सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
बेली का अंग अथ बेली का अंग ३६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै । सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥ 2 ॥ पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे । सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥ 3 ॥ दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ । सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36 जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ । दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥ 5 ॥ हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार । दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥ 6 ॥ दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ । आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ 7 ॥ कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप । दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ 8 ॥ जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ । दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ 9 ॥ दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं । सूखै खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ 10 ॥ दादू बहुगुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं । सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥ 11 ॥ बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि । मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥ 12 ॥ अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ । अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ 13 ॥ दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ । विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ 14 ॥ सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार । प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥ 15 ॥ दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ । संतोंष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छत्तीसवां बेली काअंग सम्पूर्ण ।। अंग 36 ।। साखी 16 ।।
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अबिहड़ का अंग www.dadooram.org अथ अबिहड़ का अंग ३७ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ । ना वह मरै, न बीछूटै, ना दुख व्यापै कोइ ॥ 2 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहि संसार । ना वह खिरै, न हम खपैं, ऐसा लेहु विचार ॥ 3 ॥ दादू संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी । दादू जीवन-मरण का, सो सदा संगाती ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-अबिहड़ का अंग 37 दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूँ पलट न जाइ। आदि अंत बिहड़ै नही, ता सन यहु मन लाइ ॥ 5 ॥ दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार। अविनाशी आपै रहै, बिनसै सब संसार ॥ 6 ॥ दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार। आदि अंत बिहड़ै नहीं, बिनसै सब आकार ॥ 7 ॥ दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ। निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥ 8 ॥ दादू अबिहड़ आप है, कबहूँ बिहड़े नांहि। घटै बधै नहीं एक रस, सब उपज खपै उस मांहि ॥ 