भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8 करतूति कर्म कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ। कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥ 95 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां निष्कर्मी पतिव्रता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 8 ॥ साखी 95 ॥

[दादूराम / राम / सत्यराम]

  • 126 -

चितावनी का अंग www.dadooram.org अथ चितावनी का अंग ९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ १ ॥ दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ । सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥ २ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण । मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ ३ ॥ दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे । परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ ४ ॥

  • 127 -

श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे । सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ । मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥ दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त । यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥ दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार । निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥ स्मरण नाम चितावणी दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ । जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥ बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह । दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥ एका एकी राम सौं, कै साधु का संग । दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥ दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा । तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे । होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥ दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर । साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा

  • 128 -

श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9 धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य आठवां चितावणी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 9 ॥ साखी 15 ॥ दादूराम सत्यराम

  • 129 -

अथ मन का अंग १० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥ दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि । मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥ हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ । बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥ जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि । तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥

  • 130 -

२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ। जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥ आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन। साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥ सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ। जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥ जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार। वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥ दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ। नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥ दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ। यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥ मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै। पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥ बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै। आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥ जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ। दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥ दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ। सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥ सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं। मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥ हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ। दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥

  • 131 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ। दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥ 17 ॥ दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ। उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥ 18 ॥ यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढ़ी आकास। दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥ 19 ॥ दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ। दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥ 20 ॥ तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ। दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥ 21 ॥ मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद। दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 22 ॥ विषय विरक्ति दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ। बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥ 23 ॥ दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट। अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥ 24 ॥ दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ। तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 25 ॥ जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ। दादू पानी लौन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥ 26 ॥ ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौन। ऐसैं आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौन ॥ 27 ॥ मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश। दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 28 ॥

  • 132 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 करुणा सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम । दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥ क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ । जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥ जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं। दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥ किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार । क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥ इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह । जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥ किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज । दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥ दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता । तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥ दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार । का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥ मन प्रबोध बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार । यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥ विषय अतृप्ति दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग । देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥

  • 133 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन हरि भावनि दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ। दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥ दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ। साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥ दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन। मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥ जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ। दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥ चाणक उपदेश पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार। राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥ पर प्रबोध दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात। औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥ दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश। यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥ दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ। यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥ दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि। द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥ काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ। काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥ मध्य निष्पक्ष सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग। ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥

  • 134 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10

मन दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग। जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥ हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग। दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥ सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन। दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥ दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ। काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥ विरक्तता सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर। मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥ मन दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ। है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥ दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर। नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥ जाचक मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ। साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥ दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक। जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥ इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै। तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥ इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ। दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥

  • 135 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड। पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥ दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे। नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥ आन लगन व्यभिचार पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल। मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥ जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव। दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥ मन अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ। त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥ घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया। दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥ सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ। ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥ क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि। दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ। साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥ चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध। दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥ एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि। दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥

  • 136 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ। दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥ तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ। दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥ 74 ॥ कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ। राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥ 75 ॥ यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत है जाइ। दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥ 76 ॥ स्मरण नाम चितावणी भूला भौंदू फेर मन, मूरख मुग्ध गँवार। सुमिर सनेही आपणा, आतम का आधार ॥ 77 ॥ मन माणिक मूरख राखि रे, जण जण हाथ न देहु। दादू पारिख जौंहरी, राम साधु दोइ लेहु ॥ 78 ॥ दादू माज्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन। ज्ञान खड्ग गुरुदेव का, ता संग सदा सुजान ॥ 79 ॥ मन मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस। दादू खाइबे को हिल्या, तातैं आन उदास ॥ 80 ॥ कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम। विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥ 81 ॥ केता कहि समझाइया, मानै नहीं निलज्ज। मूरख मन समझै नहीं, कीये काज अकज्ज ॥ 82 ॥ सांच मन ही मंजन कीजिये, दादू दरपण देह। मांहीं मूरति देखिये, इहि औसर कर लेह ॥ 83 ॥

