भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
३६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २२

| विसर्जयास्मान्निजसद्म गन्तुं<br>शिवं भवानी तव संविधास्यति।<br>न कापि चिन्ता मम भूप वर्तते<br>सञ्चिन्तयन्त्याः परमाम्बिकां वै॥ ३४ | हे राजन्! अब आप हमलोगोंको अपने घर जानेके लिये आज्ञा दीजिये। भगवती दुर्गा आपका कल्याण करेंगी। हे राजन्! मुझे अब कोई चिन्ता नहीं है; क्योंकि मैं पराम्बा भगवतीका भलीभाँति चिन्तन करती रहती हूँ॥ ३४॥ | | दोषा गता विविधवाक्यपदै रसालै-<br>रन्योन्यभाषणपदैरमृतोपमैश्च ।<br>प्रातर्नृपाः समधिगम्य कृतं विवाहं<br>रोषान्विता नगरबाह्यगतास्तथोचुः॥ ३५ | इस प्रकार उन दोनोंमें विविध वाक्योंद्वारा अमृतके समान मधुर वार्तालापमें रात बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर सभी राजा विवाह हो जानेकी बात जानकर कुपित हो उठे और नगरके बाहर निकलकर आपसमें कहने लगे- ॥ ३५॥ | | अद्यैव तं नृपकलङ्कधरञ्च हत्वा<br>बालं तथैव किल तं न विवाहयोग्यम्।<br>गृह्णीम तां शशिकलां नृपतेश्च लक्ष्मीं<br>लज्जामवाप्य निजसद्म कथं व्रजेम॥ ३६ | हम आज ही उस कलंकी राजा सुबाहु तथा विवाहकी योग्यता न रखनेवाले उस कुमार सुदर्शनको मारकर राज्यलक्ष्मीसहित उस शशिकलाको छीन लेंगे, अन्यथा लज्जित होकर हमलोग कैसे अपने घर जायँगे?॥ ३६॥ | | शृण्वन्तु तूर्यनिनदान्किल वाद्यमाना-<br>ञ्छङ्खस्वनानभिभवन्ति मृदङ्गशब्दाः।<br>गीतध्वनिं च विविधं निगमस्वनञ्च<br>मन्यामहे नृपतिनात्र कृतो विवाहः॥ ३७ | आप सब लोग बजायी जा रही तुरहियों तथा शंखोंके निनाद, गीतध्वनि तथा अनेक प्रकारकी वेद-ध्वनि सुन लें। मृदंगोंके भी शब्द हो रहे हैं। हमलोग तो ऐसा मानते हैं कि राजा सुबाहुने विवाह सम्पन्न कर दिया॥ ३७॥ | | अस्मान्प्रतार्य वचनैर्विधिवच्चकार<br>वैवाहिकेन विधिना करपीडनं वै।<br>कर्तव्यमद्य किमहो प्रविचिन्तयन्तु<br>भूपाः परस्परमतिं च समर्थयन्तु॥ ३८ | राजाने हमें बातोंसे ठगकर वैवाहिक विधिसे पाणिग्रहण-संस्कार अवश्य कर दिया। हे राजाओ! अब हमलोगोंको क्या करना चाहिये, इस विषयमें आपलोग सोचें और आपसमें विचार करके एक निर्णय लें॥ ३८॥ | | एवं वदत्सु नृपतिष्वथ कन्यकायाः<br>कृत्वा विवाहविधिमप्रतिमप्रभावः।<br>भूपान्निमन्त्रयितुमाशु जगाम राजा<br>काशीपतिः स्वसुहृदैः प्रथितप्रभावैः॥ ३९ | इस प्रकार राजाओंमें परस्पर बातचीत हो ही रही थी कि इतनेमें अप्रतिम प्रभाववाले काशीपति महाराज सुबाहु कन्याका पाणिग्रहण-संस्कार सम्पन्न करके प्रसिद्ध तेजवाले अपने मित्रोंको साथ लेकर उन राजाओंको निमन्त्रित करनेके लिये शीघ्र उनके पास गये॥ ३९॥ | | आगच्छन्तं च तं दृष्ट्वा नृपाः काशीपतिं तदा।<br>नोचुः किञ्चिदपि क्रोधान्मौनमाधाय संस्थिताः॥ ४० | काशीराज सुबाहुको आते देखकर उपस्थित नरेशोंने क्रोधके कारण कुछ नहीं कहा। वे मौन साधकर बैठे रहे॥ ४०॥ | | स गत्वा प्रणिपत्याह कृताञ्जलिरभाषत।<br>आगन्तव्यं नृपैः सर्वैर्भोजनार्थं गृहे मम॥ ४१ | राजा सुबाहु उनके पास जाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे कि सभी राजागण भोजन करनेके |

अ० २३ ]तृतीय स्कन्ध३६१
कन्ययासौ वृतो भूपः किं करोमि हिताहितम्।<br>भवद्भिरस्तु शमः कार्यो महान्तो हि दयालवः॥ ४२लिये मेरे घर आयें। कन्याने तो उस राजकुमार सुदर्शनका पतिरूपमें वरण कर लिया है। मैं इस विषयमें अच्छा-बुरा क्या कर सकता हूँ? अब आपलोग शान्त हो जायें; क्योंकि महान् लोग दयालु होते हैं॥ ४१-४२॥
तन्निशम्य वचस्तस्य नृपाः क्रोधपरप्लुताः।<br>प्रत्यूचुर्भुक्तमस्माभिः स्वगृहं नृपते व्रज॥ ४३राजा सुबाहुकी बात सुनकर सभी राजा क्रोधसे तमतमा उठे। उन्होंने कहा—राजन्! हमलोग भोजन कर चुके, अब आप अपने घर जाइये। आपको जो अच्छा लगा, उसे आपने कर लिया। जो कार्य शेष हों उन सबको भी जाकर कर लीजिये। अब सभी राजागण अपने-अपने घर चले जायेंगे॥ ४३-४४॥
कुरु कार्याण्यशेषाणि यथेष्टं सुकृतं कृतम्।<br>नृपाः सर्वे प्रयान्त्वद्य स्वानि स्वानि गृहाणि वै॥ ४४
सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा जगाम शङ्कितो गृहम्।<br>किं करिष्यन्ति संविग्नाः क्रोधयुक्ता नृपोत्तमाः॥ ४५सुबाहु भी यह सुनकर घर चले गये और शंका करने लगे कि ये क्षुब्ध तथा कुपित राजागण अब न जाने क्या कर डालेंगे॥ ४५॥
गते तस्मिन्महीपालाश्चक्रुश्च समयं पुनः।<br>रुद्ध्वा मार्गं ग्रहीष्यामः कन्यां हत्वा सुदर्शनम्॥ ४६राजा सुबाहुके चले जानेपर उन नरेशोंने यह निश्चय किया कि अब हमलोग मार्ग रोककर सुदर्शनको मारकर कन्याको छीन लेंगे॥ ४६॥
केचनोचुः किमस्माकं हन्त तेन नृपेण वै।<br>दृष्ट्वा तु कौतुकं सर्वं गमिष्यामो यथागतम्॥ ४७उनमेंसे कुछ राजाओंने कहा—अरे! उस राजकुमार सुदर्शनसे हमारा क्या वैर? हमने यहाँका सब कौतुक देख लिया। अब हम जैसे आये थे, वैसे ही घर लौट चलें॥ ४७॥
इत्युक्त्वा ते नृपाः सर्वे मार्गमाक्रम्य संस्थिताः।<br>चकारोत्तरकार्याणि सुबाहुः स्वगृहं गतः॥ ४८ऐसा कहकर वे सब [विरोधी] राजागण मार्ग रोककर खड़े हो गये और राजा सुबाहु अपने भवन पहुँचकर आगेके कृत्य सम्पादित करने लगे॥ ४८॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
सुदर्शनशशिकलयोर्विवाहवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
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अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तस्मै गौरवभोज्यानि विधाय विधिवत्तदा।<br>वासराणि च षड्राजा भोजयामास भक्तितः॥ १[हे राजन्!] उस समय राजा सुबाहुने छः दिनोंतक विविध प्रकारके भोजन बनवाकर सुदर्शनको प्रेमपूर्वक खिलाया॥ १॥
एवं विवाहकार्याणि कृत्वा सर्वाणि पार्थिवः।<br>पारिबर्हं प्रदत्त्वाथ मन्त्रयन्सचिवैः सह॥ २<br>दूतैस्तु कथितं श्रुत्वा मार्गसंरोधनं कृतम्।<br>बभूव विमना राजा सुबाहुरमितद्युतिः॥ ३इस प्रकार विवाहके सभी कृत्य करके राजा सुबाहु सुदर्शनको उपहार प्रदान करके सचिवोंके साथ मन्त्रणा कर रहे थे, उसी समय अपने दूतोंका यह कथन सुनकर कि विरोधी राजाओंने मार्ग रोक रखा है, वे अमित तेजवाले राजा सुबाहु खिन्नमनस्क हो गये॥ २-३॥

३६२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २३

३६२ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुदर्शनस्तदोवाच श्वशुरं संशितव्रतः।<br>अस्मान्विसर्जयाशु त्वं गमिष्यामो ह्यशङ्किताः॥ ४तब व्रतपरायण सुदर्शनने अपने श्वसुरसे कहा—आप हमें शीघ्र विदा कर दीजिये, हम निःशंक होकर चले जायँगे॥ ४॥
भारद्वाजाश्रमं पुण्यं गत्वा तत्र समाहिताः।<br>निवासाय विचारो वै कर्तव्यः सर्वथा नृप॥ ५हे राजन्! भारद्वाजमुनिके पवित्र आश्रममें पहुँचनेपर वहीं सावधानीके साथ आगे रहनेके लिये विचार कर लिया जायगा॥ ५॥
नृपेभ्यश्च न कर्तव्यं भयं किञ्चित्त्वयानघ।<br>जगन्माता भवानी मे साहाय्यं वै करिष्यति॥ ६अतः हे पुण्यात्मन्! उन राजाओंसे आप कुछ भी भय न करें; क्योंकि जगज्जननी भगवती मेरी सहायता अवश्य करेंगी॥ ६॥
व्यास उवाच<br>तस्येति मतमाज्ञाय जामातुर्नृपसत्तमः।<br>विससर्ज धनं दत्त्वा प्रतस्थे सोऽपि सत्वरः॥ ७<br>बलेन महताविष्टो ययावनु नृपोत्तमः।<br>सुदर्शनो वृतस्तत्र चचाल पथि निर्भयः॥ ८व्यासजी बोले—अपने जामाता सुदर्शनका ऐसा विचार जानकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उन्हें धन देकर विदा कर दिया और वे सुदर्शन भी तत्काल चल पड़े। नृपश्रेष्ठ सुबाहु भी एक विशाल सेना लेकर उनके पीछे-पीछे चले। इस प्रकार उन सैनिकोंसे आवृत सुदर्शन निर्भय होकर मार्गमें चले जा रहे थे॥ ७-८॥
रथैः परिवृतः शूरः सदारो रथसंस्थितः।<br>गच्छन्ददर्श सैन्यानि नृपाणां रघुनन्दनः॥ ९रथोंसे घिरे हुए एक रथपर अपनी पत्नीके साथ बैठकर जाते हुए रघुनन्दन सुदर्शनने मार्गमें उन राजाओंके सैनिकोंको देखा॥ ९॥
सुबाहुरपि तान्वीक्ष्य चिन्ताविष्टो बभूव ह।<br>विधिवत्स शिवां चित्ते जगाम शरणं मुदा॥ १०<br>जजापैकाक्षरं मन्त्रं कामराजमनुत्तमम्।<br>निर्भयो वीतशोकश्च पत्या सह नवोढया॥ ११राजा सुबाहु भी उन सैनिकोंको देखकर चिन्तित हुए। तब सुदर्शनने विधिपूर्वक अपने मनमें भगवती जगदम्बाका ध्यान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी शरण ली। उस समय सुदर्शन एकाक्षर कामराज नामक सर्वोत्तम मन्त्रका जप कर रहे थे, उसके प्रभावसे वे अपनी नवविवाहिता पत्नीके साथ निर्भय तथा चिन्तामुक्त थे॥ १०-११॥
ततः सर्वे महीपालाः कृत्वा कोलाहलं तदा।<br>उत्थिताः सैन्यसंयुक्ता हन्तुकामास्तु कन्यकाम्॥ १२इसी बीच सभी राजा एक साथ कोलाहल करके कन्याका हरण करनेकी इच्छासे अपनी-अपनी सेनाके साथ उनकी ओर बढ़े॥ १२॥
काशिराजस्तु तान्दृष्ट्वा हन्तुकामो बभूव ह।<br>निवारितस्तदात्यर्थं राघवेण जिगीषता॥ १३उन्हें ऐसा करते देखकर काशीनरेश सुबाहुने उनको मारनेका विचार किया, किंतु विजयकी इच्छावाले रघुवंशी सुदर्शनने उन्हें मना कर दिया॥ १३॥
तत्रापि नेदुः शङ्खाश्च भेर्यश्चानकदुन्दुभिः।<br>सुबाहोश्च नृपाणाञ्च परस्परजिघांसताम्॥ १४उस समय एक दूसरेको मार डालनेकी अभिलाषावाले महाराज सुबाहु तथा अन्य राजाओंकी सेनाओंमें शंख भेरी, नगाड़े और दुन्दुभि बजने लगे॥ १४॥
शत्रुजित्तु सुसंवृत्तः स्थितस्तत्र जिघांसया।<br>युधाजित्तत्सहायार्थं सन्नद्धः प्रबभूव ह॥ १५सुदर्शनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुजित् सैन्य-बलसे युक्त होकर बड़ी तत्परतासे तैयार खड़ा था और राजा युधाजित् भी उसकी सहायताके लिये

