छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
घोषित करके, ललकारकर, नंगी तलवार हाथ में लेकर सामने से आक्रमण करने वाला शत्रु ठीक रहता है किन्तु अपने पल्लू में छिपे अंगार को ठंडा करने में बड़ी कठिनाई होती है। सामने आने वाले शत्रु को हम एकबार क्षमा कर सकते हैं क्योंकि वह हमारा शत्रु ही है, पर मराठों के इन जमींदारों को हम कभी भी क्षमा नहीं करेंगे।'' "हम समझे नहीं, पिताजी?" "इतनी जल्दी नहीं समझ पाओगे। हमें तो अपने जन्मकाल से ही इन लोगों की आग झेलनी पड़ी है। ये लोग शेखियाँ बघारते हुए हमेशा कहते थे कि इनका सूर्य कुल से रिश्ता है। ये लोग अपनी देहाती कोठियों में खड़े होकर मूँछों पर हाथ फेरते थे। अपने को राजा कहते थे। किन्तु इनकी सारी पीढ़ियाँ अहमदनगर के निजामशाह, बीजापुर के आदिलशाह और दिल्ली के यवनों की सेवा में ही जीवन बिता रही थीं। गाँव के इन लोमड़ों ने अपनी कोठियों की आड़ में गरीबों की बहू- बेटियों की इज्जत लूटी। मेहनत करने वाले किसानों की फसलें लूटकर अपनी जेबें भरीं। इसीलिए गाँवों की इन गढ़ियों (कोठियों) के साथ जमींदारी को दफन करके स्वराज्य के मन्दिर को खड़ा करना आवश्यक समझा। हमने कानून बनाया कि अपने गढ़ी या व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए कोई तटबन्दी नहीं बनाएगा। मैंने हिम्मत करके पुरानी गढ़ियों को नष्ट कर दिया। उस समय ये जमींदार जितना विरोध कर सकते थे, करते रहे।'' शिवाजी महाराज ये बातें बता रहे थे और शम्भूराजा बड़ी सावधानी से एकाग्र होकर सुन रहे थे। महाराज ने आगे कहा, "अरे यह राज्या का दुष्ट पाटिल कौन था? आज आपका सगा बहनोई फलटण का महादजी निंबालकर मुगलों की फौज में किसकी गुलामी कर रहा है? जावली के मोरे जैसे गद्दार देशद्रोही दूसरी जगह कहाँ मिलेंगे? शृंगारपुर के सुर्वे हों या हमारे दामाद गणोजी शिर्के, ये शरीर से स्वराज्य में रहते हैं किन्तु मन से वे मुगलों के ही साथ हैं।" "इस प्रकार के धोखेबाज स्वजनों के बीच रहते हुए भी आपने स्वराज्य खड़ा किया। पिताजी आप धन्य हैं।" शम्भूराजा ने कृतज्ञ भावना से कहा। "क्या बताऊँ शम्भू बेटे? दुश्मन को खून में नहलाते समय मेरी तलवार तेज से चमक जाती है किन्तु सम्बन्धियों एवं घर के गद्दारों और द्रोहियों पर उठते समय वह शर्म से पानी हो जाती है। इसीलिए कहता हूँ कि इन स्वार्थी मराठों और ब्राह्मण जागीरदारों से भविष्य में भी सावधान रहना।" सूर्य विशालगढ़ की दिशा में डूब रहा था। समुद्र में जैसे तूफान आ जाय और उसमें लहरों की अनेक पहाड़ियाँ बनकर एक-दूसरे से टकराने लगें वैसी ही हलचल महाराज के भीतर मची हुई थी। वे अपने पुत्र को बहुत-सी बातें समझा रहे
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थे। "शम्भू बेटे! राज्यशासन चलाते समय गरीब-से-गरीब प्रजा पर यहाँ तक कि गाय चराने वाले बच्चे से भी श्रद्धा रखो। उन्हें शक्ति दो। मैं अपनी जिन्दगी में यदि सँभल पाया तो इन्हीं लोगों के भरोसे। इन जमींदारों को तो मैंने हमेशा बगल में कंकड़ की तरह दबाकर रखा। गाय-भैंस चराने वालों को भी मैंने सैनिक बनाया। हल चलाने वाले किसानों को भी फौजी बनाया। उनके साहसी हाथों में भाले और तलवारें दीं। उनके भीतर छिपी चिनगारी को जागृत किया। उन्हीं में कोई तानाजी कोई मुरारबाजी पैदा हुआ। ये साधारण लोग ही स्वराज्य के साथ हमेशा निष्ठावान बने रहे।" बोलते बोलते शिवाजी महाराज कुछ क्षण के लिए रुके। फिर शम्भूमहाराज का हाथ अपने हाथ में लेकर उन्होंने कहा, "एक समय था जब सिंहगढ़ का हरा झंडा माताजी की आँखों में काँटे की तरह चुभता था। उसी तरह जंजीरे के किले की सिद्दीकी वहाँ उपस्थिति मेरे हृदय को घायल करती रहती थी। जंजीरे पर भगवा झंडा फहराने के लिए हम आठ बार लड़े, बार बार जूझे। किन्तु उस जलदुर्ग ने हमें सदैव ही धोखा दिया।" "जंजीरा क्या उतना महत्त्वपूर्ण है?" "महत्त्वपूर्ण ?" शिवाजी महाराज की मुद्रा कल्पनामात्र से जवाकुसुम की भाँति अरुणाभ हँसी में बदल गयी। अपने हाथ की मुट्ठियाँ बाँधते हुए ऊर्जस्वित स्वर में बोले, "बेटे, देश-विदेश की व्यापारिक नाड़ियों को अपने पैरों के नीचे दबाकर रखने वाला जंजीरा का वह जालिम किला एक बार अपने अधिकार में ले आइये, फिर देखिए कि अपने स्वराज्य की सीमा किस प्रकार गंगा-यमुना जाकर पहुँचती है?" पहले शम्भूमहाराज ने चार वर्ष तक रायगढ़ पर स्थानीय प्रशासन का कार्य सँभाला था। उनको प्रशासन की बारीकियों, शक्तिशाली बुर्जों, भूमिगत मार्गों की पूरी जानकारी थी। इसलिए अण्णाजी दत्तो जैसे राज्य कर्मचारी चाहते थे कि शम्भूमहाराज की जगह छोटे राजाराम गद्दी पर बैठें जिससे राजाराम को राजनीति सिखाने के बहाने वे अपना हित साध सकें और सत्ता का काजू आराम से खाते रहें। इसके विपरीत प्रजावर्ग और सेना को शम्भूमहाराज ही राजा के रूप में चाहिए थे। शम्भूमहाराज स्वार्थी राजकर्मचारियों के लिए संकट बन चुके थे। दरबारियों की राय थी कि शम्भूराजा को कर्नाटक का राज्य दे दिया जाय और रायगढ़ के साथ मराठी राज्य राजाराम की झोली में डाल दिया जाय। दरबारी ऐसा इसलिए चाहते थे कि उनकी प्रतिष्ठा और उनके राज्याधिकार सुरक्षित रहें। स्वराज्य के बँटवारे की बात सामने आते ही शिवाजी महाराज ने हँसते हुए कहा, "हमारा सम्भाजी :: 159
स्वराज्य किसी जमींदार की अपनी कमाई नहीं है। यह किसी की जागीर भी नहीं है। यह असंख्य लोगों के खून-पसीने से बना एक पवित्र मन्दिर है। दक्षिण की शक्ति, युक्ति और संस्कृति के प्रतीक इस मन्दिर को कैसे बाँटा जा सकता है, शम्भू बेटे?'' शिवाजी महाराज की बात सुनकर शम्भूराजा ने कातर स्वर में कहा, "पिताजी, सत्ता की प्यास मुझे कभी नहीं थी। आप मेरे हाथों में नारियल सुपारी रखेंगे तो भी मैं उसे आपका कृपा-प्रसाद मानकर ग्रहण करूँगा। आपके चरणों की पूजा करते हुए मैं दूध-भात पर भी अपने दिन काट लूँगा।'' गजापुर और विशालगढ़ की ओर सूर्य की सुनहरी किरणें सरक रही थीं। