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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

प्रथम उद्योतः ५७ लोचनम् नन्वेवं 'सिंहो वटुः' इत्यत्रापि काव्यरूपता स्यात्; ध्वननलक्षणस्यात्म- नोऽत्रापि समनन्तरं वक्ष्यमाणतया भावात् । ननु घटेऽपि जीवव्यवहारः स्यात्; आत्मनो विभुत्वेन तत्रापि भावात् । शरीरस्य खलु विशिष्टाधिष्ठानयुक्तस्य सत्यात्मनि जीवव्यवहारः, न यस्य कस्यचिदिति चेत्-गुणालङ्कारौचित्यसुन्द- रशब्दार्थशरीरस्य सति ध्वननाख्यात्मनि काव्यरूपताव्यवहारः । न चात्मनोऽ- सारता काचिदिति च समानम् । न चैवं भक्तिरेव ध्वनिः, भक्तिर्हि लक्षणाव्या- पारस्तृतीयकक्ष्यानिवेशी । चतुर्थ्यां तु कक्ष्यायां ध्वननव्यापारः । तथा हि- त्रितयसन्निधौ लक्षणा प्रवर्तत इति तावद्भवन्त एव वदन्ति । तत्र मुख्यार्थबाधा तावत्प्रत्यक्षादिप्रमाणान्तरमूला । निमित्तं च यदभिधीयते सामीप्यादि तदपि प्रमाणान्तरावगम्यमेव । ( शङ्का ) इस प्रकार 'सिंहो वटुः' इस स्थल में भी काव्य की स्वरूपता¹ होगी, क्योंकि यहाँ भी ध्वननरूप आत्मा की, तुरत वक्ष्यमाण होने के कारण स्थिति है । तब तो घट में भी जीव का व्यवहार होगा, क्योंकि आत्मा के विभु ( सर्वत्र व्याप्त ) होने के कारण ( उसमें ) भी अस्तित्व है ! ( यदि कहिए कि ) शरीर जब विशिष्ट प्रकार के ( इन्द्रिय, मन, अङ्ग आदि ) अधिष्ठानों से युक्त होता है और उसमें आत्मतत्त्व रहता है तब जीव का व्यवहार होता है, जिस किसी का नहीं—तो ( इधर भी कह सकते हैं कि ) गुण और अलङ्कार के औचित्य से सुन्दर शब्द और अर्थ के शरीर का ध्वननाख्य आत्मा के होने पर काव्यरूपता व्यवहार है । आत्मा की कोई असारता नहीं, यह दोनों में बराबर है । इस प्रकार भक्ति ही ध्वनि नहीं, क्योंकि 'भक्ति' रूप लक्षणा व्यापार तृतीय कक्ष्या में होता है । चौथी कक्ष्या में तो ध्वनन व्यापार होता है । जैसा कि, तीनों—मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थयोग और प्रयोजन के सन्निधान में लक्षणा व्यापार प्रवृत्त है यह तो आप ही कहते हैं । वहाँ मुख्यार्थ का बाध प्रत्यक्ष आदि प्रमाणान्तर से होता है । और जो कि सामीप्य आदि निमित्त का अभिधान करते हैं वह भी प्रमाणान्तर के द्वारा ही बोध्य है । बाधित हो जाता है उसी प्रकार 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्०' इत्यादि वाक्य अपने ज्ञात होने के पश्चात् उत्पन्न बाधज्ञान से विशिष्ट होने के कारण प्रमाण नहीं होंगे । पुनः शङ्का करते हैं कि तब तो 'सिंहो माणवकः' इत्यादि वाक्य भी प्रमाण नहीं होंगे, क्योंकि अन्वय-बोध के पश्चात् इनका भी बाध हो जायगा, इसके समाधान में आचार्य का कहना है कि द्वितीय कक्ष्या में जब तात्पर्य शक्ति के द्वारा अन्वय-बोध यहाँ होता है तब बाधक रूप विरोध की प्रतीति उत्पन्न होती है जिसके निरा- करणार्थ तृतीय शक्ति 'लक्षणा' ही समुल्लसित होती है । १. यहाँ शङ्का यह खड़ी हुई कि जब 'ध्वनन' को ही 'काव्यात्मा' माना जाय तो 'सिंहो वटुः' इस स्थल में भी 'काव्य' का व्यवहार होगा, क्योंकि 'प्रयोजन', जो 'प्रतीयमान' होने वाला है वह यहाँ भी है । इसका समाधान करते हुये आचार्य कहते हैं कि तब 'घट' में भी जीव-व्यवहार प्रसक्त होना चाहिये, क्योंकि व्यापक आत्मा की स्थिति घट में भी है ही । तब यदि यह कहा जायगा कि मन और इन्द्रियों के अधिष्ठान से युक्त शरीर में आत्मा के होने पर जीव-व्यवहार होता है तब हम भी

५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यच्चिदं घोषस्यातिपवित्रत्वशीतलत्वसेव्यत्वादिकं प्रयोजनमशब्दान्तर- वाच्यं प्रमाणान्तराप्रतिपन्नम्, वटोर्वा पराक्रमातिशयशालित्वं, तत्र शब्दस्य न तावन्न व्यापारः । तथाहि—तत्सामीप्यात्तद्धर्मत्वानुमानमनैकान्तिकम्, सिंह- शब्दवाच्यत्वं च वटोरसिद्धम् । अथ यत्र यत्रैवं शब्दप्रयोगस्तत्र तत्र तद्धर्मयोग जो कि यह घोष का अतिपवित्रत्व, अतिशीतलत्व और अतिसेव्यत्व आदि प्रयोजन, ( लाक्षणिक शब्द से ) अतिरिक्त शब्द द्वारा अवाच्य एवं ( शब्द से ) अतिरिक्त प्रमाण के द्वारा अज्ञात है, अथवा 'वटु' का अतिशयपराक्रमशालित्व ( प्रयोजन ) है, वहाँ शब्द का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं¹। जैसा कि ('गङ्गायां घोषः' इस स्थल में ) 'तत्सामीप्य' के हेतु से तद्धर्मत्व का अनुमान² अनैकान्तिक ( व्यभिचारी ) है । और, 'वटु' का 'सिंह' शब्दवाच्यत्व हेतु असिद्ध ( स्वरूपासिद्ध ) है । ( यदि कहते हैं कि ) जहाँ-जहाँ इस प्रकार के शब्द का प्रयोग है वहाँ-वहाँ उसके धर्म का योग है, यह यही उत्तर देंगे कि गुण और अलङ्कार के औचित्य से सुन्दर शब्दार्थ-शरीर जब ध्वनन रूप आत्मा से युक्त होता है तभी 'काव्य' व्यवहार है। इससे तो कोई आत्मा की असारता व्यक्त नहीं होती है। दूसरे यह भी कि भक्ति ही ध्वनि है, गलत पक्ष है, क्योंकि भक्ति लक्षणा-व्यापार है और तृतीय कक्ष्या में यह व्यापार होता है। अर्थात् प्रथम कक्ष्या में अभिधा-व्यापार दूसरी में तात्पर्य-शक्ति और तीसरी में लक्षणा और ध्वनन-व्यापार चतुर्थ कक्ष्या में होता है। इस प्रकार न तो 'सिंहो वटुः' इत्यादि 'काव्य' की श्रेणी में आयेंगे और न तो भक्ति या लक्षणा ही 'ध्वनि' सिद्ध होगी। १. प्रसङ्ग यह प्राप्त है कि आखिर यहाँ 'प्रयोजन' को क्या समझा जाय ? इसके उत्तर में आचार्य को सिद्ध करना है कि यह 'प्रयोजन' सर्वथा शब्द के व्यापार का विषय है। इसीलिये आचार्य दृढ़ होकर कहते हैं कि शब्द का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं, अर्थात् सर्वथा शब्द का ही व्यापार है। इसके शब्द-व्यापार के विषय होने के दो मुख्य कारण हैं, पहला यह कि प्रयोजन 'अशब्दान्तर वाच्य' है, अर्थात् लाक्षणिक शब्द ही, जैसे प्रस्तुत में 'गङ्गा' 'सिंह' आदि शब्द, 'प्रयोजन' का प्रतिपादन कर सकते हैं, तथा दूसरा कारण यह है कि 'शब्द' के अतिरिक्त किसी प्रमाण से ज्ञात नहीं होता है। इसी उद्देश्य से आचार्य ने आगे की पंक्तियों में 'अनुमान' और 'स्मृति' की आशङ्का करके इनकी विषयता का निराकरण किया है तथा शब्द-व्यापारों में अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा का भी निराकरण करके इन शब्द-व्यापारों से अतिरिक्त चतुर्थ 'ध्वनन' व्यापार को माना है। २. 'गङ्गायां घोषः' और 'सिंहो वटुः' इन स्थलों में प्रतीयमान 'प्रयोजन' को 'अनुमान' प्रमाण का विषय माना जा सकता है अथवा नहीं यह विचारणीय है। आचार्य का सिद्धान्त पक्ष यह है कि यहाँ 'अनुमान' नहीं हो सकता, क्योंकि पहले स्थल में 'व्यभिचार' है और दूसरे में 'असिद्धि' कैसे ? प्रथम स्थल में 'अनुमान' का रूप यह होगा—'तीरं गङ्गागतातिपवित्रत्वादिकधर्मवत्, गङ्गासामी- प्यात्', इस प्रकार का 'अनुमान' करने वाला यह कहना चाहता है कि जो वस्तु गङ्गा के समीप होती है वह गङ्गा के समान ही पवित्र आदि होती है, गङ्गा के प्रायः सभी गुण उसमें संक्रान्त हो जाते हैं, इसका उदाहरण मुनिजन हैं, जो गङ्गा के समीप रहते हैं और पवित्र होते हैं। किन्तु यहीं यह प्रतिकूल तर्क क्यों न उपस्थित किया जाय कि शिर की खोपड़ी भी तो गङ्गा के समीप रह सकती है, किन्तु वह अति पवित्र नहीं है, ऐसी स्थिति में 'गङ्गा-सामीप्य' को हेतु मानकर अतिपवित्रत्व आदि को सिद्ध करना व्यभिचार-दोषग्रस्त है। इसी को आचार्य ने 'अनैकान्तिक' कहा है।

