गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वर्णस्तथैव च।
शीलदः शीलसम्पन्नो दुःशीलपरिवर्जितः॥
मोक्षोऽध्यात्मसमाविष्टः स्तुतिः स्तोता च पूजकः।
पूज्यो वाक्करणं चैव वाच्यं चैव तु वाचकः॥
वेत्ता व्याकरणं चैव वाक्यं चैव च वाक्यवित्।
वाक्यगम्यस्तीर्थवासी तीर्थस्तीर्थी च तीर्थवित्॥
तीर्थादिभूतः साङ्ख्यश्च निरुक्तं त्वधिदैवतम्।
प्रणवः प्रणवेशश्च प्रणवेन प्रवन्दितः॥
प्रणवेन च लक्ष्यो वै गायत्री च गदाधरः।
शालग्रामनिवासी च शालग्रामस्तथैव च॥
जलशायी योगशायी शेषशायी कुशेशयः।
महीभर्ता च कार्यं च कारणं पृथिवीधरः॥
प्रजापतिः शाश्वतश्च काम्यः कामयिता विराट्।
सम्राट् पूषा तथा स्वर्गो रथस्थः सारथिर्बलम्॥
धनी धनप्रदो धन्यो यादवानां हिते रतः।
अर्जुनस्य प्रियश्चैव ह्यर्जुनो भीम एव च॥
पराक्रमो दुर्विषहः सर्वशास्त्रविशारदः।
सारस्वतो महाभीष्मः पारिजातहरस्तथा॥
अमृतस्य प्रदाता च क्षीरोदः क्षीरमेव च।
इन्द्रात्मजस्तस्य गोप्ता गोवर्धनधरस्तथा॥
कंसस्य नाशनस्तद्वद्धस्तिपो हस्तिनाशनः।
शिपिविष्टः प्रसन्नश्च सर्वलोकार्तिनाशनः॥
मुद्रो मुद्रा करश्चैव सर्वमुद्राविवर्जितः।
देही देहस्थितश्चैव देहस्य च नियामकः॥
श्रोता श्रोतृनियन्ता च श्रोतव्यः श्रवणं तथा।
त्वक्स्थितश्च स्पर्शयित्वा स्पृश्यं च स्पर्शनं तथा॥
रूपद्रष्टा च चक्षुःस्थो नियन्ता चक्षुषस्तथा।
दृश्यं चैव तु जिह्वास्थो रसज्ञश्च नियामकः॥
घ्राणस्थो घ्राणकृद् घ्राता घ्राणेन्द्रियनियामकः।
वाक्स्थो वक्ता च वक्तव्यो वचनं वाङ्नियामकः॥
प्राणिस्थः शिल्पकृच्छिल्पो हस्तयोश्च नियामकः।
पदव्यश्चैव गन्ता च गन्तव्यं गमनं तथा॥
नियन्ता पादयोश्चैव पाद्यभाक् च विसर्गकृत्।
विसर्गस्य नियन्ता च ह्युपस्थस्थः सुखं तथा॥
उपस्थस्य नियन्ता च तदानन्दकरश्च ह।
शत्रुघ्नः कार्तवीर्यश्च दत्तात्रेयस्तथैव च॥
अलर्कस्य हितश्चैव कार्तवीर्यनिकृन्तनः।
कालनेमिर्महानेमिर्मेघो मेघपतिस्तथा॥
अन्नप्रदोऽन्नरूपी च ह्यन्नादोऽन्नप्रवर्तकः।
धूमकृद्धूमरूपश्च देवकीपुत्र उत्तमः॥
देवक्यानन्दनों नन्दो रोहिण्याः प्रिय एव च।
वसुदेवप्रियश्चैव वसुदेवसुतस्तथा॥
दुन्दुभिर्हासरूपश्च पुष्पहासस्तथैव च।
अट्टहासप्रियश्चैव सर्वाध्यक्षः क्षरोऽक्षरः॥
अच्युतश्चैव सत्येशः सत्यायाश्च प्रियो वरः।
रुक्मिण्याश्च पतिश्चैव रुक्मिण्या वल्लभस्तथा॥
गोपीनां वल्लभश्चैव पुण्यश्लोकश्च विश्रुतः।
वृषाकपियर्मो गुह्यो मकुलश्च<sup>१</sup> बुधस्तथा॥
राहुः केतुर्ग्रहो ग्राहो गजेन्द्रमुखमेलकः<sup>२</sup>।
ग्राहस्य विनिहन्ता च ग्रामणी रक्षकस्तथा॥
किन्नरश्चैव सिद्धश्च छन्दः स्वच्छन्द एव च।
विश्वरूपो विशालाक्षो दैत्यसूदन एव च॥
अनन्तरूपो भूतस्थो देवदानवसंस्थितः।
सुषुप्तिस्थः सुषुप्तिश्च स्थानं स्थानान्त एव च॥
जगत्स्थश्चैव जागर्ता स्थानं जागरितं तथा।
स्वप्नस्थः स्वप्नवित् स्वप्नस्थानं स्वप्नस्तथैव च॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तैश्च विहीनो वै चतुर्थकः।
विज्ञानं वेद्यरूपं च जीवो जीवयिता तथा॥
भुवनाधिपतिश्चैव भुवनानां नियामकः।
पातालवासी पातालं सर्वज्वरविनाशनः॥
परमानन्दरूपी च धर्माणां च प्रवर्तकः।
सुलभो दुर्लभश्चैव प्राणायामपरस्तथा॥
प्रत्याहारो धारकश्च प्रत्याहारकरस्तथा।
प्रभा कान्तिस्तथा हार्चिः शुद्धः स्फटिकसंनिभः॥
१-मङ्गलश्च बुध इति पा०। २-गजेन्द्रमुपखेल०।
| काण्ड ] | भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण | ३९ |
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अग्राह्यश्चैव गौरश्च सर्वः शुचिरभीष्टुतः।
वषट्कारो वषड् वौषट् स्वधा स्वाहा रतिस्तथा॥
पक्ता नन्दयिता भोक्ता बोद्धा भावयिता तथा।
ज्ञानात्मा चैव देहात्मा भू (उ) मा सर्वेश्वरेश्वरः॥
नदी नन्दी च नन्दीशो भारतस्तरुनाशनः।
चक्रपः श्रीपतिश्चैव नृपाणां चक्रवर्तिनाम्॥
ईशश्च सर्वदेवानां द्वारकासंस्थितस्तथा।
पुष्करः पुष्कराध्यक्षः पुष्करद्वीप एव च॥
भरतो जनको जन्यः सर्वाकारविवर्जितः।
निराकारो निर्निमित्तो निरांतंको निराश्रयः॥
इति नामसहस्रं ते वृषभध्वज कीर्तितम्।
देवस्य विष्णोरीशस्य सर्वपापविनाशनम्॥
पठन् द्विजश्च विष्णुत्वं क्षत्रियो जयमाप्नुयात्।
वैश्यो धनं सुखं शूद्रो विष्णुभक्तिसमन्वितः॥
हे वृषभध्वज! मैंने सर्वपापविनाशक, जगदीश्वर, देवाधिदेव विष्णुके इस सहस्रनामका जो कीर्तन किया है, इसका पाठ करनेसे ब्राह्मण विष्णुत्व अर्थात् विष्णुस्वरूप, क्षत्रिय विजय, वैश्य धन तथा सुख और शूद्र विष्णुकी भक्ति प्राप्त करता है।
(अध्याय १५)
भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण
रुद्रने कहा— हे शंख-चक्र और गदाको धारण करनेवाले भगवान् हरि! आप पुनः देवदेवेश्वर शुद्धरूप परमात्मा विष्णुके ध्यानका वर्णन करें।
हरिने कहा— हे रुद्र! संसाररूपी वृक्षका विनाश करनेवाले वे हरि ज्ञानरूप, अनन्त, सर्वव्यास, अजन्मा और अव्यय हैं। वे अविनाशी, सर्वत्रगामी, नित्य, महान्, अद्वितीय ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण संसारके मूल कारण तथा समस्त चराचरमें गतिमान् परमेश्वर हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले तथा सभीके ईश्वर हैं, सम्पूर्ण जगत्का आधार होते हुए भी वे स्वयं निराधार हैं। सभी कारणोंके कारण हैं।
सांसारिक विषयोंकी आसक्तिसे परे उनकी स्थिति है, वे निर्मुक्त हैं। मुक्त योगियोंके ध्येय हैं। वे स्थूल शरीरसे रहित नेत्र, पाणि, पाद, पायु, उपस्थादि समस्त इन्द्रियोंसे विहीन हैं। वे हरि मन एवं मनके धर्म सङ्कल्प-विकल्प आदिसे रहित हैं। वे बुद्धि (भौतिक इन्द्रियविशेष)-से रहित, बुद्धि-धर्म-विवर्जित, अहंकारसे शून्य, चित्तसे अग्राह्य, प्राण-अपान-व्यानादि वायुसे रहित हैं।
हरिने कहा— अब मैं सूर्यकी पूजाका पुनः वर्णन करता हूँ, जो प्राचीन कालमें भृगु ऋषिको सुनायी गयी थी।
'ॐ खखोल्काय नमः'— यह भगवान् सूर्यदेवका मूल मन्त्र है, जो साधकको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। (निम्न मन्त्रसे अङ्गन्यास करके साधकको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये।) यथा—
'ॐ खखोल्काय त्रिदशाय नमः।' 'ॐ विचि ठठ शिरसे नमः।' 'ॐ ज्ञानिने ठठ शिखायै नमः।' 'ॐ सहस्ररश्मये ठठ कवचाय नमः।' 'ॐ सर्वतेजोऽधिपतये ठठ अस्त्राय नमः।' 'ॐ ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ठठ नमः।'
सूर्यका यह मन्त्र साधकके समस्त पापोंका विनाश करनेवाला है। इसे अग्नि-प्राकार मन्त्र भी कहते हैं।
भगवान् सूर्यको प्रसन्न करनेवाला मन्त्र इस प्रकार है, यह सूर्य-गायत्री-मन्त्र कहलाता है—इस मन्त्र-जपके पश्चात् साधकको सूर्य एवं गायत्रीका सकलीकरण करना चाहिये—
| ४० | संक्षिप्त गरुड़पुराण | [ आचार- |
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‘ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।’
साधकको प्रत्येक दिशा-प्रदिशामें निम्नलिखित दिक्पाल देवोंके लिये प्रणाम निवेदन करना चाहिये—
‘ॐ धर्मात्मने नमः’ पूर्वमें, ‘ॐ यमाय नमः’ दक्षिणमें, ‘ॐ दण्डनायकाय नमः’ पश्चिममें, ‘ॐ दैवताय नमः’ उत्तरमें, ‘ॐ श्यामपिंगलाय नमः’ ईशानमें, ‘ॐ दीक्षिताय नमः’ अग्निकोणमें, ‘ॐ वज्रपाणये नमः’ नैर्ऋत्यकोणमें, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः नमः’ वायुकोणमें।
हे वृषध्वज! साधकको चाहिये कि वह निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे पूर्वादि दिशाओंसे प्रारम्भ करके ईशानकोणतक चन्द्रादि ग्रहोंकी भी पूजा करे—
‘ॐ चन्द्राय नक्षत्राधिपतये नमः।’ ‘ॐ अङ्गारकाय क्षितिसुताय नमः।’ ‘ॐ बुधाय सोमसुताय नमः।’ ‘ॐ वागीश्वराय सर्वविद्याधिपतये नमः।’ ‘ॐ शुक्राय महर्षये भृगुसुताय नमः।’ ‘ॐ शनैश्चराय सूर्यात्मजाय नमः।’ ‘ॐ राहवे नमः।’ ‘ॐ केतवे नमः।’
निम्न तीन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको प्रणाम करके उन देवको अर्घ्यादि प्रदान करनेके लिये आवाहित करना चाहिये—
‘ॐ अनूरुकाय नमः।’ ‘ॐ प्रमथनाथाय नमः।’ ‘ॐ बुधाय नमः।’
