गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
यदि सत्रे मन से शुद्ध हृदय से मानवजाति को संकटपूर्ण स्थिति से उबार कर विश्व को शांति और कल्याणकारी, मंगलमयता प्रदान करना है, तो भारतीय ऋषि-मुन-महात्माओं द्वारा मोक्ष चार पुरुषार्थों की सनातन संस्कृति को आत्मसात् करना होगा। जिसके आधार पर यह विश्वशांति, मानवता का कल्याण एवं मंगलमय स्वरूप टिका हुआ है, यह शाश्वत सत्य हैं।
भारत में एक बहुत बड़ी क्रान्ति शुरू हुई है कि गुरुकलों का पुनः प्रस्थापन युगानुकूल रूप में हो रहा है।
क्योंकि जहाँ पर सर्वांगीण और समग्र शिक्षा मिलेगी वही पर बच्चा आगे जाएगा।
जब तक समाज शिक्षा का दायित्व अपने हाथ में नहीं लेता, सरकार चाहकर भी परिवर्तन नहीं कर सकती।
स्वाभिमान और समृद्धि की कुंजी है
स्थानीय संसाधन और स्थानीय कौशल - अतुल जैन
(लेखक दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव हैं, लेकिन इस लेख में उनके विचार निजी हैं।)
पूरे विश्व में इस समय हाहाकार मचा हैं, मंदी का एक भंयकर दौर चल रहा हैं, पश्चिम की सभी अर्थव्यवस्थाएँ एक-एक कर इस दल-दल में धंसती चली जा रही है। अपना देश अगर अभी तक इस भयानक परिस्थिति से बचा हुआ है तो सिर्फ इसलिए कि वैश्वीकरण की चकाचौंध के बावजूद उसका एक बहुत बड़ा वर्ग अभी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और इसके अधिष्ठान में है, हमारे किसान, हमारे कारीगर, हमारी परिवार व्यवस्था और परंपराओं में हमारी आस्थआ व उनके प्रति हमारा प्रेम। ये परम्पराएँ सिर्फ सामाजिक स्तर पर ही नहीं, आर्थिक रूप से भी हमें मजबूत बनाए हुए हैं।
शहरों ने, शहरीकरण की प्रवृत्ति ने परंपराओं को तोड़ने की कोशिश जरूर की है, लेकिन हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं ने कम से कम गांवों में तो उन्हें अभी थामे रखा है। इसका हमें गर्व होना चाहिए, परंतु यह भी सच है कि गाँवों से बड़ी तादाद में शहरों की तरफ पलायन हो रहा है, हजारों की संख्या में बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में रोजाना शहरों की ओर कूच करने लगे हैं, इसके लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार है, तो हम स्वयं भी उतने ही जिम्मेदार हैं, समाज ने अपनी आवश्यकताएं, पसंद- नापसंद, इच्छाएं-अनिच्छाएँ, सभी शहरों के समान ढालने शुरू कर दिए, अपने संसाधनों की अनदेखी कर, अपने कौशल को तुच्छ समझ कर हम नौकरी पर आश्रित होने लग गए हैं।
गाँव के लोहार का बेटा अगर स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ अपने दादा और पिता से उनके हुनर के कुछ राज समझता है, उन्हें काम करते हुए देखता है, उन्हें सुनता है और कभी-कभी हाथ बटाता है तो यह कोई तथाकथित बाल-श्रम के कानून में नहीं आता, यह तो वांछित है, होना ही चाहिए, गलीचे बनाने वाले किसी परिवार के बच्चे अगर उस खानदानी पेशे में शुरू से ही दिलचस्पी लेने लगते हैं तो क्या वे वर्तमान, दिशाहीन स्कूली शिक्षा से बेहतर शिक्षा प्राप्त नहीं कर रहें होते?
