भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

षड्विंश खण्ड

इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश

तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशात्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः संकल्प आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामात्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदꣳसर्वमिति ॥ १ ॥

उस इस प्रकार देखनेवाले, इस प्रकार मनन करनेवाले और इस प्रकार जाननेवाले इस विद्वान्‌के लिये आत्मासे प्राण, आत्मासे आशा, आत्मासे स्मृति, आत्मासे आकाश, आत्मासे तेज, आत्मासे जल, आत्मासे आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मासे अन्न, आत्मासे बल, आत्मासे विज्ञान, आत्मासे ध्यान, आत्मासे चित्त, आत्मासे संकल्प, आत्मासे मन, आत्मासे वाक्, आत्मासे नाम, आत्मासे मन्त्र, आत्मासे कर्म और आत्मासे ही यह सब हो जाता है ॥ १ ॥

तस्य ह वा एतस्येत्यादि स्वाराज्यं प्राप्तस्य प्रकृतस्य विदुष इत्यर्थः । प्राक्सदात्मविज्ञानात्स्वात्मनोऽन्यस्मात्सतः प्राणादे-'तस्य ह वा एतस्य' इत्यादिका यह तात्पर्य है कि स्वाराज्यको प्राप्त हुए इस प्रकृत विद्वान्‌के लिये सबका आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेके पूर्व प्राणसे लेकर नामपर्यन्त पदार्थोंके उत्पत्ति और प्रलय स्वात्मासे भिन्न

खण्ड २६] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

नर्नामान्तस्योत्पत्तिप्रलयावभूताम्। सदात्मविज्ञाने तु सतीदानीं स्वात्मत एव संवृत्तौ तथा सर्वोऽप्यन्यं व्यवहार आत्मत एव विदुषः ॥ १ ॥सतसे होते थे। किन्तु अब सत्‌का आत्मत्व ज्ञात होनेपर वे अपने आत्मासे ही हो गये। इसी प्रकार विद्वान्‌का और भी सब व्यवहार आत्मासे ही होने लगता है ॥१॥

किञ्च-- | तथा—

तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताᳵसर्वᳵ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति। स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विँशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारस्तँस्कन्द इत्याचक्षते तँस्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥

इस विषयमें यह मन्त्र है—विद्वान् न तो मृत्युको देखता है, न रोगको और न दुःखत्वको ही। वह विद्वान् सबको [ आत्मरूप ही ] देखता है; अतः सबको प्राप्त हो जाता है। वह एक होता है; फिर वही तीन, पाँच, सात और नौ रूप हो जाता है। फिर वही ग्यारह कहा गया है तथा वही सौ, दश, एक सहस्र और बीस भी होता है। आहारशुद्धि (विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि) होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर निश्चल स्मृति होती है तथा स्मृतिकी प्राप्ति होनेपर सम्पूर्ण ग्रन्थियोंकी निवृत्ति हो जाती है। [इस प्रकार] जिनकी वासनाएँ क्षीण हो गयी थीं उन (नारदजी) को भगवान् सनत्कुमारने अज्ञानान्धकारका पार दिखलाया।

| ८०० | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ७ |

८००छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ७

उन (सनत्कुमारजी) को 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं, 'स्कन्द' ऐसा कहते हैं॥ २ ॥

| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति—न पश्यः पश्यतीति। पश्यो यथोक्तदर्शी विद्वानित्यर्थः, मृत्युं मरणं रोगं ज्वरादि दुःखतां दुःखभावं चापि न पश्यति। सर्वं ह सर्वमेव स पश्यः पश्यत्यात्मानमेव सर्वम्। ततः सर्वमाप्नोति सर्वशः सर्वप्रकारैरिति। <br><br> किञ्च स विद्वान्प्राक्सृष्टिप्रभेदादेकधैव च संस्त्रिधादिभेदैरनन्तभेदप्रकारो भवति सृष्टिकाले। पुनः संहारकाले मूलमेव स्वं पारमार्थिकमेकधाभावं प्रतिपद्यते स्वतन्त्र एवेति विद्याफलेन प्ररोचयन्स्तौति। <br><br> अथेदानीं यथोक्ताया विद्यायाः सम्यगवभासकारणं मुखावभासकारणस्तेवादर्शस्य विशुद्धिकारणं | इस विषयमें यह श्लोक—मन्त्र भी है। पश्य नहीं देखता। पश्य अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे देखनेवाला विद्वान् मृत्यु—मरण, ज्वरादि रोग और दुःखत्व यानी दुःखभावको नहीं देखता। वह पश्य—विद्वान् सभीको देखता है अर्थात् सबको आत्मरूप ही देखता है। इसीसे वह सबको सब प्रकार प्राप्त होता है। <br><br> तथा वह विद्वान् सृष्टिभेदके पूर्व एकरूप होता हुआ ही सृष्टिकालमें त्रिधा आदि अनन्तभेद प्रकारोंवाला हो जाता है। और फिर संहारकालमें अपने मूल पारमार्थिक एकधाभावको ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह स्वतन्त्र ही है—इस प्रकार विद्याके फलद्वारा रुचि उत्पन्न करते हुए सनत्कुमारजी उसकी स्तुति करते हैं। <br><br> इसके पश्चात् अब मुखावभासकी हेतुभूत दर्पणकी विशुद्धि करनेके समान उपर्युक्त विद्याके सम्यक् प्रकारसे प्रतिफलित होनेके हेतुभूत साधनका उपदेश किया |