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों के आलोक में शम्भूराजा की मुखमुद्रा बड़ी लुभावनी लग रही थी। उनकी पेच में लगी रत्नमाला का एक छोर लटक रहा था। शिवाजी महाराज ने अपने हाथों से उसे उठाकर पगड़ी में लगा लिया और बोले, "शम्भू ! अपना रायगढ़ का सिंहासन कभी अच्छी तरह से देखा है क्या ?'' "बहुत बार।'' शम्भूमहाराज ने हँसते हुए कहा। "शम्भूराजा ! आज जानबूझकर ये बातें मैं तुम्हारे सामने ला रहा हूँ। पिता की गद्दी युवराज को उत्तराधिकार रूप में सारी दुनिया में मिल जाती होगी। किन्तु रायगढ़ की राजगद्दी दुनिया से अलग है।'' "इसका मतलब ? पिताजी !'' "वही कह रहा हूँ, शम्भू बेटे। उत्तराधिकार के हक से रकाब में पाँव रखकर घोड़ा दौड़ाने की उतावली बिल्कुल मत करो। रायगढ़ के सिंहासन के सामने एकबार पुनः जाकर खड़े हो जाओ। खुली आँखों से उस पवित्र सिंहासन को बार बार देखो। पाँच सीढ़ियों वाले सिंहासन का अच्छी तरह से दर्शन करो। "पहली सीढ़ी को ध्यान से देखोगे तो मोर के कलाप की तरह उस पर बहुत सी आँखें बनी दिखाई देंगी। ये आँखें हैं बारह मावलों और छत्तीस नेरों के किसानों और उनके पशुओं की। यदि ध्यान से उस पहले सोपान की आहट लोगे तो कृष्णा, भीमा, गोदावरी आदि पवित्र नदियों की कलकल ध्वनि और प्रवाही गति आपको सुनाई देगी। "दूसरे सोपान पर तुम पाँव रखोगे तो सह्याद्रि पर्वत, खाई में अथवा समुद्र के तल में बनाये गये साढ़े तीन सौ गढ़ों और दुर्गों के दर्शन होंगे। इन दुर्गों के पत्थरों को यदि समीप से और ध्यान से देखोगे तो वे वीर योद्धाओं के खून से रँगे दिखाई देंगे। "तीसरे सोपान पर तुम देखोगे जीजा माता और उनके साथ मावल की असंख्य बहू-बेटियों के चित्र। इन माँ बहनों ने स्वराज्य के लिए अपना सुहाग लुटा देने में ही गौरव माना। अपने बड़े बेटे को इन्होंने स्वराज्य के लिए प्रसन्नता से 160 :: सम्भाजी
अर्पित किया। यहीं पर आपको सुनाई देगी माँ बहनों की टूटी चूड़ियों की खनक। “चौथी सीढ़ी पर तो बहुत संभाल कर पाँव रखना होगा। वहाँ आपको सन्त तुकाराम की वाणी सुनाई देगी। वहाँ आप ज्ञानेश्वर की सदाबहार विराणी सुन सकेंगे। वहाँ पर समर्थ रामदास के साथ आपको सन्तों का विशाल समूह मिलेगा। “पाँचवीं सीढ़ी पर पहुँच जाने पर आपको लगेगा ऊँची ऊँची चोटियाँ आपकी ओर बड़ी आशा, आस्था और श्रद्धा से टकटकी लगाये देख रही हैं। आधे अधूरे सपनों से बेचैन अतीत बड़ी आशा से आपकी ओर देखेगा। जो घाव अभी भरे नहीं वे आपसे दवा माँगेंगे। आपके हाथ से कुछ मांगलिक और कल्याणप्रद कार्य हो जाय, इसके लिए सूर्य की भोरहरी किरणें दुआ करेंगी। इस प्रकार मेरे सिंहपुरुष बेटे शम्भू ! अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल हिरन के बच्चों की तरह आपके कदमों में रेंगते रहेंगे। “इन पाँच सीढ़ियों का ठीक ठीक दर्शन कर लेने के बाद मेरे प्रिय बेटे, तब स्वयं से एक प्रश्न करो। इन असीम जिम्मेदारियों, अनसुलझी समस्याओं के बड़े बड़े गट्ठरों और प्रजा की पर्वताकार आशाओं आकांक्षाओं के भारी बोझ को उठाने का साहस तुम्हारे कलेजे में है या नहीं? यदि आप में यह आत्मविश्वास है तभी उस दृढ़ विश्वास से, यहाँ की मिट्टी के प्रति पूरी निष्ठा के साथ उस पवित्र सिंहासन पर सुख से बैठो। किन्तु अपनी शक्ति और साहस में थोड़ी भी शंका हो तो उस सिंहासन की हवा के लिए भी न रुको। शरीर पर अचला पहनो और संन्यासी बनकर जंगल की ओर चले जाओ।” तीन रायगढ़ पर दशहरा-दीवाली का उत्सवी वातावरण बना था। दो-ढाई वर्ष के बाद शिवाजी महाराज राजधानी में वापस आये थे। इस आनन्द के साथ महाराज ने एक और मांगलिक कार्य की घोषणा की थी। महाराज के छोटे पुत्र राजाराम अब दस वर्ष के हो गये थे। उनका विवाह निश्चित कर दिया गया था। इस समाचार से सभी में असीम उत्साह उमड़ रहा था। मोरोपन्त पेशवा ने हँसते-हँसते अपने दरबारी सहयोगियों से कहा, “महाराज राजाराम का विवाह किसके साथ निश्चित करेंगे? इसकी हम सभी को बड़ी उत्सुकता थी। किन्तु जब उन्होंने प्रताप राव की जानकी सम्भाजी :: 161
को बहू के रूप में चुन लिया तो हम सभी को अपार हर्ष हुआ।" महाराज के घर के मंगलकार्य को अपना ही मानकर सभी सरदार कार्य में लग गये थे। महाराज की निजी बैठक में अष्टप्रधानों की व्यस्तता बढ़ गयी थी। महाराज स्वयं वर के पिता होने के नाते व्यस्त थे। वे बैठक के बीच में ही उठकर अन्तःपुर में चले जाते थे। पुनः बैठक में आते थे। सेवक और परिचारक अपना कार्य शीघ्रता से कर रहे थे। यह जानकर कि महाराज अन्तःपुर में व्यस्त हैं, बालाजी आवजी ने इसका फायदा उठाते हुए धीरे से प्रश्न किया, "पन्त यह बात सच है क्या?" "किस सम्बन्ध में पूछ रहे हैं?" "यही कि पन्हाला पर येसूबाई और संभाजी को निमन्त्रण नहीं भेजा गया है?" "बालाजी! दुर्भाग्य से यह बात सच है।" मोरोपन्त ने दुखी स्वर में कहा। बालाजी आवजी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कहा, "ऐसा कहा जाता है कि कम-से-कम शादी और मातम में तो किसी भी सम्बन्धी को भूलना नहीं चाहिए। शम्भूमहाराज तो राजाराम के बड़े भाई हैं।" वे दोनों धीमी आवाज में बात करने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु उनका सारा भाषण दूसरी ओर बैठे अण्णाजी दत्तो के कानों में पड़ गया। उन्होंने सिर पर बँधे रूमाल को अलग किया। अपनी सफेद दाढ़ी में उँगलियों को घुमाते हुए झूठी हँसी हँसते हुए कहा, "दूध में नमक और विवाह जैसे मंगल कार्य में अनाहूत मेहमान चाहिए ही क्यों?" बालाजी ने कहा, "अण्णाजी पन्त! तुम कुछ ज्यादती कर रहे हो। शम्भूमहाराज के प्रति तुम्हारी रग-रग में क्रोध कूट कूट कर भरा है।" "युवराज की जवानी के शौक-पर-शौक पूरा करने के लिए जिन लोगों ने अपनी बहू-बेटियाँ गँवाई हैं, अपने दुःख की यातना वही जानते हैं, बालाजी! दूर से देखने वाले उसकी कल्पना नहीं कर सकते?" बोलते-बोलते अण्णाजी का गला भर आया। बैठक का रंग उड़ गया। अण्णाजी की जहरीली वाणी से सभी लोग चुप हो गये। बड़े महाराज के भय से सभी अष्टप्रधान आपस में ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे उनमें परस्पर बड़ा सौहार्द हो किन्तु वास्तव में उनके बीच बहुत तू-तू मैं-मैं होती थी। मोरोपन्त और अण्णाजी में भी सौमनस्य नहीं था। इसीलिए बड़े महाराज किसी भी लड़ाई पर दोनों को माथ नहीं भेजते थे। दोपहर का समय हो गया। बैठक ममाप्त हो गयी। पेशवा मोरोपन्त भी अन्य 162 .: सम्भाजी
