भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

७०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| निर्वर्तयितुं शक्या नोत्पन्नेति वा शक्यं वक्तुम्, सर्वोपनिषद्वाक्यानां तत्परतयैवोपक्षयात्। यथाग्निहोत्रादिविधिजनिताग्निहोत्रादिकर्तव्यताबुद्धीनामतथार्थत्वमनुत्पन्नत्वं वा न शक्यते वक्तुं तद्वत्। | होत्रादिकर्त्तव्यता बुद्धिका अतथार्थत्व (अग्निहोत्रपरक न होना) अथवा अनुत्पन्नत्व (उत्पन्न ही न होना) नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार 'तू वह है' इस प्रकार कहे जानेपर 'मैं सत् हूँ' ऐसी प्रमाणवाक्यजनित बुद्धि निवृत्त नहीं की जा सकती और न यही कहा जा सकता है कि वह उत्पन्न ही नहीं हुई, क्योंकि सम्पूर्ण उपनिषद्वाक्योंका पर्यवसान इसी अर्थमें हुआ है। | | देहादिष्वात्मबुद्धित्वात् न सदात्मविज्ञानम्<br>यत्तूक्तं सदात्मा सन्नात्मानं कथं न जानीयादिति, नासौ दोषः; कार्यकरणसङ्घातव्यतिरिक्तोऽहं जीवः कर्ता भोक्तेत्यपि स्वभावतः प्राणिनां विज्ञानादर्शनात्किमु तस्य सदात्मविज्ञानम्। कथमेवं सदात्मविज्ञानम् ? कथमेवं व्यतिरिक्तविज्ञानेऽसति तेषां कर्तृत्वादिविज्ञानं सम्भवति ? दृश्यते | और ऐसा जो कहा कि 'सत्स्वरूप होनेपर भी वह अपनेको [सद्रूप] क्यों न जानता' सो यह दोष भी नहीं आ सकता; क्योंकि स्वभावतः तो प्राणियोंकी ऐसी बुद्धि भी नहीं देखी जाती कि मैं देह और इन्द्रियोंके संघातसे भिन्न कर्ता-भोक्ता जीव हूँ, फिर उन्हें सदात्म-बुद्धि न हो तो आश्चर्य ही क्या है ! ऐसी अवस्थामें उन्हें सदात्म-बुद्धि होगी भी कैसे ? इस प्रकार जबतक उन्हें देहेन्द्रियादिसे व्यतिरिक्त बुद्धि न हो तबतक कर्तृत्वादिवुद्धिका होना भी कैसे |

खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९


| च। तद्वत्तस्यापि देहादिष्वात्मबुद्धित्वान्न स्यात्सदात्मविज्ञानम्। तस्माद्विकारानृताधिकृतजीवात्मविज्ञाननिवर्तकमेवेदं वाक्यं तत्त्वमसीति सिद्धमिति ॥ ३ ॥ | सम्भव हो सकता है और यही बात देखी भी जाती है। इसी प्रकार उसे देहादिमें आत्मबुद्धि होनेके कारण सदात्मबुद्धि नहीं होती। अतः यह सिद्ध हुआ कि ‘तत्त्वमसि’ यह वाक्य विकाररूप मिथ्या देहादिमें अधिकृत जीवात्मभावकी निवृत्ति करनेवाला ही है ॥ ३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥

— : ० : —

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्वि-
वरणे षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ ६ ॥

