देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
| ८२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| ददौ च दानं किल याचकेभ्यो गीतानि वाद्यानि बहूनि नेदुः।<br>कृत्वोत्सवं भूपतिरात्मजस्य नामैकवीरेति चकार विश्रुतम्॥ ५२<br>सुखं च सम्प्राप्य मुदान्वितोऽसौ ननन्द देवाधिपतुल्यवीर्यः।<br>पुत्रं हरे रूपगुणानुरूपं सम्प्राप्य वंशस्य ऋणाच्च मुक्तः॥ ५३ | राजाने याचकोंको दान दिया। इस अवसरपर गीत गाये गये तथा अनेक वाद्य बजाये गये। सम्यक् उत्सव करके राजाने अपने पुत्रका 'एकवीर'—यह प्रसिद्ध नाम रखा। वे सुख पाकर बहुत प्रसन्न हुए तथा आनन्दित हुए। इन्द्रके समान पराक्रमशाली राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुके सदृश रूपवान् तथा गुणी पुत्र पाकर वंशऋण (पितृऋण)-से मुक्त हो गये॥ ५२-५३॥ | | इति सकलसुराणामीश्वरेणार्पितं तं सकलगुणगणाढ्यं पुत्रमासाद्य राजा।<br>विविधसुखविनोदैर्भार्यया सेव्यमानो व्यहरत निजगेहे शक्रतुल्यप्रतापः॥ ५४ | इस प्रकार समस्त देवताओंके अधिपति भगवान् विष्णुके द्वारा अर्पित किये गये उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको प्राप्त करके इन्द्रके समान प्रतापी राजा हरिवर्मा अपनी भार्याके साथ नानाविध सुख भोगते हुए तथा विनोद करते हुए अपने महलमें रहने लगे॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
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अथैकविंशोऽध्यायः
आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा
| व्यास उवाच<br>जातकर्मादिसंस्कारांश्चकार नृपतिस्तदा।<br>दिने दिने जगामाशु वृद्धिं बालः सुलालितः॥ १ | व्यासजी बोले—हे राजन्! तत्पश्चात् राजा हरिवर्माने बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। भलीभाँति पालित-पोषित होनेके कारण वह बालक दिनोदिन शीघ्रतासे बढ़ने लगा॥ १॥ |
|---|---|
| नृपः संसारजं प्राप्य सुखं पुत्रसमुद्भवम्।<br>ऋणत्रयविमोक्षं च मेने तेन महात्मना॥ २ | इस प्रकार पुत्रजनित सांसारिक सुख प्राप्त करके उन महात्मा नरेशने अपनेको अब तीनों ऋणोंसे मुक्त मान लिया॥ २॥ |
| षष्ठेऽन्नप्राशनं तस्य कृत्वा मासि यथाविधि।<br>तृतीयेऽथ तथा वर्षे चूडाकरणमुत्तमम्॥ ३<br>चकार ब्राह्मणान् द्रव्यैः सम्पूज्य विविधैर्धनैः।<br>गोभिश्च विविधैर्दानैर्योचकानितरानपि॥ ४ | राजा हरिवर्माने छठें महीनेमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करके तीसरे वर्षमें शुभ मुण्डन-संस्कार विधि-विधानके साथ सम्पन्न किया। इनमें ब्राह्मणोंकी सम्यक् पूजा करके उन्हें विविध धन-द्रव्यों तथा गौओंका दान किया गया और अन्य याचकोंको भी नानाविध दान दिये॥ ३-४॥ |
| वर्षे चैकादशे तस्य मौञ्जीबन्धनकर्म वै।<br>कारयित्वा धनुर्वेदमध्यापयत पार्थिवः॥ ५ | ग्यारहवें वर्षमें उस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार कराकर राजाने उसको धनुर्वेद पढ़वाया॥ ५॥ |
| अधीतवेदं पुत्रं तं राजधर्मविशारदम्।<br>दृष्ट्वा तस्याभिषेकाय मतिं चक्रे जनाधिपः॥ ६ | राजा हरिवर्माने उस पुत्रको धनुर्वेद तथा राजधर्ममें पूर्ण निष्णात हुआ देखकर उसका राज्याभिषेक करनेका निश्चय किया॥ ६॥ |
| अ० २१ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्यार्कयोगसंयुक्ते दिवसे नृपसत्तमः ।<br>कारयामास सम्भारानभिषेकार्थमादरात् ॥ ७ | तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाने पुष्यार्क-योगसे युक्त शुभ दिनमें बड़े आदरके साथ अभिषेकहेतु सभी सामग्रियाँ एकत्र करवायीं ॥ ७ ॥ |
| द्विजानाहूय वेदज्ञान् सर्वशास्त्रविचक्षणान् ।<br>अभिषेकं चकारासौ विधिवत् स्वात्मजस्य ह ॥ ८<br><br>जलमानीय तीर्थेभ्यः सागरेभ्यश्च पार्थिवः ।<br>स्वयं चकार विधिवदभिषेकं शुभे दिने ॥ ९ | सभी शास्त्रोंमें पूर्ण पारंगत तथा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने विधिवत् अपने पुत्रका अभिषेक सम्पन्न किया। सभी तीर्थों तथा समुद्रोंसे जल मँगाकर राजाने शुभ दिनमें पुत्रका स्वयं अभिषेक किया ॥ ८-९ ॥ |
| धनं दत्त्वाथ विप्रेभ्यो राज्यं पुत्रे निवेश्य सः ।<br>जगाम वनमेवाशु स्वर्गकामः स भूपतिः ॥ १० | तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको धन देकर तथा पुत्रको राज्य सौंपकर उन राजा हरिवर्माने स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे वनके लिये शीघ्र ही प्रस्थान किया ॥ १० ॥ |
| एकवीरं नृपं कृत्वा सम्मान्य सचिवानथ ।<br>भार्यया सह भूपालः प्रविवेश वनं वशी ॥ ११ | इस प्रकार एकवीरको राजा बनाकर तथा योग्य मन्त्रियोंको नियुक्तकर इन्द्रियजित् राजा हरिवर्माने अपनी भार्याके साथ वनमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥ |
| मैनाकशिखरे राजा कृत्वा तार्तीयमाश्रमम् ।<br>नित्यं पत्रफलाहारश्चिन्तयामास पार्वतीम् ॥ १२ | मैनाकपर्वतके शिखरपर तृतीय आश्रम (वानप्रस्थ)-का आश्रय लेकर वे राजा प्रतिदिन वनके पत्तों तथा फलोंका आहार करते हुए भगवती पार्वतीकी आराधना करने लगे ॥ १२ ॥ |
| एवं स नृपतिः कृत्वा दिष्टान्ते सह भार्यया ।<br>मृतोऽसौ वासवं लोकं गतः पुण्येन कर्मणा ॥ १३ | इस प्रकार अपनी भार्याके साथ वानप्रस्थ-आश्रमका पालन करके वे राजा प्रारब्ध कर्मके समाप्त हो जानेपर मृत्युको प्राप्त हुए और अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोक चले गये ॥ १३ ॥ |
| इन्द्रलोकं पिता प्राप्त इति श्रुत्वाथ हैहयः ।<br>चकार वेदनिर्दिष्टं कर्म चैवौर्ध्वदैहिकम् ॥ १४ | पिता इन्द्रलोक चले गये—ऐसा सुनकर हैहय एकवीरने वैदिक विधानके अनुसार उनका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न किया ॥ १४ ॥ |
| कृत्वोत्तराः क्रियाः सर्वाः पितुः पार्थिवनन्दनः ।<br>राज्यं चकार मेधावी पित्रा दत्तं सुसम्मतम् ॥ १५ | पिताकी सभी श्राद्ध आदि क्रियाएँ सम्पन्न करके सबकी सहमतिसे पिताद्वारा दिये गये राज्यपर वह मेधावी राजकुमार एकवीर शासन करने लगा ॥ १५ ॥ |
| एकवीरोऽथ धर्मज्ञः प्राप्य राज्यमनुत्तमम् ।<br>बुभुजे विविधान् भोगान् सचिवैश्च समानितः ॥ १६ | उत्कृष्ट राज्य प्राप्त करके धर्मपरायण एकवीर सभी मन्त्रियोंसे सम्मानित रहते हुए अनेकविध सुखोंका उपभोग करने लगे ॥ १६ ॥ |
| एकस्मिन् दिवसे राजा मन्त्रिपुत्रैः समन्वितः ।<br>जगाम जाह्नवतीरे हयारूढः प्रतापवान् ॥ १७ | एक दिन प्रतापी राजा एकवीर मन्त्रियोंके पुत्रोंके साथ घोड़ेपर आरूढ़ होकर गंगाके तटपर गये। वहाँ |
| सम्पश्यन् पादपान् रम्यान् कोकिलालापसंयुतान् ।<br>पुष्पितान् फलसंयुक्तान् षट्पदालिविराजितान् ॥ १८ | उन्होंने कोकिलोंकी कूजसे गुंजित, भ्रमरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित तथा फलों-फूलोंसे लदे मनोहर वृक्षों; वेदपाठकी ध्वनिसे निनादित, हवनके धुएँसे आच्छादित आकाश-मण्डलवाले, मृगोंके छोटे शिशुओंसे आवृत |
| ८२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| मुनीनामाश्रमान् दिव्यान् वेदध्वनिनिनादितान्।<br>होमधूमावृताकाशान् मृगशावसमावृतान्॥ १९<br><br>केदाराञ्छालिसम्पक्वान् गोपिकाभिः सुरक्षितान्।<br>प्रफुल्लपङ्कजारामान्निनुकुञ्जांश्च मनोरमान्॥ २०<br><br>प्रेक्षमाणः प्रियालांस्तु चम्पकान् पनसद्रुमान्।<br>बकुलांस्तिलकान्नीपान् मन्दारांश्च प्रफुल्लितान्॥ २१<br><br>शालांस्तालांस्तमालांश्च जम्बूचूतकदम्वकान्।<br>स गच्छञ्जाह्नवीतोये प्रफुल्लं शतपत्रकम्॥ २२<br><br>पङ्कजं चातिगन्धाढ्यमपश्यदवनीपतिः।<br>दक्षिणे जलजस्याथ पार्श्वे कमललोचनाम्॥ २३<br><br>कनकाभां सुकेशीं च कम्बुग्रीवां कृशोदरीम्।<br>बिम्बोष्ठीं सुन्दरीं किञ्चित्समुद्गतसुपयोधराम्॥ २४<br><br>सुनासां चारुसर्वाङ्गीमपश्यत् कन्यकां नृपः।<br>रुदतीं तां सखीं त्यक्त्वा विह्वलां दुःखपीडिताम्॥ २५<br><br>साश्रुनेत्रां क्रन्दमानां विजने कुररीमिव।<br>संवीक्ष्य राजा पप्रच्छ कन्यकां शोककारणम्॥ २६ | दिव्य मुनि-आश्रमों; गोपिकाओंके द्वारा सुरक्षित तथा पके हुए शालिधान्यसे युक्त खेतों; विकसित कमलोंसे सुशोभित अनेक सरोवरों तथा मनको आकर्षित करनेवाले निकुंजोंको देखा। उन राजा एकवीरने प्रियाल, चम्पक, कटहल, बकुल, तिलक, नीप, पुष्पित मन्दार, शाल, ताल, तमाल, जामुन, आम और कदम्बके आदि वृक्षोंको देखते हुए कुछ दूर आगे जानेपर गंगाके जलमें उत्कृष्ट गन्धयुक्त एक खिला हुआ शतदल कमल देखा। राजाने उस कमलके दक्षिण भागमें कमलसदृश नेत्रोंवाली, स्वर्णके समान कान्तिवाली, सुन्दर केश-पाशवाली, शंखतुल्य गर्दनवाली, कृश कटिप्रदेशवाली, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, किंचित् स्फुट पयोधरवाली, मनोहर नासिकावाली तथा समस्त सुन्दर अंगोंवाली एक सुन्दरी कन्याको देखा। अपनी सखीसे बिछुड़ जानेसे व्याकुल होकर दुःखपूर्वक विलाप करती हुई, निर्जन वनमें आँखोंमें आँसू भरकर कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई उस कन्याको देखकर राजा एकवीरने उससे शोकका कारण पूछा॥ १७—२६॥ | | सुनसे ब्रूहि कासि त्वं कस्य पुत्री शुभानने।<br>गन्धर्वी देवकन्याथ कथं रोदिषि सुन्दरि॥ २७ | हे सुन्दर नासिकावाली! तुम कौन हो? हे सुमुखि! तुम किसकी पुत्री हो? तुम गन्धर्वकन्या हो अथवा देवकन्या? हे सुन्दरि! तुम क्यों रो रही हो? यह मुझे बताओ॥ २७॥ | | कथमेकाकिनी बाले त्यक्ता केन पिकस्वरे।<br>पतिस्ते क्व गतः कान्ते पिता वा ब्रूहि साम्प्रतम्॥ २८ | हे बाले! तुम यहाँ अकेली क्यों हो? हे पिकस्वरे! तुम्हें यहाँ किसने छोड़ दिया है? हे प्रिये! तुम्हारे पति अथवा पिता इस समय कहाँ चले गये हैं? मुझे बताओ॥ २८॥ | | किं ते दुःखमरालभ्रु कथयाद्य ममान्तिके।<br>करोमि दुःखनाशं ते सर्वथैव कृशोदरि॥ २९ | हे वक्र भौंहोंवाली! तुम्हें क्या दुःख है? उसे मेरे सामने अभी व्यक्त करो। हे कृशोदरि! मैं सब प्रकारसे तुम्हारा दुःख दूर करूँगा॥ २९॥ | | न राज्ये मम तन्वङ्गि पीडां कोऽपि करोत्यलम्।<br>न भयं चौरजं कान्ते न राक्षसभयं तथा॥ ३० | हे तन्वंगि! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी किसीको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता और हे कान्ते! कहीं न तो चोरोंका भय है और न राक्षसोंका ही भय है॥ ३०॥ | | मयि शासति भूपाले नोत्पाता दारुणा भुवि।<br>भयं न व्याघ्रसिंहेभ्यो न भयं कस्यचिद्द्भवेत्॥ ३१ | मुझ नरेशके शासन करते हुए इस पृथ्वीपर भीषण उत्पात नहीं हो सकते; बाघ अथवा सिंहसे किसीको भय नहीं हो सकता और किसीको कोई भी भय नहीं रहता॥ ३१॥ | | वद वामोरु कस्मात्त्वं विलापं जाह्नवीतटे।<br>करोषि त्राणहीनात्र किं ते दुःखं वदस्व मे॥ ३२ | हे वामोरु! असहाय होकर तुम गंगातटपर क्यों विलाप कर रही हो, तुम्हें क्या दुःख है? मुझे बताओ॥ ३२॥ |
अ० २१] षष्ठ स्कन्ध ८२७
अ० २१] षष्ठ स्कन्ध ८२७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| हन्त्यहं दुःखमत्युग्रं प्राणिनां पृथिवीतले।<br>दैवं च मानुषं कान्ते व्रतमेतन्ममाद्भुतम्॥ ३३<br>विशाललोचने ब्रूहि करोमि तव चिन्तितम्। | हे कान्ते! मैं जगत्के प्राणियोंके अत्यन्त भीषण दैविक तथा मानुषिक कष्टको भी दूर करता हूँ; यह मेरा अद्भुत व्रत है। हे विशालनयने! बताओ, मैं तुम्हारा वांछित कार्य करूँगा॥ ३३ ½ ॥ |
| इत्युक्ते वचने राज्ञा श्रुत्वोवाच मृदुस्वना॥ ३४<br>शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि मम शोकस्य कारणम्।<br>विपत्तिरहितः प्राणी कथं रोदिति भूपते॥ ३५<br>प्रब्रवीमि महाबाहो यदर्थं रुदती त्वहम्।<br>तव राज्यादन्यदेशे राजा परमधार्मिकः॥ ३६<br>रैभ्यो नाम महाराजः सन्तानरहितो भृशम्।<br>तस्य भार्या सुविख्याता रुक्मरेखेति नामतः॥ ३७<br>सुरूपा चतुरा साध्वी सर्वलक्षणसंयुता।<br>अपुत्रा दुःखिता कान्तमित्युवाच पुनः पुनः॥ ३८<br>किं जीवितेन मे नाथ धिग्वृथा जीवितं मम।<br>वन्ध्यायाः सुखहीनाया ह्यपुत्राया धरातले॥ ३९ | राजाके ऐसा कहनेपर उसे सुनकर मधुरभाषिणी कन्याने कहा—हे राजेन्द्र! सुनिये, मैं आपको अपने शोकका कारण बता रही हूँ। हे राजन्! विपदारहित प्राणी भला क्यों रोयेगा? हे महाबाहो! मैं जिसलिये रो रही हूँ, वह आपको बता रही हूँ। आपके राज्यसे भिन्न दूसरे देशमें रैभ्य नामक एक महान् धार्मिक राजा हैं, वे महाराज सन्तानहीन हैं, उनकी पत्नी रुक्मरेखा—इस नामसे प्रसिद्ध हैं। वे परम रूपवती, बुद्धिमती, पतिव्रता तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। पुत्रहीन होनेसे दुःखित रहनेके कारण वे अपने पतिसे बार-बार कहा करती थीं—हे नाथ! मेरे इस जीवनसे क्या लाभ? इस जगत्में मुझ वन्ध्या, पुत्रहीन तथा सुखरहित नारीके इस व्यर्थ जीवनको धिक्कार है॥ ३४—३९॥ |
| इत्येवं भार्यया भूपः प्रेरितो मखमुत्तमम्।<br>चकार ब्राह्मणांस्तज्ज्ञानाहूय विधिवत्तदा॥ ४० | इस प्रकार अपनी भार्यासे प्रेरणा पाकर राजा रैभ्यने यज्ञके ज्ञाता ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उत्तम यज्ञ सम्पन्न किया॥ ४०॥ |
| पुत्रकामो धनं भूरि ददावथ यथोदितम्।<br>हूयमाने घृतेऽत्यर्थं पावकादतिसुप्रभात्॥ ४१<br>आविर्बभूव चार्वङ्गी कन्यका शुभलक्षणा।<br>बिम्बोष्ठी सुदती सुभ्रूः पूर्णचन्द्रनिभानना॥ ४२<br>कनकाभा सुकेशान्ता रक्तपाणितला मृदुः।<br>सुरक्तनयना तन्वी रक्तपादतला भृशम्॥ ४३ | पुत्राभिलाषी राजा रैभ्यने शास्त्रोक्त रीतिसे प्रचुर धन दान दिया। घृतकी आहुति अधिक पड़ते रहनेसे तीव्र प्रभायुक्त अग्निसे सुन्दर अंगोंवाली, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, सुन्दर दाँतों तथा भौंहोंवाली, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, स्वर्णके समान आभावाली, सुन्दर केशोंवाली, रक्त हथेलियोंवाली, कोमल, सुन्दर लाल नेत्रोंवाली, कृश शरीरवाली तथा रक्त पादतल [तलवे]-वाली एक कन्या प्रकट हुई॥ ४१—४३॥ |
| हुताशनात्समुद्भूता होत्रा सा स्वीकृता तदा।<br>होता प्रोवाच राजानं गृहीत्वा तां सुमध्यमाम्॥ ४४<br>राजन् पुत्रीं गृहाणेमां सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>एकावलीव सम्भूता हूयमानाद्धुताशनात्॥ ४५ | तब होताने अग्निसे उत्पन्न हुई उस कन्याको स्वीकार कर लिया। इसके बाद उस सुन्दर कन्याको लेकर होताने राजा रैभ्यसे कहा—हे राजन्! समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न इस पुत्रीको ग्रहण कीजिये। हवन करते समय अग्निसे उत्पन्न यह कन्या मोतियोंकी मालाके समान प्रतीत होती है। अतः हे राजन्! यह |
| ८२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| नाम्ना चैकावली लोके ख्याता पुत्री भविष्यति।<br>सुखितो भव भूपाल पुत्र्या पुत्रसमानया॥ ४६<br><br>सन्तोषं कुरु राजेन्द्र दत्ता देवेन विष्णुना।<br>होतुर्वाक्यं नृपः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कन्यकां शुभाम्॥ ४७<br><br>जग्राह परमप्रीतो होत्रा दत्तां सुसम्मताम्।<br>गृहीत्वा नृपतिस्तां तु ददौ पत्न्यै वराननाम्॥ ४८<br><br>आभाष्य रुक्मरेखायै गृहाण सुभगे सुताम्।<br>सा तां कमलपत्राक्षीं प्राप्य कन्यां मनोरमाम्॥ ४९<br><br>जहर्ष मुदिता राज्ञी पुत्रं प्राप्य यथासुखम्।<br>चकार मङ्गलं कर्म जातकर्मादिकं शुभम्॥ ५०<br><br>पुत्रजन्मसमुत्थं यत्तत्सर्वं विधिवत्ततः।<br>समाप्य च मखं राजा द्विजेभ्यो दक्षिणां शुभाम्॥ ५१<br><br>दत्त्वा विसृज्य विप्रेन्द्रान् मुदं प्राप महीपतिः।<br>दिने दिनेऽसितापाङ्गी पुत्रवृद्ध्या भृशं बभौ॥ ५२<br><br>मुदं च परमां प्राप नृपभार्या सुतान्विता।<br>उत्सवस्तद्दिने तस्य प्रवृत्तः सुतजन्मजः॥ ५३<br><br>पुत्री पुत्रसमात्यर्थं बभूव वल्लभा किल।<br>राज्ञो मन्त्रिसुता चाहं सुबुद्धे मन्मथाकृते॥ ५४<br><br>यशोवती च मे नाम समानं वय आवयोः।<br>वयस्याहं कृता राज्ञा क्रीडनाय तया सह॥ ५५<br><br>सदा सहचरी जाता प्रेमयुक्ता दिवानिशम्।<br>एकावली गन्धवन्ति यत्र पद्मानि पश्यति॥ ५६<br><br>तत्र सा रमते बाला नान्यत्र सुखमाप्नुयात्।<br>सुदूरे जाह्नवतीरे भवन्ति कमलान्यपि॥ ५७ | पुत्री जगत्में 'एकावली' नामसे प्रसिद्ध होगी। पुत्रतुल्य इस कन्याको प्राप्तकर आप सुखी हो जायें। हे राजेन्द्र! सन्तोष कीजिये; भगवान् विष्णुने आपको यह कन्या दी है॥ ४४–४६ १/२॥<br><br>होताकी बात सुनकर राजाने उस सुन्दर कन्याकी ओर देखकर होताके द्वारा प्रदत्त उस कन्याको अति प्रसन्न होकर ले लिया। राजाने सुन्दर मुखवाली उस कन्याको ले करके अपनी पत्नी रुक्मरेखाको यह कहकर दे दिया कि हे सुभगे! इस कन्याको स्वीकार करो। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस मनोहर कन्याको पाकर रानी बहुत हर्षित हुईं; वे ऐसी सुखी हो गयीं मानो उन्हें पुत्र प्राप्त हो गया हो॥ ४७–४९ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् राजाने उसके जातकर्म आदि सभी शुभ मंगल कार्य सम्पन्न किये तथा पुत्रजन्मके अवसरपर होनेवाले जो कुछ भी कार्य थे, वे सब उन्होंने विधिपूर्वक सम्पन्न कराये। यज्ञ सम्पन्न करके राजा रैभ्य ब्राह्मणोंको विपुल दक्षिणा देकर तथा सभी विप्रेन्द्रोंको विदाकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ५०–५१ १/२॥<br><br>श्याम नेत्रोंवाली वह कन्या पुत्रवृद्धिके समान दिनोंदिन बढ़ने लगी। उसे देखकर उस समय रानी अपनेको पुत्रवती समझकर परम आनन्दित हुई। उस दिन महलमें ऐसा उत्सव मनाया गया, जैसा पुत्रजन्मके अवसरपर मनाया जाता है। वह पुत्री उन दोनोंके लिये पुत्रके ही सदृश प्रिय हो गयी॥ ५२–५३ १/२॥<br><br>हे सुबुद्धे! हे कामदेवसदृश रूपवाले! मैं उन्हीं राजा रैभ्यके मन्त्रीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम यशोवती है। मेरी तथा एकावलीकी अवस्था समान है। उसके साथ खेलनेके लिये राजाने मुझे उसकी सखी बना दिया। इस प्रकार मैं उसकी सहचरी बनकर प्रेमपूर्वक दिन-रात उसके साथ रहने लगी॥ ५४–५५ १/२॥<br><br>एकावली जहाँ भी सुगन्धित कमल देखती थी, वह बाला वहीं खेलने लग जाती थी; अन्यत्र कहीं भी उसे सुख नहीं मिलता था। [एक बार] गंगाके तटपर बहुत दूर कमल खिले हुए थे। राजकुमारी एकावली सखियोंसहित मेरे साथ घूमती हुई वहाँ |
| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२९ |
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| रममाणा तत्र याता मत्समेता सखीयुता।<br>मया निवेदितं राजन् पुत्री ते कमलाकरान् ॥ ५८<br><br>प्रेक्षमाणातिदूरे सा प्रयाति निर्जने वने।<br>निषेधिताथ पित्रासौ गृहे कृत्वा जलाशयान् ॥ ५९<br><br>कमलान् वापयित्वाथ पुष्पितान् भ्रमरावृतान्।<br>तथापि निर्ययौ बाला कमलासक्तचेतना ॥ ६०<br><br>तदा राज्ञा रक्षपालाः प्रेरिताः शस्त्रपाणयः।<br>एवं रक्षायुता तन्वी मत्समेता सखीयुता।<br>क्रीडार्थं जाह्नवीतोये नित्यमायाति याति च ॥ ६१ | चली गयी। [इससे चिन्तित होकर] मैंने महाराज रैभ्यसे कहा—हे राजन्! आपकी पुत्री एकावली कमलोंको देखती हुई बहुत दूर निर्जन वनमें चली जाती है। तब उसके पिताने घरपर ही अनेक जलाशयोंका निर्माण कराकर उनमें पुष्पित तथा भौंरोंसे आवृत्त कमल लगवाकर उसे दूर जानेसे मना कर दिया। इसपर भी मनमें कमलोंके प्रति आसक्ति रखनेवाली वह कन्या बाहर निकल जाती थी। तब राजाने उसके साथ हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए रक्षक नियुक्त कर दिये। इस प्रकार रक्षित होकर वह सुन्दरी मेरे तथा सखियोंसहित क्रीडाके लिये गङ्गातटपर प्रतिदिन आया-जाया करती थी॥ ५६—६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे राजपुत्र्या एकावल्या वर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना
| यशोवत्युवाच | यशोवती बोली— |
|---|---|
| प्रातरुत्थाय तन्वङ्गी चलिता च सखीयुता।<br>चामरैर्वीज्यमाना सा रक्षिता बहुरक्षिभिः॥ १<br><br>सायुधैश्चातिसन्नद्धैः सहिता वरवर्णिनी।<br>क्रीडार्थमत्र राजेन्द्र सम्प्राप्ता नलिनीं शुभाम्॥ २ | एक बार वह सुन्दरी एकावली प्रातःकाल उठकर अपनी सखियोंके साथ बाहर निकल पड़ी। वह बहुत-से रक्षकोंसे रक्षित थी तथा उसके ऊपर चँवर डुलाये जा रहे थे। हे राजेन्द्र! वह सुन्दरी यहाँ सुन्दर कमलोंके पास क्रीड़ा करनेके लिये आयी थी॥ १-२॥ |
| अहमप्यनया सार्धं गङ्गातीरे समागता।<br>अप्सरोभिः समेता च कमलैः क्रीडमानया॥ ३ | कमलोंसे खेलनेकी रुचिवाली इस कन्याके साथ मैं भी अप्सराओंसहित गङ्गाके तटपर आयी थी॥ ३॥ |
| एकावली तथा चाहं जाते क्रीडापरे यदा।<br>सहसैव तदायातो दानवो बलसंयुतः॥ ४<br><br>कालकेतुरिति ख्यातो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः।<br>परिघासिगदाचापबाणतोमरपाणिभिः ॥ ५ | जब मैं तथा एकावली दोनों खेलनेमें व्यस्त हो गयीं, उसी समय हाथोंमें परिघ, तलवार, गदा, धनुष, बाण तथा तोमर धारण किये हुए बहुत-से राक्षसोंके साथ कालकेतु नामक बलवान् दानव वहाँ अकस्मात् आ पहुँचा॥ ४-५॥ |
| दृष्टा चैकावली तेन रूपयौवनशालिनी।<br>द्वितीया कामपत्नीव क्रीडमाना सुपङ्कजैः॥ ६ | उसने कमलोंके साथ क्रीडा करती हुई उस रूप-यौवनसम्पन्न तथा दूसरी कामपत्नी रतिकी भाँति प्रतीत हो रही एकावलीको देख लिया॥ ६॥ |
| मयोक्तैकावली राजन् कोऽयं दैत्यः समागतः।<br>गच्छावो रक्षपालानां मध्ये पङ्कजलोचने॥ ७ | हे राजन्! मैंने एकावलीसे कहा—हे कमलनयने! यह कौन-सा दैत्य आ गया है! अब हम दोनों रक्षकोंके पास भाग चलें॥ ७॥ |
| ८३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विमृश्यैवं सखी चाहं त्वरयैव गते भयात्।<br>मध्ये वै सैनिकानां तु सायुधानां नृपात्मज॥ ८ | हे राजकुमार! इस प्रकार विचारविमर्श करके सखी एकावली तथा मैं भयभीत होनेके कारण शस्त्रधारी सैनिकोंके बीच तुरंत चली गयी॥ ८॥ |
| कालकेतुस्तु तां दृष्ट्वा मोहिनीं मदनातुरः।<br>गदां गुर्वीं गृहीत्वा तु धावमानः समागतः॥ ९<br><br>रक्षकान्दूरतः कृत्वा जग्राहाम्बुजलोचनाम्।<br>त्रस्तां वेपथुसंयुक्तां क्रन्दमानां कृशोदरीम्॥ १० | वह कामातुर कालकेतु उस मोहिनी एकावलीको देखकर अपनी विशाल गदा लेकर दौड़ता हुआ पासमें आ गया और उसने रक्षकोंको हटाकर डरके मारे काँपती तथा रोती हुई कृश कटिप्रदेशवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली एकावलीको पकड़ लिया॥ ९-१०॥ |
| त्यजैनां मां गृहाणेति मया चोक्तोऽपि दानवः।<br>न मां जग्राह कामार्तस्तां गृहीत्वा विनिःसृतः॥ ११ | ‘इस राजकुमारीको छोड़ दो और मुझे ग्रहण कर लो’—ऐसा मेरे कहनेपर भी उसने मुझे स्वीकार नहीं किया और कामके वशीभूत वह दानव एकावलीको लेकर वहाँसे निकल गया॥ ११॥ |
| तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो रक्षकास्तं महाबलम्।<br>प्रतिषिध्य तु संग्रामं चक्रुर्विस्मयकारकम्॥ १२ | रक्षकोंने ‘ठहरो-ठहरो’—ऐसा कहते हुए उस महाबलीको रोककर उसके साथ विस्मयकारक युद्ध किया॥ १२॥ |
| तस्यापि राक्षसाः क्रूराः सर्वतः शस्त्रपाणयः।<br>युयुधु रक्षकैः सार्धं स्वामिकार्ये कृतोद्यमाः॥ १३<br><br>संग्रामस्तु तदा जातः कालकेतोस्तथा रणे।<br>निहत्य रक्षकान्सर्वान्गृहीत्वैनां महाबलः॥ १४<br><br>युक्तो राक्षससैन्येन निर्जगाम पुरं प्रति।<br>वीक्ष्य तां रुदतीं बालां गृहीतां दानवेन तु॥ १५<br><br>पृष्ठतोऽहं गता तत्र यत्र नीता सखी मम।<br>विक्रोशन्ती यथा सा मां पश्येदिति पदानुगा॥ १६ | अपने स्वामीके कार्यमें पूर्ण तत्पर तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये उसके सभी क्रूर राक्षसों ने भी रक्षकोंके साथ भीषण युद्ध किया। तब उन रक्षकोंके साथ कालकेतुका संग्राम होने लगा। वह महाबली युद्धमें सभी रक्षकोंको मारकर तथा एकावलीको लेकर राक्षसी सेनाके साथ अपने नगरके लिये चल दिया। दानव कालकेतुके द्वारा अधिकारमें की गयी उस राजकुमारीको रोती हुई देखकर मैं उसके पीछे-पीछे वहीं पहुँच जाती थी, जहाँ कालकेतु मेरी सखीको लेकर जाता था जिससे कि रोती हुई वह मुझे अपने पीछे आते हुए देख ले॥ १३—१६॥ |
| सापि मामागतां वीक्ष्य किञ्चित्स्वस्थाभवत्तदा।<br>गताहं तत्समीपे तु तामाभाष्य पुनः पुनः॥ १७ | मुझे आयी हुई देखकर वह भी कुछ स्वस्थचित्त हुई तब मैं उसके पास जाकर उससे बार-बार बातें करने लगी॥ १७॥ |
| सा मां प्राप्यातिदुःखार्ता स्तम्भस्वेदसमाकुला।<br>कण्ठे गृहीत्वा मां भूप रुरोद भृशदुःखिता॥ १८ | हे राजन्! दुःखसे व्याकुल तथा पसीनेसे संसिक्त उस एकावलीने मुझे पकड़कर गलेसे लगा लिया और वह अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी॥ १८॥ |
| स मामाह कालकेतुः प्रीतिपूर्वमिदं वचः।<br>समाश्वासय भीतां त्वं सखीं चञ्चललोचनाम्॥ १९ | तत्पश्चात् उस कालकेतुने प्रेम प्रदर्शित करते हुए मुझसे यह बात कही कि चंचल नेत्रोंवाली अपनी इस भयग्रस्त सखीको धीरज बँधाओ और अपनी इस सखीसे [मेरी बात] कहो—‘हे प्रिये! देवलोकके समान अत्यन्त |
अ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१
अ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राप्तं ममाद्य नगरं देवलोकसमं प्रिये।<br>दासोऽस्मि तव रत्या हि कस्मात्क्रन्दसि कातरा ॥ २०<br><br>कथयैनां सखीं तेऽद्य स्वस्था भव सुलोचने।<br>इत्युक्त्वा मां सखीपार्श्वे समारोप्य रथोत्तमे ॥ २१<br><br>जगाम तरसा दुष्टः पुरे स्वस्य मनोहरे।<br>सैन्येन महता युक्तः प्रफुल्लवदनाम्बुजः ॥ २२ | सुन्दर मेरा नगर अब आ ही गया है। तुम्हारे प्रेमके कारण मैं तुम्हारा दास हो चुका हूँ। तुम भयभीत होकर क्यों विलाप कर रही हो? हे सुलोचने! अब शान्त हो जाओ'—ऐसा कहकर उसी उत्तम रथमें सखीके पास मुझे भी बैठाकर प्रसन्नताके कारण खिले हुए कमलके समान मुखवाला दुष्ट कालकेतु अपनी भारी सेनाके साथ अपने सुन्दर नगरके लिये शीघ्र ही चल दिया ॥ १९–२२ ॥ |
| एकावलीं तथा मां च संस्थाप्य धवले गृहे।<br>राक्षसान् गृहरक्षार्थं कल्पयामास कोटिशः ॥ २३ | वहाँ उस दानवने मुझे तथा एकावलीको एक दिव्य महलमें ठहराकर उस महलकी रक्षाके लिये करोड़ों राक्षस नियुक्त कर दिये ॥ २३ ॥ |
