छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ७१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
| ७१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी अनुवाद |
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| त्मेष्यते। नन्वात्माप्यात्मशब्दे-<br>नाभिधीयते; न, “यतो वाचो<br>निवर्तन्ते” (तै० उ० २।<br>४।१)। “यत्र नान्यत्पश्यति”<br>(छा० उ० ७।२४।१)<br>इत्यादिश्रुतेः। | आत्मा माना नहीं जाता। यदि कहो कि आत्मा भी तो 'आत्मा' शब्दसे कहा ही जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि “जहाँसे वाणी लौट आती है” “जहाँ कोई और नहीं देखता” इत्यादि श्रुतिसे [उसका शब्दवाच्य न होना ही सिद्ध होता है]। |
| कथं तर्ह्यात्मैवाधस्तात्स आत्मे-<br>त्यादिशब्दा आत्मानं प्रत्या-<br>ययन्ति। | शङ्का—तो फिर “आत्मा ही नीचे है”, “वह आत्मा है” इत्यादि शब्द किस प्रकार आत्माकी प्रतीति कराते हैं ? |
| नैष दोषः; देहवति प्रत्यगा-<br>अनात्मभावात् त्मनि भेदविषये<br>सदात्मप्रत्यय प्रयुज्यमानः शब्दो<br>देहादीनामात्मत्वे प्रत्याख्याय-<br>माने यत्परिशिष्टं सदवाच्यमपि<br>प्रत्याययति। यथा सराजिकायां<br>दृश्यमानायां सेनायां छत्रध्वज-<br>पताकादिव्यवहितेऽदृश्यमानेऽपि<br>राजन्येष राजा दृश्यत इति भवति<br>शब्दप्रयोगस्तत्र कोऽसौ राजेति | समाधान—यह कोई दोष नहीं है। भेदके विषयभूत देहधारी प्रत्यगात्मामें प्रयोग किया हुआ ['आत्मा'—यह] शब्द, देहादिका आत्मत्व निरस्त हो जानेपर जो सन्मात्र अवशिष्ट रहता है उसे—यद्यपि वह [मुख्यवृत्तिसे किसी शब्दका] वाच्य नहीं है तो भी—[लक्षणासे] उसकी प्रतीति करा देता है, जिस प्रकार कि राजाके सहित दिखायी देती हुई सेनामें छत्र, ध्वजा और पताका आदिकी ओटमें राजाके दिखायी न देनेपर भी 'ये राजा दिखायी देते हैं' ऐसा प्रयोग होता है, फिर ऐसा प्रश्न होनेपर कि 'इनमें राजा कौन है?' राजा |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१७
| भाष्य | भाष्यार्थ |
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| राजविशेषनिरूपणायां दृश्यमानेतरप्रत्याख्यातेऽन्यस्मिन्नदृश्यमानेऽपि राजनि राजप्रतीतिर्भवेत्तद्वत्। | कहलानेवाले विशेष व्यक्तिका निरूपण करनेपर अन्य दृश्यमान पुरुषोंका प्रत्याख्यान करके उनसे भिन्न राजाके साक्षात् दिखलायी न देनेपर भी राजाकी प्रतीति हो जाती है उसी प्रकार [अनात्माका बाध करके आत्माकी प्रतीति होती है]। |
| तस्मात्सोऽहं मन्त्रवित्कर्मविदेवास्मि कर्मकार्यं च सर्वं विकार इति विकारज्ञ एवास्मि नात्मविन्नात्मप्रकृतिस्वरूपज्ञ इत्यर्थः। अत एवोक्तम् "आचार्यवान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। १४। २) इति। "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २। ४। १) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च। | अतः [नारदजी कहते हैं—] वह मैं मन्त्रवेत्ता अर्थात् कर्मवेत्ता ही हूँ, कर्मका कार्य ही सारा विकार है; अतः मैं विकारज्ञ ही हूँ—आत्मज्ञ अर्थात् आत्मारूप प्रकृति (कारण) के स्वरूपको जाननेवाला नहीं हूँ। इसीसे कहा है कि "आचार्यवान् पुरुष [आत्माको] जानता है" और यही बात "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी प्रमाणित होती है। |
| श्रुतमागमज्ञानमस्त्येव हि यस्मान्मे मम भगवद्दृशेभ्यो युष्मत्सदृशेभ्यस्तरत्यतिक्रामति शोकं मनस्तापमकृतार्थबुद्धितामात्मविदित्युतः सोऽहमनात्मविद्त्वाद्धे भगवः शोचाम्यकृतार्थ- | क्योंकि मैंने आप-जैसोंसे सुना है—मुझे ऐसा शास्त्रीय ज्ञान है कि 'आत्मवेत्ता शोक—मानसिक ताप अर्थात् अकृतार्थताबुद्धिको तर जाता है—पार कर लेता है' और हे भगवन्! मैं अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक करता हूँ अर्थात् अकृतार्थ- |