प्रथम उद्योतः ५९ लोचनम् इत्यनुमानम्, तस्यापि व्याप्तिग्रहणकाले मौलिकं प्रमाणान्तरं वाच्यम्, न चास्ति । न च स्मृतिरियम्, अननुभूते तदयोगात्, नियमाप्रतिपत्तेर्वक्तुरेर्त- द्विवक्षितमित्यध्यवसायाभावप्रसङ्गाच्चेत्यस्ति तावदत्र शब्दस्यैव व्यापारः। व्यापारश्च नाभिधात्मा, समयाभावात् । न तात्पर्यात्मा, तस्यान्वयप्रतीतावेव परिक्षयात् । न लक्षणात्मा, उक्तादेव हेतोः स्खलद्गतित्वाभावात् । तत्रापि हि अनुमान होगा। उसका भी व्याप्ति-ग्रहण के समय मौलिक प्रमाण कहना चाहिए, पर है नहीं। न कि यह स्मृति १ है, अननुभूत में क्योंकि उसका योग नहीं और नियम का ज्ञान न होने के कारण 'वक्ता का यह विवक्षित है' इस अध्यवसाय का अभाव- प्रसङ्ग है। इसलिए यहाँ शब्द का ही व्यापार है। और (यहाँ) व्यापार अभिधारूप नहीं है, क्योंकि 'समय' (सङ्केत) का अभाव है। और तात्पर्यरूप व्यापार नहीं है, क्योंकि वह 'अन्वय' (सम्बन्ध) का बोध होने पर ही परिक्षीण हो जाता है। लक्षणा रूप (व्यापार) नहीं है, क्योंकि कहे हुए कारण से ही स्खलद्गतित्व' का अभाव है। दूसरे स्थल में 'सिंहो माणवकः' में अनुमान का रूप यह होगा-वटुः सिंहधर्मवान् सिंह- शब्दवाच्यत्वात्, सम्प्रतिपन्नसिंहवत्; यहाँ हेतु 'स्वरूपासिद्ध' है, क्योंकि 'सिंह' शब्द से 'वटु' वाच्य नहीं होता। इसी प्रकार इन स्थलों में कोई अन्य प्रकार का अनुमान भी, जैसे 'जहाँ-जहाँ ऐसा प्रयोग होता है वहाँ उसके धर्म का योग होता है' यह अनुमान भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि अनुमान तब तक सिद्ध नहीं होता जब तक कि व्याप्ति-ग्रहण के समय मौलिक प्रमाणान्तर नहीं हो। प्रस्तुत में, जो भी व्याप्ति सामान्य को लेकर की जायगी वह प्रामाणिक नहीं होगी, क्योंकि व्याप्ति-ग्रह का प्रयोजन कोई प्रत्यक्ष आदि प्रमाण नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि अनुमान प्रमाण का विषय किसी प्रकार 'प्रयोजन' को नहीं बनाया जा सकता। १. आचार्य लिखते हैं कि यह 'स्मृति' नहीं है, अर्थात् गङ्गागत शैत्य-पावनत्व आदि प्रयोजन के ज्ञान को 'स्मृति' भी नहीं कहा जा सकता, अर्थात् 'प्रयोजन' स्मृति का भी विषय नहीं बन सकता, क्योंकि स्मृति उसकी होती है जो पहले कभी अनुभूत हो चुका हो। यहाँ ऐसा कोई पूर्वानुभव विद्यमान नहीं है जिसके आधार पर 'स्मृति' होगी। कथञ्चित् भी स्मृति को यहाँ लाया नहीं जा सकता, क्योंकि ऐसा कोई यहाँ नियामक नहीं है जिसके बल से यह समझा जाय कि वक्ता का यही विवक्षित है। अन्ततः जब कि अनुमान भी नहीं और स्मृति भी नहीं, तो स्वीकार करना होगा कि यहाँ शब्द का ही व्यापार है। २. यहाँ शब्द का व्यापार न 'अभिधा' है, न 'तात्पर्य' है और न 'लक्षणा' है। 'अभिधा' तो इसलिये नहीं है कि गङ्गा शब्द का 'समय' या संकेत शैत्य-पावनत्व में नहीं मिलता, 'तात्पर्य' इसलिये नहीं है कि वह केवल अन्वय या परस्पर सम्बन्ध की प्रतीति होते ही समाप्त हो जाता है और लक्षणा व्यापार भी यहाँ नहीं है क्योंकि मुख्यार्थ-बाध आदि हेतु, जो कहा जा चुका है सो यहाँ अवगमन रूप व्यापार स्खलित या प्रतिहत नहीं हो रहा है। 'स्खलद्गतित्व' अर्थात् स्वार्थ- भ्रंश। लक्षणा-व्यापार वहीं होता है जहाँ स्खलद्गतित्व या स्वार्थभ्रंश होता है। स्पष्टीकरण यह कि 'गङ्गायां घोषः' इस स्थल में 'गङ्गा' शब्द का प्रवाह रूप स्व अर्थ मुख्यार्थ-बाध आदि स्खलित होकर 'तीर' अर्थ को प्रकट करता है अतः 'तीर' अर्थ में लक्षणा-व्यापार है, किन्तु 'प्रयोजन' रूप शैत्य-पावनत्व के अंश में स्वार्थभ्रंश का अनुभव नहीं होता, क्योंकि मुख्यार्थबाध आदि की वहाँ प्रवृत्ति ही नहीं। ऐसी स्थिति में लक्षणा-व्यापार का विषय यह नहीं हो सकता। यदि किसी प्रकार

६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् स्खलद्गतित्वे पुनर्मुख्यार्थबाधा निमित्तं प्रयोजनमित्यनवस्था स्यात् । अत एव यत्केनचिल्लक्षितलक्षणेति नाम कृतं तद्व्यसनमात्रम् । तस्मादभिधातात्पर्यलक्ष- णाव्यतिरिक्तश्चतुर्थोऽसौ व्यापारो ध्वननद्योतनव्यञ्जनप्रत्यायनावगमनादिसोद्- रव्यपदेशनिरूपितोऽभ्युपगन्तव्यः । यद्वक्ष्यति— 'मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ।।' इति ।। तेन समयापेक्षा वाच्यावगमनशक्तिरभिधाशक्तिः । तदन्यथानुपपत्तिस- हायार्थावबोधनशक्तिस्तात्पर्यशक्तिः । मुख्यार्थबाधादिसहकार्यपेक्षार्थप्रतिभास- नशक्तिर्लक्षणाशक्तिः। तच्छक्तित्रयोपजनितार्थावगममूलजाततत्प्रतिभासपवित्रि- यदि उस तीरादि अर्थ में भी स्खलद्गति ( स्वार्थभ्रंश ) होना मानते हैं तब पुनः मुख्यार्थबाधा और निमित्त रूप प्रयोजन होने से अनवस्था होगी। अतएव जो कि किसी नें ( लक्षित तीरादि में पुनः पावनत्वादि प्रयोजन को लक्षित करते हुए ) 'लक्षितलक्षणा' यह नाम रखा है वह तो व्यसनमात्र है । अतः अभिधा, तात्पर्य, लक्षणा से व्यतिरिक्त चौथा यह व्यापार, जिसे ध्वनन, द्योतन, व्यंजन, प्रत्यायन, अवगमन आदि पर्याय शब्दों से निरूपित किया गया है, स्वीकार के योग्य है। जिसे कहेंगे— 'मुख्य वृत्ति ( अभिधा व्यापार ) को छोड़कर गुणवृत्ति ( लक्षणारूप व्यापार ) से ( अमुख्य ) अर्थ अमुख्य अर्थ का दर्शन ( ज्ञान ) जिस ( प्रयोजनरूप ) फल को उद्देश्य करके करते हैं उसमें शब्द स्खलद्गति नहीं है ।' इस प्रकार समय ( सङ्केत ) की अपेक्षा रखनेवाली, वाच्य अर्थ के बोधन की शक्ति 'अभिधाशक्ति' है। उसकी अन्यथानुपपत्तिरूप सहायवाली, अर्थावबोधन की शक्ति 'तात्पर्यशक्ति¹' है। लक्षणाशक्ति मुख्यार्थबाध आदि तीन सहकारियों की अपेक्षा से, इस प्रयोजन में भी स्खलद्गतित्व मान लिया जाय तो फिर मुख्यार्थ-बाधा, निमित्त और प्रयोजन की कल्पना करनी पड़ेगी और इस प्रकार अनवस्था होगी। इसलिये यही स्वीकार करना चाहिये कि 'प्रयोजन' में लक्षणा-व्यापार नहीं होता । इसी विषय को आचार्य मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' के द्वितीय उल्लास में इन कारिकाओं द्वारा निरूपित किया है— नाभिधा, समयाभावात्, हेत्वभावान्न लक्षणा । लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योगः फलेन नो । न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्दः स्खलद्गतिः । एवमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयकारिणी । 'काव्यप्रदीप' में 'स्खलद्गति' का अर्थ 'मुख्यार्थबाध आदि तीनों की अपेक्षा करके बोधक होना' किया है—'मुख्यार्थबाधादित्रयमपेक्ष्य बोधकत्वं स्खलद्गतित्वम् ।' १. यह वाक्य अत्यन्त उलझा हुआ है। जैसा कि इसका संस्कृत रूप है—'तदन्यथानुपपत्ति- सहायार्थावबोधनशक्तिस्तात्पर्यशक्तिः'; एक अर्थ के अनुसार उसके अर्थात् अभिधा के अन्यथा अर्थात् विना जिसकी अनुपपत्ति ( असम्भव ) सहायक है अर्थात् अभिधाशक्ति की सहायता प्राप्त करके ही तात्पर्यशक्ति क्रियाशील होती है, और जिस प्रकार अभिधा सङ्केतित अर्थ के अवबोधन की