लोगों के साथ बाहर निकले। उनके पीछे-पीछे प्रह्लाद निराजी भी निकले। उसी समय अण्णाजी ने निराजी का हाथ कसकर पकड़ा। "थोड़ा रुको," उन्होंने आँखों से संकेत किया। बैठक से अन्तःपुर की ओर जा रहे शिवाजी महाराज को सामने से रोक लिया। विनम्र मुद्रा में उन्होंने बड़ी व्यग्रता से कहा, "महाराज, आप थोड़ा रुक जाएँगे तो अच्छा होगा। स्वामी से हमारा एक निवेदन है।" "बोलो।" महाराज के कदम रुक गये। "रामदास जैसे युगपुरुष ने आपको इतना सम्मान ऐसे ही नहीं दिया है। जो कुछ भी महाराष्ट्र-धर्म बचा है वह केवल आपके कारण। ऐसे अपने महाराज से हम थोड़े न्याय, थोड़े न्यायोचित बर्ताव की माँग करें तो गलत तो नहीं होगा?" "पन्त ऐसा आड़ा-टेढ़ा क्यों बोल रहे हो? जो कुछ कहना है साफ-साफ बोलो।" महाराज ने कहा। "अजी अण्णाजी, महाराज जल्दी में हैं, इतना लम्बा-चौड़ा भाषण क्यों दे रहे हो?" बालाजी आवजी ने बीच में ही टोका। अण्णाजी को बालाजी की चाटुकारिता पर बहुत क्रोध आया। वे अपना एक हाथ उठाकर न्यायाधीश की मुद्रा में बोले, "मुझे इतना ही कहना है कि स्वराज्य द्रोह जैसे अपराध के लिए शिवाजी महाराज के पास तिनके जितनी भी दया नहीं होती है।" शिवाजी महाराज का चेहरा अत्यन्त भ्रमित हो गया। उस समय बालाजी को छोड़कर शेष सभी अधिकारी काँप उठे थे। लोगों को आश्चर्य था कि ऐसी साहसी धृष्टता अण्णाजी कर सकते हैं? अण्णाजी का आक्रामक रुख महाराज ने पहले ही पहचान लिया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "देखो अण्णाजी, इस प्रकार यहाँ- वहाँ ऐसे ही घोड़े दौड़ाते मत घूमो। तुम्हारी शम्भूराजा के बारे में जो शिकायत हो एक बार साफ-साफ बोल दो और मुक्त हो जाओ।" अण्णाजी अपराधी की मुद्रा में खड़े हो गये। किन्तु शीघ्र ही साहस बटोरते हुए बोले, "क्षमा करें महाराज! मैं ही नहीं धर्मशास्त्र भी यही सिखाता है कि न्याय के पलड़े में एक चरवाहे और युवराज का स्थान समान होता है।" अण्णाजी ने अपने उत्तरीय से चेहरे का पसीना पोंछा और पुनः हाथ जोड़ते हुए बोले, "प्रजा को ऐसी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि अपने राज्य में राजद्रोह के लिए दंड के स्थान पर पुरस्कार मिलता है। अपराधी स्वतन्त्र होकर घूमते हैं।" अन्तःपुर की ओर जा रहे बड़े महाराज के कदम रुक गये। वे वापस आकर बैठक में बैठ गये। भरे दरबार में अण्णाजी दत्तो शिवाजी महाराज का विरोध कर रहे सम्भाजी :: 163
थे। महाराज ने निश्चय कर लिया कि जो कुछ होना है एक बार हो जाय। उन्होंने हँसने का अभिनय करते हुए कहा, "युवराज शम्भू यवनों से जाकर मिले कि उन्हें इस अपराध की सजा नहीं दी गयी। इसकी शिकायत लेकर मेरे पास कोई नहीं आया। किन्तु मुझे पक्का विश्वास था अण्णाजी पन्त शिकायत लेकर अवश्य आएँगे।" "हमारा इतना ही कहना है महाराज ! शम्भूराजा कास्तकारों को बहुत चाहते हैं। उनके लिए बहुत दया भाव रखते हैं। कर डुबाने वालों का कर माफ कर देते हैं।" "अण्णाजी उस सारे प्रकरण की मैंने गहराई से पूछताछ कर ली है। हमारे गुप्तचरों ने उन गरीब किसानों की सही जानकारी जब मुझे दी तो मुझे मालूम पड़ा वे किसान खाने के लिए भी मोहताज थे। यदि शम्भू ने उन्हें माफ न किया होता तो यह एक अपराध होता।" तो भी शम्भूराजा का व्यवहार अनेक बार अच्छा नहीं रहा है, महाराज।" शिवाजी महाराज चकित हो गये। उन्हें इस बात का कतई अनुमान न था कि अण्णाजी इस प्रकार का नाजुक प्रश्न भरी सभा में उठाएँगे। इन सारी बातों का मूल स्रोत अण्णाजी से जुड़ा था इसलिए इतनी स्पष्टता से बात को उठाना उचित नहीं था। इसलिए महाराज को लगा कि अब कुछ भी छुपाना ठीक नहीं हैं उन्होंने दृढ़ता से सीधे-सीधे कहा, "देखो अण्णाजी पन्त ! आप की जवान बेटी की मृत्यु जिस प्रकार दुर्घटना में हुई उसका आपको कितना गहरा दुख होगा, इसकी कल्पना हम कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में शम्भूराजा के सम्बन्ध में पूरी जानकारी लेने का काम मैंने महारानी सोयराबाई को सौंपा था। उनकी सारी पूछताछ के बाद ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला कि इस दुर्घटना में शम्भू दोषी हैं।" "महाराज! आपने तो मुसलमान सूबेदार की बहू को भी साड़ी-चोली दी थी।" "उसी तरह हम आपसे वादा करते हैं अण्णाजी पन्त, शम्भू के दुर्व्यवहार का आप कोई प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यदि वे अपराधी सिद्ध होते हैं तो हम अपने पुत्र को उचित दंड अवश्य देंगे। उन्हें कैद करेंगे।" "महाराज! हमारी गोद का क्या हुआ?" अण्णाजी पन्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे। "देखो, उसकी फरियाद और रंगपंचमी के दिन हुई सारी गड़बड़ी की मैंने बड़ी बारीकी से जाँच-पड़ताल कर ली है। त्र्यम्बकराव और निवासराव, पिता-पुत्र को शत्रु का साथ देते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। उन दोनों ने लिंगाणा के ऊपर की कालकोठरी से रात में बाहर भागने का प्रयत्न किया। इस कोशिश में वे दोनों पहाड़ 164 . सम्भाजी
के ऊपर से कालदरी में जा गिरे और चूर-चूर हो गये। इस घटना की जानकारी आप को भी है।" दरबार में बहुत तनाव का वातावरण बन गया था। महाराज के स्वाभिमानी मन के तार को अण्णाजी पन्त ने छेड़ दिया था। अण्णाजी पन्त चाहते थे कि राजाराम के विवाह के अवसर पर या किसी अन्य निमित्त से शम्भूमहाराज रायगढ़ न आ सकें। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग को छेड़ा था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने महाराज के क्रोध की भी चिन्ता नहीं की। इसी समय अन्तःपुर की ओर खुलने वाले दरवाजे का पर्दा हिला। उस ओर पैर-बिछुओं के बजने की आवाज महाराज ने सुनी। यह आवाज उनकी परिचित थी। महाराज ने धमकाते हुए कहा, "महारानी जी, पर्दे के पीछे से शायद आपको हमारी सारी बातें ठीक-ठीक सुनाई नहीं पड़ेंगी। आप सीधे बाहर ही आ जाइये न?" अपनी दृष्टि पैरों की ओर झुकाए सोयराबाई बाहर आ गयीं। बैठक में आकर एक ओर बैठ गयीं। महाराज ने विवादपूर्ण दृष्टि से महारानी की ओर देखा, मानो कह रहे हों कि संभाजी का एक और प्रेमी व्यक्ति आ गया। महाराज के प्रश्नों से अण्णाजी बहुत डर गये थे, किन्तु महारानी सोयराबाई के आ जाने से उनमें कुछ साहस आ गया। अन्य सभी प्रधान भारी तनाव में आ गये थे। महाराज ने अपने क्रोध को भीतर ही पी लिया। वे संयत स्वर में बोले, "देखिए शम्भूराजा जिस प्रकार हमारे पुत्र और आत्मीय हैं उसी प्रकार आप में से बहुतों के साथ हमारी जीवनभर की मित्रता है। आपने भी स्वराज्य के निर्माण में बड़ा कष्ट उठाया है। इसे हम कभी नहीं भूल सकते।" अण्णाजी पन्त ने अपने ओंठ आधे खोले। उन्होंने महारानी