9 ॥ अबिहड़ अंग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ। दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥ 10 ॥ अन्त समय की साखी जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन। साहिब अपणे कारणैं,(भलो निबाह्यो प्रण) ॥ 11 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सैंतीसवां अबिहड़ काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 37 ॥ साखी 11 ॥ साखी स्कन्ध पूर्वार्द्ध भाग समाप्त दादूराम सत्यराम
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दादूराम ॥ श्री परमात्मने नमः ॥ सत्यराम ॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ शब्द भाग (उत्तरार्ध) अथ राग गौड़ी १ (गायन समय दिन 3 से 6)
- स्मरण शूरातन नाम निश्चय । त्रिताल राम नाम नहीं छाडूं भाई, प्राण तजूं निक ट जीव जाई ॥ टेक ॥ रती रती कर डारै मोहि, साँई संग न छाडूं तोहि ॥ 1 ॥ भावै ले सिर करवत दे, जीवन मूरी न छाडूं तोहि ॥ 2 ॥ पावक में ले डारै मोहि, जरै शरीर न छाडूं तोहि ॥ 3 ॥ अब दादू ऐसी बन आई, मिलूं गोपाल निसान बजाई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 2. अन्य उपदेश । त्रिताल राम नाम जनि छाड़े कोई, राम कहत जन निर्मल होई ॥ टेक ॥ राम कहत सुख संपति सार, राम नाम तिर लंघे पार ॥ 1 ॥ राम कहत सुधि बुधि मति पाई, राम नाम जनि छाड़हु भाई ॥ 2 ॥ राम कहत जन निर्मल होई, राम नाम कहि कश्मल धोई ॥ 3 ॥ राम कहत को को नहिं तारे, यहु तत दादू प्राण हमारे ॥ 4 ॥ 3. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल मेरे मन भैया राम कहो रे । राम नाम मोहि सहज सुनावै, उनहीं चरण मन कीन रहो रे ॥ टेक ॥ राम नाम ले संत सुहावै, कोई कहै सब शीश सहो रे । वाही सौं मन जोरे राखो, नीके राशि लिये निबहो रे ॥ 1 ॥ कहत सुनत तेरो कछू न जावै, पापनि छेदन सोई लहो रे । दादू रे जन हरि गुण गावो, कालहि जालहि फेरि दहो रे ॥ 2 ॥ 4. विरह । एकताल कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥ पास पीव, परदेश है रे, जब लग प्रकटै नांहि। बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन मांहि ॥ 1 ॥ जब लग नैन न देखिये, प्रकट मिलै न आइ। एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ 2 ॥ तब लग नेड़ै दूर है रे, जब लग मिले न मोहि। नैन निकट नहीं देखिये, संग रहे क्या होइ ॥ 3 ॥ कहा करूँ कैसे मिले रे, तलफै मेरा जीव। दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 5. विरह विलाप । षटताल जियरा क्यों रहै रे, तुम्हारे दर्शन बिन बेहाल ॥ टेक ॥ परदा अंतर कर रहे, हम जीवैं किहिं आधार। सदा संगाती प्रीतमा, अब के लेहु उबार ॥ 1 ॥ गोप्य गुसांइ ह्रै रहे, अब काहे न प्रकट होइ। राम सनेही संगिया, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥ अन्तरयामी छिप रहे, हम क्यों जीवैं दूर। तुम बिन व्याकुल केशवा, नैन रहे जल पूर ॥ 3 ॥ आप अपरछन ह्रै रहे, हम क्यों रैनि बिहाइ। दादू दर्शन कारणै, तलफ तलफ जीव जाइ ॥ 4 ॥ 6. विरह हैरान । त्रिताल अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर। दर्शन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर ॥ टेक ॥ चार पहर चारों युग बीते, रैनि गँवाई भोर। अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहूँ रहे चित-चोर ॥ 1 ॥ कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, मारग चितवत तोर। दादू ऐसे आतुर विरहनी, जैसे चंद चकोर ॥ 2 ॥ 7. सुन्दरी श्रृंगार सो-धन पीवजी साज सँवारी, अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥ टेक ॥ साज श्रृंगार किया मन मांही, अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥ 1 ॥ पीव मिलन को अहिनिशि जागी, अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥ 2 ॥ जतन-जतन कर पंथ निहारूँ, पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥ 3 ॥ अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी, कहै दादू सुन विपति हमारी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 ४. विरह चिन्ता । गजताल सो दिन कबहूँ आवेगा, दादूड़ा पीव पावेगा ॥ टेक ॥ क्यूं ही अपने अंग लगावेगा, तब सब दुख मेरा जावेगा ॥ 1 ॥ पीव अपने बैन सुनावेगा, तब आनंद अंग न मावेगा ॥ 2 ॥ पीव मेरी प्यास मिटावेगा, तब आपहि प्रेम पिलावेगा ॥ 3 ॥ दे अपना दर्श दिखावेगा, तब दादू मंगल गावेगा ॥ 4 ॥ ९. विरह प्रीति । पंचम ताल तैं मन मोह्यो मोर रे, रह न सकूँ हौं राम जी ॥ टेक ॥ तोरे नांव चित लाइया रे, औरन भया उदास। साँईं ये समझाइया, हौं संग न छाडूं पास रे ॥ 1 ॥ जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे, जनि पछतावा होइ। गुण तेरे रसना जपूं, सुणसी साँई सोइ रे ॥ 2 ॥ भोरे जन्म गँमाइया रे, चीन्हा नहीं सो सार। अजहूँ यह अचेत है, और नहीं आधार रे ॥ 3 ॥ पीव की प्रीत तो पाइये रे, जो सिर होवे भाग। यो तो अनत न जाइसी, रहसी चरणहुँ लाग रे ॥ 4 ॥ अनतैं मन निवारिया रे, मोहि एकै सेती काज। अनत गये दुख ऊपजै, मोहि एकै सेती राज रे ॥ 5 ॥ साँईं सौं सहजैं रमूँ रे, और नहीं आन देव। तहाँ मन विलंबिया, जहाँ अलख अभेव रे ॥ 6 ॥ चरण कमल चित लाइया रे, भोरैं ही ले भाव। दादू जन अचेत है, सहजैं ही तूँ आव रे ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
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विरह विलाप । पंचमताल विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥ विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ 1 ॥ नव-सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ 2 ॥ देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ 3 ॥ दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ 4 ॥
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करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल अब तो मोहि लागी बाइ, उन निश्चल चित्त लियो चुराइ ॥ टेक ॥ आन न रुचै और नहीं भावै, अगम अगोचर तहँ मन जाइ। रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥ 1 ॥ तिन चरणों चित्त सहज समाना, सो रस भीना तहँ मन धाइ। अब तो ऐसी बन आई, विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥ 2 ॥ कहा करूँ, मेरा वश नांही, और न मेरे अंग सुहाइ। पल इक दादू देखन पावै, तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥ 3 ॥