| द्वितीये दिवसे सोऽथ मामुवाच रहो नृप।<br>प्रबोधय सखीं बालां शोचन्तीं विरहातुराम् ॥ २४<br><br>पत्नी मे भव सुश्रोणि सुखं भुङ्क्ष्व यथेप्सितम्।<br>राज्यं त्वदीयं चन्द्रास्ये सेवकोऽहं सदा तव ॥ २५ | हे राजन्! दूसरे दिन उस कालकेतुने एकान्तमें मुझसे कहा—विरहसे दुःखित तथा शोक करती हुई अपनी सुन्दर सखीको [मेरे शब्दोंमें] समझाओ—'हे सुश्रोणि! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और फिर यथेच्छ सुखोपभोग करो। हे चन्द्रमुखि! अब यह राज्य तुम्हारा है और मैं सदाके लिये तुम्हारा सेवक बन गया हूँ' ॥ २४-२५ ॥ |
| पुनरुक्तं मया वाक्यं श्रुत्वा तद्भाषितं खरम्।<br>नाहं क्षमाप्रियं वक्तुं त्वमेनां कथय प्रभो ॥ २६ | उसका ऐसा दुर्वचन सुनकर मैंने उससे यह बात कही कि हे प्रभो! मैं ऐसा अप्रिय वाक्य नहीं कह सकती, अतः आप ही इससे कहिये ॥ २६ ॥ |
| इत्युक्ते वचने दुष्टो मदनक्षतमानसः।<br>उवाच विनयादेनां सखीं क्षामोदरीं प्रियाम् ॥ २७ | मेरे ऐसा कहनेपर कामसे आहत चित्तवाले उस दुष्ट दानवने कृश उदरवाली मेरी उस प्रिय सखीसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २७ ॥ |
| कृशोदरि त्वया मन्त्रो निक्षिप्तोऽस्ति ममोपरि।<br>तेन मे हृदयं कान्ते हृतं ते वशतां गतम् ॥ २८<br><br>तेनाहं तव दासोऽद्य कृतोऽस्मीति विनिश्चयः।<br>भज मां कामबाणेन पीडितं विवशं भृशम् ॥ २९<br><br>यौवनं याति रम्भोरु चञ्चलं दुर्लभं तदा।<br>सफलं कुरु कल्याणि पतिं मां परिरभ्य च ॥ ३० | हे कृशोदरि! तुमने मेरे ऊपर कोई मन्त्र-प्रयोग कर दिया है। हे कान्ते! उसीसे मोहित होकर मेरा मन तुम्हारे वशमें हो चुका है। उसी मन्त्रने मुझे अब तुम्हारा दास बना दिया है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये कामबाणसे आहत मुझ अत्यन्त विवशको अब तुम स्वीकार कर लो। हे रम्भोरु! तुम्हारा दुर्लभ तथा चंचल यौवन व्यर्थ जा रहा है। इसलिये हे कल्याणि! पतिभावसे मेरा आलिंगन करके इसे सफल कर लो ॥ २८–३० ॥ |
| एकावल्युवाच<br>पित्राहं कल्पिता पूर्वं दातुं राजसुताय वै।<br>हैहयस्तु महाभाग स मया मनसा वृतः ॥ ३१ | एकावली बोली—मेरे पिता राजकुमार हैहयको मुझे देनेका पहले ही निश्चय कर चुके हैं। मैंने भी उन महाभागका मनसे वरण कर लिया है ॥ ३१ ॥ |
| ८३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| कथमन्यं भजे कान्तं त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्।<br>कन्याधर्मं विहायाद्य वेत्सि शास्त्रविनिश्चयम् ॥ ३२<br><br>यस्मै दद्यात्पिता कामं कन्या तं पतिमाप्नुयात्।<br>परतन्त्रा सदा कन्या न स्वातन्त्र्यं कदाचन ॥ ३३ | सनातनधर्मका त्याग करके तथा कन्याधर्म छोड़कर मैं दूसरेको पतिरूपमें कैसे स्वीकार करूँ ? आप भी तो शास्त्रीय नियमको जानते ही हैं। पिता कन्याको जिसे सौंप दे, कन्या उसीको पति बना ले। कन्या इस विषयमें सदा पराधीन रहती है, उसे स्वतन्त्रता कभी नहीं रहती ॥ ३२-३३ ॥ |
| इत्युक्तोऽपि तया पापी विरराम न मोहितः।<br>न मुमोच विशालाक्षीं मां च पार्श्वस्थितां तथा ॥ ३४ | [हे राजकुमार !] उस एकावलीके ऐसा कहनेपर भी वह पापात्मा कालकेतु राजकुमारीपर मोहित रहनेके कारण अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और उसने विशाल नेत्रोंवाली एकावलीको तथा उसके पासमें स्थित मुझको नहीं छोड़ा ॥ ३४ ॥ |
| पातालविवरे तस्य पुरं परमसङ्कटे।<br>राक्षसै रक्षितं दुर्गं मण्डितं परिखावृतम् ॥ ३५<br><br>तत्र तिष्ठति दुःखार्ता सखी मे प्राणवल्लभा।<br>तेनाहं विरहेणात्र ररटीमि सुदुःखिता ॥ ३६ | उस कालकेतुका नगर अनेक प्रकारके संकटोंसे युक्त एक पाताल-विवरमें विद्यमान है। वहींपर चारों ओर खाइयोंसे घिरा हुआ तथा राक्षसोंसे पूर्णतया रक्षित उसका सुन्दर दुर्ग है। मेरी प्राणप्यारी सखी एकावली वहींपर दुःखके साथ पड़ी हुई है। इसलिये उसके विरहसे अत्यन्त व्यथित होकर मैं यहाँ विलाप कर रही हूँ ॥ ३५-३६ ॥ |
| एकवीर उवाच<br>कथं त्वमत्र सम्प्राप्ता पुरातत्तस्य दुरात्मनः।<br>विस्मयो मे महानत्र तत्त्वं ब्रूहि वरानने ॥ ३७ | एकवीरने कहा—हे वरानने! उस दुष्टात्मा कालकेतुके नगरसे तुम यहाँ कैसे आ गयी ? इस बातसे मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हूँ; तुम मुझसे इस विषयमें बताओ ॥ ३७ ॥ |
| त्वया च कथितं वाक्यं सन्दिग्धं भाति भामिनि।<br>हैहयार्थे कल्पिता सा पित्रेति मम साम्प्रतम् ॥ ३८<br><br>हैहयो नाम राजाहं नान्योऽस्ति पृथिवीपतिः।<br>मदर्थे कथिता सा किं सखी तव सुलोचना ॥ ३९ | हे भामिनि! अभी तुमने जो कहा है कि एकावलीके पिताने उसका विवाह हैहयके साथ करनेका निश्चय किया है, वह बात मुझे अत्यन्त सन्देहास्पद प्रतीत हो रही है। हैहय नामका राजा मैं ही हूँ; अन्य कोई राजा नहीं है। सुन्दर नेत्रोंवाली वह तुम्हारी सखी अपने पिताके द्वारा कहीं मेरे लिये ही तो कल्पित नहीं की गयी है ? ॥ ३८-३९ ॥ |
| एतन्मे संशयं सुभ्रु छेत्तुमर्हसि भामिनि।<br>अहं तामानयिष्यामि तं हत्वा राक्षसाधमम् ॥ ४०<br><br>स्थानं दर्शय मे तस्य यदि जानासि सुव्रते।<br>राज्ञे निवेदितं किं वा तत्पित्रे चातिदुःखिता ॥ ४१ | हे सुभ्रु! हे भामिनि! तुम मेरे इस सन्देहको दूर करो। मैं उस अधम राक्षसका वध करके उस एकावलीको ले आऊँगा। हे सुव्रते! यदि तुम उस राक्षसका स्थान जानती हो तो वह स्थान मुझे दिखा दो। उसके पिता राजा रैभ्यको तुमने यह बताया अथवा नहीं कि वह अत्यन्त दुःखित है ॥ ४०-४१ ॥ |
| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्यैषा वल्लभा पुत्री न किं जानाति तां हृताम्।<br>नोद्यमः किं कृतस्तेन ततो मोचनहेतवे॥ ४२ | जिसकी ऐसी प्रिय पुत्री हो, क्या वह उसके हरणको नहीं जानता? और फिर उसने एकावलीकी मुक्तिके लिये क्या कोई प्रयास नहीं किया? ॥ ४२॥ |
| बन्दीकृतां सुतां ज्ञात्वा कथं तिष्ठति सुस्थिरः।<br>असमर्थो नृपः किं वा कारणं ब्रूहि सत्वरम्॥ ४३ | अपनी पुत्रीको बन्दी बनाया गया जाननेके बाद भी राजा स्थिरचित्त होकर कैसे चुप बैठे हैं? अथवा राजा कुछ कर पानेमें असमर्थ तो नहीं हैं? मुझे इसका कारण शीघ्र बताओ॥ ४३॥ |
| त्वया मेऽपहृतं चेतो गुणानुक्त्वा ह्यमानुषान्।<br>सख्याः पङ्कजपत्राक्षि कृतः कामवशो भृशम्॥ ४४ | हे कमलनयने! तुमने अपनी सखीके अलौकिक गुणोंको बताकर मेरे चित्तको हर लिया है तथा मैं पूर्ण-रूपसे कामके वशीभूत कर दिया गया हूँ॥ ४४॥ |
| कदा पश्यामि तां कान्तां मोचयित्वातिसङ्कटात्।<br>इति मे हृदयं चाद्य करोत्यतिमनोरथम्॥ ४५ | अब तो मेरे मनकी यही अभिलाषा है कि उस प्रियाको इस महान् संकटसे मुक्त करके मैं उसे कब देख लूँ॥ ४५॥ |
| ब्रूहि मे गमनोपायं पुरे तस्यातिदुर्गमे।<br>कथं त्वमागता तस्मात्सङ्कटादत्र तद्वद॥ ४६ | अब उस दानवके अत्यन्त दुर्गम नगरमें जानेका उपाय मुझे बताओ और यह भी बताओ कि उस महान् संकटसे छूटकर तुम यहाँ कैसे आयी? ॥ ४६॥ |
| यशोवत्युवाच<br>बालभावान्मया मन्त्रो भगवत्या विशांपते।<br>प्राप्तोऽस्ति ब्राह्मणात्सिद्धात्सबीजध्यानपूर्वकः॥ ४७ | यशोवती बोली—हे राजन्! मैंने बाल्यावस्थासे ही एक सिद्ध ब्राह्मणसे बीज तथा ध्यानसहित भगवतीका मन्त्र प्राप्त किया है॥ ४७॥ |
| तत्रावस्थितया राजन् मया चित्ते विचारितम्।<br>आराधयामि सततं चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ ४८<br><br>सा देवी सेविता कामं बन्धमोक्षं करिष्यति।<br>भक्तानुकम्पिनी शक्तिः समर्था सर्वसाधने॥ ४९<br><br>या विश्वं सृजते शक्त्या पालयत्येव सा पुनः।<br>कल्पान्ते संहरत्येव निराकारा निराश्रया॥ ५०<br><br>इति सञ्चिन्त्य मनसा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्।<br>ध्यात्वा रक्ताम्बरां सौम्यां सुरक्तनयनां हृदि॥ ५१<br><br>संस्मृत्य मनसा रूपं मन्त्रजाप्यपराभवम्।<br>उपासिता मया देवी मासमेकं समाधिना॥ ५२ | हे राजन्! जब मैं कालकेतुके यहाँ थी तभी मैंने अपने मनमें सोचा कि अब मैं प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिकाकी निरन्तर आराधना करूँ। वे भगवती पूर्णरूपसे आराधित होनेपर निश्चितरूपसे मुझे इस बन्धनसे मुक्त करेंगी; क्योंकि भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाली वे शक्तिस्वरूपा चण्डिका सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो निराकार तथा निरालम्ब भगवती अपनी शक्तिसे जगत्का सृजन करती हैं तथा पालन करती हैं, वे ही कल्पके अन्तमें उसका संहार भी कर देती हैं। मनमें ऐसा सोचकर मैं विश्वकी अधिष्ठात्री, कल्याणकारिणी, लाल वस्त्र धारण करनेवाली, सौम्य विग्रहवाली तथा सुन्दर रक्त नयनोंवाली भगवतीका ध्यान करके मन-ही-मन उनके रूपका स्मरण करके मन्त्रका जप करनेमें तत्पर हो गयी। इस प्रकार मैं समाधि लगाकर एक माहतक भगवती जगदम्बाकी उपासना करती रही॥ ४८–५२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 A