७१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| बुद्ध्या संतप्ये सर्वदा तं मा मां शोकसागरस्य पारमन्तं भगवांस्तारयत्वात्मज्ञानोडुपेन कृतार्थबुद्धिमापादयत्वभयं गमयत्वित्यर्थः ।<br><br>तमेवमुक्तवन्तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा अधीतवानसि, अध्ययनेन तदर्थज्ञानमुपलक्ष्यते, ज्ञानवानसीत्येतन्नामैवैतत् ।<br><br>“वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः ॥ ३ ॥ | बुद्धिसे सर्वदा संतप्त रहता हूँ । उसे मुझको हे भगवन् ! आत्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा शोकसागरके पार—परे पहुँचा दो—मुझे कृतार्थबुद्धि प्राप्त करा दो अर्थात् अभयको प्राप्त करा दो ।<br><br>इस प्रकार कहते हुए उन (नारदजी) से सनत्कुमारजीने कहा--‘तुमने यह जो कुछ अध्ययन किया है—अध्ययनसे उसके अर्थका ज्ञान भी उपलक्षित होता है--[ अतः तात्पर्य यह है कि ] तुम जो कुछ जानते हो वह सब नाम ही है; क्योंकि “विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है” ऐसी श्रुति है ॥ ३ ॥ |
नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्देवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ॥ ४ ॥
ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या,
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१९
भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतादिकला और शिल्पविद्या-- ये सब भी नाम ही हैं तुम नामकी उपासना करो ॥ ४ ॥
| नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेद इत्यादि नामैवैतत् । नामोपास्स्व ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्ध्या । यथा प्रतिमां विष्णुबुद्ध्योपास्ते तद्वत् ॥ ४ ॥ | ऋग्वेद नाम ही है, तथा यजुर्वेद इत्यादि ये सब भी नाम ही हैं । अतः जिस प्रकार विष्णु-बुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते हैं उसी प्रकार तुम नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करो ॥ ४ ॥ |
स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥
वह जो कि नामको 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद-- ] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार-- ] 'नामसे भी अधिक है ।' [ नारद— ] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥
| स यस्तु नाम ब्रह्मेत्युपास्ते तस्य यत्फलं भवति तच्छृणु,—या- | वह जो कि 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे जो फल मिलता है वह सुनो--जहाँतक |
७२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| वन्नाम्नो गतं नाम्नो गोचरं तत्र तस्मिन्नामविषयेऽस्य यथाकामचारः कामचरणं राज्ञ इव स्वविषये भवति । यो नाम ब्रह्मेत्युपास्त इत्युपसंहारः । किमस्ति भगवो नाम्नो भूयोऽधिकतरं यद्ब्रह्मदृष्ट्यर्हमन्यदित्यभिप्रायः । सनत्कुमार आह नाम्नो वाव भूयोऽस्त्येवेत्युक्त आह यद्यस्ति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ | नामकी गति अर्थात् नामका विषय होता है वहाँतक उस नामके विषयमें इसका कामचार—स्वेच्छाचरण हो जाता है, जैसा कि राजाके अपने विषय (अधिकृत देश) में, जो 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है—यह उपसंहार है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या नामसे बढ़कर भी कुछ है ? अर्थात् जो ब्रह्मदृष्टिके योग्य हो ऐसी कोई और वस्तु भी है—ऐसा इसका अभिप्राय है ?' सनत्कुमारने कहा—'नामसे बढ़कर भी है ही।' इस प्रकार कहे जानेपर नारदने कहा—'यदि है तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