सोयराबाई की आँखों में झाँका। उन्हें अपने प्रति विश्वास और सहानुभूति दिखाई पड़ी। अण्णाजी पन्त में साहस आ गया। उन्होंने कहा, "महाराज ! क्या इन बातों का हम यह अर्थ निकालें कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। शम्भूराजा यवनों से जाकर मिले ही नहीं। वे वहाँ गये ही नहीं थे। श्रृंगारपुर के महल में ही बैठे थे— ?" "अण्णाजी पन्त, यह मत भूलो कि शम्भूराजा दिन दहाड़े खुल्लमखुल्ला यवनों से मिले थे। प्रश्न यह उठता है कि यवनों से मिलकर उन्होंने स्वराज्य का क्या अहित किया ? मोरोपन्त कहाँ हैं ? उन्हें बुलाइए।" "महाराज ! युवराज अल्हड़ स्वभाव के हैं। किसी को वे उपद्रवी भी लग सकते हैं। किन्तु मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि वे मन के बहुत साफ हैं।" अण्णाजी पन्त और सोयराबाई की जहरीली नजरों की चिन्ता किये बिना, बालाजी पन्त चिटणीस ने कहा। महाराज के आदेशानुसार एक गुप्त पत्र लेकर मोरोपन्त पेशवा दरबार में आये। सम्भाजी : 165
उन्होंने पत्र के साथ लगी चन्दन की डंडी महाराज के हाथ में पकड़ा दी। उसकी रेशमी डोरी खोलते हुए महाराज ने कहा, "यह देखो! कर्नाटक जाते समय मैंने शम्भू के आसपास गुप्तचरों को नियुक्त कर दिया था। शम्भू और दिलेरखान के बीच पत्राचार आरम्भ था। इसकी सूचना हमारे गुप्तचरों को थी। अनेक बार युवराज के पत्र को हस्तगत कर उसकी प्रतिलिपि गुप्तचर मेरे पास कर्नाटक भेजते थे। दिलेरखान को श्रृंगारपुर से भेजे गये शम्भू के पत्र की यह प्रतिलिपि देखिए। क्या लिखते हैं, हमारे बेटे इस पत्र में- " 'हमारे पिताजी मुझ पर भरोसा रखकर परदेश गये हैं। ऐसे में उन्हें धोखा देकर, आपके साथ मेलजोल रखना, हमारे धर्म को शोभा नहीं देता।' मित्रो ! आपको कुछ फर्क इसमें दिखाई देता है ? सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों और बच्चों का बकरी की तरह सिर छाँट देने वाले कहाँ मुगलों के शहजादे और कहाँ यह पिता की अनुपस्थिति में राज्य की हानि करने से डरने वाला बहादुर राजकुमार ? यही अन्तर होता है मुगलों के शहजादों और मराठों के युवराज में।" महाराज की मुखमुद्रा बहुत व्यथित दिख रही थी। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा, "दिलेरखान से जाकर मिलने का संभाजी का अपराध, एक प्रकार का अविवेक था। जवानी का पागल नशा था। अपने बारे में झूठी कल्पनाओं का एक दौरा था, इसमें कोई शक नहीं है। किन्तु उसी समय आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यदि मराठी स्वराज्य का गला घोंटने और माता भवानी का सिर फोड़ने की गद्दार भावना से शम्भूराजा सचमुच पागल हो गया होता तो क्या होता? बताइए, बताइए! हमारी अनुपस्थिति में सीधे रायगढ़ पर आकर बगावत का नारा लगा देते तो ? यह भयानक समाचार पाने के बाद हमें घोड़ा दौड़ाते हुए यहाँ पहुँचने में कम-से-कम चार दिन लग जाते। तब तक कौन जाने कौन सी रामायण यहाँ घट चुकती?" महाराज की बात सुनकर सभी प्रधान चुप हो गये। अब दरबार में कोई भी कुछ बोल नहीं रहा था। महाराज की मुखमुद्रा, उनके भावभरे स्वर की गम्भीरता कुछ अलग ही लग रही थी। उन्होंने दुखी स्वर में कहा- "कुछ महीने पहले अपने दोनों पुत्रों संभाजी और राजाराम में राज्य का बँटवारा करने का मेरा विचार था। राज्य शिवाजी का हो या प्रभु रामचन्द्र का, राजा प्रधान होता है, शेष सभी अधिकारी और जनता मिट्टी के पुतले होते हैं। इसीलिए असंख्य बीमारियों ने सभी को ग्रस रखा है। आज स्वराज्य की पालकी उठाने के बदले लोग अपने-अपने स्वार्थों की टोकरियाँ ढोने में लगे हैं। परस्पर द्वेष और भेदभाव इतना बढ़ गया है कि किसी समय तोरणा किले पर किये गये मेरे मन्त्रघोष का एक भी स्वर आज बचा नहीं है। यहाँ हमारे अष्टप्रधानों में भी झगड़े हैं। एक 166 . सम्भाजी
ओर ब्राह्मणों का दल है तो दूसरी ओर चाँदसेनी कायस्थ प्रभुओं का। यहाँ दरबार में अण्णाजी दत्तो पन्त और बालाजी आवजी का सुर नहीं मिलता। ऊँच नीच के भेदभाव से मराठा जाति हमेशा के लिए पंगु हो गयी है। ऐसे अविश्वासपूर्ण दूषित वातावरण में स्वराज्य का बँटवारा करना यानी संकट के कीचड़ में और गहरे धँसना है। भविष्य में जो कुछ होगा उसका निर्णय समय स्वयं करेगा।" बड़े महाराज खड़े हो गये। प्रधानमंडल ने भी जाने की तैयारी की। उसी समय बड़े महाराज कुछ रुके। सभी की ओर देखते हुए अत्यन्त कातर स्वर में बोले— "शम्भुराजा के जन्म के समय हम प्रतापगढ़ की लड़ाई में व्यस्त थे। जिस समय शम्भुराजा का जन्म हुआ पुरन्दर के किले पर घनघोर वर्षा हो रही थी। वह छोटा सा कोमल मांस का गोला सईबाई ने मुझे और जीजा माता को सौंप दिया। अपने इस नवजात शिशु को छोड़कर बीमारी से जर्जर उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी। शम्भू को जब मैंने अपने सीने से लगाया तो उसने मेरी उँगली जोर से पकड़ रखी थी। तब से अब तक मैंने और मेरे राजसी वस्त्रों के भीतर छिपे उसके पिता ने उसे बहुत समीप से जाँचा परखा है। रानी साहिब सोयराबाई, अण्णाजी पन्त! आपको हमारे शम्भुराजा क्रोधी स्वभाव के लग सकते हैं। किसी को उद्द्यत भी लग सकते हैं। किन्तु उस बात को भी हमेशा स्मरण रखें जिसकी याद मुझे जीजा माता दिलाती रहती थीं, वे कहती थीं, "शिवा! शम्भू के बाहर से दिखने वाले अनगढ़ और उद्यत स्वभाव पर कभी मत जाओ। वह खरे सोने की मुहर है। भविष्य में तुम्हारे हिन्दवी स्वराज्य पर कोई आपदा आएगी तो यही तुम्हारा पागल बेटा अपने प्राणों की बाजी लगा देगा किन्तु अपने सम्मान पर आँच नहीं आने देगा। इस बात को गाँठ बाँध लो।" चार भोगावती की घाटी और सुदूर विशालगढ़ की पगडंडियों से बादल उठते थे। म्हसाई के विस्तृत पठार से तैरते हुए आगे आते थे। उधर से आने वाले मेघों के आकार इतने चौड़े टेढ़े-मेढ़े और बिखरे हुए होते थे कि लगता था जैसे जटायु जैसा कोई विशाल पक्षी आकाश में उड़ानें भर रहा हो। कभी कभी फटे पंखों-सी मेघ- छायाएँ अशुभ के बीज बोती आती थीं और दैत्यों की भाँति आती थीं और भागते हुए सम्भाजी · 167