खण्ड २६ ]शाङ्करभाष्यार्थ८०१
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
साधनमुपदिश्यते । आहारशुद्धौ । आहियत इत्याहारः शब्दादिविषयविज्ञानं भोक्तुर्भोगायाहियते तस्य विषयोपलब्धिलक्षणस्य विज्ञानस्य शुद्धिराहारशुद्धी रागद्वेषमोहदोषैरसंसृष्टं विषयविज्ञानमित्यर्थः ।जाता है—'आहारशुद्धौ' इत्यादि । जिनका आहरण किया जाय उन्हें 'आहार' कहते हैं; भोक्ताके भोगके लिये शब्दादि विषयविज्ञानका आहरण किया जाता है; उस विषयोपलब्धिरूप विज्ञानकी शुद्धि ही 'आहारशुद्धि' है, अर्थात् राग-द्वेष, मोह आदि दोषोंसे असंसृष्ट विषयविज्ञान ।
तस्यामाहारशुद्धौ सत्यां तद्वतोऽन्तःकरणस्य सत्त्वस्य शुद्धिनैर्मल्यं भवति, सत्त्वशुद्धौ च सत्यां यथावगते भूमात्मनि ध्रुवाविच्छिन्ना स्मृतिरविस्मरणं भवति । तस्यां च लब्धायां स्मृतिलम्भे सति सर्वेषामविद्याकृतानर्थपाशरूपाणामनेकजन्मान्तरानुभवभावनाकाठिनीकृतानां हृदयाश्रयाणां ग्रन्थीनां विप्रमोक्षो विशेषेण प्रमोक्षणं विनाशो भवतीति । यत एतदुत्तरोत्तरं यथोक्तमाहारशुद्धिमूलं तस्मात्सा कार्येत्यर्थः ।उस आहारशुद्धिके होनेपर उससे युक्त अन्तःकरण यानी सत्त्वकी शुद्धि-निर्मलता होती है; और अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर उपर्युक्त प्रकारसे जाने गये भूमात्मामें ध्रुव—अविच्छिन्न स्मृति यानी अविस्मरण हो जाता है तथा उसकी प्राप्ति होनेपर—स्मृति लब्ध होनेपर अनेक जन्मोंमें अनुभव की हुई भावनाओंसे कठिन की हुई अविद्याकृत अनर्थपाशरूप हृदयस्थित ग्रन्थियोंका विप्रमोक्ष—विशेषरूपसे प्रमोक्षण—विनाश हो जाता है । इस प्रकार क्योंकि यह ऊपर कहा हुआ सब कुछ उत्तरोत्तर आहारशुद्धिमूलक है, इसलिये वह अवश्य करनी चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ।

८०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

८०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| सर्वं शास्त्रार्थमशेषत उक्त्वा-ख्यायिकामुपसंहरति श्रुतिः—तस्मै मृदितकषायाय वार्क्षादिरिव कषायो रागद्वेषादिदोषः सत्त्वस्य रञ्जनारूपत्वात्स ज्ञानवैराग्याभ्यासरूपक्षारेण क्षालितो मृदितो विनाशितो यस्य नारदस्य तस्मै योग्याय मृदितकषायाय तमसोऽविद्यालक्षणात्पारं परमार्थतत्त्वं दर्शयति दर्शितवानित्यर्थः। कोऽसौ ? भगवान्—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति” ( विष्णुपु० ६ । ५ । ७८ ) एवंधर्मा सनत्कुमारः। तमेव सनत्कुमारं देवं स्कन्द इत्याचक्षते कथयन्ति तद्विदः। द्विर्वचनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ २ ॥ | शास्त्रके सम्पूर्ण अभिप्रायको सम्यक् प्रकारसे कहकर श्रुति आख्यायिकाका उपसंहार करती है—उस मृदितकषायको वृक्षादिसे सम्बन्ध रखनेवाले कषायके समान रागद्वेषादि दोष अन्तःकरणके रञ्जक होनेके कारण कषाय हैं। ज्ञान, वैराग्य और अभ्यासरूप क्षारसे जिन नारदजीके उस कषायका क्षालन-मर्दन अर्थात् विनाश कर दिया गया है उन मृदितकषाय योग्य शिष्य नारदजीको अविद्यारूप तमसे पार परमार्थतत्त्वको दिखलाया। वह दिखानेवाला कौन था ? भगवान्—“जो भूतोंकी उत्पत्ति, प्रलय, आय-व्यय तथा विद्या-अविद्याको जानता है उसे ‘भगवान्’ कहना चाहिये” ऐसे धर्मोंवाले सनत्कुमारजी। उन सनत्कुमारदेवको ही विद्वान् लोग ‘स्कन्द’ ऐसा कहते हैं। ‘तं स्कन्द इत्याचक्षते’ इसकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ २ ॥ |


— : ० : —
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये षड्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २६ ॥
——
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्विवरणे सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥
— : ० : —