| अ० २३ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
केचिच्च प्रेक्षकास्तस्य सहानीकैः स्थितास्तदा ।<br>युधाजिदग्रतो गत्वा सुदर्शनमुपस्थितः ॥ १६<br><br>शत्रुजित्तेन सहितो हन्तुं भ्रातरमानुजः ।<br>परस्परं ते बाणौघैस्ततक्षुः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ १७<br><br>सम्मर्दः सुमहांस्तत्र सम्प्रवृत्तः सुमार्गणेः ।<br>काशीपतिस्तदा तूर्णं सैन्येन बहुना वृतः ॥ १८सन्नद्ध थे। उनमें कुछ राजागण अपनी सेनाके साथ दर्शकके रूपमें खड़े थे। तभी युधाजित् आगे बढ़कर सुदर्शनके समक्ष जा डटा। उसके साथ शत्रुजित् भी अपने भाईका वध करनेके लिये आ गया। तब क्रोधके वशीभूत होकर वे सब परस्पर एक-दूसरेपर बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार वहाँ बाणोंद्वारा बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया। तब काशीनरेश सुबाहु एक विशाल सेना लेकर अपने सुशंसित जामाताकी सहायताके लिये जा पहुँचे ॥ १५-१८ १/२ ॥
साहाय्यार्थं जगामाशु जामातरमनिन्दितम्।<br>एवं प्रवृत्ते संग्रामे दारुणे लोमहर्षणे ॥ १९<br><br>प्रादुर्बभूव सहसा देवी सिंहोपरि स्थिता ।<br>नानायुधधरा रम्या वराभूषणभूषिता ॥ २०इस प्रकार भयानक लोमहर्षक संग्राम छिड़ जानेपर सहसा भगवती प्रकट हो गयीं। वे सिंहपर सवार थीं, विविध प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण किये थीं, अत्यन्त मनोहर थीं तथा उत्तम आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य वस्त्र पहने थीं और मन्दारकी मालासे सुशोभित थीं ॥ १९-२० १/२ ॥
दिव्याम्बरपरीधाना मन्दारस्रक्सुसंयुता ।<br>तां दृष्ट्वा तेऽथ भूपाला विस्मयं परमं गताः ॥ २१<br><br>केयं सिंहसमारूढा कुतो वेति समुत्थिता ।<br>सुदर्शनस्तु तां वीक्ष्य सुबाहुमिति चाब्रवीत् ॥ २२<br><br>पश्य राजन् महादेवीमागतां दिव्यदर्शनाम्।<br>अनुग्रहाय मे नूनं प्रादुर्भूता दयान्विता ॥ २३उन्हें देखकर वे राजागण अत्यन्त चकित हो गये। वे कहने लगे कि सिंहपर सवार यह स्त्री कौन है और कहाँसे प्रकट हो गयी है? उन्हें देखकर सुदर्शनने सुबाहुसे कहा—हे राजन्! यहाँ प्रादुर्भूत हुई इन दिव्य दर्शनवाली महादेवीको आप देखें। ये दयामयी भगवती निश्चय ही मुझपर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई हैं। हे महाराज! मैं निर्भय तो पहले ही था, किंतु अब और भी अधिक निर्भय हो गया ॥ २१-२३ १/२ ॥
निर्भयोऽहं महाराज जातोऽस्मि निर्भयादपि ।<br>सुदर्शनः सुबाहुश्च तामालोक्य वराननाम् ॥ २४<br><br>प्रणामं चक्रतुस्तस्या मुदितौ दर्शनेन च।<br>ननाद च तदा सिंहो गजास्त्रस्ताश्चकम्पिरे ॥ २५सुदर्शन और सुबाहुने उन सुमुखी भगवतीको देखकर उन्हें प्रणाम किया। उनके दर्शनसे वे दोनों प्रसन्न हो गये। उसी समय भगवतीके सिंहने भीषण गर्जन किया, जिससे उस रणभूमिमें विद्यमान सभी हाथी भयसे काँपने लगे। उस समय महाभीषण आँधी चलने लगी और सभी दिशाएँ अत्यन्त भयानक हो गयीं ॥ २४-२५ १/२ ॥
ववुर्वाता महाघोरा दिशश्चासान्त्सुदारुणाः ।<br>सुदर्शनस्तदा प्राह निजं सेनापतिं प्रति ॥ २६<br><br>मार्गे व्रज त्वं तरसा भूपाला यत्र संस्थिताः ।<br>किं करिष्यन्ति राजानः कुपिता दुष्टचेतसः ॥ २७<br><br>शरणार्थञ्च सम्प्राप्ता देवी भगवती हि नः।<br>निरातङ्कैश्च गन्तव्यं मार्गेऽस्मिन्भूपसङ्कुले ॥ २८तब सुदर्शनने अपने सेनापतिसे कहा कि जहाँ ये राजागण [मार्ग रोककर] खड़े हैं, उधर ही तुम वेगसे आगे बढ़ो। ये दुष्ट तथा कुपित राजालोग हमारा क्या कर लेंगे? अब हमें शरण देनेके लिये स्वयं भगवती जगदम्बा आ गयी हैं। अतएव हमें निर्भय होकर राजाओंसे भरे इस मार्गपर आगे बढ़ना
३६४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३ ]

| स्मृता मया महादेवी रक्षणार्थमुपागता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं सेनापतिस्तेन पथाव्रजत्॥ २९ | चाहिये। मेरे स्मरण करते ही मेरी रक्षाके लिये ये भगवती आ गयी हैं। सुदर्शनका वचन सुनकर सेनापति उसी मार्गसे आगे बढ़ा॥ २६—२९॥ | | युधाजित्तु सुसंक्रुद्धस्तानुवाच महीपतीन्।<br>किं स्थिता भयसन्त्रस्ता निघ्नन्तु कन्यकान्वितम्॥ ३० | अतिशय कुपित होकर युधाजित्ने उन राजाओंसे कहा—तुमलोग भयभीत होकर खड़े क्यों हो; कन्यासहित इस सुदर्शनको मार डालो॥ ३०॥ | | अवमन्य च नः सर्वान्बलहीनो बलाधिकान्।<br>कन्यां गृहीत्वा संयाति निर्भयस्तरसा शिशुः॥ ३१ | हम सभी बलवानोंका तिरस्कार करके यह बलहीन बालक कन्याको लेकर निर्भीकतापूर्वक बड़े वेगसे चला जा रहा है॥ ३१॥ | | किं भीताः कामिनीं वीक्ष्य सिंहोपरि सुसंस्थिताम्।<br>नोपेक्ष्यो हि महाभागा हन्तव्योऽत्र समाहितैः॥ ३२ | सिंहपर विराजमान उस स्त्रीको देखकर तुमलोग क्यों डरते हो? हे महाभाग राजाओ! इस समय सुदर्शनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये और अत्यन्त सावधान होकर इसका वध कर देना चाहिये॥ ३२॥ | | हत्वैनं संग्रहीष्यामः कन्यां चारुविभूषणाम्।<br>नायं केसरिणादत्तां छेत्तुमर्हति जम्बुकः॥ ३३ | इसे मारकर हम सुन्दर आभूषण धारण करनेवाली कन्याको छीन लेंगे। हम सिंहसदृश वीरोंके भागको यह सियार नहीं ले जा सकता॥ ३३॥ | | इत्युक्त्वा सैन्यसंयुक्तः शत्रुजित्सहितस्तदा।<br>योद्धुकामः सुसम्प्राप्तो युधाजित्क्रोधसंवृतः॥ ३४ | ऐसा कहकर वह युधाजित् अत्यन्त कुपित हो [अपने दौहित्र] शत्रुजित् तथा विशाल सेनाको साथ लिये हुए युद्धकी इच्छासे आ डटा॥ ३४॥ | | मुमोच विशिखांस्तूर्णं समपुंखाञ्छिलाशितान्।<br>धनुराकृष्य कर्णान्तं कर्मारपरिमार्जितान्॥ ३५ | अब वह कानतक धनुष खींचकर लोहारके द्वारा सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए, शिलापर घिसकर तेज किये गये तथा समान पुच्छयुक्त बाणोंको शीघ्रतापूर्वक छोड़ने लगा॥ ३५॥ | | हन्तुकामः सुदुर्मेधाः सुदर्शनमथोपरि।<br>सुदर्शनस्तु तान्बाणैश्चिच्छेदापततः क्षणात्॥ ३६ | इस प्रकार उसके ऊपर प्रहार करके वह दुर्बुद्धि युधाजित् सुदर्शनको मार डालना चाहता था, किंतु सुदर्शनने उसके बाणोंको छूटते ही अपने बाणोंसे क्षणभरमें काट डाला॥ ३६॥ | | एवं युद्धे प्रवृत्तेऽथ चुकोप चण्डिका भृशम्।<br>दुर्गादेवी मुमोचाथ बाणान्युधाजितं प्रति॥ ३७ | वह भीषण युद्ध छिड़ जानेपर भगवती चण्डिका अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं और युधाजित्पर बाण बरसाने लगीं॥ ३७॥ | | नानारूपा तदा जाता नानाशास्त्रधरा शिवा।<br>सम्प्राप्ता तुमुलं तत्र चकार जगदम्बिका॥ ३८ | उस समय कल्याणमयी जगदम्बिका विविध रूप धारण कर लेती थीं। वे नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र लेकर घमासान युद्ध कर रही थीं॥ ३८॥ | | शत्रुजिन्निहतस्तत्र युधाजिदपि पार्थिवः।<br>पतितौ तौ रथाभ्यां तु जयशब्दस्तदाभवत्॥ ३९ | कुछ ही क्षणोंमें शत्रुजित् और राजा युधाजित्—दोनों मार डाले गये और अपने-अपने रथोंसे गिर पड़े। उस समय जयजयकारकी ध्वनि होने लगी॥ ३९॥ | | विस्मयं परमं प्राप्ता भूपाः सर्वे विलोक्य ताम्।<br>निधनं मातुलस्यापि भागिनेयस्य संयुगे॥ ४० | उस युद्धमें भगवतीको तथा मामा और भांजेकी (नाना-नातीकी) मृत्यु देखकर सभी राजा बहुत विस्मयमें पड़ गये॥ ४०॥ |

