भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

आँख भरकर देख लीजिए।" बादशाह ने उपहास की मुद्रा में बेगम की ओर देखा। वहाँ पर असदखान, उसका बेटा जुल्फिकारखान और बादशाह की बहू शहरबानू बेगम उपस्थित थे। उन सभी को बेगम और शहजादी साहिबा के विचित्र अनुरोध से आश्चर्य हो रहा था। बादशाह ने हँसते हुए कहा, "बेगम साहिबा सीने पर तलवार की नोंक रखने पर भी मेरे सामने कोई काफिर उस देवता का नाम लेने का साहस नहीं करेगा। इस तरह के उस नर्क में आप मुझे ले जाना चाहती हैं?" "गुस्ताखी माफ़ हजरत ! किसी फालतू निरर्थक बात के स्वामी से हम प्रार्थना करें ही कैसे?" "फिर ऐसा वहाँ क्या है?" "वही तो असली चमत्कार है हजरत ! जो व्यक्ति उस नीलकंठ को एक टक निहारता है, उसे धीरे-धीरे उस गुफा में अपने भविष्य का आईना दिखाई देने लगता है। अगले जन्म में हमें क्या होना है? जानवर कि पंछी इसका वहाँ प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है।" बादशाह का मन स्थिर नहीं था। किन्तु बेगम उदयपुरी की बताई कहानी में उसे बहुत मजा आ रहा था। अपनी लाडली शहजादी जीनत का मन भी वह तोड़ नहीं पा रहा था। दूसरे दिन शाही दल बेरूल की ओर निकला। बहू-बेगम, पोते, बच्चे सभी साथ लेकर बादशाह बेरूल के लिए निकल पड़ा। उन्हें ले जाने के लिए सजे-सजाए सत्तर हाथी, कुछ हजार घोड़े और ऊँट साथ जा रहे थे। शाम को लगभग चार बजे शाही दल बेरूल गुफा के पास पहुँचा। ऊँचा कैलाश मन्दिर देखकर बादशाह की भौंहें तन गयीं। वह जुल्फिकारखान से बोला, "बेटेऽऽ सम्भा के साथ इन मरहठों की हड्डी नरम करते ही हम इस कैलाश मन्दिर की जगह पर ही एक खूबसूरत मस्जिद खड़ी करेंगे। इस बात को याद रखना।" आखिर सभी लोग गुफा के पास पहुँचे। नीले रंग के उस पंछी की ओर औरंगजेब आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था। कुछ समय तक उसे कुछ साफ दिखाई नहीं पड़ा। थोड़ी देर में उसे कुछ अस्पष्ट-सा दिखाई पड़ा। वह डर गया। नहीं, उसकी मुखमुद्रा विकृत हो गयी। उसने अपने माथे का पसीना पोंछा। फिर बारीक नजर से देखकर वह चिल्लाया, "पागल कहीं के, चलो, भागो यहाँ से दूर, काफ़िरों के इस कबरिस्ता से।" बादशाह ने अपना एक छोटा-सा चबूतरा बेरूल गुफा के सामने बनाने का हुक्म दिया। वहाँ के देवता, नाचनेवाले यक्ष-किन्नर, पत्थरों में उकेरे गये पशु-पक्षी इन सभी पर बादशाह को बहुत क्रोध आ रहा था। उसने कमाठियों की टोली को 450 :: सम्भाजी

तुरन्त बुलाकर सामने की गुफाओं को नष्ट करने का आदेश दिया। कमाठियों ने अपने हथियार उठा लिए। देवताओं की छोटी-बड़ी मूर्तियों, पत्थरों में उकेरे गये पशु- पंछियों के चित्रों का विध्वंस आरम्भ हो गया। कैलाश मन्दिर के परिसर में पत्थरों पर हाथियों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। अनेक मूर्तियाँ भी थीं। बेलदारों के मजबूत घनों से हाथियों के सिर उड़ाये गये। चारों ओर धूल ही धूल भर गयी। बादशाह जानता था कि उदयपुरी बेगम के अनुरोध पर वह इस नरक में आ पहुँचा था। इसीलिए रुष्ट बादशाह की सान्त्वना के लिए चार मीठी बातें करने की बेगम उदयपुरी का साहस नहीं हो रहा था। फिर भी उन्होंने बादशाह से कहा, "हजरत, आप इसके लिए इतना कष्ट न उठाएँ।" "यह भूतों से भरा हुआ काफिरों का पहाड़ है। इसे तोड़कर नष्ट करो। नहीं टूटता है तो जलाकर खाक कर दो।" "अब्बाजान! आप इतना कष्ट क्यों कर रहे हैं? अपने जुल्फिकार यह सब काम कर लेंगे। आपके शरीर में पहले से ही थोड़ा बुखार है। आप यहाँ से निकलें।" शहजादी ने सुझाव दिया। उदयपुरी बेगम मीठा बोलकर बादशाह को उस पहाड़ से दूर ले गयीं। उस रात बादशाह का पड़ाव बेरूल गाँव के पास पड़ा। अभेद्य चट्टानों से बनी मूर्तियों को तोड़ पाना आसान नहीं था। कारीगरों की अनेक पीढ़ियों ने खून पसीना एक करके इस वैभववान वस्तु को खड़ा किया था। मुगलों के बेलदारों और कमाठी बहुत देर तक प्रहार करते हुए थक गये थे। उनके हाथों से खून बहने लगा। कुछ छोटी-मोटी मूर्तियाँ विकृत अवश्य हुईं। किन्तु भव्य मेहराबें, सभामंडप, मन्दिर आदि अभी भी वैसे ही खड़े थे। जुल्फिकार ने निश्चय किया कि इस पागल बादशाह को समझाया जाय। उसने अपने सैनिकों से घास की गठियाँ और गोबर गाड़ियों में भरकर लाने को कहा। मन्दिर में घास और गोबर भरकर उसमें आग लगा दी गयी। रात में आग की लपटें आसमान छूने लगीं। अनेक मूर्तियाँ प्रहारों से बच गयीं थी। किन्तु दीवारों पर बने अमर चित्रों और उनके रंगों को आग से असीम हानि हो रही थी। बेरूल की गुफा से निकलने वाली आग की लपटों को बादशाह अपने डेरे से देख रहा था। बादशाह का मन अब प्रसन्न हो गया। दो दिन बाद उदयपुरी बेगम ने देखा कि बादशाह का मन प्रसन्न है और बेटी जीनत भी घर में नहीं है तो उसने धीमी आवाज में बादशाह से पूछा- "हजरत, उस दिन बेरूल में गुफा के अन्दर आपने ऐसा क्या देख लिया जो आपको इतना अधिक क्रोध आ गया?" "सुअरऽ" "सुअरऽऽ" ठंडी आवाज में औरंगजेब ने ही बेगम से सवाल पूछना आरम्भ कर दिया- "क्या मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि अगले जन्म में सुअर बन जाऊँ?" बादशाह के उस प्रश्न का बेगम ने कोई उत्तर नहीं दिया। सम्भाजी : 451