अष्टम अध्याय

अष्टम अध्याय

-: ❀ :-

प्रथम खण्ड

दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना

| [अष्टमप्रपाठकारम्भप्रयोजनम्]<br><br>यद्यपि दिग्देशकालादिभेदशून्यं ब्रह्म सत्, एकमेवाद्वितीयमात्मैवेदं सर्वमिति षष्ठसप्तमयोरधिगतं तथापीह मन्दबुद्धीनां दिग्देशादिभेदवद्वस्त्वित्येवं भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसा परमार्थविषया कर्तुमित्यनधिगम्य च ब्रह्म न पुरुषार्थसिद्धिरिति तदधिगमाय हृदयपुण्डरीकदेश उपदेष्टव्यः ।<br><br>यद्यपि सत्सम्यक्प्रत्ययैकविषयं निर्गुणं चात्मतत्त्वं तथापि मन्दबुद्धीनां गुणवत्त्वस्येष्टत्वा- | यद्यपि छठे और सातवें अध्यायमें दिशा, देश और कालादि भेदसे रहित ब्रह्म 'सत् एकमात्र अद्वितीय है,' 'आत्मा ही यह सब है'—ऐसा जाना गया है, तथापि 'यहाँ दिशा और देश आदि भेदयुक्त वस्तु है ही'—इस प्रकारकी भावनासे युक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंकी बुद्धि सहसा परमार्थसम्बन्धिनी नहीं की जा सकती और ब्रह्मको जाने बिना पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, अतः उसका अनुभव होनेके लिये हृदयकमलरूप देशका उपदेश करना आवश्यक है।<br><br>यद्यपि आत्मतत्त्व सत्, एकमात्र सम्यक् ज्ञानका विषय और निर्गुण है, तो भी मन्दबुद्धि पुरुषोंको उसकी सगुणता ही इष्ट है, इसलिये उसके सत्यसंकल्पादि गुणोंसे युक्त |

छा० उ० २६—

८०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
संस्कृतहिन्दी
त्सत्यकामादिगुणवत्त्वं च वक्तव्यम् । तथा यद्यपि ब्रह्मविदां स्त्र्यादिविषयेभ्यः स्वयमेवोपरमो भवति तथाप्यनेकजन्मविषयसेवाभ्यासजनिता विषयविषया तृष्णा न सहसा निवर्तयितुं शक्यत इति ब्रह्मचर्यादिसाधनविशेषो विधातव्यः । तथा यद्यप्यात्मैकत्वविदां गन्तृगमनगन्तव्याभावादविद्यादिशेषस्थिति-निमित्तक्षये गगन इव विद्युदुद्भूत इव वायुरुद्धेन्धन इवाग्निः स्वात्मन्येव निवृत्तिस्तथापि गन्तृगमनादिवासितबुद्धीनां हृदयदेशगुणविशिष्टब्रह्मोपासकानां मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येत्यष्टमः प्रपाठक आरभ्यते ।होनेका प्रतिपादन करना आवश्यक है । इसी प्रकार यद्यपि ब्रह्मोपासकोंको स्त्री आदि विषयोंसे स्वयं ही उपरति होती है तो भी अनेक जन्मोंके विषयसेवनके अभ्याससे उत्पन्न हुई विषयसम्बन्धिनी तृष्णा सहसा निवृत्त नहीं की जा सकती, इसलिये ब्रह्मचर्यादि साधनविशेषका विधान करना भी आवश्यक है, इसी तरह यद्यपि आत्माका एकत्व जाननेवालोंकी दृष्टिमें गमन करनेवाले, गमनक्रिया और गन्तव्य देशका अभाव हो जानेके कारण शरीरकी स्थितिकी निमित्तभूत अविद्या आदिका क्षय हो जानेपर उनकी विद्युत, बढ़े हुए वायु और जिसका ईंधन जल गया है उस अग्निके आकाशमें लीन हो जानेके समान अपने आत्मामें ही निवृत्ति हो जाती है तो भी जिनकी बुद्धि गन्ता और गमनादिकी वासनासे युक्त है अपने हृदयदेशस्थित गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करनेवाले उन पुरुषोंकी शिरोगत नाडीसे होनेवाली गतिका प्रतिपादन करना आवश्यक है, इसीलिये अष्टम प्रपाठकका आरम्भ किया जाता है ।
दिग्देशगुणगतिफलभेदशून्यं हि परमार्थसदद्वयं ब्रह्म मन्द-दिशा, देश, गुण, गति और फलभेदसे शून्य जो परमार्थ सत्

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यथ ८०५

बुद्धीनामसदिव प्रतिभाति । सन्मार्गस्थास्तावद्भवन्तु; ततः शनैः परमार्थसदपि ग्राहयिष्यामीति मन्यते श्रुतिः ।अद्वितीय ब्रह्म है, वह मन्दबुद्धि पुरुषोंको असत्‌के समान प्रतीत होता है; ये सन्मार्गमें स्थित हों, तब धीरे-धीरे मैं इन्हें परमार्थ सत्‌को भी ग्रहण करा दूँगी--ऐसा श्रुति मानती है।