अ० २३ ] तृतीय स्कन्ध ३६५

अ० २३ ] तृतीय स्कन्ध ३६५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुबाहुरपि तद् दृष्ट्वा निधनं संयुगे तयोः।<br>तुष्टाव परमप्रीतो दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ ४१महाराज सुबाहु भी रणभूमिमें उन दोनोंका मरण देखकर बहुत प्रसन्न हुए और दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गाकी स्तुति करने लगे॥ ४१॥
सुबाहुरुवाच<br>नमो देव्यै जगद्धात्र्यै शिवायै सततं नमः।<br>दुर्गायै भगवत्यै ते कामदायै नमो नमः॥ ४२सुबाहु बोले— जगत्को धारण करनेवाली देवीको नमस्कार है। भगवती शिवाको निरन्तर नमस्कार है। मनोरथ पूर्ण करनेवाली आप भगवती दुर्गाको बार-बार नमस्कार है॥ ४२॥
नमः शिवायै शान्त्यै ते विद्यायै मोक्षदे नमः।<br>विश्वव्याप्त्यै जगन्मातर्जगद्धात्र्यै नमः शिवे॥ ४३आप शिवा और शान्तिदेवीको नमस्कार है। हे मोक्षदायिनि! आप विद्यास्वरूपिणीको नमस्कार है। हे जगन्माता! हे शिवे! आप विश्वव्यापिनी तथा जगज्जननीको नमस्कार है॥ ४३॥
नाहं गतिं तव धिया परिचिन्तयन्वै<br>जानामि देवि सगुणः किल निर्गुणायाः।<br>किं स्तौमि विश्वजननीं प्रकटप्रभावां<br>भक्तार्तिनाशनपरां परमां च शक्तिम्॥ ४४हे देवि! मैं सगुण प्राणी अपनी बुद्धिसे बहुत प्रकारसे चिन्तन करके भी आप निर्गुणा भगवतीकी गतिको नहीं जान पाता। हे विश्वजननि! प्रत्यक्ष प्रभाववाली, भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें तत्पर तथा परम शक्तिस्वरूपा आपकी स्तुति मैं कैसे करूँ?॥ ४४॥
वाग्देवता त्वमसि सर्वगतैव बुद्धि-<br>र्विद्या मतिश्च गतिरप्यसि सर्वजन्तोः।<br>त्वां स्तौमि किं त्वमसि सर्वमनोनियन्त्री<br>किं स्तूयते हि सततं खलु चात्मरूपम्॥ ४५आप ही देवी सरस्वती हैं, आप ही बुद्धिरूपसे सबके भीतर विराजमान हैं, आप ही सब प्राणियोंकी विद्या, मति और गति हैं और आप ही सबके मनका नियन्त्रण करती हैं, तब मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? सर्वव्यापी आत्माके रूपकी भी स्तुति भला कभी की जा सकती है?॥ ४५॥
ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं स्तुवन्तो<br>नान्तं गताः सुरवराः किल ते गुणानाम्।<br>क्वाहं विभेदमतिरम्ब गुणैर्वृतो वै<br>वक्तुं क्षमस्तव चरित्रमहोऽप्रसिद्धः॥ ४६देवताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु और शिव निरन्तर आपकी स्तुति करते हुए भी आपके गुणोंके पार नहीं जा सके। तब हे अम्ब! भेदबुद्धिवाला, सत्त्व आदि गुणोंसे आबद्ध तथा अप्रसिद्ध एक तुच्छ जीव मैं आपके चरित्रका वर्णन करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ?॥ ४६॥
सत्सङ्गतिः कथमहो न करोति कामं<br>प्रासङ्गिकापि विहिता खलु चित्तशुद्धिः।<br>जामातुरस्य विहितेन समागमेन<br>प्राप्तं मयाऽद्भुतमिदं तव दर्शनं वै॥ ४७अहो! सत्संग कौन-सा मनोरथ पूर्ण नहीं कर देता? आपके इस प्रासंगिक संगसे ही मेरा चित्त शुद्ध हो गया। [आपके भक्त] अपने इस जामाता सुदर्शनके संगके प्रभावसे मैंने अनायास आपका यह अद्भुत दर्शन पा लिया॥ ४७॥
ब्रह्मापि वाञ्छति सदैव हरो हरिश्च<br>सेन्द्राः सुराश्च मुनयो विदितार्थतत्त्वाः।<br>यद्दर्शनं जननि तेऽद्य मया दुरापं<br>प्राप्तं विना दमशमादिसमाधिभिश्च॥ ४८हे जननि! ब्रह्मा, शिव, भगवान् विष्णु, इन्द्र-सहित सभी देवता तथा तत्त्वज्ञानी मुनिलोग भी आपके जिस दर्शनको चाहते हैं, वह आपका दुर्लभ दर्शन मुझे बिना शम, दम तथा समाधि आदिके ही प्राप्त हो गया॥ ४८॥
३६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २३

| क्वाहं सुमन्दमतिराशु तवावलोकं<br>क्वेदं भवानि भवभेषजमद्वितीयम्।<br>ज्ञातासि देवि सततं किल भावयुक्ता<br>भक्तानुकम्पनपरामरवर्गपूज्या ॥ ४९ | हे भवानि ! कहाँ अतिशय मन्दमति मैं और कहाँ भवरूपी रोगके लिये औषधिस্বরূপ आपका यह शीघ्र अद्वितीय दर्शन ! हे देवि ! मुझे ज्ञात हो गया कि आप सदा भावनायुक्त रहती हैं। देवसमूहद्वारा पूजी जानेवाली आप अपने भक्तोंपर अनुकम्पा करती हैं ॥ ४९ ॥ | | किं वर्णयामि तव देवि चरित्रमेतद्<br>यद्रक्षितोऽस्ति विषमेऽत्र सुदर्शनोऽयम्।<br>शत्रू हतौ सुबलिनौ तरसा त्वयाद्य<br>भक्तानुकम्पि चरितं परमं पवित्रम्॥ ५० | हे देवि ! आपने इस भीषण संकटके समय जिस प्रकार इस सुदर्शनकी रक्षा की है, आपके इस चरित्रका मैं किस तरह वर्णन करूँ? आपने आज इसके दो बलवान् शत्रुओंको तत्काल मार डाला। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाला आपका यह चरित्र परम पवित्र है ॥ ५० ॥ | | नाश्चर्यमेतदिति देवि विचारितेऽर्थे<br>त्वं पासि सर्वमखिलं स्थिरजङ्गमं वै।<br>त्रातस्त्वया च विनिहत्य रिपुर्दयातः<br>संरक्षितोऽयमधुना ध्रुवसन्थिसूनुः॥ ५१ | हे देवि ! विशेष विचार करनेपर ज्ञात होता है कि आपका ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप अखिल स्थावर-जंगम जगत्की रक्षा करती हैं। आपने शत्रुको मारकर दयालुतावश ध्रुवसन्धिके पुत्र इस सुदर्शनकी इस समय रक्षा की ॥ ५१ ॥ | | भक्तस्य सेवनपरस्य स्वयशोऽतिदीप्तं<br>कर्तुं भवानि रचितं चरितं त्वयैतत्।<br>नोचेत्कथं सुपरिगृह्य सुतां मदीयां<br>युद्धे भवेत्कुशलवाननवद्यशीलः॥ ५२ | हे भवानि ! अपने सेवापरायण भक्तके यशको अत्यन्त उज्ज्वल बनानेके लिये ही आपने इस चरित्रकी रचना की है, नहीं तो मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके यह असमर्थ सुदर्शन युद्धमें सकुशल जीवित कैसे बच सकता था ? ॥ ५२ ॥ | | शक्तासि जन्ममरणादिभयान्विहन्तुं<br>किं चित्रमत्र किल भक्तजनस्य कामम्।<br>त्वं गीयसे जननि भक्तजनैरपारा<br>त्वं पापपुण्यरहिता सगुणागुणा च॥ ५३ | जब आप अपने भक्तोंके जन्म-मरण आदि भयोंको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, तब उसकी लौकिक अभिलाषा पूर्ण कर देना कौन बड़ी बात है ? हे जननि ! आप पाप-पुण्यसे रहित, सगुणा तथा निर्गुणा हैं; इसी कारण भक्तजन सदा आपके गुण गाते रहते हैं ॥ ५३ ॥ | | त्वद्दर्शनादहमहो सुकृती कृतार्थो<br>जातोऽस्मि देवि भुवनेश्वरि धन्यजन्मा।<br>बीजं न ते न भजनं किल वेद्मि मात-<br>र्ज्ञातस्तवाद्य महिमा प्रकटप्रभावः॥ ५४ | हे देवि ! हे भुवनेश्वरि ! आज आपके दर्शनसे मैं पवित्र, कृतार्थ और धन्य जन्मवाला हो गया। हे माता! मैं न आपका भजन जानता हूँ और न तो बीजमन्त्र जानता हूँ। मैं आपकी प्रत्यक्ष प्रभाववाली महिमाको आज जान गया ॥ ५४ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी प्रसन्नवदना शिवा।<br>उवाच तं नृपं देवी वरं वरय सुव्रत॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**महाराज सुबाहुके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती शिवाका मुखमण्डल प्रसन्नतासे भर गया। तब भगवतीने उन राजासे कहा—हे सुव्रत ! तुम वर माँगो ॥ ५५ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुबाहुकृतदेवीस्तुतिवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति लेकर अपने-अपने राज्योंको प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भवान्याः स नृपोत्तमः।<br>प्रोवाच वचनं तत्र सुबाहुर्भक्तिसंयुतः॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उन भवानीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने भक्तिसे युक्त होकर यह बात कही— ॥ १ ॥
सुबाहुरुवाच<br>एकतो देवलोकस्य राज्यं भूमण्डलस्य च।<br>एकतो दर्शनं ते वै न च तुल्यं कदाचन॥ २**सुबाहु बोले—**हे माता! एक ओर देवलोक तथा समस्त भूमण्डलका राज्य और दूसरी ओर आपका दर्शन; वे दोनों तुल्य कभी नहीं हो सकते ॥ २ ॥
दर्शनात्सदृशं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु नास्ति मे।<br>कं वरं देवि याचेऽहं कृतार्थोऽस्मि धरातले॥ ३आपके दर्शनसे बढ़कर समस्त त्रिलोकीमें कोई भी वस्तु नहीं है। हे देवि! मैं आपसे क्या वर माँगूँ? मैं तो इस जगतीतलममें आपके दर्शनसे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं मातर्याचितुं वाञ्छितं वरम्।<br>तव भक्तिः सदा मेऽस्तु निश्चला ह्यनपायिनी॥ ४हे माता! मैं तो यही अभीष्ट वर माँगना चाहता हूँ कि आपकी स्थिर तथा अखण्ड भक्ति मेरे हृदयमें बनी रहे ॥ ४ ॥
नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा।<br>दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता॥ ५<br>रक्षा त्वया च कर्तव्या सर्वदा नगरस्य ह।<br>यथा सुदर्शनस्त्रातो रिपुसंघादनामयः॥ ६<br>तथात्र रक्षा कर्तव्या वाराणस्यास्त्वयाम्बिके।<br>यावत्पुरी भवेद्भूभौ सुप्रतिष्ठा सुसंस्थिताः॥ ७<br>तावत्त्वयात्र स्थातव्यं दुर्गे देवि कृपानिधे।<br>वरोऽयं मम ते देयः किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम्॥ ८हे माता! आप मेरी नगरी काशीमें सदा निवास करें। आप शक्तिस्वरूपा होकर दुर्गादेवीके नामसे यहाँ विराजमान रहें और सर्वदा नगरकी रक्षा करती रहें। हे अम्बिके! इस समय आपने जिस तरह शत्रुदलसे सुदर्शनकी रक्षा की है और उसे विकार-रहित बना दिया है, उसी तरह आप सदा वाराणसीकी रक्षा करें। हे देवि! हे कृपानिधे! जबतक भूलोकमें काशीनगरी सुप्रतिष्ठित होकर विद्यमान रहे, तबतक आप यहाँ विराजमान रहें— आप मुझे यही वरदान दें, इसके अतिरिक्त मैं आपसे और दूसरा क्या माँगूँ? ॥ ५–८ ॥
विविधांन्सकलांकामांदेहि मे विद्विषो जहि।<br>अभद्राणां विनाशञ्च कुरु लोकस्य सर्वदा॥ ९आप मेरी विविध प्रकारकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करें, मेरे शत्रुओंका नाश करें और जगत्‌के सभी अमंगलोंको सदाके लिये नष्ट कर डालें ॥ ९ ॥
व्यास उवाच<br>इति सम्प्रार्थिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>तमुवाच नृपं तत्र स्तुत्वा वै संस्थितं पुरः॥ १०**व्यासजी बोले—**इस प्रकार राजा सुबाहुके सम्यक् प्रार्थना करनेपर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा स्तुति करके अपने समक्ष खड़े राजा सुबाहुसे कहने लगीं— ॥ १० ॥
दुर्गोवाच<br>राजन् सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति।<br>रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी॥ ११**दुर्गाजी बोलीं—**हे राजन्! जबतक यह पृथिवी रहेगी, तबतक सभी लोकोंकी रक्षाके लिये मैं निरन्तर इस मुक्तिपुरी काशीमें निवास करूँगी ॥ ११ ॥