प्रथम उद्योतः ६१ लोचनम् तप्रतिपत्तप्रतिभासहायार्थद्योतनशक्तिर्ध्वननव्यापारः; स च प्राग्वृत्तं व्यापारत्रयं न्यक्कुर्वन्प्रधानभूतः काव्यात्मेत्याशयेन निषेधप्रमुखतया च प्रयोजनविषयोऽपि निषेधविषय इत्युक्तम् । अभ्युपगममात्रेण चैतदुक्तम् ; न त्वत्र लक्षणा, अत्यन्त- तिरस्कारान्यसंक्रमणयोरभावात् । न ह्यर्थशक्तिमूलेऽस्या व्यापारः । सहकारि- अर्थ के प्रतिभासन (बोधन) की शक्ति है। इन तीनों शक्तियों से उत्पन्न अर्थबोध के मूल से हुई, (उन अभिधेय आदि अर्थों) के प्रतिभास से पवित्रित प्रतिपत्ता (सहृदय) की प्रतिभा की सहायता से अर्थ के द्योतन की शक्ति 'ध्वननव्यापार'¹ है। और वह पहले हुए तीनों व्यापारों को अभिभूत करता हुआ, प्रधानभूत काव्यात्मा है इस आशय से (वृत्तिकार ने ही ध्वनिव्यापार को) निषेध के प्रमुख होने के कारण प्रयोजनविषयक होने पर भी 'निषेधविषयक'² कहा है। अभ्युपगम (प्रौढिवाद) मात्र से यह कहा है कि यहाँ लक्षणा नहीं है क्योंकि अत्यन्त तिरस्कार और अन्यसंक्रमण यहाँ नहीं हैं। अर्थशक्तिमूल में इस (लक्षणा) का व्यापार नहीं है। शक्ति का भेद सहकारी³ के शक्ति है उसी प्रकार तात्पर्यशक्ति अन्वय रूप अर्थ के अवबोधन की शक्ति है। दूसरे अर्थ के अनुसार उसकी अर्थात् अन्वय रूप अर्थ की अन्यथा अर्थात् तात्पर्य के अभाव में जो अनुपपत्ति है उसकी सहायता वाली यह तात्पर्यशक्ति है। इस प्रकार यहाँ आचार्य ने तात्पर्यशक्ति को 'व्यतिरेक' (तदभावे तदभावः = कारणाभावे कार्याभावः) के प्रकार से अनिवार्य सिद्ध किया है। मतलब यह कि तात्पर्यशक्ति के अभाव में वाक्यार्थ-बोध की अनुपपत्ति होगी यही कारण है कि तात्पर्यशक्ति को स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार यहाँ वाक्यार्थ-बोधाभाव ही तात्पर्यशक्ति की सिद्धि का सहायक है। १. पूरी एक पंक्ति में आचार्य ने 'ध्वननव्यापार' के प्रति अभिधा आदि तीनों शक्तियों के द्वारा प्रयोज्य अर्थावबोध को सहकारी कारण बताया है और साथ ही यह भी निर्देश किया है कि इस व्यापार से ध्वन्यमान अर्थ का ज्ञान उसी प्रतिपत्ता को हो सकता है जो काव्यार्थ के पुनः पुनः अनुसन्धान (प्रतिभास) से पवित्रित या संस्कृत होकर पूर्ण 'सहृदय' हो जाता है। २. वृत्तिकार ने 'कच्चिद् वाच्ये विधिरूपे निषेधरूपः' अर्थात् कहीं पर वाच्य विधिरूप होता है तो व्यङ्ग्य निषेधरूप, यह कह कर 'भ्रम धार्मिक०' को उदाहृत किया है। यद्यपि 'प्रयोजन' जो सर्वथा 'व्यङ्ग्य' होता है यहाँ 'निषेध' नहीं बल्कि 'स्वच्छन्दविहार' आदि है, चूँकि इस 'प्रयोजन' की प्रतीति 'निषेध' की प्रतीति के द्वारा होती है इस कारण यहाँ वृत्तिकार ने 'निषेध' को व्यङ्ग्य कहा है। इससे यह समझना गलत होगा कि यहाँ 'निषेध' लक्षणा का विषय है, क्योंकि यहाँ न तो अत्यन्त तिरस्कार है और न अन्य सङ्क्रमण है। ३. अर्थशक्तिमूल ध्वनि का वह स्थल है जहाँ सहकारी के रूप में वक्तृ, बोद्धव्य आदि के वैशिष्ट्य की प्रतीति हो, परन्तु लक्षणा में मुख्यार्थ-बाध आदि सहकारी होते हैं इस कारण दोनों का स्थल एक नहीं हो सकता। सहकारिभेद से शक्ति का भेद होता है इस सिद्धान्त के उदाहरण में आचार्य का कहना है कि वही शब्द का, जो अर्थ-बोधन के लिए प्रयुक्त होता है, व्याप्तिस्मृति, पक्षधर्मताज्ञान आदि सहकारी की अपेक्षा के बल पर विवक्षा के ज्ञान के लिए अनुमापकत्व व्यापार होता है और जब इन्द्रियसन्निकर्ष आदि सहकारी की अपेक्षा होगी तो 'विकल्पकत्व' व्यापार (सविकल्पकज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति) होगा। जहाँ अनुमापकत्व व्यापार होगा वहाँ प्रयोग इस प्रकार होगा—'अयं वक्ता एतद्विवक्षुः एतच्छब्दप्रयोगात्'। शब्द श्रोत्र आदि के

६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्

भेदाच्च शक्तिभेदः स्पष्ट एव, यथा तस्यैव शब्दस्य व्याप्तिस्मृत्यादिसहकृतस्य विवक्षावगतावनुमापकत्वव्यापारः । अक्षादिसहकृतस्य वा विकल्पकत्वव्यापारः। एवमभिहितान्वयवादिनामियदनपह्नवनीयम् । योऽप्यन्विताभिधानवादी 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इति हृदये गृहीत्वा शरवदभिधाव्यापारमेव दीर्घदीर्घमिच्छति, तस्य यदि दीर्घो व्यापारस्तदेकोऽ- साविति कुतः ? भिन्नविषयत्वात् । अथानेकोऽसौ ? तद्विषयसहकारिभेदादस- जातीय एव युक्तः । सजातीये च कार्ये विरम्यव्यापारः शब्दकर्मबुद्ध्यादीनां पदार्थविद्भिर्निषिद्धः । असजातीये चास्मन्नय एव । अथ योऽसौ चतुर्थकक्षानिविष्टोऽर्थः, स एव झटिति वाक्येनाभिधीयत भेद से होता है यह स्पष्ट है। जैसे उसी शब्द के सहकारी व्याप्तिस्मृति आदि हों और उनके द्वारा विवक्षा (वक्ता की इच्छा) का ज्ञान हो, तब अनुमापकत्व व्यापार होगा। अथवा चक्षु आदि सहकारी में तब विकल्पकत्व व्यापार होगा। इस प्रकार 'अभिहितान्वयवादियों' के लिए यह ध्वनन व्यापार का अस्तित्व अनिराकरणीय है। जो कि अन्विताभिधानवादी२ 'शब्द का जिसमें तात्पर्य होता है वह शब्द का अर्थ होता है' इस बात को हृदय में रखकर, बाण की भाँति एक अभिधा व्यापार को ही दीर्घ-दीर्घ मानता है, उसका यदि वह दीर्घ व्यापार एक है सो कैसे ? क्योंकि विषय के भिन्न होने से (व्यापार को भी भिन्न होना चाहिए) । यदि वह व्यापार अनेक है तो विषय और सहकारी के भेद से असजातीय ही है यह (मानना) ठीक होगा। और कार्य के सजातीय मानने पर पदार्थविद् लोगों ने शब्द, बुद्धि और कर्म के विराम हो जाने के बाद व्यापार का निषेध किया है। और यदि (व्यापार को) असजातीय मानते हैं तो हमारा नय (पक्ष) ही है। (यदि कहें) जो वह चौथी कक्षा में रहने वाला अर्थ है वह भी झट से वाक्य के


सहकार से अपना प्रत्यक्ष उत्पन्न करता है। इस प्रकार एक ही शब्द के अर्थ-ज्ञान में सहकारी भेद को लेकर व्यापारभेद हो गया है। १. अभिहितान्वयवादी—अन्वय या पदों के सम्बन्ध के अर्थ के पक्षपाती ये आचार्य मीमांसक हैं और ये 'भाट्ट' या 'तौतातिक' मत के अनुयायी माने जाते हैं। २. अन्विताभिधानवादी—इसे प्राभाकर मत कहते हैं। यहाँ 'अभिधा' के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं माना जाता। जिस प्रकार एक ही बाण दीर्घ-दीर्घ व्यापार के द्वारा अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है उसी प्रकार एक ही अभिधा-व्यापार दीर्घ-दीर्घ होकर वक्ता के अभिप्रेत अर्थ का ज्ञान करा देता है। किन्तु जब आचार्य इस सिद्धान्त को अपने तर्क की कसौटी पर लाते हैं। तब यह विशृङ्खल हो जाता है। क्योंकि किसी प्रकार एक ही व्यापार को नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिस व्यापार से विधि रूप अर्थ का बोध होता है उसी से निषेध रूप अर्थ करना सम्भव नहीं, अतः मानना पड़ेगा कि व्यापार अनेक है, साथ ही विषय और सहकारी के भेद से उसे असजातीय भी मानना होगा। अनेक व्यापार को सजातीय इसलिए नहीं मान सकते कि शब्द, बुद्धि और कर्म का विरम्य व्यापार नहीं होता।

प्रथम उद्योतः ६३ लोचनम् इत्येवंविधं दीर्घदीर्घत्वं विवक्षितम्, तर्हि तत्र सङ्केताकरणात्कथं साक्षात्प्रति- पत्तिः। निमित्तेषु सङ्केतः, नैमित्तिकस्त्वसावर्थस्सङ्केतानपेक्ष एवेति चेत्- पश्यत श्रोत्रियस्योक्तिकौशलम् । यो ह्यसौ पर्यन्तकक्षाभाग्यर्थः प्रथमं प्रतीतिप- थमवतीर्णः, तस्य पश्चात्तनः पदार्थावगमाः निमित्तभावं गच्छन्तीति नूनं मीमांसकस्य प्रपौत्रं प्रति नैमित्तिकत्वमभिमतम् । अथोच्यते—पूर्वं तत्र सङ्केतग्रहणसंस्कृतस्य तथा प्रतिपत्तिर्भवतीत्यमुया वस्तुस्थित्या निमित्तत्वं पदार्थानाम्, तर्हि तदनुसरणोपयोगि न किञ्चिदप्युक्तं द्वारा अभिहित हो जाता है. इस प्रकार का दीर्घदीर्घत्व विवक्षित है, तब यदि 'वहाँ सङ्केत न करने के कारण कैसे उसकी साक्षात् प्रतिपत्ति हो सकती है ? सङ्केत तो निमित्तों में होता है वह अर्थ तो नैमित्तिक होता है, अतः वह सङ्केत की अपेक्षा ही नहीं रखता' यदि यह कहें तब तो देखो जरा वैदिक की वचनचातुरी ! जो कि यह (अर्थ) सबसे अन्त (पर्यन्त) की कक्षा में रहने वाला है वह पहले प्रतीति के पथ में अवतीर्ण होता है, उसके बाद में पदार्थज्ञान निमित्तभाव को प्राप्त करते हैं—इस प्रकार निश्चय ही मीमांसक को प्रपौत्र¹ के प्रति नैमित्तिकत्व अभिमत है ! यदि कहते हैं—'पहले वहां सङ्केतग्रह से संस्कृत (हो जाने पर) उस प्रकार की (पार्यन्तिक अर्थ की) प्रतीति होती है इस वस्तुस्थिति से पदार्थों का निमित्तत्व है।' तब तो फिर उसके अनुसरण² के उपयोग का कोई निमित्त नहीं बताया गया ! दूसरे १. ऊपर जो कि 'दीर्घ दीर्घ' की बात कही गई है उसमें यदि मीमांसक के पक्ष से यह स्वीकार किया जाय कि चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ झटिति वाक्य द्वारा अभिहित कर दिया जाता है तब अनेक व्यापार की कल्पना की स्थिति नहीं रह जाती । इस स्थिति में आचार्य कहते हैं कि तब तो और भी गड़बड़ी उपस्थित होगी, क्योंकि चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ की साक्षात् प्रतिपत्ति संकेत किए बिना कैसे हो सकती है ? यदि नैमित्तिक रूप उस अर्थ को संकेत की अपेक्षा से रहित माना गया तब तो एक विचित्र बात होगी । क्योंकि जो चतुर्थ कक्ष्या का अर्थ है सबसे पहले प्रतीत होगा और उसके पश्चात् उत्पन्न होने वाले पदार्थज्ञान उसके निमित्त होंगे ! मीमांसक महोदय अपने पक्ष के समर्थन में यहाँ तक आ पहुँचे कि वे अपने प्रपौत्र को भी अपना कारण बेहिचक स्वीकार कर लेंगे । स्पष्ट यह कि जब कि मीमांसक के अनुसार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ अपने निमित्त रूप पदार्थज्ञान से पहले उत्पन्न होता है तब मीमांसक अपने प्रपौत्र के उत्पन्न होने के बाद में उत्पन्न हुए होंगे यह उन्हें अवश्य अभिमत होगा ! इस प्रकार यहाँ आचार्य ने मीमांसकों की लिहाड़ी ली है । २. पुनः अन्विताभिधानवादी मीमांसक का कहना है कि जहाँ तक यहाँ पदार्थों के निमित्त होने का प्रश्न है वह पहले पदार्थों में संकेतग्रह के मान लेने पर हल हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ पहले पदार्थों में संकेतग्रह से संस्कृत रूप में उत्पन्न होता है। ऐसा मान लेने पर पदार्थ निमित्त बन जाते हैं। इस पर आचार्य कहते हैं कि उसके अनुसरण का यहाँ आपने कोई उपयोग नहीं कहा ! अर्थात् पहले पार्यन्तिक अर्थ को संकेतग्रह से संस्कृत करने का उपयोग तो यही होना चाहिए कि पहले पदार्थों का ज्ञान हो तत्पश्चात् चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ का ज्ञान हो । इस प्रकार पदार्थों का निमित्तत्व भी सार्थक होगा । दूसरे आपके मत में