किले के ऊपर से निकल जाती थीं। संक्रान्ति से एक दिन पहले शम्भूराजा की महाराज से भेंट हुई थी। उसके बाद तीन-चार दिन तक उनकी चर्चाएँ निरन्तर होती रहीं। महाराज रायगढ़ की ओर निकल चुके थे। शम्भूराजा को शिवाजी महाराज के हृदय के अमृतघट से नयी ऊर्जा प्राप्त हुई थी। किन्तु यद्यपि महाराज ने उन्हें पन्हालगढ़ की सूबेदारी सौंप दी थी तथापि उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे वहाँ मेहमान हों। एक तो उनके साथ काम करने के लिए हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त, सुमन्त जैसे अनुभवी लोगों के साथ सोमाजी बंकी और बर्हिर्जी नाइक जैसे नौसिखिये नियुक्त किये गये थे। फर्जन्द रिश्ते में शम्भूराजा के चाचा थे परन्तु उनमें अब पहले जैसा अपनापन नहीं था। किले का अन्य प्रबन्ध अष्टप्रधानों के निर्देश से चल रहा था। ऐसी स्थिति में शम्भूराजा को परायेपन का अनुभव हो रहा था। ढाई तीन महीने पहले जब बड़े महाराज रायगढ़ के लिए प्रस्थान कर रहे थे। तब शम्भूराजा ने उनसे पूछा था—"पिताजी ! हम कितने दिनों बाद वहाँ आयें ? "पिताजी, मुझे लगता है कि मेरे सम्बन्ध में आपके मन में जो संशय उत्पन्न हुआ था। वह अभी तक मिट नहीं पाया। क्या इसे हम अपना दुर्भाग्य मानें ?" अपने को न रोक पाने के कारण शम्भूराजा ने कह दिया। शिवाजी महाराज का मन गद्गद हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू बेटे ! आपका हृदय कितना पाक साफ है? इसका साक्ष्य मुझे किसी और से नहीं लेना है। किन्तु रायगढ़ की जहरीली हवा अभी आपके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। समय के साथ ये जहरीले काँटे अपने आप दूर हो जाएँगे। आपस की खाइयाँ पट जाएँगी, मन परस्पर जुड़ जाएँगे। इसके बाद हम सभी रायगढ़ में एकत्र होंगे। जगदीश्वर का अभिषेक करना है, आपस में बहुत कुछ बोलना है, करना है।" उन चार दिनों में पिता पुत्र के बीच घटित दीर्घ संवाद शम्भूराजा के मानस पटल पर ताजा बना रहा। उसी बीच रायगढ़ पर राजाराम के यज्ञोपवीत संस्कार और विवाह के आयोजन का समाचार मिला। महाराज ने राजाराम का विवाह प्रतापराव की पुत्री के साथ निश्चित किया था। यह शुभ समाचार जब युवराज और युवराज्ञी को मिला तो वे बहुत प्रसन्न हुए थे। किन्तु विवाह समारोह का निमन्त्रण शम्भूराजा को नहीं आया। शम्भूराजा को पक्का विश्वास था कि आज नहीं तो कल निमन्त्रण अवश्य आएगा। किन्तु वैसा कुछ नहीं हुआ। शम्भूराजा और येसूबाई ने भी रायगढ़ जाने का निश्चय किया था। इसी बीच रायगढ़ से हिरोजी फर्जन्द, जनार्दन पन्त और अनेक छोटे-बड़े मुंशियों तक के लिए निमन्त्रण आ गये। जनार्दन पन्त के पोते विवाह में जाने के लिए सजधज कर बैठे थे। दो-ढाई साल की छोटी भवानी दौड़ती हुई आयी और येसूबाई के गले से लिपटकर 168 :: सम्भाजी
पूछने लगी, "माताजी, रायगढ़ के विवाह में जाने के लिए वहाँ घोड़े सज रहे हैं। हम लोग कब निकलेंगे?" शम्भूराजा ने छोटी भवानी को अपने सीने से लगा लिया। अपनी रुलाई को छिपाते और भीतर-ही-भीतर पीड़ा के घूँट पीते हुए वे बोले, "बेटी, छोटे राजा की माता को हमारा वहाँ जाना पसन्द नहीं है।" उन दिन पन्हाला से अनेक घोड़े सजधज कर रायगढ़ की ओर निकल गये। यदि दूसरे लोगों को भी निमन्त्रण न आया होता तो युवराज और युवराज्ञी विवाह समारोह के लिए रायगढ़ अवश्य चले जाते। किन्तु जानबूझकर दिखाया गया यह सौतेला व्यवहार बड़ा विषाक्त था। उस दिन शम्भूराजा बहुत उदास दिखाई पड़ रहे थे। नया रेशमी कुर्ता और मोतियों की माला पहने भवानी विवाह की खुशी में इधर उधर नाचती रही और अन्ततः वैसे ही सो गयी। येसूबाई ने संभा को सँभालने का बहुत प्रयास किया। किन्तु यदि चिन्ता का भूत एक बार मन में प्रविष्ट हो जाता है तो निकलने का नाम ही नहीं लेता। वह खाली बर्तन की तरह बजता ही रहता है। शम्भूराजा ने विषाद भरे स्वर में पूछा, "येसू अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोग कैसे बदल जाते हैं? कैसे टूट जाते हैं सारे रिश्ते?" "और क्या स्मरण हो रहा है, युवराज?" "हो सकता है कि ये बातें आज किसी को अच्छी भी न लगें। किन्तु इस शम्भू के बचपन का आँगन था जीजा माता की गोद, और बचपन के चैतन्य का झूला थीं हमारी सौतेली माता सोयराबाई। वह ममत्व वह प्रेम कहाँ चला गया सब कुछ?" युवराज की पीड़ा भरी स्मृतियों को सुनकर येसूबाई का भी मन व्यथित हो गया। उन्होंने दुखी मन से कहा, "सच है, कितने बदल जाते हैं दिन?" रात खाने को दौड़ती थी। केवल दिन में शम्भूमहाराज अपने मित्रों के साथ पन्हाला के बाहर निकलते थे। पन्हाला के पश्चिम में तीन मील लम्बा म्हमाई का पठार था। उस पर आठ दस छोटी बड़ी पहाड़ियों के होने के कारण भीतरी भाग में अनेक खाइयाँ बन गयी थीं। काली चट्टानों के इन पहाड़ों की तलहटी में अनेक छुपने लायक जगहें बन गयी थीं। इनमें हजारों की संख्या में सैनिक रहते थे। इन सैनिकों को पन्हाला के बाहर का क्षेत्र दिखाई पड़ता था किन्तु गुफाओं की भाँति बनी जगह बाहर के लोगों को दिखाई नहीं देती थी। शम्भूराजा इन जगहों को 'बारद्वारी' कहते थे। वहाँ पहुँचकर शम्भूराजा अपने मित्रों से अभिमानपूर्वक कहते थे, "अपने सह्याद्रि के पहाड़ों-पत्थरों में ऐसी कितनी ही बारद्वारी खाइयाँ हैं। यह क्षेत्र बहुत ही कठिन और अजेय है। ये हमारे पहाड़ पत्थर अपना पेट चीर कर बड़ी सम्भाजी . 169
सहजता से हमें छिपा लेंगे। जहाँ सूर्य की किरणें तक नहीं पहुँच पातीं वहाँ इन पत्थर की दीवारों को भेद कर पापी औरंगजेब कैसे पहुँच सकेगा?'' रात को पलँग के अत्यन्त कोमल बिछौने पर भी शम्भुराजा को नींद नहीं आती थी। उनकी बेचैनी के कारण येसूबाई की चिन्ता भी बढ़ जाती थी। जब शम्भुराजा को कर्मचारियों और अधिकारियों की बात स्मरण होती तो उन्हें विषाद की जगह क्रोध आ जाता था। आवेश के स्वर में युवराज कहते, "आजकल हमारे फर्जन्द चाचा को भी जाने क्या हो गया है। जिस समय आगरा के महल से पिताजी निकले थे तब कुछ घंटों के लिए उन्होंने अपनी जगह पर फर्जन्द चाचा को सुला दिया था। क्योंकि फर्जन्द चाचा ठीक उन्हीं की तरह दिखाई देते थे। युवराज्ञी, उस समय मेरे बालमन को लगा था कि यदि ऐसा कोई प्रसंग घटित हुआ तो पिताजी की जगह को फर्जन्द चाचा भर देंगे। किन्तु आजकल तो हमें टालना ही उन्हें अच्छा लगता है।" "जाने दें! आप अधिक चिन्ता न करें। यहाँ पन्हाला पर पिताजी के साथ खुलकर बातें हुई हैं न? उनका हृदय निर्मल है तो अन्य लोगों की चिन्ता क्यों करें?'' येसूबाई ने कहा। "नहीं, येसू राज्य के कार्य व्यापार को चलाने के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। किन्तु अनेक बार बेड़ ही खेत खाने लगती है।" चर्चा के दौरान