नामकी अपेक्षा वाक्की महत्ता
वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदꣳसामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यꣳराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳसर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांश्च तृणवनस्पतीञ्श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु), कीट-पतंग, पिपीलिकापर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही विज्ञापित करती है]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज्ञ
७२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्की उपासना करो ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| वाग्वाव । वागितीन्द्रियं जिह्वामूलादिष्वष्टसु स्थानेषु स्थितं वर्णानामभिव्यञ्जकम् । वर्णाश्च नामेति नाम्नो वाग्भूयसीत्युच्यते । कार्याद्धि कारणं दृष्टं लोके यथा पुत्रात्पिता तद्वत् ।<br><br>कथं च वाङ्नाम्नो भूयसी ? इत्याह—वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयत्ययम्ऋग्वेद इति । तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम् । हृदयज्ञं हृदयप्रियम् । तद्विपरीतमहृदयज्ञम् । यद्यदि वाङ्नाभविष्यद्धर्मादि न व्यज्ञापयिष्यद्वागभावेऽध्ययनाभावोऽध्ययनाभावे तदर्थश्रवणाभावस्तच्छ्रवणाभावे धर्मादि | 'वाग्वाव'—वाक् यह जिह्वामूल आदि* आठ स्थानोंमें स्थित वर्णोंको अभिव्यक्त करनेवाली इन्द्रिय है। वर्ण ही नाम हैं, इसीसे यह कहा जाता है कि नामसे वाक् उत्कृष्ट है। जिस प्रकार पुत्रसे पिता उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार लोकमें कार्यसे ही कारणकी उत्कृष्टता देखी जाती है।<br><br>नामकी अपेक्षा वाक् क्यों उत्कृष्ट है सो बतलाते हैं—वाक् ही ऋग्वेदको 'यह ऋग्वेद है' इस प्रकार विज्ञापित करती है। इसी प्रकार यजुर्वेद इत्यादिको भी—ये सब पूर्ववत् समझने चाहिये। तथा हृदयज्ञ—हृदयको प्रिय और उससे विपरीत अहृदयज्ञको भी [ वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाक् न होती तो धर्मादि विज्ञापित न होते। वाक्के अभावमें अध्ययनका अभाव हो जाता, अध्ययनके अभावमें उसके अर्थश्रवणका अभाव होता और उसके श्रवणके अभावमें धर्मादिका विज्ञान न |
* आदि शब्दसे यहाँ वक्षःस्थल, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका और तालु--इन सात स्थानोंका ग्रहण होता है।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२३
| न व्यज्ञापयिष्यन्न विज्ञातमभविष्यदित्यर्थः । तस्माद्वागेवैतच्छब्दोच्चारणेन सर्वं विज्ञापयत्यतो भूयसी वाङ्नाम्नस्तस्माद्वाचं ब्रह्मेत्युपास्स्व ॥ १ ॥ | होता अर्थात् धर्मादि विज्ञात न होते । अतः शब्दोच्चारणके द्वारा वाक् ही इन सबको विज्ञापित करती है । अतः वाक् नामसे उत्कृष्ट है, अतः तुम वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करो ॥ १ ॥ |
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स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद— ] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥२॥
| समानमन्यत् ॥ २ ॥ | शेष व्याख्या पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ॥
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तृतीय खण्ड
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वाक् की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता
मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥१॥
मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं उसी प्रकार वाक् और नामका मनमें अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा संकल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी कामना करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो ॥ १ ॥
| मनो मनस्यनविशिष्टमन्तःकरणं वाचो भूयः। तद्धि मनस्यनव्यापारवद्वाचं वक्तव्ये प्रेरयति। तेन वाङ्मनस्यन्तर्भवति। यच्च यस्मिन्नन्तर्भवति तत्तस्य | मन—मननशक्तिविशिष्ट अन्तःकरण वाणीसे उत्कृष्ट है। वह मननव्यापारयुक्त मन ही वाणीको वक्तव्य विषयमें प्रेरित करता है। अतः वाक् मनके अन्तर्गत है, और जो जिसके अन्तर्गत होता है, |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| व्यापकत्वात्ततो भूयो भवति । यथा वै लोके द्वे वामलके फले द्वे वा कोले बदरफले द्वौ वाक्षौ बिभीतकफले मुष्टिरनुभवति मुष्टिस्ते फले व्याप्नोति मुष्टौ हि ते अन्तर्भवतः । एवं वाचं च नाम चामलकादिवन्मनोऽनुभवति । | उसकी अपेक्षा वह व्यापक होनेके कारण, बड़ा होता है । लोकमें जिस प्रकार दो आँवलों; दो कोलों—बेरों अथवा दो अक्षों—बहेड़ेके फलों—को मुट्ठी अनुभव करती है—उन फलोंको मुट्ठी व्याप्त कर लेती है अर्थात् वे मुट्ठीके अन्तर्गत हो जाते हैं, उसी प्रकार उन आँवले आदिके समान वाणी और नाम—इन दोनोंको मन अनुभव करता है । |
| स यदा पुरुषो यस्मिन्काले मनसान्तःकरणेन मनस्यति मनस्यनं विवक्षाबुद्धिः कथम् ? मन्त्रानधीयीयोच्चारयेयमित्येवं विवक्षां कृत्वाथाधीते तथा कर्माणि कुर्वीयेति चिकीर्षाबुद्धिं कृत्वाथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेति प्राप्तीच्छां कृत्वा तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते पुत्रादीन्प्राप्नोतीत्यर्थः । तथेमं च लोकममुं चोपायेनेच्छेयेति | वह (यह) पुरुष जब—जिस समय मन-अन्तःकरणसे मनस्यन (कुछ कहनेकी इच्छा) करता है, मनस्यन-का अर्थ है विवक्षा-बुद्धि (कुछ कहनेकी इच्छा या विचार) किस प्रकार ? यह बताते हैं—'मैं मन्त्रोंका पाठ—उच्चारण करूँ,' इस प्रकार बोलनेकी इच्छा करके वह पाठ करता है; 'मैं कर्म करूँ,' ऐसी चिकीर्षाबुद्धि करके कर्म करता है; तथा 'मैं पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ,' इस प्रकार उनकी प्राप्तिकी इच्छा करके उनकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान कर उनकी इच्छा करता है अर्थात् उन पुत्रादिको प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार 'मैं इस लोक और परलोक-को उपायद्वारा [ प्राप्त करना ] |
७२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते प्राप्नोति ।<br>मनो ह्यात्मात्मनः कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सति मनसि नान्यथेति मनो ह्यात्मेत्युच्यते । मनो हि लोकः सत्येव हि मनसि लोको भवति तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानं चेति मनो हि लोको यस्मात्तस्मान्मनो हि ब्रह्म । यत एवं तस्मान्मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | चाहूँ" ऐसे संकल्पपूर्वक उनकी प्राप्तिके उपायद्वारा उन्हें चाहता अर्थात् प्राप्त कर लेता है।<br>मन ही आत्मा है; क्योंकि मनके रहनेपर ही आत्माका कर्तृत्व-भोक्तृत्व सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं; इसीसे 'मन ही आत्मा है' ऐसा कहा जाता है। मन ही लोक है; क्योंकि मनके रहनेपर ही लोक और उसकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान होता है। इस प्रकार क्योंकि मन ही लोक है, इसलिये मन ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा है इसलिये मनकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है?' [सनत्कुमार—] 'मनसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवन्! मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ २ ॥