सप्तम अध्याय

सप्तम अध्याय

प्रथम खण्ड

नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश

[वक्ष्यमाणग्रन्थारम्भप्रयोजनम्]
परमार्थतत्त्वोपदेशप्रधानपरः षष्ठोऽध्यायः सदात्मैकत्वनिर्णयपरतयैवोपयुक्तः, न सतोऽर्वाग्विकारलक्षणानि तत्त्वानि निर्दिष्टानीत्यतस्तानि नामादीनि क्रमेण निर्दिश्य तद्वारेणापि भूमाख्यं निरतिशयं तत्त्वं निर्देश्यामीति शाखाचन्द्रदर्शनवदितीमं सप्तमं प्रपाठकमारभते । अनिर्दिष्टेषु हि सतोऽर्वाक्तत्त्वेषु सन्मात्रे च निर्दिष्टेऽन्यदप्यविज्ञातं स्यादित्याशङ्का कस्यचित्स्यात्सा मा भूदिति वा तानि निर्दिदिक्षति ।प्रधानतया परमार्थतत्त्वका उपदेश करनेवाला छठा अध्याय सत् (ब्रह्म) और आत्माका एकत्व-निर्णय करनेके कारण ही उपयोगी है। उसमें सत्से निम्नतर विकाररूप तत्त्वोंका निर्देश नहीं किया गया। अतः उन नामादि तत्त्वोंका क्रमशः निरूपण कर उनके द्वारा भी शाखाचन्द्र दर्शनके समान भूमासंज्ञक निरतिशय तत्त्वका निर्देश करूँगी—इस अभिप्रायसे श्रुति यह सातवाँ प्रपाठक आरम्भ करती है। अथवा सत्से निम्नतर तत्त्वोंका निर्देश न होनेपर और केवल सन्मात्रका ही निरूपण किया जानेपर किसीको ऐसी आशङ्का हो सकती है कि अभी कुछ और भी अविज्ञात है, वह आशङ्का न हो—इस आशयसे श्रुति उनका निर्देश करना चाहती है।

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथवा सोपानारोहणवत्स्थूलादारभ्य सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च बुद्धिविषयं ज्ञापयित्वा तदतिरिक्ते स्वाराज्येऽभिषेक्ष्यामीति नामादीनि निर्दिदिक्षति ।<br><br>अथवा नामाद्युत्तरोत्तरविशिष्टानि तत्त्वान्यतितरां च तेषाम्युत्कृष्टतमं भूमाख्यं तत्त्वमिति तत्स्तुत्यर्थं नामादीनां क्रमेणोपन्यासः ।अथवा सीढ़ियोंपर चढ़नेके समान स्थूलसे आरम्भ करके बुद्धिके सूक्ष्म और सूक्ष्मतर विषयका ज्ञान कराकर अधिकारीको उससे अतिरिक्त स्वाराज्यपर अभिषिक्त करूँगी- इस अभिप्रायसे वह नामादिका निर्देश करना चाहती है ।<br><br>अथवा नामादि उत्तरोत्तर विशिष्ट तत्त्व हैं; उन सबकी अपेक्षा भूमासंज्ञक तत्त्व अत्यन्त उत्कृष्ट है—इस प्रकार उसकी स्तुतिके लिये नामादिका क्रमशः उल्लेख किया गया है ।
आख्यायिका तु परविद्यास्तुत्यर्था । कथम् ? नारदो देवर्षिः कृतकर्तव्यसर्वविद्योऽपि सन्नात्मज्ञत्वाच्छुशोचैव किमु वक्तव्यमन्योऽल्पविज्जन्तुरकृतपुण्यातिशयोऽकृतार्थ इति । (आख्यायिका-प्रयोजनम्)<br><br>अथवा नान्यदात्मज्ञानान्निरतिशयश्रेयःसाधनमस्तीत्येतत्प्रदर्शनार्थं सनत्कुमारनारदाख्या-यहाँ जो आख्यायिका है वह तो परा विद्याकी स्तुतिके लिये है । किस प्रकार ? जो अपने सारे कर्तव्य पूर्ण कर चुके थे और सर्वविद्यासम्पन्न थे उन देवर्षि नारदको भी अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक हुआ ही, फिर जिसने अत्यन्त पुण्यसम्पादन नहीं किया और जो अकृतार्थ है ऐसे किसी अन्य अल्पज्ञ जीवकी तो बात ही क्या है ?<br><br>अथवा आत्मज्ञानसे बढ़कर और कोई कल्याणका साधन नहीं है—यह • प्रदर्शित करनेके लिये सनत्कुमार - नारद - आख्यायिकाका