चरखा स्वयं एक कीमती मशीन है, हाथ कताई ही दरिद्रता को भगाने का और धन के अभाव को असंभव बनाने का एक मात्र सुलभ उपाय है। - गांधी जी
आधुनिक शिक्षा को कड़ी चुनौती
अमेरीका के हॉवर्ड विश्वविद्यालय से लेकर भारत के आई.आई.टी. तक में क्या कोई ऐसी शिक्षा दी जाती है कि छात्र की आँखों पर रूई रखकर पट्टी बांध दी जाए और उसे प्रकाश की किरण भी दिखाई न दे, फिर भी वह सामने रखी हर पुस्तक को पढ़ सकता है! है न चौँकाने वाली बात? पर इसी भारत में किसी हिमालय की कंदरा में नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के महानगर अहमदाबाद में यह चमत्कार आज साक्षात् हो रहा है। तीन हफ्ते पहले मुझे इस चमत्कार को देखने का सुअवसर मिला। मेरे साथ अनेक वरिष्ठ लोग और थे। हम सबको अहमदाबाद के हेमचन्द्रचार्य संस्कृत गुरुकुल में विद्यार्थियों को अद्भुत मेधा शक्तियों का प्रदर्शन देखने के लिए बुलाया गया था। निमंत्रण देने वालों के ऐसे दावे पर यकीन नहीं हो रहा था, पर वे आश्चर्य थे कि अगर एक बार हम अहमदाबाद चले जाएं, तो हमारे सब संदेह स्वतः दूर हो जाएंगे और वही हुआ, छोटे-छोटे बच्चे इस गुरुकुल में आधुनिकता से कोसों दूर पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा पा रहे हैं, पर उनकी मेधा शक्ति किसी भी मंहगे पब्लिक स्कूल के बच्चों की मेधा शक्ति को बहुत पीछे छोड़ चुकी है।
दूसरा नमूना उस बच्चे का है, जिसे आप दुनिया के इतिहास की कोई भी तारीख पूछें, तो वह सवाल खत्म होने से पहले उस तारीख को क्या दिन था, ये बता देता है। इतनी जल्दी तो कोई आधुनिक कम्प्यूटर भी जवाब नहीं दे पाता। तीसरा बच्चा गणित के 50 मुश्किल सवाल मात्र ढाई मिनट में हल कर देता है। यह विश्व रिकॉर्ड है। ये सब बच्चे संस्कृत में वार्ता करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन
करते हैं, देशी गाय का दूध-धी खाते हैं। बाजारू सामानों में बचकर रहते हैं। यथासंभव प्राकृतिक जीवन जीते हैं और घुडसवारी, ज्योतिष, शास्त्रीय संगीत, चित्रकला आदि विषयों का इन्हें अध्ययन कराया जाता है। इस गुरुकुल में मात्र 90 बच्चे हैं पर उनके पढ़ाने के लिए 120 शिक्षक हैं। ये सब शिक्षक वैदिक पद्धति से पढ़ाते हैं। बच्चों की अभिरुचि अनुसार उनका पाठ्यक्रम तय किया जाता है। परीक्षा की कोई निर्धारित पद्धति नहीं है। पढकर निकलने के बाद कोई डिग्री भी नहीं मिलती। यहाँ पढने वाले ज्यादातर बच्चे 15-16 वर्ष से कम आयु के हैं और लगभग सभी बच्चे अत्यंत संपन्न परिवारों के हैं। इसलिए उन्हें नौकरी की चिंता भी नहीं है, घर के लंबे-चौड़े कारोबार संभालने है। वैसे भी डिग्री लेने वालों को नौकरी कहाँ मिल रही है? एक चपरासी की नौकरी के लिए 3.5 लाख पोस्ट ग्रेजुएट लोग आवेदन करते हैं। ये डिग्रियां तो अपना महत्व बहुत पहले खो चुकी है। इसलिए इस गुरुकुल के संस्थापक उत्तमभाई ने यह फैसला किया कि उन्हें योग्य, संस्कारवान, मेधावी व देशभक्त युवा तैयार करने हैं, जो जिस क्षेत्र में जाएं, अपनी योग्यता का लोहा मनवा दें और आज यह हो रहा है। दर्शक इन बच्चों की बहुआयामी प्रतिभाओं को देखकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं।
खुद डिग्रीविहीन उत्तम भाई का कहना है कि उन्होंने सारा ज्ञान स्वाध्याय और अनुभव से अर्जित किया है। उन्हें लगा कि भारत की मौजूदा शिक्षा प्रणाली, जोकि मैकाले की देन है, भारत को गुलाम बनाने के लिए लागू की गई थी। इसीलिए भारत गुलाम बना और आज तक बना हुआ है।
उत्तम भाई और उनके अन्य साथियों के पास देश को सुखी और समृद्ध बनाने के ऐसे ही अनेक कालजयी प्रस्ताव हैं जिन्हें अपने-अपने स्तर पर प्रयोग करने सिद्ध किया जा चुका है, लेकिन उन्हें चिंता है कि आधुनिक मीडिया, लोकतंत्र की नौटंकी, न्यायपालिका का आडंबर और तथाकथित आधुनिक शिक्षा इस विचार को पनपने नहीं देंगे। क्योंकि ये सारे ढांचे औपनिवेशिक भारत को झूठी आजादी देकर गुलाम बनाए रखने के लिए स्थापित किए गए थे, लेकिन वे उत्साहित है यह देखकर कि हम जैसे अनेक लोग, तो उनके गुरुकुल को देखकर आ
रहे हैं, उन सबका विश्वास ऐसे विचारों की तरफ दृढ़ होता जा रहा है। समय की देर है, कभी भी ज्वालामुखी फट सकता है।
शिक्षा को धर्मानुसारी बनाने की आवश्यकता है....