| स यो मन इत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | 'स यो मनः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
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मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता
संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
संकल्प ही मनसे बढ़कर है। जिस समय पुरुष संकल्प करता है तभी वह मनस्यन (बोलनेकी इच्छा) करता है और फिर वाणीको प्रेरित करता है। वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममें सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥१॥
| संकल्पो वाव मनसो भूयान्। | संकल्प ही मनसे बढ़कर है। |
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| संकल्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकरणवृत्तिः, कर्त्तव्याकर्त्तव्यविषयविभागेन समर्थनम्। विभागेन हि समर्थिते विषये चिकीर्षाबुद्धिर्मनस्यनं भवति। कथम् ? यदा वै संकल्पयते कर्त्तव्यादिविषयान् विभजत इदं कर्तुं युक्तमिति। अथ मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यादि। अथानन्तरं वाचमीरयति | मनस्यनके समान संकल्प भी अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, यानी कर्तव्य और अकर्तव्य विषयोंका विभागपूर्वक समर्थन ही संकल्प है। इस प्रकार विषयका विभागपूर्वक समर्थन होनेपर ही चिकीर्षाबुद्धि यानी मनस्यन होता है। सो किस प्रकार ?—जिस समय पुरुष संकल्प करता है अर्थात् 'यह करना चाहिये' इस प्रकार कर्तव्यादि विषयोंका विभाग करता है तभी वह सोचता है 'मैं मन्त्रोंका पाठ करूँ' इत्यादि। इसके पश्चात् वह मन्त्रादिका उच्चारण करनेमें |
७२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| मन्त्राद्युच्चारणे । तां च वाचम् नाम्नि नामोच्चारणनिमित्तं विवक्षां कृत्वेरयति नाम्नि नामसामान्ये मन्त्राः शब्दविशेषाः सन्त एकं भवन्त्यन्तर्भवन्तीत्यर्थः । सामान्ये हि विशेषोऽन्तर्भवति ।<br><br>मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्ति, मन्त्रप्रकाशितानि कर्माणि क्रियन्ते नामन्त्रकमस्ति कर्म । यद्धि मन्त्रप्रकाशनेन लब्धसत्ताकं सत्कर्म ब्राह्मणेनेदं कर्तव्यमस्मै फलायेति विधीयते। याप्युत्पत्तिर्ब्राह्मणेषु कर्मणां दृश्यते सापि मन्त्रेषु लब्धसत्ताकानामेव कर्मणां स्पष्टीकरणम् । न हि मन्त्राप्रकाशितं कर्म किञ्चिद्ब्राह्मणे उत्पन्नं दृश्यते । त्रयोविहितं कर्मेति | वाणीको प्रेरित करता है । और उस वाणीको नाममें अर्थात् नामोच्चारणनिमित्तक विवक्षा करके नाममें प्रेरित करता है तथा नामरूप सामान्यमें मन्त्र, जो शब्दविशेष ही हैं, एक होते हैं अर्थात् उसके अन्तर्भूत होते हैं; क्योंकि सामान्यमें विशेषका अन्तर्भाव होता है ।<br><br>मन्त्रोंमें कर्म एकरूप हो जाते हैं। मन्त्रोंसे प्रकाशित कर्म ही किये जाते हैं, मन्त्रहीन कोई भी कर्म नहीं है । [ यदि कहो कि कर्मोंका विधान तो ब्राह्मणभागमें भी है, फिर ऐसा कैसे माना जा सकता है कि कर्म मन्त्रप्रकाशित ही हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ] जिस सत्कर्मको मन्त्रोंके प्रकाशित करनेसे सत्ता प्राप्त हुई है ब्राह्मणोंने उसीका ‘इसे अमुक फलके लिये करना चाहिये’ इस प्रकार विधान किया है । इसके सिवा ब्राह्मणोंमें जो कर्मोंकी उत्पत्ति देखी जाती है वह भी मन्त्रोंमें सत्ता प्राप्त किये हुए कर्मोंका ही स्पष्टीकरण है; मन्त्रोंसे अप्रकाशित कोई भी कर्म ब्राह्मणभागमें उत्पन्न हुआ नहीं देखा |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