७१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| यिकारभ्यते, येन सर्वविज्ञान-<br>साधनशक्तिसम्पन्नस्यापि नार-<br>दस्य देवर्षेः श्रेयो न बभूव<br>येनोत्तमाभिजनविद्यावृत्तसाधन-<br>शक्तिसम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हि-<br>त्वा प्राकृतपुरुषवत्सनत्कुमार-<br>मुपससाद श्रेयःसाधनप्राप्तये-<br>ऽतः प्रख्यापितं भवति निर-<br>तिशयप्राप्तिसाधनत्वमात्मवि-<br>द्याया इति । | आरम्भ किया जाता है, जिससे कि<br>सम्पूर्ण विज्ञानरूप साधनोंकी<br>शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी देवर्षि<br>नारदका कल्याण नहीं हुआ, इसीसे<br>वे उत्तम कुल, विद्या, आचार और<br>नाना प्रकारके साधनोंकी सामर्थ्य-<br>रूप सम्पत्तिसे होनेवाले अभिमान-<br>को त्यागकर श्रेयःसाधनकी प्राप्तिके<br>लिये एक साधारण पुरुषके समान<br>सनत्कुमारजीके समीप गये। इससे<br>श्रेयःप्राप्तिमें आत्मविद्याका निरतिशय<br>साधनत्व सूचित होता है। |

ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तँहोवाच यद्वेत्थ तेन नोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥

‘हे भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये’ ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये। उनसे सनत्कुमारजीने कहा—‘तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास उपदेश लेनेके लिये आओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा’ तब नारदने कहा—॥ १ ॥

| अधीह्यधीष्व भगवो भगवन्नि-<br>ति ह किलोपससाद । अधीहि<br>भगव इति मन्त्रः । सनत्कुमारं<br>योगीश्वरं ब्रह्मिष्ठं नारद उपस-<br>न्नवान् । तं न्यायत उपसन्नं | ‘हे भगवन् ! मुझे अध्ययन<br>कराइये’ ऐसा कहते हुए नारदजी<br>ब्रह्मनिष्ठ योगीश्वर सनत्कुमारके प्रति<br>उपसन्न हुए अर्थात् [ शिष्यरूपसे ]<br>उनके समीप गये । ‘अधीहि भगवः’<br>यह उपसत्तिका मन्त्र है । अपने<br>प्रति नियमानुसार उपसन्न हुए उन |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१३


| होवाच यदात्मविषये किञ्चिद्वेत्थ<br><br>तेन तत्प्रख्यापनेन मामुपसीदे-<br><br>दमहं जान इति, ततोऽहं भवतो<br><br>विज्ञानात्ते तुभ्यमूर्ध्वं वक्ष्यामि, इ-<br><br>त्युक्तवति स होवाच नारदः ॥१॥ | नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—<br>'तुम आत्माके विषयमें जो कुछ<br>जानते हो उसे बतलाते हुए अर्थात्<br>ऐसा प्रकट करते हुए मेरे पास<br>उपदेश लेनेके लिये आओ; मैं यह<br>जानता हूँ' तब मैं तुम्हें तुम्हारे<br>ज्ञानसे आगे उपदेश करूँगा।'<br>सनत्कुमारजीके ऐसा कहनेपर<br>नारदजी बोले ॥ १ ॥ |


ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद १४ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य १४ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या १२ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥

'भगवन् ! मुझे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद याद है, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गरुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ' ॥ २ ॥

| ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि स्मरामि<br><br>यद्वेत्थेति विज्ञानस्य पृष्टत्वात् ।<br><br>तथा यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं<br><br>चतुर्थं वेदं वेदशब्दस्य प्रकृतत्वा- | हे भगवन् ! मैं ऋग्वेदका अध्ययन<br>कर चुका हूँ अर्थात् मुझे ऋग्वेद<br>स्मरण है [ यहाँ अध्ययनवाचक<br>पदका स्मरण अर्थ क्यों किया गया ?<br>उत्तर— ] क्योंकि 'यद्वेत्थ' ऐसा<br>कहकर विज्ञानके विषयमें प्रश्न<br>किया गया है । तथा यजुर्वेद |