६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् स्यात् । न चापि प्राक्पदार्थेषु सङ्केतग्रहणं वृत्तम्, अन्वितानामेव सर्वदा प्रयोगात् । आवापोद्वापाभ्यां तथाभाव इति चेत्-सङ्केतः पदार्थमात्र एवेत्य- भ्युपगमे पाश्चात्त्यैव विशेषप्रतीतिः । अथोच्यते—दृष्टैव झटिति तात्पर्यप्रतिपत्तिः किमत्र कुर्म इति । तदिदं वय- मपि न नाङ्गीकुर्मः । यद्वक्ष्यामः— तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाक्यार्थविमुखात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वावभासिन्यां झटित्येवावभासते ॥ इति ॥ यह कि पहले पदार्थों में सङ्केतग्रह भी नहीं हुआ है, क्योंकि सर्वदा अन्वितों का ही प्रयोग है । यदि कहिए—'आवापोद्वाप' के द्वारा उस प्रकार (पृथक् पदार्थों में सङ्केतग्रह) होगा, तब तो सङ्केत को पदार्थमात्र में ही स्वीकार करने पर विशेष (वाक्यार्थ ) की प्रतीति बाद में ही होगी । यदि कहते हैं—'झट-से तात्पर्य (पर्यन्तिक अर्थ) की प्रतीति देखी गई है तो हम क्या करें ?' तो हम भी इसे अस्वीकार नहीं करते ! क्योंकि हम कहेंगे— 'उस प्रकार वाक्यार्थ से विमुख स्वभाव वाले सहृदय जनों की तत्त्वावभासिनी बुद्धि में वह अर्थ (पर्यन्तिक अर्थ) झट से अवभासित हो जाता है।' पदार्थों में संकेतग्रह होता ही नहीं, क्योंकि अन्वित पदार्थों का ही सर्वदा आप प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थिति में संकेतग्रह को पहले मानने का पक्ष सर्वथा अन्विताभिधानवादी मीमांसक के मत में गलत होगा । १. आवापोद्वाप = प्रक्षेप-निक्षेप; ग्रहण-त्याग । यहाँ अन्विताभिधानवाद का स्पष्टीकरण आवश्यक है । जैसा कि 'अभिहितान्वयवाद' में पहले 'अभिधा' शक्ति द्वारा पदार्थों का ज्ञान, तत्पश्चात् तात्पर्य शक्ति द्वारा अन्वय रूप वाक्यार्थ का ज्ञान है वह प्रस्तुत 'अन्विताभिधानवाद' में सर्वथा त्याज्य पक्ष है। इसके अनुसार 'अभिधा' से अन्वित पदार्थ का ही ज्ञान होता है अर्थात् जो वाक्यार्थ है वही वाच्यार्थ है। ये लोग अन्वयांश में अतिरिक्त शक्ति की कल्पना नहीं करते । जैसे 'गामानय' इस वाक्य में 'गो' शब्द का कोई अर्थ नहीं, बल्कि यहाँ 'गौ' की प्रतीति 'आनयन' से अन्वित होकर, एवं 'आनयन' की प्रतीति 'गौ' से अन्वित होकर होती है । यह मत प्रभाकर-मत या गुरुमत के नाम से प्रसिद्ध है। प्रभाकर ने 'व्यवहार' को संकेतग्रह का प्रधान उपाय माना है। व्यवहार में देखा जाता है कि कोई बड़ा आदमी (उत्तम वृद्ध) अपने से छोटे आदमी (मध्यम वृद्ध) से 'गामानय' कहता है, उस समय वह दूसरा आदमी 'गौ' को लाकर उपस्थित करता है। समीप में स्थित बालक उत्तम वृद्ध के कथन और मध्यम वृद्ध के कार्य दोनों को सुनता और देखता है। इस प्रकार वह बालक 'गामानय' इस अखण्ड वाक्य का अर्थ-ज्ञान करता है। तत्पश्चात् उत्तम वृद्ध के द्वारा 'गां बधान, अश्वमानय' (गौ को बाँधो और अश्व को लाओ) यह कहे जाने पर बालक 'गाम्' और 'आनय' का अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। यही 'आवापोद्वाप' के द्वारा संकेत का ग्रहण है। इस पर आचार्य अभिनवगुप्त का कहना है कि ऐसी स्थिति में आप भी यही स्वीकार कर रहे हैं कि संकेत पदार्थ मात्र में ही होगा, फिर वाक्यार्थ रूप विशेष की प्रतीति पश्चात् ही होगी, पहले नहीं। इसलिये 'दीर्घदीर्घतरव्यापार' का पक्ष किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता ।

प्रथम उद्योतः ६५ लोचनम् किं तु सातिशायानुशीलनाभ्यासात्तत्र सम्भाव्यमानोऽपि क्रमः सजातीय- तद्विकल्पपरम्पराऽनुदयादभ्यस्तविषयव्याप्तिसमयस्मृतिक्रमवन्न संवेद्यत इति। निमित्तनैमित्तिकभावश्चावश्याश्रयणीयः, अन्यथा गौणलाक्षणिकयोर्मुख्याद् भेदः ‘श्रुतिलिङ्गादिप्रमाणषट्कस्य पारदौर्बल्यम्’ इत्यादिप्रक्रियाविघातः, निमित्तता- किन्तु, पर्यालोचन का अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि वहाँ सम्भाव्यमान भी क्रम सजातीय उन (पदार्थविषयक) विकल्पों की परम्परा के उदित न होने से पहले से अभ्यस्त-विषय वाले व्याप्ति और समय (सङ्केत) की स्मृति के क्रमों की भाँति मालूम नहीं होता। और निमित्तनैमित्तिकभाव का अवश्य आश्रयण करना चाहिए। अन्यथा गौण और लाक्षणिक अर्थों का मुख्य अर्थ से भेद (मुख्यामुख्यरूपभेद) एवं (मीमांसा- शास्त्र में उक्त) ‘श्रुति’१ लिङ्ग आदि छः प्रमाणों का क्रमशः दौर्बल्य है’ इत्यादि १. मीमांसाशास्त्र के प्रवर्त्तक आचार्य्य जैमिनि का यह पूरा सूत्र इस प्रकार है—‘श्रुतिलिङ्ग- वाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्’; इस सूत्र को प्रस्तुत ‘लोचन’ में उद्धृत करते हुये आचार्य्य का यह तात्पर्य्य है कि जब ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले अर्थों के क्रम में यदि निमित्त-नैमित्तिकभाव (कार्यकारणभाव) स्वीकार नहीं करते हैं तब उक्त मीमांसा- सूत्र में महर्षि जैमिनि ने श्रुति की अपेक्षा जो लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का प्रतिपादन किया है, इस प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि श्रुतिस्थल की भांति लिङ्ग आदि स्थल में भी शब्दश्रवण के पश्चात् प्रतीयमान सभी अर्थों की अभिधा से ही प्रतीति होने पर लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का कारण नहीं रह जाता। इसलिये इस प्रक्रिया का समर्थन एकमात्र—निमित्तता-वैचित्र्य के मानने पर ही हो सकता है। और जब निमित्तता-वैचित्र्य स्वीकार कर लिया गया तो व्यापार का भिन्न होना लाजिमी है। इस प्रकार ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले सभी अर्थों में केवल अभिधा व्यापार से काम नहीं चलेगा, अतिरिक्त व्यापार मानना ही होगा। यहाँ हम स्पष्टीकरण के उद्देश्य से ‘काव्यप्रदीप’ के उल्लेख के आधार पर उक्त मीमांसा-सूत्र का अर्थ-निर्देश करते हैं— श्रुति आदि का समवाय अर्थात् एकत्र प्राप्ति होने पर उनके बीच जिसकी अपेक्षा जो पर (बाद) में होगा उसकी अपेक्षा वह दुर्बल होगा, क्योंकि अर्थविप्रकर्ष है; अर्थात् पूर्व की अपेक्षा पर विलम्ब से अर्थ का प्रत्ययन करता है। श्रुति—‘निरपेक्षो रवः श्रुतिः’, अर्थात् वह शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है जो अपने द्वारा किसी के अङ्गत्व-बोध के कार्य में प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं रखता है। दूसरे प्रकार से यह भी कह सकते हैं कि अपने अर्थ के बोध में अन्य शब्द की अपेक्षा न रखने वाला शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है; जैसे ‘व्रीहीनवहन्ति’; क्रिया के फल को प्राप्त करने वाला ही कर्म होता है, इस प्रकार यहाँ ‘व्रीहि’ में कर्मत्व का प्रकार करती हुई द्वितीया विभक्ति किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा के बिना ही व्रीहियों को ‘अवघात’ का शेष (अङ्ग) प्रतिपादन करती है। लिङ्ग—‘अर्थविशेषप्रकाशनसामर्थ्यं लिङ्गम्’; अर्थात् शब्द का वह सामर्थ्य, जिससे अर्थविशेष का प्रकाशन होता है ‘लिङ्ग’ कहलाता है। यह ‘सामर्थ्य’ रूढि ही है। जैसे—‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ (देवों के आवास रूप बर्हि-कुश को काटता हूँ) इस मन्त्र का ‘दामि’ (लवन करता हूँ, काटता हूँ) इस श्रुत पद के सामर्थ्य से कुशच्छेदन में विनियोग है। वाक्य—‘परस्पराकांक्षावशात् कचिदेकस्मिन् अर्थे पर्यवसितानि पदानि वाक्यम्’; अर्थात् वह ५ ध्व०

६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वैचित्रयेणैवास्याः समर्थितत्वात् । निमित्ततावैचित्र्ये चाभ्युपगते किमपरम- स्मास्वसूयया । येऽप्यविभक्तं स्फोटं वाक्यं तदर्थं चाहुः, तैरप्यविद्यापदपतितैः प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि निमित्तता के वैचित्र्य से इसका समर्थन किया जा चुका है। जब कि निमित्तताप्रयुक्त वैचित्र्य आप मान लेते हैं तो हम पर असूया १

