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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 साचे को साचा कहै, झूठे को झूठा। दादू दुविधा को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥ 27 ॥ पारिख अपारिख दादू हीरे को कंकर कहैं, मूरख लोग अजान। दादू हीरा हाथ ले, परखैं साधु सुजान ॥ 28 ॥ हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार। पाया पारख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 29 ॥ अंधे हीरा परखिया, किया कौडी मोल। दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 30 ॥ सगुरा निगुरा सगुरा निगुरा परखिये, साध कहैं सब कोइ। सगुरा साचा, निगुरा झूठा, साहिब के दर होइ ॥ 31 ॥ सगुरा सत संयम रहै, सन्मुख सिरजनहार। निगुरा लोभी लालची, भूंचै विषय विकार ॥ 32 ॥ कर्त्ता कसौटी खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ। साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥ 33 ॥ पारिख अपारिख खोटा खरा कर देवै पारिख, तो कैसे बन आवै। खरे खोटा का न्याय नबेरे, साहिब के मन भावै ॥ 34 ॥ दादू जिन्हें ज्यों कही, तिन्हें त्यों मानी, ज्ञान विचार न कीन्हा। खोटा खरा जीव परख न जानै, झूठ सच करि लीन्हा ॥ 35 ॥ कर्त्ता कसौटी जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर-घर आहि। दादू महँगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥ 36 ॥

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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ। दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥ 37 ॥ दादू राम कसै सेवक खरा, कदे न मोड़ै अंग। दादू जब लग राम है, तब लग सेवक संग ॥ 38 ॥ दादू कस कस लीजिये, यहु ताते परिमान। खोटा गाँठ न बाँधिये, साहिब के दीवान ॥ 39 ॥ खरी कसौटी पीव की, कोई बिरला पहुँचनहार। जे पहुँचे ते ऊबरे, ताइ किये तत सार ॥ 40 ॥ दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी। काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥ 41 ॥ दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ। साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥ 42 ॥ दादू ठग आमेर में, साधौं सौं कहियो। हम शरणाई राम की, तुम नीके रहियो ॥ 43 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सत्ताईसवां पारिख कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 27 ॥ साखी 43 ॥

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उपजन का अंग अथ उपजन का अंग २८ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।। विचार दादू माया का गुण बल करै, आपा उपजै आइ । राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्रै जाइ ।। 2 ।। आपा नाहीं बल मिटै, त्रिविध तिमिर नहिं कोइ । दादू यहु गुण ब्रह्म का, शून्य समाना सोइ ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28 उपजन दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ। गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥ 4 ॥ द्वै पख उपजी परिहरै, निर्पख अनुभव सार। एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार ॥ 5 ॥ दादू काया ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान। चौरासी लख जीव को, इस माया का ध्यान ॥ 6 ॥ आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट। दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥ 7 ॥ आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ। दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥ 8 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्चल सहज समाधि। दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥ 9 ॥ प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार। दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥ 10 ॥ दादू बंझ बियाई आत्मा, उपज्या आनन्द भाव। सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव ॥ 11 ॥ निन्दा जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग मांहि। दादू पहुंचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नांहि ॥ 12 ॥ उपजन पहले हम सब कुछ किया, भरम करम संसार। दादू अनुभव उपजी, राते सिरजनहार ॥ 13 ॥ सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तव सार। सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाहिं विकार ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-उपजन का अंग 28 परिचय जिज्ञासा उपदेश पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ । दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ ॥ 15 ॥ दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद । औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद ॥ 16 ॥ दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होइ । जैसा है तैसा कहै, दादू विरला कोइ ॥ 17 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य अट्ठाईसवां उपजन काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 28 ॥ साखी 17 ॥

