छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| द्भोजनात्पूर्वमुपरिष्टाच्च भोजनादूर्ध्वं च परिदधति परिधानं कुर्वन्ति मुख्यस्य प्राणस्य । लम्भुको लम्भनशीलो वासो ह भवति, वाससो लब्धैव भवतीत्यर्थः । अनग्नो ह भवति, वाससो लम्भुकत्वेनार्थसिद्धैवानग्नतेत्यनग्नो ह भवतीत्युत्तरीयवान् भवतीत्येतत् । | मुख्य प्राणका परिधान (आच्छादन) करते हैं । [ ऐसा करनेसे ] वह लम्भुक—वस्त्रोंका लम्भनशील अर्थात् वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला ही होता है और अनग्न होता है । वस्त्रोंको प्राप्त करनेवाला होनेसे अनग्नता अर्थतः सिद्ध ही है; अतः अनग्न होता है। इसका अभिप्राय यह है कि उत्तरीय वस्त्रसे युक्त होता है। |
| भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं शुद्धयर्थं विज्ञातं तस्मिन् प्राणस्य वास इति दर्शनमात्रमिह विधीयते । अद्भिः परिदधतीति नाचमनान्तरम् । यथा लौकिकैः प्राणिभिर्भक्ष्यमानमन्नं प्राणस्येति दर्शनमात्रम्, तद्वत् । किं मेऽन्नं किं मे वास इत्यादिप्रश्नप्रतिवचनयोस्तुल्यत्वात् । यद्याचमनमपूर्वं तादर्थ्येन क्रियेत | भोजन आरम्भ करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन शुद्धिके लिये विदित है उसमें 'यह प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया गया है । 'जलसे परिधान करता है' ऐसा कहकर किसी अन्य आचमनका विधान नहीं किया गया । जिस प्रकार लौकिक प्राणियोंद्वारा भक्षित होनेवाला अन्न प्राणका है—यहाँ जिस तरह केवल दृष्टिमात्रका विधान किया गया है उसी तरह इसे समझना चाहिये; क्योंकि 'मेरा अन्न क्या है ? मेरा वस्त्र क्या है '? इत्यादि प्रश्न और इनके उत्तर दोनों समान हैं । यदि [ इस श्रुतिके अनुसार ] प्राणके लिये अपूर्व—नवीन आचमनका विधान मान |
४६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तदा कृम्याद्यन्नमपि प्राणस्येति भक्ष्यत्वेन विहितं स्यात् । तुल्ययोर्विज्ञानार्थयोः प्रश्नप्रतिवचनयोः प्रकरणस्य विज्ञानार्थत्वादर्धजरतीयो न्यायो न युक्तः कल्पयितुम् । | लिया जाय तो कृमि आदि अन्नका भी प्राणके भक्ष्यरूपसे विधान समझा जायगा । इस प्रकार समानरूपसे विज्ञानार्थक प्रश्न और उत्तरोंका यह प्रकरण विज्ञानरूप प्रयोजनके लिये ही होनेके कारण यहाँ अर्धजरतीय न्यायकी* कल्पना करना उचित नहीं है । |
| यत्तु प्रसिद्धमाचमनं प्रायत्यार्थं प्राणस्यानग्नतार्थं च न भवतीत्युच्यते, न तथा वयमाचमनमुभयार्थं ब्रूमः; किं तर्हि ? प्रायत्यार्थाचमनसाधनभूता आपः प्राणस्य वास इति दर्शनं चोद्यत इति ब्रूमः । तत्राचमनस्योभयार्थत्वप्रसङ्गदोषचोदनानुपपन्ना । वासोऽर्थ एवाचमने तद्दर्शनं स्यादिति चेत् ? | तथा ऐसा जो कहा जाता है कि 'शुद्धिके लिये किया जानेवाला प्रसिद्ध आचमन प्राणकी नग्नताके निवारणके लिये नहीं हो सकता' उसके विषयमें हमें यह कहना है कि इस प्रकार हम आचमनको दोनों प्रयोजनोंके लिये नहीं बतलाते । तो फिर क्या कहते हैं ?—हमारा कथन तो यह है कि शुद्धिके लिये किये जानेवाले आचमनका साधनभूत जल प्राणका वस्त्र है--ऐसी दृष्टिका विधान किया गया है । उसमें आचमनके दो प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये होनेरूप दोषकी शङ्का करना उचित नहीं है । यदि कहो कि 'ऐसी दृष्टि करना तो तब उचित होता जब कि आचमन प्राणके वस्त्रके लिये ही किया जाता'—तो |
- यदि कोई मनुष्य कहे कि आधी गाय तो जवान है और आधी बूढ़ी है तो इसे अर्धजरतीय न्याय कहते हैं । अतः ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिये कि अन्नोंमें तो केवल दृष्टिमात्रका विधान है; किंतु आचमन नवीन विहित है !