येसूबाई ने कहा, "जब से सोयराबाई के छोटे भाई हंबीरराव स्वराज्य के सेनापति बन गये हैं तब से हमारी सासूजी को आसमान छोटा लगने लगा है। वे तो आजकल खुलकर कहती भी हैं कि-'शेर जैसा मेरा भाई स्वराज्य का सेनापति बन गया है तो बेटा राजाराम सिंहासन तक क्यों नहीं पहुँच पाएगा?'" शम्भुराजा ने कुछ नहीं कहा। तब येसूबाई उनसे पूछने लगीं, "क्या स्वामी को यह बात सच लगती है? हंबीरराव उनकी इस प्रकार सहायता करेंगे?'' "क्यों नहीं, येसू? यदि करोड़ों की सम्पत्ति का राज्य अपने भांजे को मिल रहा हो तो कौन सा मामा ऐसा नहीं करेगा? आज नहीं तो कल हंबीर मामा अपनी बहन के पक्ष में जाएँगे ही। यह तो काले पत्थर की लकीर की तरह स्पष्ट है।" विवाह का समारोह पूरा करके लोग शीघ्र ही पन्हाला आ गये। राजाराम के प्रति असीम ममता के कारण शम्भुराजा उनकी कुशल क्षेम पूछे बिना नहीं रह सके। लोगों ने बताया कि विवाह का कार्य समाप्त होने पर बड़े महाराज को प्रतापराव की बहुत याद आयी। वे बेचैन और विचलित हो गये। कुछ लोगों ने शम्भुराजा को बताया कि विवाह के ऐन मौके पर विवाह मंडप में ही राजाराम रुष्ट हो गये। यह कहकर कि-'हमारी शादी में शम्भू दादा को क्यों नहीं बुलाया गया?' क्रोध करने लगे। वे तो विवाह वेदी पर बैठने को तैयार ही न थे। हंबीर मामा ने उन्हें किसी 170 .. सम्भाजी
प्रकार यह कहकर तैयार किया कि 'शम्भूराजा आज ही पहुँचने वाले हैं।' तब जाकर कहीं छोटे युवराज विवाह के लिए तैयार हुए। यह कहानी सुनते सुनते शम्भूराजा का कलेजा तिलमिला रहा था। दूसरे दिन शम्भूराजा चन्दन के पीढ़े पर भोजन करने बैठे थे। उनके साथ जोत्याजी कतूरकर और अन्य मित्र भी साथ बैठे थे। इसी समय जनार्दन पन्त सुमन्त के घर से लड्डुओं से भरी टोकरी लेकर आये। येसूबाई ने तत्काल पहचान लिया कि यह रायगढ़ से आयी विवाह से सम्बद्ध भेंट है। उन्होंने आँखों के संकेत से टोकरी अन्दर रखने को कहा। किन्तु जो सेवक टोकरी लेकर आया था, उसकी समझ में कुछ नहीं आया। यह देखकर येसूबाई शीघ्रता से उठीं और टोकरी लेकर अन्दर जाने लगीं। उसी समय शम्भूराजा के कठोर शब्द उनके कानों में पड़े— "येसू क्या छिपा रही हो? क्यों छिपा रही हो? मंगल कार्य की मिठाई कहीं ऐसे छिपा कर रखी जाती है? ले आओ वे लड्डू और पूरी पंक्ति में बाँटो।" शम्भूराजा का वह रुद्रावतार देखकर येसूबाई झटपट लड्डू बाँटने लगीं। शम्भूराजा ने टोकरी से एक लड्डू उठाकर येसूबाई के हाथ में रख दिया। अपने आँसू को छुपाने का प्रयास करते हुए शम्भूराजा ने कहा "जोत्याजी येसूबाई! लड्डू खाओ, खाओ, कड़वे हों या मीठे, खाओ अब भले ही थाली में जहर के लड्डू परोसे तो भी उसे मीठा मानकर खाना होगा। येसू! अब हमारे सामने दूसरा कोई विकल्प रह गया है क्या?"
पाँच
फागुन की अमावस्या तिथि आयी। उस शाम को सूर्य डूबने से पहले ग्रहण ग्रस्त हो गया। पन्हालगढ़ से कुछ उत्साही लोग सूर्य ग्रहण देख रहे थे। शम्भूराजा ने उस ओर दृष्टि दौड़ाई। वे अपने महल के छज्जे पर खड़े थे। उसी समय येसूबाई वहाँ दौड़ती हुई आयीं। पीछे से युवराज का हाथ खींचते हुए कहने लगीं, "अन्दर चलिए। कहते हैं कि ग्रहण के समय सूर्य की ओर देखना अशुभ माना जाता है।" चार दिन बाद एक दिन शम्भूराजा अत्यन्त चिन्तित मुद्रा में महल की ओर लौटे। स्वागत के लिए येसूबाई दरवाजे पर खड़ी थीं। उन्हें देखकर येसूबाई ने चिन्तित स्वर में पूछा, "आज सवारी इतनी गम्भीर क्यों है?"
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"क्या कहते हैं?" येसूबाई ने साड़ी के पल्लू को अपनी ठुड्डी पर रखते हुए पूछा? "इतना ही नहीं रायगढ़ पर प्रतिदिन कोई-न-कोई नयी घटना घट रही है। पिताजी की बीमारी का सोयराबाई ने बहुत लाभ उठाया है। समझ में नहीं आता कि उनके मस्तिष्क में क्या चल रहा है। उन्होंने रायगढ़ पर अपना शिकंजा कसने की शुरुआत कर दी है।" "ऐसा? क्या कह रहे हैं?" "हाँ! वहाँ पर पूरी तरह भय और आशंका का वातावरण फैल गया है। गढ़ के द्वार तो बन्द रहते ही हैं, अन्य ड्योढ़ियाँ भी शायद ही कभी खोली जाती हों। कड़ी नाकेबन्दी के कारण किले में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश सम्भव नहीं है। येसू, अपने रायगढ़ पर कोई विलक्षण राजनीति रंग ले रही है।" युवराज के चेहरे का रंग एकदम उड़ गया था। येसूबाई ने पलक झपकते ही युवराज का भाव पढ़ लिया। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यहाँ अधिक समय गँवाने की अपेक्षा यही अच्छा होगा कि वहाँ के लिए निकल पड़ें।" बिना किसी दुविधा में पड़े आगे निर्णय लेना आवश्यक था। युवराज ने कवि कलश के लिए संगमेश्वर की ओर पत्र भेज दिया था। शृंगारपुर की ओर भी घोड़े दौड़ा दिये गये थे। युवराज ने अपने ससुर पिलाजीराव शिर्के को सावधान रहने का संकेत दे दिया था। चैत्र की पूर्णिमा आयी। यह हनुमान जयन्ती का दिन था। युवराज भोर में ही उठे और स्नानादि से निवृत्त होकर हनुमान मन्दिर चले गये। युवराज और युवराज्ञी ने हनुमानजी की महापूजा की। किन्तु आज एक पोरिषा ऊँची हनुमानजी की पाषाण मूर्ति कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी। हनुमानजी का सिन्दूर चर्चित मुख बहुत क्रुद्ध दिखाई पड़ रहा था। आज प्रातःकाल से ही येसूबाई का मन बहुत अशान्त था। उन्हें भविष्य का कोई अनिष्ट भयभीत कर रहा था। उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था। दोपहर में उन्होंने घबराये स्वर में युवराज से कहा, "मुझे ससुरजी की बड़ी चिन्ता हो रही है।" "पिताजी की तबीयत की इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? वे तो सिद्ध पुरुष हैं। दीर्घायु होंगे ही और अभी उनकी उम्र ही क्या हुई है? पचास पूरा करने में भी अभी एक महीना बाकी है। मुझसे और तुमसे इस मराठी माटी को उनकी अधिक आवश्यकता है।" सन्ध्या समय कवि कलश युवराज के महल में प्रविष्ट हुए। उनके पीछे ही संभाजी राजा के दो जासूस भी महाड़ और रायगढ़ वाड़ी से लौटकर आये। दोनों जासूस बहुत घबराये हुए दिख रहे थे। जासूसों ने घबराये स्वर में कहा, "हमें तो क्या, किसी को भी रायगढ़ में प्रवेश नहीं मिल रहा है। कुछ लोग कह रहे थे कि 172 :: सम्भाजी