-इन्दुमती कटदरे
सयोंजक, पुनरुत्थान विद्यापीठ, अहमदाबाद
मनुष्य वैसा ही होता है जैसी शिक्षा उसे मिलती है। समाज भी वैसा ही होता है जैसी उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। समाज यदि संकटग्रस्त है, मनुष्य यदि दीन-हीन, दुर्गुणी और दुराचारी है और समाज के लिए कंटक समान है तो समझना चाहिए कि उस समाज की शिक्षाव्यवस्था ठीक नहीं है।
आज ऐसी ही स्थिति है। समृद्धि और संस्कृति दोनों ही क्षेत्र में केवल हमारे ही देश ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व की स्थिति चिन्ता करने योग्य है। कितने ही देश भुखमरी की अवस्था में पहुँच गए हैं। संस्कारों का हास हो रहा है। स्वतंत्रता, मानवीय गौरव, सुरक्षा, समृद्धि, सद्गुण आदि मनुष्य-जीवन को गौरवान्वित करने वाले तत्वों का अभाव चारों ओर दिखाई दे रहा है। इन सभी संकटों से यदि मानव-समूह को मुक्त करना हैं तो शिक्षा के विषय में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
पुनर्विचार करते समय ध्यान में रखने की बात यह है कि सुसंस्कृत समाज का निर्देशन, नियमन और नियंत्रण करने वाला तत्व धर्म है। 'धारणाद्धर्म इत्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः' सम्पूर्ण लोक को धारण करता है इसीलिए यह धर्म है। आज भले ही अनेक प्रकार के निहित स्वार्थों तथा अज्ञान के कारण धर्म को उलटी सुलटी व्याख्याओं से उलझा कर उसके अर्थ का अनर्थ कर दिया गया हो, धर्म के बिना प्रजा की सुस्थिति हो नहीं सकती। समाज जीवन धर्मानुसारी होना चाहिए यह निर्विवाद सत्य है।
जीवन को धर्मानुसारी होने के लिए शिक्षा को धर्मानुसारी होना चाहिए। शिक्षा ज्ञानसत्ता है। धर्मसत्ता और ज्ञानसत्ता मिलकर ही समाजजीवन को सही दिशा देते हैं।
हम देख रहे हैं कि आज की शिक्षा धर्मानुसारी नहीं रह गई हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में मोक्ष लक्ष्य है और धर्म अधिष्ठान है। अर्थ और काम को धर्म के अविरোধी होना चाहिए। यह सुसंस्कृत और समर्थ समाज की रीति है। परंतु आज सब कुछ अर्थ के नियंत्रण में चलता है। धर्म को अर्थ के आगे गौणत्व प्राप्त हुआ है। जब अर्थ सब से अधिक प्रभावी होता है और शेष सब उसके गौणत्व में होते हैं तब समाज में असंस्कृति की प्रतिष्ठा होती है और समृद्धि भी क्षीण होती है।
समाज को इस संकट से बचाने के लिए शिक्षा धर्मानुसारी बने इस बात की चिन्ता करनी चाहिए। यह चिन्ता शिक्षकों को करनी चाहिए, यह तो ठीक हैं, परंतु इसका सही अधिकार धर्माचार्यों का है। संपूर्ण समाज का और शासन का भी मार्गदर्शन करने का अधिकार धर्माचार्यों का है।
वर्तमान में इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। वास्तव में इसकी आवश्यकता निरंतर होती ही है क्योंकि धर्म पर चलने वाला समाज ही श्रेष्ठ और चिरजीवी समाज होता है।
A photograph showing a large group of men, mostly in white dhotis, sitting on a wooden platform that extends over a pond. The pond is filled with green lily pads. The men are arranged in several rows, some sitting on the platform and others on the ground. They appear to be engaged in a formal gathering, possibly a religious or educational session. The background shows lush green trees and foliage.
भारत को धर्मनिष्ठ बनकर विश्व का मार्गदर्शन करना है। यह उसका ईश्वरप्रदत्त कर्तव्य है। इस कर्तव्य को निभाने के लिए उसे समर्थ बनना
होगा। यह सामर्थ्य ज्ञान का, प्रेम का और तप का होगा। ऐसा सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए भी धर्मानुसारी शिक्षा की आवश्यकता हैं।
हमने जो विकास का रास्ता लिया है, वह विकास नहीं है, वह तो रावण की सर्वनाश करने वाली लंका का रास्ता है। अगर देश को बदलना हो तो गुरुकुलम् चलाना ही चाहिए। - डॉ प्रवीण तोगडिया
- 1. इस देश की बहुत बड़ी विशेषता रही है कि मानवजीवन के लिए जो अनिवार्य है, वह निःशुल्क था। शिक्षा अनिवार्य है तो वह निःशुल्क थी। वैदकीय सेवाएँ निःशुल्क थी।