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३
| न; वासोऽज्ञानाथंवाक्ये वासोऽर्थापूर्वाचमनविधाने तत्रानग्नतार्थत्वदृष्टिविधाने च वाक्यभेदः । आचमनस्य तदर्थत्वमन्यार्थत्वं चेति प्रमाणाभावात्॥२॥ | यह ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रदृष्टिके लिये प्रवृत्त हुए वाक्यमें वस्त्रके लिये नवीन आचमनका विधान और उसमें प्राणकी नग्नताके निवारणरूप प्रयोजनकी दृष्टिका विधान माननेसे वाक्यभेदरूप दोष होगा, क्योंकि आचमनके वासोऽर्थत्व और किसी अन्यार्थत्वमें कोई प्रमाण नहीं है॥२॥ |
प्राणविद्याकी स्तुति
| तदेतत्प्राणदर्शनं स्तूयते। कथम् ? | उस इस प्राणदर्शनकी स्तुति की जाती है; किस प्रकार ? |
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तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥
उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जाबालने वैयाघ्रपद्य गोश्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे शुष्क स्थाणुके प्रति कहे तो उसमें शाखा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फूट आवेंगे ॥ ३ ॥
| तद्वैतत्प्राणदर्शनं सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये नाम्ना वैयाघ्रपद्याय व्याघ्रपदोऽपत्यं वैयाघ्रपद्यस्तस्मै गोश्रुत्याख्यायोक्त्वोवाचान्यदपि वक्ष्यमाणं वचः । किं तदुवाच ? त्याह-- यद्यपि शुष्काय स्थाणव एतद्- | उस इस प्राणदर्शनको सत्यकाम जाबालने गोश्रुतिनामक वैयाघ्रपद्यसे—व्याघ्रपदके पुत्रको वैयाघ्रपद्य कहते हैं, उस गोश्रुति नामवालेसे कहकर और भी आगे कहा जानेवाला वचन कहा। उसने क्या कहा ? सो बतलाते हैं—यदि प्राणवेत्ता पुरुष इस दर्शनको शुष्क स्थाणुके प्रति |
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४१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| र्शनं ब्रूयात्प्राणाविजायेरन्नुत्पद्ये-<br>रन्नेवास्मिन्स्थाणौ शाखाः प्ररो-<br>हेयुश्च पलाशानि पत्राणि। किमु<br>जीवते पुरुषाय ब्रूयादिति ॥ ३ ॥ | कहे तो उस स्थाणुमें शाखाएँ उत्पन्न<br>हो जायँ और पत्ते निकल आवें,<br>यदि जीवित पुरुषसे कहे तब तो<br>कहना ही क्या है ? ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
मन्थकर्म
| यथोक्तप्राणदर्शनविद इदं<br>मन्थाख्यं कर्मारभ्यते--- | उपर्युक्त प्राणदर्शनके ज्ञाताके<br>लिये इस मन्थनामक कर्मका आरम्भ<br>किया जाता है— |
अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥
अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमावास्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये ॥ ४ ॥
| अथानन्तरं यदि महन्महत्त्वं<br>जिगमिषेद्गन्तुमिच्छेन्महत्त्वं प्रा-<br>प्तं यदि कामयेतेत्यर्थः, तस्येदं<br>कर्म विधीयते। महत्त्वे हि सति<br>श्रीरुपनमते। श्रीमतो ह्यर्थप्राप्तं<br>धनं ततः कर्मानुष्ठानं ततश्च | अब इसके पश्चात् यदि वह<br>महत् यानी महत्त्वको प्राप्त होना<br>चाहे अर्थात् महत्त्वप्राप्तिकी कामना<br>रखता हो तो उसके लिये इस<br>कर्मका विधान किया जाता है,<br>क्योंकि महत्त्व प्राप्त होनेपर ही लक्ष्मी<br>समीप आती है, क्योंकि श्रीमान्को<br>धन तो स्वतः प्राप्त होता ही है, उससे<br>कर्मानुष्ठान होता है और उससे |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५
| देवयानं पितृयाणं वा पन्थानं प्रतिपत्स्यत इत्येतत्प्रयोजनमुररीकृत्य महत्त्वप्रेप्सोरिदं कर्म न विषयोपभोगकामस्य। तस्यायं कालादिविधिरुच्यते—<br><br>अमावास्यायां दीक्षित्वा दीक्षित इव भूमिशयनादिनियमं कृत्वा तपोरूपं सत्यवचनं ब्रह्मचर्यमित्यादिधर्मवान्भूत्वेत्यर्थः। न पुनर्दैक्षमेव कर्मजातं सर्वमुपादत्ते, अतद्विकारत्वान्मन्थाख्यस्य कर्मणः। “उपसद्व्रती” (बृ० उ० ६।३।१) इति श्रुत्यन्तरात्पयोमात्रभक्षणं च शुद्धिकारणं तप उपादत्ते। पौर्णमास्यां रात्रौ कर्मारभते। सर्वौषधस्य ग्राम्यारण्यानामोषधीनां यावच्छक्त्यल्पमल्पमुपादाय तद्वितुषीकृत्याममेव पिष्टं दधिमधुनोरौदुम्बरे कंसाकारे चम- | देवयान अथवा पितृयाण मार्ग प्राप्त होना सम्भव है—इस उद्देश्यको लक्ष्यमें रखकर ही महत्त्वप्राप्तिकी इच्छावालेके लिये—विषयोपभोगकी कामनावालेके लिये नहीं—यह कर्म आरम्भ किया जाता है। उसकी यह कालादि विधि कही जाती है—<br><br>अमावास्याके दिन दीक्षित हो—दीक्षित पुरुषके समान भूमिशयन आदि नियम कर अर्थात् तपःस्वरूप-सत्यवचन, ब्रह्मचर्य इत्यादि धर्मवाला होकर पूर्णिमाकी रात्रिको इस कर्मका आरम्भ करता है। [इस कर्ममें दीक्षित होनेवाला पुरुष] दीक्षा-सम्बन्धी [मौञ्जीबन्धनादि] समस्त कर्मोंका ग्रहण नहीं करता, क्योंकि यह मन्थाख्य कर्म किसी अन्य कर्मका विकार नहीं है। “उपसद्व्रती भूत्वा” ऐसी अन्य श्रुति होनेके कारण वह शुद्धिका कारणभूत पयोभक्षणमात्र तप स्वीकार करता है। सर्वौषध अर्थात् यथाशक्ति ग्राम्य और वन्य समस्त ओषधियोंका थोड़ा-थोड़ा भाग लेकर उन्हें तुषरहित कर उसकी कच्ची पिट्ठीको एक अन्य श्रुतिके अनुसार दही और मधुके सहित कंसाकार अथवा चमसाकार |