‘ॐ भगवन्नपरिमितमयूखमालिन् सकलजगत्पते सप्ताश्ववाहन चतुर्भुज परमसिद्धिप्रद विस्फुलिङ्गपिङ्गल तत् एहोहि इदमर्घ्यं मम शिरसि गतं गृह् गृह् तेजोग्ररूपम् अनग्र ज्वल ज्वल ठठ नमः।’
उपर्युक्त मन्त्रसे आवाहित इन अभीष्ट देवका निम्न मन्त्रसे विसर्जन करे—
‘ॐ नमो भगवते आदित्याय सहस्रकिरणाय गच्छ सुखं पुनरागमनाय।’
हे सहस्ररश्मि भगवान् आदित्य! आपके लिये मेरा प्रणाम है। हे कृपालु! आप पुनः आगमनके लिये सुखपूर्वक पधारें।
हरिने कहा—हे रुद्र! मैं पुनः सूर्य-पूजाकी विधिका वर्णन करूँगा, जिसे मैंने पहले कुबेरसे कहा था।
[सूर्यपूजा प्रारम्भ करनेसे पूर्व] एकाग्रचित्त होकर पवित्र स्थानपर कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल बनाये। तदनन्तर सूर्यदेवका आवाहन करे। तत्पश्चात् भूमिपर निर्मित कमलदलके मध्यमें यन्त्ररूपी खखोल्क भगवान् सूर्यकी उनके परिकरोंके साथ स्थापना करे तथा उन्हें स्नान कराये।
हे शिव! इसके बाद साधक अग्निकोणमें (अभीष्ट) देवके हृदयकी स्थापना करे। ईशानकोणमें सिरकी स्थापना करके नैर्ऋत्यकोणमें शिखाका विन्यास करे। वह पुनः एकाग्रचित्त होकर पूर्व दिशामें उनके धर्म, वायुकोणमें उनके नेत्र और पश्चिम दिशामें उनके अस्त्रका विन्यास करे।
इसी प्रकार अष्टदलकमलके ईशानकोणमें चन्द्र, पूर्व दिशामें मंगल, अग्निकोणमें बुध, दक्षिण दिशामें बृहस्पति, नैर्ऋत्यकोणमें शुक्र, पश्चिम दिशामें शनि, वायुकोणमें केतु एवं उत्तर दिशामें राहुके पूजनका विधान है। अतः (साधकको इन सभी ग्रहोंकी पूजा करके) द्वितीय कक्षामें साथ ही द्वादश सूर्योंकी पूजा भी करनी चाहिये।
भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और विष्णु—ये द्वादश सूर्य कहे गये हैं।
द्वादश सूर्योंकी पूजा करनेके बाद पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि देवोंकी अर्चना करे तथा जया-विजया-जयन्ती एवं अपराजिता शक्तियोंकी और शेष, वासुकि आदि नागोंकी पूजा करे।
(अध्याय १६-१७)
१७- भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि
| काण्ड ] | मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा | ४१ |
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मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा
सूतजीने कहा— अब मैं मृत्युञ्जय-पूजाका वर्णन करूँगा, जिसको गरुडने कश्यप ऋषिसे कहा था। वह साधकका उद्धार करनेवाली, पुण्यप्रदायिनी एवं सर्वदेवमय पूजा है, ऐसा सभीका अभिमत है।
सूतजीने कहा— मृत्युञ्जय-मन्त्र ‘ॐ जुं सः’ तीन अक्षरोंवाला है। पहले ॐकारका उच्चारण करके जुं (हुं)-का उच्चारण करे। तदनन्तर विसर्गके साथ ‘स’ (सः)-का उच्चारण करना चाहिये। यह मन्त्र मृत्यु और दरिद्रताका मर्दन करनेवाला है तथा शिव, विष्णु, सूर्य, आदि सभी देवोंका कारणभूत है। ‘ॐ जुं सः’ यह महामन्त्र अमृतेशके नामसे कहा जाता है। इस मन्त्रका जप करनेसे प्राणी सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है और मृत्युरहित हो जाता है अर्थात् मृत्युके समान होनेवाले उसके कष्ट दूर हो जाते हैं।
इस मन्त्रका सौ बार जप करनेसे वेदाध्ययनजनित पुण्यफल तथा यज्ञकृत फल एवं तीर्थ-स्नान-दान-पुण्यादिका फल प्राप्त होता है। तीनों संध्याओंमें एक सौ आठ बार इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य मृत्युको जीत लेता है। कठिन-से-कठिन विघ्न-बाधाओंको पार कर जाता है, शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है।
भगवान् मृत्युञ्जय श्वेत कमलके ऊपर बैठे हुए वरद-हस्त तथा अभय-मुद्रा धारण किये रहते हैं। तात्पर्य यह कि उनके एक हाथमें अभय-मुद्रा है और एक हाथमें वरद-मुद्रा। दो हाथोंमें अमृत-कलश है। इस रूपमें अमृतेश्वरका ध्यान करनेके साथ ही अमृतेश्वरभगवान्के वामाङ्गमें रहनेवाली अमृतभाषिणी अमृतादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। देवीके दायें हाथमें कलश और बायें हाथमें कमल सुशोभित रहता है।
हे शिव! यदि एक मासतक अमृतादेवीके साथ अमृतेश्वरभगवान्का ध्यान करते हुए मानव ‘ॐ जुं सः’ इस मन्त्रका तीनों सन्ध्याओंमें आठ हजार जप करे तो वह जरा, मृत्यु तथा महाव्याधियोंसे मुक्त हो जाता है और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है। यह मन्त्र महान् शान्ति प्रदान करनेवाला है।
अमृतेश्वरभगवान्की पूजामें आवाहन, स्थापन, रोधन (प्रतिष्ठा), संनिधान, निवेशन करनेके बाद पाद्य, आचमन, स्नान, अर्घ्य, माला, अनुलेपन, दीप, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य, पान, आचमन, वीजन (पंखेसे हवन करना), मुद्रा-प्रदर्शन, मन्त्र-जप, ध्यान, दक्षिणा, आहुति, स्तुति, वाद्य और गीत तथा नृत्य, न्यासयोग और प्रदक्षिणा, साष्टाङ्ग प्रणति, मन्त्रशय्या, वन्दन आदि उपचारोंको निवेदित करके उनका विसर्जन करना चाहिये।
षडङ्ग प्रकारका पूजन जिसे परमेश परमात्माने अपने मुखसे स्वयं कहा है, वह क्रमसे बतलाया गया है, उसे जो जानता है वही पूजक है। षडङ्ग-पूजा इस प्रकार है—
साधकको प्रारम्भमें अर्घ्य प्रदान करनेके लिये प्रयुक्त पात्रकी पूजा करके अस्त्र अर्थात् फट् मन्त्रसे हस्तताडन (दाहिने हाथके द्वारा बायें हाथपर ध्वनि) करना चाहिये। उसके बाद कवच (हुं) मन्त्रसे शोधनकर अमृतकरणकी क्रियाको पूर्ण करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति आदिकी पूजा, प्राणायाम, आसनोपवेशन तथा देहशुद्धि करके भगवान् अमृतेशका ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर अपनी आत्माको देवस्वरूपमें स्वीकारकर अङ्गन्यास, करन्यास करके साधक हृदयकमलमें स्थित ज्योतिर्मय आत्मदेवका पूजन करे।
उसके बाद मूर्तिपर अथवा यज्ञके लिये बनी
१८- सर्पों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र
| ४२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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हुई वेदीपर चित्रित देवके ऊपर सुन्दर पुष्प अर्पित करे। द्वारपर अवस्थित रहनेवाले देवोंका आवाहन और पूजन करनेके लिये पहले आधारशक्तिकी पूजा करे। तदनन्तर देवताकी प्रतिष्ठा करके उनके (देव) परिवारका पूजन करना चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने बतलाया है कि मुख्य देवके पूजाके साथ उसके अङ्ग-परिवार आदिकी भी पूजा करनेका विधान है। आयुधों एवं परिवारोंके साथ धर्म आदिकी तथा इन्द्र आदिकी, युगों, वेदों और मुहूर्तोंकी भी मुख्य देवके रूपमें पूजा करनी चाहिये। यह पूजा भुक्ति और मुक्ति प्रदान करनेवाली है। अतः साधक विद्वानोंको उनकी षडङ्ग-पूजा करनी चाहिये।
देवमण्डलकी पूजा करनेके पूर्व मातृका, गणदेवता, नन्दी और गङ्गाकी पूजा करके देवस्थानके देहली-भागपर महाकाल तथा यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। इस पूजामें ‘ॐ अमृतेश्वर भैरवाय नमः।’ तथा ‘ॐ जुं हंसः सूर्याय नमः’ कहना चाहिये। इसी प्रकार प्रारम्भमें प्रणव मन्त्र ॐकारको जोड़कर नामोच्चार करते हुए अन्तमें ‘नमः’ शब्दका प्रयोग करके शिव, कृष्ण, ब्रह्मा, गण, चण्डिका, सरस्वती और महालक्ष्मी आदिकी पूजा करनी चाहिये।
(अध्याय १८)
सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र
( प्राणेश्वरी विद्या )
श्रीसूतजी बोले—हे ऋषियो! अब मैं शिवद्वारा पक्षिराज गरुडको सुनाये गये प्राणेश्वर महामन्त्रका वर्णन करता हूँ, किंतु उसके पूर्व उन स्थानोंका वर्णन करूँगा, जहाँ सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं रह सकता।
श्मशान, वल्मीक (बाँबी), पर्वत, कुआँ और वृक्षके कोटर—इन स्थानोंमें स्थित सर्पके द्वारा काट लेनेपर यदि उस दाँत-लगे स्थानपर तीन प्रच्छन्न रेखाएँ बन जाती हैं तो वह प्राणी जीवित नहीं रहता है। षष्ठी तिथिमें, कर्क और मेष राशिमें आनेवाले नक्षत्रों तथा मूल, अश्लेषा, मघा आदि क्रूर नक्षत्रोंमें सर्पदंश होनेसे प्राणीका जीवन समाप्त हो जाता है तथा काँख, कटि, गला, सन्धि-स्थान, मस्तक या कनपटीके अस्थिभाग और उदरादिमें काटनेपर प्राणी जीवित नहीं रहता है।