७१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| दितिहासपुराणं पञ्चमं वेदं वेदानां भारतपञ्चमानां वेदं व्याकरणमित्यर्थः । व्याकरणेन हि पदादिविभागश ऋग्वेदादयो ज्ञायन्ते; पित्र्यं श्राद्धकल्पम्; राशिं गणितम्; दैवमुत्पातज्ञानम्; निधिं महाकालादिनिधिशास्त्रम्; वाकोवाक्यं तर्कशास्त्रम्; एकायनं नीतिशास्त्रम्; देवविद्यां निरुक्तम्; ब्रह्मण ऋग्यजुःसामारूख्यस्य विद्यां ब्रह्मविद्यां शिक्षाकल्पच्छन्दश्चितयः; भूतविद्यां भूततन्त्रम्; क्षत्रविद्यां धनुर्वेदम्; नक्षत्रविद्यां ज्योतिषम्; सर्पदेवजनविद्यां सर्पविद्यां गारुडं देवजनविद्यां गन्धयुक्तिनृत्यगीतवाद्यशिल्पादिविज्ञानानि । एतत्सर्वं हे भगवोऽध्येमि ॥२॥ | सामवेद और चौथा आथर्वण वेद जानता हूँ, 'वेद' शब्द प्रसंगतः प्राप्त होनेके कारण इतिहासपुराणरूप पाँचवाँ वेद, महाभारतसहित पाँचों वेदोंका वेद अर्थात् व्याकरण—क्योंकि व्याकरणके द्वारा ही पदादिके विभागपूर्वक ऋग्वेदादिका ज्ञान होता है, पित्र्य—श्राद्धकल्प, राशि—गणित, दैव—उत्पातज्ञान, निधि—महाकालादिनिधिशास्त्र, वाकोवाक्य—तर्कशास्त्र, एकायन—नीतिशास्त्र, देवविद्या—निरुक्त, ब्रह्मविद्या—ब्रह्म अर्थात् ऋग्यजुःसामसंज्ञक वेदोंकी विद्या यानी शिक्षा, कल्प, छन्द और चिति, भूतविद्या—भूतशास्त्र, क्षत्रविद्या—धनुर्वेद, नक्षत्रविद्या—ज्योतिष, सर्पदेवजनविद्या अर्थात् सर्पविद्या—गारुड और देवजनविद्या—गन्धयुक्ति तथा नृत्य, गान, वाद्य और शिल्पादि विज्ञान—ये सब हे भगवन् ! मैं जानता हूँ ॥२॥ |

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सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतꣳ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७१५ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

भगवःशोचामि तं मा भगवान्छोकस्य पारं तारयत्विति तꣳहोवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥

हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ । मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, और हे भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये । तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है' ॥ ३ ॥

| सोऽहं भगव एतत्सर्वं जानन्नपि मन्त्रविदेवास्मि शब्दार्थमात्रविज्ञानवानेवास्मीत्यर्थः । सर्वो हि शब्दोऽभिधानमात्रमभिधानं च सर्वं मन्त्रेष्वन्तर्भवति । मन्त्रविदेवास्मि मन्त्रवित्कर्मविदित्यर्थः । 'मन्त्रेषु कर्माणि' इति हि वक्ष्यति; नात्मानं वेद्मि । | हे भगवन् ! वह मैं यह सब जानते हुए भी केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ अर्थात् केवल शब्दार्थमात्र जाननेवाला हूँ; क्योंकि सारे शब्द अभिधानमात्र हैं और सम्पूर्ण अभिधान मन्त्रोंके अन्तर्गत हैं । मैं मन्त्रवित् ही हूँ, मन्त्रवित् अर्थात् कर्मवित्, क्योंकि 'मन्त्रोंमें कर्म [ एकरूप होते हैं ]' ऐसा आगे ( खं० ४ मं० १ में ) कहेंगे । मैं आत्माको नहीं जानता । | | नन्वात्मापि मन्त्रैः प्रकाश्यत एवेति कथं मन्त्रविच्चेन्नात्मवित् । | शङ्का—किंतु आत्मा भी तो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित होता ही है; फिर नारदजी मन्त्रवित् होनेपर भी आत्मवेत्ता क्यों नहीं हैं ? | | न; अभिधानाभिधेयभेदस्य विकारत्वात् । न च विकार आ- | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि नाम-नामीरूप जो भेद है, वह तो विकार है और विकार |