पदसमूह 'वाक्य' है जो परस्पर आकांक्षाके वश किसी एक अर्थ में पर्यवसित होता है । जैसे— 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनो बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामि'; इस मन्त्र का 'निर्वपामि' इस 'लिङ्ग' द्वारा निर्धाप में विनियोग के साथ ही समवेत अर्थभाग की एकवाक्यता के बल से 'देवस्य त्वा०' इत्यादि भाग का भी निर्धाप में ही विनियोग है । प्रकरण—'लब्धवाक्यभावानां पदानां कार्यान्तरापेक्षावशाद् वाक्यान्तरेण सम्बन्ध आकांक्षा- पर्यवसन्नं प्रकरणम्' अर्थात् जब पदसमूह 'वाक्य' की स्थिति में होता है तब दूसरे कार्य की अपेक्षा 'से दूसरे वाक्य के सम्बन्ध में आकांक्षा को 'प्रकरण' कहते हैं। जैसे- 'समिधो यजति' । यह मन्त्र दर्शपूर्णमास यागों के प्रकरण में पढ़ा जाता है। जब यह आकांक्षा उपस्थित होती है कि दर्शपूर्णमास याग कैसे हों तब पाठवश इसका विनियोग होता है। स्थान—'स्थानं क्रमः', अर्थात् अनेक में आम्नात मन्त्र का सन्निधिविशेष में आम्नात रूप क्रम को 'स्थान' कहते हैं। जैसे- 'दब्धिरसि' इस मन्त्र में आग्नेय, अग्नीषोमीय और उपांशु याग क्रम से ब्राह्मण भाग में पढ़े गए हैं। मन्त्रभाग में भी क्रम से तीनों अनुमन्त्रण पठित हैं। आग्नेय और अग्नीषोमीय यागों में लिङ्ग के ही द्वारा दोनों का विनियोग सिद्ध है, किन्तु 'दब्धिरसि' में लिङ्ग आदि कोई विनियोजक नहीं है । किन्तु 'ब्राह्मण' में जिस स्थान पर 'उपांशु' याग का विधान किया है उसी स्थान पर मन्त्र में भी इसका पाठ है, इस 'क्रम' से 'उपांशु याग' के अनुमन्त्रण में इसका विनियोग है । समाख्या - 'योगबलम्'; अर्थात् यौगिक शब्द 'समाख्या' है। जैसे- 'हौत्रम् औद्गात्रम्' इत्यादि । 'होतुर्इदं हौत्रम्' इस 'योग' के बल से हौत्रादि रूप से समाख्यात कर्म होत्रादि द्वारा अनुष्ठेय होते हैं । विरोध के उदाहरण - श्रुति और लिङ्ग के विरोध में लिङ्ग का दौर्बल्य; जैसे- 'कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' ( हे इन्द्र तुम कभी भी हिंसक नहीं होते हो, किन्तु आहुति देने वाले यजमान पर प्रसन्न होते हो ); 'अग्निहोत्र' के प्रकरण में यह ऋक् सुनी जाती है। इस ऋक् का विनियोग करने वाली यह 'श्रुति' है- 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते'; अर्थात् इन्द्रसम्बन्धिनी ऋक् के गार्हपत्य नाम के अग्नि का आराधन करता है। इस प्रकार इन्द्रप्रकाशन-सामर्थ्य रूप लिङ्ग से 'गार्हपत्य' की ही 'इन्द्र' के अर्थ में लक्षणा आदि कारक विनियोग होगा। इस प्रकार श्रुति और लिङ्ग में विरोध होने पर श्रुति द्वारा लिङ्ग दुर्बल होने के कारण बाध लिया जायगा, क्योंकि 'गार्हपत्यम्' में द्वितीया विभक्ति अभिधा द्वारा पहले ही इस ऋक् को गार्हपत्य अग्नि के उपस्थान में विनियोग कर देगी । प्रकाशक 'इन्द्र' पद के सामर्थ्य रूप लिङ्ग के द्वारा विलम्ब से इन्द्रोपस्थान में ऋक् का विनियोग सूचित होता है अतः यह पक्ष दुर्बल है। इसी प्रकार अन्य बाध्य और बाधकों का विचार 'काव्य- प्रकाश' के टीका-ग्रन्थों से कर लेना चाहिए। अब रस-प्रसङ्ग को हम अधिक विस्तार के भय से यहाँ ही छोड़ देते हैं ।

१. सर्वथा आप ( मीमांसक ) को भी निमित्ततावैचित्र्य के आधार पर अनेक व्यापारों की कल्पना करनी ही होगी तब मैंने जो ऐसी कल्पना की है उससे आपको असूया क्यों है ? केवल यही न, विवश होकर आपको जिसे स्वीकार करना पड़ता है उसे हमने अपना पक्ष बना लिया है !

प्रथम उद्योतः ६७ लोचनम् सर्वैयमनुसरणीया प्रक्रिया । तदुत्तीर्णत्वे तु सर्वं परमेश्वराद्वयं ब्रह्मेत्यस्मच्छा- स्त्रकारेण न न विदितं तत्त्वालोकग्रन्थं विरचयतेत्यास्ताम् । यत् तु भट्टनायकेनोक्तम्—इह दृप्तसिंहादिपदप्रयोगे च धार्मिकपदप्रयोगे च भयानकरसावेशकृतैव निषेधावगतिः तदीयभीरुवीरत्वप्रकृतिनियमावगममन्त- रेणैकान्ततो निषेधावगत्यभावादिति तन्न केवलार्थसामर्थ्य निषेधावगतेर्निमि- करने से क्या लाभ ? जो लोग¹ वाक्य और उसके अर्थ को अखण्ड, स्फोट रूप कहते हैं वे भी जब अविद्या या व्यवहार में आयेंगे तब उन्हें इस प्रक्रिया का अनुसरण करना होगा । उस (अविद्या या व्यवहार) की स्थिति को पार (उत्तीर्ण) होने के बाद तो सब कुछ परमेश्वराद्वय ब्रह्म हो जाता है, इसे हमारे शास्त्रकार नहीं जानते हैं ? जब कि उन्होंने 'तत्त्वालोक' नामक ग्रन्थ की रचना की है ! अस्तु । जो कि भट्टनायक ने कहा है—यहाँ ('भ्रम धार्मिक०' इस स्थल में) निषेध का ज्ञान दृप्तसिंहादि पद के प्रयोग और 'धार्मिक' पद के प्रयोग में होनेवाले भयानक रस के आवेश² के द्वारा ही होता है, क्योंकि उनकी (धार्मिक और सिंह की, क्रमशः) भीरुता और वीरतारूप प्रकृति के नियम (अविनाभाव) के ज्ञान के बिना एकान्ततः निषेध का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए केवल अर्थ का सामर्थ्य निषेध के ज्ञान का १. व्याकरण-दर्शन में स्फोट रूप शब्द-ब्रह्म का सिद्धान्त है उसके अनुसार वाक्य और वाक्यार्थ दोनों अखण्ड होते हैं । शब्द अकेले होकर अनर्थक होता है और समस्त अखण्ड वाक्य से अखण्ड अर्थ का बोध होता है । इसी प्रकार वेदान्ती लोग भी अखण्ड वाक्य और वाक्यार्थ को मानते हैं । पद-पदार्थविभाग के बिना किए ही ये लोग 'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि अखण्ड वाक्य को अखण्ड ब्रह्म का वाचक मानते हैं । इस प्रकार इन दोनों सम्प्रदायों के अनुसार अखण्ड वाक्य का अखण्ड वाक्यार्थ बोध सम्पन्न हो जायगा, इतने व्यापारभेद की कल्पना अनावश्यक है यह कहकर प्रस्तुत कार्य का अपलाप नहीं किया जा सकता । आचार्य का कहना है कि हम दोनों मतों को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि समर्थन करते हैं, किन्तु जब व्यवहार का प्रसंग है तब तो किसी भी अखण्ड वाक्य को बिना क्रिया-कारक-भेद आदि से खण्ड-खण्ड किए अर्थज्ञान नहीं होगा, यहाँ तक कि वैयाकरण को भी नहीं होगा । तथा दूसरे वेदान्ती भी तो 'अविद्या' की स्थिति या व्यावहारिक दुनियाँ में आकर व्यावहारिक सत्य को स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी पद-पदार्थ की कल्पना अवश्य करनी होगी । हाँ जब वे 'विद्या' की स्थिति की बात करेंगे तब उनका अखण्ड-वाक्य-वाक्यार्थवाद हमें स्वीकार्य होगा, क्योंकि उस स्थिति में एक अद्वैत ब्रह्म को छोड़ कर और कुछ रह ही नहीं जाता यह विषय क्या 'ध्वन्यालोक' के रचयिता आचार्य आनन्दवर्धन को विदित नहीं है ? इस प्रकार व्यवहार-क्षेत्र में वैयाकरण और वेदान्ती दोनों को हमारी सब बातें माननी होंगी । इस विषय का स्पष्टीकरण 'काव्यप्रकाश' के टीका-ग्रन्थों में है । २. भ्रम धार्मिक० में भट्टनायक के कथनानुसार 'दृप्तसिंह' आदि और 'धार्मिक' पद के प्रयोग के होने पर प्रतिपत्ता (बोद्धा) को जो निषेध का ज्ञान होता है वह सर्वथा भयानक रस के आवेश के कारण ही होता है, क्योंकि बिना धार्मिक की भीरुता और सिंह की वीरता के ज्ञान के 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता है । केवल अर्थ के सामर्थ्य से निषेध का ज्ञान नहीं होता है । तात्पर्य यह कि प्रतिपत्ता को भयानक रस की अभिव्यक्ति से प्रस्तुत में निषेध की प्रतीति होती है ।