| ८३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| स्वप्ने मम समायाता भक्तिभावेन तोषिता।<br>मामाहामृतया वाचा किं सुप्तासीति चण्डिका॥ ५३<br><br>उत्तिष्ठ याहि तरसा गङ्गातीरं मनोहरम्।<br>आगमिष्यति तत्रासौ हैहयो नृपपुङ्गवः॥ ५४<br><br>एकवीरो महाबाहुः सर्वशत्रुविमर्दनः।<br>दत्तात्रेयेण मन्मन्त्रो महाविद्याभिधः परः॥ ५५<br><br>दत्तोऽस्मै सोऽपि सततं मामुपास्तेऽतिभक्तितः।<br>मय्यासक्तमतिर्नित्यं मम पूजापरायणः॥ ५६<br><br>मामेव सर्वभूतेषु ध्यायन्नास्ते च मत्परः।<br>स ते दुःखविनाशं वै करिष्यति महामतिः॥ ५७<br><br>मासुतो विहरंस्तत्र तव त्राता भविष्यति।<br>हत्वा तं राक्षसं घोरं मोचयिष्यति मानिनीम्॥ ५८<br><br>एकावलीमेकवीरः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>पश्चात्सैव पतिः कार्यस्त्वया राजसुतः शुभः॥ ५९ | तत्पश्चात् मेरे भक्तिभावसे प्रसन्न होकर देवी चण्डिकाने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया और अमृतमयी वाणीमें मुझसे कहा—‘तुम सोयी क्यों हो? उठो और तत्काल गङ्गाजीके मनोहर तटपर चली जाओ; वहींपर विशाल भुजाओंवाले तथा सभी शत्रुओंका दमन करनेवाले नृपश्रेष्ठ हैहय एकवीर आयेंगे। दत्तात्रेयजीने महाविद्या नामक मेरा श्रेष्ठ मन्त्र उन्हें प्रदान किया है। वे भी भक्तिपूर्वक निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं। उनका मन सदा मुझमें लगा रहता है तथा वे सदा मेरी पूजामें रत रहते हैं। मेरे प्रति आसक्तिभाव रखनेवाले वे सभी प्राणियोंमें एकमात्र मुझे ही देखते हुए सदा मेरे ही परायण रहते हैं। वे महामति एकवीर ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे। वे लक्ष्मीपुत्र एकवीर घूमते हुए गङ्गातटपर आकर तुम्हारी रक्षा करेंगे और उस भयानक राक्षस कालकेतुका वध करके मानिनी एकावलीको मुक्त करेंगे। इसके बाद तुम समस्त शास्त्रोंमें निष्णात उन्हीं सुन्दर राजकुमार एकवीरके साथ एकावलीका विवाह करवा देना’॥ ५३-५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी प्रबुद्धाहं तदैव हि।<br>कथितं स्वप्नवृत्तान्तं देव्याश्चाराधनं तथा॥ ६० | ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और मैं उसी समय जग गयी। तत्पश्चात् मैंने स्वप्नका वृत्तान्त तथा देवीकी आराधनाकी बात एकावलीको बतायी॥ ६०॥ |
| प्रसन्नवदना जाता श्रुत्वा सा कमलेक्षणा।<br>विशेषेण च सन्तुष्टा मामुवाच शुचिस्मिता॥ ६१<br><br>गच्छ तत्र त्वरायुक्ता कुरु कार्यं मम प्रिये।<br>सत्यवाक्या भगवती सावां मोक्षं विधास्यति॥ ६२ | सारी बातें सुनकर उस कमलनयनीके मुख-मण्डलपर प्रसन्नता छा गयी। अत्यन्त सन्तुष्ट होकर पवित्र मुसकानवाली एकावलीने मुझसे कहा—हे प्रिये! तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो। जो भगवती सत्य वाणीवाली हैं, वे हम दोनोंको मुक्त करेंगी॥ ६१-६२॥ |
| इत्याज्ञप्ता तया चाहं सख्या वै प्रेमयुक्तया।<br>मत्वोपसरणं युक्तं तस्मात्स्थानात्तदा नृप॥ ६३<br><br>चालिताहं ततः शीघ्रं महादेवीप्रसादतः।<br>मार्गज्ञानं शीघ्रगतिर्मया प्राप्ता नृपात्मज॥ ६४ | हे राजन्! सखी एकावलीके इस प्रकार प्रेमपूर्वक आदेश देनेपर उस समय प्रस्थान कर देना उचित समझकर मैं उस स्थानसे तुरंत चल पड़ी। हे राजकुमार! भगवती जगदम्बाकी कृपासे मार्गकी जानकारी तथा द्रुतगतिसे चलनेकी क्षमता मुझे प्राप्त हो गयी थी॥ ६३-६४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 B
| अ० २३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३५ |
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| इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं मम दुःखजम्।<br><br>कस्त्वं कस्य सुतश्चेति वद वीर यथा तथा॥ ६५ | हे वीर ! इस प्रकार मैंने अपने दुःखी होनेका समस्त कारण आपको बता दिया। अब जिस प्रकार मैंने आपको अपने विषयमें बताया, उसी प्रकार आप भी बताइये कि आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं ? ॥ ६५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैकवीराय यशोवत्यैकावलीमोचनाय देवीस्वप्नवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षित एकवीरद्वारा कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकी परम्परा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रमापुत्रः प्रतापवान्।<br>प्रफुल्लवदनाम्भोजस्तामुवाच विशांपते॥ १ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस यशोवतीकी बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा और वे उससे कहने लगे— ॥ १ ॥ |
| राजोवाच<br>रम्भोरु यस्त्वया पृष्टो वृत्तान्तो विशदाक्षरः।<br>हैहयोऽहं चैकवीरनाम्ना सिन्धुसुतासुतः॥ २ | राजा बोले— हे रम्भोरु! जो तुमने सुन्दर वाणीमें मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो। एकवीर नामसे प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ॥ २ ॥ |
| मनो मे यत्त्वया नूनं परतन्त्रं कृतं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि विरहेणातिपीडितः॥ ३ | [एकावलीके विषयमें वर्णन करके] तुमने मेरे मनको परतन्त्र बना दिया है। विरहसे अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? ॥ ३ ॥ |
| प्रथमं रूपमाख्यातं सर्वलोकातिगं त्वया।<br>तेन मे विह्वलं जातं कामबाणहतं मनः॥ ४ | तुमने सर्वप्रथम एकावलीके सम्पूर्ण लोकको तिरस्कृत कर देनेवाले रूपका जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाणसे आहत होकर व्याकुल हो उठा है॥ ४॥ |
| ततस्तस्या गुणाः प्रोक्तास्तैस्तु चित्तं हृतं पुनः।<br>यत्त्वयोक्तं पुनर्वाक्यं तेन मे विस्मयोऽभवत्॥ ५ | तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणोंका मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है। पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत विस्मय हो गया है। दानव कालकेतुके सामने एकावलीने यह बात कही थी कि मैं हैहयका वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी अन्यका वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है। हे तन्वंगि! एकावलीके इस कथनके द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है। हे सुन्दर केशोंवाली! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनोंके लिये क्या करूँ ? ॥ ५—७ ॥ |
| एकावल्या वचः प्रोक्तं दानवाग्रे मया वृतः।<br>हैहयस्तं विना नान्यं वृणोमीति विनिश्चयः॥ ६ | |
| तेन वाक्येन तन्वङ्गि भृत्योऽहमधुना कृतः।<br>त्वया तस्याः सुकेशान्ते ब्रूहि किं करवाणि वाम्॥ ७ |
| ८३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| स्थानं तस्य न जानामि राक्षसस्य दुरात्मनः।<br>गतिर्मे नास्ति गमने पुरे तस्मिन्सुलोचने॥ ८<br><br>वद मां त्वं विशालाक्षि तत्र प्रापयितुं क्षमा।<br>प्रापयाशु सखी ते सा यत्र तिष्ठति सुन्दरी॥ ९ | हे सुलोचने! मैं उस दुष्टात्मा राक्षस कालकेतुके स्थानको नहीं जानता। और फिर उस नगरतक पहुँच सकनेकी मेरी सामर्थ्य भी नहीं है। हे विशाल नयनोंवाली! अब तुम्हीं उपाय बताओ। मुझे वहाँ पहुँचानेमें तुम्हीं समर्थ हो। अतएव जहाँ तुम्हारी सुन्दर सखी एकावली विराजमान है, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचाओ॥ ८-९॥ | | हत्वा तं राक्षसं क्रूरं मोचयिष्यामि साम्प्रतम्।<br>विवशां शोकसन्तप्तां राजपुत्रीं तव प्रियाम्॥ १० | उस क्रूर राक्षसका वध करके मैं इसी समय विवश तथा शोक-सन्तप्त तुम्हारी प्रिय सखी राजकुमारी एकावलीको मुक्त करा लूँगा॥ १०॥ | | विमुक्तदुःखां कृत्वाशु प्रापयिष्यामि ते पुरम्।<br>पित्रे चास्याः प्रदास्यामि कन्यामेकावलीमहम्॥ ११ | राजकुमारी एकावलीको संकटसे मुक्ति दिलाकर शीघ्र ही उसे तुम्हारे पुरमें पहुँचा दूँगा और उसके पिताको सौंप दूँगा॥ ११॥ | | पश्चाद्विवाहं कर्तासौ राजा पुत्र्याः परन्तपः।<br>एवं ते मनसः कामो मम चापि प्रियंवदे॥ १२<br><br>भविष्यति स सम्पूर्णः साधनेन तवाधुना।<br>दर्शयाशु पुरं तस्य पश्य मे त्वं पराक्रमम्॥ १३<br><br>यथा हन्मि दुराचारं परदारापहारकम्।<br>तथा कुरु प्रियं कर्तुं शक्तासि वरवर्णिनि॥ १४<br><br>मार्गं दर्शय तस्याद्य पुरस्य दुर्गमस्य च। | तत्पश्चात् शत्रुतापक राजा रैभ्य अपनी पुत्रीका विवाह कर सकेंगे। हे प्रियंवदे! इस प्रकार तुम्हारे सहयोगसे मेरे तथा तुम्हारे मनकी कामना अब पूरी हो जायगी। तुम मुझे उस कालकेतुका नगर शीघ्र दिखा दो, फिर मेरा पराक्रम देखो। हे वरवर्णिनि! मैं जिस प्रकार उस दुराचारी तथा परस्त्रीका हरण करनेवाले कालकेतुका वध कर सकूँ, तुम वैसा ही उपाय करो; क्योंकि तुम हित-साधन करनेमें पूर्ण सक्षम हो। उस दानवके दुर्गम नगरका मार्ग तुम मुझे आज ही दिखाओ॥ १२-१४॥ | | व्यास उवाच<br><br>तन्निशम्य प्रियं वाक्यं मुदिता च यशोवती॥ १५<br><br>तमुवाच रमापुत्रं गमनोपायमादरात्।<br>मन्त्रं गृहाण राजेन्द्र भगवत्यास्तु सिद्धिदम्॥ १६<br><br>दर्शयिष्यामि तस्याद्य पुरं राक्षसपालितम्।<br>सज्जो भव महाभाग गमनाय मया सह॥ १७<br><br>सैन्येन महता युक्तस्तत्र युद्धं भविष्यति।<br>कालकेतुर्महावीरो राक्षसैर्बलिभिर्वृतः॥ १८<br><br>तस्मान्मन्त्रं गृहीत्वा त्वं व्रज तत्र मया सह।<br>दर्शयिष्यामि ते मार्गं पुरस्यास्य दुरात्मनः॥ १९<br><br>हत्वा तं पापकर्माणं मोचयाशु च मे सखीम्। | **व्यासजी बोले—**एकवीरकी यह प्रिय वाणी सुनकर यशोवती प्रसन्न हो गयी और वह लक्ष्मीपुत्र एकवीरसे नगर पहुँचनेका उपाय आदरपूर्वक बताने लगी—हे राजेन्द्र! पहले आप भगवती जगदम्बाके सिद्धिप्रदायक मन्त्रको ग्रहण कीजिये। तत्पश्चात् मैं आपको अनेक राक्षसोंद्वारा रक्षित उस कालकेतुका नगर आज ही दिखाऊँगी। हे महाभाग! एक विशाल सेनासे युक्त होकर आप मेरे साथ वहाँ चलनेके लिये तैयार हो जाइये। वहाँ युद्ध होगा। कालकेतु स्वयं महापराक्रमी है तथा बलवान् राक्षसोंसे युक्त रहता है। अतएव भगवतीका मन्त्र ग्रहण करके ही आप मेरे साथ वहाँ चलिये। मैं उस दुष्टात्माके नगरका मार्ग आपको दिखाऊँगी। अब आप उस पापकर्मपरायण दानवको मारकर मेरी सखीको शीघ्र मुक्त कीजिये॥ १५-१९॥ |
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा तद्वचनं वीरो मन्त्रं जग्राह सत्वरः॥ २०<br>दत्तात्रेयाद्दैवयोगात्प्राप्ताज्ज्ञानिवराच्छुभात् ।<br>योगेश्वरीमहामन्त्रं त्रिलोकीतिलकाभिधम्॥ २१ | उसका यह वचन सुनकर एकवीरने वहाँपर दैवयोगसे पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ दत्तात्रेयजीसे त्रिलोकीका तिलक कहे जानेवाले योगेश्वरीके महामन्त्रको उसी क्षण ग्रहण कर लिया॥ २०-२१॥ |
| तेन सर्वज्ञता जाता सर्वान्तश्चारिता तथा।<br>तया सह जगामाशु पुरं तस्य सुदुर्गमम्॥ २२ | उस मन्त्रके प्रभावसे एकवीरको सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमनकी क्षमता प्राप्त हो गयी। इसके बाद वे यशोवतीके साथ कालकेतुके दुर्गम नगरके लिये शीघ्र प्रस्थित हुए॥ २२॥ |
| रक्षितं राक्षसैर्घोरैः पातालमिव पन्नगैः।<br>यशोवत्या च सैन्येन महता संयुतो नृपः॥ २३ | वह नगर राक्षसोंद्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, जैसे सर्पोंद्वारा पातालकी निरन्तर सुरक्षा होती रहती है। कालकेतुके ऐसे नगरमें अब यशोवती तथा विशाल सेनाके साथ राजा एकवीर आ गये॥ २३॥ |
| तमायान्तं समालोक्य दूतास्तस्य भयातुराः।<br>क्रोशन्तोऽभिययुः पार्श्वं कालकेतोस्तरस्विनः॥ २४ | एकवीरको आते देखकर कालकेतुके दूत भयसे व्यग्र हो गये और चीखते-चिल्लाते हुए बड़ी तेजीसे भागकर उसके पास पहुँचे॥ २४॥ |
| तमूचुः सहसा मत्वा राक्षसं काममोहितम्।<br>एकावलीसमीपस्थं कुर्वन्तं विनयान्बहून्॥ २५ | उस समय एकावलीके पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतुको अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे॥ २५॥ |
| दूता ऊचुः<br>राजन् यशोवती नारी कामिन्याः सहचारिणी।<br>आयाति सह सैन्येन राजपुत्रेण संयुता॥ २६ | **दूतोंने कहा—**हे राजन्! इस कामिनीकी सहचारिणी जो यशोवती नामकी स्त्री है, वह एक राजकुमारके साथ विशाल सेना लेकर आ रही है॥ २६॥ |
| जयन्तो वा महाराज कार्तिकेयोऽथवा नु किम्।<br>आगच्छति बलोन्मत्तो वाहिनीसहितः किल॥ २७ | हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय। बलके अभिमानसे मत्त वह राजकुमार सेनाके साथ चला आ रहा है॥ २७॥ |
| संयत्तो भव राजेन्द्र संग्रामः समुपस्थितः।<br>देवपुत्रेण युध्यस्व त्यज वा कमलेक्षणाम्॥ २८ | हे राजेन्द्र! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्धकी स्थिति सामने आ गयी है। अब आप या तो इस देवपुत्रके साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनीको मुक्त कर दीजिये॥ २८॥ |
| इतो दूरेऽस्ति सैन्यं तद्योजनत्रयमात्रतः।<br>सज्जो भव महीपाल दुन्दुभिं घोषयाशु वै॥ २९ | उसकी सेना यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है। अतएव हे राजन्! अब आप तैयार हो जाइये और रण-दुंदुभी बजानेकी तुरंत आज्ञा दीजिये॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसः क्रोधमूर्च्छितः।<br>राक्षसान्प्रेरयामास सायुधान्सबलान्बहून्॥ ३०<br>गच्छध्वं राक्षसाः सर्वे सम्मुखाः शस्त्रपाणयः। | **व्यासजी बोले—**दूतोंके मुखसे वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसोंको उत्साहित करते हुए कहा—हे राक्षसो! तुम सब हाथोंमें शस्त्र लेकर शत्रुके सामने जाओ॥ ३० १/२॥ |
८३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तानाज्ञाप्य कालकेतुः पप्रच्छ प्रणयान्वितः ॥ ३१<br>एकावलीं समीपस्थां विवशां भृशदुःखिताम्।<br>कोऽयमायाति तन्वङ्गि पिता ते वापरो पुमान् ॥ ३२<br>त्वदर्थे सैन्यसंयुक्तो ब्रूहि सत्यं कृशोदरि।<br>पिता ते यदि सम्प्राप्तो नेतुं त्वां विरहातुरः ॥ ३३<br>ज्ञात्वा ते पितरं सम्यक् संग्रामं न करोम्यहम्।<br>आनयित्वा गृहे पूजां रत्नैर्वस्त्रैर्हयैः शुभैः ॥ ३४<br>करोमि तस्य चातिथ्यं गृहे प्राप्तस्य सर्वथा।<br>अन्यश्चेद्यदि सम्प्राप्तस्तं हन्मि निशितैः शरैः ॥ ३५<br>आनीतः किल कालेन मरणाय महात्मना।<br>तस्माद्वद विशालाक्षि कोऽयमायाति मन्दधीः ॥ ३६<br>अज्ञात्वा मां दुराधर्षं कालरूपं महाबलम्। | उन्हें आज्ञा देकर कालकेतुने अपने निकट बैठी हुई अत्यन्त विवश तथा दुःखित एकावलीसे विनयप्रता-पूर्वक पूछा—'हे तन्वंगि! तुम्हें लेनेके लिये सेनासहित यह कौन आ रहा है? ये तुम्हारे पिता हैं अथवा कोई अन्य पुरुष? हे कृशोदरि! सच-सच बताओ। यदि विरहसे व्यथित होकर तुम्हारे पिता तुम्हें लेनेके लिये आ रहे हों, तो यह जानकर कि ये तुम्हारे पिता हैं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अपितु उन्हें घर लाकर उनकी पूजा करूँगा तथा बहुमूल्य रत्न, वस्त्र तथा अश्व भेंट करके घरमें आये हुए उनका विधिवत् आतिथ्य करूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति आया होगा तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसे मार डालूँगा। निश्चित ही महान् कालने उसे मरनेके लिये यहाँ ला दिया है। अतएव हे विशाल नयनोंवाली! मुझ अपराजेय, कालरूप तथा अपार बलसम्पन्नके विषयमें न जानकर यह कौन मन्दमति चला आ रहा है? यह तुम मुझे बताओ' ॥ ३१-३६ ½ ॥ |
| एकावल्युवाच<br>न जानेऽहं महाभाग कोऽयमायाति सत्वरः ॥ ३७<br>न मेऽस्ति विदितः कोऽपि स्थितायास्तव बन्धने।<br>नायं पिता मे न भ्राता कोऽप्यन्योऽस्ति महाबलः ॥ ३८<br>किमर्थमिह चायाति नाहं वेद विनिश्चयम्। | एकावली बोली—हे महाभाग! मैं यह नहीं जानती कि इतनी तेजीसे यह कौन आ रहा है? आपके बन्धनमें पड़ी हुई मैं नहीं जानती कि यह कौन है? ये न तो मेरे पिता हैं और न मेरे भाई ही। यह दूसरा ही कोई महान् पराक्रमी पुरुष है, यह किसलिये यहाँ आ रहा है, यह भी मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती ॥ ३७-३८ ½ ॥ |
| दैत्य उवाच<br>एवं वदन्त्यमी दूता वयस्या ते यशोवती ॥ ३९<br>समानीय च तं वीरमागतेति कृतोद्यमा।<br>क्व गता सा सखी कान्ते विदग्धा कार्यनिश्चये ॥ ४०<br>नान्यः कोऽपि ममारातिर्यो मे प्रतिबलो भवेत्। | दैत्य बोला—ये दूत तो कह रहे हैं कि तुम्हारी सखी यशोवती ही प्रयत्नपूर्वक उस वीरको साथमें लेकर आयी है। हे कान्ते! कार्य सिद्ध करनेमें अत्यन्त चतुर तुम्हारी वह सखी कहाँ गयी? कोई अन्य मेरा शत्रु भी नहीं है, जो मेरा विरोधी हो ॥ ३९-४० ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे दूतास्तत्रान्ये वै समागताः ॥ ४१<br>ते होचुस्त्वरिता भीताः कालकेतुं गृहे स्थितम्।<br>किं स्वस्थोऽसि महाराज समीपे सैन्यमागतम् ॥ ४२<br>निर्गच्छ नगरात्तूर्णं सैन्येन महतावृत्तः।<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा कालकेतुर्महाबलः ॥ ४३<br>रथमारुह्य त्वरितो निर्ययौ स्वपुराद् बहिः। | व्यासजी बोले—इसी बीच दूसरे दूत वहाँ आ गये। भयभीत उन दूतोंने महलमें बैठे कालकेतुसे तुरंत कहा—हे महाराज! आप निश्चिन्त क्यों हैं? शत्रुसेना समीप आ पहुँची है। आप एक विशाल सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकलिये। उनकी यह बात सुनकर महान् बलशाली कालकेतु शीघ्र ही रथपर चढ़कर अपने नगरसे बाहर निकल गया ॥ ४१-४३ ½ ॥ |
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३९
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३९