| ७१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |

| ७१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ | | :--- | :--- |

संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी अनुवाद
त्मेष्यते। नन्वात्माप्यात्मशब्दे-<br>नाभिधीयते; न, “यतो वाचो<br>निवर्तन्ते” (तै० उ० २।<br>४।१)। “यत्र नान्यत्पश्यति”<br>(छा० उ० ७।२४।१)<br>इत्यादिश्रुतेः।आत्मा माना नहीं जाता। यदि कहो कि आत्मा भी तो 'आत्मा' शब्दसे कहा ही जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि “जहाँसे वाणी लौट आती है” “जहाँ कोई और नहीं देखता” इत्यादि श्रुतिसे [उसका शब्दवाच्य न होना ही सिद्ध होता है]।
कथं तर्ह्यात्मैवाधस्तात्स आत्मे-<br>त्यादिशब्दा आत्मानं प्रत्या-<br>ययन्ति।शङ्का—तो फिर “आत्मा ही नीचे है”, “वह आत्मा है” इत्यादि शब्द किस प्रकार आत्माकी प्रतीति कराते हैं ?
नैष दोषः; देहवति प्रत्यगा-<br>अनात्मभावात् त्मनि भेदविषये<br>सदात्मप्रत्यय प्रयुज्यमानः शब्दो<br>देहादीनामात्मत्वे प्रत्याख्याय-<br>माने यत्परिशिष्टं सदवाच्यमपि<br>प्रत्याययति। यथा सराजिकायां<br>दृश्यमानायां सेनायां छत्रध्वज-<br>पताकादिव्यवहितेऽदृश्यमानेऽपि<br>राजन्येष राजा दृश्यत इति भवति<br>शब्दप्रयोगस्तत्र कोऽसौ राजेतिसमाधान—यह कोई दोष नहीं है। भेदके विषयभूत देहधारी प्रत्यगात्मामें प्रयोग किया हुआ ['आत्मा'—यह] शब्द, देहादिका आत्मत्व निरस्त हो जानेपर जो सन्मात्र अवशिष्ट रहता है उसे—यद्यपि वह [मुख्यवृत्तिसे किसी शब्दका] वाच्य नहीं है तो भी—[लक्षणासे] उसकी प्रतीति करा देता है, जिस प्रकार कि राजाके सहित दिखायी देती हुई सेनामें छत्र, ध्वजा और पताका आदिकी ओटमें राजाके दिखायी न देनेपर भी 'ये राजा दिखायी देते हैं' ऐसा प्रयोग होता है, फिर ऐसा प्रश्न होनेपर कि 'इनमें राजा कौन है?' राजा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१७


भाष्यभाष्यार्थ
राजविशेषनिरूपणायां दृश्यमानेतरप्रत्याख्यातेऽन्यस्मिन्नदृश्यमानेऽपि राजनि राजप्रतीतिर्भवेत्तद्वत्।कहलानेवाले विशेष व्यक्तिका निरूपण करनेपर अन्य दृश्यमान पुरुषोंका प्रत्याख्यान करके उनसे भिन्न राजाके साक्षात् दिखलायी न देनेपर भी राजाकी प्रतीति हो जाती है उसी प्रकार [अनात्माका बाध करके आत्माकी प्रतीति होती है]।
तस्मात्सोऽहं मन्त्रवित्कर्मविदेवास्मि कर्मकार्यं च सर्वं विकार इति विकारज्ञ एवास्मि नात्मविन्नात्मप्रकृतिस्वरूपज्ञ इत्यर्थः। अत एवोक्तम् "आचार्यवान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। १४। २) इति। "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २। ४। १) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च।अतः [नारदजी कहते हैं—] वह मैं मन्त्रवेत्ता अर्थात् कर्मवेत्ता ही हूँ, कर्मका कार्य ही सारा विकार है; अतः मैं विकारज्ञ ही हूँ—आत्मज्ञ अर्थात् आत्मारूप प्रकृति (कारण) के स्वरूपको जाननेवाला नहीं हूँ। इसीसे कहा है कि "आचार्यवान् पुरुष [आत्माको] जानता है" और यही बात "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी प्रमाणित होती है।
श्रुतमागमज्ञानमस्त्येव हि यस्मान्मे मम भगवद्दृशेभ्यो युष्मत्सदृशेभ्यस्तरत्यतिक्रामति शोकं मनस्तापमकृतार्थबुद्धितामात्मविदित्युतः सोऽहमनात्मविद्त्वाद्धे भगवः शोचाम्यकृतार्थ-क्योंकि मैंने आप-जैसोंसे सुना है—मुझे ऐसा शास्त्रीय ज्ञान है कि 'आत्मवेत्ता शोक—मानसिक ताप अर्थात् अकृतार्थताबुद्धिको तर जाता है—पार कर लेता है' और हे भगवन्! मैं अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक करता हूँ अर्थात् अकृतार्थ-