| ३६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ | | :--- | :--- |

| अथो सुदर्शनस्तत्र समागम्य मुदान्वितः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्॥ १२ | इसके बाद सुदर्शन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आकर उन्हें प्रणाम करके परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति करने लगे— ॥ १२॥ | | अहो कृपा ते कथयाम्यहं किं<br>त्रातस्त्वया यत्किल भक्तिहीनः।<br>भक्तानुकम्पी सकलो जनोऽस्ति<br>विमुक्तभक्तेरवनं व्रतं ते॥ १३ | अहो! मैं आपकी कृपाका वर्णन कहाँतक करूँ! आपने मुझ जैसे भक्तिहीनकी भी रक्षा कर ली। अपने भक्तोंपर तो सभी लोग अनुकम्पा करते हैं, किंतु भक्तिरहित प्राणीकी भी रक्षा करनेका व्रत आपने ही ले रखा है॥ १३॥ | | त्वं देवि सर्वं सृजसि प्रपञ्चं<br>श्रुतं मया पालयसि स्वसृष्टम्।<br>त्वमत्सि संहारपरे च काले<br>न तेऽत्र चित्रं मम रक्षणं वै॥ १४ | मैंने सुना है कि आप ही समस्त विश्व-प्रपंचकी रचना करती हैं और अपनेद्वारा सृजित उस जगत्का पालन करती हैं तथा यथोचित समय उपस्थित होनेपर उसे अपनेमें समाहित कर लेती हैं; तब आपने जो मेरी रक्षा की, उसमें कोई आश्चर्य नहीं॥ १४॥ | | करोमि किं ते वद देवि कार्यं<br>क्व वा ब्रजामीत्यनुमोदयाशु।<br>कार्ये विमूढोऽस्मि तवाज्ञयाहं<br>गच्छामि तिष्ठे विहरामि मातः॥ १५ | हे देवि! अब यह बताइये कि मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ; मैं कहाँ जाऊँ? मुझे शीघ्र आदेश दीजिये। मैं इस समय किंकर्तव्यविमूढ हो रहा हूँ। हे माता! मैं आपकी ही आज्ञासे जाऊँगा, ठहरूँगा या विहार करूँगा॥ १५॥ | | व्यास उवाच<br>तं तथा भाषमाणं तु देवी प्राह दयान्विता।<br>गच्छायोध्यां महाभाग कुरु राज्यं कुलोचितम्॥ १६ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहते हुए उस सुदर्शनसे भगवतीने दयापूर्वक कहा—हे महाभाग! अब तुम अयोध्या जाओ और अपने कुलकी मर्यादाके अनुसार राज्य करो॥ १६॥ | | स्मरणीया सदाहं ते पूजनीया प्रयत्नतः।<br>शं विधास्याम्यहं नित्यं राज्ये ते नृपसत्तम॥ १७ | हे नृपश्रेष्ठ! तुम प्रयत्नके साथ सदा मेरा स्मरण तथा पूजन करते रहना और मैं भी तुम्हारे राज्यका सर्वदा कल्याण करती रहूँगी॥ १७॥ | | अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।<br>मम पूजा प्रकर्तव्या बलिदानविधानतः॥ १८<br>अर्चा मदीया नगरे स्थापनीया त्वयानघ।<br>पूजनीया प्रयत्नेन त्रिकालं भक्तिपूर्वकम्॥ १९ | अष्टमी, चतुर्दशी और विशेष करके नवमी तिथिको विधि-विधानसे मेरी पूजा अवश्य करते रहना। हे अनघ! तुम अपने नगरमें मेरी प्रतिमा स्थापित करना और प्रयत्नके साथ भक्तिपूर्वक तीनों समय मेरा पूजन करते रहना॥ १८-१९॥ | | शरत्काले महापूजा कर्तव्या मम सर्वदा।<br>नवरात्रविधानेन भक्तिभावयुतेन च॥ २०<br>चैत्रेऽश्विने तथाषाढे माघे कार्यो महोत्सवः।<br>नवरात्रे महाराज पूजा कार्या विशेषतः॥ २१ | शरत्कालमें सर्वदा नवरात्रविधानके अनुसार भक्तिभावसे युक्त होकर मेरी महापूजा करनी चाहिये। हे महाराज! चैत्र, आश्विन, आषाढ़ तथा माघमासमें नवरात्रके अवसरपर मेरा महोत्सव मनाना चाहिये और विशेषरूपसे मेरी महापूजा करनी चाहिये॥ २०-२१॥ | | कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मम भक्तिसमन्वितैः।<br>कर्तव्या नृपशार्दूल तथाष्टम्यां सदा बुधैः॥ २२ | हे नृपशार्दूल! विज्ञजनोंको चाहिये कि वे भक्तियुक्त होकर कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तथा अष्टमीको सदा मेरी पूजा करें॥ २२॥ |

| अ० २४ ] | तृतीय स्कन्ध | ३६१ | | :--- | :--- | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी।<br>नता सुदर्शनेनाथ स्तुता च बहुविस्तरम्॥ २३ | व्यासजी बोले— राजा सुदर्शनके स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर ऐसा कहकर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं॥ २३॥ | | अन्तर्हितां तु तां दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते।<br>प्रणेमुस्तं समागम्य यथा शक्रं सुरास्तथा॥ २४ | उन भगवतीको अन्तर्हित देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजाओंने आकर सुदर्शनको उसी प्रकार प्रणाम किया जैसे देवता इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ २४॥ | | सुबाहुरपि तं नत्वा स्थितश्चाग्रे मुदान्वितः।<br>ऊचुः सर्वे महीपाला अयोध्याधिपतिं तदा॥ २५ | महाराज सुबाहु भी उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षपूर्वक उनके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर उन सभी राजाओंने अयोध्यापति सुदर्शनसे कहा—॥ २५॥ | | त्वमस्माकं प्रभुः शास्ता सेवकास्ते वयं सदा।<br>कुरु राज्यमयोध्यायां पालयास्मान्नृपोत्तम॥ २६ | हे नृपश्रेष्ठ! आप हमारे स्वामी तथा शासक हैं और हम आपके सेवक हैं। अब आप अयोध्यामें राज्य करें और हमारा पालन करें॥ २६॥ | | त्वत्प्रसादान्महाराज दृष्टा विश्वेश्वरी शिवा।<br>आदिशक्तिर्भवानी सा चतुर्वर्गफलप्रदा॥ २७ | हे महाराज! आपकी कृपासे हमने धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली उन विश्वेश्वरी, शिवा और आदिशक्ति भवानीका दर्शन पा लिया॥ २७॥ | | धन्यस्त्वं कृतकृत्योऽसि बहुपुण्यो धरातले।<br>यस्माच्च त्वत्कृते देवी प्रादुर्भूता सनातनी॥ २८ | आप इस धरतीपर धन्य, कृतकृत्य और बड़े पुण्यात्मा हैं; क्योंकि आपके लिये साक्षात् सनातनी देवी प्रकट हुईं॥ २८॥ | | न जानीमो वयं सर्वे प्रभावं नृपसत्तम।<br>चण्डिकायास्तमोयुक्ता मायया मोहिताः सदा॥ २९<br>धनदारसुतानां च चिन्तनेऽभिरताः सदा।<br>मग्ना महार्णवे घोरे कामक्रोधझषाकुले॥ ३० | हे नृपसत्तम! तमोगुणसे युक्त और सदा मायासे मोहित रहनेवाले हम सभी लोग भगवती चण्डिकाका प्रभाव नहीं जानते। हम सदा धन, स्त्री और पुत्रोंकी चिन्तामें व्यग्र रहकर काम-क्रोधरूपी मत्स्योंसे भरे घोर महासागरमें डूबे रहते हैं॥ २९-३०॥ | | पृच्छामस्त्वां महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते।<br>केयं शक्तिः कुतो जाता किंप्रभावा वदस्व तत्॥ ३१ | हे महाभाग! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव हम आपसे यह पूछ रहे हैं कि ये शक्ति कौन हैं, कहाँसे उत्पन्न हुई हैं और इनका कैसा प्रभाव है? वह सब बताइये॥ ३१॥ | | भव त्वं नौश्च संसारे साधवोऽति दयापराः।<br>तस्मान्नो वद काकुत्स्थ देवीमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३२ | साधु पुरुष बड़े दयालु होते हैं। अतएव आप हमारे लिये इस संसार-सागरकी नौका बन जाइये। हे काकुत्स्थ! अब आप भगवतीके उत्तम माहात्म्यका वर्णन कीजिये॥ ३२॥ | | यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा।<br>तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वं ब्रूहि नृवरोत्तम॥ ३३ | हे नृपश्रेष्ठ! उनका जो प्रभाव हो, जो स्वरूप हो तथा वे जैसे प्रकट हुई हों; यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं, आप बतायें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तदा तैस्तु ध्रुवसंधिसुतो नृपः।<br>विचिन्त्य मनसा देवीं तानुवाच मुदान्वितः॥ ३४ | व्यासजी बोले— राजाओंके यह पूछनेपर ध्रुवसन्धिके पुत्र राजा सुदर्शन मन-ही-मन भगवतीका स्मरण करके हर्षपूर्वक उनसे कहने लगे—॥ ३४॥ |