| प्रसिद्धं लोके । त्रयीशब्दश्च ऋग्यजुःसामसमाख्या । "मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यन्" (मु० उ० १ । २ । १) इति चाथर्वणे । तस्माद्युक्तं मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्तीति ॥ १ ॥ | जाता। लोकमें यह बात प्रसिद्ध ही है कि 'कर्म त्रयीविहित है' और 'त्रयी' शब्द ऋक्-यजुः-सामका ही नाम है। "विद्वानोंने जिन कर्मोंको मन्त्रोंमें देखा" ऐसा आथर्वणोपनिषद्में कहा भी है। अतः यह कहना कि 'मन्त्रोंमें सब कर्म एकरूप हो जाते हैं, ठीक ही है ॥ १ ॥ |
तानि ह वा एतानि संकल्पैकायनानि संकल्पात्मकानि संकल्पे प्रतिष्ठितानि समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाकाशं च समकल्पन्तापश्च तेजश्च तेषाँ१सङ्क्लृप्त्यै वर्षँ१संकल्पते वर्षस्य संक्लृप्त्या अन्नँ१संकल्पतेऽन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः संकल्पन्ते प्राणानाँ१संक्लृप्त्यै मन्त्राः संकल्पन्ते मन्त्राणाँ१संक्लृप्त्यै कर्माणि संकल्पन्ते कर्मणाँ१संक्लृप्त्यै लोकः संकल्पते लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वँ१संकल्पते स एष संकल्पः संकल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
वे ये (मन आदि) एकमात्र संकल्परूप लयस्थानवाले, संकल्पमय और संकल्पमें ही प्रतिष्ठित हैं। द्युलोक और पृथिवीने मानो संकल्प किया है। वायु और आकाशने संकल्प किया है; जल और तेजने संकल्प किया है। उनके संकल्पके लिये वृष्टि समर्थ होती है [अर्थात् उन द्युलोकादिके संकल्पसे वृष्टि होती है ], वृष्टिके संकल्पके लिये अन्न समर्थ होता है, अन्नके संकल्पके लिये प्राण समर्थ होते हैं, प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ
७६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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होते हैं, मन्त्रोंके संकल्पके लिये कर्म समर्थ होते हैं, कर्मोंके संकल्पके लिये लोक (फल) समर्थ होता है और लोकोंके संकल्पके लिये सब समर्थ होते हैं। वह (ऐसा) यह संकल्प है; तुम संकल्पकी उपासना करो ॥ २ ॥
| तानि ह वा एतानि मनआदीनि संकल्पैकायनानि संकल्प एकोऽयनं गमनं प्रलयो येषां तानि संकल्पैकायनानि। संकल्पात्मकान्युत्पत्तौ संकल्पे प्रतिष्ठितानि स्थितौ समक्लृपतां संकल्पं कृतवत्याविव हि द्यौश्च पृथिवी च द्यावापृथिवी द्यावापृथिव्यौ निश्चले लक्ष्येते। तथा समकल्पेतां वायुश्चाकाशं चैतावपि संकल्पं कृतवन्ताविव। तथा समकल्पन्तापश्च तेजश्च स्वेन रूपेण निश्चलानि लक्ष्यन्ते यतः। <br><br> तेषां द्यावापृथिव्यादीनां संक्लृप्त्यै संकल्पनिमित्तं वर्षं संकल्पते समर्थीभवति। तथा वर्षस्य संक्लृप्त्यै संकल्पनिमित्तमन्नं संकल्पते। वृष्टेर्ह्यन्नं भवत्यन्नस्य संक्लृप्त्यै प्राणाः संकल्पन्ते। | वे ये मन आदि संकल्पैकायन हैं—संकल्प ही है एक अयन—गमन अर्थात् प्रलयस्थान जिनका ऐसे संकल्पैकायन हैं। वे उत्पत्तिके समय संकल्पमय हैं तथा स्थितिके समय संकल्पमें प्रतिष्ठित हैं। द्युलोक और पृथिवीने मानो संकल्प किया है, क्योंकि ये द्यावापृथिवी—द्यौ और पृथिवी निश्चल दिखायी देते हैं। तथा वायु और आकाश इन दोनोंने भी मानो संकल्प किया है। इसी प्रकार जल और तेजने भी संकल्प किया है, क्योंकि ये भी अपने स्वरूपसे निश्चल दिखायी देते हैं। <br><br> उन द्युलोक और पृथिवी आदिकी संक्लृप्ति यानी संकल्पके लिये वर्षा संकल्पित होती अर्थात् समर्थ होती है। तथा वर्षाकी संक्लृप्ति—संकल्पके लिये अन्न समर्थ होता है, क्योंकि वृष्टिसे ही अन्न होता है। अन्नकी संक्लृप्तिके लिये प्राण समर्थ होते हैं, क्योंकि प्राण अन्नमय |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अन्नमया हि प्राणा अन्नोपष्टम्भकाः । "अन्नं दाम" (बृ० उ० २।२।१) इति हि श्रुतिः । | हैं और अन्नके ही आश्रय रहनेवाले हैं। श्रुति कहती है "[ प्राणरूप शिशुके लिये ] अन्न डोरी है"। |