४६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| साकारे वा पात्रे श्रुत्यन्तरात्प्रक्षिप्योपमथ्याग्रतः स्थापयित्वा ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावावसथ्य आज्यस्यावापस्थाने हुत्वा स्रुवसंलग्नं मन्थे संपातमवनयेत्संस्रवमधः पातयेत् ॥ ४ ॥ | गूलरके पात्रमें डालकर उसका मन्थन कर उसे अपने आगे रख 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए आवसथ्याग्निमें आवापस्थानमें घृतकी आहुति दे और स्रुवमें लगे हुए अवशिष्ट हविको मन्थमें डाल दे अर्थात् उस घृतकी धाराको मन्थमें गिरा दे ॥४॥ |
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वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ५ ॥
[ इसी प्रकार ] 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले; 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले; 'संपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले तथा 'आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले ॥ ५ ॥
| समानमन्यत्, वसिष्ठाय प्रतिष्ठायै संपद आयतनाय स्वाहेति प्रत्येकं तथैव संपातमवनयेद्धुत्वा ॥ ५ ॥ | शेष अर्थ पूर्ववत् है; 'वसिष्ठाय, प्रतिष्ठायै, संपदे तथा आयतनाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए प्रत्येक मन्त्रके अनन्तर आहुति देकर उसी प्रकार घृतका स्राव [ मन्थमें ] डाले ॥ ५ ॥ |
—:०:—
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७
अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदग्ंस हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यग्ंश्रैष्ठ्यग्ंराज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदग्ं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥
तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमें ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [ अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ— ] हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [ अपने प्राणभूत ] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ ॥६॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अथ प्रतिसृप्याग्नेरीषदपसृत्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्तीमं मन्त्रम् अमो नामास्यमा हि ते। अम इति प्राणस्य नाम, अन्नेन हि प्राणः प्राणिति देह इत्यतो मन्थद्रव्यं प्राणस्यान्नत्वात्प्राणत्वेन स्तूयतेऽमो नामासीति। कुतः ? यतोऽमा सह हि यस्मात्ते तव प्राणभूतस्य सर्वं समस्तं जगदिदमतः स हि प्राणभूतो मन्थो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। अत एव च राजा दीप्तिमानधिपतिश्चाधिष्ठाय पालयिता सर्वस्य। स मा मामपि मन्थः प्राणो | फिर प्रतिसर्पण कर—अग्निसे कुछ हटकर मन्थको अञ्जलिमें रख इस मन्त्रको जपता है—'अम नामासि अमा हि ते' इत्यादि। 'अम' यह प्राणका नाम है, अन्नके कारण ही प्राण शरीरमें प्राणनक्रिया करता है; इसीसे मन्थद्रव्य प्राणका अन्न होनेके कारण 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रद्वारा प्राणरूपसे स्तुत होता है। तू क्यों 'अम' नामवाला है ?—क्योंकि प्राणभूत तेरे साथ ही यह सारा जगत् है; अतः वह [तू] प्राणभूत मन्थ ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। इसीसे तू राजा—दीप्तिमान् और अधिपति—सबका अधिष्ठान होकर पालन करनेवाला है। वह |
४६८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५]
४६८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ५]
| ज्यैष्ठ्यादिगुणपूगमात्मनो गमयत्वहमेवेदं सर्वं जगदसानि भवानि प्राणवत् । इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | मन्थरूप प्राण मुझे भी अपने ज्येष्ठत्व आदि गुणसमूहको प्राप्त करावे। प्राणके समान मैं भी यह सम्पूर्ण जगत्स्वरूप हो जाऊँ । 'इति' शब्द मन्त्रकी समाप्तिके लिये है ॥६॥ |
अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति । तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति । वयं देवस्य भोजनमित्याचामति । श्रेष्ठँसर्वधातममित्याचामति । तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति । निर्णिज्य कँसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः । स यदि स्त्रियं पश्येत्स समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥
फिर वह इस ऋचासे* पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्सवितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'वयं देवस्य भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'श्रेष्ठँ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है; तथा 'तुरं भगस्य धीमहि' ऐसा कहकर कंस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर (अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे) अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो वैसा समझे कि कर्म सफल हो गया ॥७॥
| अथानन्तरं खल्वेतया वक्ष्यमाणयर्चा पच्छः पादश आचा- | इसके अनन्तर वह इस कही जानेवाली ऋचासे पादशः आचमन—भक्षण करता है; अर्थात् इस |
* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही सविता देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'
| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४६९ |
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| मति भक्षयति मन्त्रस्यैकैकेन पादेनैकेकं ग्रासं भक्षयति । तद्भोजनं सवितुः सर्वस्य प्रसवितुः प्राणमादित्यं चैकीकृत्योच्यते, आदित्यस्य वृणीमहे प्रार्थयेमहि मन्थरूपम् । येनान्नेन सावित्रेण भोजनेनोपभुक्तेन वयं सवितृस्वरूपापन्ना भवेमेत्यभिप्रायः । देवस्य सवितुरिति पूर्वेण संबन्धः श्रेष्ठं प्रशस्यतमं सर्वान्नेभ्यः सर्वधातमं सर्वस्य जगतो धारयितृतममतिशयेन विधातृतममिति वा । सर्वथा भोजनविशेषणम् । तुरं त्वरं तूर्णं शीघ्रमित्येतत् । भगस्य देवस्य सवितुः स्वरूपमिति शेषः । धीमहि चिन्तयेमहि विशिष्टभोजनेन संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्त इत्यभिप्रायः । अथवा भगस्य श्रियः कारणं महत्त्वं प्राप्तुं कर्म | मन्त्रके एक-एक पादसे एक-एक ग्रास भक्षण करता है । हम सविता—सबका प्रसव करनेवाले आदित्यके उस मन्थरूप भोजनकी प्रार्थना करते हैं—यहाँ प्राण और आदित्यको एक मानकर ऐसा कहा गया है—जिस अन्न अर्थात् सविता देवतासे उपभोग किये हुए भोजनद्वारा हम सूर्यस्वरूपको प्राप्त होंगे—ऐसा इसका अभिप्राय है । 'देवस्य सवितुः' इस प्रकार 'देवस्य' पदका पहले [ सवितुः पद ] से सम्बन्ध है । श्रेष्ठ—समस्त अन्नोंकी अपेक्षा प्रशस्यतम, 'सर्वधातमम्'—समस्त जगत्के उत्कृष्ट धारयिता अथवा सम्पूर्ण जगत्के अतिशय विधाता ( उत्पत्तिकर्ता ) [—इस प्रकार कुछ भी अर्थ किया जाय ] यह सर्वथा भोजनका विशेषण है । हम तुर-त्वर--तूर्णं अर्थात् शीघ्र ही भग—सविता देवताके स्वरूपका—'स्वरूप' शब्द यहाँ शेष है—[ अर्थात् यह ऊपरसे लाना पड़ता है ] ध्यान—चिन्तन करते हैं; तात्पर्य यह है कि उस विशिष्ट भोजनसे संस्कारयुक्त और शुद्धचित्त होकर हम उसके स्वरूपका ध्यान करते हैं । अथवा भग यानी श्रीके कारणभूत महत्त्वको प्राप्त करनेके |
४७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| कृतवन्तो वयं तद्धीमहि चिन्त-<br>येमहीति सर्वं च मन्थलेपं पिबति<br>निर्णिज्य प्रक्षाल्य कंसं कंसाकारं<br>चमसं चमसाकारं बौदुम्बरं<br>पात्रम् ।<br> पीत्वाचम्य पश्चादग्नेः प्रा-<br>क्शिराः संविशति चर्मणि वाऽजिने<br>स्थण्डिले केवलायां वा भूमौ,<br>वाचंयमो वाग्यतः सन्नित्यर्थः,<br>अप्रसाहो न प्रसह्यते नाभिभूयते<br>स्त्र्याद्यनिष्टस्वप्नदर्शनेन यथा<br>तथा संयतचित्तः सन्नित्यर्थः,<br>स एवंभूतो यदि स्त्रियं पश्येत्स्व-<br>प्नेषु तदा विद्यात्समृद्धं ममेदं<br>कर्मेति ॥ ७ ॥ | लिये कर्म करनेवाले हम उसका ध्यान<br>—चिन्तन करते हैं। ऐसा कहकर<br>कंस—कंसाकार अथवा चमस—<br>चमसाकार गूलरके पात्रको धोकर<br>सारे मन्थलेपको पी जाता है।<br> मन्थलेपको पीकर आचमन<br>करनेके अनन्तर अग्निके पीछे चर्म-<br>[ मृगादिकी ] खालपर अथवा<br>स्थण्डिल--केवल भूमिपर ही पूर्वकी<br>ओर शिर करके वाचंयम अर्थात्<br>संयतवाक् होकर तथा अप्रसाह<br>यानी इस प्रकार संयतचित्त होकर<br>कि जिससे स्त्री आदि अनिष्ट स्वप्नके<br>देखनेसे विकृत न हो जाय सो जाता<br>है। ऐसी अवस्थामें यदि वह स्वप्नमें<br>स्त्रीको देखे तो यह समझे कि मेरा<br>यह कर्म समृद्ध हो गया ॥ ७ ॥ |