यदि सर्पदंशके समय दण्डी, शस्त्रधारी, भिक्षु तथा नग्न प्राणीका दर्शन होता है तो उसे कालका ही दूत समझना चाहिये। हाथ, मुख, गर्दन और पीठमें सर्पके काटनेसे प्राणी जीवित नहीं बचता है।
दिनके प्रथम भागके पूर्व अर्ध यामका भोग सूर्य करता है। उस दिवाकर-भोगके पश्चात् गणनाक्रममें जो ग्रह आते हैं, उन ग्रहोंके द्वारा यथाक्रम शेष यामोंका भोग होता है। इस कालगतिमें प्रत्येक दिन छः परिवर्तनोंके साथ अन्य शेष ग्रहोंका भोग माना गया है। यथा—ज्योतिषियोंने काल-चक्रके आधारपर रात्रिकालमें शेषनाग ‘सूर्य’, वासुकि नाग ‘चन्द्र’, तक्षक नाग ‘मङ्गल’, कर्कोटक नाग ‘बुध’, पद्म नाग ‘गुरु’, महापद्म नाग ‘शुक्र’, शंख नाग ‘शनि’ और कुलिक नाग ‘राहु’ को स्वीकार किया।
रात या दिनमें बृहस्पतिका भोगकाल आनेपर सर्प, देवोंका भी अन्त करनेवाला हो जाता है। अतः इस कालमें सर्पद्वारा काटा गया प्राणी बच नहीं सकता है। दिनमें शनि-ग्रहकी वेलाके आनेपर राहु अशुभ धर्मसे संयुक्त रहता है। अतः वह अपने यामार्थ भोग और सन्धिकालकी अवस्थामें काल
१९- श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजन-विधि
काण्ड ] सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र ४३
अर्थात् यमराजकी गतिके समान गतिमान् रहता है।
रात्रि और दिनका मान लगभग तीस-तीस घटिका होता है। इस मानके अनुसार निर्मित कालचक्रमें चन्द्रमा प्रतिपदा तिथिको पादाङ्गुष्ठ, द्वितीयाको पैरसे ऊपर, तृतीयाको गुल्फ, चतुर्थीको जानु, पञ्चमीको लिङ्ग, षष्ठीको नाभि, सप्तमीको हृदय, अष्टमीको स्तन, नवमीको कण्ठ, दशमीको नासिका, एकादशीको नेत्र, द्वादशीको कान, त्रयोदशीको भौंह, चतुर्दशीको शंख अर्थात् कनपटी तथा पूर्णिमा एवं अमावस्याको मस्तकपर निवास करता है। पुरुषके दक्षिणाङ्गमें तथा स्त्रीके वामभागमें चन्द्रकी स्थिति होती है। चन्द्रकी स्थिति जिस अङ्गमें होती है, उस अङ्गमें सर्पके डसनेपर प्राणी जीवित बच सकता है। यद्यपि सर्पदंशसे शरीरमें उत्पन्न हुई मूर्च्छा शीघ्र समाप्त होनेवाली नहीं है, फिर भी शरीर-मर्दनसे वह दूर हो सकती है।
स्फटिकके समान निर्मल 'ॐ हंसः' नामक बीजमन्त्र, साधकका परम मन्त्र है। विषरूपी पापको नष्ट करनेमें समर्थ इस बीज-मन्त्रका प्रयोग सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीपर करना चाहिये। इसके चार प्रकार हैं। प्रथम मात्रा बीज बिन्दुसे युक्त है। दूसरा पाँच स्वरोंसे संयुक्त है। तीसरा छः स्वरोंवाला और चौथा विसर्गयुक्त है। प्राचीन समयमें पक्षिराज गरुडने तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये 'ॐ कुरु कुले स्वाहा' इस महामन्त्रको आत्मसात् किया था। अतः सर्प एवं सर्पिणियोंके विषको शान्त करनेके लिये इच्छुक व्यक्तिको मुखमें 'ॐ', कण्ठमें 'कुरु', दोनों गुल्फोंमें 'कुले' तथा दोनों पैरोंमें 'स्वाहा' मन्त्रका न्यास करना चाहिये। जिस घरमें उपर्युक्त मन्त्र भली प्रकारसे लिखा रहता है, सर्प उस घरको छोड़कर चले जाते हैं। जो मनुष्य एक हजार बार इस मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित सूत्रको कानपर धारण करता है, उसको सर्प-भय नहीं रहता। जिस घरमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित शर्कराखण्ड फेंक दिये जाते हैं, उस घरको भी सर्प छोड़ देते हैं। देवताओं और असुरोंने इस मन्त्रका सात लाख जप करके सिद्धि प्राप्त की थी।
इसी प्रकार एक अष्टदल पद्मका रेखाङ्कनकर उसके प्रत्येक दलपर इस—'ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा'—मन्त्रके दो-दो वर्ण लिखे तथा 'ॐ पक्षि स्वाहा'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा स्नान करानेसे विषविह्वल प्राणीका विष दूर हो जाता है।
'ॐ पक्षि स्वाहा' इस मन्त्रके द्वारा अङ्गुष्ठ-भागसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त करन्यास तथा मुख-हृदय-लिङ्ग और पैरोंमें अङ्गन्यास करे तो विषधर नाग ऐसे मनुष्यकी छायाको स्वप्नमें भी लाँघ नहीं सकता। जो मनुष्य इस मन्त्रका एक लाख जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेता है, वह अपनी दृष्टिमात्रसे व्यथित व्यक्तिके शरीरमें व्याप्त विषको नष्ट कर देता है।
'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं भि (भी)रुण्डायै स्वाहा'—इस मन्त्रका जप सर्पदंशित व्यक्तिके कानमें करनेपर विषका प्रभाव क्षीण हो जाता है।
यदि दोनों पैरके अग्रभागमें 'अ आ', गुल्फमें 'इ ई' जानुमें 'उ ऊ', कटिमें 'ए ऐ', नाभिमें 'ओ', हृदयमें 'औ', मुखमें 'अं' तथा मस्तकमें 'अः' वर्णका स्थापनकर 'ॐ हंसः' बीजमन्त्रके सहित न्यास करके साधक इस बीजमन्त्रका ध्यान-पूजन और जप करे तो वह सर्प-विषको दूर कर सकता है।
'मैं (स्वयं) गरुड हूँ' यह ध्यान (भावना) करके साधकको विष-शमनका कार्य करना चाहिये। 'हं' बीजमन्त्रका शरीरमें विन्यास विषादिका हरण करनेवाला कहा गया है। वाम हाथमें 'हंसः' मन्त्रका न्यास करके जो साधक इस मन्त्रका
| ४४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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ध्यान-पूजन और जप करता है, वह सर्प-विषको दूर करनेमें समर्थ होता है; क्योंकि यह मन्त्र विषधर नागोंके नासिकाभाग और मुँहकी श्वास-नलिकाको भी रोकनेमें पूर्ण समर्थ है। यह मन्त्र शरीरकी त्वचा-मांस आदिमें व्यास सर्प-विषको भी विनष्ट कर देता है।
सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीके शरीरमें 'ॐ हंसः' मन्त्रका न्यास करके भगवान् नीलकण्ठ आदि देवोंका भी ध्यान करना चाहिये। ऐसा करनेसे यह मन्त्र अपनी वायु शक्तिके द्वारा उस सम्पूर्ण विषका हरण कर लेता है।
प्रत्यङ्गिराकी जड़को चावलके जलके साथ पीसकर पीनेसे विषका प्रभाव दूर हो जाता है। पुनर्नवा, प्रियंगु, वक्त्रज (ब्राह्मी), श्वेत, बृहती, कूष्माण्ड, अपराजिताकी जड़, गेरू तथा कमलगट्टेके फलको जलमें पीसकर घृतके साथ लेप तैयार करना चाहिये, इस प्रकार बना हुआ लेप भी शरीरमें लगानेसे विषको शान्त कर देता है। सर्पके काटनेपर जो मनुष्य उष्ण (गरम) घृतका पान कर लेता है, उसके शरीरमें विषका अधिक प्रभाव नहीं बढ़ता। सर्पदंश होनेपर शिरीष नामक वृक्षके पञ्चाङ्ग (पत्र, पुष्प, फल, मूल एवं छाल)-के सहित गाजरके बीजोंको पीसकर सर्वाङ्गमें लेप करनेसे अथवा पीनेसे भी विषका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
'ॐ ह्रीं' बीजमन्त्र, गोनस (गोहअन) आदि विषैले सर्पोंके विषको दूर करनेमें समर्थ है। इस मन्त्रके साथ 'अः'-का प्रयोगकर अर्थात् 'ॐ ह्रीं अः' का उच्चारण करते हुए हृदय, ललाट आदिमें विन्यास करके उसका ध्यान करनेमात्रसे ही सर्पादिका वशीकरण हो जाता है। इसका पंद्रह हजार जप करके साधक गरुडके समान सर्वगामी, कवि—विद्वान्, वेदविद् हो जाता है तथा दीर्घ आयुको प्राप्त करता है।
**सूतजीने पुनः कहा—**ऋषियो! अब मैं आप सभीको शिवके द्वारा कथित अत्यन्त गोपनीय मन्त्रोंको बताऊँगा; जिनसे अभिमन्त्रित पाश, धनुष, चक्र, मुद्गर, शूल और पट्टिश नामक आयुधोंको धारण करके राजा शत्रुओंपर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
मन्त्रोद्धारके लिये कमल-पत्रपर अष्टवर्ग बनाकर पूर्व (दिशा)-से शुरू करके क्रमशः ईशान-कोणतक बीजमन्त्र (ॐ ह्रीं ह्रीं)-को लिखना चाहिये। **'ॐ'**कार ब्रह्मबीज है, **'ह्रीं'**कार विष्णुबीज है और 'ह्रीं' कार शिवबीज है। त्रिशूलके तीनों शीर्षपर 'ह्रीं' लिखकर क्रमानुसार न्यास करे। मन्त्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं' है।
साधक हाथमें शूल ग्रहण करे। तत्पश्चात् उसको आकाशमें घुमाये, जिसे देखते ही दुष्ट ग्रह और सर्प नष्ट हो जाते हैं। साधक धूम्रवर्णके धनुषको हाथमें लेकर आकाशकी ओर भुजा उठाकर इस मन्त्रका चिन्तन करे। ऐसा करनेसे दुष्ट विषैले सर्प, कुत्सित ग्रह, विनाशकारी मेघ और राक्षस नष्ट होते हैं। यह मन्त्र तो त्रिलोककी रक्षा करनेमें समर्थ है, मृत्युलोकके विषयमें कहना ही क्या है?