  • 137 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 आन लगन-व्यभिचार तब ही कारा होत है, हरि बिन चितवत आन । क्या कहिये समझै नहीं, दादू सिखवत ज्ञान ॥ 84 ॥ साच दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ । मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 85 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जो मन नहीं निर्मल होइ । तो बग सब ही उद्धरैं, जे इहि विधि सीझै कोइ ॥ 86 ॥ दादू ध्यान धरे क्या होत है, जे मन का मैल न जाइ । बग मीनी का ध्यान धर, पसू बिचारे खाइ ॥ 87 ॥ दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ । मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 88 ॥ दादू जिसका दर्पण ऊजला, सो दर्शन देखै मांहि । जिस की मैली आरसी, सो मुख देखै नांहि ॥ 89 ॥ दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ । दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥ 90 ॥ यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ । दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥ 91 ॥ दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ । देही की रक्षा करैं, हम जनि भीटै कोइ ॥ 92 ॥ दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ । उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ 93 ॥ दादू हाडौं मुख भव्या, चाम रह्या लिपटाय । मांहीं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥ 94 ॥ दादू नौवों द्वारे नरक के, निशदिन बहै बलाइ । शुचि कहाँ लौं कीजिये, राम सुमरि गुण गाइ ॥ 95 ॥

  • 138 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 प्राणी तन मन मिल रह्या, इंद्री सकल विकार । दादू ब्रह्मा शूद्र धर, कहाँ रहै आचार ॥ 96 ॥ मन की चपलता दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ । दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 97 ॥ दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत । मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 98 ॥ निश्चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि । दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥ 99 ॥ दादू यहु मन मींडका, जल सौं जीवै सोइ । दादू यहु मन रिंद है, जनि रु पतीजै कोइ ॥ 100 ॥ मांही सूक्ष्म है रहै, बाहरि पसारै अंग । पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥ 101 ॥ आशय विश्राम सपना तब लग देखिये, जब लग चंचल होइ । जब निश्चल लागा नाम सौं, तब सपना नांही कोइ ॥ 102 ॥ जागत जहाँ जहाँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ । दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥ 103 ॥ दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति । बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 104 ॥ सावण हरिया देखिये, मन चित ध्यान लगाइ । दादू केते जुग गये, तो भी हऱ्या न जाइ ॥ 105 ॥ जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम । भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 106 ॥ जहाँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ । दादू वासा प्राण का, जहाँ पहली रह्या समाइ ॥ 107 ॥

  • 139 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ नांही तहँ नांहि। गुण निर्गुण जहाँ राखिये, दादू घर वन मांहि ॥ 108 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, आदि अन्त इस्थान। माया ब्रह्म जहाँ राखिये, दादू तहँ विश्राम ॥ 109 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, जीवन मरण जिस ठौर। विष अमृत तहँ राखिये, दादू नाहीं और ॥ 110 ॥ जहाँ सुरति तहँ जीव है, जहाँ जाणै तहँ जाइ। गम अगम जहाँ राखिये, दादू तहाँ समाइ ॥ 111 ॥ मन मनसा का भाव है, अन्त फलेगा सोइ। जब दादू बाणक बण्या, तब आशय आसण होइ ॥ 112 ॥ जप तप करणी कर गये, स्वर्ग पहुँचे जाइ। दादू मन की वासना, नरक पड़े फिर आइ ॥ 113 ॥ पाका काचा ह्वै गया, जीत्या हारे डाव। अंत काल गाफिल भया, दादू फिसले पांव ॥ 114 ॥ दादू यहु मन पंगुल पंच दिन, सब काहू का होइ। दादू उतर आकाश तैं, धरती आया सोइ ॥ 115 ॥ ऐसा कोई एक मन, मरै सो जीवै नाहिं। दादू ऐसे बहुत हैं, फिर आवै कलि माहिं ॥ 116 ॥ देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ। दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥ 117 ॥ जग जन विपरीत बरतन एकै भांति सब, दादू संत असंत। भिन्न भाव अन्तर घणां, मनसा तहाँ गच्छन्त ॥ 118 ॥ यहु मन मारै मोमिनां, यहु मन मारै मीर। यहु मन मारै साधकाँ, यहु मन मारै पीर ॥ 119 ॥