७१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| बुद्ध्या संतप्ये सर्वदा तं मा मां शोकसागरस्य पारमन्तं भगवांस्तारयत्वात्मज्ञानोडुपेन कृतार्थबुद्धिमापादयत्वभयं गमयत्वित्यर्थः ।<br><br>तमेवमुक्तवन्तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा अधीतवानसि, अध्ययनेन तदर्थज्ञानमुपलक्ष्यते, ज्ञानवानसीत्येतन्नामैवैतत् ।<br><br>“वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः ॥ ३ ॥ | बुद्धिसे सर्वदा संतप्त रहता हूँ । उसे मुझको हे भगवन् ! आत्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा शोकसागरके पार—परे पहुँचा दो—मुझे कृतार्थबुद्धि प्राप्त करा दो अर्थात् अभयको प्राप्त करा दो ।<br><br>इस प्रकार कहते हुए उन (नारदजी) से सनत्कुमारजीने कहा--‘तुमने यह जो कुछ अध्ययन किया है—अध्ययनसे उसके अर्थका ज्ञान भी उपलक्षित होता है--[ अतः तात्पर्य यह है कि ] तुम जो कुछ जानते हो वह सब नाम ही है; क्योंकि “विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है” ऐसी श्रुति है ॥ ३ ॥ |


नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्देवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ॥ ४ ॥

ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या,

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१९


भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतादिकला और शिल्पविद्या-- ये सब भी नाम ही हैं तुम नामकी उपासना करो ॥ ४ ॥

| नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेद इत्यादि नामैवैतत् । नामोपास्स्व ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्ध्या । यथा प्रतिमां विष्णुबुद्ध्योपास्ते तद्वत् ॥ ४ ॥ | ऋग्वेद नाम ही है, तथा यजुर्वेद इत्यादि ये सब भी नाम ही हैं । अतः जिस प्रकार विष्णु-बुद्धिसे प्रतिमाकी उपासना करते हैं उसी प्रकार तुम नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करो ॥ ४ ॥ |


स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य कामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥

वह जो कि नामको 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद-- ] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार-- ] 'नामसे भी अधिक है ।' [ नारद— ] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥

| स यस्तु नाम ब्रह्मेत्युपास्ते तस्य यत्फलं भवति तच्छृणु,—या- | वह जो कि 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे जो फल मिलता है वह सुनो--जहाँतक |

७२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७२०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| वन्नाम्नो गतं नाम्नो गोचरं तत्र तस्मिन्नामविषयेऽस्य यथाकामचारः कामचरणं राज्ञ इव स्वविषये भवति । यो नाम ब्रह्मेत्युपास्त इत्युपसंहारः । किमस्ति भगवो नाम्नो भूयोऽधिकतरं यद्ब्रह्मदृष्ट्यर्हमन्यदित्यभिप्रायः । सनत्कुमार आह नाम्नो वाव भूयोऽस्त्येवेत्युक्त आह यद्यस्ति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ | नामकी गति अर्थात् नामका विषय होता है वहाँतक उस नामके विषयमें इसका कामचार—स्वेच्छाचरण हो जाता है, जैसा कि राजाके अपने विषय (अधिकृत देश) में, जो 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है—यह उपसंहार है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या नामसे बढ़कर भी कुछ है ? अर्थात् जो ब्रह्मदृष्टिके योग्य हो ऐसी कोई और वस्तु भी है—ऐसा इसका अभिप्राय है ?' सनत्कुमारने कहा—'नामसे बढ़कर भी है ही।' इस प्रकार कहे जानेपर नारदने कहा—'यदि है तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥

द्वितीय खण्ड

नामकी अपेक्षा वाक्‌की महत्ता

वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदꣳसामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यꣳराशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳसर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांश्च तृणवनस्पतीञ्श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु), कीट-पतंग, पिपीलिकापर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही विज्ञापित करती है]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज्ञ