हरिः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥

अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिये ॥ १ ॥

अथानन्तरं यदिदं वक्ष्यमाणं दहरमल्पं पुण्डरीकं पुण्डरीकसदृशं वेश्मेव वेश्म द्वारपालादिमत्त्वात्; अस्मिन्ब्रह्मपुरे ब्रह्मणः परस्य पुरं राज्ञोऽनेकप्रकृतिमद्यथा पुरं तथेदमनेकेन्द्रियमनोबुद्धिभिः स्वाम्यर्थकारिभिर्युक्तमिति ब्रह्मपुरम् । पुरे च वेश्म राज्ञो यथा तथा तस्मिन् ब्रह्मपुरे शरीरे दहरं वेश्म ब्रह्मण उपलब्ध्यधि-अथ-इसके पश्चात् [ यह कहा जाता है कि ] यह जो आगे कहा जानेवाला दहर अर्थात् छोटा-सा कमल सदृश गृह है-द्वारपालादिसे युक्त होनेके कारण जो गृहके समान गृह है वह इस ब्रह्मपुरमें-ब्रह्म यानी परमात्माके पुरमें, जैसा कि राजाका अनेकों प्रजाओंसे युक्त पुर होता है उसी प्रकार यह ( शरीर ) भी [आत्मारूप] अपने स्वामीका अर्थ सिद्ध करनेवाली अनेकों इन्द्रियों तथा मन और बुद्धिसे युक्त पुर है, अतः यह ब्रह्मपुर है। जिस प्रकार पुरमें राजाका भवन होता है उसी प्रकार उस ब्रह्मपुररूप शरीरमें एक सूक्ष्म गृह अर्थात् ब्रह्मकी उपलब्धिका अधिष्ठान है, जिस प्रकार कि शाल-

| ८०६ | छान्दोग्योपनिषद् | अध्याय ८ |

८०६छान्दोग्योपनिषद्अध्याय ८
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
ष्ठानमित्यर्थः, यथा विष्णोः शालग्रामः ।<br><br>अस्मिन् हि स्वविकारशुङ्गे देहे नामरूपव्याकरणाय प्रविष्टं सदाख्यं ब्रह्म जीवेनात्मनेत्युक्तम् । तस्मादस्मिन्हृदयपुण्डरीके वेश्मन्युपसंहृतकरणैर्बाह्यविषयविरक्तैर्विशेषतो ब्रह्मचर्यसत्यसाधनाभ्यां युक्तैर्वक्ष्यमाणगुणवद्ध्यायमानैर्ब्रह्मोपलभ्यत इति प्रकरणार्थः ।<br><br>दहरोऽल्पतरोऽस्मिन्दहरे वेश्मनि वेश्मनोऽल्पत्वात्तदन्तर्वर्तिनोऽल्पतरत्वं वेश्मनोऽन्तराकाश आकाशाख्यं ब्रह्म । आकाशो वै नामेति हि वक्ष्यति ।<br><br>आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वसर्वगतत्वसामान्याच्च । तस्मिन्ना-ग्रामशिला विष्णुकी उपलब्धिकी अधिष्ठान होती है—ऐसा इसका तात्पर्य है।<br><br>इस अपने विकारभूत कार्य--देहमें सत्संज्ञक ब्रह्म नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये जीवात्मभावसे अनुप्रविष्ट है—यह कहा जा चुका है। इसीसे जिन्होंने इस हृदयकमलरूप भवनमें अपने इन्द्रियवर्गका उपसंहार कर दिया है उन बाह्य विषयोंसे विरक्त, विशेषतः ब्रह्मचर्य एवं सत्यरूप साधनोंसे सम्पन्न तथा आगे बतलाये जानेवाले गुणोंसे युक्त पुरुषोंद्वारा चिन्तन किये जानेपर ब्रह्मकी उपलब्धि होती है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है।<br><br>इस सूक्ष्म गृहमें दहर—अत्यन्त सूक्ष्म अन्तराकाश यानी आकाशसंज्ञक ब्रह्म है। गृह सूक्ष्म होनेके कारण उसके अन्तर्वर्ती आकाशका सूक्ष्मतरत्व सिद्ध होता है। 'आकाश ही नाम-रूपका निर्वाह करनेवाला है' ऐसा श्रुति कहेगी भी। आकाशके समान अशरीर होनेके कारण तथा सूक्ष्मत्व और सर्वगतत्वमें उससे समानता होनेके कारण [ उसे आकाश कहा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


काशाख्ये यदन्तर्मध्ये तदन्वेष्टव्यम् । तद्भाव तदेव च विशेषेण जिज्ञासितव्यं गुर्वाश्रयश्रवणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्करणीयमित्यर्थः ॥ १ ॥गया है ] । उस आकाशसंज्ञक तत्त्वके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये, तथा उसीकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये, अर्थात् गुरुके आश्रय तथा श्रवणादि उपायोंसे अन्वेषण करके उसका साक्षात्कार करना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