सात औरंगजेब के यहाँ गहरा सन्नाटा था। बादशाह ने कासिमखान, रणमस्तखान, पन्नी, खानजहानखान, बक्शी बरामदखान, मुहम्मद अमीन, असदखान, जुल्फिकारखान जैसे अपने खास सरदारों को विचार-विमर्श के लिए बुलाया था। किन्तु सभी लोग अन्दर से बहुत घबराये हुए थे। बादशाह की ऐसी अस्थिर और संशयी मनःस्थिति पहले कभी नहीं देखी गयी थी। दिलेरखान जैसे जिन्दगी भर के बादशाह के सेवक की हालत बुरी हो गयी थी। उसे लड़ाई के मोर्चे से वापस बुला लिया गया था। उसके आगे-पीछे बादशाह की पाँच हजार की सेना लगी थी। उसके हाथ में अभी तक जंजीरें नहीं पड़ी थीं किन्तु वह दिन अब अधिक दूर नहीं था। उसे पूरी तरह अपमानित करके उसे खींचकर वापस लाया जा रहा था। वापसी की यात्रा में पड़ाव की जगहों पर कड़ा पहरा बिठाया जाता है। बादशाह का चेहरा खिन्न था। वह हँसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हँसी आ नहीं रही थी। वह उदास होकर बोला, ‘‘खैर, असदखान डेढ़-दो साल से सम्भा के इस मनहूस मुल्क में इतनी बड़ी सेना लेकर इधर उधर घूम रहे हैं। भेड़ बकरियाँ लेकर घूमने वाले गड़ेरियों की तरह हम भी यहाँ वहाँ भटक रहे हैं। पर बताइए क्या लगा हमारे हाथ? सह्याद्रि की पहाड़ी में उस काफिर के बच्चे सम्भा का हुड़दंग हम एक बार समझ सकते हैं। किन्तु यहाँ अहमदनगर और बराह तक वह हंबीरराव रात-दिन दौड़ रहा है। दस-पन्द्रह हजार की फौज लेकर हमारे प्रदेश को बर्बाद कर रहा है।’’ ‘‘हजरत, वह हंबीरराव पूरा शैतान है। उसके घोड़ों के पैरों में आसमानी बिजली के घुँघरू बँधे हैं। शत्रु ही नहीं हमारे सैनिक भी खुलेआम यही बात कहते हैं।’’ मुमदरखान बीच में ही उठकर बोला। ‘‘बैठ जाओ मूर्ख! यह तो उस काफिर की बदनामी नहीं तारीफ है, बेवकूफ!’’ बादशाह गुर्रया। आज बादशाह का क्रोध देखने लायक हो गया था। असदखान भी डर गया था। उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। औरंगजेब ने जैसे ही अपनी निगाह घुमाई सभी सिर झुकाकर खड़े हो गये। बादशाह ने कहा, ‘‘आखिर मैं भी इन्सान हूँ। आप दख्खन में एक दिन में बहुत बड़ी विजय प्राप्त कर लें ऐसा मैं नहीं करता। मेरा सवाल बस इतना है—जुल्फिकारखान?’’ 452 :: सम्भाजी

“जी मेरे आका।” जुल्फिकारखान ने आदर से घुटने टेक दिये। “सिर्फ इतना ही बता दो कि डेढ़-दो वर्षों में उस सम्भा के चेहरे पर एक भी खरोंच आयी है? क्यूँऽ?” बादशाह के उस प्रश्न से जुल्फिकारखान की ही नहीं, सभी की गर्दन शर्म से नीचे झुक गयी। सभी की आवाज बन्द हो गयी। बादशाह धीरे से उस बैठक से उठा। उसने बड़े रूखे शब्दों में इतना ही कहा, “मैंने अपने लिए फैसला कर लिया है। मैं दिल्ली वापस जा रहा हूँ। आक्रमण की जिम्मेदारी सँभालने के लिए शहजादा मुअज्जम, हमारे बहादुरखान कोकल्ताश साहब, ये वजीरे आजम असदखान और आप सभी हर तरह से काबिल हैं।” औरंगजेब अपने ऊँचे आसन से धीरे-धीरे उतरकर नीचे आया। उसका यह क्रोध हमेशा की तरह नहीं था। आजकल उसकी मनोदशा में अस्थिरता, अपयश, आदि उत्पन्न निराशा का समावेश था। बादशाह का निर्णय अकाट्य था। इसलिए सभी डरे हुए सरदार अपने में सबसे बुजुर्ग और जिम्मेदार असदखान की ओर देखने लगे। बातचीत के दौरान 'तोबाऽऽ, तोबाऽऽ' ' या अल्लाह' जैसे पीड़ाबोधक उद्गार निकलने लगे। असदखान से भी रहा नहीं गया। वह वैसे ही आगे की ओर दौड़ा और औरंगजेब के पैरों पर गिर गया। उसने बादशाह का दुर्बल पीला हाथ अपने हाथ की ओर खींचा। वह जोर-जोर से रोते हुए बोला, “आप रिश्ते नाते में मेरे लड़के लगते हो। लेकिन मेरे आका आपकी शक्ति समुद्र जैसी है। हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हो, किब्लाए आलम?” “नहीं चाचाजान मुझे मत रोको...।” “जहाँपनाह, आप हमारे इस्लाम के रखवाले हैं। हमारे सरताज हैं, जिन्दा पीर हैं। आप हैं इसलिए यह सेना है, यह सल्तनत है। आप वापस चले जा रहे हैं। यह समाचार यदि उस सम्भा को मिला तो आप की अनुपस्थिति में वह हमारी सेना को कुत्ते की मौत मारेगा। हममें से किसी का काफिला दिल्ली-आगरा तक नहीं पहुँचेगा।” असदखान के बाद जुल्फिकारखान, फिर बरामदखान ऐसे एक-एक करके सभी बादशाह के सामने आ गये। वे घुटनों पर बैठकर, आसमान की ओर हाथ फैलाकर बादशाह को मानने लगे। औरंगजेब को विश्वास हुआ कि सरदारों की प्रार्थनाएँ अक्षरशः सत्य हैं। वह मन में प्रसन्न हुआ। फिर मन्दगति से चलता हुआ अपने ऊँचे आसन पर जाकर बैठ गया। फिर भी उसके सीने की आग शान्त नहीं हुई। सभी की ओर निगाह घुमाते हुए बादशाह ने धीमे किन्तु दृढ़ स्वर में कहा, सम्भाजी :: 453

"आप सभी इस्लाम के रखवाले हो। इस कमबख्त दक्षिण देश में हम बदनसीबी से अटके पड़े हैं। गोलकुंडा की कुतुबशाही, बीजापुर की आदिलशाही की शिया मुसलमानों की हुकूमतें काफिरों से कम खतरनाक नहीं हैं। और दोस्तोऽऽ यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि यह सम्भा नाम का एक मामूली जमींदार का नटखट बेटा सालों-साल आपके शाहंशाह को नचाता रहा है? सताता रहा है? तो बोलो—दिल से इस्लामी कौम का काम करोगे?" "जी हुजूरऽऽ! जी आकाऽऽ!" इस प्रस्ताव को चारों ओर से प्रतिसाद मिल रहा था। "अपने शाहंशाह की खातिर अपने इस्लाम की खातिर हम मर मिटेंगे।" "बिलकुल हजरत हम जान की कुर्बानी देंगे।" वहाँ के सभी लोगों पर आलमगीर ने जादू कर दिया था। वहाँ का हर एक सदस्य जरूरत पड़ने पर खाई में कूदने को तैयार था। किन्तु बादशाह को अभी समाधान नहीं मिल रहा था। उसने अपने सिर का मुकुट हाथ में लिया। उस जरीदार टोप की कला अपूर्व थी। उसमें बहुत महँगे हीरे-जवाहरात जड़े थे। बादशाह के उस किरीट की प्रभा इतनी चमकदार थी कि हीरों-जवाहरातों से निकलने वाला प्रकाश उसके चेहरे को भी मंडित कर रहा था। औरंगजेब ने पलभर में उस किरीट को हाथ से ऊपर उठाया और दूसरे ही क्षण जोर से बाईं ओर फेंक दिया। वह किरीट दीवार से टकराकर नीचे गिर गया। उसमें जड़े रत्न और मोती टूटकर बिखर गये। अपने ऊँचे आसन पर औरंगजेब सिर उठाये खड़ा था। उसकी आँखों में झलकता निश्चय, उसकी बँधी मुट्ठियाँ, उसकी फूली हुई छाती, उसके चेहरे की तनी हुई नसें उस पैंसठ वर्ष के शाहंशाह का कुछ और ही रूप प्रकट कर रही थीं। उसके माथे पर लटकते सुनहरे-सफेद बाल और आँखें किसी को भी आकर्षित कर सकते थे। नीचे बिखरे हुए किरीट की ओर उसने संकेत किया। सभी की निगाहें उस ओर मुड़ गयीं। उस समय जैसे किसी महावृक्ष की डाल टूटकर नीचे गिरी हो ऐसे बादशाह गरजा— "इस्लाम के रखवालेऽ दोस्तोऽऽ, यह आलगगीर कसम खाता है कि जब तक हम उस काफिर के बच्चे सम्भा को दक्षिण की इस सीमा से पार नहीं कर देते, उसके टुकड़े टुकड़े करके उसे जिन्दा फाड़ नहीं देते, तब तक यह किरीट यह राजमुकुट मैं अपने सिर पर नहीं पहनूँगा।" 454 :: सम्भाजी