- 2. राजा का बेटा जहाँ पढ़ता था वहाँ किसान का बेटा भी पढ़ता था। हमारा संस्कृतिक पतन भी हुआ और मैकाले ने हमारा ब्रेनवाश करने का काम किया। अंग्रेज तो चले गये पर 'काले अंग्रेज' यहाँ छोड़कर गये, जिनका चिंतन, जिनकी सोच मूलतः इस देश की संस्कृति और मानव-सभ्यता एवं विश्वकल्याण के साथ सुसंगत नहीं है। दुर्भाग्य की बात है कि आज का समाज-जीवन इतना कम्पलेक्ष(जटिल) बन चुका हैं, कि व्यक्ति उस रास्ते पे नहीं चलेंगे तो जी नहीं पायेंगे। ना आर्थिक दृष्टि से, ना सामाजिक दृष्टि से।
- 3. कहते हैं कि प्रलय आता है तब ईश्वर पुनः सृष्टि निर्माण के लिए कुछ बचाकर विध्वंस करता है ताकि प्रलय के बाद पुनः सृष्टि निर्माण प्रारंभ कर सके। वैसे ही संस्कृति के महाप्रलय काल कि में उत्तमभाई ने पुनः निर्माण की प्रक्रिया यहाँ प्रारम्भ की है। पुनर्निर्माण कठिन होता है। मुश्किल होता है। क्योंकि इन्सान अकेला निकलता है, दुनिया हँसती है, तो भी विचार को दृढ़ रखकर जो आगे जाता है, वह अपना मूल रास्ता लोगों को स्वीकृत कराने के लिए अपने चरित्र से और दृढ़ता से प्रयत्न करता है। ऐसी एक बड़ी प्रतिकृति शिक्षा
की यहाँ खड़ी होगी। आगे जाकर अनेक लोगों से चर्चा के आधार पर उन्हें विकसित करते जायेंगे।
- 4. पैसे नहीं है तो पानी नहीं मिलेगा। अब तो लगता है कि पैसे होंगे सांस ले पाओगे, वरना सांस भी नहीं ले पाओगे। इतना व्यापारीकरण दुनिया के इतिहास में कभी नहीं हुआ था।
- 5. चालीस साल पहले में गाँव में रहता था, हमारे गाँव में दूध नहीं बिकता था। लोगों को मुफ्त में देते थे। जिस देश में दूध नहीं बिकता था, घी नहीं बिकता था, उस देश में 12 रुपये में पानी की बोतल बिकने लगी है। फिर तो स्त्री और पुरुष बिकेंगे। उसमें आश्चर्य क्या है। आप पानी बेच सकते हो, अपने मूल्य बेच सकते हो, अपना इतिहास, अपने पुरखों, अपने मूल्य बेच सकते हो, अपना इतिहास, अपने पुरखों, अपने धर्म को और देश को भी बेच सकते हो।
- 6. इसलिए हमें शास्त्र की रक्षा करनी चाहिए, परंतु शास्त्र की रक्षा करने के लिए, शांति के लिए, अहिंसा की रक्षा के लिए इस देश में पुनः महान आर्य परंपरा की स्थापना जरूरी है। हमारे दिल की कामना है कि भारत में हमारी आर्य परंपरा पुनः स्थापित हो।
- 7. मैकाले ने हमारी शिक्षा बदल दी। इस देश में 18 वीं सदी में अंग्रेज आये। भारत की शिक्षा-व्यवस्था अध्ययन किया। उन्होंने लिखा कि हिन्दू कैसे लोग हैं, जो अपने बच्चों को 'क, ख, ग, घ' नहीं सिखाते हैं। प्रत्येक के साथ एक श्लोक होता है, जो उनमें चरित्र का निर्माण करता है। हम सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं देते थे, अक्षरज्ञान के साथ उनमें चरित्र भी देते थे। आज की ये आधुनिक शिक्षण पद्धति ने प्रवीण तोगडिया को एक डॉक्टर बना दिया। मेरी पूरी मेडिकल शिक्षा में नैतिक मूल्यों का एक भी पेज पर उल्लेख नहीं है। ये आधुनिक शिक्षा पद्धति है। मैकाले ने हमारी जो मूल्य युक्त शिक्षा पद्धति थी, उनका अध्ययन करने के बाद उसका सर्वनाश, गुरुकुल अकेले दक्षिण भारत में मद्रास में थे, जो मुफ्त पढ़ाते थे। तो इनकी व्यवस्था चलती कैसे थी? हर
एक के पास जमीन थी, राजा एक हिस्सा देता था और श्रेष्ठि एक हिस्सा देता था' अंग्रेजों ने हमारे सभी गुरुकुलों की जमीन समाप्त कर दी। राजाओं को खत्म कर दिया। इससे हमारी गुरुकुलों को टिकाने की व्यवस्था खत्म हो गई। जो भारत ने दुनिया को '0' शून्य दिया, एक से नौ का अंक दिया. वह भारत आज निरक्षर हो गया है और भारत में अंग्रेजों का शासन चलाने के लिए और क्लर्क पैदा करने के लिए जो शिक्षण पद्धति आई, उनके हम शिकार बन चुके हैं और उसी के द्वारा आगे ले जाने में लगे हुए हैं। वे भारत को आगे नहीं ले जाएंगे, भारत को सर्वनाश की ओर ले जाएंगे।