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करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल तूँ जनि छाड़ै केशवा, मेरे और निवाहनहार हो ॥ टेक ॥ अवगुण मेरे देखकर, तूँ ना करि मैला मन। दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥ 1 ॥ हम अपराधी जन्म के, नखशिख भरे विकार। मेट हमारे अवगुणा, तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥ 2 ॥ मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु सँवार । समर्थ मेरा सांइयाँ, तूँ आपै आप उधार हो ॥ 3 ॥ तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि। दादू को और निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 13. केवल विनती । गजताल राम सँभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥ टेक ॥ मंझ समंदां नावरी रे, बूडे खेवट-बाज। काढनहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥ 1 ॥ पार न पहुँचै राम बिन, भेरा भवजल मांहि। तारणहारा एक तूँ, दूजा कोई नांहि ॥ 2 ॥ पार परोहन तो चले, तुम खेवहु सिरजनहार। भव सागर में डूब है, तुम्ह बिन प्राण अधार ॥ 3 ॥ औघट दरिया क्यों तिरे, बोहिथ बैसणहार। दादू खेवट राम बिन, कौण उतारे पार ॥ 4 ॥ 14. रंग ताल पार नहीं पाइये रे, राम बिना को निर्वाणहार ॥ टेक ॥ तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार। पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥ 1 ॥ विषम भयानक भव-जला, तुम्ह बिन भारी होइ। तूँ हरि तारण केशवा, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥ तुम्ह बिन खेवट को नहीं, अतिर तिरा नहिं जाइ। औघट भेरा डूब है, नांही आन उपाइ ॥ 3 ॥ यहु घट औघट विषम है, डूबत मांहि शरीर । दादू कायर, राम बिन, मन नहिं बाँधै धीर ॥ 4 ॥ 15. रंग ताल क्यों हम जीवैं दास गुसाँई, जे तुम छाड़हु समर्थ साँई ॥ टेक ॥ जे तुम जन को मनहिं बिसारा, तो दूसर कौण संभालणहारा ॥ 1 ॥ जे तुम परिहर रहो नियारे, तो सेवक जाइ कवन के द्वारे ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 जे जन सेवक बहुत बिगारे, तो साहिब गरवा दोष निवारे ॥ ३ ॥ समर्थ साँई साहिब मेरा, दादू दास दीन है तेरा ॥ ४ ॥ 16. करुणा । वीर विक्रम ताल क्यों कर मिलै मोकौं राम गुसाँई, यहु बिषिया मेरे वश नांही ॥ टेक ॥ यहु मन मेरा दहदिशि धावै, नियरे राम न देखन पावे ॥ 1 ॥ जिह्वा स्वाद सबै रस लागे, इन्द्री भोग विषय को जागे ॥ 2 ॥ श्रवणहुँ साच कदे नहिं भावे, नैन रूप तहँ देख लुभावे ॥ 3 ॥ काम क्रोध कदे नहीं छीजे, लालच लाग विषय रस पीजे ॥ 4 ॥ दादू देख मिले क्यों साँई, विषय विकार बसे मन मांही ॥ 5 ॥ 17. परिचय विनती । वीर विक्रम ताल जो रे भाई ! राम दया नहीं करते । नवका नाम खेवट हरि आपै, यों बिन क्यों निस्तरते ॥ टेक ॥ करणी कठिन होत नहिं मोपै, क्यों कर ये दिन भरते । लालच लाग परत पावक में, आपहि आपै जरते ॥ 1 ॥ स्वाद हि संग विषय नहिं छूटै, मन निश्चल नहिं धरते । खाय हलाहल सुख के तांई, आपै ही पच मरते ॥ 2 ॥ मैं कामी कपटी क्रोध काया में, कूप परत नहिं डरते । करवत काम शीश धर अपने, आपहि आप विहरते ॥ 3 ॥ हरि अपना अंग आप नहिं छाड़ै, अपनी आप विचरते । पिता क्यों पूत को मारै, दादू यूं जन तिरते ॥ 4 ॥ 18. विरह विलाप विनती । द्वितीय ताल तो लग जनि मारे तूँ मोहि, जो लग मैं देखूं नहिं तोहि ॥ टेक ॥ अब के बिछुरे मिलन कैसे होइ, इहि विधि बहुरि न चिन्है कोइ ॥ 1 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 दीन दयाल दया कर जोइ, सब सुख आनंद तुम्ह तैं होइ ॥ 2 ॥ जन्म-जन्म के बन्धन खोइ, देखन दादू अहिनिशि रोइ ॥ 3 ॥ 19. स्पर्श विनती । द्वितीय ताल संग न छाडूं मेरा पावन पीव, मैं बलि तेरे जीवन जीव ॥ टेक ॥ संग तुम्हारे सब सुख होहि, चरण कमल मुख देखूं तोहि ॥ 1 ॥ अनेक जतन कर पाया सोइ, देखूं नैनहुँ तो सुख होइ ॥ 2 ॥ शरण तुम्हारी अंतर वास, चरण कमल तहँ देहु निवास ॥ 