७२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७२२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्‌की उपासना करो ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वाग्वाव । वागितीन्द्रियं जिह्वामूलादिष्वष्टसु स्थानेषु स्थितं वर्णानामभिव्यञ्जकम् । वर्णाश्च नामेति नाम्नो वाग्भूयसीत्युच्यते । कार्याद्धि कारणं दृष्टं लोके यथा पुत्रात्पिता तद्वत् ।<br><br>कथं च वाङ्नाम्नो भूयसी ? इत्याह—वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयत्ययम्ऋग्वेद इति । तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम् । हृदयज्ञं हृदयप्रियम् । तद्विपरीतमहृदयज्ञम् । यद्यदि वाङ्नाभविष्यद्धर्मादि न व्यज्ञापयिष्यद्वागभावेऽध्ययनाभावोऽध्ययनाभावे तदर्थश्रवणाभावस्तच्छ्रवणाभावे धर्मादि'वाग्वाव'—वाक् यह जिह्वामूल आदि* आठ स्थानोंमें स्थित वर्णोंको अभिव्यक्त करनेवाली इन्द्रिय है। वर्ण ही नाम हैं, इसीसे यह कहा जाता है कि नामसे वाक् उत्कृष्ट है। जिस प्रकार पुत्रसे पिता उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार लोकमें कार्यसे ही कारणकी उत्कृष्टता देखी जाती है।<br><br>नामकी अपेक्षा वाक् क्यों उत्कृष्ट है सो बतलाते हैं—वाक् ही ऋग्वेदको 'यह ऋग्वेद है' इस प्रकार विज्ञापित करती है। इसी प्रकार यजुर्वेद इत्यादिको भी—ये सब पूर्ववत् समझने चाहिये। तथा हृदयज्ञ—हृदयको प्रिय और उससे विपरीत अहृदयज्ञको भी [ वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाक् न होती तो धर्मादि विज्ञापित न होते। वाक्‌के अभावमें अध्ययनका अभाव हो जाता, अध्ययनके अभावमें उसके अर्थश्रवणका अभाव होता और उसके श्रवणके अभावमें धर्मादिका विज्ञान न

* आदि शब्दसे यहाँ वक्षःस्थल, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका और तालु--इन सात स्थानोंका ग्रहण होता है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२३


न व्यज्ञापयिष्यन्न विज्ञातमभविष्यदित्यर्थः । तस्माद्वागेवैतच्छब्दोच्चारणेन सर्वं विज्ञापयत्यतो भूयसी वाङ्नाम्नस्तस्माद्वाचं ब्रह्मेत्युपास्स्व ॥ १ ॥होता अर्थात् धर्मादि विज्ञात न होते । अतः शब्दोच्चारणके द्वारा वाक् ही इन सबको विज्ञापित करती है । अतः वाक् नामसे उत्कृष्ट है, अतः तुम वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करो ॥ १ ॥

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स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद— ] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥२॥

समानमन्यत् ॥ २ ॥शेष व्याख्या पूर्ववत् है ॥ २ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ॥

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तृतीय खण्ड

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वाक् की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता

मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥१॥

मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं उसी प्रकार वाक् और नामका मनमें अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा संकल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी कामना करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो ॥ १ ॥

मनो मनस्यनविशिष्टमन्तःकरणं वाचो भूयः। तद्धि मनस्यनव्यापारवद्वाचं वक्तव्ये प्रेरयति। तेन वाङ्मनस्यन्तर्भवति। यच्च यस्मिन्नन्तर्भवति तत्तस्यमन—मननशक्तिविशिष्ट अन्तःकरण वाणीसे उत्कृष्ट है। वह मननव्यापारयुक्त मन ही वाणीको वक्तव्य विषयमें प्रेरित करता है। अतः वाक् मनके अन्तर्गत है, और जो जिसके अन्तर्गत होता है,