- 8. हमें आर्थिक समृद्धि चाहिए, पर सांस्कृतिक मूल्यों के अधिष्ठान पर चाहिए। आज विकास का मापदंड क्या है, पता है? मानव मूल्य नहीं है, प्रमाणिकता नहीं है, सत्य नहीं है। कितने फोर ट्रक हार्डवे है, कितने लोगों के हाथ में मोबाईल है, कितनी कार और स्कूटर हैं। इस देश में मानव का मूल्यांकन मानवीय मूल्यों के आधार पर बंद हो गया है। इसीलिए, जो विकास का रास्ता हमने लिया है, वह विकास का नहीं है, यह तो रावण की सर्वनाश करने वाली लंका का रास्ता है।
- 9. अगर देश को बदलना है, तो गुरुकुल की शिक्षा अनिवार्य है और जैसे वैदिक जी ने कहा, संस्कृति का देशव्यापी अभियान चलाकर इस देश में सांस्कृतिक जागरण का महायज्ञ भी साथ में करना चाहिए और हमें लगता है कि उत्तमभाई का प्रयास भारत को भारत बनाकर रहेगा।
ज्ञान
आज अगर खेती के परंपरागत औजार नहीं मिलते, तो उसका कारण है कि उन्हें बनाने वाले हाथ शहरों में कारखानों में बनने वाले ऐसे औजारों को सिर पर ढोने और ट्रकों तक पहुँचाने को मजबूर हैं। वहाँ वे अपने घर से, अपनी माँ, अपने परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर नर्क की जिंदगी जीने को शापित हैं, क्योंकि
उन्हें न उस लकड़ी का ज्ञान रह गया हैं जो उन्हें पड़ोस के जंगल से मिल जाया करती थी और जिससे उनके पिता हल बनाया करते थे, न ही उन्हें उस लकड़ी को बचाने व उसके संवर्धन की आवश्यकता महसूस हो रही है। इससे यहाँ स्थानीय कौशल लुप्त होता जा रहा हैं, वहीं स्थानीय संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों के भूमिका भी समाप्त होती जा रही हैं।
स्थानीय संसाधनों व स्थानीय कौशल की वकालत करते हुए इस लेख का उद्देश्य विकास के चक्र को वापिस घुमाना नहीं है। उसे युगानुकूल बने हुए भी, उसकी देशानुकूलता बनाए रखना हैं, हमारा समाज स्वभाव से ही उद्यमी रहा हैं, अब तक की सरकारी नीतियाँ व तथाकथित प्रगतिवादियों द्वारा बनाए वातावरण के कारण उसकी उद्यमिता को जबरदस्त धक्का पहुँचा है। अगर ट्रेक्टर ने हल और बैलगाड़ी को बेमानी बना दिया है, तो इसलिए क्योंकि हमारी पंरपरागत उद्यमिता कहीं उनके शोर में दब कर रह गई है।
आज आवश्यकता है, हमें अपने कारीगरी कौशल को फिर समझने की, उस पर गर्व करने की, कारीगर बंधु अपने भीतर छिपे हनुमान की शक्ति को स्वयं पहचानें, उसे जगाने के लिए किसी जाम्बवंत का इंतजार न करें।
आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने विविध डिग्रीओं के धारक व्यक्तियों का निर्माण किया है। पर एक अच्छे मानवसमूह का निर्माण करने में वह असमर्थ रही है।
अपना बचपन भूल गए
बच्चे जब स्कूल गए....
- • दुनिया में सबसे ज्यादा बेरहम और अमानवीय माँ-बाप आपको कहाँ मिलेंगे? जाहिर है, ऐसे माँ-बाप आपको हिन्दुस्तान में मिलेंगे और सरप्लस में मिलेंगे।
- • इन माँ-बापों के पास ढेर सारा पैसा है और ढेर सारी मूर्खताएँ हैं। ये माँ-बाप अगर दुनिया में किसी चीज के बारे में सबसे कम जानते हैं, तो अपने बच्चों के बारे में।
- • जैसे, माँ-बाप नहीं जानते कि उनके बच्चों के लिए धूप में रहना बहुत जरूरी है। विटामिन, टॉनिक या सिरप से नहीं, कुदरत से मिलता है और मुफ्त मिलता है।
- • बच्चा मिट्टी में नहीं खेलेगा, तो बड़ा कैसे होगा? स्वस्थ कैसे रहेगा? बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण मिट्टी से होता है। बच्चों को मिट्टी से दूर रखना, बच्चों के साथ दुश्मनी निभाना है।
- • मौजूदा लाइफ स्टाइल का मंत्र है – बच्चे को धूप से दूर रखिए, हवा से दूर रखिए, मिट्टी से दूर रखिए। जी हाँ, अब तो दो साल के बच्चों के लिए जिम खुल गए हैं।
- • बच्चे को किस उम्र में स्कूल भेजना चाहिए? अपने बचपन के सबसे बेहतरीन चार-पाँच साल, बच्चों के खेलने, मस्ती करने और खाने-पीने के होते हैं। बच्चों का सबसे अनमोल समय उनके माँ-बाप उनसे छीन
लेते हैं। प्ले ग्रुप, नर्सरी, जूनियर केजी, सीनियर केजी, स्कैटिंग, डान्स क्लास, चित्रकारी यानी लिस्ट बहुत लम्बी है। तीन साल के बच्चे को गर्मागर्म खाने के बदले टिफिन का खाना?