महाराज को गुड़घी रोग हो गया है।'' ''कुछ लोग दबे स्वर में यह भी कह रहे थे कि सोयराबाई ने महाराज पर विष प्रयोग किया है।'' दूसरे जासूस ने कहा। जासूसों की खबरें संभाजी राजा शान्तिपूर्वक सुन रहे थे। गर्म साँस छोड़ते हुए उन्होंने कवि कलश से कहा, ''कविराज स्वराज्य का चक्र उल्टी-सीधी दिशा में घूम रहा है। तैयार हो जाइए और सावधानी बरतिए ! पिताजी के स्वास्थ्य का ठीक- ठीक समाचार ले आने के लिए जितनी जल्दी सम्भव हो जासूसों को रायगढ़ भेजिए।'' चैती पूनम का दिन था। आठ दिनों तक तीव्र ज्वर से पीड़ित होने के कारण महाराज परलोकवासी हो गये। शिवाजी महाराज के आकस्मिक निधन के कारण रायगढ़ विषाद में डूब गया। बुर्ज झुक गये। दरवाजों की कमानें झुकी हुई दिखने लगीं। गंगा सागर से लेकर काली हौज तक अनेकानेक तालाबों, बावड़ियों और झरनों का पानी फीका लगने लगा। इस वज्राघात से मराठा राज्य की मानो कमर ही टूट गयी। यह भी प्रश्न था कि आसपास के शत्रु आक्रमण कर सकते थे। स्थिति समझ में नहीं आ रही थी। किले पर अष्टप्रधानों में कोई भी अनुभवी बुजुर्ग व्यक्ति मौजूद नहीं था। इसीलिए कान्होंजी भांडवलकर, दादूजी सोमनाथ और महारानी सोयराबाई इस दुखद समाचार को छुपा रहे थे। राजाराम के हाथों किसी प्रकार अन्त्येष्टि कर्म कराया गया। कारवार की ओर युद्ध पर निकले अण्णाजी दत्तो जल्दी ही वापस लौट आये। उनके पीछे ही नासिक त्र्यम्बकेश्वर से पेशवा मोरोपन्त भी वापस आ गये। राज्य रावण का हो या राम का, प्रशासन के अधिकारी इस बात का ध्यान तो रखते ही हैं कि उनका स्थान और अधिकार सुरक्षित बना रहे। यही कारण था कि रायगढ़ के सचिव अण्णाजी दत्तो बहुत बेचैन थे। वे सोचते थे-''यहाँ जो भी होगा देखा जाएगा किन्तु यदि एकबार संभाजी गद्दी पर बैठ गये तो उनके लिए कुछ ठीक न होगा। उनके पक्ष वालों का भी ऐसा ही सोचना था। अण्णाजी की नींद उड़ गयी थी। आज तक उन्होंने संभाजी राजा से द्वेष करने और चार लोगों में उनके सम्बन्ध में अनाप-शनाप बकने का एक भी अवसर खाली नहीं जाने दिया था। अण्णाजी की तानाशाही प्रजा से प्राप्त धन के घोटालों, परस्पर जारी की गयी सनदें, गलत ढंग से संचित किया गया धन आदि की पूरी जानकारी शम्भूराजा को थी। इसीलिए अण्णाजी जब भी सामने पड़ते थे तो शम्भूराजा कहते थे, ''अपश्यतः पश्चातामात्यान्पश्यते-यह देखो पैसा लूटने वाले अमात्य आ गये।'' सम्भाजी 173
शिवाजी महाराज का नारा सर्वकल्याण का था किन्तु उनके कुछ अधिकारियों का झुकाव अपना उल्लू सीधा करने की ओर था। इसीलिए वसूली की पूरी राशि सरकारी खजाने तक नहीं पहुँच पाती थी। यही नहीं, जब फ्रांसीसी, अंग्रेज पुर्तगाली आदि विदेशी अतिथि किले पर आते थे तो दरबारी अधिकारी ललचाये रहते थे कि महाराज के साथ उन्हें भी कुछ उपहार मिल जाय। बीस-बाईस वर्ष के तरुण शम्भूराजा को यह सब असह्य था। वे क्रोध से भन्नाये रहते थे परिणामस्वरूप अधिकारी उनके असन्तुष्ट रहते थे। शिवाजी महाराज के स्वर्गवास के बाद अन्य इष्ट मित्र दरबारी अण्णाजी से दबी जबान में पूछने लगे, “क्यों अण्णाजी अब शम्भूमहाराज गद्दी पर विराजमान होंगे तो आपका क्या होगा?'' अपने भविष्य की चिन्ता ने अण्णाजी को पागल कर दिया था। अण्णाजी अच्छी तरह जानते थे कि अपने बेटे को गद्दी पर बिठाने के लिए सोयराबाई शम्भूराजा का विरोध करेंगी किन्तु केवल बुद्धि और षड्यन्त्र के सहारे राज्य खड़े नहीं होते। राज्य के लिए बाहुबल की आवश्यकता होती है। स्वराज्य के सेनापति हंबीरराव मोहिते का पड़ाव कराड के समीप पड़ा था। अण्णाजी ने उन्हें तत्काल सन्देश भेजा, "आपके भांजे राजाराम साहब को गद्दी पर बिठाने का हमारा पक्का इरादा है। वे आपकी सात पीढ़ियों का उद्धार कर देंगे। किन्तु आपके सहयोग के बिना हम अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सकते।" सुदैव से दो ही दिनों में हंबीरराव का उत्तर आ गया- "मन्त्रीजी! आप स्वयं इतने ज्ञानी और तीव्र बुद्धि वाले हैं। स्वराज्य के किस वृक्ष मे कितने पत्ते हैं, इसका हिसाब किताब आपके पास है। आपके नेतृत्व में ही मेरे भांजे का कल्याण होगा। इस सिपाही को इससे अधिक और क्या चाहिए?'' हंबीरराव की लिखित सम्मति से अण्णाजी कुछ अधिक ही प्रसन्न हो गये। उनके पक्ष को इससे बड़ा बल मिला। किले पर आने के बाद वे सोयराबाई से दो तीन बार मिल चुके थे। अब तो उनकी जेब में हंबीरराव का पत्र भी आ गया था। इसीलिए महारानी सोयराबाई के महल की ओर जाते समय उनके पैरों में विलक्षण तीव्रता आ गयी थी। महाराज की मृत्यु के बाद सप्त महल सूना सूना दिखाई देने लगा था। किन्तु रनिवास के बाहर एक महल के सामने अण्णाजी को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। दासी द्वारा सूचित करने पर महारानी सोयराबाई थोड़े ही समय में उपस्थित हो गयीं। पति के स्वर्गवास से उनका मन टूट गया था। किन्तु अपने के भविष्य की चिन्ता में वे व्याकुल हो रही थीं। वर्तमान परिस्थिति से बिना विचलित हुए उन्होंने किले पर और किले के बाहर कड़ा बन्दोबस्त कर रखा था। अण्णाजी को महारानी का जोश, सामर्थ्य और इरादा अच्छी तरह मालूम था। इसलिए उन्हें पूरा विश्वास था 174 :: सम्भाजी
कि उनकी मनोवांछित योजना अवश्य पूरी होगी। महारानी आकर सामने पलँग पर बैठ गयीं। अण्णाजी पन्त बड़ी आत्मीयता से अभिवादन करके कहने लगे- "महारानी! अब अधिक समय गँवाना किसी के भी लिए अच्छा नहीं है। बाहर प्रजा उलझन में पड़ गयी है, सेना भी बेहाल हो रही है। उन्हें यदि समय पर निश्चित आदेश दिया गया तो ठीक रहेगा।" "इतनी शीघ्रता करनी होगी क्या?" "शीघ्रता? महारानी महाराज की मृत्यु के समाचार को जितना ही छुपाया जा रहा है, यह समाचार उतनी ही तीव्र गति से बाहर फैल रहा है। इसके साथ ही सिंहासन को अधिक समय तक खाली रखना अराजकता को निमन्त्रित करना है।" सोयराबाई और भी चिन्ताग्रस्त हो गयीं। उनकी वेदना छिप नहीं पायी। दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए उन्होंने पूछा- "किसको बिठाएँ सिंहासन पर? शम्भूराजा के बदले यदि हमने राजाराम को गद्दी पर बिठाया तो क्या प्रजा इसे स्वीकार करेगी? वरिष्ठ लोग इससे सहमत होंगे क्या?" "आप ऐसे ऐन मौके पर इस प्रकार पीछे क्यों हट रही हैं? सोयराबाई को स्मरण दिलाते हुए अण्णाजी ने कहा, "आपने बड़े महाराज को बहुत समीप से देखा है। क्या उन्होंने कभी भी शम्भूराजा को राज्य देने की बात कही? क्या आपको ऐसा कोई प्रसंग स्मरण है?" "किन्तु उन्हें राज्य नहीं देना है ऐसा भी तो महाराज ने कभी नहीं कहा।" अण्णाजी ने अपने