| तेषां संक्लृप्त्यै मन्त्राः संक्लपन्ते । प्राणवान् हि मन्त्रानधीते नाबलः । मन्त्राणां हि संक्लृप्त्यै कर्माण्यग्निहोत्रादीनि संक्लपन्तेऽनुष्ठीयमानानि मन्त्रप्रकाशितानि समर्थीभवन्ति फलाय । ततो लोकः फलं संक्लपते कर्मकर्तृसमवायितया समर्थीभवतीत्यर्थः । लोकस्य संक्लृप्त्यै सर्वं जगत्संक्लपते स्वरूपावैकल्याय । एतद्यदिदं सर्वं जगद्यत्फलावसानं तत्सर्वं संकल्पमूलम् । अतो विशिष्टः स एव संकल्पः । अतः संकल्पमुपास्स्वेत्युक्त्वा फलमाह तदुपासकस्य ॥ २ ॥ | उन प्राणोंके संकल्पके लिये मन्त्र समर्थ होते हैं, क्योंकि प्राणवान् (बलवान्) ही मन्त्रोंको पढ़ सकता है, बलहीन नहीं। मन्त्रोंके संकल्पके लिये अग्निहोत्र आदि कर्म समर्थ होते हैं, क्योंकि मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित कर्म अनुष्ठान किये जानेपर फलप्रदानमें समर्थ होते हैं। उनसे लोक अर्थात् फल संक्लृप्त होता है, अर्थात् कर्म और कर्ताके समवायीरूपसे समर्थ होता है। लोक (फल) के संकल्पके लिये सम्पूर्ण जगत् अपने स्वरूपकी अविकलतामें समर्थ होता है। इस प्रकार फलपर्यन्त जो सारा जगत् है वह सब-का-सब संकल्पमूलक ही है। अतः वह संकल्प ही विशिष्ट है, इसलिये तुम संकल्पकी उपासना करो। ऐसा कहकर सनत्कुमारजी उसके उपासकके लिये फल बतलाते हैं—॥ २ ॥ |
७३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कॢप्तान् वै स लोकान्ध्रुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति। यावत्संकल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥
वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [विधाताके] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है। जहाँतक संकल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या संकल्पसे भी बढ़कर कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स यः संकल्पं ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्धयोपास्ते कॢप्तान् वै धात्रास्येमे लोकाः फलमिति कॢप्तान् समर्थितान् संकल्पितान्स विद्वान्ध्रुवान् नित्यानत्यन्ताध्रुवापेक्षया ध्रुवश्च स्वयम्। लोकिनो ह्यध्रुवत्वे लोके ध्रुवकॢप्तिर्व्यर्थेति ध्रुवः सन् प्रतिष्ठितानुपकरण- | वह जो कि संकल्पकी 'ब्रह्म' इस प्रकार अर्थात् ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता है, कॢप्त— विधाताद्वारा 'इसे ये लोक यानी फल प्राप्त हों' इस प्रकार समर्थित—संकल्पित ध्रुव अर्थात् नित्य लोकोंको, जो अन्य अध्रुव लोकोंकी अपेक्षा ध्रुव हैं, स्वयं ध्रुव होकर, क्योंकि लोकवान् भोक्ताके अध्रुव होनेपर लोकोंमें ध्रुवताकी कल्पना करना व्यर्थ है, अतः ध्रुव होकर; प्रतिष्ठित अर्थात् सामग्री- |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| सम्पन्नानित्यर्थः । पशुपुत्रादिभिः प्रतितिष्ठतीति दर्शनात्स्वयं च प्रतिष्ठित आत्मीयोपकरणसम्पन्नोऽव्यथमानानमित्रादित्रासरहितानव्यथमानश्च स्वयमभिसिद्ध्यत्यभिप्राप्नोतीत्यर्थः । यावत्संकल्पस्य गतं संकल्पगोचरस्तत्रास्य यथाकामचारो भवति आत्मनः संकल्पस्य न तु सर्वेषां संकल्पस्येति । उत्तरफलविरोधात् । यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | सम्पन्न [लोकोंको]; क्योंकि वह पशु-पुत्रादिसे प्रतिष्ठित