- • प्ले ग्रुप से फर्स्ट स्टैंडर्ड तक की पाँच साल की यह कवायद बच्चे को कहाँ ले जाती है? बच्चे गिनती या पहाड़े नहीं सीख पाते, लेकिन टीवी
पर आने वाला हर विज्ञापन उन्हें याद रहता है। उन्हें पता चल जाता है कि रोटी-सब्जी नहीं, पिज्जा-बर्गर उनका भोजन है।
लड़कियाँ 'कांटा लगा' फेम शेफाली बनना चाहती है और लड़के प्रभु देवा। चार साल का बच्चा मेकडोनलड में जाने के लिए घर सर पर उठा लेता है। पाँच साल की स्वीट बच्ची अभी से फेयर और लवली की डिमांड करती है।
किताबों का बोझ, ट्यूशन, बर्थ-डे पर हर रोज मिलने वाली चाँकलेट, कभी मदर्स डे, तो कभी फादर्स डे, वन डे पिकनिक, चक्करदार फैशन प्रतियोगिताएँ और ऐसी ही ढेर सारी चीजों का अंवार लगा है बच्चों की दुनिया में। सिर्फ एक चीज गायब है – 'बचपन'।
कागज की कश्ती नदी में बहाने नहीं ले जाता कोई। छत पर चाँद दिखाने नहीं ले जाता कोई। लोरी गाकर नहीं सुलाता कोई। गुड़ का गर्म शीरा नहीं खिलाता कोई। न नानी की कहानियाए याद रहीं और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ़्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।
न्यूयार्क का अब्राहम लिंकन स्कूल
आज समस्त भारतीयों की नजर यूरोप-अमरीका की तरफ है। उनकी हर बात हम आंखे मूंद कर अपनाने को तैयार है। जिस प्रकार कस्तुरी मृग की नाभि में होती है, फिर भी मृग अज्ञानता के कारण उसे पाने के लिए इधर-उधर भटकता है। उसी प्रकार सारी व्यवस्थाएँ हमारी संस्कृति में मौजूद है, पर आँखे मूंद कर हम विदेशों की नकल करने में लगे हैं। मद्य, मांस, सेक्स , हिंसा के कुपरिणामों से त्रस्त होकर यूरोप-अमरीका के लोग शाकाहार, योग, अहिंसा, ध्यान आदि का मूल्य समझ कर उन्हें अपनाने का प्रयास कर रहे हैं। दुःख की बात यह है कि इन देशों के लोग जिन दुष्परिणामों को भुगत रहे हैं, उन्हें सारी बातों को फैशन के नाम पर हम अपनाने में गौरव अनुभव कर रहे हैं।
प्राचीन काल में हमारे वहाँ नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। संसार के अनेक देशों के लोग हमारे यहाँ आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् विद्या (ज्ञान) वह है, जो हमें बंधनों से छुड़ा कर मुक्ति की ओर ले जाये। इस सुनहरे सूत्र पर हमारी शिक्षा आधारित थी। शिक्षा द्वारा व्यक्ति को संस्कार, करूणा, नैतिकता आदि प्राप्त होते हैं। आज शिक्षा द्वारा बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पाकर मानव डॉक्टर, वकील, इंजीनियर बन गया है। लेकिन उसमें मानवता नदारद है। जीवन के अमूल्य 15 या 18 वर्ष शिक्षा के पीछे लगाकर जब वह शिथिल बनता है, तब शिक्षा अर्थउपार्जन
में कितनी उपयोगी होती हैं, यह सोचनेवाली बात हैं। वर्तमान शिक्षा ने हमारे सांस्कृतिक पर्यावरण को खूब विकृत किया है। आज मानवता ऑक्सिजन पर आखिरी सांस ले रही है। सरस्वती मंदिर आज अनाचार व दुराचार के अड्डे बन गये हैं। हमारी प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था एवं उसमें प्रदान की जाने वाली शिक्षा का त्याग कर हम नौकरी व अर्थ के लालच में अंग्रेजी बाबू बनने के चक्कर में पड़ गये हैं। शिक्षा-शक्तियों का स्पष्ट मत हैं कि बच्चों की बुद्धि का विकास मातृभाषा में शिक्षा के माध्यम से जितना अधिक हो सकता है, उतना अन्य भाषा के माध्यम से संभव नहीं है। फिर भी हम मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेजी भाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा की अंधी दौड़ में शामिल हो रहे हैं। इसके दुष्परिणाम सामने आने लग गये हैं। अभी भविष्य की कल्पना तो और अधिक भयावह हैं।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि न्यूयार्क (अमरीका) में अब्राहम लिंकन स्कूल प्रारंभ किया गया है, जिसका मुख्य कार्यालय लंदन में है। अन्य अनेक देशों में भी उसकी शाखाएँ प्रारंभ की गई हैं। वहाँ हमारी देवभाषा संस्कृत, प्रचीन गणित एवं तत्वज्ञान की शिक्षा दी जाती है। स्कूल-प्रबंधनने पांच वर्ष या उससे बड़ी उम्र के बच्चों को इस स्कूल में भेजने के लिए जनता से आग्रह किया है। उन्होंने कहा है कि अपने बच्चों को श्रेष्ठ, आदर्श स्वच्छ व प्रामाणिक नागरिक बनने के लिए हमारे स्कूल में भेजिए।
तत्संबंधी हमारा ध्यान इस ओर कब जायेगा, जब हम अपनी पुरानी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की ओर लौटेंगे। कम से कम अब न्यूयार्क के अब्राहम लिंकन स्कूल को देखकर तो हमें कुछ सोचना ही चाहिए। जितनी जल्दी हम इस ओर ध्यान दे पायेंगे, उतना ही लाभप्रद होगा।
-जे.के. संधवी
तूफान आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है....