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकवीरोऽपि सहसा हयारूढः प्रतापवान् ॥ ४४<br>आगतस्तत्र कामिन्या विरहेण समाकुलः।<br>युद्धं तयोरभूत्तत्र वृत्रवासवयोरिव ॥ ४५<br>शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् । | कामिनी एकावलीके विरहसे व्याकुल प्रतापी एकवीर भी घोड़ेपर आरूढ़ होकर अचानक वहींपर आ गया। उन दोनोंका वृत्रासुर तथा इन्द्रकी भाँति युद्ध होने लगा। उस युद्धमें छोड़े गये विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं ॥ ४४-४५ १/२ ॥ |
| वर्तमाने तदा युद्धे कातराणां भयावहे ॥ ४६<br>गदया ताडयामास दैत्यं सिन्धुसुतासुतः।<br>स गतासुः पपातोर्व्यां वज्राहत इवाचलः ॥ ४७<br>पलायित्वा गताः सर्वे राक्षसा भयपीडिताः। | भीरुजनोंको भयभीत कर देनेवाले उस युद्धमें लक्ष्मीपुत्र एकवीरने दानव कालकेतुपर अपनी गदासे प्रहार किया। गदाप्रहारसे वह कालकेतु वज्रसे आहत पर्वतकी भाँति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब भयभीत होकर अन्य सभी राक्षस भाग गये ॥ ४६-४७ १/२ ॥ |
| यशोवती ततो गत्वा वेगादेकावलीं तदा ॥ ४८<br>उवाच मधुरां वाणीं विस्मितां मुदिता भृशम्।<br>एह्यालि नृपपुत्रेण दानवोऽसौ निपातितः ॥ ४९<br>एकवीरेण धीरेण युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।<br>स्कन्धावारेऽप्यसौ राजा तिष्ठत्यद्य श्रमातुरः ॥ ५०<br>दर्शनं काङ्क्षमाणस्ते श्रुतरूपगुणस्तव ।<br>पश्य तं कुटिलापाङ्गि मनोभवसमं नृपम् ॥ ५१<br>कथिता त्वं मया पूर्वं तस्याग्रे जाह्नवीतटे ।<br>पूर्णानुरागः सञ्जातस्तेनासौ विरहातुरः ॥ ५२<br>वाञ्छति त्वां चारुरूपां द्रष्टुं नृपतिनन्दनः। | तत्पश्चात् यशोवतीने विस्मयमें पड़ी एकावलीके पास जाकर प्रसन्नतापूर्वक मधुर वाणीमें उससे कहा— हे सखि ! इधर आओ। कालकेतुके साथ भीषण युद्ध करके धीरतासम्पन्न राजकुमार एकवीरने उस राक्षसको मार गिराया है। इस समय वे राजकुमार एकवीर थक जानेके कारण अपने शिविरमें विद्यमान हैं। तुम्हारे रूप तथा गुणोंके विषयमें सुनकर वे तुम्हारा दर्शन करना चाहते हैं। हे कुटिलापांगि ! कामदेवसदृश उन राजकुमारको तुम देखो। मैं उनसे तुम्हारे विषयमें गंगातटपर पहले ही बता चुकी हूँ। इससे तुम्हारे प्रति उनका पूर्ण अनुराग हो जानेके कारण वे विरहातुर राजकुमार अब तुझ सुन्दर रूपवालीका दर्शन करना चाहते हैं ॥ ४८-५२ १/२ ॥ |
| सा तस्या वचनं श्रुत्वा गमनाय मनो दधे ॥ ५३<br>लज्जमाना भृशं भीत्या कौमारं प्राप्तया तया ।<br>कथं तस्य मुखं द्रक्ष्ये कुमारी ह्यवशा भृशम् ॥ ५४<br>स मां गृह्णाति कामार्त इति चिन्ताकुला सती ।<br>यशोवत्या युता तत्र नरयानस्थिता ययौ ॥ ५५<br>स्कन्धावारेऽतिमलिना मलिनाम्बरधारिणी । | यशोवतीकी बात सुनकर उसने वहाँ जानेका मन बना लिया। कुमारी अवस्थामें होनेके कारण वह भयवश लज्जित हो रही थी। [वह सोचने लगी] मैं एक अत्यन्त विवश कुमारी कन्या उनका मुख कैसे देखूँगी ? वह साध्वी एकावली इस बातसे चिन्तित हो उठी कि वे कामासक्त राजकुमार मुझे ग्रहण कर लेंगे। तब वह एकावली मलिन वस्त्र धारण करके अत्यन्त उदास होकर पालकीमें बैठकर यशोवतीके साथ उनके शिविरमें पहुँच गयी ॥ ५३-५५ १/२ ॥ |
| तामागतां विशालाक्षीं दृष्ट्वा राजसुतोऽब्रवीत् ॥ ५६<br>दर्शनं देहि तन्वङ्गि तृषिते नयने मम । | उस विशाल नयनोंवाली एकावलीको वहाँ आयी हुई देखकर राजकुमारने उससे कहा—हे तन्वंगि ! मुझे दर्शन दो। मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शनके लिये तृष्णाकुल हैं ॥ ५६ १/२ ॥ |
८४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २३
| कामातुरं च तं वीक्ष्य तां च लज्जाभरावृताम् ॥ ५७ <br><br> नीतिज्ञा शिष्टमार्गज्ञा तमुवाच यशोवती ।<br>राजपुत्र पिताप्यस्यास्त्वामेनां दातुमिच्छति ॥ ५८ <br><br> एषापि त्वद्वशा नूनं भविता सङ्गमस्तव ।<br>कालं प्रतीक्ष्य राजेन्द्र नयैनां पितुरन्तिकम् ॥ ५९ <br><br> स विवाहविधिं कृत्वा दास्यतीति विनिश्चयः । | एकवीरको कामातुर तथा एकावलीको लज्जासे युक्त देखकर नीतिका ज्ञान रखनेवाली तथा श्रेष्ठजनोंके मार्गका अनुसरण करनेवाली यशोवतीने उस एकवीरसे कहा—हे राजकुमार! इसके पिता भी इसे आपको ही देना चाहते हैं। यह एकावली भी आपके वशीभूत है; इसलिये इसके साथ आपका मिलन अवश्य होगा, किंतु हे राजेन्द्र! कुछ समय प्रतीक्षा करके पहले इसे इसके पिताके पास पहुँचा दीजिये। वे विधिपूर्वक विवाह करके इसे आपको निश्चितरूपसे सौंप देंगे॥ ५७-५९ १/२॥ | | स तस्या वचनं तथ्यं मत्वा सैन्यसमन्वितः ॥ ६० <br><br> समेतः कामिनीभ्यां तु ययौ तत्पितुराश्रमम् । | यशोवतीकी बातको उचित मानकर उन दोनों कन्याओं—एकावली तथा यशोवतीको साथमें लेकर सेनासहित वे राजकुमार एकवीर उसके पिताके स्थानपर पहुँचे॥ ६० १/२॥ | | राजपुत्रीं तथायातां श्रुत्वा प्रेमसमन्वितः ॥ ६१ <br><br> प्रययौ सम्मुखस्तूर्णं सचिवैः परिवेष्टितः ।<br>बहुभिर्दिवसैर्दृष्टा पुत्री सा मलिनाम्बरा ॥ ६२ <br><br> यशोवत्या तु वृत्तान्तः कथितो विस्तरात्पुनः ।<br>एकवीरं मिलित्वासौ गृहानीय चादरात् ॥ ६३ <br><br> पुण्येऽह्नि कारयामास विवाहं विधिपूर्वकम् ।<br>पारिबर्हं ततो दत्त्वा सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ६४ <br><br> पुत्रीं विसर्जयामास यशोवत्या समन्विताम् । | राजपुत्रीको आयी हुई सुनकर राजा रैभ्य प्रेमपूर्वक मन्त्रियोंके साथ उसके सम्मुख शीघ्रतासे पहुँच गये। मलिन वस्त्र धारण की हुई उस पुत्रीको राजाने बहुत दिनोंके बाद देखा, पुनः यशोवतीने रैभ्यको सारा वृत्तान्त विस्तारके साथ बताया। तत्पश्चात् एकवीरसे मिलकर राजा रैभ्य उन्हें आदरपूर्वक घर ले आये। पुनः उन्होंने शुभ दिनमें विधिविधानसे दोनोंका विवाह सम्पन्न कराया। तदुपरान्त राजाने पर्याप्त वैवाहिक उपहार देकर एकवीरको भलीभाँति सम्मानित करके पुत्रीको यशोवतीसहित विदा कर दिया॥ ६१-६४ १/२॥ | | एवं विवाहे संवृत्ते रमापुत्रो मुदान्वितः ॥ ६५ <br><br> गृहं प्राप्य बहून्भोगान्बुभुजे प्रियया समम् ।<br>बभूव तस्यां पुत्रस्तु कृतवीर्याभिधः किल ।<br>तत्सूनुः कार्तवीर्यस्तु वंशोऽयं कथितो मया ॥ ६६ | इस प्रकार विवाह हो जानेपर लक्ष्मीपुत्र एकवीर हर्षित हो गये और घर पहुँचकर अपनी भार्या एकावलीके साथ नानाविध सुखोपभोग करने लगे। यथासमय उस एकावलीसे कृतवीर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य हुए। इस प्रकार मैंने आपसे इस हैहयवंशका वर्णन कर दिया॥ ६५-६६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीरैकावल्योर्विवाहवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
अ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१
अ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजोवाच<br>भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजाच्च्युतं दिव्यकथारसम्।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि पिबंस्तु सुधया समम्॥ १ | राजा बोले— हे भगवन्! आपके मुखारविन्दसे निर्गत इस अमृततुल्य दिव्य कथारसका निरन्तर पान करते रहनेपर भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ १॥ |
| विचित्रमिदमाख्यानं कथितं भवता मम।<br>हैहयानां समुत्पत्तिर्विस्तराद्विस्मयप्रदा॥ २ | आपके द्वारा मुझसे यह विचित्र आख्यान विस्तारपूर्वक कहा गया; हैहयवंशी राजाओंकी उत्पत्ति तो अत्यन्त आश्चर्यजनक है॥ २॥ |
| परं कौतूहलं मेऽत्र यद्विष्णुः कमलापतिः।<br>देवदेवो जगन्नाथः सृष्टिस्थित्यन्तकारकः॥ ३<br><br>सोऽप्यश्वभावमापन्नो भगवान्हरिरच्युतः।<br>परतन्त्रः कथं जातः स्वतन्त्रः पुरुषोत्तमः॥ ४<br><br>एतन्मे संशयं ब्रह्मञ्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>सर्वज्ञस्त्वं मुनिश्रेष्ठ ब्रूहि वृत्तान्तमद्भुतम्॥ ५ | मुझे इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है कि देवाधिदेव जगत्पति लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु स्वयं जगत्के उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहर्ता हैं; उन्हें भी अश्वरूप धारण करना पड़ गया? सर्वथा स्वतन्त्र रहनेवाले वे अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् हरि परतन्त्र कैसे हो गये? हे ब्रह्मन्! इस समय मेरे इस सन्देहका निवारण करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं। हे मुनिवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव इस अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कीजिये॥ ३–५॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि सन्देहस्यास्य निर्णयम्।<br>यथा श्रुतं मया पूर्वं नारदान्मुनिसत्तमात्॥ ६ | व्यासजी बोले— हे राजन्! सुनिये, इस सन्देहका निर्णय पूर्व समयमें मैंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे जैसा सुना है, वैसा ही आपको बता रहा हूँ॥ ६॥ |
| ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम तापसः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वलोकप्रियः कविः॥ ७ | नारदजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। वे तपस्वी, सर्वज्ञानी, सर्वत्र गमन करनेवाले, शान्त, समस्त लोकोंके प्रिय एवं मनीषी हैं॥ ७॥ |
| स चैकदा मुनिश्रेष्ठो विचरन्पृथिवीमिमाम्।<br>वादयन्महतीं वीणां स्वरतानसमन्विताम्॥ ८<br><br>बृहद्रथन्तरादीनां साम्नां भेदाननेकशः।<br>गायन्गायत्रममृतं सम्प्राप्तोऽथ ममाश्रमम्॥ ९<br><br>शम्याप्रासं महातीर्थं सरस्वत्याः सुपावनम्।<br>निवासं मुनिमुख्यानां शर्मदं ज्ञानदं तथा॥ १० | एक बार वे मुनिवर नारद स्वर तथा तानसे युक्त अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा सामगानके बृहद्रथन्तर आदि अनेक भेदों और अमृतमय गायत्र-सामका गान करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करते हुए मेरे आश्रमपर पहुँचे। वह शम्याप्रास महातीर्थ सरस्वतीके पावन तटपर विराजमान है। कल्याण और ज्ञान प्रदान करनेवाला वह तीर्थ प्रधान ऋषियोंका निवासस्थान है॥ ८–१०॥ |
| तमागतमहं प्रेक्ष्य ब्रह्मपुत्रं महाद्युतिम्।<br>अभ्युत्थानादिकं सर्वं कृतवानर्चनादिकम्॥ ११ | ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजस्वी नारदजीको अपने आश्रममें आया देखकर मैं उठकर खड़ा हो गया और मैंने भलीभाँति उनकी पूजा आदि की॥ ११॥ |
| ८४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अर्घ्यपाद्याविधिं कृत्वा तस्यासनस्थितस्य च।<br>उपविष्टः समीपेऽहं मुनेरमिततेजसः॥ १२॥ | अर्घ्य तथा पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक पूजन करके आदरपूर्वक आसनपर विराजमान उन अमित तेजस्वी नारदके समीप मैं बैठ गया॥ १२॥ |
| दृष्ट्वा विश्रमिणं शान्तं नारदं ज्ञानपारदम्।<br>तमपृच्छमहं राजन् यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना॥ १३॥ | हे राजन्! तत्पश्चात् ज्ञानके पार पहुँचानेमें समर्थ मुनि नारदको मार्गश्रमसे रहित तथा शान्तचित्त देखकर मैंने उनसे वही प्रश्न पूछा था, जो आपने इस समय मुझसे पूछा है॥ १३॥ |
| असारेऽस्मिंस्तु संसारे प्राणिनां किं सुखं मुने।<br>न पश्यामि विनिश्चित्य कदाचित्कुत्रचित्क्वचित्॥ १४॥ | [मैंने उनसे पूछा—] हे मुने! इस सारहीन जगत्में प्राणियोंको क्या सुख प्राप्त होता है ? विचार करनेपर मुझे तो कभी भी, कहीं भी तथा कुछ भी सुख नहीं दिखायी देता है॥ १४॥ |
| द्वीपे जातो जनन्याहं संत्यक्तस्तत्क्षणादपि।<br>अनाश्रयो वने वृद्धिं प्राप्तः कर्मानुसारतः॥ १५॥ | मुझे ही देखिये, एक द्वीपमें जन्म लेते ही मेरी माताने मेरा त्याग कर दिया। तभीसे आश्रयहीन रहता हुआ मैं वनमें अपने कर्मके अनुसार बढ़ने लगा॥ १५॥ |
| तपस्तप्तं मया चोग्रं पर्वते बहुवार्षिकम्।<br>पुत्रकामेन देवर्षे शङ्करः समुपासितः॥ १६॥ | हे देवर्षे! तत्पश्चात् मैंने पुत्रप्राप्तिकी कामनासे एक पर्वतपर बहुत वर्षोंतक शंकरजीकी उपासना करते हुए कठोर तपस्या की॥ १६॥ |
| ततो मया शुकः प्राप्तः पुत्रो ज्ञानवतां वरः।<br>पाठितस्तु मया सम्यग्वेदानां सार आदितः॥ १७॥ | तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ शुकदेव मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हुए। मैंने उन्हें आरम्भसे लेकर सम्यक् प्रकारसे वेदोंका सारभूत तत्त्व पढ़ा दिया॥ १७॥ |
| स त्यक्त्वा मां गतः क्वापि रुदन्तं विरहातुरम्।<br>लोकाल्लोकान्तरं साधो वचनात्तव बोधितः॥ १८॥ | हे साधो! आपके वचनोंसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा वह पुत्र मुझ विरहातुरको रोता हुआ छोड़कर लोकलोकान्तरमें कहीं चला गया ?॥ १८॥ |
| ततोऽहं पुत्रसन्तप्तस्त्यक्त्वा मेरुं महागिरिम्।<br>मातरं मनसा कृत्वा सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलम्॥ १९॥ | तब पुत्रविरहसे सन्तप्त मैं महापर्वत सुमेरुको छोड़कर अपनी माताको मनमें याद करते हुए कुरुजांगल प्रदेशमें पहुँचा॥ १९॥ |
| पुत्रस्नेहादतितरां कृशाङ्गः शोकसंयुतः।<br>जानन्मिथ्येति संसारं मायापाशनियन्त्रितः॥ २०॥ | संसार मिथ्या है—ऐसा जानते हुए भी मायापाशमें बँधा हुआ मैं पुत्र-स्नेहके कारण शोकाकुल रहनेसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाला हो गया॥ २०॥ |
| ततो राज्ञा वृतां ज्ञात्वा मातरं वासवीं शुभाम्।<br>स्थितोऽत्रैवाश्रमं कृत्वा सरस्वत्यास्तटे शुभे॥ २१॥ | तत्पश्चात् जब मैंने यह जाना कि वासवराजसुता मेरी कल्याणमयी माताका राजा शन्तनुने वरण कर लिया है, तब मैं सरस्वतीके पवित्र तटपर आश्रम बनाकर रहने लगा॥ २१॥ |
| शन्तनुः स्वर्गतिं प्राप्तो विधुरा जननी स्थिता।<br>पुत्रद्वययुता साध्वी भीष्मेण प्रतिपालिता॥ २२॥ | इसके बाद महाराज शन्तनुके स्वर्ग प्राप्त कर लेनेपर मेरी माँ विधवा हो गयीं। तब भीष्मने दो पुत्रोंवाली मेरी माताका पालन किया॥ २२॥ |
| अ० २४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८४३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चित्राङ्गदः कृतो राजा गङ्गापुत्रेण धीमता।<br>कालेन सोऽपि मे भ्राता मृतः कामसमद्युतिः॥ २३ | बुद्धिमान् गङ्गापुत्र भीष्मने चित्रांगदको राजा बनाया। किंतु कुछ ही समयमें कामदेवके सदृश कान्तिमान् मेरे भाई चित्रांगद भी मृत्युको प्राप्त हो गये॥ २३॥ |
| ततः सत्यवती माता निमग्ना शोकसागरे।<br>चित्राङ्गदं मृतं पुत्रं रुरोद भृशमातुरा॥ २४ | पुत्र चित्रांगदके मर जानेपर मेरी माता सत्यवती अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगीं और नित्य शोकके समुद्रमें निमग्न रहने लगीं॥ २४॥ |
| सम्प्राप्तोऽहं महाभाग ज्ञात्वा तां दुःखितां सतीम्।<br>आश्वासिता मयात्यर्थं भीष्मेण च महात्मना॥ २५ | हे महाभाग! उन पतिव्रताको दुःखित जानकर मैं उनके पास गया। वहाँ मैंने तथा महात्मा भीष्मने उन्हें बहुत सान्त्वना दी॥ २५॥ |
| विचित्रवीर्यस्त्वपरो वीर्यवान्पृथिवीपतिः।<br>कृतो भीष्मेण भ्राता वै स्त्रीराज्यविमुखेन ह॥ २६ | तब स्त्री तथा राज्यसे विमुख भीष्मने अपने दूसरे भाई पराक्रमी विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २६॥ |
| काशिराजसुते रम्ये विजित्य पृथिवीपतीन्।<br>भीष्मेणानीय स्वबलात्कन्यके द्वे समर्पिते॥ २७<br><br>सत्यवत्यै शुभे काले विवाहः परिकल्पितः।<br>भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य तदाहं सुखितोऽभवम्॥ २८ | तत्पश्चात् भीष्मने अपने बलसे राजाओंको जीतकर काशिराजकी दो सुन्दर पुत्रियोंको लाकर माता सत्यवतीको समर्पित कर दिया। पुनः शुभ मुहूर्तमें जब भाई विचित्रवीर्यका विवाह सम्पन्न हो गया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ २७-२८॥ |
| पुनः सोऽपि मृतो भ्राता यक्ष्मणा पीडितो भृशम्।<br>अनपत्यो युवा धन्वी माता मे दुःखिताभवत्॥ २९ | कुछ ही समयमें मेरे धनुर्धर भाई विचित्रवीर्य भी यक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर युवावस्थामें ही निःसन्तान मर गये, जिससे मेरी माता दुःखित हुईं॥ २९॥ |
| काशिराजसुते द्वे तु मृतं दृष्ट्वा पतिं तदा।<br>पतिव्रताधर्मपरे भगिन्यौ सम्बभूवतुः॥ ३० | इधर जब काशिराजकी दोनों पुत्रियोंने अपने पतिको मृत देखा तब वे दोनों बहनें पातिव्रत्य धर्मके पालनके लिये तत्पर हुईं॥ ३०॥ |
| ते ऊचतुः सतीं श्वश्रूं रुदतीं भृशदुःखिताम्।<br>पतिना सहगामिन्यौ भविष्यावो हुताशने॥ ३१<br><br>पुत्रेण सह ते श्वश्रु स्वर्गे गत्वाथ नन्दने।<br>सुखेन विहरिष्यावः पतिना सह संयुते॥ ३२ | वे दारुण दुःखके कारण रोती हुई अपनी साध्वी साससे कहने लगीं—हे श्वश्रु! हम दोनों चिताग्निमें अपने पतिके साथ ही जायँगी। आपके पुत्रके साथ स्वर्गमें जाकर हम दोनों अपने पतिसे युक्त होकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक विहार करेंगी॥ ३१-३२॥ |
| निवारिते तदा मात्रा वध्वौ तस्मान्महोद्यमात्।<br>स्नेहभावं समाश्रित्य भीष्मस्य वचनात्तदा॥ ३३ | तब स्नेहभावका आश्रय लेकर मेरी माताने भीष्मके परामर्शसे उन दोनों वधुओंको महान् चेष्टा करनेसे रोक दिया॥ ३३॥ |
| गाङ्गेयेन च मात्रा मे सम्मन्त्र्य च परस्परम्।<br>कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं संस्मृतोऽहं गजाव्हये॥ ३४ | विचित्रवीर्यकी सभी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके गङ्गातनय भीष्म तथा मेरी माताने आपसमें मन्त्रणा करके मुझे हस्तिनापुर आनेके लिये मेरा स्मरण किया॥ ३४॥ |