'ॐ जूं सूं हूं फट्' यह दूसरा मन्त्र है। साधक खैरकी आठ लकड़ियोंको इसी मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर उन्हें आठ दिशाओंमें गाड़ दे तो उस कीलाङ्कित क्षेत्रमें वज्रपात (विद्युत्-निपात) तथा इसकी गर्जनाका उपद्रव नहीं होता। गरुडद्वारा कहे गये इस मन्त्रसे आठ कीलोंको इक्कीस बार अभिमन्त्रितकर रात्रिके समय अपने अभीष्ट क्षेत्रकी चारों दिशाओं और विदिशाओंमें गाड़ देना चाहिये। इससे भी वहाँ विद्युत्-निपात, वज्रपतन तथा चूहा, टिड्डी आदिसे होनेवाले उपद्रवोंका भय नहीं रहता।
काण्ड ] पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि ४५
'ॐ हां सदाशिवाय नमः' ऐसा कहकर साधक तर्जनी अंगुलिके द्वारा अनार-पुष्पके सदृश कान्तिमान् एक पिण्डका निर्माण करे। उस पिण्डके प्रदर्शनमात्रसे ही दुष्ट जन, मेघ, विद्युत्, विष, राक्षस, भूत और डाकिनी आदि दसों दिशाओंको छोड़कर भाग जाते हैं।
'ॐ ह्रीं गणेशाय नमः।' 'ॐ ह्रीं स्तम्भनादिचक्राय नमः।' 'ॐ ऐं ब्राह्म्यै त्रैलोक्यडामराय नमः।'- इस मन्त्र-संग्रहको भैरव-पिण्ड कहा जाता है। यह भैरव-पिण्ड विष तथा पापग्रहोंके कुप्रभावको समाप्त करनेमें समर्थ है। यह साधकके कार्यक्षेत्रकी रक्षा और भूत-राक्षसादिकी उपद्रवी शक्तियोंको नष्ट करता है।
'ॐ नमः' यह कहकर साधक अपने हाथमें इन्द्रवज्रका ध्यान करे। इस वज्रमुद्रासे विष, शत्रु और भूतगण विनष्ट हो जाते हैं। 'ॐ क्षुं (क्ष) नमः' इस मन्त्रसे बायें हाथमें पाशका स्मरण करे, जिससे विष तथा भूतादिका विनाश होता है। इसी प्रकार 'ॐ हां (हो) नमः' इस मन्त्रके उच्चारणसे उपद्रवकारी मेघ और पापग्रहोंके प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। कृतान्त-यमराजका ध्यान करके साधक छेदक अस्त्र (भाले)-से शत्रु-समूहका विनाश करे। 'ॐ क्ष्ण (क्ष्म) नमः' इस मन्त्रोच्चारके साथ कालभैरवका ध्यान करके मनुष्य पापग्रह, भूत, विषके प्रभावका शमन कर सकता है।
'ॐ लसद्दंष्ट्रिजिव्हाक्ष स्वाहा' इस मन्त्रका ध्यान करके मनुष्य खेती-वाड़ीमें विघ्न डालनेवाले ग्रह, भूत, विष और पक्षियोंका निवारण कर सकता है। 'ॐ क्ष्व (क्ष्णं) नमः' इस मन्त्रको रक्त-वर्णकी स्याहीसे नगाड़ेपर लिखकर उसे बजाना चाहिये। उसके शब्दोंको सुनकर पापग्रह आदि सभी उपद्रवकारी तत्त्व भयभीत हो उठते हैं।
(अध्याय १९-२०)
पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि
सूतजीने कहा-हे ऋषियो! अब मैं पञ्चमुख शिवकी पूजाका वर्णन करूँगा, जो साधकको भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। साधकको सबसे पहले निम्न मन्त्रसे उन देवका आवाहन करना चाहिये-
'ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्तये स्वाहा।'
पुनः 'ॐ हां सद्योजाताय नमः।' कहकर साधक सद्योजातका आवाहन करे। इन सद्योजातकी आठ कलाएँ कही गयी हैं। उनका नाम सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति है। सद्योजातकी पूजा करनेके पश्चात् 'ॐ सिद्धयै नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उन सभी आठ कलाओंकी पूजा करनेका विधान है। तदनन्तर 'ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः' इस मन्त्रसे साधक वामदेवकी पूजा करे। वामदेवकी तेरह कलाएँ हैं, जिन्हें रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कान्ति, तृष्णा, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओंके अतिरिक्त मनोन्मनी, अघोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया तथा भयंकरा नामकी आठ कलाएँ (अघोरकी) हैं।
उक्त समस्त कलाओंका पूजन करनेके बाद साधकको 'ॐ हैं तत्पुरुषाय नमः' इस मन्त्रसे तत्पुरुषदेवकी पूजा करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और सम्पूर्णा-ये पाँच कलाएँ हैं। साधक कलाओंकी पूजा करके 'ॐ ह्रौं ईशानाय नमः' इस मन्त्रसे ईशानदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् ईशानदेवकी निश्चला, निरञ्जना, शशिनी, अंगना, मरीचि और ज्वालिनी नामकी जो छः कलाएँ हैं, उनकी पूजा करके पूजन पूर्ण करे।
| ४६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सूतजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं शिवकी अर्चनाका वर्णन करूँगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करनेवाली है। बारह अंगुलके मापमें बिन्दुद्वारा (किसी पात्रमें) भगवान् शिवकी मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, सर्वगत और निराकारका चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुद्वारा बनायी गयी मूर्तिमें ऊपरकी ओर पाँच बिन्दु लगाने चाहिये, जो शिवका मुख है। वह छोटे आकारमें होना चाहिये और नीचेकी ओर मूर्तिके अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े-बड़े अङ्ग बनाने चाहिये। मूर्तिके अधोभागमें छठा बिन्दु विसर्गके साथ होना चाहिये, जो अस्त्र है। इसके साथ 'हौं' लिख देना चाहिये—यह महामन्त्र है और सम्पूर्ण अर्थोंको देनेवाला है। साधक मूर्तिके ऊर्ध्वभागसे लेकर मूर्तिके चरणपर्यन्त अपने दोनों हाथोंसे स्पर्श करे और महामुद्रा दिखाये; इसके बाद सम्पूर्ण अङ्गोंमें न्यास-करन्यास आदि करे।
तदनन्तर वह अस्त्रमन्त्र 'ॐ फट्' का उच्चारण करता हुआ दाहिनी हथेलीसे स्पर्श करके शोधन करे। उसके बाद कनिष्ठा अँगुलीसे लेकर महामन्त्रसे ही तर्जनी अँगुलीतक न्यास करना चाहिये।
अब मैं हृदय-कमलकी कर्णिकामें* पूजनकी विधि बतलाऊँगा। उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादिकी अर्चना करे। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान अर्पित करे तथा अन्य विविध मानस उपचारोंको करके तदाकार हो जाय। उसके बाद अग्निमें आहुति देनेकी विधि कह रहा हूँ। साधकको पूजा-स्थलपर अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये 'ॐ फट्' अस्त्रमन्त्रसे एक कुण्डका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् 'ॐ हूं' इस कवचमन्त्रसे उस कुण्डका अभ्युक्षण करके मानिसकरूपसे उसमें शक्तिका विन्यास करे। उसके बाद साधकको हृदय अथवा शक्तिकुण्डमें क्रमशः ज्ञानरूपी तेज तथा अग्निका विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्निके निष्कृति-संस्कारको छोड़कर गर्भाधानादि समस्त संस्कार करनेका विधान है। निष्कृति या मोक्ष-संस्कार आहुतिके पश्चात् किया जाता है। [इसलिये आहुतिके पूर्व उस संस्कारका निषेध है।] समस्त संस्कारोंके बाद साधकको उस प्रज्वलित अग्निमें समस्त आङ्गिकदेवोंके साथ मानसिकरूपसे शिवको आहुति देनी चाहिये।
तदनन्तर कमलाङ्कित गर्भवाले उस मण्डलमें नीलकण्ठ शिवका पूजन करना चाहिये। इस मण्डलके अग्निकोणमें अर्धचन्द्राकार कल्याणकारी एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये।
तदनन्तर अग्निदेवताके अस्त्रोंसे युक्त हृदयादिमें न्यास करनेका विधान है। उसके बाद मण्डलके अन्तर्गत बने हुए कमलकी कर्णिकापर सदाशिवकी तथा दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करे।
अब श्रेष्ठ पञ्चतत्त्वोंमें स्थित पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंकी दीक्षा बतलायी जाती है। इन दोनों शान्तियोंके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे सौ-सौ आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिये। तत्पश्चात् साधक पूर्णाहुति देकर प्रसन्नतापूर्वक त्रिशूली भगवान् शिवका ध्यान करे।
उसके बाद प्रायश्चित्त-शुद्धिके लिये आठ बार आहुति देनी चाहिये। यह आहुति अस्त्र-बीज 'हुं फट्' मन्त्रसे प्रदान करनेका विधान है। इस प्रकार संस्कारसे शुद्ध हुआ वह साधक निःसंदेह शिव-स्वरूप हो जाता है।
शिवकी विशेष पूजामें साधकको चाहिये कि वह प्रथम—'ॐ हां आत्मतत्त्वाय स्वाहा', 'ॐ हीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा' तथा 'ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा'—ऐसा उच्चारण करके आचमन करे।
* यहाँ बाह्यपूजन तथा मानसपूजन दोनोंका एक साथ वर्णन है।
२०- पञ्चतत्त्वार्चन-विधि
काण्ड ] पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि ४७
तत्पश्चात् उसे मानसिक रूपसे कर्णेन्द्रियोंका स्पर्श करना चाहिये। उसके बाद भस्म-धारण और तर्पण आदि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। ‘ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा’, ‘ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा’ और ‘ॐ हां नमः सर्वमातृभ्यः स्वधा’ इन मन्त्रोंसे तर्पण करे। इसी रीतिसे पिता, पितामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदिका भी तर्पण करे और फिर प्राणायाम करना चाहिये।
इसके बाद आचमन तथा मार्जन करके साधकको शिवके गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। वह मन्त्र इस प्रकार है—
‘ॐ हां तन्महेशाय विद्महे, वाग्वि Greed शुद्धाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।’
अर्थात् प्रणवसे युक्त ‘हां’ बीजशक्तिसे सम्पन्न उन महेश्वरका हम सभी चिन्तन करते हैं। वाणीकी पवित्रताके लिये उनका हम ध्यान करते हैं। वे रुद्र हम सभीको सन्मार्गपर चलनेके लिये प्रेरणा प्रदान करें।
शिव-गायत्रीमन्त्र-जपके पश्चात् सूर्योपस्थान करके सूर्य-मन्त्रोंसे सूर्यरूप शिवकी पूजा करनी चाहिये। उन मन्त्रोंका स्वरूप इस प्रकार है—