आपके पास अपने बच्चों के लिए वक्त नहीं है। इससे ज्यादा खतरनाक बात यह है कि आपके बच्चों के पास बहुत ज्यादा वक्त हैं, जिसे आप अनदेखा कर रहे हैं। आपकी यह उदासीनता बरकरार रही, तो आपका और आपके परिवार का विनाश निश्चित है। तूफान आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है और उसकी दस्तक आप नहीं सुनना चाहते हैं तो फिर भगवान ही आपका
A black and white photograph of a man in a plaid shirt, looking down with his hands pressed against his forehead in a gesture of distress or despair.
मालिक हैं।
अतिरिक्त समय में आपके बच्चे क्या कर रहे हैं? चॉकलेट खा कर दाँत बिगाड़ रहे हैं, घंटों इंटरनेट के सामने बैठकर चेटिंग कर रहे हैं और अपनी आंखों की रोशनी गँवा रहे है।
आपके बच्चे मोबाईल पर संदेश भेजने के आदी हो चुके हैं। टाइम पास करने का यह जरिया उन्हें कैसर दे सकता है। शहर में कितने डिस्को है, कौन-सा डिस्को रात कितनी देर तक खुला रहता हैं, इसकी उन्हें पूरी जानकारी है। दिन में खुले रहने वाले डिस्को में कम उम्र के लड़के-लड़कियों का जाना आम बात हैं, जिन्होंने अभी अपनी स्कूल की पढ़ाई भी पूरी नहीं की।
फास्ट फूड, फिल्मी गॉसिप, फैशन शो, पुल, और वीडियों गेम्स पार्लर, क्रिकेट, धूम्रपान, ड्रग्स इत्यादि आपके बच्चों की जिंदगी के अहम हिस्से बन चुके हैं। ये आपके बच्चों के सहज जीवन को समाप्त कर रहे हैं। रही-सही कसर टेलीविजन पूरा कर रहा है, जो चौबीसों घंटे आपके बच्चों के दिलो-दिमाग पर इस कदर छाया हुआ है कि वे एक तरह से टेलीविजन के दास बन गए
हैं। आपके बच्चे वही खाएंगे जो टेलीविजन कहेगा, वही पहनेंगे जो टेलीविजन चाहेगा, वहीं सोचेंगे जो टेलीविजन बोलेगा।
पश्चिमी अर्थशास्त्र की मान्यता है कि किसी समाज पर कब्जा करना हो तो, पहले उस समाज के बच्चों पर काबिज हो जाओ। देश तो अपने आप गुलाम हो जाएगा।
बच्चों को संस्कार दीजिए, संपत्ति नहीं...
बच्चों को संस्कार दीजिए, संपत्ति नहीं। बच्चों को नैसर्गिक भारतीय जीवन शैली में ढालना ही इसका एकमात्र उपाय है। मंदिर बनवाने से ज्यादा जरूरी है, बच्चों को मंदिर में जाने की पात्रता देना। वरना जिस तरह आज जीन्स और टाई पहन कर कृष्ण कन्हैया की आरती उतारने के दृश्य देखे जा सकते हैं, कल हमारे बच्चे कोकाकोला पीकर और बर्गर खाकर उपवास करेंगे और प्रसाद में अल्कोहलिक चॉकलेट देना घर की इज्जत का प्रतीक बन जाएगा।
संपत्ति बच्चों को बिगाड़ती है, संस्कार उन्हें सहज और नैसर्गिक जीवन जीने की ऊर्जा देते हैं। संपत्ति को भोगने की एक सीमा है, संस्कारों के साथ जीवन जीने के सुख अनंत हैं।
- नंदकिशोर राजगड़िया
आज तो जो विद्या की अर्थी उठा दे, वही विद्यार्थी...