गोवा पर आक्रमण एक जैसे कोई व्यक्ति बीमारी के बाद स्वस्थ होकर पुनः अपने नियमित कार्य पर लग जाये, उसी प्रकार असफलताओं और निराशाओं से बाहर निकलकर औरंगजेब ने भी अपने कार्य को सँभाल लिया। जीवन के पैंसठवें साल में भी औरंगजेब ने नयी आशाओं के साथ फिर से अपने कार्य को आरम्भ किया। उसकी इस अभिनव तत्परता ने सरदारों, शहजादों, पोतों आदि सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। असदखान अपने स्तर पर लोगों को बड़े गर्व से बता रहा था—‘‘आलमगीर के लिए काम काम बस काम, यही एक नित्य की धुन है।’’ किसी बड़ी मुहिम में संलग्न होने पर भी आलमगीर अपनी विस्तृत सल्तनत के हर कोने की खबर रखता था। इन दिनों फौजदार बलोचखान का लड़का अबूमुहम्मद बादशाह के महल में आते जाते दिखाई पड़ता था। तेईस वर्ष के इस लड़के के बादशाह के साथ बढ़ते सम्बन्ध से लोग आश्चर्यचकित थे। उस दिन बादशाह ने जानबूझकर अबूमुहम्मद को अपनी बैठक में बुलाया। यह व्यक्तिगत बैठक थी, जिसमें विशिष्ट सरदार और अधिकारी उपस्थित थे। किसी के मुँह पर उसकी प्रशंसा करना औरंगजेब के स्वभाव में नहीं था। किन्तु उस दिन अबूमुहम्मद की की गयी खुली प्रशंसा से सभी बुजुर्ग चकित थे। अपने शहजादे मुअज्जम की ओर देखते हुए बादशाह प्रसन्न होकर बोला, ‘‘शहजादे, इस छोकरे की कच्ची उम्र को मत देखो, इसकी करामात को देखो।’’ शाहंशाह के संकेत करते ही, अबूमुहम्मद ने काँख में दबाए नक्शे की तहें खोलीं और उसे बैठक के सामने फैला दिया। सम्पूर्ण सह्याद्रि पर्वत का स्पष्ट नक्शा देखकर सभी की आँखें चमक उठीं। बादशाह प्रसन्नता से पूछने लगा, ‘‘बेटे अबू! इन पर्वत श्रृंखलाओं के बारे में सम्भाजी :: 455

इन सब को बताओ।" "जहाँपनाह ! यह सह्याद्रि पर्वत, बेर, बबूल जैसे अनेक काँटेदार वृक्षों के जंगल से भरा है। इसमें बड़ी खतरनाक पहाड़ियाँ और गहरी घाटियाँ हैं।" "कुल मिलाकर कितने रास्ते और कितने घाट हैं?" बादशाह ने प्रश्न किया, "जहाँपनाह, सह्याद्रि के इन कठिन घाटों को पार करने के लिए कुल मिलाकर छोटे-बड़े तीन सौ साठ रास्ते हैं जिनमें पैंसठ रास्ते ऐसे हैं जिनसे हाथी, ऊँट आदि लेकर जाया जा सकता है।" "और बचे हुए दूसरे जंगली रास्ते?" "वे बहुत छोटे और बड़े खतरनाक हैं। वहाँ से गुजरते हुए तो शेर भी डरते हैं।" मुहम्मद पर सभी को आश्चर्य हो रहा था। मुहम्मद के सम्बन्ध में सभी के मन में उठ रहा एक प्रश्न बादशाह के मुँह से बाहर आया, "बेटे इतनी छोटी-छोटी बातों की जानकारी तुमने कैसे हासिल की ?" "हजरत, पहाड़ों और नदियों के साथ घूमना मेरा बचपन का शौक है। यहाँ की पर्वत श्रृंखलाओं को देखने के उद्देश्य से ही छः वर्ष पहले अपने क्षेत्र से मैं यहाँ आया। अनेक साधुओं, फकीरों, बैरागियों की संगति में मैंने यहाँ की पहाड़ियों के चप्पे-चप्पे को छान मारा। अपने इसी अनुभव से मैंने यह नक्शा बनाया जिससे भविष्य में मेरे जैसे यात्रियों के काम आये।" औरंगजेब ने अपने पास के कच्चे नक्शे बाहर निकाले। उनका सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण किया। अबूमुहम्मद के नक्शे के कुछ स्थलों पर उसने उँगली रखी। औरंगजेब के इस सूक्ष्म अध्ययन से अबूमुहम्मद भी चकित हुआ। बादशाह ने अबूमुहम्मद को मुल्यवान वस्त्र और हीरे जवाहरात देकर सम्मानित किया। बादशाह ने उसी समय वजीर से कहा, "इसी दिशा से अपना पूरा जोर लगाओ। सह्याद्रि की इन ऊँची पहाड़ियों और गुफाओं में की जानकारी प्राप्त करो। इस इलाके के रहने वाले लोगों को ढूँढ़ो। इन पहाड़ियों पर झटपट चढ़ जाने वाले लोगों को अपनी फौज में भर्ती करो, उन्हें मुँह माँगी तनख्वाह दो।" सम्भाजी की चुनौतियों का करारा जवाब देने और अन्ततः बेड़ियों में जकड़ने का आलमगीर ने निश्चय कर दिया था। नित्य की भाँति रत्नजड़ित मुकुट आज उसके सर पर नहीं था। मुकुटहीन उसका नंगा सिर भौंड़ा और कलाहीन लग रहा था ऐसा लगता था कि अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का उसने पक्का निश्चय कर लिया है। औरंगजेब ने अपने सरदारों से कहा, "जुल्फिकार, वह संभा अपनी फौज के साथ गोवा की ओर बढ़ रहा है। फिरंगियों को पराजित करने का उसका पक्का इरादा है। ऐसी खबर मुझे मिली है।" 456 :: सम्भाजी

"उस बन्दे को गलतफहमी तो नहीं हो गयी है कि फिरंगियों की अव्वल दर्जे की तोपों का वह मुकाबला कर लेगा।" असदखान ने हँसकर कहा। वजीर की इस प्रतिक्रिया पर सभी सरदार हँस पड़े, किन्तु बादशाह कुछ अधिक गम्भीर हो गया। ऐसा लगा कि उसे शत्रु की हिम्मत और शक्ति का ठीक- ठीक अन्दाजा था। इसीलिए उसने अपनी अनेक रातें चिन्ता में जागकर बितायीं। उसने एक जोखिम भरी योजना बनाई। इस योजना की रूपरेखा अपने सहयोगियों के सामने स्पष्ट करते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा ने फिरंगियों से सम्बन्ध बिगाड़ लिया है। उसका एक पाँव फिरंगियों के जबड़े में फँस गया है। ऐसे में हम दूसरी ओर हमला करेंगे। हमारा एक गाजी चालीस-पचास हजार की फौज लेकर निकलेगा। कोल्हापुर, बेलगाँव की ओर से रामदरिया घाट पार करेगा और दक्षिण कोंकण पर हमला बोल देगा।" "लेकिन हुजूर ?" असदखान अपना आधा ही मुँह खोल पाया था। "हाँ बोलो वजीरे ?" "इतनी बड़ी फौज के खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी ? उन्हें रसद कौन पहुँचाएगा ?" "वाह असदखान, आपकी यह चिन्ता शाहंशाह के वजीर के लिए उचित ही है। मगर इसका भी इन्तजाम हमने कर लिया है। हमारा सूरत का सूबेदार रसद से भरी जहाजों को गुजरात के किनारे से भेजेगा। ये जहाजें अरब सागर से मुम्बई, जंजीरा, राजापुर होते हुए पणजी की ओर बढ़ेंगी।" "लेकिन जहाँपनाह, समुद्रतट पर शिवाजी और सम्भाजी द्वारा बनाए गये अनेक जलदुर्ग और नौसेना की चौकियाँ हैं।" "उनकी नौसेना का मुकाबला करने की शक्ति हमारी नौसेना में निश्चित रूप से है। इसके अतिरिक्त हमारी मदद करने के सिवा फिरंगियों के पास भी कोई दूसरा उपाय नहीं है।" बादशाह की इस योजना को सुनकर अनुभवी और बुजुर्ग सरदारों ने अपनी गर्दनें हिलाईं। किन्तु जुल्फिकार लम्बी साँसें छोड़ने लगा। बादशाह ने उसकी सशंक आँखों को देखा। "बोलो जुल्फिकार तुम्हारा शक क्या है?" "जहाँपनाह आपका मनोबल बुलन्द है। पर रामदरिया गोवा की ओर से हमारी इतनी बड़ी फौज घुसेगी तो सम्भा वहाँ से भागकर सीधा अपने रायगढ़ के पहाड़ी गर्भगृह में जा घुसेगा, उसका क्या करना ?" बादशाह मुस्कराया फिर नक्शे पर उँगली दिखाते हुए कहने लगा, "उसी समय दूसरा गाजी दूसरी फौज लेकर कल्याण और पनवेल से होता हुआ रागयगढ़ सम्भाजी :. 457