रेशमी रूमाल से पसीने से तर चेहरे को पोंछ लिया। सोयराबाई को अधिक सचेत करते हुए उन्होंने कहा, "महारानी जी आप ही सोचिए बड़े महाराज के अन्तिम आठ दिनों से हवा किस दिशा में बह रही है?" सोयराबाई कुछ सम्भ्रम के साथ बोलीं, "उन दिनों तो महाराज अर्धचेतन अवस्था में रहते थे। बीच-बीच में कुछ स्मरण करते हुए कहने लगते थे- 'शम्भू को बुला लीजिए, मेरे शम्भू को बुला लीजिए'।" "बुला लेने का मतलब यह थोड़े ही होता है कि गद्दी पर बिठाइए। मृत्यु के समय मनुष्य की जान छटपटाती है, बाल बच्चों की याद आती है। इससे अधिक इसमें कुछ नहीं है।" अण्णाजी की इन बातों से सोयराबाई और भी दृढ़ दिखाई देने लगीं। अपने को न रोक पाने के कारण अण्णाजी चिन्तातुर होकर बोले, "महारानी जी कृपा कीजिए, जल्दी कीजिए। राज्यारोहण के निर्णय में आप विलम्ब कर रही हैं। महाराज की मृत्यु का समाचार छिपाने से बाहर लोगों में कुछ अलग ही शंका फैल रही है।" "कैसी आशंकाएँ?" सम्भाजी :: 175
इधर-उधर देखते हुए अण्णाजी ने धीमे कि तेज स्वर में कहा, "बाहर लोगों की जिह्वाएँ कुछ अधिक ही हिलने लगी हैं। वे कह रहे हैं कि राज्य के लोभ ने महारानी को अन्धा कर दिया है। उन्होंने ही महाराज को विष दे दिया है। सोयराबाई ने ही महाराज को मार डाला।" इससे सोयराबाई बहुत क्षुब्ध हुई। किन्तु समय गँवाने से कोई लाभ न था। तत्परता से भविष्य का निर्णय लेना आवश्यक था। उसी दिन दोपहर को निजी दरबार में रामचन्द्र नीलकंठ, न्यायाधीश प्रह्लाद और राहुजी सोमनाथ जैसे विशिष्ट लोग चर्चा के लिए एकत्र हुए। चर्चा आरम्भ हुई। बहुत समय बीत जाने पर पेशवा मोरोपन्त पिंगले वहाँ नहीं आये। वैसे भी अण्णाजी को मोरोपन्त पर भी विश्वास न था। नासिक से रायगढ़ आने में भी पन्त को विलम्ब हुआ था। अण्णाजी पहले पहुँच गये थे। शम्भूराजा के विरोधियों को एकत्र करने का सुअवसर मिला था। इससे अण्णाजी मन ही मन बहुत प्रसन्न थे। बैठक में मोरोपन्त के सम्मिलित न होने से कुछ लोगों की दृष्टि वक्र होने लगी। लोग सशंक होने लगे। अण्णाजी दत्तो बेचैन होकर उठ गये। वे अब तक मोरोपन्त के पास तीन बार दूत भेज चुके थे। किन्तु फिर भी वे नहीं आये। इससे अण्णाजी बहुत बेचैन हो गये। अन्ततः परिस्थिति के असह्य हो जाने पर उन्होंने राहुजी सोमनाथ से कहा, "अब आप उठिए। साथ में सेना लेकर मोरोपन्त की हवेली पर जाइए और उन्हें नजरबन्द कीजिए। इसके बिना उनके जैसे अभिमानी व्यक्ति का अहंकार उतरेगा नहीं।" इसी समय दुबले-पतले गेहुँए रंग के मोरोपन्त पेशवा सामने आकर खड़े हो गये। अण्णाजी के कुछ शब्द उनके कानों से टकरा गये थे। इसी से मोरोपन्त की भूरी आँखें कुछ तिरछी हो गयी थीं। उन्होंने शम्भूराजा के विरोध में एकत्र इन दिग्गजों को देखा और कुछ पीछे हटकर नम्रतापूर्वक नीचे बैठ गये। "बोलो भाइयो, बोलो। समय बहुत कठिन है। सीमा पर शत्रु खड़ा है। ऐसे समय में विवेकपूर्ण निर्णय लेना ही श्रेयस्कर होगा।" अण्णाजी पन्त जोर-जोर से कहने लगे, "अभी एक वर्ष पहले ही जो व्यक्ति मुगलों से जा मिला, जिसने अपने भूपालगढ़ जैसे मजबूत किले को खोद खोदकर गिराया, जिसने अपने पिता के राज्य से गद्दारी की, क्या ऐसे स्वराज्य द्रोही के हाथों में यह स्वराज्य सौंपना है?" अण्णाजी दत्तो के सारे तर्क सभी को बेजोड़ लगे। किन्तु अपनी धीमी और शान्त आवाज में अण्णाजी को रोकते हुए मोरोपन्त ने प्रश्न किया—"हम कहते हैं थोड़ा धीरज रखिए इतनी उतावली किस बात की?" "उतावली?" नीचे बैठे अण्णाजी उठकर खड़े हो गये और कहा, "क्यों? आप शम्भूराजा के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्या?" 176 सम्भाजी
अण्णाजी ने बहुत चिल्ल-पों मचाई किन्तु प्रधान मंडली में से कोई भी उनके सहयोग के लिए तत्काल तैयार नहीं हुआ। अण्णाजी भी कच्चे गुरु के चेले न थे। वे बड़े उस्ताद थे। स्वराज्य के नाम पर उन्होंने बहुत धन जोड़ रखा था। इसीलिए अन्य प्रधान सोचते थे कि शम्भूराजा के सामने यदि अण्णाजी का कच्चा-चिट्ठा खुलता है तो खुलने दो, हमें उससे क्या? प्रधानों और अधिकारियों का उदासीन प्रतिसाद अण्णाजी को बहुत अखरा। वे दाँत से ओंठ काटते हुए और अपनी नुकीली मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले, "चलो हमें दिखाई पड़ रहा है कि आप लोगों को शम्भूराजा की चाटुकारिता करना ही अच्छा लगेगा। आप लोग खुशी से उनकी चाकरी करो। मुझे तो यहाँ एक पल के लिए भी चैन नहीं आएगा। उसकी अपेक्षा हाथ में कटोरा और लाठी लेकर काशी यात्रा करना मुझे अधिक अच्छा लगेगा।" अण्णाजी ने फिर से एकबार सब पर नजर डाली। किन्तु किसी का भी समर्थन न मिलने से निराश हो गये। महारानी सोयराबाई की समझ में आ गया कि बैठक में अण्णाजी अकेले पड़ रहे हैं। उन्हें लगा कि राजमाता होकर भी उनके सारे मनोरथ टूट जाएँगे! राजमाता बनकर दरबार में बैठना तो दूर उन्हें अपने साथियों का साथ भी नहीं मिल रहा था। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो यात्रियों के साथ से छूटकर अकेले काशी यात्रा को निकली हों। फिर दरबारियों को आड़े हाथों लेती हुई बोलीं, "अण्णाजी पन्त क्या केवल अपने भले के लिए यह सब कह रहे हैं? आज महाराज के स्वर्गवासी होने से स्वराज्य के जहाज के डूबने का समय आ गया है। ऐसे समय में भले-बुरे की चिन्ता न करने वाले शम्भूराजा के पाप में सने पैर यदि सिंहासन पर पहुँच गये तो कैसे अनर्थ होगा? इसकी कल्पना किसी ने की है क्या?" स्वयं महारानी ने नेतृत्व सँभाला तो बैठक में हवा की दिशा ही बदल गयी। वैसे सभी कर्मचारी शम्भूराजा से किसी-न-किसी कारण दुखी थे। इसलिए अब उन सभी को शम्भूराजा में कोई-न-कोई दोष दिखाई देने लगा। जो शान्त स्वभाव के थे, वे भी मौका देखकर शम्भूराजा की शिकायत करने लगे। न्यायाधीश प्रह्लाद निराजी ने कहा, "बड़े महाराज मात्र पुत्रमोह के कारण उन्हें बुरा नहीं कहते थे। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उनके जैसे उग्र स्वभाव वाले व्यक्ति के लिए राज्य सँभालना बहुत कठिन है।" "इसीलिए कहता हूँ जल्दी कीजिए। औरंगजेब जैसा शत्रु दरवाजे पर खड़ा है। आक्रमण होने से पहले राजाराम के हाथों में सारा कार्यभार सौंप दीजिए और निश्चिन्त हो जाइए। इसी में हम सब का कल्याण है।" अण्णाजी ने सुझाव दिया। सभी को शांत करके महारानी कड़े शब्दों में कहने लगीं-"घर की बात को सम्भाजी :: 177