3 ॥ अब दादू मन अनत न जाइ, अंतर वेधि रह्यो ल्यौ लाइ ॥ 4 ॥ 20. परिचय विनती (गुजराती भाषा) । त्रिताल नहीं मेल्हूँ , राम ! नहीं मेल्हूँ , मैं शोधि लीधो नहीं मेल्हूँ, चित्त तुम्ह सूं बांधूं नहीं मेल्हूँ ॥ टेक ॥ हूँ तारे काजे तालाबेली, हवे केम मने जाशे मेल्ही ॥ 1 ॥ साहसि तूं ने मनसों गाढो, चरण समानों केवी पेरे काढो ॥ 2 ॥ राखिश हदे तूं मारो स्वामी, मैं दुहिले पाम्यों अंतरजामी ॥ 3 ॥ हवे न मेल्हूँ तूं स्वामी मारो, दादू सन्मुख सेवक तारो ॥ 4 ॥ 21. परिचय करुणा विनती । दादरा राम ! सुनहु न विपति हमारी हो, तेरी मूरति की बलिहारी हो ॥ टेक ॥ मैं जु चरण चित चाहना, तुम सेवक साधारना ॥ 1 ॥ तेरे दिन प्रति चरण दिखावना, कर दया अंतर आवना ॥ 2 ॥ जन दादू विपति सुनावना, तुम गोविन्द तपत बुझावना ॥ 3 ॥ 22. परिचय विनती-प्रश्न । द्रुताली कौण भांति भल मानैं गुसाँई, तुम्ह भावे सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
कै भल मानैं नाचें गायें, कै भल मानैं लोक रिझायें ॥ 1 ॥ कै भल मानैं तीरथ न्हायें, कै भल मानैं मूंड़ मुंडायें ॥ 2 ॥ कै भल मानैं सब घर त्यागी, कै भल मानैं भये वैरागी ॥ 3 ॥ कै भल मानैं जटा बधाये, कै भल मानैं भस्म लगाये ॥ 4 ॥ कै भल मानैं वन वन डोलें, कै भल मानैं मुखहि न बोलें ॥ 5 ॥ कै भल मानैं जप तप कीये, कै भल मानैं करवत लीये ॥ 6 ॥ कै भल मानैं ब्रह्म गियानी, कै भल मानैं अधिक धियानी ॥ 7 ॥ जे तुम्ह भावै सो तुम्ह पै आहि, दादू न जाणैं कहि समझाहि ॥ 8 ॥ साखी से उत्तर- दादू जे तूँ समझै तो कहूँ, साचा एक अलेख । डाल पान तज मूल गहि, क्या दिखलावै भेष ॥ 1 ॥ दादू सच बिन साँई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उरध मुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 2 ॥
२३. परिचय विनती अहो ! गुण तोर, अवगुण मोर, गुसाँई । तुम कृत कीन्हा, सो मैं जानत नांहीं ॥ टेक ॥ तुम उपकार किये हरि केते, सो हम बिसर गये । आप उपाइ अग्निमुख राखे, तहाँ प्रतिपाल भये, हो गुसाँई ॥ 1 ॥ नख-सिख साज किये हो संजीवन, उदर आधार दिये । अन्न-पान जहाँ जाइ भस्म हो, तहाँ तैं राखि लिये, हो गुसाँई ॥ 2 ॥ दिन दिन जान जतन कर पोषे, सदा समीप रहे । अगम अपार किये गुन केते, कबहुँ नांहि कहे, हो गुसाँई ॥ 3 ॥ कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत, माया मोह परे । दादू तुम तज जाइ गुसाँई, विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 24. उपदेश चेतावनी । एकताल कैसे जीविये रे, साँई संग न पास ? चंचल मन निश्चल नहीं, निशिदिन फिरे उदास ॥ टेक ॥ नेह नहीं रे राम का, प्रीति नहीं परकाश । साहिब का सुमिरण नहीं, करे मिलन की आश ॥ 1 ॥ जिस देखे तूँ फूलिया रे, पाणी पिंड बधाणां मांस । सो भी जल-बल जाइगा, झूठा भोग विलास ॥ 2 ॥ तो जीवीजे जीवणां, सुमरै श्वासै श्वास । दादू प्रकट पीव मिलै, तो अंतर होइ उजास ॥ 3 ॥ 25. हितोपदेश । चटताल जियरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तज विकार ॥ टेक ॥ तूँ जनि भूले मन गँवार, शिर भार न लीजे मान हार ॥ 1 ॥ सुन समझायो बार-बार, अजहूँ न चेतै, हो हुसियार ॥ 2 ॥ कर तैसे भव तिरिये पार, दादू अब तैं यही विचार ॥ 3 ॥ 26. (क)-भय चेतावनी । त्रिताल जियरा, चेत रे जनि जारे । हे जैं हरि सौं प्रीति न कीन्ही, जन्मअमोलक हारे ॥ टेक ॥ बेर बेर समझायो रे जियरा, अचेत न होइ गंवारे । यहु तन है कागद की गुड़िया, कछु इक चेत विचारे ॥ 