‘ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः शिवसूर्याय नमः।’ ‘ॐ हं खखोल्काय सूर्यमूर्तये नमः।’ ‘ॐ हां हीं सः सूर्याय नमः।’
—इस पूजाके बाद क्रमशः नामके आदि और अन्तमें ‘ॐ नमः’ शब्दका प्रयोग करके दण्डी तथा पिङ्गल आदि भूतनायकोंका स्मरण करे। तदनन्तर अग्नि आदि कोणोंमें ‘ॐ विमलायै नमः, ॐ ईशानायै नमः’—आदि मन्त्रोंसे क्रमशः विमला और ईशानादि शक्तियोंकी स्थापना करके पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उपासकको परम सुखकी प्राप्ति होती है। [इन शक्तियोंकी पूजाके लिये पृथक्-पृथक् बीजमन्त्र निर्दिष्ट हैं।] यथा—
‘ॐ रां पद्मायै नमः’ (अग्निकोणमें), ‘रीं दीप्तायै नमः’ (नैर्ऋत्यकोणमें), ‘रूं सूक्ष्मायै नमः’(वायव्यकोणमें), ‘रैं जयायै नमः’ (ईशानकोणमें), ‘रैं भद्रायै नमः’ (पूर्व दिशामें), ‘रों विभूत्यै नमः’ (दक्षिण दिशामें), ‘रौं विमलायै नमः’ (पश्चिम दिशामें), ‘रं अमोधिकायै नमः’, ‘रं विद्युतायै नमः’ (उत्तर दिशामें) और ‘रं सर्वतोमुख्यै नमः’ (मण्डलके मध्यमें)। इसके बाद शिवस्वरूप सूर्यप्रतिमाको सूर्यासिन प्रदान करके ‘हां हूं (हीं) सः’ इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यकी अर्चना करे और फिर निम्न मन्त्रोंसे न्यास करे—
‘ॐ आं हृदयाय नमः’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिरसे स्वाहा’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिखायै वौषट्’, ‘ॐ हूं ज्वालिन्यै नमः’, ‘ॐ हुं कवचाय हुम्’, ‘ॐ हूं अस्त्राय फट्’, ‘ॐ हं फट् राज्ञ्यै नमः’, ‘ॐ हं फट् दीक्षितायै नमः।’
साधकको अङ्गन्यासके पश्चात् निम्न मन्त्रोंसे सूर्यादि सभी नवग्रहोंकी मानसी पूजा करनी चाहिये—
‘ॐ सः सूर्याय नमः, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ मं मंगलाय नमः, ॐ बुं बुधाय नमः, ॐ बृं बृहस्पतये नमः, ॐ भं भार्गवाय नमः, ॐ शं शनैश्चराय नमः, ॐ रं राहवे नमः, ॐ कं केतवे नमः, ॐ तेजश्चण्डाय नमः।’
इस प्रकार सूर्यदेव आदिकी पूजा करके साधकको आचमन करना चाहिये। उसके बाद वह कनिष्ठिका आदि अंगुलियोंमें करन्यास तथा पुनः निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे—
‘ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वौषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हः अस्त्राय फट्।’
तदनन्तर भूतशुद्धि करे तथा पुनः न्यास करे। अर्घ्यस्थापन करके उसी जलसे अपने शरीरका
| ४८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद वह साधक शिवसहित नन्दी आदिकी पूजा करे। 'ॐ हौं शिवाय नमः' मन्त्रसे पद्ममें स्थित शिवकी पूजा करके नन्दी, महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्रीवत्स, वास्तुदेवता, ब्रह्मा, गणपति तथा गुरुकी पूजा करे।
तत्पश्चात् साधकको पद्मके मध्यमें शक्ति एवं अनन्त देवकी पूजा करके पूर्व दिशामें धर्म, दक्षिणमें ज्ञान, पश्चिममें वैराग्य, उत्तरमें ऐश्वर्य, अग्निकोणमें अधर्म, नैर्ऋत्यमें अज्ञान, वायव्यमें अवैराग्य, ईशानमें अनैश्वर्य, पद्मकी कर्णिकामें वामा और ज्येष्ठा उसके बाद पूर्व आदि दिशाओंमें रौद्री, काली, शिवा तथा असिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर साधकको शिवके आगे स्थित पीठके मध्यमें 'ॐ हौं कलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलविकरिण्यै नमः, ॐ हौं बलप्रमथिन्यै नमः, ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः, ॐ मनोन्मन्यै नमः'— इन मन्त्रोंसे कलविकरिणी एवं बलविकरिणी आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। साधक भगवान् शिवके लिये आसन प्रदानकर महामूर्तिकी स्थापना करे। तदनन्तर मूर्तिके मध्यमें शिवको उद्दिष्ट करके आवाहन-स्थापन-सन्निधान-सन्निरोध-सकलीकरण आदि मुद्रा दिखाये और अर्घ्य, पाद्य, आचमन, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन तथा स्थानीय जल समर्पित करे एवं अरणि-मन्थन करके पूज्य देवको वस्त्र, गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्यमें चरु समर्पित करे। नैवेद्यके अनन्तर आचमन दे करके मुखशुद्धिके लिये ताम्बूल, करोद्वर्तन, छत्र, चामर, पवित्रक (यज्ञोपवीत) प्रदानकर परमीकरण (अर्चनीय देवमें सर्वोत्कृष्टताका भाव) करे। तदनन्तर साधक आराध्यके साथ तदाकार होकर उनका जप करे तथा विनम्रभावसे स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करे। इसी हृदयादिन्यास आदिके साथ पूर्ण की गयी पूजाको 'षडङ्गपूजा' यह नाम दिया गया है।
इस प्रकार शिवपूजन पूर्ण करनेके पश्चात् साधकको अग्नि आदि चतुर्दिक् कोणों, मध्यभाग तथा पूर्वादि दिशाओंमें अग्नि आदि दिग्देवताओं तथा इन्द्रादि दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर उसको उन देवोंके मध्य स्थित चण्डेश्वरकी पूजाकर उनके लिये निर्माल्य समर्पित करना चाहिये। उसके बाद वह निम्नाङ्कित स्तुतिसे क्षमापन (क्षमा-याचना) करके उनका विसर्जन करे—
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् त्वयि स्थितिः॥
यत्किञ्चित् क्रियते कर्म सदा सुकृतदुष्कृतम्।
तन्मे शिवपदस्थस्य रुद्र क्षपय शङ्कर॥
शिवो दाता शिवो भोक्ता शिवः सर्वमिदं जगत्।
शिवो जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च॥
यत्कृतं यत् करिष्यामि तत् सर्वं सुकृतं तव।
त्वं त्राता विश्वनेता च नान्यो नाथोऽस्ति मे शिव॥
(२३। २६—२९)
हे प्रभो! आप गुह्य-से-गुह्य तत्त्वोंके संरक्षक हैं। आप मेरे किये हुए जपको स्वीकार करें। हे देव! मुझे सिद्धि प्राप्त हो। आपकी कृपासे आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। हे रुद्र! हे भगवान् शङ्कर! मेरे द्वारा सर्वदा पाप-पुण्यरूप जो कर्म किया जाता है, उसे आप नष्ट करें। मैं आपके इन कल्याणकारी चरणोंमें पड़ा हूँ। हे शिव! आप अपने भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले हैं। आप ही भोक्ता हैं, हे शिव! यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् भी तो आप ही हैं। हे शङ्कर! आपकी विजय हो। सर्वत्र जब शिव ही हैं तो मैं भी वही हूँ। जो कुछ मैंने किया है और जो कुछ भविष्यमें करूँगा, वह सब आपके द्वारा ही किया हुआ है। आप रक्षक हैं। आप विश्वनायक हैं। हे शिव! आपके अतिरिक्त मेरा कोई स्वामी नहीं है।
२१- सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि
काण्ड ] भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि ४९
(हरिने पुनः कहा—हे रुद्र!) इसके बाद मैं शिवपूजाकी दूसरी विधि कह रहा हूँ—
इस विधिके अनुसार गणेश-सरस्वती-नन्दी-महाकाल-गङ्गा-यमुना, अस्त्र तथा वास्तुपतिदेवकी पूजा मण्डलके द्वारपर करनी चाहिये और साधक पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि सभी दिक्पालोंकी पूजा करे। उसके बाद कारणभूत समस्त तत्त्वोंकी पूजा करे।
उन तत्त्वोंमें 'पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश'— ये पञ्चमहाभूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द—ये उनकी पाँच तन्मात्राएँ हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इनके अतिरिक्त मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—ये अन्तःकरणचतुष्टय हैं। इनसे ऊपर 'पुरुष' की स्थिति है। इन्हीं (पुरुष)-को शिव कहा जाता है।
इन तत्त्वोंके साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी पूजा होनी चाहिये। इन समस्त तत्त्वोंमें जो शिव और शक्ति अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिका तत्त्व अनुस्यूत है, उसको जानकर ज्ञानी साधक जीवन्मुक्त होकर शिवरूप हो जाता है। इन तत्त्वोंमें जो शिवतत्त्व है, वही विष्णु है, वही ब्रह्मा है और वही ब्रह्मतत्त्व है।
भगवान् सदाशिवका मङ्गलमय ध्यानस्वरूप इस प्रकार है—वे देव पद्मासनपर विराजमान रहते हैं। उनका वर्ण शुक्ल है। सदैव सोलह वर्षकी आयुमें स्थित रहते हैं। वे पाँच मुखोंवाले हैं। उनके दसों हाथोंमें क्रमशः दक्षिणभागकी ओर अभयमुद्रा, प्रसादमुद्रा, शक्ति, शूल तथा खट्वाङ्ग और वामभागकी ओर सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल तथा श्रेष्ठ बीजपूरक (बिजौरा नीबू) स्थित रहता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया नामक तीन शक्तियाँ उनके तीन नेत्र हैं। ऐसे वे देव सर्वदा कल्याणकी भावनामें अवस्थित रहते हैं, इसीलिये इन्हें सदाशिव कहा गया है।*
ऐसे मूर्तिमान् देवका चिन्तन करनेवाला साधक सदैव कालभयसे रहित रहता है। इस प्रकार शिवोपासना करनेवाले साधककी न तो अकालमृत्यु होती है और न शीत तथा उष्णादि कारणोंसे ही उसकी मृत्यु होती है। (अध्याय २१—२३)
भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि
सूतजीने कहा—अब मैं गणेश आदि देवोंकी तथा त्रिपुरादेवीकी पूजाको कहूँगा, जो अपने भक्तोंको सर्वदा अभीष्ट प्रदान करनेवाली तथा श्रेष्ठ है। साधकको सबसे पहले गणपतिदेवके आसन एवं उनके मूर्तस्वरूपका पूजन करके न्यासपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। साधक 'गां' आदि बीजमन्त्रोंसे निम्न रीतिसे हृदयादिन्यास करे—
ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, ॐ गूं शिखायै वषट्, ॐ गैं कवचाय हुम्, ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ गः अस्त्राय फट्।