३७०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४

| सुदर्शन उवाच | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! उन जगदम्बाके उत्तम चरित्रको मैं क्या कहूँ; क्योंकि ब्रह्मा आदि तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी उन्हें नहीं जानते॥ ३५॥ | | किं ब्रवीमि महीपालास्तस्याश्चरितमुत्तमम्।<br>ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा॥ ३५ | | | सर्वस्याद्या महालक्ष्मीर्वरेण्या शक्तिरुत्तमा।<br>सात्त्विकीयं महीपाला जगत्पालनतत्परा॥ ३६ | हे राजाओ! वे भगवती सबकी आदिरूपा हैं, महालक्ष्मीके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, वे वरेण्य हैं और उत्तम सात्त्विकी शक्तिके रूपमें समस्त विश्वका पालन करनेमें तत्पर रहती हैं॥ ३६॥ | | सृजते या रजोरूपा सत्त्वरूपा च पालने।<br>संहारे च तमोरूपा त्रिगुणा सा सदा मता॥ ३७ | वे अपने रजोगुणी स्वरूपसे सृष्टि करती, सत्त्वगुणी स्वरूपसे पालन करती और तमोगुणी स्वरूपसे इसका संहार करती हैं, इसी कारण वे त्रिगुणात्मिका कही गयी हैं। | | निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकामफलप्रदा।<br>सर्वेषां कारणं सा हि ब्रह्मादीनां नृपोत्तमाः॥ ३८ | परम शक्तिस्वरूपा निर्गुणा भगवती समस्त कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। हे श्रेष्ठ राजाओ! वे ब्रह्मा आदि सभी देवताओंकी भी आदिकारण हैं॥ ३७-३८॥ | | निर्गुणा सर्वथा ज्ञातुमशक्या योगिभिर्नृपाः।<br>सगुणा सुखसेव्या सा चिन्तनीया सदा बुधैः॥ ३९ | हे राजाओ! योगीलोग भी निर्गुणा भगवतीको जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं। अतः बुद्धिमानोंको चाहिये कि सरलतापूर्वक सेवनीय सगुणा भगवतीकी निरन्तर आराधना करें॥ ३९॥ | | राजान ऊचुः<br>बाल एव वनं प्राप्तस्त्वं तु नूनं भयातुरः।<br>कथं ज्ञाता त्वया देवी परमा शक्तिरुत्तमा॥ ४० | **राजागण बोले—**बाल्यावस्थामें ही आप वनवासी हो गये थे तथा भयसे व्याकुल थे। तब आपको उन उत्तम परमा शक्तिका ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?॥ ४०॥ | | उपासिता कथं चैव पूजिता च कथं नृप।<br>या प्रसन्ना तु साहाय्यं चकार त्वरयान्विता॥ ४१ | हे नृप! आपने उनकी उपासना और पूजा कैसे की, जिससे शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न होकर उन्होंने आपकी सहायता की॥ ४१॥ | | सुदर्शन उवाच<br>बालभावान्मया प्राप्तं बीजं तस्याः सुसम्मतम्।<br>स्मरामि प्रजपन्नित्यं कामबीजाभिधं नृपाः॥ ४२ | **सुदर्शन बोले—**हे राजाओ! बाल्यकालमें ही मुझे उनका अतिश्रेष्ठ बीजमन्त्र प्राप्त हो गया था। मैं उसी कामराज नामक बीजमन्त्रका सदा जप करता हुआ भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ॥ ४२॥ | | ऋषिभिः कथ्यमाना सा मया ज्ञाताम्बिका शिवा।<br>स्मरामि तां दिवारात्रं भक्त्या परमया पराम्॥ ४३ | ऋषियोंके द्वारा उन कल्याणमयी भगवतीके विषयमें बताये जानेपर मैंने उन्हें जाना और तभीसे मैं परम भक्तिके साथ दिन-रात उन परा शक्तिका स्मरण किया करता हूँ॥ ४३॥ | | व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य राजानो भक्तितत्पराः।<br>तां मत्वा परमां शक्तिं निर्ययुः स्वगृहान्प्रति॥ ४४ | **व्यासजी बोले—**सुदर्शनका वचन सुनकर वे राजा भी भक्तिपरायण हो गये और उन देवीको ही परम शक्ति मानकर अपने-अपने घर चले गये॥ ४४॥ | | सुबाहुरगमत्काश्यां तमापृच्छ्य सुदर्शनम्।<br>सुदर्शनोऽपि धर्मात्मा निर्जगाम सुकोसलान्॥ ४५ | सुदर्शनसे अनुमति लेकर महाराज सुबाहु काशी चले गये और धर्मात्मा सुदर्शन वहाँसे अयोध्याकी ओर चल पड़े॥ ४५॥ |

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३७१

अ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३७१

मन्त्रिणस्तु नृपं श्रुत्वा हतं शत्रुजितं मृधे।<br>जितं सुदर्शनञ्चैव बभूवुः प्रेमसंयुताः ॥ ४६राजा शत्रुजित् युद्धमें मारा गया और सुदर्शन विजयी हुए—यह सुनकर मन्त्रीलोग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे ॥ ४६ ॥
आगच्छन्तं नृपं श्रुत्वा तं साकेतनिवासिनः।<br>उपायनान्युपादाय प्रययुः सम्मुखे जनाः ॥ ४७<br><br>तथा प्रकृतयः सर्वे नानोपायनपाणयः।<br>ध्रुवसन्धिसुतं मत्वा मुदिताः प्रययुः प्रजाः ॥ ४८राजा सुदर्शनके आगमनका समाचार सुनकर साकेतके निवासी विविध प्रकारके उपहार लेकर उनके सम्मुख उपस्थित हुए और सब राजकर्मचारीगण भी हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर आये। महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शनको राजाके रूपमें जानकर अयोध्याकी समस्त प्रजा आनन्दविभोर हो गयी ॥ ४७-४८ ॥
स्त्रियोपसंयुतः सोऽथ प्राप्यायोध्यां सुदर्शनः।<br>सम्मान्य सर्वलोकांश्च ययौ राजा निवेशनम् ॥ ४९<br><br>बन्दिभिः स्तूयमानस्तु वन्द्यमानश्च मन्त्रिभिः।<br>कन्याभिः कीर्यमाणश्च लाजैः सुमनसैस्तथा ॥ ५०अपनी स्त्रीके साथ अयोध्यामें पहुँचकर सब लोगोंका सम्मान करके राजा सुदर्शन राजभवनमें गये। उस समय बन्दीजन उनकी स्तुति कर रहे थे, मन्त्रीगण उनकी वन्दना कर रहे थे और कन्याएँ उनके ऊपर लाजा (धानका लावा) तथा पुष्प बिखेर रही थीं ॥ ४९-५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुदर्शनेन देवीमहिमवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना

व्यास उवाच<br>गत्वायोध्यां नृपश्रेष्ठो गृहं राज्ञः सुहृद्वृतः।<br>शत्रुजिन्मातरं प्राह प्रणम्य शोकसंकुलाम् ॥ १<br><br>मातर्न ते मया पुत्रः संग्रामे निहतः किल।<br>न पिता ते युधाजिच्च शपे ते चरणौ तथा ॥ २व्यासजी बोले—अयोध्या पहुँचकर नृपश्रेष्ठ सुदर्शन अपने मित्रोंके साथ राजभवनमें गये। वहाँपर शत्रुजित्की परम शोकाकुल माताको प्रणामकर उन्होंने कहा—हे माता! मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके पुत्र तथा आपके पिता युधाजित्को युद्धमें मैंने नहीं मारा है ॥ १-२ ॥
दुर्गया तौ हतौ संख्ये नापराधो ममात्र वै।<br>अवश्यंभाविभावेषु प्रतीकारो न विद्यते ॥ ३स्वयं भगवती दुर्गाने रणभूमिमें उनका वध किया है; इसमें मेरा अपराध नहीं है। होनी तो अवश्य होकर रहती है, उसे टालनेका कोई उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
न शोकोऽत्र त्वया कार्यों मृतपुत्रस्य मानिनी।<br>स्वकर्मवशगो जीवो भुङ्क्ते भोगान्सुखासुखान् ॥ ४हे मानिनि! अपने मृत पुत्रके विषयमें आप शोक न करें; क्योंकि जीव अपने पूर्वकर्मोंके अधीन होकर सुख-दुःखरूपी भोगोंको भोगता है ॥ ४ ॥