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दया निर्वैरता का अंग www.dadooram.org अथ दया निर्वैरता का अंग २९ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ सारमत आपा मेटै हरि भजै, तन मन तजै विकार । निर्वैरी सब जीव सौं, दादू यहु मत सार ॥ 2 ॥ दादू निर्वैरी निज आत्मा, साधन का मत सार । दादू दूजा राम बिन, बैरी मंझ विकार ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 निर्वैरी सब जीव सौं, संतजन सोई । दादू एकै आत्मा, बैरी नहिं कोई ॥ 4 ॥ सब हम देख्या शोध कर, दूजा नांही आन । सब घट एकै आत्मा, क्या हिन्दू मुसलमान ॥ 5 ॥ दादू नारी पुरुष का नाम धर, इहि संशय भ्रम भुलान । सब घट एकै आत्मा, क्या हिंदू मुसलमान ॥ 6 ॥ दादू दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान । दोनों भाई नैन हैं, हिंदू मुसलमान ॥ 7 ॥ दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ । भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥ 8 ॥ किस सौं बैरी ह्वै रह्या, दूजा कोई नांहि । जिसके अंग तैं ऊपजै, सोई है सब मांहि ॥ 9 ॥ सब घट एकै आत्मा, जानै सो नीका । आपा पर में चीन्ह ले, दर्शन है पीव का ॥ 10 ॥ काहे को दुख दीजिये, घट घट आत्माराम । दादू सब संतोषिये, यह साधु का काम ॥ 11 ॥ काहे को दुख दीजिये, साँई है सब मांहि । दादू एकै आत्मा, दूजा कोई नांहि ॥ 12 ॥ साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष । दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥ 13 ॥ दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई । सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥ 14 ॥ आत्माराम विचार कर, घट घट देव दयाल । दादू सब संतोषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥ 15 ॥ दादू पूरण ब्रह्म विचारले, द्वैत भाव कर दूर । सब घट साहिब देखिये, राम रह्या भरपूर ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू मंदिर काँच का, मर्कट सुनहाँ जाइ । दादू एक अनेक है, आप आपको खाइ ॥ 17 ॥ आत्म भाई जीव सब, एक पेट परिवार । दादू मूल विचारिये, तो दूजा कौन गँवार ॥ 18 ॥ दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि । काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥ 19 ॥ दया निर्वैरता घट घट के उनहार सब, प्राण परस है जाइ । दादू एक अनेक है, बरतैं नाना भाइ ॥ 20 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । दादू न्यारे नांम धर, भिन्न भिन्न है जाइ ॥ 21 ॥ आये एकंकार सब, साँई दिये पठाइ । आदि अंत सब एक है, दादू सहज समाइ ॥ 22 ॥ आतम देव आराजिये, विरोधिये नहिं कोइ । आराधे सुख पाइये, विरोधे दुःख होइ ॥ 23 ॥ ज्यों आपै देखे आपको, यों जे दूसर होइ । तो दादू दूसर नहीं, दुःख न पावै कोइ ॥ 24 ॥ दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान । दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥ 25 ॥ अदया हिंसा दादू अर्श खुदाय का, अजरावर का थान । दादू सो क्यों ढाहिये, साहिब का नीशान ॥ 26 ॥ दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन । प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥ 27 ॥ मसीत संवारी माणसाँ, तिसको करैं सलाम । ऐन आप पैदा किया, सो ढाहैं मुसलमान ॥ 28 ॥

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श्री दादूवाणी-दया निर्वैरता का अंग 29 दादू जंगल मांही जीव जे, जग तैं रहैं उदास। भयभीत भयानक रात दिन, निश्चल नाहीं वास ॥ 29 ॥ वाचा बंधी जीव सब, भोजन पानी घास। आत्म ज्ञान न ऊपजै, दादू करहि विनास ॥ 30 ॥ काला मुँह कर करद का, दिल तैं दूर निवार। सब सूरत सुबहान की, मुल्लां मुग्ध न मार ॥ 31 ॥ गला गुस्से का काटिये, मियाँ मनी को मार। पंचों बिस्मिल कीजिये, ये सब जीव उबार ॥ 32 ॥ वैर विरोधे आत्मा, दया नहीं दिल मांहि। दादू मूरति राम की, ताको मारन जांहि ॥ 33 ॥ दया निर्वैरता कुल आलम यके दीदम, अरवाहे इखलास। बद अमल बदकार दुई, पाक यारां पास ॥ 34 ॥ काल झाल तैं काढ कर, आतम अंग लगाइ। जीव दया यहु पालिये, दादू अमृत खाइ ॥ 35 ॥ दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ। परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 36 ॥ सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत। ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 37 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य उन्तीसवां दया निर्वैरता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 29 ॥ साखी 37 ॥