—:०:—

तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥

उस (गुरु) से यदि [ शिष्यगण ] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो अन्तराकाश है उसके भीतर क्या वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये?—तो [ इस प्रकार पूछनेवाले शिष्योंके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ २ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तमाचार्यं यदि ब्रूयुरन्तेवासिनश्चोदययुः, कथम् ? यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीकं वेश्म ततोऽप्यन्तरल्पतर एवाकाशः । पुण्डरीक एव वेश्मनि तावत्किंइस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें अर्थात् शङ्का करें, किस प्रकार शङ्का करें?—इस परिच्छिन्न ब्रह्मपुरमें जो यह अन्तर्वर्ती कमलाकार सूक्ष्म गृह है उसके भीतर तो उससे भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो उस कमलाकार गृहमें ही क्या वस्तु रह सकती है ? फिर उससे भी

| १०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |

१०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
स्यात् । किं ततोऽल्पतरे खे यद्द्भवेदित्याहुः । दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते न किञ्चन विद्यत इत्यभिप्रायः । <br><br> यदि नाम बदरमात्रं किमपि विद्यते किं तस्यान्वेषणेन विजिज्ञासनेन वा फलं विजिज्ञासितुः स्यात् ? अतो यत्तत्रान्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं वा न तेन प्रयोजनमित्युक्तवतः स आचार्यो ब्रूयादिति श्रुतेर्वचनम् ॥ २ ॥अल्पतर आकाशमें जो हो ऐसी क्या वस्तु हो सकती है ?--इस प्रकार यदि वे पूछें। अभिप्राय यह है कि इस हृदयपुण्डरीकके भीतर जो आकाश है वह सूक्ष्म है, उसमें क्या वस्तु हो सकती है ? अर्थात् कुछ भी नहीं हो सकती। <br><br> यदि बेरके समान कोई वस्तु हो भी तो उसकी खोज अथवा जिज्ञासा करनेसे जिज्ञासुको फल भी क्या होगा ? अतः वहाँ जो खोज करने योग्य अथवा जिज्ञासा करने योग्य वस्तु है उससे हमें कोई प्रयोजन नहीं है तो इस प्रकार कहनेवाले शिष्योंसे आचार्यको इस प्रकार कहना चाहिये—यह श्रुतिका वाक्य है ॥ २ ॥
शृणुत, तत्र यद्ब्रूथ पुण्डरीकान्तःखस्याल्पत्वात्तत्स्थमल्पतरं स्यादिति, तदसत् । न हि खं पुण्डरीकवेश्मगतं पुण्डरीकादल्पतरं मत्वावोचं दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति । किन्तर्हि ? पुण्डरीकमल्पं तदनुविधायिसुनो, इस विषयमें तुम जो कहते हो कि हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाश सूक्ष्म होनेके कारण उसका अन्तर्वर्ती ब्रह्म और भी सूक्ष्म होगा, वह ठीक नहीं। मैंने हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशको हृदयकमलसे सूक्ष्मतर मानकर यह नहीं कहा कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश सूक्ष्म है। तो क्या बात है ?—हृदयकमल सूक्ष्म है उसका अनुवर्तन

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०९


| तत्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- | करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः- | | परिच्छिन्नं तस्मिन्विशुद्धे संहृत- | करण उस पुण्डरीकाकाशसे परि- | | करणानां योगिनां स्वच्छ इवो- | च्छिन्न है। जिन्होंने अपनी इन्द्रि- | | दके प्रतिबिम्बरूपमादर्श इव च | योंका उपसंहार कर लिया है उन | | शुद्धे स्वच्छं विज्ञानज्योतिः- | योगियोंको उस विशुद्ध अन्तःकरणमें | | स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | जलमें प्रतिबिम्बके समान तथा | | पलभ्यत इति दहरोऽस्मिन्नन्तरा- | स्वच्छ दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध | | काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- | | धिनिमित्तम्; स्वतस्तु-- | वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध | | | होता है। इसीसे अन्तःकरणरूप | | | उपाधिके कारण हमने यह कहा | | | था कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश | | | अन्तःकरणरूप उपाधिके कारण | | | सूक्ष्म है; स्वयं तो— |

यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥

जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी—ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु—ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥

८१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| यावान्वै प्रसिद्धः परिमाणतोऽयमाकाशो भौतिकस्तावतानेषोऽन्तर्हृदय आकाशो यस्मिन्नन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । नाप्याकाशतुल्यपरिमाणत्वमभिप्रेत्य तावानित्युच्यते। किं तर्हि ? ब्रह्मणोऽनुरूपस्य दृष्टान्तान्तरस्याभावात् । कथं पुनराकाशसममेव ब्रह्मेत्यवगम्यते । “येनावृतं खं च दिवं महीं च” ( महानारा० उ० १।३ ) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः ।” (तै०उ० २।१।१) “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाशः ।” (बृ०उ० ३।८।११)<br><br>इत्यादिश्रुतिभ्यः ।<br>किञ्चोभे अस्मिन्द्यावापृथिवी ब्रह्माकाशे बुद्धद्युपाधिविशिष्टे अन्तरेव समाहिते सम्यगाहिते स्थिते। यथा वा अरा नाभावित्युक्तं हि । तथोभावग्निश्च वायुश्चेत्यादि | परिमाणमें जितना यह भौतिक आकाश प्रसिद्ध है उतना ही यह हृदयान्तर्गत आकाश है, जिसके विषयमें कि हमने 'अन्वेषण करना चाहिये तथा जिज्ञासा करनी चाहिये' ऐसा कहा था । [ यही नहीं ] 'ब्रह्मको आकाशके समान परिमाणवाला मानकर भी ऐसा नहीं कहा जाता । तो फिर क्या बात है ? — ब्रह्मके अनुरूप कोई अन्य दृष्टान्त न होनेके कारण ऐसा कहा जाता है । [ प्रश्न] किंतु ब्रह्म आकाशके समान ही नहीं है—यह कैसे जाना जाता है ? [उत्तर] 'जिसने आकाश, द्युलोक और पृथ्वीको आवृत किया हुआ है” “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “हे गार्गि ! इस अक्षरमें ही आकाश स्थित है” इत्यादि श्रुतियोंसे यह बात सिद्ध होती है ।<br>यही नहीं, इस बुद्धयुपाधिविशिष्ट ब्रह्माकाशके भीतर ही द्युलोक और पृथिवी समाहित—सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; जिस प्रकारकी नाभिमें अरे—ऐसा पहले कह ही चुके हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु —ये दोनों भी |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११