३७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

दासोऽस्मि तव भो मातर्यथा मम मनोरमा।<br>तथा त्वमपि धर्मज्ञे न भेदोऽस्ति मनागपि॥ ५हे माता! मैं आपका दास हूँ। जैसे मनोरमा मेरी माता हैं, वैसे ही आप भी मेरी माता हैं। हे धर्मज्ञे! आपमें और उनमें मेरे लिये कुछ भी भेद नहीं है॥ ५॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>तस्मान्न शोचितव्यं ते सुखे दुःखे कदाचन॥ ६अपने किये हुए शुभ तथा अशुभ कर्मोंका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। अतएव सुख-दुःखके विषयमें आपको कभी भी शोक नहीं करना चाहिये॥ ६॥
दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम्।<br>आत्मानं शोकहर्षाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्॥ ७मनुष्यको चाहिये कि दुःखकी स्थितिमें अधिक दुःखवालोंको तथा सुखकी स्थितिमें अधिक सुखवालोंको देखे; अपने आपको हर्ष-शोकरूपी शत्रुओंके अधीन न करे। यह सब दैवके अधीन है, अपने अधीन कभी नहीं। अतएव बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि शोकसे अपनी आत्माको न सुखाये॥ ७-८॥
दैवाधीनमिदं सर्वं नात्माधीनं कदाचन।<br>न शोकेन तदात्मानं शोषयेन्मतिमान्नरः॥ ८
यथा दारुमयी योषा नटादीनां प्रचेष्टते।<br>तथा स्वकर्मवशगो देही सर्वत्र वर्तते॥ ९जैसे कठपुतली नट आदिके संकेतपर नाचती है, उसी प्रकार जीवको भी अपने कर्मके अधीन होकर सर्वत्र रहना पड़ता है॥ ९॥
अहं वनगतो मातर्नाभवं दुःखमानसः।<br>चिन्तयन्स्वकृतं कर्म भोक्तव्यमिति वेद्मि च॥ १०हे माता! अपने किये हुए कर्मका फल भोगना ही पड़ता है—यह सोचते हुए मैं वनमें गया था, इसलिये मेरे मनमें दुःख नहीं हुआ। इस बातको मैं अभी भी जानता हूँ॥ १०॥
मृतो मातामहोऽत्रैव विधुरा जननी मम।<br>भयातुरा गृहीत्वा मां निर्ययौ गहनं वनम्॥ ११इसी अयोध्यामें मेरे नाना मारे गये, माता विधवा हो गयी। भयसे व्याकुल वह मुझे लेकर घोर वनमें चली गयी। रास्तेमें चोरोंने उसे लूट लिया, उसके वस्त्रतक उतार लिये और समस्त राह-सामग्री छीन ली। वह बालपुत्रा निराश्रय होकर मुझे लिये हुए भारद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँची। ये मन्त्री विदल्ल तथा अबला दासी हमारे साथ गये थे॥ ११-१३॥
लुण्ठिता तस्करैर्मार्गे वस्त्रहीना तथा कृता।<br>पाथेयञ्च हृतं सर्वं बालपुत्रा निराश्रया॥ १२
माता गृहीत्वा मां प्राप्ता भारद्वाजाश्रमं प्रति।<br>विदल्लोऽयं समायातस्तथा धात्रेयिकाबला॥ १३
मुनिभिर्मुनिपत्नीभिर्दयायुक्तैः समन्ततः।<br>पोषिताः फलनीवारैर्वयं तत्र स्थितास्त्रयः॥ १४आश्रमके मुनियों और मुनिपत्नियोंने दया करके नीवार तथा फलोंसे भलीभाँति हमारा पालन किया और हम तीनों वहीं रहने लगे॥ १४॥
दुःखं न मे तदा ह्यासीत्सुखं नाद्य धनागमे।<br>न वैरं न च मात्सर्यं मम चित्ते तु कर्हिचित्॥ १५उस समय निर्धन होनेके कारण न मुझे दुःख था और न अब धन आ जानेपर सुख ही है। मेरे मनमें कभी भी वैर तथा ईर्ष्याकी भावना नहीं रहती॥ १५॥
नीवारभक्षणं श्रेष्ठं राजभोगात्परन्तपे।<br>तदाशी नरकं याति न नीवाराशनः क्वचित्॥ १६हे परन्तपे! राजसी भोजनकी अपेक्षा नीवारभक्षण श्रेष्ठ है; क्योंकि राजस अन्न खानेवाला नरकमें जा सकता है, किंतु नीवारभोजी कभी नहीं॥ १६॥
अ० २५ ]तृतीय स्कन्ध३७३
धर्मस्याचरणं कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>सञ्जितेन्द्रियवर्गं वै यथा न नरकं व्रजेत्॥ १७इन्द्रियोंपर सम्यक् नियन्त्रण करके विज्ञ पुरुषको धर्मका आचरण करना चाहिये, जिससे उसे नरकमें न जाना पड़े॥ १७॥
मानुष्यं दुर्लभं मातः खण्डेऽस्मिन्भारते शुभे।<br>आहारादिसुखं नूनं भवेत्सर्वासु योनिषु॥ १८<br>प्राप्य तं मानुषं देहं कर्तव्यं धर्मसाधनम्।<br>स्वर्गमोक्षप्रदं नृणां दुर्लभं चान्ययोनिषु॥ १९हे माता! इस पवित्र भारतवर्षमें मानवजन्म दुर्लभ है। आहारादिका सुख तो निश्चय ही सभी योनियोंमें मिल सकता है। स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मनुष्यतनको पाकर धर्मसाधन करना चाहिये; क्योंकि अन्य योनियोंमें यह दुर्लभ है॥ १८-१९॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्ता सा तदा तेन लीलावत्यतिलज्जिता।<br>पुत्रशोकं परित्यज्य तमाहाश्रुविलोचना॥ २०व्यासजी बोले— उस सुदर्शनके यह कहनेपर लीलावती बहुत लज्जित हुई और पुत्रशोक त्यागकर आँखोंमें आँसू भरके बोली—॥ २०॥
सापराधास्मि पुत्रांहं कृता पित्रा युधाजिता।<br>हत्वा मातामहं तेऽत्र हतं राज्यं तु येन वै॥ २१हे पुत्र! मेरे पिता युधाजित्ने मुझे अपराधिनी बना दिया। उन्होंने ही तुम्हारे नानाका वध करके राज्यका हरण कर लिया था॥ २१॥
न तं वारयितुं शक्ता तदाहं न सुतं मम।<br>यत्कृतं कर्म तेनैव नापराधोऽस्ति मे सुत॥ २२हे तात! उस समय मैं उन्हें तथा अपने पुत्रको रोकनेमें समर्थ नहीं थी। उन्होंने जो कुछ किया, उसमें मेरा अपराध नहीं था॥ २२॥
तौ मृतौ स्वकृतेनैव कारणं त्वं तयोर्न च।<br>नाहं शोचामि तं पुत्रं सदा शोचामि तत्कृतम्॥ २३वे दोनों अपने ही कर्मसे मृत्युको प्राप्त हुए हैं। उनकी मृत्युमें तुम कारण नहीं हो। अतएव मैं अपने उस पुत्रके लिये शोक नहीं करती। मैं सदा उसके किये कर्मकी चिन्ता करती रहती हूँ॥ २३॥
पुत्रस्त्वमसि कल्याण भगिनी मे मनोरमा।<br>न च क्रोधो न शोको मे त्वयि पुत्र मनागपि॥ २४हे कल्याण! अब तुम्हीं मेरे पुत्र हो और मनोरमा मेरी बहन है। हे पुत्र! तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी शोक या क्रोध नहीं है॥ २४॥
कुरु राज्यं महाभाग प्रजाः पालय सुव्रत।<br>भगवत्याः प्रसादेन प्राप्तमेतदकण्टकम्॥ २५हे महाभाग! अब तुम राज्य करो और प्रजाका पालन करो। हे सुव्रत! भगवतीकी कृपासे ही तुम्हें यह अकंटक राज्य प्राप्त हुआ है॥ २५॥
तदाकर्ण्य वचो मातर्नत्वा तां नृपनन्दनः।<br>जगाम भवनं रम्यं यत्र पूर्वं मनोरमा॥ २६<br><br>न्यवसत्तत्र गत्वा तु सर्वानाहूय मन्त्रिणः।<br>दैवज्ञानथ पप्रच्छ मुहूर्तं दिवसं शुभम्॥ २७<br><br>सिंहासनं तथा हैमं कारयित्वा मनोहरम्।<br>सिंहासने स्थितां देवीं पूजयिष्ये सदाप्यहम्॥ २८<br><br>स्थापयित्वासने देवीं धर्मार्थकाममोक्षदाम्।<br>राज्यं पश्चात्करिष्यामि यथा रामादिभिः कृतम्॥ २९माता लीलावतीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम करके राजकुमार सुदर्शन उस भव्य भवनमें गये, जहाँ पहले उनकी माता मनोरमा रहा करती थीं। वहाँ जाकर उन्होंने सब मन्त्रियों तथा ज्योतिषियोंको बुलाकर शुभ दिन और मुहूर्त पूछा और कहा कि सोनेका सुन्दर सिंहासन बनवाकर उसपर विराजमान देवीका मैं नित्य पूजन करूँगा। उस सिंहासनपर धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्थापना करनेके बाद ही मैं राज्यकार्य संचालित करूँगा, जैसा मेरे पूर्वज श्रीराम आदिने किया है। सभी नागरिकजनोंको चाहिये
३७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २५

| पूजनीया सदा देवी सर्वैर्नागरिकैर्जनैः।<br>माननीया शिवा शक्तिः सर्वकामार्थसिद्धिदा॥ ३० | कि वे सभी प्रकारके काम, अर्थ और सिद्धि प्रदान करनेवाली कल्याणमयी भगवती आदिशक्तिका पूजन तथा सम्मान करते रहें॥ २६—३०॥ | | इत्युक्ता मन्त्रिणस्ते तु चक्रुर्वै राजशासनम्।<br>प्रासादं कारयामासुः शिल्पिभिः सुमनोरमम्॥ ३१ | राजा सुदर्शनके ऐसा कहनेपर मन्त्रीगण राजाज्ञाके पालनमें तत्पर हो गये। उन्होंने शिल्पियोंद्वारा एक बहुत सुन्दर मन्दिर तैयार कराया॥ ३१॥ | | प्रतिमां कारयित्वाथ मुहूर्तेऽथ शुभे दिने।<br>द्विजानाहूय वेदज्ञांस्थापयामास भूपतिः॥ ३२ | तदनन्तर राजाने देवीकी प्रतिमा बनवाकर शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें वैदिक विद्वानोंको बुलाकर उसकी स्थापना की॥ ३२॥ | | हवनं विधिवत्कृत्वा पूजयित्वाथ देवताम्।<br>प्रासादे मतिमान् देव्याः स्थापयामास भूमिपः॥ ३३ | तत्पश्चात् विधिवत् हवन तथा देवपूजन करके बुद्धिमान् राजाने उस मन्दिरमें देवीकी प्रतिमा स्थापित की॥ ३३॥ | | उत्सवस्तत्र संवृत्तो वादित्राणां च निःस्वनैः।<br>ब्राह्मणानां वेदघोषैर्गानैस्तु विविधैर्नृप॥ ३४ | हे राजन्! उस समय ब्राह्मणोंके वेदघोष, विविध गानों तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया॥ ३४॥ | | व्यास उवाच<br>प्रतिष्ठाप्य शिवां देवीं विधिवद्वेदवादिभिः।<br>पूजां नानाविधां राजा चकारातिविधानतः॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार वेदवादी विद्वानोंद्वारा कल्याणमयी देवीकी विधिवत् स्थापना कराकर राजा सुदर्शनने बड़े विधानके साथ नाना प्रकारकी पूजा सम्पन्न की॥ ३५॥ | | कृत्वा पूजाविधिं राजा राज्यं प्राप्य स्वपैतृकम्।<br>विख्यातश्चाम्बिका देवी कोसलेषु बभूव ह॥ ३६ | इस प्रकार राजा सुदर्शन भगवतीकी पूजा करके अपना पैतृक राज्य प्राप्तकर विख्यात हो गये और कोसल देशमें अम्बिकादेवी भी विख्यात हो गयीं॥ ३६॥ | | राज्यं प्राप्य नृपः सर्वं सामन्तकनृपानथ।<br>वशे चक्रेऽतिधर्मिष्ठांस्सद्धर्मविजयी नृपः॥ ३७ | सम्पूर्ण राज्य प्राप्त करनेके बाद सद्धर्मसे विजय प्राप्त करनेवाले राजा सुदर्शनने सभी धर्मात्मा सामन्त राजाओंको अपने अधीन कर लिया॥ ३७॥ | | यथा रामः स्वराज्येऽभूद्दिलीपस्य रघुर्यथा।<br>प्रजानां वै सुखं तद्वन्मर्यादापि तथाभवत्॥ ३८ | जिस प्रकार अपने राज्यमें राम हुए और जिस प्रकार दिलीपके पुत्र राजा रघु हुए उसी प्रकार सुदर्शन भी हुए। जैसे उनके राज्यमें प्रजाओंको सुख था और मर्यादा थी, वैसा ही राजा सुदर्शनके राज्यमें भी था॥ ३८॥ | | धर्मो वर्णाश्रमाणां च चतुष्पादभवत्तथा।<br>नाधर्मे रमते चित्तं केषामपि महीतले॥ ३९ | उनके राज्यमें वर्णाश्रमधर्म चारों चरणोंसे समृद्ध हुआ। उस समय धरातलपर किसीका भी मन अधर्ममें लिप्त नहीं होता था॥ ३९॥ | | ग्रामे ग्रामे च प्रासादांश्चक्रुः सर्वे जनाधिपाः।<br>देव्याः पूजा तदा प्रीत्या कोसलेषु प्रवर्तिता॥ ४० | कोसलदेशके सभी राजाओंने प्रत्येक ग्राममें देवीके मन्दिर बनवाये। तबसे समस्त कोसलदेशमें प्रेमपूर्वक देवीकी पूजा होने लगी॥ ४०॥ |