होता है—ऐसा देखा गया है, स्वयं भी प्रतिष्ठित—अपनी सामग्रीसे सम्पन्न होकर तथा अव्यथमान—शत्रु आदिके भयसे रहित लोकोंको स्वयं भी अव्यथमान—व्यथित न होता हुआ 'अभिसिध्यति'—सब प्रकारसे प्राप्त करता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। जहाँतक संकल्पकी गति है अर्थात् संकल्पका विषय है वहाँतक इसकी स्वेच्छागति हो जाती है; जहाँतक उसके संकल्पकी गति होती है वहींतक, न कि सबके संकल्पकी गतितक, क्योंकि [ऐसा न माननेसे] आगे बतलाये हुए फलोंसे विरोध आवेगा । 'यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
पञ्चम खण्ड
संकल्पकी अपेक्षा चित्तकी प्रधानता
चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो यदा वै चेतयतेऽथ संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १॥
चित्त ही संकल्पसे उत्कृष्ट है। जिस समय पुरुष चेतनावान् होता है तभी वह सङ्कल्प करता है, फिर मनन करता है, तत्पश्चात् वाणीको प्रेरित करता है, उसे नाममें प्रवृत्त करता है। नाममें मन्त्र एकरूप होते हैं और मन्त्रोंमें कर्म ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्तं वाव संकल्पाद्भूयः, चित्तं चेतयितृत्वं प्राप्तकालानुरूपबोधवत्त्वमतीतानागतविषयप्रयोजननिरूपणसामर्थ्यं च तत् संकल्पादपि भूयः । कथम् ? यदा वै प्राप्तं वस्त्विदमेवं प्राप्तमिति चेतयते तदादानाय वापोहाय वाथ संकल्पयतेऽथ मनस्यतीत्यादि पूर्ववत् ॥ १॥ | चित्त ही सङ्कल्पसे उत्कृष्ट है। चित्त यानी चेतयितृत्व—प्राप्त कालके अनुरूप बोधयुक्त होना तथा भूत और भविष्यत् विषयोंके प्रयोजनका निरूपण करनेमें समर्थ होना—यह सङ्कल्पकी अपेक्षा भी बढ़कर है। यह कैसे ? [ सो बतलाते हैं—] जिस समय पुरुष प्राप्त हुई वस्तुको 'यह इस प्रकारकी वस्तु प्राप्त हुई है' इस प्रकार चेतित करता है, तभी वह उसे ग्रहण करने अथवा त्यागनेके लिये सङ्कल्प करता है। फिर मनस्यन करता है—इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥ |
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खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५
तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वानेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
वे ये [ संकल्पादि ] एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय तथा चित्तमें ही प्रतिष्ठित हैं। इसीसे यद्यपि कोई मनुष्य बहुज्ञ भी हो तो भी यदि वह अचित्त होता है तो लोग कहने लगते हैं कि 'यह तो कुछ भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा विद्वान् होता तो ऐसा अचित्त न होता।' और यदि कोई अल्पज्ञ होनेपर भी चित्तवान् हो तो उसीसे वे सब श्रवण करना चाहते हैं। अतः चित्त ही इनका एकमात्र आश्रय है, चित्त ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है, तुम चित्तकी उपासना करो ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तानि संकल्पादीनि कर्मफलान्तानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्तोत्पत्तीनि चित्ते प्रतिष्ठितानि चित्तस्थितानीत्यपि पूर्ववत् । किञ्च चित्तस्य माहात्म्यम् । यस्माच्चित्तं संकल्पादिमूलं तस्माद्यद्यपि बहुविद्बहुशास्त्रादिपरिज्ञानवान्सन्नचित्तो | संकल्पसे लेकर कर्मफलपर्यन्त वे सब एकमात्र चित्तरूप लयस्थानवाले, चित्तमय—चित्तसे उत्पन्न होनेवाले और चित्तसे प्रतिष्ठित अर्थात् चित्तमें ही स्थित रहनेवाले हैं—इस प्रकार पूर्ववत् ही समझना चाहिये । इसके सिवा चित्तकी महिमा इस प्रकार है; क्योंकि चित्त संकल्पादिका मूल है इसलिये यदि कोई पुरुष बहुज्ञ—बहुत-से शास्त्रादिका परिज्ञान रखनेवाला |