समानम् । यच्चास्यात्मन आत्मीयत्वेन देहवतोऽस्ति विद्यत इह लोके, तथा यच्चात्मीयत्वेन न विद्यते; नष्टं भविष्यच्च नास्तोत्युच्यते । न त्वत्यन्तमेवासत्, तस्य हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तेः ॥ ३ ॥स्थित हैं—इत्यादि शेष वाक्यका तात्पर्य भी इसीके समान है । इस देहवान् आत्माका आत्मीयरूपसे जो कुछ पदार्थ इस लोकमें है ओर जो कुछ 'आत्मीयरूपसे [ इस समय ] नहीं है, नष्ट हो गया है अथवा भविष्यमें नहीं होगा'—ऐसा कहा जाता है [ वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ] । यहाँ अत्यन्त असत् वस्तुसे अभिप्राय नहीं है, क्योंकि उसकी तो हृदयाकाशमें स्थिति होनी ही सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥

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तं चेद्ब्रूयुरस्मिँश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वँसमाहितँ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरा वाप्नोति प्रध्वँसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥

उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है उस समय क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तं ब्रूयुः पुनरन्तेवासिनोऽस्मिंश्चेद्यथोक्ते चेद्यदि ब्रह्मपुरे ब्रह्मपुरोपलक्षितान्तराकाशकिंतु यदि इस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें अर्थात् ब्रह्मपुरोपलक्षित अन्तराकाशमें यह सब सम्यक् प्रकारसे स्थित है तथा

८१२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

८१२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इत्यर्थः । इदं सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ।सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी स्थित हैं [ तो जिस समय यह वृद्ध होता या नष्ट हो जाता है उस समय क्या क्या रहता है ? ]
कथमाचार्येणानुक्ताः कामा अन्तेवासिभिरुच्यन्ते ?**शङ्का—**आचार्यने जिनका निरूपण नहीं किया उन कामनाओंको शिष्यगण क्यों [ ब्रह्मपुरमें स्थित ] बतलाते हैं ?
नैष दोषः; यच्चास्येहास्ति यच्च नास्तीत्युक्ता एव ह्याचार्येण कामाः । अपि च सर्वशब्देन चोक्ता एव कामाः । यदा यस्मिन्काल एतच्छरीरं ब्रह्मपुराख्यं जरावलीपलितदिलक्षणा वयोहानिर्माप्नोति शस्त्रादिना वा वृक्णं प्रध्वंसते विस्रंसते विनश्यति किं ततोऽन्यदतिशिष्यते ।**समाधान—**यह दोष नहीं है; 'इस लोकमें जो कुछ इसका है और जो कुछ नहीं है' इस प्रकार आचार्यने कामनाओंके विषयमें कहा ही है। इसके सिवा 'सर्व' शब्दसे भी कामनाओंका कथन हो ही जाता है । जब—जिस समय इस ब्रह्मपुरसंज्ञक शरीरको झुर्रियाँ पड़ जाने और केशोंके पक जाने आदि रूपसे वृद्धावस्था अपनाती है अथवा उसकी आयुका क्षय प्राप्त होता है अथवा वह शस्त्रादिसे काटा जाकर ध्वंस—विस्रंसन यानी नाशको प्राप्त हो जाता है तो उससे भिन्न और क्या शेष रहता है ?
घटाश्रितक्षीरदधिस्नेहादिवद्-घटनाशे देहनाशेऽपि देहाश्रयमुत्तरोत्तरं पूर्वपूर्वनाशान्नश्यती-अभिप्राय यह है कि घटका नाश होनेपर घटस्थित दुग्ध, दही और घृतादिके नाशके समान देहका नाश होनेपर भी देहके आश्रित

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३


त्यभिप्रायः। एवं प्राप्ते नाशे किं ततोऽन्यद्यथोक्तादतिशिष्यतेऽवतिष्ठते न किञ्चनावतिष्ठत इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥उत्तरोत्तर कार्य पूर्व-पूर्व कारणका नाश होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार नाश होनेपर उपर्युक्त नाशसे भिन्न और क्या रह जाता है? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥४॥

एवमन्तेवासिभिश्चोदितः—शिष्योंद्वारा इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर—

स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥

उसे कहना चाहिए 'इस (देह) की जरावस्थासे यह (आकाशाख्य ब्रह्म) जीर्ण नहीं होता। इसके वधसे उसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है; इसमें [सम्पूर्ण] कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं; यह आत्मा है, धर्माधर्मसे शून्य है तथा जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, भोजनेच्छारहित, पिपासाशून्य, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है; जिस प्रकार इस लोकमें प्रजा राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करती है तो वह जिस-जिस सन्निहित वस्तुकी कामना करती है तथा जिस-जिस देश या भूभागकी इच्छा करती है उसी-उसीके आश्रित जीवन धारण करती है' ॥ ५ ॥