1 ॥ तिल तिल तुझको हानि होत है, जे पल राम बिसारे । भय भारी दादू के जिय में, कहु कैसे कर डारे ॥ 2 ॥ 26 (ख) पंजाबी त्रिताल जियरा काहे रे मूढ डोले ? वनवासी लाला पुकारे, तूँही तूँही कर बोले ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 साथ सवारी ले न गयो रे, चालण लागो बोले । तब जाइ जियरा जाणैगो रे, बाँधे ही कोई खोले ॥ 1 ॥ तिल तिल मांहैं चेत चली रे, पंथ हमारा तोले । गहिला दादू कछू न जाणै, राख ले मेरे मोले ॥ 2 ॥ 27. अबल वैराग्य । त्रिताल ता सुख को कहो का कीजै, जातैं पल पल यहु तन छीजै ॥ टेक ॥ आसन कुंजर सिर छत्र धरीजै, ताथैं फिरि फिरि दुःख सहीजै ॥ 1 ॥ सेज सँवार, सुन्दरी संग रमीजै, खाइ हलाहल भरम मरीजै ॥ 2 ॥ बहु विधि भोजन मान रुचि लीजै, स्वाद संकट भ्रम पाश परीजै ॥ 3 ॥ ये तज दादू प्राण पतीजै, सब सुख रसना राम रमीजै ॥ 4 ॥ 28. उपदेश । एकेताल मन निर्मल तन निर्मल भाई, आन उपाइ विकार न जाई ॥ टेक ॥ जो मन कोयला तो तन कारा, कोटि करै नहिं जाइ विकारा ॥ 1 ॥ जो मन विषहर तो तन भुवंगा, करै उपाइ विषय पुनि संगा ॥ 2 ॥ मन मैला तन उज्जवल नांहीं, बहु पचहारे विकार न जांहीं ॥ 3 ॥ मन निर्मल तन निर्मल होई, दादू साच विचारै कोई ॥ 4 ॥ 29. उपदेश चेतावनी । त्रिताल मैं मैं करत सबै जग जावै, अजहूँ अंध न चेते रे । यह दुनिया सब देख दिवानी, भूल गये हैं केते रे ॥ टेक ॥ मैं मेरे में भूल रहे रे, साजन सोइ विसारा । आया हीरा हाथ अमोलक, जन्म जुवा ज्यों हारा ॥ 1 ॥ लालच लोभैं लाग रहे रे, जानत मेरी मेरा । आपहि आप विचारत नाहीं, तूँ का को को तेरा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
आवत हैं सब जाता दीसैं, इनमें तेरा नाहीं । इन सौं लाग जन्म जनि खोवै, शोधि देख सचु मांहीं ॥ 3 ॥ निहचल सौं मन मानैं मेरा, साँई सौं बन आई । दादू एक तुम्हारा साजन, जिन यहु भुरकी लाई ॥ 4 ॥
३०. उपदेश चेतावनी । त्रिताल का जिवना का मरणा रे भाई, जो तैं राम न रमसि अघाई ॥ टेक ॥ का सुख संपत्ति छत्रपति राजा, वनखंड जाइ बसे किहिं काजा ॥ 1 ॥ का विद्या गुन पाठ पुराना, का मूरख जो तैं राम न जाना ॥ 2 ॥ का आसन कर अहर्निशि जागे, का फिर सोवत राम न लागे ॥ 3 ॥ का मुक्ता, का बंधे होई, दादू राम न जाना सोई ॥ 4 ॥
३१. मन प्रबोध । पंजाबी त्रिताल मन रे राम बिना तन छीजे । जब यहु जाइ मिलै माटी में, तब कहु कैसे कीजै ॥ टेक ॥ पारस परस कंचन कर लीजे, सहज सुरति सुखदाई । माया बेलि विषय फल लागे, ता पर भूल न भाई ॥ 1 ॥ जब लग प्राण पिंड है नीका, तब लग ताहि जनि भूलै । यहु संसार सेमल के सुख ज्यों, ता पर तूँ जनि फूलै ॥ 2 ॥ अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै । अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥ 3 ॥
३२. मृगोक्ति उपदेश। झपताल मोह्यो मृग देख वन अंधा, सूझत नहीं काल के फंधा ॥ टेक ॥ फूल्यो फिरत सकल वन मांही, सिर साधे शर सूझत नांही ॥ 1 ॥ उदमद मातो वन के ठाट, छाड़ चल्यो सब बारह बाट ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