की ओर बढ़ेगा। दोनों फौजें यहाँ पहाड़ और निजामपुर के पास मिलेंगी। दोनों फौजें अपनी पूरी ताकत से काफिरों की इस पत्थर की राजधानी को बारूद लगाकर सिंहासन के साथ नीचे पटक देंगी।" बादशाह के मायाजाल के उस विलक्षण फैलाव को देखकर सभी सरदार अवाक् थे। सभी बादशाह की प्रशंसा करने लगे। तब बादशाह ने कहा, "इतने से खुश न हो जाइए। अपनी-अपनी जिम्मेदारी पर ध्यान दीजिए। ये दोनों फौजें वक्त पर एक साथ मिल पायीं तभी यह योजना कामयाब होगी। नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा।" सरदार और अधिकारी के दृढ़ चेहरे की ओर गम्भीरता से सभी देखने लगे। उसी समय बादशाह ने कहा, "एक बार यदि दोनों फौजें एक जगह पर मिल गयीं तो मैं एक दूसरी चाल चलूँगा। ये देखो कोंकण में नीचे उतरने वाले घाट। यह बोरघाट, यह कावल घाट, यह वरंदघाट दूसरी ओर का यह अंवाघाट। यदि वक्त पर दोनों फौजें इकट्ठा हो गयीं तो मैं इन घाटों से दस-दस हजार फौजों की टुकड़ियाँ और भी नीचे उतारूँगा। ये फौजें पूरे कोंकण को अंगारे पर पड़ी मछली की तरह भून डालेंगी। किन्तु यदि समय का तालमेल नहीं बैठा तो हमारी फौजें सह्याद्रि की इन घाटियों में डूब जाएँगी। पूछो क्यों?" "क्यों जहाँपनाह ? "हमारी ताकत के जरा भी कमज़ोर होने का अन्दाजा होते ही इन वनों और जंगलों के लोग, लाड़ियों और कुल्हाड़ियों के साथ बाहर निकल पड़ेंगे। बीच रास्ते में फँसाकर हमारे लोगों को पीटेंगे। औरतें और बच्चे भी आगे पीछे नहीं देखेंगे। क्योंकि यह सारा मुल्क शिवा और सम्भा के साथ दिलोजान से मुहब्बत करता है।" बादशाह को आगे के सभी फैसले शीघ्र लेने थे। दक्षिण कोंकण के सैन्यदल का नेतृत्व किसे सौंपना है? इस सम्बन्ध में बादशाह ने सभी से परामर्श किया। सभी ने बड़े शहजादे मुअज्जम का नाम सुझाया। मुअज्जम ऊँचा, बलिष्ठ, मर्दाना आकर्षण और लुभावनी आवाज वाला व्यक्ति था। सभी लोग उसे एक कुशल, बुद्धिमान, वफादार आदर्श शहजादा के रूप में देखते थे। वह अभी पैंतीस वर्ष का था। मुअज्जम के नाम पर सर्वसम्मति से बादशाह एक क्षण के लिए चकित हुआ। मुअज्जम के साथ और किस-किस को भेजा जाय? इसका निर्णय भी उसी बैठक में लिया गया। इखलासखान, लतीफशाह दखनी, तोपखाने का दरोगा आतिश खान, इस प्रकार बादशाह ने एक-एक नाम लिया। इसके बाद सभी सरदार अभिवादन करते हुए एक-एक करके खड़े हो गये। इसके बाद औरंगजेब ने नेक मराठा नागोजी 458 :: सम्भाजी

माने म्हसवड़कर का नाम लिया। नाम लेते ही छः फुट ऊँचा, हट्टा-कट्टा नागोजी उठकर खड़ा हो गया। नागोजी की ओर संकेत करते हुए औरंगजेब ने गर्व से कहा, "बेटे मुअज्जम, एक बात का ध्यान हमेशा रखना। महाराष्ट्र में कुछ ऐसे नेक, कुलीन और प्रामाणिक मराठा वंश हैं जो चाहे आदिलशाही हो या निजामशाही हो अथवा हम मुगल, ये लोग वफादार रहे हैं। इन्होंने शिवा-सम्भा या विद्रोही जमींदारों को कभी अपना राजा माना ही नहीं। इन्हीं में से एक है नागोजी। भविष्य में भी यह ईमानदार आदमी बादशाह की नमकहलाली करेगा।" बादशाह ने प्रश्न किया कि कल्याण और पनवेल का सेनानायक कौन नियुक्त किया जाए? इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए जुल्फिकार स्वयं उठकर खड़ा हो गया। परन्तु उसके घमंड के घोड़े को लगाम लगाते हुए बादशाह ने कहा, "जुल्फिकार बेटा, तुम उम्र में कम और रिश्ते में मेरे मौसेरे भाई हो। मैं तुम्हें निराश नहीं करना चाहता। पर मुझे वहाँ केवल साहसी योद्धा नहीं बल्कि कोई कूटनीतिज्ञ चाहिए। उस ओर दुश्मनों का सिर और मन्दिरों का कलश गिराने वाला इस्लाम का कोई वफादार बन्दा मुझे चाहिए। इसलिए मैं पूरी तरह सोच विचारकर शहाबुद्दीन उर्फ गाजिउद्दीन फिरोजजंग को वहाँ के लिए चुन रहा हूँ।" उत्तरी कमान का सूत्र सौंपने के लिए शहाबुद्दीन को तुरन्त सन्देशा भेजा गया। जुन्नर में ताल ठोंक कर जमे हुए शहाबुद्दीन को बादशाह ने सूचित किया। आप तुरन्त नाणे घाट से नीचे उतरें। वहाँ से उत्तरी कोंकण को जलाते हुए आगे बढ़ें। मुअज्जम और आप दोनों को सम्भा को फँसाकर पकड़ना है बहुत सावधानी से काम लें। सम्भा बहती हुई हवा है। इसके बाद उसका हाथ में आना मुश्किल है।" रामदरा और गोंवा की ओर से मराठों को नेस्तनाबूद करने के लिए मुअज्जम उर्फ शाहआलम निकला था। जोर शोर से तैयारी हो रही थी। रेवदंड और चोल में सम्भाजी की सफलता की सूचनाएँ मिलीं। उसी रात बादशाह ने मुअज्जम को अपने पास बुलाया। उसे एक सूचना सिर्फ मुअज्जम को देनी थी। बादशाह ने कहा, "वह काफिर का बच्चा सम्भा आजकल मेरे साथ खिलवाड़ कर रहा है। उसने हमारे शहजादे अकबर को गुप्तरूप से बाँधा की ओर भेज दिया है। इसमें कुछ दाल में काला नजर आ रहा है। जब तुम रामघाट से नीचे उतरो, उसी समय बाँधा पर हमला कर दो। उस मूर्ख शहजादे को बन्दी बनाओ। दूसरे ही दिन सवेरे औरंगजेब ने अपने निजी सेवकों को बादशाही सामान इकट्ठा करने का आदेश दिया। उसने असदखान से कहा, "अब बहुत समय तक औरंगाबाद में डेरा डाले रहने से नहीं चलेगा। मुझे दुश्मनों के और मैदानेजंग के करीब जाना चाहिए। कुछ समय के लिए अब हमारा डेरा अहमदनगर में होगा।" सम्भाजी :: 459

