच्छरार्णवाः ।
कालहोराधिपस्यैवं पूर्णं बलमुदाहृतम् ।।२०।।
वर्ष-मास, दिन के स्वामियों का क्रम से १५, ३०, ४५ बल होता है और
कालहोरेश का पूर्ण १ अंश बल होता है। पूर्व के सभी ४ बलों का योग करने
से कालवल होता है।।२०।।
वर्षेशादि साधन
शके १८७८ श्रावण कृष्ण १३ शनिवार को कलियुगादि अहर्गण साधन।
१८७८ + ३१७९ = ५०५७ गतकलिः
१२×
६०६८४ —मास
३ —गतमास
६०६८७
७०)६०६८७(८६६     ६०६८७     ६०६८७
५६०          ८६६      १८६५
---         -------      ------
४६८       ३३)६१५५३(१८६५   ६२५५२
४२०        ३३         ३०
---        ----       ---------
४८७        २८५      १८७६५६०
४२०        २६४        २७ गति
---        ----      ---------
६७        २१५      १८७६५८७
१९८        ×११
----      ---------
१७३    ७०३)२०६४२४५७(२९३६३
१६५      १४०६
---      -----
८      ६५८२
६३२७

२५५४ २१०९

४४५५ ४२१८

२३७७ २१०९

१८७६५८७              २६८ २९३६३

१८४७२२४ १

१८४७२२५ अहर्गणः।

६२२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वर्षेश-मासेश साधन। अहर्गण—३७३ / २५२० = ल + शे शेष / ३६० ल.। शेष / ३० = ल×३+१ / ७ = शेष = वर्षेश ल×२+१ / १२ = शेष = मासेश इसके अनुसार १८४७२२५ ३७३ २५२०) १८४६८५२ (७३२ ३६०) २२१२ (६ ३०) २२१२ (७३० ल. १७६४० २१६० २१० ८२८५ ५२ ११२ ७५६० ९० ७२५२ २२ ५०४० ६×३+१ / ७ = ५ वर्षेश = गुरु २२१२ शेष ७३×२+१ / १२ = ३ मासेश = भौम इस प्रकार से वर्षेश गुरु और मासेश भौम हुये। जिस दिन जन्म होता है वही वारेश होता है। कालहोरेश साधन उक्त दिन बार प्रवृत्ति सूर्योदय के बाद २ घटी १२ पल पर हुई है अतः बार प्रवृत्ति से इष्ट घटी ३०।१६ हुआ। (३०।१६ × २) / ५ = ल. = १२, शे. = ०।३२ (६०।३२ - ०।३२ + १) / ७ = ५७ दिनपति से ५ वाँ भौम काल होरेश हुआ। वर्षेशादिबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
३०१५४५कला
विकला
नतोन्नतबल + पक्षबल + त्रिभागबल + वर्षेशादिबल = कालबल।

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२३ कालबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
५४५४१७३८२७१२३२कला
५०५२५२२५५२विकला
अयनबलसाधन-
आधाने चित्रवेशे तु त्रिंशच्छरजलकराः ।
सायनांशग्रहभुजराशीनिष्खब्धिभिः सुरैः ।।२१।।
सूर्यैर्हत्वा क्रमाद्राशिभागः स्यादा्नुपातः ।
एवं राश्यादिके युंज्यादर्करायोर्शनः सु च ।।२२।।
राशित्रयमथो युंज्यान्मेषादिस्थेषु तेष्वथ ।
तुलादिस्थेषु राश्यादींस्त्रिराशिभ्यस्तु वर्जयेत् ।।२३।।
चन्द्राकर्योर्विपरीतं स्यात्सदा युंज्याद्बुधस्य तु ।
भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं ग्रहाणामयनं बलम् ।।२४।।
अयनांश युत ग्रह के भुज राशि के तुल्य ध्रुवांक से ४५।३३।१२ गुण कर
३० से भाग देकर लब्धि में गतखंड को जोड़कर राश्यादि बनाकर तुलादि ६ राशि
में ३ घटा देना मेषादि ६ राशि में हो तो ३ जोड़ देना। परन्तु चन्द्र शनि में विलोम
करना अर्थात् तुलादि में जोड़ना और मेषादि में घटाना, बुध में सर्वदा ३ राशि
जोड़ना और अंश करके ३ से भाग देने से अयनबल होता है किन्तु सूर्य के बल
को दूना करने से अयन बल होता है। २१+२४।
उदाहरण- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने
से ४।१०।१७।५२ हुआ इसका भुज बनाने से १।१९।४२।८ हुआ, यहाँ पूर्वोक्त
नियम के अनुसार १ राशि का ध्रुवांक ३३ प्राप्त हुआ, इससे अंश कला विकला
को गुण देने से ६५१।६।२४ हुआ इसमें गतखंड ४५ को जोड़ देने से
९६।६।२४ इसका राशि कर मेषादि में होने से ३ राशि जोड़कर राशि के अंश
बनाकर इसमें ३ का भाग देने से लब्ध ६२।२।२ यह सूर्य का अयन बल हुआ
इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी साधन करना।
अयनबलचक्र।
सू.चं.बं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
:-::-::-::-::-::-::-::-:
१२४१७४६४२५९५३अंश.
५१११३८११५९कला
४४३०४३४५५०१५४७विकला