  • 140 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 दादू मन मारे मुनिवर मुये, सुर नर किये संहार। ब्रह्मा विष्णु महेश सब, राखै सिरजनहार ॥ 120 ॥ मन बाहे मुनिवर बड़े, ब्रह्मा विष्णु महेश। सिद्ध साधक योगी यति, दादू देश विदेश ॥ 121 ॥ मनमुखी मान बड़ाई पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन। राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥ 122 ॥ जहाँ जहाँ आदर पाइये, तहाँ तहाँ जीव जाइ। बिनआदरदीजे राम रस, छाड़ि हलाहल खाइ ॥ 123 ॥ करणी बिना कथनी करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार। दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ 124 ॥ जाया माया मोहनी दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ। तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 125 ॥ मन अब मन निर्भय घर नहीं, भय में बैठा आइ। निर्भय संग थैं बीछुट्या, तब कायर है जाइ ॥ 126 ॥ जब मन मृतक है रहे, इंद्री बल भागा। काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥ 127 ॥ आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहीं धागा। दादू एकै रहि गया, तब जाणी जागा ॥ 128 ॥ दादू मन के शीश मुख, हस्त पांव है जीव। श्रवण नेत्र रसना रटै, दादू पाया पीव ॥ 129 ॥ जहँ के नवाये सब नवैं, सोई सिर कर जाण। जहँ के बुलाये बोलिये, सोई मुख परमाण ॥ 130 ॥

  • 141 -

श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जहाँ के सुणाये सब सुणैं, सोई श्रवण सयाण । जहाँ के दिखाये देखिये, सोई नैन सुजाण ॥ 131 ॥ दादू मन ही सौं मल ऊपजै, मन ही सौं मल धोइ । सीख चली गुरु साध की, तो तूँ निर्मल होइ ॥ 132 ॥ दादू मन ही माया ऊपजै, मन ही माया जाइ । मन ही राता राम सौं, मन ही रह्या समाइ ॥ 133 ॥ दादू मन ही मरणा ऊपजै, मन ही मरणा खाइ । मन अविनासी ह्वै रह्या, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 134 ॥ मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज । मन ही सन्मुख ज्योति है, मन ही सन्मुख सेज ॥ 135 ॥ मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ । मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 136 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य दसवां मन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 10 ॥ साखी 136 ॥

  • 142 -

अथ सूक्ष्म जन्म का अंग ११ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू चौरासी लख जीव की, प्रकृति घट मांहि। अनेक जन्म दिन के करै, कोई जाणै नांहि ॥ 2 ॥ अनेक जन्म दिन के करै दादू जेते गुण व्यापैं जीव को, ते ते ही अवतार। आवागमन यहु दूर कर, समर्थ सिरजनहार ॥ 3 ॥

  • 143 -

श्री दादूवाणी-सूक्ष्म जन्म का अंग 11 सब गुण सब ही जीव के, दादू व्यापैं आइ। घट मांहि जामैं मरै, कोइ न जाणै ताहि ॥ 4 ॥ जीव जन्म जाणै नहीं, पलक पलक में होइ। चौरासी लख भोगवै, दादू लखै न कोइ ॥ 5 ॥ अनेक रूप दिन के करै, यहु मन आवै जाइ। आवागमन मन का मिटै, तब दादू रहै समाइ ॥ 6 ॥ निशिवासर यहु मन चलै, सूक्ष्म जीव संहार। दादू मन थिर कीजिये, आतम लेहु उबारि ॥ 7 ॥ कबहुँ पावक कबहुँ पाणी, धर अम्बर गुण बाइ। कबहुँ कुंजर कबहुँ कीड़ी, नर पशुवा ह्वै जाइ ॥ 8 ॥ करणी बिना कथनी शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट मांहि। कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणै नांहि ॥ 9 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य ग्यारहवां सूक्ष्म जन्म का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 11 ॥ साखी 9 ॥

  • 144 -

माया का अंग www.dadooram.org

माया क अंग ११ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। साहिब है पर हम नहीं, सब जग आवै जाइ । दादू सपना देखिये, जागत गया बिलाइ ।। 2 ।। दादू माया का सुख पंच दिन, गर्व्यों कहा गँवार । सपने पायो राज धन, जात न लागे बार ।। 3 ।। दादू सपने सूता प्राणिया, किये भोग विलास । जागत झूठा ह्रै गया, ताकी कैसी आस ।। 4 ।।

  • 145 -