फंध्यो न जानै वन के चाइ, दादू स्वाद बंधानो आइ ॥ ३ ॥ ३३. मन प्रति उपदेस निसारुक ताल काहे रे मन राम विसारै, मनखा जन्म जाय जिय हारै ॥ टेक॥ मात पिता को बन्धन भाई, सब ही सपना कहा सगाई ॥ १ ॥ तन धन जोबन झूठा जाणी, राम हृदय धर सारंग प्राणी ॥ २ ॥ चंचल चितवत झूठी माया, काहे न चेतै सो दिन आया ॥ ३ ॥ दादू तन मन झूठा कहिये, राम चरण गह काहे न रहिये ॥ ४ ॥ ३४. मनुष्य देह महात्म्य । झपताल ऐसा जनम अमोलिक भाई, जामें आइ मिलै राम राई ॥ टेक॥ जामें प्राण प्रेम रस पीवै, सदा सुहाग सेज सुख जीवै ॥ १ ॥ आत्मा आइ राम सौं राती, अखिल अमर धन पावै थाती ॥ २ ॥ प्रकट दर्शन परसन पावै, परम पुरुष मिलि मांहि समावै ॥ ३ ॥ ऐसा जन्म नहीं नर आवै, सो क्यों दादू रतन गँवावै ॥ ४ ॥ ३५. परिचय सत्संग । दीपचन्दी ताल सत्संगति मगन पाइये, गुरु प्रसादैं राम गाइये ॥ टेक॥ आकाश धरणी धरीजे, धरणी आकाश कीजे, शून्य माहिं निरख लीजे ॥ १ ॥ निरख मुक्ताहल मांहैं साइर आयो, अपने पिया हौं ध्यावत खोजत पायौ ॥ २ ॥ सोच साइर अगोचर लहिये, देव देहुरे मांही कवन कहिये ॥ ३ ॥ हरि को हितार्थ ऐसो लखै न कोई, दादू जे पीव पावै अमर होई ॥ ४ ॥ ३६. उपदेश चेतावनी । एकताल कौण जनम कहँ जाता है, अरे भाई, राम छाड़ि कहाँ राता है ॥ टेक॥ मैं मैं मेरी इन सौं लाग, स्वाद पतंग न सूझै आग ॥ १ ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 विषया सौं रत गर्व गुमान, कुंजर काम बँधे अभिमान ॥ 2 ॥ लोभ मोह मद माया फंध, ज्यों जल मीन न चेतै अंध ॥ 3 ॥ दादू यहु तन यों ही जाइ, राम विमुख मर गये विलाइ ॥ 4 ॥ 37 एकताल मन मूरखा, तैं क्या किया ? कुछ पीव कारण वैराग न लिया, रे तैं जप तप साधी क्या दिया ॥ टेक ॥ रे तैं करवत काशी कद सह्या, रे तूँ गंगा माहीं न बह्या, रे तैं विरहनी ज्यों दुख ना सह्या ॥ 1 ॥ रे तैं पालै पर्वत ना गल्या, रे तैं आप ही आपा ना दह्या, रे तैं पीव पुकारी कद कह्या ॥ 2 ॥ होइ प्यासे हरि जल ना पिया, रे तूँ वज्र न फाटो रे हिया। धिक् जीवन दादू ये जिया ॥ 3 ॥ ३४. यतिताल क्या कीजै मनिखा जन्म को, राम न जपहि गँवारा रे ? माया के मद मातो बहे, भूल रह्या संसारा रे ॥ टेक ॥ हिरदै राम न आवई, आवै विषय विकारा रे। हरि मारग सूझै नहीं, कूप परत नहीं बारा रे ॥ 1 ॥ आपा अग्नि जु आप में, तातैं अहिनिशि जरै शरीरा रे। भाव भक्ति भावै नहीं, पीवै न हरि जल नीरा रे ॥ 2 ॥ मैं मेरी सब सूझई, सूझै माया जालो रे। राम नाम सूझै नहीं, अंध न सूझै कालो रे ॥ 3 ॥ ऐसैं ही जन्म गमाइया, जित आया तित जाये रे। राम रसायन ना पिया, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1
३९. परिचय वैराग्य । दादरा इनमें क्या लीजे क्या दीजे, जन्म अमोलक छीजे ॥ टेक ॥ सोवत सुपिना होई, जागे थैं नहिं कोई ॥ 1 ॥ मृगतृष्णा जल जैसा, चेत देख जग ऐसा ॥ 2 ॥ बाजी भरम दिखावा, बाजीगर दहकावा ॥ 3 ॥ दादू संगी तेरा, कोई नहीं किस केरा ॥ 4 ॥ ५०. चेतावनी उपदेश । सिंह लील ताल खालिक जागे जियरा सोवे, क्यों कर मेला होवे ॥ टेक ॥ सेज एक नहिं मेला, तातैं प्रेम न खेला ॥ 1 ॥ साँई संग न पावा, सोवत जनम गमावा ॥ 2 ॥ गाफिल नींद न कीजे, आयु घटे तन छीजे ॥ 3 ॥ दादू जीव अयाना, झूठे भरम भुलानां ॥ 4 ॥ अथ राग जंगली गौड़ी ५1. पहरा (पंजाबी भाषा)। कहरवा ताल (बाल्यावस्था) पहले पहरे रैणि दे, बणिजारिया, तूँ आया इहि संसार वे । मायादा रस पीवण लग्गा, बिसाऱ्या सिरजनहार वे । सिरजनहार बिसारा किया पसारा, मात पिता कुल नार वे । झूठी माया आप बँधाया, चेतै नहीं गँवार वे । दादू दास कहै, बणिजारा, तूँ आया इहि संसार वे ॥ 1 ॥ (तरुण अवस्था) दूजे पहरै रैणि दे, बणिजारिया, तूँ रत्ता तरुणी नाल वे । माया मोह फिरै मतवाला, राम न सक्या संभाल वे । राम न संभाले, रत्ता नाले, अंध न सूझै काल वे । हरि नहीं ध्याया, जन्म गँवाया, दह दिशि फूटा ताल वे ।
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