इस न्यासके पश्चात् साधकको—'ॐ दुर्गायाः पादुकाभ्यां नमः', 'ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः'—
* बद्धपद्मासनासीनः सितः षोडशवार्षिकः ॥
पञ्चवक्त्रः कराग्रैः स्वैर्दशभिश्चैव धारयन् । अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वरः ॥
दक्षैः करैर्वामकैश्च भुजंगं चाक्षसूत्रकम् । डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुत्तमम् ॥ (२३ । ५४–५६)
२२- भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि
| ५० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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मन्त्रसे माता दुर्गा और गुरुकी पादुकाओंको नमस्कार करके देवी त्रिपुराके आसन और मूर्तिको प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् वह (साधक) 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि'—इस मन्त्रसे हृदयादिन्यास करे और फिर इसी मन्त्रसे 'रुद्रचण्डा, प्रचण्डदुर्गा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका तथा दुर्गा'—इन नौ शक्तियोंका पूजन करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग आदि मुद्राओंका प्रदर्शनकर उसके अग्निकोणमें सदाशिव आदि देवोंकी पूजा करे। अतः साधक पहले 'ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः' कहकर प्रणाम करे। तत्पश्चात् 'ॐ ऐं क्लीं (ह्रीं) सौं त्रिपुरायै नमः' यह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुराशक्तिको नमस्कार करे।
साधक उसके बाद भगवती त्रिपुराके पद्मासन, मूर्ति और हृदयादि अङ्गोंको प्रणाम करे। तत्पश्चात् उस पद्मपीठपर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका—इन आठ देवियोंकी पूजा करे। इन देवियोंकी पूजाके बाद 'भैरव' नामक देवोंकी पूजाका विधान है। असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण तथा संहार नामवाले—ये आठ भैरव हैं।
भैरव-पूजाके पश्चात् रति, प्रीति, कामदेव, पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्नराज, गुरु और क्षेत्रपाल-देवोंका भी पूजन करे।
साधकको पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपीठ बनाकर उसपर और हृदयमें शुक्ल वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक एवं अभयमुद्रासे सुशोभित भगवती सरस्वतीका भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्रका जप और हवन करनेसे भगवती त्रिपुरेश्वरी साधकके लिये सिद्धिदात्री हो जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी पूजाका भी विधान है। विशेष पूजनमें मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिये।
(अध्याय २४—२६)
सर्पों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र
सूतजीने कहा—अब मैं सर्पादि विभिन्न विषैले जीव-जन्तुओंके काटनेसे कष्ट पहुँचानेवाले विषको दूर करनेमें समर्थ मन्त्रको कह रहा हूँ, जो इस प्रकार है—
'ॐ कणिचिकीणिक्ववाणी चर्वाणी भूतहारिणि फणिविषिणि विरथनारायणि उमे दह दह हस्ते चण्डे रौद्रे माहेश्वरि महामुखि ज्वालामुखि शङ्कुकर्णि शुकमुण्डे शत्रुं हन हन सर्वनाशिनि स्वेदय सर्वाङ्गशोणितं तन्निरीक्षसि मनसा देवि सम्मोहय सम्मोहय रुद्रस्य हृदये जाता रुद्रस्य हृदये स्थिता। रुद्रो रौद्रेण रूपेण त्वं देवि रक्ष रक्ष मां हूं मां हूं फफफ ठठ स्कन्दमेखलाबालग्रह-शत्रुविषहारी ॐ शाले माले हर हर विष्ठोङ्काररहिविषवेगे हां हां शवरि हुं शवरि आकौलवेगेशे सर्वे विंचमेघमाले सर्वनागादि-विषहरणम्।'
इस मन्त्रका प्रयोग करते समय माहेश्वरी उमादेवीसे प्रार्थना करे कि हे उमे! तुम रुद्रके हृदयमें उत्पन्न हुई हो और उसीमें रहती हो। तुम्हारा रौद्र रूप है। तुम्हें रौद्री भी कहा जाता है। तुम्हारा मुख ज्वालाके समान जाज्वल्यमान है तथा तुमने अपने कटिप्रदेशमें क्षुद्र घण्टिका लगी करधनी पहन रखी है। तुम भूतोंकी प्रिय हो, सर्पोंके लिये विषरूपिणी हो, तुम्हारा नाम विरथनारायणी है तथा तुम शुकमुण्डा हो और कानोंमें शङ्कु पहनी हुई हो। हे विशाल मुखवाली, भयंकर एवं प्रचण्ड स्वभाववाली चण्डादेवी! हाथोंमें ज्वलन-शक्ति पैदा कर, शत्रु्का हनन कर, हनन कर। सब
काण्ड ] श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५१
प्रकारके विषोंका नाश करनेवाली हे देवि ! मेरे सर्वाङ्गमें फैले हुए विषको प्रभावहीन कर दे । उस विषको तुम देख रही हो । [उस काटनेवाले जन्तुको] सम्मोहित करो, सम्मोहित करो । हे देवि ! तुम मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। इस प्रकार प्रार्थना एवं चिन्तन करके 'हूँ मां हूं फफफ ठः' इसका उच्चारण करे तथा 'स्कन्दकी मेखलारूपी बालग्रहों, शत्रुओं और विषोंका हरण करनेवाली हे शाला-माला ! नाना प्रकारके विषोंके वेगका हरण कर, हरण कर।' ऐसा उच्चारण करे और 'हां हां शवरि हुं' शवरि कहकर वेगपूर्ण गतिशीलोंमें अतिगतिशील सर्वत्र व्यापिनी मेघमालारूपिणी देवि ! मेरे सभी नागादि विषजन्तुओंसे उत्पन्न विषका हरण करो।
[इस प्रकार चिन्तन और प्रार्थना करते हुए रोगीके प्रति स्पर्शादि करते हुए मन्त्रपाठ करे।]
(अध्याय २७)
श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजनविधि
श्रीसूतजीने कहा—हे ऋषियो! मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शार्ङ्गधनुष और शरभकी पूजा करनी चाहिये तथा पूर्व दिशामें भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा करनी चाहिये।
मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कूबरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुतपा तथा विष्णुशक्तिकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके परिवारकी अर्चना करे। मण्डलके मध्यमें शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशात्मक एवं ऐश्वर्यकी पूजा करे। 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'—यह गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्रजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी चाहिये।
साथ ही श्रीगोपालके शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, मुसल, खड्ग, पाश, अङ्कुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकी भी अर्चना करनी चाहिये।
गोपीजनवल्लभके मन्त्र जपनेसे तथा उनका ध्यान करनेसे एवं उनकी (साङ्गोपाङ्ग) पूजा करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है।
त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः।
—ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले हैं।
श्रीसूतजी पुनः बोले— अब मैं श्रीधरभगवान् (विष्णु)-की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ।
| ५२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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साधकको सर्वप्रथम ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः, ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ श्रूं शिखायै वषट्, ॐ श्रैं कवचाय हुम्, ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ श्रः अस्त्राय फट्’—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवान्को शङ्ख, चक्र, गदास्वरूपिणी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आत्मस्वरूप श्रीधर-भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवकी पूजा करनी चाहिये।
सर्वप्रथम शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ श्रीधरासनदेवता आगच्छत’ इस मन्त्रसे आवाहन करके ‘ॐ समस्तपरिवारायाच्युतासनाय नमः’, ‘ॐ धात्रे नमः’, ‘ॐ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ॐ यमुनायै नमः’, ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः’, ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ पृथिव्यै नमः’, ‘ॐ धर्माय नमः’, ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, ‘ॐ अधर्माय नमः’, ‘ॐ अज्ञानाय नमः’, ‘ॐ अवैराग्याय नमः’, ‘ॐ अनैश्वर्याय नमः’, ‘ॐ कन्दाय नमः’, ‘ॐ नालाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’, ‘ॐ प्रह्व्यै नमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘ॐ ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’—इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके (हे रुद्र!) पूर्वोक्त धाता, विधाता, गङ्गा आदि देवोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हरिका आवाहन करके पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ ह्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः आगच्छ।’—इस मन्त्रसे श्रीधरदेवका आवाहन तथा पूजन करना चाहिये।
इस पूजाके पश्चात् ‘ॐ श्रियै नमः’—इस मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये। ‘ॐ श्रां हृदयाय नमः’ ‘ॐ श्रीं शिरसे नमः’, ‘ॐ श्रूं शिखायै नमः’, ‘ॐ श्रैं कवचाय नमः’, ‘ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय नमः’, ‘ॐ श्रः अस्त्राय नमः’, ‘ॐ शङ्खाय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ गदायै नमः’, ‘ॐ श्रीवत्साय नमः’, ‘ॐ कौस्तुभाय नमः’, ‘ॐ वनमालायै नमः’, ‘ॐ पीताम्बराय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ नारदाय नमः’, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’, ‘ॐ सत्त्वाय नमः’, ‘ॐ रजसे नमः’, ‘ॐ तमसे नमः’, ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’—इत्यादि मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देव-परिवारकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर सपरिकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित करके प्रदक्षिणा करे। मूल मन्त्रका जप १०८ बार करे और किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित कर दे।
तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्तभर अपने हृदयदेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान कान्तिमान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभाववाले, प्रसन्नमुख, सौम्य मुद्रावाले, चमचमाते हुए धवल-मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित, सिरपर मुकुटको धारण किये हुए, शुभलक्षणसम्पन्न अङ्गोंवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेवका ध्यान करे।
उसके बाद इन स्तोत्रोंसे भगवान्की स्तुति करनी चाहिये—
२३- गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि
काण्ड ] श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५३
श्रीनिवासाय देवाय नमः श्रीपतये नमः।
श्रीधराय सशार्ङ्ग्याय श्रीप्रदाय नमो नमः॥
श्रीवल्लभाय शान्ताय श्रीमते च नमो नमः।
श्रीपर्वतनिवासाय नमः श्रेयस्कराय च॥
श्रेयसां पतये चैव ह्याश्रयाय नमो नमः।
नमः श्रेयःस्वरूपाय श्रीकराय नमो नमः॥
शरण्याय वरेण्याय नमो भूयो नमो नमः।
स्तोत्रं कृत्वा नमस्कृत्य देवदेवं विसर्जयेत्॥
इति रुद्र समाख्याता पूजा विष्णोर्महात्मनः।
यः करोति महाभक्त्या स याति परमं पदम्॥
(३०। १५-१९)
हे देव! आप लक्ष्मीनिवार और श्रीपति हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप श्रीधर हैं, शार्ङ्गपाणि हैं एवं साधकको लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमस्कार है। आप ही श्रीवल्लभ, शान्तिस्वरूप तथा ऐश्वर्यसम्पन्न देव हैं, आपको मेरा प्रणाम है।
आप श्रीपर्वतपर निवास करनेवाले हैं, समस्त मङ्गलोंके स्वामी, सर्वकल्याणकर्ता तथा सर्वमङ्गलाधार हैं, आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। आप कल्याण और ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा नमन है। आप शरण देनेवाले तथा सर्वश्रेष्ठ हैं, आपको बारम्बार प्रणाम है।
इस प्रकार देवाधिदेव श्रीधर भगवान् विष्णुका स्तवन और नमन करके उनका विसर्जन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक इस पूजाको करनेवाला परमपदको प्राप्त करता है। जो विष्णुपूजाको प्रकाशित करनेवाले इस अध्यायका पाठ करता है, वह इस लोकमें समस्त पापोंसे मुक्त होकर अन्तमें विष्णुके परमपदको प्राप्त करता है।
रुद्रने कहा— हे प्रभो! हे जगत्के स्वामी! पुनः उस प्रकारकी पूजा-विधिको बतानेकी कृपा करें, जिसके द्वारा इस अत्यन्त दुस्तर भवसागरको पार किया जा सकता है।
श्रीहरि बोले— हे वृषभध्वज! मैं विष्णुदेवके पूजन-विधानको कह रहा हूँ। हे महाभाग! उस भोग और मोक्षको देनेवाले कल्याणकारी पूजनके विषयमें सुनें।
हे रुद्र! सर्वप्रथम मनुष्यको स्नान करना चाहिये। तदनन्तर संध्यासे निवृत्त होकर यज्ञमण्डपमें प्रवेश करना चाहिये। हाथ-पैरका प्रक्षालनकर विधिवत् आचमन करके न्यासविधिके अनुसार दोनों हाथोंके द्वारा व्यापक रूपमें मूलमन्त्रका करन्यास करना चाहिये। हे रुद्र! उन विष्णु-देवके मूलमन्त्रको कह रहा हूँ, आप सुनें—
'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीधराय विष्णवे नमः।'
—यह मन्त्र देवाधिदेव परमेश्वर विष्णुका वाचक है। यह समस्त रोगोंको हरण करनेवाला तथा सभी ग्रहोंका शमनकर्ता है। यह सर्वपापविनाशक और भुक्ति-मुक्ति प्रदायक है।
साधकको इन मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास करना चाहिये—
'ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे स्वाहा, ॐ हूं शिखायै वषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हः अस्त्राय फट्।'
आत्मसंयमी साधकको चाहिये कि वह अङ्गन्यास करके आत्ममुद्रा प्रदर्शित करे। तदनन्तर हृदयगुहामें विराजमान शङ्ख-चक्रसे युक्त, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमाके समान शुभ्र कान्तिवाले, श्रीवत्स और कौस्तुभमणिसे समन्वित, वनमाला तथा रत्नहार धारण किये हुए परमेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान करे।
तदनन्तर 'विष्णुमण्डलमें अवस्थित होनेवाले आप सभी देवगणों, पार्षदों तथा शक्तियोंका मैं आवाहन करता हूँ, यहाँपर आप सब पधारें'—ऐसा कहकर—
५४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
'ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ गङ्गायै नमः, ॐ यमुनायै नमः, ॐ शङ्खनिधये नमः, ॐ पद्मनिधये नमः, ॐ चण्डाय नमः, ॐ प्रचण्डाय नमः, ॐ द्वारश्रियै नमः, ॐ आधारशक्त्यै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैराग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ सं सत्त्वाय नमः, ॐ रं रजसे नमः, ॐ तं तमसे नमः, ॐ कं कन्दाय नमः, ॐ नं नालाय नमः, ॐ लां पद्माय नमः, ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ विमलायै नमः, ॐ उत्कर्षिण्यै नमः, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ क्रियायै नमः, ॐ योगायै नमः, ॐ प्रह्व्यै नमः, ॐ सत्यायै नमः, ॐ ईशानायै नमः, ॐ अनुग्रहायै नमः—इन नाममन्त्रोंसे गन्ध-पुष्पादि उपचारोंके द्वारा धाता, विधाता, गङ्गा, यमुना आदि देवताओंका नमस्कारपूर्वक पूजन करना चाहिये।
तदनन्तर हे रुद्र! सृष्टि तथा संहार करनेवाले, सभी पापोंको दूर करनेवाले परमेश्वर भगवान् विष्णुका मण्डलमें आवाहन करके इस विधिसे उनका पूजन करना चाहिये।
जिस प्रकार सर्वप्रथम अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी प्रकार प्रतिमामें भी सर्वप्रथम न्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मुद्राका प्रदर्शनकर अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंको अर्पण करना चाहिये। उसके बाद स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यरूपमें चरु अर्पित करके उन देवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर उनके मन्त्रका जप करके इस जप-पूजनको उन्हें ही समर्पित कर देना चाहिये।
हे वृषभध्वज! उन श्रीधरदेवकी पूजा उनके मूल मन्त्रसे करनी चाहिये। हे त्रिनेत्र! इस समय मैं उन मन्त्रोंको भी कह रहा हूँ, जिनसे न्यास तथा विष्णुके परिवार, दिग्देवता और आयुध आदिकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें आप सुनें—
ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ हीं शिरसे नमः, ॐ हूं शिखायै नमः, ॐ हैं कवचाय नमः, ॐ हौं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ हः अस्त्राय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ शङ्खाय नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ श्रीवत्साय नमः, ॐ कौस्तुभाय नमः, ॐ वनमालायै नमः, ॐ पीताम्बराय नमः, ॐ खड्गाय नमः, ॐ मुसलाय नमः, ॐ पाशाय नमः, ॐ अङ्कुशाय नमः, ॐ शार्ङ्गाय नमः, ॐ शराय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ नारदाय नमः, ॐ पूर्वसिद्धेभ्यो नमः, ॐ भागवतेभ्यो नमः, ॐ गुरुभ्यो नमः, ॐ परमगुरुभ्यो नमः, ॐ इन्द्राय सुराधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ अग्नये तेजोऽधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ यमाय प्रेताधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वरुणाय जलाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वायवे प्राणाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ सोमाय नक्षत्राधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ ईशानाय विद्याधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ अनन्ताय नागाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ ब्रह्मणे लोकाधिपतये सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वज्राय हुं फट् नमः, ॐ शक्त्यै हुं फट् नमः, ॐ दण्डाय हुं फट् नमः, ॐ खड्गाय हुं फट् नमः, ॐ पाशाय हुं फट् नमः, ॐ ध्वजाय हुं फट् नमः, ॐ गदायै हुं फट् नमः, ॐ त्रिशूलाय हुं फट् नमः, ॐ चक्राय हुं फट् नमः, ॐ पद्माय हुं फट् नमः, तथा ॐ वौं विष्वक्सेनाय नमः।
२४- देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि
काण्ड ] पञ्चतत्त्वार्चन-विधि ५५
हे महादेव! इस प्रकार इन मन्त्रोंसे अधिकारी मनुष्योंको चाहिये कि वे विष्णुके विभिन्न अङ्गोंकी पूजा करें, तदनन्तर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिसे उन अविनाशी परमात्म प्रभुका स्तवन करें—
विष्णवे देवदेवाय नमो वै प्रभविष्णवे॥
विष्णवे वासुदेवाय नमः स्थितिकराय च।
ग्रसिष्णवे नमश्चैव नमः प्रलयशायिने॥
देवानां प्रभवे चैव यज्ञानां प्रभवे नमः।
मुनीनां प्रभवे नित्यं यक्षाणां प्रभविष्णवे॥
जिष्णवे सर्वदेवानां सर्वगाय महात्मने।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रवन्द्याय सर्वेशाय नमो नमः॥
सर्वलोकहितार्थाय लोकाध्यक्षाय वै नमः।
सर्वगोप्त्रे सर्वकर्त्रे सर्वदुष्टविनाशिने॥