अ० २६ ]तृतीय स्कन्ध३७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुबाहुरपि काश्यां तु दुर्गायाः प्रतिमां शुभाम् ।<br>कारयित्वा च प्रासादं स्थापयामास भक्तितः ॥ ४१महाराज सुबाहुने भी काशीमें मन्दिरका निर्माण कराकर भक्तिपूर्वक दुर्गादेवीकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की ॥ ४१ ॥
तत्र तस्या जनाः सर्वे प्रेमभक्तिपरायणाः ।<br>पूजां चक्रुर्विधानेन यथा विश्वेश्वरस्य ह ॥ ४२काशीके सभी लोग प्रेम और भक्तिमें तत्पर होकर विधिवत् दुर्गादेवीकी उसी प्रकार पूजा करने लगे, जैसे भगवान् विश्वनाथजीकी करते थे ॥ ४२ ॥
विख्याता सा बभूवाथ दुर्गा देवी धरातले ।<br>देशे देशे महाराज तस्या भक्तिर्व्यवर्धत ॥ ४३हे महाराज! तबसे इस धरातलपर देश-देशमें भगवती दुर्गा विख्यात हो गयीं और लोगोंमें उनकी भक्ति बढ़ने लगी। उस समय भारतवर्षमें सब जगह सभी वर्णोंमें भवानी ही सबकी पूजनीया हो गयीं ॥ ४३-४४ ॥
सर्वत्र भारते लोके सर्ववर्णेषु सर्वथा ।<br>भजनीया भवानी तु सर्वेषामभवत्तदा ॥ ४४
शक्तिभक्तिरताः सर्वे मानिनश्चाभवन्नृप ।<br>आगमोक्तैरथ स्तोत्रैर्जपध्यानपरायणाः ॥ ४५हे नृप! सभी लोग भगवती शक्तिको मानने लगे, उनकी भक्तिमें निरत रहने लगे और वेद-वर्णित स्तोत्रोंके द्वारा उनके जप तथा ध्यानमें तत्पर हो गये। इस प्रकार भक्तिपरायण लोग सभी नवरात्रोंमें विधानपूर्वक भगवतीका पूजन, हवन तथा यज्ञ करने लगे ॥ ४५-४६ ॥
नवरात्रेषु सर्वेषु चक्रुः सर्वे विधानतः ।<br>अर्चनं हवनं यागं देव्या भक्तिपरा जनाः ॥ ४६

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीस्थापनवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥


अथ षड्विंशोऽध्यायः

नवरात्रव्रत-विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>नवरात्रे तु सम्प्राप्ते किं कर्तव्यं द्विजोत्तम ।<br>विधानं विधिवद् ब्रूहि शरत्काले विशेषतः ॥ १**जनमेजय बोले—**हे द्विजश्रेष्ठ! नवरात्रके आनेपर और विशेष करके शारदीय नवरात्रमें क्या करना चाहिये? उसका विधान आप मुझे भलीभाँति बताइये ॥ १ ॥
किं फलं खलु कस्तत्र विधिः कार्यो महामते ।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि कृपया द्विजसत्तम ॥ २हे महामते! उस पूजनका क्या फल है और उसमें किस विधिका पालन करना चाहिये। हे द्विजवर! कृपया विस्तारके साथ मुझे यह सब बताइये ॥ २ ॥
व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।<br>शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥ ३**व्यासजी बोले—**हे राजन्! अब मैं पवित्र नवरात्रव्रतके विषयमें बता रहा हूँ, सुनिये। शरत्कालके नवरात्रमें विशेष करके यह व्रत करना चाहिये ॥ ३ ॥
वसन्ते च प्रकर्तव्यं तथैव प्रेमपूर्वकम् ।<br>द्वावृतू यमदंष्ट्राख्यौ नूनं सर्वजनेषु वै ॥ ४उसी प्रकार प्रेमपूर्वक वसन्त ऋतुके नवरात्रमें भी इस व्रतको करे। ये दोनों ऋतुएँ सब प्राणियोंके लिये यमदंष्ट्रा कही गयी हैं ॥ ४ ॥

| ३७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह।<br>तस्माद्यत्नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता॥ ५शरत् तथा वसन्त नामक ये दोनों ऋतुएँ संसारमें प्राणियोंके लिये दुर्गम हैं। अतएव आत्मकल्याणके इच्छुक व्यक्तिको बड़े यत्नके साथ यह नवरात्रव्रत करना चाहिये॥ ५॥
द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम्।<br>वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ॥ ६<br><br>तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः।<br>चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ७ये वसन्त तथा शरद्—दोनों ही ऋतुएँ बड़ी भयानक हैं और मनुष्योंके लिये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं। ये सबका विनाश कर देनेवाली हैं। अतएव हे राजन्! बुद्धिमान् लोगोंको शुभ चैत्र तथा आश्विनमासमें भक्तिपूर्वक चण्डिकादेवीका पूजन करना चाहिये॥ ६-७॥
अमावास्यां च सम्प्राप्य सम्भारं कल्पयेच्छुभम्।<br>हविष्यं चाशनं कार्यमेकभुक्तं तु तद्दिने॥ ८अमावस्या आनेपर व्रतकी सभी शुभ सामग्री एकत्रित कर ले और उस दिन एकभुक्त व्रत करे और हविष्य ग्रहण करे॥ ८॥
मण्डपस्तु प्रकर्तव्यः समे देशे शुभे स्थले।<br>हस्तषोडशमानेन स्तम्भध्वजसमन्वितः॥ ९किसी समतल तथा पवित्र स्थानमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े और स्तम्भ तथा ध्वजाओंसे सुसज्जित मण्डपका निर्माण करना चाहिये॥ ९॥
गौरमृद्गोमयाभ्याञ्च लेपनं कारयेत्ततः।<br>तन्मध्ये वेदिका शुभ्रा कर्तव्या च समा स्थिरा॥ १०उसको सफेद मिट्टी और गोबरसे लिपवा दे। तत्पश्चात् उस मण्डपके बीचमें सुन्दर, चौरस और स्थिर वेदी बनाये॥ १०॥
चतुर्हस्ता च हस्तोच्छा पीठार्थं स्थानमुत्तमम्।<br>तोरणानि विचित्राणि वितानञ्च प्रकल्पयेत्॥ ११वह वेदी चार हाथ लम्बी-चौड़ी और हाथभर ऊँची होनी चाहिये। पीठके लिये उत्तम स्थानका निर्माण करे तथा विविध रंगोंके तोरण लटकाये और ऊपर चाँदनी लगा दे॥ ११॥
रात्रौ द्विजानथामन्त्र्य देवीतत्त्वविशारदान्।<br>आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ १२<br><br>प्रतिपद्दिवसे कार्यं प्रातःस्नानं विधानतः।<br>नद्यां नदे तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽथवा॥ १३रात्रिमें देवीका तत्त्व जाननेवाले, सदाचारी, संयमी और वेद-वेदांगके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल नदी, नद, तड़ाग, बावली, कुआँ अथवा घरपर ही विधिवत् स्नान करे॥ १२-१३॥
प्रातर्नित्यं पुरः कृत्वा द्विजानां वरणं ततः।<br>अर्घ्यपाद्यादिकं सर्वं कर्तव्यं मधुपूर्वकम्॥ १४प्रातःकालके समय नित्यकर्म करके ब्राह्मणोंका वरण-कर उन्हें मधुपर्क तथा अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पण करे॥ १४॥
वस्त्रालङ्करणादीनि देयानि च स्वशक्तितः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं विभवे सति कर्हिचित्॥ १५अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें वस्त्र, अलंकार आदि प्रदान करे। धन रहते हुए इस काममें कभी कृपणता न करे॥ १५॥
विप्रैः सन्तोषिताैः कार्यं सम्पूर्णं सर्वथा भवेत्।<br>नव पञ्च त्रयश्चैको देव्याः पाठे द्विजाः स्मृताः॥ १६सन्तुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा किया हुआ कर्म सम्यक् प्रकारसे परिपूर्ण होता है। देवीका पाठ करनेके लिये नौ, पाँच, तीन अथवा एक ब्राह्मण बताये गये हैं॥ १६॥

| अ० २६ ] | तृतीय स्कन्ध | ३७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वरयेद् ब्राह्मणं शान्तं पारायणकृते तदा।<br>स्वस्तिवाचनकं कार्यं वेदमन्त्रविधानतः॥ १७देवीभागवतका पारायण करनेके कार्यमें किसी शान्त ब्राह्मणका वरण करे और वैदिक मन्त्रोंसे स्वस्तिवाचन कराये॥ १७॥
वेद्यां सिंहासनं स्थाप्यं क्षौमवस्त्रसमन्वितम्।<br>तत्र स्थाप्याम्बिका देवी चतुर्हस्तायुधान्विता॥ १८<br><br>रत्नभूषणसंयुक्ता मुक्ताहारविराजिता।<br>दिव्याम्बरधरा सौम्या सर्वलक्षणसंयुता॥ १९<br><br>शङ्खचक्रगदापद्मधरा सिंहे स्थिता शिवा।<br>अष्टादशभुजा वापि प्रतिष्ठाप्या सनातनी॥ २०वेदीपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित सिंहासन स्थापित करे। उसके ऊपर चार भुजाओं तथा उनमें आयुधोंसे युक्त देवीकी प्रतिमा स्थापित करे। भगवतीकी प्रतिमा रत्नमय भूषणोंसे युक्त, मोतियोंके हारसे अलंकृत, दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित, शुभलक्षणसम्पन्न और सौम्य आकृतिकी हो। वे कल्याणमयी भगवती शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए हों और सिंहपर सवार हों; अथवा अठारह भुजाओंसे सुशोभित सनातनी देवीको प्रतिष्ठित करे॥ १८-२०॥
अर्चाभावे तथा यन्त्रं नवार्णमन्त्रसंयुतम्।<br>स्थापयेत्पीठपूजार्थं कलशं तत्र पार्श्वतः॥ २१भगवतीकी प्रतिमाके अभावमें नवार्णमन्त्रयुक्त यन्त्रको पीठपर स्थापित करे और पीठपूजाके लिये पासमें कलश भी स्थापित कर ले॥ २१॥
पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्।<br>सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥ २२वह कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रोंसे भलीभाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थके जलसे पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्नमय होना चाहिये॥ २२॥
पार्श्वे पूजार्थसम्भारान्परिकल्प्य समन्ततः।<br>गीतवादित्रनिर्घोषान्कारयेन्मङ्गलाय वै॥ २३पासमें पूजाकी सब सामग्रियाँ रखकर उत्सवके निमित्त गीत तथा वाद्योंकी ध्वनि भी करानी चाहिये॥ २३॥
तिथौ हस्तान्वितायां च नन्दायां पूजनं वरम्।<br>प्रथमे दिवसे राजन् विधिवत्कामदं नृणाम्॥ २४हस्तनक्षत्रयुक्त नन्दा (प्रतिपदा) तिथिमें पूजन श्रेष्ठ माना जाता है। हे राजन्! पहले दिन विधिवत् किया हुआ पूजन मनुष्योंका मनोरथ पूर्ण करनेवाला होता है॥ २४॥
नियमं प्रथमं कृत्वा पश्चात्पूजां समाचरेत्।<br>उपवासेन नक्तेन चैकभुक्तेन वा पुनः॥ २५सबसे पहले उपवासव्रत, एकभुक्तव्रत अथवा नक्तव्रत—इनमेंसे किसी एक व्रतके द्वारा नियम करनेके पश्चात् ही पूजा करनी चाहिये॥ २५॥
करिष्यामि व्रतं मातर्नवरात्रमनुत्तमम्।<br>साहाय्यं कुरु मे देवि जगदम्ब ममाखिलम्॥ २६[पूजनके पहले प्रार्थना करते हुए कहे—] हे माता! मैं सर्वश्रेष्ठ नवरात्रव्रत करूँगा। हे देवि! हे जगदम्बे! [इस पवित्र कार्यमें] आप मेरी सम्पूर्ण सहायता करें॥ २६॥
यथाशक्ति प्रकर्तव्यो नियमो व्रतहेतवे।<br>पश्चात्पूजा प्रकर्तव्या विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ २७इस व्रतके लिये यथाशक्ति नियम रखे। उसके बाद मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् भगवतीका पूजन करे॥ २७॥
चन्दनागुरुकर्पूरैः कुसुमैश्च सुगन्धिभिः।<br>मन्दारकरजाशोकचम्पकैः करवीरकैः॥ २८<br><br>मालतीब्रह्मकापुष्पैस्तथा बिल्वदलैः शुभैः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं धूपैर्दीपैर्विधानतः॥ २९चन्दन, अगरु, कपूर तथा मन्दार, करंज, अशोक, चम्पा, कText (कनैल), मालती, ब्राह्मी आदि सुगन्धित पुष्पों, सुन्दर बिल्वपत्रों और धूप-दीपसे विधिवत् भगवती जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥

३७८ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २६]

३७८ श्रीमद्देवीभागवत [अ० २६]

फलैर्नानाविधैरर्घ्यं प्रदातव्यं च तत्र वै।<br>नारिकेलैर्मातुलुङ्गैर्दाडिमीकदलीफलैः ॥ ३०<br>नारंगैः पनसैश्चैव तथा पूर्णफलैः शुभैः।<br>अन्नदानं प्रकर्तव्यं भक्तिपूर्वं नराधिप॥ ३१उस अवसरपर अर्घ्य भी प्रदान करे। हे राजन्! नारियल, बिजौरा नीबू, दाडिम, केला, नारंगी, कटहल तथा बिल्वफल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर फलोंके साथ भक्तिपूर्वक अन्नका नैवेद्य एवं पवित्र बलि अर्पित करे॥ ३०-३४॥
मांसाशनं ये कुर्वन्ति तैः कार्यं पशुहिंसनम्।<br>महिषाजवराहाणां बलिदानं विशिष्यते॥ ३२होमके लिये त्रिकोण कुण्ड बनाना चाहिये अथवा त्रिकोणके मानके अनुरूप उत्तम वेदी बनानी चाहिये॥ ३५॥
देव्यग्रे निहता यान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम्।<br>न हिंसा पशुजा तत्र निघ्नतां तत्कृतेऽनघ॥ ३३विविध प्रकारके सुन्दर द्रव्योंसे प्रतिदिन भगवतीका त्रिकाल (प्रातः-सायं-मध्याह्न) पूजन करना चाहिये और गायन, वादन तथा नृत्यके द्वारा महान् उत्सव मनाना चाहिये॥ ३६॥
अहिंसा याज्ञिकी प्रोक्ता सर्वशास्त्रविनिर्णये।<br>देवदार्थे विसृष्टानां पशूनां स्वर्गतिर्ध्रुवा॥ ३४[व्रती] नित्य भूमिपर सोये और वस्त्र, आभूषण तथा अमृतके सदृश दिव्य भोजन आदिसे कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३७॥
होमार्थं चैव कर्तव्यं कुण्डं चैव त्रिकोणकम्।<br>स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यं त्रिकोणं मानतः शुभम्॥ ३५नित्य एक ही कुमारीका पूजन करे अथवा प्रतिदिन एक-एक कुमारीकी संख्याके वृद्धिक्रमसे पूजन करे अथवा प्रतिदिन दुगुने-तिगुनेके वृद्धिक्रमसे और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओंका पूजन करे॥ ३८॥
त्रिकालं पूजनं नित्यं नानाद्रव्यैर्मनोहरैः।<br>गीतवादित्रनृत्यैश्च कर्तव्यश्च महोत्सवः॥ ३६अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार भगवतीकी पूजा करे, किंतु हे राजन्! देवीके यज्ञमें धनकी कृपणता न करे॥ ३९॥
नित्यं भूमौ च शयनं कुमारीणां च पूजनम्।<br>वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः॥ ३७हे राजन्! पूजाविधिमें एक वर्षकी अवस्थावाली कन्या नहीं लेनी चाहिये; क्योंकि वह कन्या गन्ध और भोग आदि पदार्थोंके स्वादसे बिलकुल अनभिज्ञ रहती है। कुमारी कन्या वह कही गयी है, जो दो वर्षकी हो चुकी हो। तीन वर्षकी कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्षकी कन्या कल्याणी, पाँच वर्षकी रोहिणी, छः वर्षकी कालिका, सात वर्षकी चण्डिका, आठ वर्षकी शाम्भवी, नौ वर्षकी दुर्गा और दस वर्षकी कन्या सुभद्रा कहलाती है। इससे ऊपरकी अवस्थावाली कन्याका पूजन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह सभी कार्योंमें निन्द्य मानी जाती है। इन नामोंसे कुमारीका विधिवत् पूजन सदा करना चाहिये। अब मैं इन नौ कन्याओंके पूजनसे प्राप्त होनेवाले फलोंको कहूँगा॥ ४०-४४॥
एकैकां पूजयेन्नित्यमेकवृद्ध्या तथा पुनः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकं च वा॥ ३८
विभवस्यानुसारेण कर्तव्यं पूजनं किल।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं राजञ्छक्तिमखे सदा॥ ३९
एकवर्षा न कर्तव्या कन्या पूजाविधौ नृप।<br>परमज्ञा तु भोगानां गन्धादीनां च बालिका॥ ४०
कुमारिका तु सा प्रोक्ता द्विवर्षा या भवेदिह।<br>त्रिमूर्तिश्च त्रिवर्षा च कल्याणी चतुरब्दिका॥ ४१
रोहिणी पञ्चवर्षा च षड्वर्षा कालिका स्मृता।<br>चण्डिका सप्तवर्षा स्यादष्टवर्षा च शाम्भवी॥ ४२
नववर्षा भवेद् दुर्गा सुभद्रा दशवार्षिकी।<br>अत ऊर्ध्वं न कर्तव्या सर्वकार्यविगर्हिता॥ ४३
एभिश्च नामभिः पूजा कर्तव्या विधिसंयुता।<br>तासां फलानि वक्ष्यामि नवानां पूजने सदा॥ ४४

अ० २६ ] तृतीय स्कन्ध ३७९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुमारी पूजिता कुर्याद्दुःखदारिद्र्यनाशनम्।<br>शत्रुक्षयं धनायुष्यं बलवृद्धिं करोति वै॥ ४५'कुमारी' नामकी कन्या पूजित होकर दुःख तथा दरिद्रताका नाश करती है; वह शत्रुओंका क्षय और धन, आयु तथा बलकी वृद्धि करती है॥ ४५॥
त्रिमूर्तिपूजनादायुस्त्रिवर्गस्य फलं भवेत्।<br>धनधान्यागमश्चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धयः॥ ४६'त्रिमूर्ति' नामकी कन्याका पूजन करनेसे धर्म-अर्थ-कामकी पूर्ति होती है, धन-धान्यका आगम होता है और पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है॥ ४६॥
विद्यार्थी विजयार्थी च राज्यार्थी यश्च पार्थिवः।<br>सुखार्थी पूजयेन्नित्यं कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ४७जो राजा विद्या, विजय, राज्य तथा सुखकी कामना करता हो, उसे सभी कामनाएँ प्रदान करने-वाली 'कल्याणी' नामक कन्याका नित्य पूजन करना चाहिये॥ ४७॥
कालिकां शत्रुनाशार्थं पूजयेद्भक्तिपूर्वकम्।<br>ऐश्वर्यधनकामश्च चण्डिकां परिपूजयेत्॥ ४८शत्रुओंका नाश करनेके लिये भक्तिपूर्वक 'कालिका' कन्याका पूजन करना चाहिये। धन तथा ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवालेको 'चण्डिका' कन्याकी सम्यक् अर्चना करनी चाहिये॥ ४८॥
पूजयेच्छाम्भवीं नित्यं नृप सम्मोहनाय च।<br>दुःखदारिद्र्यनाशाय संग्रामे विजयाय च॥ ४९हे राजन्! सम्मोहन, दुःख-दारिद्र्यके नाश तथा संग्राममें विजयके लिये 'शाम्भवी' कन्याकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥ ४९॥
क्रूरशत्रुविनाशार्थं तथोग्रकर्मसाधने।<br>दुर्गां च पूजयेद्भक्त्या परलोकसुखाय च॥ ५०क्रूर शत्रुके विनाश एवं उग्र कर्मकी साधनाके निमित्त और परलोकमें सुख पानेके लिये 'दुर्गा' नामक कन्याकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये॥ ५०॥
वाञ्छितार्थस्य सिद्ध्यर्थं सुभद्रां पूजयेत्सदा।<br>रोहिणीं रोगनाशाय पूजयेद्विधिवन्नरः॥ ५१मनुष्य अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये 'सुभद्रा' की सदा पूजा करे और रोगनाशके निमित्त 'रोहिणी' की विधिवत् आराधना करे॥ ५१॥
श्रीरस्त्विति च मन्त्रेण पूजयेद्भक्तितत्परः।<br>श्रीयुक्तमन्त्रैरथवा बीजमन्त्रैस्तथापि वा॥ ५२'श्रीरस्तु' इस मन्त्रसे अथवा किन्हीं भी श्रीयुक्त देवीमन्त्रसे अथवा बीजमन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा करनी चाहिये॥ ५२॥
कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यपि लीलया।<br>कादीनपि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम्॥ ५३जो भगवती कुमारके रहस्यमय तत्त्वों और ब्रह्मादि देवताओंकी भी लीलापूर्वक रचना करती हैं, उन 'कुमारी' का मैं पूजन करता हूँ॥ ५३॥
सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी।<br>त्रिकालव्यापिनी शक्तिस्त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम्॥ ५४जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे तीन रूप धारण करती हैं, जिनके अनेक रूप हैं तथा जो तीनों कालोंमें सर्वत्र व्याप्त रहती हैं, उन भगवती 'त्रिमूर्ति' की मैं पूजा करता हूँ॥ ५४॥
कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजितानिशम्।<br>पूजयामि च तां भक्त्या कल्याणीं सर्वकामदाम्॥ ५५निरन्तर पूजित होनेपर जो भक्तोंका नित्य कल्याण करती हैं, सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन भगवती 'कल्याणी' का मैं भक्तिपूर्वक पूजन करता हूँ॥ ५५॥