तदेष श्लोको यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियꣳस्वप्नेषु पश्यति समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने ॥ ८ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है—जिस समय काम्यकर्मोंमें स्वप्नमें स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ८ ॥
| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको<br>मन्त्रोऽपि भवति । यदा कर्मसु | उस इसी अर्थमें यह श्लोक-<br>मन्त्र भी है। जब कि काम्य- |
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७१ |
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| काम्येषु कामार्थेषु स्त्रियं स्वप्नेषु स्वप्नदर्शनेषु स्वप्नकालेषु वा पश्यति समृद्धिं तत्र जानीयात् । कर्मणां फलनिष्पत्तिर्भविष्यतीति जानीयादित्यर्थः । तस्मिन् स्त्र्यादिप्रशस्तस्वप्नदर्शने सतीत्यभिप्रायः । द्विरुक्तिः कर्मसमाप्त्यर्था ॥ ८ ॥ | कामनाओंके लिये किये हुए कर्मोंमें स्वप्नमें—स्वप्नदर्शनमें अथवा स्वप्नकालमें स्त्रीको देखे तो उसमें समृद्धि समझे; अर्थात् उन कर्मोंका फल प्राप्त होगा—ऐसा जाने । तात्पर्य यह है कि उस स्त्री आदि प्रशस्त स्वप्नदर्शनके होनेपर [ कर्मकी सफलता समझे ] । 'तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने' यह द्विरुक्ति कर्मकी समाप्तिके लिये है॥८॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥
तृतीय खण्ड
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पाञ्चालोंकी सभामें श्वेतकेतु
| ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः संसारगतयो वक्तव्या वैराग्यहेतोर्मुमुक्षूणामित्यत आख्यायिकारभ्यते-- | मुमुक्षु पुरुषोंके वैराग्यके लिये ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त संसारकी गतियोंका वर्णन करना चाहिये—इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है— |
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श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाꣳसमितिमेयाय तꣳह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥
आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामें आया । उससे जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'हे कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है !' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥
| श्वेतकेतुर्नामतः, ह इत्यैतिह्यार्थः, अरुणस्यापत्यमारुणिस्तस्यापत्यमारुणेयः पञ्चालानां जनपदानां समितिं सभामेयायाजगाम । तमागतवन्तं ह प्रवाहणो नामतो जीवलस्यापत्यं जैवलिरुवाचोक्तवान् । हे कुमारानु त्वा त्वामशिषदन्वशिषत्पिता ? किमनुशिष्टस्त्वं | श्वेतकेतु नामवाला—'ह' यह निपात ऐतिह्यके लिये है—अरुणके पुत्रको आरुणि कहते हैं, उसका पुत्र आरुणेय पञ्चाल देशके लोगोंकी सभामें आया । उस आये हुएसे प्रवाहण नामवाले जीवलके पुत्र जैवलिने कहा---'हे कुमार ! क्या पिताने तुझे अनुशासित (शिक्षित) किया है ?' अर्थात् 'क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' ऐसा कहे |
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३
| पित्रेत्यर्थः । इत्युक्तः स अङ्—<br>अनु हि अनुशिष्टोऽस्मि भगव<br>इति सूचयन्नाह ॥ १ ॥ | जानेपर उसने कहा—"हाँ,<br>भगवन् ! मैं अनुशासित किया गया<br>हूँ"—इस प्रकार सूचित करते हुए<br>उसने उत्तर दिया ॥ १ ॥ |
प्रवाहणके प्रश्न
| तं होवाच—यद्यनुशिष्टोऽसि, | उसने उससे कहा—'यदि तुझे शिक्षा दी गयी है तो— |
वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ? न भगव इति । वेत्थ यथा पुनरावर्तन्त ३ इति ? न भगव इति । वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति ? न भगव इति ॥ २ ॥
'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे [ जानेपर ] प्रजा कहाँ जाती है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'भगवन् ! नहीं।' [ प्रवाहण— ] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'नहीं, भगवन् !' [ प्रवाहण— ] 'देवयान और पितृयाण—इन दोनों मार्गोंका एक दूसरेसे विलग होनेका स्थान तुझे मालूम है ?' [ श्वेतकेतु— ] 'नहीं भगवन् !' ॥ २ ॥