६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्

त्तमिति । तत्रोच्यते-केनोक्तमेतत् ‘वक्तृप्रतिपत्तृविशेषावगमविरहेण शब्दगत- ध्वननव्यापारविरहेण च निषेधावगतिः' इति । प्रतिपत्तृप्रतिभासहकारित्वं ह्यस्माभिर्द्योतनस्य प्राणत्वेनोक्तम् । भयानकरसावेशश्च न निवार्यते, तस्य भयमात्रोत्पत्त्यभ्युपगमात् । प्रतिपत्तृश्च रसावेशो रसाभिव्यक्त्यैव । रसश्च व्यङ्ग्य एव, तस्य च शब्दवाच्यत्वं तेनापि नोपगतमिति व्यङ्ग्यत्वमेव । प्रतिपत्तुरपि रसावेशो न नियतः, न ह्यसौ नियमेन भीरुधार्मिकसब्रह्मचारी सहृदयः । अथ तद्विशेषोऽपि सहकारी कल्प्यते, तर्हि वक्तृप्रतिपत्तृप्रतिभाप्राणितो निमित्त नहीं।' इस पर कहते हैं—'यह किसने कहा है कि वक्ता विशेष और प्रतिपत्ता विशेष के बिना जाने और बिना शब्दगत ध्वनन व्यापार के, निषेध का ज्ञान होता है ? प्रतिपत्ता की प्रतिभा की (व्यंग्यार्थविगति में) सहकारिता को तो हमने द्योतन (ध्वनन- व्यापार) का प्राण कहा है । भयानक रस के आवेश का हम निवारण नहीं करते क्योंकि सिर्फ हम उसे भयमात्र की उत्पत्ति के रूप में स्वीकार करते हैं । प्रतिपत्ता को रस का आवेश रस की अभिव्यक्ति से ही होगा । और रस व्यंग्य ही होता है, क्योंकि रस का शब्दवाच्यत्व किसी ने भी नहीं माना है, अतः वह व्यंग्य ही होता है । प्रतिपत्ता को भी नियत रसावेश नहीं होता । क्योंकि वह सहृदय डरपोंक धार्मिक जैसा नियमतः नहीं होता है । यदि उस (प्रतिपत्ता) विशेष को सहकारी कल्पित करते हैं तो वक्ता और इसके खण्डन में लोचनकार का कहना है कि भट्टनायक को समझने में भ्रम हो गया है कि वक्ता और प्रतिपत्ता के वैशिष्ट्य के ज्ञान के बिना और शब्दगत ध्वनन-व्यापार के बिना ही हम 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान करते हैं। बल्कि हम तो यह कहते हैं कि प्रतिपत्ता की प्रतिभा रूप विशेषता द्योतन या व्यञ्जना का प्राण है। दूसरी उपेक्षणीय बात जो भट्टनायक कहते हैं वह यह कि प्रतिपत्ता को भयानक रस का आवेश होता है, अर्थात् सुनने वाला सहृदय भयानकरस से आविष्ट होकर प्रस्तुत पद्य के 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान करता है। यहाँ भयानकरस का आवेश भयमात्र की उत्पत्ति ही हमें स्वीकार्य है। क्योंकि रसावेश रसाभिव्यक्ति ही से रस का आवेश हो सकता है। और रस सर्वथा व्यङ्ग्य ही होता है, शब्द द्वारा वाच्य कदापि नहीं होता है। इसलिए 'दृप्तसिंह' 'आदि और 'धार्मिक' पद के प्रयोग से जो भयानक रस का आवेश भट्टनायक ने कहा है वह उनकी मूलतः गलत धारणा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि धार्मिक के समान प्रतिपत्ता सहृदय नियमतः भीरु नहीं हो सकता है, वह वीरप्रकृति भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में भयानक-रस का आवेश हो यह आवश्यक नहीं है। तब तो आप ऐसे सहृदय के लिए 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान नहीं होना ही बताएँगे ? इसलिए यह स्वीकार करना होगा कि भयानक रस की अभिव्यक्ति से 'निषेध' की प्रतीति नहीं होती। १. ऊपर ध्वनन-व्यापार-खण्डन में भट्टनायक का जो यह मन्तव्य है कि प्रतिपत्ता अर्थात् बोद्धा को भयानकरस के आवेश के कारण ही यहाँ 'निषेध' का ज्ञान होता है, उस पर जो आचार्य अभिनवगुप्त ने यह कहा कि यह कोई नियम नहीं हो सकता कि सहृदय प्रतिपत्ता सर्वथा इस पद्य को सुन कर भयानक रस से आविष्ट होता है; क्योंकि प्रत्येक सहृदय उस 'धार्मिक' के

प्रथम उद्योतः ६९ लोचनम् ध्वननव्यापारः किं न सह्यते । किं च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्रा- हकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिध्वंसोऽयम् । यदाह—'क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः' इति । अथ रसस्यैवेयता प्राधान्यमुक्तम्; तत्को न सहते । अथ वस्तुमात्रध्वनेरेतदुदाहरणं न युक्तमित्युच्यते, तथापि काव्योदाहरणत्वाद् द्वाव- प्यत्र ध्वनी स्तः, को दोषः । यदि तु रसानुवेधेन विना न तुष्यति, तद् भयानकरसानुवेधो नात्र सहृद- यहृदयदर्पणमध्यास्ते; अपि तु उक्तनीत्या सम्भोगाभिलाषविभावसङ्केतस्था- नोचितविशिष्टकाकाद्यनुभावशबलनोदितशृङ्गाररसानुवेधः । रसस्यालौकिकत्वा- प्रतिपत्ता की प्रतिभा से प्राणित ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सहन करते ? दूसरे यह कि वस्तुध्वनि को तो दूषित करते हैं, रसध्वनि का, 'जो उस (वस्तुध्वनि) का अनुग्राहक है, समर्थन करते हैं, तो खूब यह ध्वनि का ध्वंस है ! जो कि कहा है— 'देवता का क्रोध भी वर के जैसा होता है।' यदि कहिए कि अब तक रस का ही प्राधान्य कहा है, तो इस बात को कौन नहीं सहन करता है ? यदि वस्तुमात्र ध्वनि का यह उदाहरण ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं तथापि काव्य के उदाहरण होने से दोनों ध्वनि यहाँ हैं तो क्या दोष है ? यदि (सहृदय) विना रसानुवेध (रसावेश) के सन्तुष्ट नहीं होता है, तो (कहना यह है कि) सहृदय के हृदय-दर्पण में भयानक रस का आवेश अधिष्ठित नहीं होता, बल्कि उक्त प्रकार से सम्भोग की अभिलाषा का उद्दीपन-विभाव जो सङ्केत-स्थान है उसके उचित जो विशिष्ट काकु आदि अनुभाव हैं, उनके शबलन (सम्मिश्रण) से शृङ्गाररस का अनुवेध (आवेश) उदित होता है। रस के अलौकिक होने से और उतने मात्र से ही उसका अवगम सम्भव नहीं है, अतएव प्रथम जिनका भेद निर्विवाद समान 'भीरु' नहीं होता है, बल्कि वीरप्रकृति भी होता है। इस पर भट्टनायक के पक्ष का यह कथन है कि यदि प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष अर्थात् भीरुत्व को यहाँ भयानकरस के आवेश के होने में सहकारी कारण कल्पित कर लिया जाय तो नियम बन सकता है और उस तरह का प्रत्येक प्रतिपत्ता भयानकरस के आवेश से 'निषेध' का ज्ञान कर सकता है। इस पर लोचनकार का कहना है कि जब आपने प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष तक को स्वीकार कर लिया तब ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सह लेते हैं, क्योंकि ध्वनन में भी तो प्रतिपत्ता का प्रतिभाविशेष सहकारी होता है ? आश्चर्य तो इस पर होता है कि वस्तुध्वनि को स्वीकार नहीं करते और रसध्वनि को स्वीकार करते हैं, जब कि सध्वनि वस्तुध्वनि का अनुग्राहक है। यदि आप इस पर अड़े हुए हैं कि यहाँ रसध्वनि का प्राधान्य है तो हम आपकी बात को अमान्य नहीं ठहराते। हमें तो बस यही कहना है कि किसी प्रकार 'ध्वनि' का निराकरण नहीं होना चाहिए। प्रस्तुत में यदि रसध्वनि और वस्तुध्वनि दोनों हों, तो क्या हर्ज है !

७० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तावन्मात्रादेव चानवगमात्प्रथमं निर्विवादसिद्धविविक्तविधिनिषेधप्रदर्शनाभि- प्रायेण चैतद्वस्तुध्वनेरुदाहरणं दत्तम् । यस्तु ध्वनिव्याख्यानोद्यतस्तात्पर्यशक्तिमेव विवक्षासूचकत्वमेव वा ध्वनन- मवोचत्, स नास्माकं हृदयमावर्जयति । यदाहुः—'भिन्नरुचिर्हि लोकः' इति । तदेतदग्रे यथायथं प्रतनिष्याम इत्यास्तां तावत् । भ्रमेति । अतिसृष्टोऽसि प्राप्तस्ते भ्रमणकालः । धार्मिकेति । कुसुमाद्युपकरणार्थं युक्तं ते भ्रमणम् । विस्रब्ध इति शङ्काकारणवैकल्यात् । स इति यस्ते भयप्रकम्पामङ्गलतिकामकृत । अद्येति । दिष्ट्या वर्धस इत्यर्थः । मारित इति पुनरस्यानुत्थानम् । तेनेति । यः पूर्वं कर्णो- पकर्णिकया त्वयाप्याकर्णितो गोदावरीकच्छगहने प्रतिवसतीति । पूर्वमेव हि तद्रक्षायै तत्तयोपश्रावितोऽसौ; स चाधुना तु दृप्तत्वात्ततो गहनान्निस्सरतीति प्रसिद्धगोदावरीतीरपरिसरानुसरणमपि तावत्कथाशेषीभूतं का कथा तल्लतागहन- प्रवेशशङ्कयेति भावः । सिद्ध है उन विधि और निषेध के प्रदर्शन के अभिप्राय से यह वस्तुध्वनि¹ का उदाहरण दिया है । जिसने ध्वनि का व्याख्यान करने के लिए उद्यत हो, तात्पर्य शक्ति को ही अथवा विवक्षा के सूचकत्व ( अनुमापकत्व ) को ही ध्वनन कहा है, वह हमारे हृदय को आकृष्ट नहीं करता । जैसा कि कहते हैं—'लोग भिन्न रुचि के होते हैं।' तो इसे आगे यथावत् विस्तार करेंगे । घूमो—। तुम अतिसृष्ट हो ( तुम्हारी इच्छा पर है घूमो अथवा न घूमो ), तुम्हारे घूमने का यह समय है । धार्मिक ( बाबाजी )—। फूल आदि सामग्री के लिए तुम्हारा घूमना ठीक है । इतमीनान से—। क्योंकि शङ्का करने का अब कोई कारण नहीं रह गया । वह—। जिसने तुम्हारे अङ्गों को भय से कम्पित कर डाला था । आज—। अर्थात् तुम्हारे भाग्य की वृद्धि है । मार डाला गया—। अब फिर वह नहीं आएगा । उस ( सिंह ने )—। जिसे पहले से तुमने भी कानोंकान सुन रखा है कि गोदावरी के गहन कच्छ में रहता है । पहले से ही उस स्वैरिणी ने सङ्केत स्थान की रक्षा के लिए सिंह के गोदावरी के गहन कच्छ में निवास करने का वृत्तान्त धार्मिक को सुना रखा है । भाव यह कि ( पहले तो कच्छ गहन में रहता मात्र था ) अब तो वह दृप्त ( मत्त, पागल ) हो जाने के कारण गहन से निकल जाता है, इसलिए प्रसिद्ध गोदावरी नदी के तीर की भूमि के आस-पास घूमना भी बिल्कुल बन्द हो गया है ( सिर्फ चर्चा का विषय बन कर रह गया है ) वहाँ के लतागहन में प्रवेश की शङ्का की तो बात ही नहीं । १. सहृदय पर भयानक रस का आवेश तो कतई नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कह सकते हैं कि यहाँ शृङ्गार रस का अनुवेध है । परन्तु इसे वस्तुध्वनि का उदाहरण देते हुए आचार्य का अभिप्राय यह है कि पहले निर्विवादसिद्ध विधि-निषेध का प्रदर्शन हो जाय ।