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सुंदरी का अंग www.dadooram.org अथ सुन्दरी का अंग ३० मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।। सुन्दरी विलाप आरतवन्ती सुन्दरी, पल पल चाहे पीव । दादू कारण कंत के, तालाबेली जीव ।। 2 ।। काहे न आवहु कंत घर, क्यों तुम रहे रिसाइ । दादू सुन्दरी सेज पर, जन्म अमोलक जाइ ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 आतम अंतर आव तूं, या है तेरी ठौर। दादू सुन्दरी पीव तूं, दूजा नांही और ॥ 4 ॥ दादू पीव न देख्या नैन भर, कंठ न लागी धाइ। सूती नहीं गल बाँह दे, बीच हि गई बिलाइ ॥ 5 ॥ सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ। दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥ 6 ॥ साँई कारण सेज सँवारी, सब तैं सुन्दर ठौर। दादू नारी नाह बिन, आण बिठाये और ॥ 7 ॥ कोई अवगुण मन बस्या, चित तैं धरी उतार। दादू पति बिन सुन्दरी, हाँडै घर-घर बार ॥ 8 ॥ अन्य लगन व्यभिचार प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार। दादू आतम रत नहीं, क्यों मानै भरतार ॥ 9 ॥ दादू हौं सुख सूती नींद भर, जागै मेरा पीव। क्यों कर मेला होइगा, जागै नांही जीव ॥ 10 ॥ सखी न खेलै सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग। स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥ 11 ॥ पंच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले। दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहै अकेले ॥ 12 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, हौं री दुहागिन आहि। पिव का महल न पाइये, कहाँ पुकारूँ जाहि ॥ 13 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, कंत न बूझै बात। मनसा वाचा कर्मणा, मूर्च्छ मूर्च्छ जीव जात ॥ 14 ॥ सखी सुहागिन सब कहैं, पीव सौं परस न होइ। निशवासर दुख पाइये, यहु व्यथा न जान कोइ ॥ 15 ॥

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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 सखी सुहागिन सब कहैं, प्रकट न खेलै पीव। सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥ 16 ॥ अन्य लग्न व्यभिचार पुरुष पुरातन छाड़ कर, चली आन के साथ। सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥ 17 ॥ सुन्दरी विलाप सुन्दरी कबहुँ कंत का, मुख सौं नाम न लेइ। अपने पीव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥ 18 ॥ नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण। दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥ 19 ॥ तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण। सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥ 20 ॥ सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार। त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥ 21 ॥ नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार। दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥ 22 ॥ सुन्दरी सुहाग प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास। आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥ 23 ॥ सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग। पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥ 24 ॥ दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै। राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥ 25 ॥ दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह। दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ । दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥ 27 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तीसवां सुन्दरी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 30 ॥ साखी 27 ॥

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कस्तूरिया मृग का अंग www.dadooram.org अथ कस्तूरिया मृग का अंग ३१ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। दादू घट कस्तूरी मृग के, भ्रमत फिरै उदास । अन्तरगति जाणै नहीं, तातैं सूंघै घास ।। 2 ।। सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास । कस्तूरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ।। 3 ।। दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास । गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ।। 4 ।।

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श्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31 दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि। मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥ दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर। नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥ ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ। न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥ दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि। केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥ दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ। सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥ दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ। चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥ जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद। सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥ दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत। सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥ दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत। प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥ सगुना निगुना कृतघ्नी दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव। अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र- सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥

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निंदा का अंग www.dadooram.org अथ निन्दा का अंग ३२ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ मत्सर ईर्ष्या साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ । दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥ 2 ॥ दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट। आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 निन्दा दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल । तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥ दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ । ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥ दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि । राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥ दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ । हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥ दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण । साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥ मत्सर ईर्ष्या अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप । धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥ अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार । जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥ दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ । अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥ अमिट पाप प्रचंड दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम । निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥ मत्सर ईर्ष्या दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा । राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥ दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ । दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 दादू झूठ दिखावै साच को, भयानक भयभीत । साचा राता साच सौं, झूठ न आनै चीत ॥ 15 ॥ साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान । दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥ 16 ॥ निन्दा दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहाँ लहिये । ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 17 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बत्तीसवां निन्दा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 32 ॥ साखी 17 ॥

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निगुणा का अंग www.dadooram.org अथ निगुणा का अंग ३३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ । सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥ 2 ॥ काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ । ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 अज्ञ स्वभाव अपलट सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग। दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥ दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि। उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥ सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ। दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥ कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास। दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि। दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग। दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ। दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल। मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥ सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ। दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥ दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ। गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि। दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥

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