| वेत्थ यदितोऽस्माल्लोकादधि ऊर्ध्वं यत्प्रजाः प्रयन्ति यद्गच्छन्ति, तत्किं जानीषे ? इत्यर्थः । न भगव इत्याहेतरः, न जानेऽहं तद्यत्पृच्छसि । एवं तर्हि, वेत्थ जानीषे यथा येन प्रकारेण पुनरावर्तन्त इति न भगव इति प्रत्याह । | 'क्या तू जानता है कि यहाँसे—इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती है ? तात्पर्य यह है कि क्या तुझे इसका पता है ?' इसपर दूसरे (श्वेतकेतु) ने कहा—'भगवन् ! नहीं, आप जो कुछ पूछते हैं वह मैं नहीं जानता।' 'अच्छा तो; जिस तरह वह इस लोकमें आती है वह क्या तुझे मालूम है ?' इसपर उसने उत्तर दिया--'भगवन् ! नहीं।' क्या |
४७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| वेत्थ पथोर्मार्गयोः सहप्रयाणयोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना व्यावर्तनमितरेतरवियोगस्थानं सह गच्छताम् ? इत्यर्थः । न भगव इति ॥२॥ | तुझे साथ-साथ जानेवाले देवयान और पितृयाण इन दोनों मार्गोंकी व्यावर्तना--व्यावर्तन अर्थात् इनपर साथ-साथ जानेवाले पुरुषोंके एक दूसरेसे अलग होनेके स्थानका पता है ? 'भगवन् ! नहीं ॥ २ ॥ |
वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति । वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति ? नैव भगव इति ॥ ३ ॥
[ प्रवाहण— ] 'तुझे मालूम है, यह पितृलोक भरता क्यों नहीं ?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं ।' [ प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप ( सोमघृतादि रस ) 'पुरुष' संज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं ?' [ श्वेतकेतु—] नहीं, 'भगवन् ! नहीं' ॥३॥
| वेत्थ यथासौ लोकः पितृसम्बन्धी–यं प्राप्य पुनरावर्तन्ते, बहुभिः प्रयद्भिरपि येन कारणेन न सम्पूर्यत इति ? न भगवत इति प्रत्याह । वेत्थ यथा येन क्रमेण पञ्चम्यां पञ्चसंख्याकायामाहुतौ हुतायामाहुतिनिर्वृत्ता आहुतिसाधनाश्चापः पुरुषवचसः पुरुष इत्येवं वचोऽभिधानं यासां हूय- | 'क्या तू जानता है कि यह पितृगणसम्बन्धी लोक, जिसे प्राप्त होकर फिर लौट आते हैं, बहुतोंके जानेपर भी किस कारणसे नहीं भरता ?' 'भगवन् ! नहीं' ऐसा उसने उत्तर दिया । 'क्या तुझे मालूम है कि किस प्रकार-किस क्रमसे पाँचवीं–पाँच संख्यावाली आहुतिके हुत होने पर आहुतिमें रहनेवाले आहुतिके साधनभूत आप पुरुषवाची हो जाते हैं ? तात्पर्य यह है कि हवन किये जानेवाले |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७५
| मानानां क्रमेण षष्ठाहुतिभूतानां ताः पुरुषवचसः पुरुषशब्दवाच्या भवन्ति पुरुषाख्यां लभन्ते ? इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव इत्याह, नैवाहमत्र किञ्चन जानामीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | जिन छठी आहुतिभूत द्रव्योंका 'पुरुष' यही वचन यानी नाम है वे पुरुषवाची कैसे हो जाते हैं ? अर्थात् पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हैं ?' ऐसा कहे जानेपर उसने यही कहा— 'भगवन् ! नहीं; अर्थात् मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता' ॥ ३ ॥ |
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प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना
अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथंसोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति। स हायस्तः पितुरर्धमेय्याय तँहोवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥
'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों बोलता था ? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है ?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥
| अथैवमज्ञः सन्किमनु कस्मात्त्वमनुशिष्टोऽस्मीत्यवोचथा उक्तवानसि ? यो हीमानि मया पृष्टान्यर्थजातानि न विद्यान्न विजानीयात्कथं स विद्वत्स्वनुशिष्टोऽस्मीति ब्रुवीत ? इत्येवं स श्वेतकेतुं राज्ञायस्त आयासितः | 'तो फिर इस प्रकार अज्ञ होनेपर भी तूने 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कहा ? जो पुरुष इन मेरी पूछी हुई बातोंको नहीं जानता वह विद्वानोंमें 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कह सकता है ? इस प्रकार राजासे आयस्त—पीडित हो वह श्वेतकेतु अपने |
४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| सन्पितुरर्धंस्थानमेयायागतवान्, तं च पितरमुवाच----अननुशिष्यानुशासनमकृत्वैव मा मां किल भगवान्समावर्तनकालेऽब्रवीदुक्तवाननु त्वाशिषमन्वशिषं त्वामिति ॥ ४ ॥ | पिताके अर्ध-स्थानपर आया और उस अपने पितासे बोला--'श्रीमान्-ने अनुशासन किये बिना ही समावर्तन संस्कारके समय मुझसे कह दिया था कि 'मैने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥ |
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| यतः--- । | क्योंकि— |
पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत्तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं तदैतानवदो यथाहमेषां नैकञ्चन वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥
'उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' उसने कहा--'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हें क्यों न बतलाता?' ॥५॥
| पञ्च पञ्चसंख्याकान्प्रश्नान् राजन्यबन्धू राजन्या बन्धवोऽस्येति राजन्यबन्धुः स्वयं दुर्वृत्त इत्यर्थः । अप्राक्षीत्पृष्टवान्; तेषां प्रश्नानां नैकञ्चन एकमपि नाशकं न शक्तवानहं विवक्तुं विशेषेणार्थतो निर्णैतुमित्यर्थः । | 'राजन्यबन्धुने--राजन्य (क्षत्रिय लोग) जिसके बन्धु हों उसे राजन्यबन्धु कहते हैं अर्थात् जो स्वयं दुराचारी है ऐसे उस राजन्यबन्धुने मुझसे पाँच--गिनतीके पाँच प्रश्न पूछे थे; किंतु मैं उन प्रश्नोंमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका; अर्थात् उनका विशेषरूपसे अर्थतः निर्णय नहीं कर सका।' |
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| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |
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| स होवाच पिता--यथा मा मां वत्स त्वं तदागतमात्र एवैतान् प्रश्नानवद उक्तवानसि--तेषां नैकञ्चनाशकं विवक्तुमिति, तथा मां जानीहि, त्वदीयाज्ञानेन लिङ्गेन मम तद्विषयमज्ञानं जानीहीत्यर्थः । कथम् ? यथाहमेषां प्रश्नानामेकञ्चनैकमपि न वेद न जान इति; यथा त्वमेवाङ्गैतान् प्रश्नान्न जानीषे तथाहमप्येतान्न जान इत्यर्थः । अतो मय्यन्यथाभावो न कर्तव्यः । कुत एतदेवम् ? यतो न जाने; यद्यहमिमान्प्रश्नानवेदिष्यं विदितवानस्मि, कथं ते तुभ्यं प्रियाय पुत्राय समावर्तनकाले पुरा नावक्ष्यं नोक्तवानस्मि ? ॥ ५ ॥ | तब उस पिताने कहा--'हे वत्स ! तुमने उस समय आते ही जैसे ये प्रश्न मुझसे कहे हैं उनमेंसे मैं एकका भी विवेचन नहीं कर सकता । ऐसा ही तुम मुझे समझो; अर्थात् अपने अज्ञानरूप लिङ्गसे तुम उस विषयमें मेरा अज्ञान समझ लो; ऐसा क्यों ? क्योंकि इन प्रश्नोंमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता । तात्पर्य यह है कि हे तात ! जिस प्रकार तुम इन प्रश्नोंको नहीं जानते उसी प्रकार मैं भी नहीं जानता । अतः मेरे प्रति तुम्हें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये । किंतु यह बात ऐसी कैसे समझी जाय ? क्योंकि मैं इन्हें जानता नहीं हूँ; यदि मैं इन प्रश्नोंको जानता तो पहले समावर्तनसंस्कारके समय अपने प्रियपुत्र तुम्हारे प्रति क्यों न कहता !' ॥ ५ ॥ |
पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना
| इत्युक्त्वा-- | ऐसा कहकर-- |
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स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तँहोवाच मानुषस्य भगवन्गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति। स होवाच तवैव
४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
राजन्मानुषं वित्तंयामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्ता-
मेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव ॥ ६ ॥
तब वह गौतम राजाके स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [ दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजाके सभामें पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। उसने उससे कहा—'हे भगवान् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये।' उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें; आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात [ प्रश्नरूपसे ] कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह संकटमें पड़ गया ॥ ६ ॥
| स ह गौतमो गोत्रतः, राज्ञो जैवलेरर्धं स्थानमेयायागतवान् । तस्मै ह गौतमाय प्राप्तायार्हाम-र्हणां चकार कृतवान् । स च गौतमः कृतातिथ्य उषित्वा परेद्युः प्रातःकाले सभागे सभां गते राज्ञ्युदेयाय । भजनं भागः पूजा सेवा सह भागेन वर्तमानो वा सभागः पूज्यमानोऽन्यैः स्वयं गौतम उदेयाय राजान-मुद्गतवान् ।<br><br>तं होवाच गौतमं राजा—मानुषंस्य भगवन्गौतम मनुष्य-सम्बन्धिनो वित्तस्य ग्रामादेर्वरं वरणीयं कामं वृणीथाःप्रार्थयेथाः। | वह गौतम-गोत्रोत्पन्न मुनि राजा जैवलिके स्थानपर आया । अपने यहाँ आये हुए उस गौतमकी उसने अर्हा-पूजा की । इस प्रकार आतिथ्यसत्कारसे सत्कृत वह गौतम उस दिन निवास कर दूसरे दिन सबेरे ही राजाके सभागत होने--सभामें पहुँचनेपर उसके समीप गया । अथवा [ 'सभागः' पाठ मानकर ऐसा अर्थ हो सकता है-] भाग-भजन अर्थात् पूजा-सेवाको कहते हैं जो भागसे युक्त अर्थात् दूसरेसे पूजित था वह गौतम स्वयं राजाके पास गया ।<br><br>उस गौतमसे राजाने कहा--'हे भगवन् ! आप मनुष्यसम्बन्धी ग्रामादि धनका वरण करने योग्य वर इच्छानुसार माँग लीजिये।' |
खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ४७९
| स होवाच गौतमः—तवैव तिष्ठतु राजन्मानुष वित्तम्; यामेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचं पञ्चप्रश्नलक्षणामभाषथा उक्तवानसि तामेव वाचं मे मह्यं ब्रूहि कथयेत्युक्तो गौतमेन राजा सह कृच्छ्री दुःखी बभूव—कथं न्विदामिति ॥६॥ | उस गौतमने कहा—‘हे राजन् ! यह मनुष्यसम्बन्धी धन तुम्हारे ही पास रहे । तुमने कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके प्रति जो पाँच प्रश्नरूप बात कही थी वही मुझसे कहो । गौतमके इस प्रकार कहनेपर वह राजा यह कहता हुआ कि ‘यह कैसे हो सकता है?’ कृच्छ्री --दुखी हो गया ॥ ६ ॥ |
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प्रवाहणका वरप्रदान
| स ह कृच्छ्रीभूतोऽप्रत्याख्येयं ब्राह्मणं मन्वानो न्यायेन विद्या वक्तव्येति मत्वा— | इस प्रकार दुखी हुए उस राजाने ‘ब्राह्मणका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये’ यह मानते हुए तथा ‘विद्याका नियमानुसार ही उपदेश करना चाहिये’ यह समझते हुए— |
तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तꣳहोवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥
उसे ‘यहाँ चिरकालतक रहो’ ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—‘हे गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला—॥ ७ ॥
| तं ह गौतमं चिरं दीर्घकालं वसेत्येवमाज्ञापयाञ्चकाराज्ञप्तवान्। यत्पूर्वं प्रत्याख्यातवान्राजा | उस गौतमको उसने 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी । राजाने पहले जो विद्याका प्रत्या- |
४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| विद्यां यच्च पश्चाच्चिरं वसेत्याज्ञाप्तवान्, तन्निमित्तं ब्राह्मणं क्षमापयति हेतुवचनोक्त्या ।<br><br>तं होवाच राजा सर्वविद्यो ब्राह्मणोऽपि सन्नयथा येन प्रकारेण मा मां हे गौतमावदस्त्वं तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे ब्रूहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रकारेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्मणान्न गच्छति न गतवती । न च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशासितवन्तः । तथैतत्प्रसिद्धं लोकेयतस्तस्मादु पुरा पूर्वं सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव क्षत्रजातेरेवानया विद्यया प्रशासनं प्रशास्तृत्वं शिष्याणामभूद्बभूव । क्षत्रियपरम्परयैवेयं विद्यैतावन्तं कालमागता, तथाप्यहमेतां तुभ्यं वक्ष्यामि त्वत्सम्प्रदानादूर्ध्वं ब्राह्मणान्गमिष्यति । अतो मया यदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसीत्युक्त्वा तस्मै होवाच विद्यां राजा ॥७॥ | स्थान किया और फिर उसे 'चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, उसका कारण बतलाते हुए वह ब्राह्मणसे क्षमा कराता है।<br><br>राजाने उससे कहा—'सर्वविद्यासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी हे गौतम ! तुमने जिस प्रकार मुझसे 'उस विद्यारूप वाणीको ही मेरे प्रति कहो' इस प्रकार अज्ञानपूर्वक कहा है इससे तुम यह जानो। उसमें यह कारण बतलाता है कि जिससे यह विद्या तुमसे पहले ब्राह्मणोंमें नहीं गयी तथा इस विद्याद्वारा ब्राह्मणोंने उपदेश ही नहीं किया; क्योंकि इस प्रकार यह बात इस लोकमें प्रसिद्ध है इसीसे पूर्वकालमें समस्त लोकोंमें क्षत्रियका ही--क्षत्रियजातिका ही इस विद्याके द्वारा शिष्योंका शासन--शिक्षकत्व रहा है। अर्थात् क्षत्रियोंकी परम्परासे ही इतने समयतक यह विद्या आयी है। तथापि मैं तुम्हारे प्रति इसका उपदेश करूँगा। तुम्हें देनेके पश्चात् यह ब्राह्मणोंके पास जायगी। इसलिये मैंने जो कुछ कहा है उसे क्षमा करना। ऐसा कहकर राजाने उसे विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥ |
--: ० :-- इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥ -—: ० :—-