८१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| स आचार्यो ब्रूयात्तन्मतिमपनयन् । कथम् ? अस्य देहस्य जरयैतद्यथोक्तमन्तराकाशाख्यं ब्रह्म यस्मिन् सर्वं समाहितं न जीर्यति देहवन्न विक्रियत इत्यर्थः। न चास्य वधेन शस्त्रादिघातेनैतद्धन्यते यथाकाशम्; किमु ततोऽपि सूक्ष्मतरमशब्दमस्पर्शं ब्रह्म देहेन्द्रियादिदोषैर्नस्पृश्यत इत्यर्थः । <br><br> कथं देहेन्द्रियादिदोषैर्न स्पृश्यत इत्येतस्मिन्नवसरे वक्तव्यं प्राप्तं तत्प्रकृतव्यासङ्गो मा भूदिति नोच्यते । इन्द्रविरोचनाख्यायिकायामुपरिष्टाद्वक्ष्यामो युक्तितः । <br><br> एतत्सत्यमवितथं ब्रह्मपुरं <br> ब्रह्मैव ब्रह्म-पुरम् । ब्रह्मैव पुरं ब्रह्मपुरं शरीराख्यं तु ब्रह्म- | उस आचार्यको उनकी [ शून्य-विषयिणी ] बुद्धिकी निवृत्ति करते हुए इस प्रकार कहना चाहिये । किस प्रकार कहना चाहिये ?— इस देहकी जरावस्थासे यह उपर्युक्त अन्तराकाशसंज्ञक ब्रह्म, जिसमें कि सब कुछ स्थित है जीर्ण नहीं होता, अर्थात् देहके समान उसका विकार नहीं होता, और न इसके वध अर्थात् शस्त्रादिके प्रहारसे यह नष्ट ही होता है, जैसे कि [ शस्त्रादिके आघातसे ] आकाशका नाश नहीं होता; फिर उससे भी सूक्ष्मतर अशब्द एवं अस्पर्श ब्रह्मको देह एवं इन्द्रियादिके दोषसे स्पर्श नहीं होता—इस विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका तात्पर्य है । <br><br> देह एवं इन्द्रियादिके दोषोंसे ब्रह्मका स्पर्श क्यों नहीं होता ? इस बातका उल्लेख करना इस अवसरपर आवश्यक है; परंतु प्रसङ्गका विच्छेद न हो, इसलिये यहाँ नहीं कहा जाता । आगे इन्द्र-विरोचनकी आख्यायिकामें इसका युक्तिपूर्वक वर्णन करेंगे । <br><br> यह ब्रह्मपुर सत्य—अवितथ है । ब्रह्म ही पुर [अर्थात् ब्रह्मरूप पुरका नाम ] ब्रह्मपुर है । किंतु यह |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५


| पुरं ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वात्। तच्चानृतमेव, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः। तद्विकारेऽनृतेऽपि देहशृङ्गे ब्रह्मोपलक्ष्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्तं व्यावहारिकम्। सत्यं तु ब्रह्मपुरमेतदेव ब्रह्म; सर्वव्यवहारास्पदत्वात्। अतोऽस्मिन्पुण्डरीकोपलक्षिते ब्रह्मपुरे सर्वे कामा ये बहिर्भवद्भिः प्रार्थ्यन्ते तेऽस्मिन्नेव स्वात्मनि समाहिताः। अतस्तत्प्राप्त्युपायमेवानुतिष्ठत बाह्यविषयतृष्णां त्यजतेत्यभिप्रायः। | शरीरसंज्ञक ब्रह्मपुर ब्रह्मके उपलक्षणके लिये होनेके कारण [ ब्रह्मपुर कहा जाता ] है। और वह तो मिथ्या ही है, क्योंकि “वाणीके आश्रित विकार नाममात्र है” ऐसी श्रुति है। ब्रह्मका विकार और मिथ्या होनेपर भी इस देहरूप अङ्कुर—कार्यमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये इसे व्यावहारिक ब्रह्मपुर कहा गया है। वास्तविक ब्रह्मपुर तो यह ब्रह्म ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रय है। अतः इस हृदयपुण्डरीकोपलक्षित ब्रह्मपुरमें सम्पूर्ण कामनाएँ जिन्हें कि आप बाहर पाना चाहते हैं। वे सब-की-सब इस अपने आत्मामें ही स्थित हैं। इसलिये आपको उसकी प्राप्तिके उपायका ही अनुष्ठान करना चाहिये और बाह्य विषयोंकी तृष्णाका परित्याग कर देना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है। | | एष आत्मा भवतां स्वरूपम्। आत्मनो लक्षणम्। शृणुत तस्य लक्षणम्। अपहतपाप्मा, अपहतः पाप्मा धर्माधर्माख्यो यस्य सोऽयमपहतपाप्मा। तथा विजरो विगतजरो विमृत्युश्च। | यह आत्मा आपका स्वरूप है। आप उसका लक्षण सुनिये। अपहतपाप्मा—जिसका धर्माधर्मसंज्ञक पाप अपहत—नष्ट हो गया है वह यह ब्रह्म अपहतपाप्मा है। इसी प्रकार विजर—जिसकी जरावस्था बीत गयी है और मृत्युहीन है। |