"जहाँपनाह इतनी जल्दी?" "वजीरे-आजम दोस्त हो या दुश्मन, एक बात तो सच है कि शिवाजी के इस लड़के ने मुझे बुढ़ापे में भी जवान बना दिया है।" दो राजापुर की खाड़ी में हवा तेजी से चल रही थी। तम्बू की कनातें हिल रही थीं। न जाने क्यों शंभूराजा को नींद नहीं आ रही थी। खंडो बल्लाल तीन दिन पहले ही वहाँ आ चुके थे। राजा ने उन्हें बुलवाया। खंडोजी के तम्बू में आते ही राजा का ध्यान उनकी लम्बी नाक और तेजस्वी आँखों पर गया। कुछ क्षण के लिए उन्हें बालाजी चिटणीस के ही आ जाने का आभास हुआ। राजा ने खंडोजी को सामने बैठने का आदेश दिया। कुछ देर विचार-विमर्श करने के बाद शंभूराजा ने कहा, "खंडोबा आप हमारे राज्य के सचिव हैं। आजकल तारापुर, थाना, चोल, रेवदंडा जैसी अनेक जगहों पर समुद्रतट में युद्ध छिड़ा है। एक ही समय में कहाँ और कितनी सेना भेजनी है? इसका विचार आपको करना है। ऐसे समय में आपका रायगढ़ पर रहना अति आवश्यक है।" "परन्तु महाराज।" "अकेली महारानी के कन्धों पर कितनी जिम्मेदारी देंगे? कविराज यदि वहाँ होते तो हमें वहाँ की इतनी चिन्ता न होती। मुझे लगता है कि शीघ्रातिशीघ्र वहाँ के लिए प्रस्थान करें।" खंडो बल्लाल वैसे सिर नीचा किये बैठे रहे। उनकी निरुत्साही प्रतिक्रिया से शम्भू महाराज भी कुछ विचलित हो गये थे। यह देखकर खंडो बल्लाल ने कहा, "यहाँ मैं अपने मन से थोड़े ही आया हूँ? महारानी साहिबा ने मुझे आने के लिए विवश किया।" "क्या मतलब?" "उनके विचार से आजकल आपकी ग्रह स्थिति कुछ ठीक नहीं है। इसलिए आपके साथ पराछाईं बनकर रहने के लिए कहा गया है।" अपनी प्रिय रानी की स्मृति से शम्भूराजा का मन प्रसन्न हो गया। शंभूराजा की प्रसन्न मुद्रा देखकर खंडो बल्लाल की जान में जान आयी। उन्होंने कहा, "महाराज यहाँ रुकने में मेरा भी कुछ स्वार्थ है।" 460 :: सम्भाजी

शंभूमहाराज की आँखें चमक उठीं। उन्होंने खंडोजी की ओर आश्चर्य से देखा। कुछ गद्दारों के कारण बालाजी चिटणीस की मौत, औंदा गाँव की वह बंजर भूमि, सेना की भूलें आदि स्मरण करके शंभूमहाराज का मन भारी हो गया। वे कम्पित स्वर में बोले—"खंडोजी बालाजी काका के दुखद अन्त के बाद चिटणीस का पद मैंने आपको प्रदान किया। हमारी महारानी ने आपको और निलोगा को अपना बेटा मानकर गोद में खेलाया, परन्तु—" शंभूमहाराज बोलते-बोलते रुक गये, उनकी जबान भारी हो गयी, आँखों के गर्म आँसुओं को उन्होंने बड़ी सावधानी से पोंछ लिया। शंभूमहाराज ने पुनः कहा, "औढ़ा शब्द के स्मरण होते ही मेरे कलेजे मे कुल्हाड़ियों के पाव की पीड़ा होती है। खंडोबा वह कोई षड्यन्त्र नहीं केवल एक दुर्घटना थी जिसमें बालाजी काका का अन्त हुआ। मनुष्य के जीवन में ऐसे भी प्रसंग आते हैं जब वस्तुस्थिति से हम अलग हो जाते हैं। एक ओर गद्दारों के कारण काकाजी का गिरफ्तार हो जाना दूसरी ओर दुर्भाग्य मे उनके महत्त्वपूर्ण पत्र हमारे पास तक न पहुँच पाना, कारण बन गया। खंडोजी हम अपराधी हैं। चिटणीस ही हत्या का पाप हमसे ही हुआ।" "महाराज, इसमें किसी का भी दोष नहीं है। हमारा समय ही बुरा था। यह हमारा ही दुर्भाग्य था।" उन्होंने आगे कहा, "महाराज जो भी हुआ उसे भूल जाइये। आपने हमारे लिए क्या नहीं किया? चिटणीस बनाकर अपनी गोद में संभाला - " "खंडोजी कभी कभी लगता है कि बालाजी की मृत्यु के हम ही कारण हैं इस पाप का शमन करने के लिए, आक्रमण पर निकलने से पहले मैंने रायगढ़ के किलेदार को आदेश दिया है—" "जहाँ हमारे बालाजी का अन्त हुआ है, औढ़ा की उस बंजरभूमि पर शिवालय के निर्माण का तो नहीं?" "हाँ, वहाँ के शिवलिंग पर गिरने वाली शीतल जलधारा ही हमारी और बालाजी काका के लिए अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि होगी।" खंडो बल्लाल ने उठकर शंभूमहाराज के चरण पकड़े और बोले, "महाराज राजसेवा करते समय इस प्रकार अनेक सैनिक शहीद होते हैं। पर उनकी याद किसी को नहीं आती। आपने हमारे बालाजी को इतनी अच्छी तरह अपनी स्मृति में रखा है। उनकी स्मृति को अपने हृदय में स्थान दिया है। आपका विशाल हृदय और वात्सल्य भाव देखकर मैं गद्गद हो गया हूँ। शंभूमहाराज ने उच्छ्वास लेते हुए कहा, "खंडोबा, उस ईश्वर की महिमा अपार है। पता नहीं मनुष्य क्यों मनुष्य के प्रेम में फँस जाता है ? ईश्वर और नियति का वह खेल सर्वथा अबूझ है।" ऐसा कहते समय महाराज की आँखों के सामने अहमदनगर किले की तटबन्दी दिख रही थी। तटबन्दी के पीछे तीन वर्ष से कैदी के संभाजी :: 461

जीवन बिता रही दुर्गा देवी और रानू दीदी की मूर्ति उनकी आँखों के सामने नाचने लगी। साथ ही पैरों में घुँघरू बाँधे छोटी-सी गुड़िया भी आँखों के सामने नाचने लगी। उसी प्रवाह में शम्भूमहाराज कहने लगे, "आज भी हमें अनुभव नहीं होता कि चिटणीस काका हमारे बीच नहीं हैं। खंडोबा, कोंडाजी के बलिदान के बाद का एक प्रसंग आपको बताता हूँ। जंजीरा के सामने वाली खाड़ी के किनारे हम प्रातःकाल घूम रहे थे। उस सुबह वहाँ एकदम सुनसान था। उसी समय एक मध्यम कद, पैंसठ वर्ष का, एक सुन्दर तेजस्वी व्यक्ति दिखाई पड़ा। एकदम चिटणीस काका जैसा। हम उन्हें पुकारते हुए, पानी की लहरों से भींगती हुई काली चट्टान पर बैठ गये। फिर वहाँ कोई नहीं दिखाई पड़ा। एक ओर समुद्र की लहरों का शोर और दूसरी ओर राजापुर का पड़ाव। कहाँ चला गया होगा वह व्यक्ति? समुद्र में या पहाड़ियों में?" "वह कभी-कभी केवल आभास होता है।" "नहीं खंडोजी, इन आभासों में भी सत्य का बड़ा अंश छुपा होता है। हमें लगता है कि बालाजी काका का बचपन जंजीरा के किले में ही बीता। कहीं यह छायामूर्ति यह तो नहीं कह रही है कि यदि मैं होता तो अवश्य ही मदद करता।" बहुत समय से बातें चल रहीं थी। सवेरे जल्दी उठकर जाना था। तम्बू के मुख्य द्वार पर ईमानदार रायप्पा बैठा हुआ था। उसने कुछ बेचैन होते हुए पूछा- "राजाजी कब तक जागते रहोगे? कुछ विश्राम भी कर लीजिये।" वह साहस बटोरकर बोला। खंडोजी को आदेश देते हुए महाराज ने कहा, "खंडोजी कब निकल रहे हैं रायगढ़ की ओर?" खंडो बल्लाल ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज आपके साथ जंजीरा का मुकाबला करना बाबाजी के नसीब में नहीं था। कम से कम मुझे तो गोवा के आक्रमण के लिए अपने साथ आने दें।" तीन अब अधिक समय नष्ट करने से क्या लाभ, राजन? यह वाइसराय केवल चालाक और धूर्त ही नहीं, बहुत बड़ा कपटी और गद्दार भी है अब रुकिए नहीं। किसी भी 462 :: सम्भाजी