वरप्रदाय शान्ताय वरेण्याय नमो नमः।
शरण्याय सुरूपाय धर्मकामार्थदायिने॥
(३१।२४–२९)
देवाधिदेव, तेजोमूर्ति भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार है। संसारकी स्थिति (पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके लिये नमन है। प्रलयके समय संसारको अपने मूल कारण प्रकृतिमें लीन करके आत्मसात्कर शयन करनेवाले विष्णुको प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको नमन है। मुनियों तथा यक्षोंके प्रभु और समस्त देवोंपर विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, ब्रह्मा, इन्द्र-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके लिये नमस्कार है।
समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले, लोकाध्यक्ष, सर्वगोसा, सर्वकर्ता तथा समस्त दुष्टोंके विनाशक भगवान् विष्णुके लिये नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म-काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके लिये बार-बार प्रणाम है।
हे शङ्कर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अव्यय, परात्पर भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमें उनका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे उन विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहिये। जो अधिकारी व्यक्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। हे रुद्र! इस प्रकार मैंने आपसे इस रहस्यपूर्ण, परम गुह्य, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णुकी पूजाविधिको कहा है। हे शङ्कर! जो विद्वान् पुरुष इसका पाठ करता है, वह विष्णुभक्त हो जाता है। इसे जो सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय २८–३१)
पञ्चतत्त्वार्चन-विधि
महेश्वरने कहा— हे शङ्ख-चक्र-गदाधर! आप पञ्चतत्त्वोंकी उस पूजा-विधिको मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेमात्रसे ही मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेता है।
श्रीहरिने कहा— हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व-पूजा-विधिको कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टोंकी सिद्धि करनेवाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष-विनाशक पूजन-विधिका आप श्रवण करें।
हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत्-स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य, अचल), शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्जन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी मायाके प्रभावसे पाँच प्रकारसे अवस्थित हैं। वे जगत्का कल्याण करनेवाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु
| ५६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायणस्वरूपसे पाँच रूपों (तत्त्वों)-में स्थित हैं।
हे वृषध्वज ! जनार्दन विष्णुके उक्त पञ्चरूपोंके वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ अं वासुदेवाय नमः, ॐ आं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः, ॐ अः अनिरुद्धाय नमः, ॐ ॐ नारायणाय नमः।
—ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओंके वाचक हैं, जो सभी पातक, महापातकोंके विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगोंको दूर करनेवाले हैं। अब मैं आपसे मङ्गलमय पञ्चतत्त्वार्चन-विधिको कह रहा हूँ। हे शिव ! उसको जिस विधिसे और जिन मन्त्रोंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।
—इन पाँच देवोंकी पूजामें सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर पूजा-गृहमें प्रवेश करके विद्वान् साधकको चाहिये कि वह आचमन करके मनोऽनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और—'अं क्षौं रम्'—इन मन्त्रोंसे शोषणादि क्रिया करे।
वे वासुदेव कृष्ण जगत्के स्वामी, पीतवर्णके कौशेय (रेशमी) वस्त्रोंसे विभूषित, सहस्रों सूर्यकी किरणोंके समान तेजःस्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्णका अपने हृदय-कमलमें ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् संकर्षणका ध्यान करे। उसके बाद यथाक्रम प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा श्रीमन्नारायणके स्वरूपका ध्यान करके उन देवाधिदेवसे प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवोंका ध्यान करके मूल मन्त्रके द्वारा दोनों हाथोंसे व्यापक रूपमें करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यासके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। हे महादेव ! सुव्रत ! उन न्यास एवं पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ आधारशक्त्यै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ वं वासुदेवाय परब्रह्मणे शिवाय तेजोरूपाय व्यापिने सर्वदेवाधिदेवाय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ ह्रियै नमः, ॐ पुष्ट्यै नमः, ॐ गीत्यै नमः, ॐ शक्त्यै नमः, ॐ प्रीत्यै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निर्ऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।'
तत्पश्चात् 'ॐ पद्माय नमः' ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलोंका निर्माण करके उस मण्डलमें इन्हीं मन्त्रोंसे देवोंका पूजन करना चाहिये।
मूल मन्त्रसे पाद्य आदिका निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर ! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उसे प्रभुको समर्पित कर दे।
तदनन्तर भगवान् वासुदेवका स्मरणकर इस स्तोत्रका पाठ करे—
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥
प्रद्युम्नायादिदेवायानिरुद्धाय नमो नमः।
| काण्ड ] | सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि | ५७ |
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नमो नारायणायैव नराणां पतये नमः ॥
नरपूज्याय कीर्त्याय स्तुत्याय वरदाय च ।
अनादिनिधनायैव पुराणाय नमो नमः ॥
सृष्टिसंहारकर्त्रे च ब्रह्मणः पतये नमः ।
नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्रधराय च ॥
कलिकल्मषहर्त्रे च सुरेशाय नमो नमः ।
संसारवृक्षच्छेत्रे च मायाभेत्रे नमो नमः ॥
बहुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।
ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय मोक्षदाय नमो नमः ॥
मोक्षद्वाराय धर्माय निर्वाणाय नमो नमः ।
सर्वकामप्रदायैव परब्रह्मस्वरूपिणे ॥
संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर ।
त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्प्रभो ॥
त्वामेव सर्वगं विष्णुं गतोऽहं शरणं ततः ।
ज्ञानदीपप्रदानेन तमोमुक्तं प्रकाशय ॥
(३२।३०—३८)
'हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आदिदेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्योंसे पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देनेवाले, आदि तथा अन्तसे रहित सनातन प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहार-कर्ता, ब्रह्माके भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नमस्कार है।'
कलिकालके दोषोंको नष्ट करनेवाले, देवोंके ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत्-रूपी मूल वृक्षका छेदन करनेवाले, मायाका भेदन करनेवाले, बहुतसे रूपोंको धारण करनेवाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें अवस्थित रहनेवाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वरको नमस्कार है। मोक्षके द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टोंको प्रदान करनेवाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये बार-बार नमस्कार है। इस गहन संसारसागरमें मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर ! हे जगत्के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे भगवन् ! ज्ञानरूपी दीपकको प्रज्वलितकर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकारको दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।
इस प्रकार समस्त कष्टोंको दूर करनेवाले देवेश भगवान् वासुदेवकी स्तुति करके हे नीललोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठोंसे भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वोंसे युक्त उन भगवान् विष्णुका अपने हृदयमें ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली वासुदेवकी श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजाके करनेमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चनको पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ३२)
सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि
रुद्रने कहा— हे शङ्ख-गदाधर! उस सुदर्शनकी पूजाके विषयमें मुझे बतायें, जिसे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि—सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।
श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज! सुदर्शनचक्रकी पूजा-विधिको मैं कह रहा हूँ, आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करके हरिका पूजन करे। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं शुभ हृदय-कमलमें भगवान्