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
व्यापकत्वात्ततो भूयो भवति । यथा वै लोके द्वे वामलके फले द्वे वा कोले बदरफले द्वौ वाक्षौ बिभीतकफले मुष्टिरनुभवति मुष्टिस्ते फले व्याप्नोति मुष्टौ हि ते अन्तर्भवतः । एवं वाचं च नाम चामलकादिवन्मनोऽनुभवति ।उसकी अपेक्षा वह व्यापक होनेके कारण, बड़ा होता है । लोकमें जिस प्रकार दो आँवलों; दो कोलों—बेरों अथवा दो अक्षों—बहेड़ेके फलों—को मुट्ठी अनुभव करती है—उन फलोंको मुट्ठी व्याप्त कर लेती है अर्थात् वे मुट्ठीके अन्तर्गत हो जाते हैं, उसी प्रकार उन आँवले आदिके समान वाणी और नाम—इन दोनोंको मन अनुभव करता है ।
स यदा पुरुषो यस्मिन्काले मनसान्तःकरणेन मनस्यति मनस्यनं विवक्षाबुद्धिः कथम् ? मन्त्रानधीयीयोच्चारयेयमित्येवं विवक्षां कृत्वाथाधीते तथा कर्माणि कुर्वीयेति चिकीर्षाबुद्धिं कृत्वाथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेति प्राप्तीच्छां कृत्वा तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते पुत्रादीन्प्राप्नोतीत्यर्थः । तथेमं च लोकममुं चोपायेनेच्छेयेतिवह (यह) पुरुष जब—जिस समय मन-अन्तःकरणसे मनस्यन (कुछ कहनेकी इच्छा) करता है, मनस्यन-का अर्थ है विवक्षा-बुद्धि (कुछ कहनेकी इच्छा या विचार) किस प्रकार ? यह बताते हैं—'मैं मन्त्रोंका पाठ—उच्चारण करूँ,' इस प्रकार बोलनेकी इच्छा करके वह पाठ करता है; 'मैं कर्म करूँ,' ऐसी चिकीर्षाबुद्धि करके कर्म करता है; तथा 'मैं पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ,' इस प्रकार उनकी प्राप्तिकी इच्छा करके उनकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान कर उनकी इच्छा करता है अर्थात् उन पुत्रादिको प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार 'मैं इस लोक और परलोक-को उपायद्वारा [ प्राप्त करना ]

७२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते प्राप्नोति ।<br>मनो ह्यात्मात्मनः कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सति मनसि नान्यथेति मनो ह्यात्मेत्युच्यते । मनो हि लोकः सत्येव हि मनसि लोको भवति तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानं चेति मनो हि लोको यस्मात्तस्मान्मनो हि ब्रह्म । यत एवं तस्मान्मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | चाहूँ" ऐसे संकल्पपूर्वक उनकी प्राप्तिके उपायद्वारा उन्हें चाहता अर्थात् प्राप्त कर लेता है।<br>मन ही आत्मा है; क्योंकि मनके रहनेपर ही आत्माका कर्तृत्व-भोक्तृत्व सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं; इसीसे 'मन ही आत्मा है' ऐसा कहा जाता है। मन ही लोक है; क्योंकि मनके रहनेपर ही लोक और उसकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान होता है। इस प्रकार क्योंकि मन ही लोक है, इसलिये मन ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा है इसलिये मनकी उपासना करो ॥ १ ॥ |

स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है?' [सनत्कुमार—] 'मनसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवन्! मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ २ ॥

| स यो मन इत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | 'स यो मनः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

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मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता

संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥

संकल्प ही मनसे बढ़कर है। जिस समय पुरुष संकल्प करता है तभी वह मनस्यन (बोलनेकी इच्छा) करता है और फिर वाणीको प्रेरित करता है। वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममें सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥१॥

संकल्पो वाव मनसो भूयान्।संकल्प ही मनसे बढ़कर है।
संकल्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकरणवृत्तिः, कर्त्तव्याकर्त्तव्यविषयविभागेन समर्थनम्। विभागेन हि समर्थिते विषये चिकीर्षाबुद्धिर्मनस्यनं भवति। कथम् ? यदा वै संकल्पयते कर्त्तव्यादिविषयान् विभजत इदं कर्तुं युक्तमिति। अथ मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यादि। अथानन्तरं वाचमीरयतिमनस्यनके समान संकल्प भी अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, यानी कर्तव्य और अकर्तव्य विषयोंका विभागपूर्वक समर्थन ही संकल्प है। इस प्रकार विषयका विभागपूर्वक समर्थन होनेपर ही चिकीर्षाबुद्धि यानी मनस्यन होता है। सो किस प्रकार ?—जिस समय पुरुष संकल्प करता है अर्थात् 'यह करना चाहिये' इस प्रकार कर्तव्यादि विषयोंका विभाग करता है तभी वह सोचता है 'मैं मन्त्रोंका पाठ करूँ' इत्यादि। इसके पश्चात् वह मन्त्रादिका उच्चारण करनेमें