तरह से उस फिरंगी को युद्ध में उतारना पड़ेगा।" दुर्गादास राठौर ने आग्रहपूर्वक कहा। राजापुर के पास की पहाड़ियों के समीप शम्भूमहाराज का तम्बू खड़ा किया गया है। तम्बू में महत्त्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श चल रहा था। शम्भूमहाराज के सामने कवि कलश, दुर्गादास राठौर, शहजादा अकबर, सरदार येसाजी कंक बैठे थे। तम्बू के नीचे एक ढलान की बगल में राजापुर की खाड़ी थी। यहाँ पर पानी और हवा के साथ लहराने वाले नारियल और सुपारी के पेड़ थे। शम्भूमहाराज, सत्तर वर्ष की आयु को पहुँच रहे येसाजी कंक की ओर एकटक देख रहे थे। येसाजी बाबा के सिर पर बहारदार पगड़ी, शरीर पर जरीदार ढीला अँगरखा, कमर में लिपटा शुभ्र जामा सुशोभित थे। ऐसी वेशभूषा में उनकी वृद्ध छवि और भी खिल उठी थी। उनकी बगल में एक आकर्षक और तेजस्वी युवक बैठा था। लगभग पचीस वर्ष का वह युवक कृष्णाजी, येसाजी कंक का पुत्र था। शम्भूमहाराज ने कहा, "येसाजी आप हमारी थल सेना के सेनापति हैं। इस बार हम आप पर एक बड़ी जोखिमभरी जिम्मेदारी सौंप रहे हैं।" महाराज यदि आप आग में कूदने को कहें तो भी यह बूढ़ा किसी बात का विचार नहीं करेगा। महाराज अभी कल कोंडाजी जैसा वीर आपके लिए जलकर खाक हो गया। आज यह शिवाजी का येसाजी आपके लिए जलकर खाक होने के लिए तैयार है। गोवा पर आक्रमण करने की चर्चा होने लगी। वहाँ के बन्दरगाह वहाँ की खाड़ियाँ, फिरंगियों के किले, उनकी चर्चें, संरक्षण करने वाली फिरंगी सेनाएँ, पणजी का गोलाकार गुम्बद, सशक्त प्रवेश द्वार आदि सभी बातों पर विस्तार से चर्चा हुई। कांट दी आल्होर नामक फिरंगी से शम्भूमहाराज बहुत दुखी थे। उन्होंने कहा, "यह फिरंगी स्वार्थी, धोखेबाज और कमाल का नाटक करने वाला है। एक ओर तो यह पुत्ररत्न प्राप्ति के उपलक्ष्य में हमें बधाई का सन्देश भेजता है, बच्चे के लिए हीरे-जवाहिर और मणि-माणिक्य का उपहार तो दूसरी ओर यह जानकर कि नारवातीर्थ में हम बहुत कम सैनिकों के साथ आ रहे हैं, हमें जिन्दा पकड़कर बादशाह को सौंपने की योजना बनाता है अब बताइए इसका क्या किया जाए?" "आक्रमण, गोवा पर आक्रमण, और दूसरा क्या?" येसाजी कंक ने गरजकर कहा। "कल यदि औरंगजेब की फौज गोवा में आयी तो ये फिरंगी मेंढक की तरह कूदकर पहले उधर ही जाएँगे। ये चोर हमारे साथ मैत्री का जितनी भी दिखावा करें हम इनकी असलियत जानते हैं। हमें पता है कि पुर्तगालियों ने बादशाह के साथ एक अत्यन्त गुप्त लिखित समझौता किया है।" राजा ने सभी को बता दिया। सम्भाजी :: 463

"क्या कह रहे हैं महाराज?" सभी ने आश्चर्य से पूछा। "कविराज, कहाँ है वह कागज ?" कवि कलश ने एक कागज प्रस्तुत किया। गुप्तचरों नें पुर्तगालियों और बादशाह के गुप्त समझौते की प्रतिलिपि तैयार कर ली थी। उसके अनुसार मराठों के कोंकण का जो भाग पुर्तगाली और मुगल सेना द्वारा जीता जाएगा, वह सब पुर्तगालियों को दे दिया जाएगा। उसके बदले में पुर्तगाली पणजी के समीप बादशाह को नौसेना का अड्डा बनाने की अनुमति देंगे। वाइसराय की सारी पोल खुल गयी थी। शंभूमहाराज ने दृढ़तापूर्वक कहा, "यह साला औरंगजेब से जाकर मिले उससे पहले ही उसे लंजुपुंज कर देना चाहिए।" "फिर देर किस बात की? चलें गोवा पर हमला करें।" राजा के सभी सहयोगियों ने एक साथ उद्घोष किया। ऐसा लग रहा था कि उस बैठक में ही युद्ध के नगाड़े बज रहे हों। अत्यन्त तनावपूर्ण मनःस्थिति में महाराज ने कहा, "फिरंगियों द्वारा की गयी पणजी की तटबन्दी, आगे चलने वाली उनकी तोपें, फौजों का कुशल संचालन, उच्चकोटि का बारूद और समुद्र में मुक्त रूप से घूमने वाली उनकी नौकाओं आदि का विचार करने से उन पर सीधा आक्रमण हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। पर देखेंगे, कोई-न-कोई रास्ता अवश्य निकलेगा।" उसी रात महाराज ने मुबई के अंग्रेजों को सन्देश भेजा। दक्षिण की ओर जिंजी में उन्हें व्यापार की अनुमति चाहिए थी। इस माँग को लेकर अँग्रेजों ने रायगढ़ की अनेक यात्रायें की थीं। महाराज ने कहा, "कविराज ! जिंजी के पास वाले क्षेत्र में व्यापार की अनुमति उन्हें तुरन्त दे दी जाय। एक ही समय में सभी से लड़ाई मोल लेना हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।" रात में कवि कलश, खंडो बल्लाल और येसाजी कंक राजापुर की खाड़ी के किनारे टहल रहे थे। खाड़ी के भीतर टूटने वाली लहरों की प्रतिध्वनि सीधे कानों से टकरा रही थी। शंभूराजा ने अपने मन की शंका को व्यक्त करते हुए कहा, "येसाजी काका गोवा में फिरंगियों को स्थापित हुए सौ वर्ष बीत चुके हैं। इस तथ्य को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता कि उनके पास तोपें और लड़ाकू जहाजें बड़ी मात्रा में हैं। समुद्र के पानी पर हमारे घोड़ों के पाँव कैसे चल पाएँगे?" बात करते-करते शंभूमहाराज के पैर तट की बालू में धँस गये। वे रुके और प्रसन्न होकर पूछा, "येसाजी, कविराज खंडोजी, कोई योजना बनाकर उस फिरंगी को ही अपने घोड़ों की टापों के पास खींच लिया जाये तो?" 464 :: सम्भाजी