प्रथम उद्योतः ७१ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा— अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्थ अहं दिअसअं पलोएहि । मा पहिअ रत्तिअन्धअ सेज्जाए मह णिमज्जहिसि ॥ कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यंग्य विधिरूप; जैसे— सास यहाँ गहरी सोती है, यहाँ मैं (सोती हूँ), दिन में ही देख लो। रात के अन्धे (रतौंधी के रोगी) हे पथिक ! कहीं हमारी खाट पर न गिर पड़ना । लोचनम् अत्ता इति । श्वश्रूरत्र शेते अथवा निमज्जति अत्राहं दिवसकं प्रलोकय । मा पथिक रात्र्यन्ध शय्यायामावयोः शयिष्ठाः ॥ मह इति निपातोऽनेकार्थवृत्तिरत्रावयोरित्यर्थे न तु ममेति । एवं हि विशेष- वचनमेव शङ्काकारि भवेदिति प्रच्छन्नाभ्युपगमो न स्यात् । कांचत्प्रोषित- पतिकां तरुणीमवलोक्य प्रवृद्धमदनाङ्कुरः संपन्नः पान्थोऽनेन निषेधद्वारेण तया- भ्युपगत इति निषेधाभावोऽत्र विधिः । न तु निमन्त्रणरूपोऽप्रवृत्तप्रवर्तनास्व- भावः सौभाग्याभिमानखण्डनाप्रसङ्गात् । अत एव रात्र्यन्धेति समुचितसमय- (प्राकृत गाथा में) 'मह' यह निपात अनेकार्थवृत्ति होने के कारण यहाँ 'हमारी' (अर्थात् मेरी और सास की) इस अर्थ में है न कि 'मेरी' इस अर्थ में। ऐसा करने पर ('मम' यह) विशेष वचन ही श्वश्रू को शङ्कित कर देने वाला^१ हो जायगा, ऐसी स्थिति में नायिका द्वारा किया गया पथिक का प्रच्छन्नाभ्युपगम (छिपे ढंग से साथ सोने की स्वीकृति) नहीं बनेगा। किसी प्रोषित-पतिका (जिसका पति परदेश चला गया है) तरुणी को देखकर कोई पथिक विशेष कामासक्त हो गया, तब इस निषेध के प्रकार से उस तरुणी ने उसे शयन के लिए वचन दिया, इस प्रकार यहाँ निषेधाभावरूप विधि है, न कि अप्रवृत्त में प्रवर्तन स्वभाव का निमन्त्रणरूप^२ (विधि) है; क्योंकि (तब तो) सौभाग्य के अभिमान के खण्डित हो जाने का प्रसंग होगा। इसीलिए 'रात के अन्धे' इसके द्वारा योग्य समय में सम्भावित होने वाले विकारों से उसका आकुलित १. यदि नायिका 'मम' इस विशेष वचन का प्रयोग करेगी तब सुनती हुई उसकी सास को यह शंका हो सकती है यह (बहू) अपनी ही खाट पर पथिक के गिर जाने की बात क्यों करती है?, जब कि रतौंधी वाला पथिक मेरी भी खाट पर गिर सकता है। हो न हो यहाँ दाल में कुछ काला है! २. प्रस्तुत गाथा में प्रतीयमान विधि को निषेध का अभाव रूप समझना चाहिए, क्योंकि नायिका ने 'खाट पर गिर न जाना' इस निषेध के प्रकार से पथिक को मिलन का वचन दिया है। यहाँ आचार्य का निर्देश है कि 'विधि' को निमन्त्रण स्वरूप नहीं समझ लेना चाहिए, अर्थात् नायिका ने यहाँ अप्रवृत्त पथिक को निमन्त्रण के द्वारा प्रवृत्त नहीं किया है, क्योंकि यदि ऐसा माना जायगा तब उसे अपने सौभाग्य का अभिमान क्या रह जायगा। पथिक तो स्वयं नायिका से-

७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सम्भाव्यमानविकाराकुलितत्वं ध्वनितम् । भावतदभावयोश्च साक्षाद्विरोधाद्वा- च्याद्व्यङ्ग्यस्य स्फुटमेवान्यत्वम् । यत्त्वाह भट्टनायकः-‘अहमित्यभिनयविशेषेणात्मदशावेदनाच्छाब्दमेतदपी’- ति । तत्राहमिति शब्दस्य तावन्नायं साक्षादर्थः; काक्वादिसहायस्य च तावति ध्वननमेव व्यापार इति ध्वनेर्भूषणमेतत् । अत्तेति प्रयत्नेनानिभृतसम्भोगपरि- हारः । अथ यद्यपि भवान्मदनशरासारदीर्यमाणहृदय उपेक्षितुं न युक्तः, तथापि किं करोमि पापो दिवसकोऽयमनुचितत्वात्कुत्सितोऽयमित्यर्थः । प्राकृते पुंनपुंस- कयोरनियमः । न च सर्वथा त्वामुपेक्षे, यतोऽत्रैवाहं तत्प्रलोकय नान्यतोऽहं गच्छामि, तदन्योन्यवदनावलोकनविनोदेन दिनं तावदतिवाहयाव इत्यर्थः । प्रतिपन्नमात्रायां च रात्रावन्धीभूतो मदीयायां शय्यायां मा श्लिक्षः, अपि होना ध्वनित होता है । भाव और अभाव इन दोनों में साक्षात् विरोध होने के कारण वाच्य से व्यंग्य का भिन्नत्व स्पष्ट ही है । जो कि भट्टनायक ने कहा है—( गाथा में प्रयुक्त ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस पद के द्वारा अभिनय विशेष के बल से अपनी दशा के आवेदन करने के कारण यह ( निषेध के द्वारा जो अभ्युपगमन ) भी वह शब्द ( शब्दाभिधेय ) है ।’ इस पर ( कहते हैं कि ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस शब्द का यह ( अभिनय विशेषरूप अभ्युपगमन ) साक्षात् अर्थ नहीं है, बल्कि काकु की सहायता से ऐसा होता है, ऐसी स्थिति में ध्वनन ही व्यापार ( यहाँ ठहरता ) है; यह ध्वनि का भूषण है, दूषण नहीं । ( गाथा में ) ‘अत्ता’ ( ‘श्वश्रू’ ) के प्रयोग द्वारा प्रयत्नपूर्वक सम्भावित अपने अनिभृत ( एकान्त ) सम्भोग का परिहार है । यद्यपि तुम काम के बाणों की वर्षा से फटे हृदय वाले किसी प्रकार उपेक्षणीय नहीं हो तथापि यह पापी दिन सम्भोग के लिए अनुचित होने के कारण बड़ा खराब है—यह अर्थ हुआ । प्राकृत में पुंल्लिङ्ग-नपुंसक का नियम¹ नहीं है । अर्थात् मैं सर्वथा तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर रही हूँ, क्योंकि देखो कहीं अन्यत्र नहीं जाती हूँ, अतः हम एक दूसरे का मुख देखने के विनोद से इस दिन को बितायें । रात के होते ही अन्धे होकर मिलने के लिए प्रवृत्त है, उत्सुक है; इसी कारण ही नायिका ने उसे ‘रात्र्यन्ध’ ( रतौंधी का रोगी या रात का अन्धा ) कह कर उसके सम्भाव्यमान विकारों के कारण आकुलता को सूचित किया है ! अन्यथा नायिका को क्या पड़ी थी कि उसे ‘रात्र्यन्ध’ कहती, जब कि वह किसी प्रकार पहुँचता स्वयं वह मिल ही लेती । किन्तु ऐसी स्थिति ही नहीं है । १. तात्पर्य यह कि कोई भी शब्द, जो पुंल्लिङ्ग है वह नपुंसक भी हो सकता है और जो नपुंसक है वह पुंल्लिङ्ग भी हो सकता है, जैसा कि पुंल्लिङ्ग ‘दिवसक’ शब्द नपुंसक पढ़ा गया है । किन्तु मेरा विचार है कि ‘दिवसकं प्रलोकय’—प्रस्तुत इस स्थल में ‘दिवसकम्’ यह प्रयोग ‘कालाध्वनोर- त्यन्तसंयोगे’ के नियम के अनुसार ‘द्वितीया’ विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसलिए यहां प्राकृत-शब्द के पुंनपुंसकत्व का विचार ही कोई आवश्यक नहीं है । फिर भी, सम्भव है आचार्य का यह कहना ठीक हो ।

प्रथम उद्योतः ७३ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये विधिरूपेऽनुभयरूपो यथा— वच्च मह च्चिअ एक्केइ होन्तु णीसासरोइअव्वाईं । मा तुज्झ वि तीअ विणा दक्खिण्णहअस्स जाअन्तु ॥ कहीं वाच्य के विधिरूप होने पर (व्यङ्ग्य) अनुभय रूप (न विधिरूप तथा न निषेधरूप) होता है। जैसे— तू जा, मुझ ही अकेली के निश्वास और रुदन भाग में हों, उसके बिना दाक्षिण्य (समानुरागिता) से रहित तेरे भी ये (निश्वास, रुदन) मत पैदा हों। लोचनम् तु निभृतनिभृतमेवात्ताभिधाननिकटकण्टकनिद्रान्वेषणपूर्वकमितीयदत्र ध्वन्यते। व्रज ममैवैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितव्यानि । मा तवापि तया विना दाक्षिण्यहतस्य जनिषत ॥ अत्र व्रजेति विधिः । न प्रमादादेव नायिकान्तरसंगमनं तव, अपि तु गाढा- नुरागात्, येनान्यादृङ्मुखरागः गोत्रस्खलनादि च, केवलं पूर्वकृतानुपालना- त्मना दाक्षिण्येनैकरूपत्वाभिमानेनैव त्वमत्र स्थितः, तत्सर्वथा शठोऽसीति गाढमन्युरूपोऽयं खण्डितनायिकाभिप्रायोऽत्र प्रतीयते । न चासौ व्रज्याभाव- रूपो निषेधः, नापि विध्यन्तरमेवान्यनिषेधाभावः । मेरी शय्या पर मत गिर जाओ, बल्कि बहुत कायदे से यह पता कर लो कि 'श्वश्रू' नाम का निकट वाला काँटा नींद में है, यह इतना ध्वनित होता है । यहाँ 'जा' यह विधि है। प्रमादवश ही तू दूसरी नायिका से नहीं मिलता, अपितु गाढ़ अनुरागवश तू (उससे) मिलता है, जिससे यह तेरा मुखराग कुछ भिन्न-सा है और गोत्रस्खलन (दूसरी नायिका का नामोच्चारण) आदि हो रहे हैं। सिर्फ तू यहाँ मेरे पालन का जो पहले वचन कर चुका है उसी दाक्षिण्य के कारण जो एकरूपता का अभिमान तुझे है उसी से तू यहाँ ठहरा है तो तू सर्वथा 'शठ'१ निकला, इस प्रकार यहाँ 'खण्डिता'२ नायिका का अधिक कोपरूप अभिप्राय प्रतीत होता है। न तो यहाँ गमनाभावरूप निषेध है और न तो कोई दूसरा विधि (विध्यन्तर) निषेध का अभाव ही (व्यंग्य होता है)। १. 'शठ' वह नायक कहलाता है जो एक नायिका में बाहर से अनुराग प्रकट करता है और छिपे-छिपे दूसरी से अनुराग करते हुए उसका विप्रिय या अहित करता है—गूढविप्रियकृच्छठः । २. 'खण्डिता' वह नायिका कहलाती है जिसका प्रिय पराई के साथ सम्पन्न मिलन के चिह्न से चिह्नित होकर प्रातःकाल उपस्थित होता है और वह उसे देख कर ईर्ष्या से भर जाती है— पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः । सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता ॥ साहित्यदर्पण ३।११७