८१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८१६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| तदुक्तं पूर्वमेव न वधेनास्य हन्यत इति किमर्थं पुनरुच्यते ? | शङ्का—'इस (शरीर) के नाशसे उसका नाश नहीं होता'—यह बात तो पहले ही कही जा चुकी है, फिर इसे पुनः क्यों कहा जाता है ? | | यद्यपि देहसम्बन्धिभ्यां जरा-मृत्युभ्यां न सम्बध्यते। अन्यथापि सम्बन्धस्ताभ्यां स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थम्। | समाधान—यद्यपि देह-सम्बन्धी जरा-मृत्युसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो भी अन्य प्रकारसे तो उनके साथ उसका सम्बन्ध हो ही सकता है—इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ऐसा किया गया है। | | विशोको विगतशोकः। शोको नामेष्टादिवियोगनिमित्तो मानसः सन्तापः। विजिघत्सो विगताशनेच्छः। अपिपासोऽपानेच्छः। | वह—विशोक—शोकरहित—इष्टादिका वियोग होनेके कारण जो मानसिक संताप होता है उसे शोक कहते हैं, विजिघत्स—भोजनेच्छासे रहित और अपिपास—पीनेकी इच्छासे रहित है। | | नन्वपहतपाप्मत्वेन जरादयः शोकान्ताः प्रतिषिद्धा एव भवन्ति। कारणप्रतिषेधात्। धर्माधर्मकार्या हि त इति। जरादिप्रतिषेधेन वा धर्माधर्मयोः कार्याभावे विद्यमानयोरप्यसत्समत्वमिति पृथक्प्रतिषेधोऽनर्थकः स्यात्। | शङ्का—किंतु अपहतपाप्मत्वके द्वारा तो जरासे लेकर शोकपर्यन्त सभी विशेषण प्रतिषिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि उनके कारणका प्रतिषेध हो जाता है, कारण वे सब धर्माधर्मके ही कार्य हैं; अथवा जरादिके प्रतिषेधसे धर्माधर्मका कोई कार्य न रहनेके कारण, विद्यमान रहते हुए भी, उनका असत्समत्व सिद्ध होता है। इसलिये इन दोनोंका पृथक् प्रतिषेध निरर्थक ही है। |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१७

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
जरादि-प्रतिषेध-सामर्थ्यम्<br>सत्यमेवं तथापि धर्मकार्यानन्दव्यतिरेकेण स्वाभाविकानन्दो यथेश्वरे “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ९ । २८) इति श्रुतेः । तथाधर्मकार्यजरादिव्यतिरेकेणापि जरादिदुःखस्वरूपं स्वाभाविकं स्यादित्याशङ्क्यते । अतो युक्तस्तन्निवृत्तये जरादीनां धर्माधर्माभ्यां पृथक्प्रतिषेधः । जरादिग्रहणं सर्वदुःखोपलक्षणार्थम् । पापनिमित्तानां तु दुःखानामानन्त्यात्प्रत्येकं च तत्प्रतिषेधस्याशक्यत्वात्सर्वदुःखप्रतिषेधार्थं युक्तमेवापहतपाप्मत्ववचनम् ।समाधान—ठीक है, ऐसा ही होता है; किंतु जिस प्रकार ईश्वरमें धर्मके कार्यभूत आनन्दसे भिन्न “ब्रह्म विज्ञानस्वरूप और आनन्दमय है” इस श्रुतिके अनुसार स्वाभाविक आनन्द है इसी प्रकार अधर्मके कार्यरूप जरादिसे भिन्न स्वाभाविक जरादि दुःखका होना भी सम्भव है—ऐसी आशङ्का हो सकती है । इसलिये उसकी निवृत्तिके लिये धर्माधर्मसे जरादिका पृथक् प्रतिषेध करना उचित ही है । जरादिका ग्रहण सम्पूर्ण दुःखोंके उपलक्षणके लिये है । पापनिमित्तक दुःखोंकी अनन्तता होनेके कारण और उनमेंसे प्रत्येकका प्रतिषेध करना असम्भव होनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका प्रतिषेध करनेके लिये उसके अपहतपाप्मत्वका प्रतिपादन करना उचित ही है ।
सत्या अवितथाः कामा यस्य सोऽयं सत्यकामः । वितथा हि संसारिणां कामाः । ईश्वरस्य तद्विपरीताः । तथा कामहेतवः संकल्पा अपि सत्या यस्य स सत्यसंकल्पः । संकल्पाः कामाश्च शुद्धसत्त्वोपाधिनिमित्ता ईश्वरस्यजिसकी कामनाएँ सत्य—अमिथ्या हैं उसे सत्यकाम कहते हैं । असत्य तो संसारियोंकी ही कामनाएँ हुआ करती हैं, ईश्वरकी कामनाएँ तो उससे विपरीत होती हैं । इसी प्रकार जिसके कामके हेतुभूत संकल्प भी सत्य हैं वह ईश्वर सत्यसंकल्प है । ईश्वरके