चार पणजी बन्दरगाह के शराबखाने मे लोगों की भीड़ थी। किनारे पर लंगर डाले हुए अनेक जहाजों के नाविक, देश-विदेश के मुसाफिर, व्यापारी, चोर-उचक्के जैसे हर प्रकार के लोगों की भीड़ होती थी। दो-तीन दिनों से कुछ अपरिचित लोग वहाँ आते-जाते दिखाई पड़ते थे। उनकी वेशभूषा से उन्हें ठीक-ठीक पहचानना असम्भव था। यदि उन्हें नीली आँखों वाले कोंकणी लोगों के रूप में जाना जाये तो उनकी लम्बी, काली, नुकीली दाढ़ी अफगानियों की थी। गोरे रंग के कारण उन्हें फिरंगी समझा जा सकता था किन्तु उनकी रहन-सहन और दबी जबान में बातचीत विचित्र थी। मदिरा का प्याला खाली करते हुए वे एक-दूसरे से कह रहे थे-‘‘संभा ने फोंडा के किले पर चार-पाँच करोड़ का खजाना लाकर रखा है। बारूद का बड़ा भंडार भी रखा है कुछ दिनों में उसकी फौज भी वहाँ आनेवाली है। दो-तीन दिनों में ही इस गुप्तचर्चा के असंख्य पैर उग आये। फिरंगियों के गुप्तचर खबरों को एकत्र करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर सदैव बने रहते थे। उन्होंने यह खबर तत्काल कांट-द-आल्होर तक पहुँचा दी। जिन दो गुप्तचरों ने वाइसराय तक यह खबर पहुँचाई थी उनकी सूचना कभी गलत नहीं हुई थी। वाइसराय कहने लगा-‘‘शिवाजी के इस छोकरे को पहले से ही गोवा में बड़ी रुचि है। कुछ दिन पहले वह अंजदीव टापू पर चूना-पत्थर लेकर आया था। वहाँ पर वह किला बनाना चाहता था।’’ वाइसराय ने बड़ी सावधानी से जासूसों के एक दूसरे गुट से उस खबर की निगरानी की। कांट द आल्होर ने फोंडा के किले की ओर भी कुछ गुप्तचर भेज दिये। उन्हें खबर मिली की फोंडा किले की मराठा सेना बहुत कम और कमजोर है। किन्तु यह भी पता चला कि वहाँ कुछ विशेष बात है। ऐसी खबर मिलते ही कांट अपनी विजय की कल्पना करके नाचने लगा। दो महीना पहले नारवा नदी से बच निकला था। अब देखता हूँ। वाइसराय अपने आपसे बोल रहा था। उसे यह भी खबर मिल गयी थी कि शीघ्र ही औरंगजेब की सेना इधर आ रही है। उसके आने के पहले ही किला जीतकर खजाना लूट लिया जाएगा। अपनी विजय की कल्पना करके वह थैया-थैया करके नाचने लगा। वाइसराय ने अपने सहयोगियों के साथ विचार विमर्श किया। कांट को सहायता के लिए गोवा के अनेक पादरी, कैप्टन दिओगो, आदि आ गये। अन्ततः वाइसराय ने तीन हजार थल सेना जमा की। उसमें दो हजार साष्टी महल के सम्भाजी :: 465

कन्नड़भाषी सैनिक थे। अक्तूबर 1683 के अन्त में एक सुहानी सुबह यह सेना पणजी से बाहर निकलने लगी। इस सेना का नेतृत्व वाइसराय स्वयं कर रहा था। दूर तक मार करने वाली बड़ी-बड़ी तोपों को खींचते-खींचते बैल व्याकुल हो रहे थे। हाथों में बन्दूक और तलवार संभाले सैनिक एक-दो, एक-दो के कदमताल से आगे बढ़ रहे थे। फ़ौज प्रातःकाल ही पांडवी नदी की सहायक एक छोटी नदी के किनारे पहुँच गयी। पैर के नीचे की भुसभुसी मिट्टी में सैनिकों के जूते धँसने लगे। बहुत वर्षों बाद गोवा के भूमि पर एक बड़ा युद्ध होने जा रहा था। इसलिए आसपास की चर्चों पर, पेड़ों पर, पहाड़ियों पर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गयी थी। जैसे-जैसे दुर्भाट बन्दरगाह समीप आ रहा था, वाइसराय के सहयोगी भयभीत होने लगे। वाइसराय का सचिव चिन्ताग्रस्त स्वर में बोला- "सर, दुर्भाट बन्दर छोड़ दिया जाय तो अच्छा होगा।" "क्यों?" "वहाँ पर मराठों का वीर सूबेदार दुलबा नाइक अपनी फौज के साथ हमेशा के लिए ताल ठोंककर बैठा है।" "चलो तो सही !" वाइसराय ने सोत्साह कहा। दुर्भाट बन्दर के पास फौज पहुँची तो सभी दर्शकों ने अपनी साँस रोक ली। सभी इस अनुमान से आँखें फाड़कर देखने लगे कि अभी दोनों फौजों में घमासान युद्ध होगा। दुलबा नंगी तलवार लेकर आने की जगह मेले में किसी बालक की तरह अपनी पगड़ी उछालते और नाचते हुए आया। उसने वाइसराय को आलिंगन दिया। वाइसराय ने ममता से उसके गाल नोंच लिए। दुलबा फिरंगियों से मिला हुआ था। इसलिए फोंडा की तटबन्दी आसानी से भेदकर उस पर क़ब्ज़ा कर लेंगे, ऐसे विश्वास से वाइसराय अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहा था। दिन में हम कहाँ और किसलिए जा रहे हैं, इसका उसने किसी को पता ही नहीं चलने दिया। रात को सेना फोंडा किले के पास पहुँची। वहाँ ठंडी हवा ने किले के भीतर मराठों और बाहर फिरंगी सेना को परेशान कर दिया था। आधी रात तक फिरंगियों की बन्दूकों से कोई गोली दागी नहीं गयी थी। किन्तु इसी समय आकाश से बादल बरसने लगे। जैसे उछलते घोड़े दौड़ते हुए सामने आ रहे हो वैसे ही गर्जन- तर्जन के साथ बरसात ने जोर पकड़ा। उसने पेड़-पत्तों के साथ खड़ी फिरंगी सेना को खूब पीटा। एक बार किले के पास तक पहुँचकर पीछे मुड़ना भी अच्छा नहीं था वर्षा में वाइसराय के वस्त्र भीग गये। अपने ऊपर छाता ताने खड़े नौकर को भी उसने भगा दिया। तेज बारिश और अन्धकार का फायदा उठाने की बात वाइसराय ने सोची। रात में ही उसने तीन बड़ी तोपों को किले की सामने वाली पहाड़ी पर खड़ा कर दिया। चढ़ाई चढ़ते समय बैलों के पैर कीचड़ में धँसने के 466 :: सम्भाजी

कारण बैल गिरने लगे। कुछ बैलों के पैर टूट गये। तोपों को खींचने वाले सैनिक बेहाल हो गये। किन्तु वाइसराय ने किसी बात की चिन्ता नहीं की। कांट ने सही जगह पर तोपों को खड़ा कर दिया। वह जगह ऐसी थी जहाँ से किले पर सीधा निशाना साधा जा सकता था। वाइसराय ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "मराठे नींद में बेसुध दीखते हैं। चलों उन्हें वहीं पर गाड़ देंगे।" आधी रात को ही फिरंगियों की तोपों से धड़ाम धूम, धड़ाम-धूम करके बड़े-बड़े गोले किले पर बरसने लगे। फिरंगी सेना उत्सव मनाने लगी। कुछ ही क्षणों में सामने की दीवार थरथराने लगी। थोड़ी देर में ऊपर के बुर्ज से मराठे भी धामऽऽ धामऽऽ" धुड़म धामऽऽ प्रत्युत्तर देने लगे। तोपों से तोपों और गोलियों से गोलियों की भिड़न्त शुरू हो गयी। बरसात के पानी के साथ साथ ही आग का भी खेल आरम्भ हुआ। तोपों से निकलने वाली आग, चिनगारियों से सजकर लाल मिट्टी पर गिर रही थी। उन गिरने वाली बूँदों की शोभा निराली थी। किन्तु दूसरी रात मराठों के लिए इतनी भाग्यशाली नहीं थी। फिरंगियों की तोपों के धमाके बहुत जहरीले थे। उन्होंने मराठों की तोपों को व्यर्थ कर दिया। एक दुखद घटना यह घटी कि गढ़ी का ऊपरी हिस्सा बारिश में भीगकर गिर गया। एक तोप भी अपनी जगह से लुढ़क गयी। किसी चट्टान की तरह वह तोप लुढ़कते हुए नीचे गिर गयी। किले के ऊपर बनी मजबूत गढ़ी भी गिर गयी। फिरंगियों में उत्साह का माहौल हो गया। तटबन्दी की दीवार टूटने पर भी कोई मराठा पीछे नहीं हटा। वाइसराय निराश हुआ। पिछले दिन से वह तीन बार भीग चुका था। तीन दिनों से मराठों के साथ मुठभेड़ चल रही थी, पर किले का दरवाजा खुल नहीं पा रहा था। वाइसराय ने दुलबा नाईक की गर्दन पकड़कर उससे पूछा, "बोल दुलबा, किले मे लोग हैं भी तो कितने ?" "सरकार मेरी जानकारी के अनुसार अन्दर सिर्फ दस बारह लोग थे।" अपनी जबान काटते हुए दुलबा ने आगे कहा, "पता नहीं पिछले तीन दिनों से उन्होंने लड़ाई जारी कैसे रखी ? उस कपटी सम्भाजी ने क्या जादू किया है, कुछ पता नहीं चल रहा है?" "जादू नहीं दुलबा, उस सम्भा ने बड़ी कुशलता से कुछ बलवान मराठी जवानों की फौज को तैनात किया है। नहीं तो इस मिट्टी के ढेर में इतनी हिम्मत कहाँ से आती ?" एक बार फिर कांट द आल्होर ने हिम्मत करके अपनी तोपों को ऊपर से नीचे उतार दिया। उसने किले के सामने से तोपों को दागना शुरू किया। सामने वाले बुर्ज में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने लगीं। स्थिति को समझने के लिए कांट ने कुछ समय के लिए गोलाबारी रोक दी। गन्धक और कीचड़ सने हाथों को कपड़ों से पोंछता हुआ वह बहुत देर तक वहीं पर खड़ा रहा। भीतर से किसी हलचल का संकेत नहीं सम्भाजी :: 467