७४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपेऽनुभयरूपो यथा— दे आ पसिअ णिवत्तसु मुहससिजोह्लाविलुत्ततमणिवहे । अहिसारिआणँ विघ्घं करोसि अण्णाणं वि हआसे ॥ कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यङ्ग्य अनुभयरूप होता है। जैसे— प्रार्थना करता हूँ, प्रसन्न हो, लौट आओ, अरी, अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से अन्धकार-समूह को दूर करनेवाली, इन आशाओं वाली, तू दूसरी अभिसारिकाओं के भी विघ्न करती है। लोचनम् दे इति निपातः प्रार्थनायाम् । आ इति तावच्छब्दार्थे । तेनायमर्थः— प्रार्थये तावत्प्रसीद निवर्तस्व मुखशशिज्योत्स्नाविलुप्ततमोनिवहे । अभिसारिकाणां विघ्नं करोष्यन्यासामपि हताशे ॥ अत्र व्यवसिताद्गमनान्निवर्तस्वेति प्रतीतेर्निषेधो वाच्यः । गृहागता नायिका गोत्रस्खलिताद्यपराधिनी नायके सति ततः प्रतिगन्तुं प्रवृत्ता, नायकेन चाटूप- क्रमपूर्वकं निवर्त्यते । न केवलं स्वात्मनो मम च निर्वृतिविघ्नं करोषि, यावद्- न्यासामपि; ततस्तव न कदाचन सुखलवलाभोऽपि भविष्यतीत्यत एव हताशा- सीति वल्लभाभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । यदि वा सख्योपदिश्यमानापि तदवधीरण्या गच्छन्ती सख्योच्यते—न केवलमात्मनो विघ्नं करोषि, लाघवादबहुमानास्पदमात्मानं कुर्वती, अत एव हताशा, यावद्वदनचन्द्रिकाप्रकाशितमार्गतयान्यासामप्यभिसारिकाणां विघ्नं ( गाथा में ) 'दे' यह निपात प्रार्थना के अर्थ में है । 'आ' यह निपात 'तावत्' शब्द के अर्थ में है । इसलिए यह अर्थ हुआ— प्रार्थना करता हूँ……। यहाँ व्यवसित गमन से 'लौट आओ' इस प्रतीति के कारण गमन का निषेध वाच्य है । जब नायिका घर आई तब नायक गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा और वह (नायिका) लौट जाने के लिए प्रवृत्त हुई, तब नायक प्रशंसा की भाषा का उपक्रम करके उसे निवृत्त करता है । न केवल तू अपने-आपके और मेरे सुख में विघ्न डालती है, बल्कि दूसरी स्त्रियों के भी; इसलिए तुझे कभी भी सुखलेश का लाभ भी नहीं होगा, अतएव तू हताशा है, इस प्रकार नायक का अभिप्राय रूप चाटु विशेष व्यंग्य है । अथवा सखी के द्वारा उपदेश दिए जाने पर भी उसे न मानकर जाती हुई नायिका के प्रति सखी कहती है—न केवल तू अपना विघ्न करती है—इस प्रकार के छुटपन (लघुता) से अपने को अवहुमान का आस्पद बनाती हुई—अतएव हताशा, बल्कि तू अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के भी विघ्न करती है, यह सखी का अभिप्रायरूप चाटुविशेष व्यंग्य है । इन दोनों व्याख्यानों में

प्रथम उद्योतः ७५ लोचनम् करोषीति सख्यभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । अत्र तु व्याख्यानद्वयेऽपि व्यवसितात्प्रतीपगमनात्प्रियतमगृहगमनाच्च निवर्तस्वेति पुनरपि वाच्य एव विश्रान्तेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदस्य प्रेयोरसवदलङ्कारस्योदाहरणमिदं स्यात्, न ध्वनेः । तेनायमत्र भावः—काचिद्रभसात्प्रियतममभिसरन्ती तद्गृहाभिमुखमाग- च्छता तेनैव हृदयवल्लभेनैवमुपश्लोक्यतेऽप्रत्यभिज्ञानच्छलेन, अत एवात्मप्रत्य- भिज्ञापनार्थमेव नर्मवचनं हताश इति । अन्यासाञ्च विघ्नं करोषि तव चेप्सित- लाभो भविष्यतीति का प्रत्याशा । अत एव मदीयं वा गृहमागच्छ, त्वदीयं वा गच्छावेत्युभयत्रापि तात्पर्यादनुभयरूपो वल्लभाभिप्रायश्चात्वात्मा व्यङ्ग्य इत्यत्येव व्यवतिष्ठते । अन्ये तु—'तटस्थानां सहृदयानामभिसारिकां प्रतीय- मुक्तिः' इत्याहुः । तत्र हताशे इत्यामन्त्रणादि युक्तमयुक्तं वेति सहृदया एव प्रमाणम् । भी (नायिका द्वारा) व्यवसित प्रतीपगमन (अपने घर के प्रति गमन) और प्रियतम के गृह के गमन से 'लौट आओ' (निवृत्त हो) यह जो वाच्य है उसमें ही (सखीगत नायिकाविषयकभावरूप रति अथवा नायकगत नायिकाविषयक रति के) विश्रान्त होने के कारण गुणीभूतव्यंग्य के भेद जो क्रमशः प्रेयोऽलङ्कार और रसवदलङ्कार हैं उनका यह उदाहरण होगा, न कि ध्वनि का। इसलिए' यहाँ यह भाव है—कोई नायिका झटपट प्रियतम के घर के प्रति अभिसार करती है, उसी समय मार्ग में उसके घर की ओर आता हुआ वही प्रियतम अप्रत्यभिज्ञान (नायिका को न पहचानने) के बहाने उसे इस प्रकार प्रशंसा करता है। इसीलिए अपने को पहचानने के लिए ही नर्मवचन 'हताशे' (का प्रयोग) है। दूसरी (अभिसारिकाओं) के विघ्न पहुँचाती है, फिर तेरा ईप्सित लाभ होगा, इसकी क्या प्रत्याशा है ? अतएव 'मेरे घर आ, या हम दोनों तेरे घर चलें' इन दोनों में तात्पर्य होने के कारण अनुभयरूप चाटुगर्भित प्रिय का अभिप्राय व्यंग्य इतने में ही व्यवस्थित होता है। दूसरे तो यह कहते हैं कि यह तटस्थ सहृदयों का अभिसारिका के प्रति वचन है। वहाँ 'हताशे' यह आमन्त्रणादि ठीक है अथवा ठीक नहीं, सहृदयजन ही प्रमाण हैं। १. प्रस्तुत गाथा 'दे आ पसिअ०' को आचार्य ने वक्ता के भेद के आधार पर तीन-चार प्रकार से लगाया है। पहले व्याख्यान के अनुसार नायक के घर पर नायिका पहुँची तब नायक उसके समक्ष गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा । इस पर तुनक कर जब वह चल पड़ने के लिए उद्यत हुई तब नायक उसकी प्रशंसा के द्वारा उसे निवृत्त करने का प्रयत्न करने लगा । उसने कहा कि वह अपने और मेरे सुख में तत्काल विघ्न तो कर ही रही है अन्य अभिसारिकाओं के सुख में भी विघ्न डाल रही है। 'अभिसारिका' वह नायिका कहलाती है जो अन्धकार आदि में प्रिय का अभिसरण करती है'। यहाँ नायक का चाटुरूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। दूसरे व्याख्यान के अनुसार यह नायिका की सखी का वचन है, नायिका को सखी ने मना किया कि वह तत्काल अभिसार न करे;

७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्याद्विभिन्नविषयत्वेन व्यवस्थापितो यथा— कस्स व ण होइ रोसो दट्ठूण पिआएँ सव्वणं अहरम्। सभमरपउमग्घाइणि वारिअवामे सहसु एह्निम्॥ अन्ये चैवंप्रकारा वाच्याद्विभेदिनः प्रतीयमानभेदाः सम्भवन्ति। तेषां दिङ्मात्रमेतत्प्रदर्शितम्। द्वितीयोऽपि प्रभेदो वाच्याद्विभिन्नः सप्रपञ्चमग्रे दर्शयिष्यते। कहीं वाच्य से विभिन्न-विषय रूप में व्यवस्थापित व्यङ्ग्य, जैसे— अथवा प्रिय के व्रणयुक्त अधर को देखकर किसे क्रोध नहीं होता, री, मना करने पर भी भौंरे सहित कमल को सूंघने वाली, अब तू उसका दुष्परिणाम भुगत! वाच्य से भेद रखने वाले प्रतीयमान के दूसरे इस प्रकार के भेद सम्भव हैं। उन्हें दिङ्मात्र यहाँ प्रदर्शित किया है। वाच्य से विभिन्न दूसरा भी प्रभेद आगे प्रपञ्च के साथ दिखायेंगे। लोचनम् एवं वाच्यव्यङ्ग्ययोर्धार्मिकपान्थप्रियतमाभिसारिकाविषयैक्येऽपि स्वरूप- भेदाद्भेद इति प्रतिपादितम्। अधुना तु विषयभेदादपि व्यङ्ग्यस्य वाच्याद्भेद इत्याह—क्वचिद्वाच्यादिति। व्यवस्थापित इति। विषयभेदोऽपि विचित्ररूपो व्यवतिष्ठमानः सहृदयैर्व्यवस्थापयितुं शक्यत इत्यर्थः। कस्य वा न भवति रोषो दृष्ट्वा प्रियायाः सव्रणमधरम्। सभ्रमरपद्माघ्राणशीले वारितवामे सहस्वेदानीम्॥ इस प्रकार (इन निर्दिष्ट उदाहरणों में) धार्मिक, पान्थ, प्रियतम और अभिसारिका के वाच्य और व्यंग्य के एकविषय होने पर भी स्वरूप के भेद से भेद है यह प्रतिपादन किन्तु जब यह नायिका ने नहीं माना तब सखी ने कहा कि हताशा वह अपना विघ्न तो करती ही है साथ ही अपने मुखचन्द्र की चन्द्रिका से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के भी विघ्न करने के लिए प्रस्तुत है। यहाँ सखी का चाटु रूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। आचार्य के कथनानुसार इन दोनों व्याख्यानों में प्रस्तुत गाथा 'ध्वनि' का उदाहरण न होकर गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण हो जाती है। सखी के वचन के पक्ष में 'प्रेयोऽलङ्कार' है। भाव के पराङ्ग होने पर 'प्रेयोऽलङ्कार' होता है। यहाँ सखी की नायिका में 'रति' व्यङ्ग्य है एवं 'लौट आओ' (निवर्त्तस्व) इस वाच्य के प्रति अङ्ग हो रहा है। इसी प्रकार नायक के वचन के पक्ष में यह रसवदलङ्कार है। क्योंकि रस जब पराङ्ग होता है तब 'रसवदलङ्कार' होता है। यहाँ नायक की नायिकागत रति प्रस्तुत वाच्य के प्रति अङ्ग हो रही है। इसलिए आचार्य ने तृतीय व्याख्यान किया कि नायिका को उस समय अभिसार करते हुए नायक अंधेरे में मार्ग में पाता है जब वह स्वयं नायिका के घर उससे मिलने के लिए जा रहा था। नायिका को पहचान कर भी न पहचानने का बहाना करके नायक ने प्रस्तुत वचन कहा।