मिला। फिरंगी सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे खुशी से नाचने लगे। किले के चारों ओर गहरी खाई खोदी गयी थी। उसके कारण भीतर जाना कठिन था। फिरंगी मजदूरों ने ईंट-पत्थर आदि डालकर उस खाई को पाटने का कार्य आरम्भ किया। देखते ही देखते उस खाई पर रास्ता तैयार हो गया। उस रास्ते से फिरंगी आगे बढ़े फिर भी भीतर की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। फिरंगी बन्दरों की तरह सीढ़ियों पर चढ़ने लगे। इसी समय किले के भीतर 'हर हर महादेव' की गर्जना सुनाई दी। अपने हाथ में दुधारी तलवार नचाते हुए येसाजी कंक दहाड़ते हुए शेर की तरह आगे बढ़े। वृद्ध येसाजी के शरीर में कमाल की शक्ति आ गयी थी। येसाजी सीढ़ियों पर चढ़ रहे फिरंगियों को सपा​सप काटना आरम्भ किया। उनका नौजवान बेटा कृष्णाजी सीढ़ियों को पीछे फेंकने लगा। घबराये हुए फिरंगी खाई में गिरने लगे। किले में छः सौ मराठा सैनिक हाथ में नंगी तलवारें खड़े थे। बाहर जंगले में हुए दो सौ मराठों के हाथ भी युद्ध के लिए आतुर हो रहे थे। भीतर और बाहर दोनों ओर से फिरंगी सेना पर जोरदार आक्रमण हुआ। फोंडा किले पर क़ब्ज़ा करने के लिए फिरंगियों ने हर सम्भव प्रयास किया। पाँच दिन तक लगातार तोपें दागते रहे। तीन तगह से किले की दीवार तोड़ दी। किन्तु मराठा वीरों ने उन्हें अन्दर नहीं आने दिया। तेज बारिश और मराठा सैनिकों के तीव्र प्रतिरोध से वाइसराय पूर्णतया हताश हो गया दुलबा नाईक ने साहब को समझाते हुए बोला, "सरकार, लड़ाई बहुत हो गयी। अब हमें पीछे हटना ही होगा।'' "‘सात समुद्र पार पुर्तगाल से हम यहाँ किसलिए आये हैं? इन मामूली मरगठों से मार खाने?'' वाइसराय पीछे हटने को तैयार नहीं था। पीछे हटने से होने वाला अपमान उसे सत्य नहीं था। एक दिन सात-आठ फिरंगियों को टोली तलवार भाँजते हुए एक बड़ी सुराख से भीतर घुस आयी। अचानक उनकी घुसपैठ से सामने का मराठी दल कमजोर पड़ने लगा। इस स्थिति को कृष्णाजी कंक ने देख लिया। क्रोध से उनका खून खौल उठा। उसी आवेश में वे दीवार से नीचे कूद पड़े। उनके पैर में मोच आ गयी। किन्तु शरीर में समाया हुआ युद्ध-ज्वर उन्हें शान्त बैठने नहीं दे रहा था। अपने दुख रहे पैर को घसीटते हुए वे फिरंगियों पर टूट पड़े। वह अपनी तलवार को चारों ओर घुमा रहे थे। लड़ते लड़ते उनके मुख से झाग आने लगा, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। उनके पेट और पीठ पर अनेक गहरे घाव लग गये थे। उनके शरीर से खून की धाराएँ बह रही थीं। उन्होंने दस बारह फिरंगियों को तलवार के घाट उतारा किन्तु सुराख से आने वाले फिरंगियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 468 :: सम्भाजी

कृष्णाजी पर हो रहे आक्रमण पर येसाजी की दृष्टि गयी। उनके मुख से उद्घोष निकला, "बेटा"। फिरंगियों का सामना करने के लिए वे हथेली पर जान लेकर आगे बढ़े। उन पिता-पुत्र की सहायता के लिए लगभग सौ सैनिकों का एक दल वहाँ पहुँच गया। घमासान युद्ध हुआ। मराठों के तेज प्रहार के सामने फिरंगी भागने लगे। येसाजी और उनके बहादुर सैनिकों ने सभी फिरंगियों को बाहर खदेड़ दिया। अनेक घावों से घायल कृष्णाजी गिर पड़े थे। शरीर खून मे लथपथ था और वस्त्र रक्त से भीग गये थे। मराठों ने कृष्णाजी को पालकी में बिठाकर पीछे के डेरे में पहुँचा दिया। वहाँ पर अनेक वैद्य कृष्णाजी के शरीर पर औषधियों का प्रयोग करने लगे। किन्तु घाव इतने गहरे थे कि खून का बहना बन्द ही नहीं हो रहा था। अपने बेटे की यह दशा देखकर येसाजी का हृदय चूर चूर हो रहा था। पालकी पर झुककर येसाजी अपने पुत्र के मुँह पर हाथ फेर रहे थे। उसका धैर्य का प्रयत्न कर रहे थे। किन्तु अभी-अभी समाप्त हुए युद्ध में येसाजी के पैर में गहरा घाव लग गया था। घाव मे बहते खून को सैनिकों ने देख लिया। उस घाव की ओर येसा का ज़रा भी ध्यान नहीं था। सेवकों ने उनके पैर को बाँध दिया। कृष्णाजी का रक्तस्राव रुक नहीं रहा था। इसलिए निश्चित किया गया कि पीछे बांदा भेज दिया जाय। येसाजी को समझाते हुए मानाजी मोरे ने कहा, "बाबाजी, आप अपने बच्चे पर ध्यान दीजिए। पालकी के साथ आप भी चले जाइये। यहाँ पर लड़ाई का सब काम हम देख लेंगे।" "ऐसा कैसे हो सकता है मेरे बच्चे? इन फिरंगियों की आँतों को बाहर खींचने का मैंने शम्भूमहाराज को वचन दिया है। मैं युद्धभूमि से हट कैसे सकता हूँ?" दूसरे दिन का सूरज निकला। सवेरे सवेरे रणभूमि कुछ शान्त रही। अपमान के बोध से वाइसराय बन्दर की तरह नाच रहा था। एक बड़ी टक्कर देकर किले तबाह कर देने का उसने निश्चय किया था। इसके लिए फिरंगियों ने तट के बाहर ऊँची ऊँची सीढ़ियाँ इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी थीं। कमर में डोर से सामान बाँधकर फिरंगी सैनिक तैयार हो गये। आगे की बहादुरी दिखाने के उत्साह में वे अपनी जगह पर ही भेड़ की तरह नाचने लगे। उसी समय नदी की ओर नारियल और सुपारी के वनों में किसी भयंकर तूफान के आने का एहसास हुआ। 'हर हर महादेव' 'शिवाजी महाराज की जय' जैसे नारों से आकाश गूँज उठा। उसके बाद दोनों में शोरगुल शुरू हुआ। किले के अन्दर किले के भीतर से 'आयेऽऽ आयेऽऽ, सम्भाजी महाराज आयेऽऽ' महाराज आये महाराज आये हाथ में नंगी तलवारें झंडे की तरह लहराते हुए मराठा सैनिक एक स्वर में चिल्लाने लगे। देखते देखते शम्भू सम्भाजी 469