बेरोजगारी का अंतिम पड़ाव अपराध है। अब तक यह माना जाता था कि अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग ही अपराध की ओर मुड़ते हैं। आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि आजकल पढ़े-लिखे लोगों का अपराध पर एकाधिकार हो गया है। फराटेंदार अंग्रेजी बोलने वाले माफिया गिरोहों में शामिल हो रहे हैं। सरकारी तंत्र का पढ़ा-लिखा तबका हर तरह के अपराध करने में सबसे आगे है।
A composite illustration. The top part shows a conveyor belt with several graduates in blue gowns and caps. The bottom part is a collage of educational symbols: a building labeled 'COLLEGE', a blue 'MBA' logo with silhouettes of people, a graduation cap with a red ribbon, the word 'EDUCATION', and a stack of books.
हिन्दुस्तान का अंगूठा छाप आदमी आज भी ईमानदारी से जीना चाहता है। जितना मिल जाए, उसी में गुजर-बसर करने को तैयार हैं।
शिक्षा का अर्थ तो यह होना चाहिए कि दूसरों के होठों की मुस्कराहट हमारी खुशी बने। हम विद्या और शिक्षा को पर्यायवाची न समझें। प्रशिक्षित तो हम पशु को भी कर सकते हैं, पर हम उसमें विवेक नहीं जगा सकते। यह विवेक ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है। विद्या जानना है जबकि शिक्षा सीखना। शिक्षा ली जाती है, विद्या अर्जित की जाती है। हमें आज के विद्यार्थियों को विद्या के साथ-साथ शिक्षा भी देनी है। आज तो जो विद्या की अर्थी उठा दे, वही विद्यार्थी।
-अनंत श्रीमाली (कवि, व्यंग्यकार और मंच संचालक)
भाषा अंग्रेजों की! शिक्षा अंग्रेजों की
अंग्रेजी राज में पिंडारियों और ठगों ने मिलकर जितना हिन्दुस्तान लूटा होगा, उससे ज्यादा माल तो आज मात्र एक वर्ष में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने मुनाफे के रूप में ले जाती हैं।
कौन कह सकता है कि अंग्रेज चले गए हैं? हमारे उठने, बैठने, सांस लेने, जीने की हर गतिविधि में अंग्रेज मौजूद है। कोई ऐसे ही थोड़े चला जाता है, अपने को छोड़कर?
कहाँ नहीं है, अंग्रेज? काला कोट पहन कर अदालत में मौजूद है। नीली वर्दी पहने हुए थाने में मौजूद हैं। लिप्टन की चुसकियाँ लेता हुआ हर दीवानखाने में मौजूद हैं।
मैंने हर बार उसे संसद में बजट पेश करते हुए देखा है। लंबा चोंगा पहन कर दीक्षांत-समारोहों में खातकों को डिग्रियाँ बाँटते हुए देखा है। सात-घोड़ों की बग्गी में सवार होकर गणतंत्र दिवस की परेड में सलामी लेते हुए देखा हैं।
घोड़ों की तरह हिनहिनाता हुआ रेसकार्स में मौजूद हैं अंग्रेज। वह विल्स की नेम-प्लेट चिपकाए हवा में बल्ला लहराता हुआ क्रिकेट के मैदान में मौजूद हैं। इत्कालीस दिसंबर की रात को नशे में धुत कभी पोप, कभी भांगड़ा करता हुआ हर सड़क पर मौजूद है।
अंग्रेज हर चुंगी नाके पर जजिया बसूल रहा है। फॉरिस्ट ऑफिसर की हैसियत से आदिवासियों पर लठियां बरसा रहा है। मंदिरों को मस्जिदों से लड़ाता है। किंगफिशर की एक बोतल पर रॉक संगीत का कैसेट मुफ्त दे रहा है। बेटियों और बहनों को लेडी डायना की लाइफ स्टाइल परोस रहा है।
संविधान अंग्रेजों का, संसदीय लोकतंत्र अंग्रेजों का, कानून अंग्रेजों का, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था अंग्रेजों की, शिक्षा-प्रणाली अंग्रेजों की, भाषा अंग्रेजों की! मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इतिहास में एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब आपको असली और खानदानी अंग्रेजी सिर्फ हिन्दुस्तान में मिलेंगे, इंग्लैण्ड में नहीं।
-अक्षय जैन
ऐसे माँ-बाप, माँ-बाप कम दुश्मन ज्यादा होते हैं....
जीवन संस्कारों से सजता व संवरता है। पढी हुई शिक्षा तो भूली जा सकती है, लेकिन संस्कार जीवन पर्यन्त के पाथेय होते हैं। संस्कारहीन व्यक्ति दरिद्र ही नहीं होता, वह जीवन भर दुःख और तकलीफ भी भोगता है। सुसंस्कार सुरक्षा कवच हैं, जो मनुष्य के यात्रापथ को निरापथ बनाता है। पालक और बालक यदि सुसंस्कृत, धार्मिक और सभ्य हैं, तो धर्म, समाज और राष्ट्र का बहुमुखी विकास अवश्यभावी है। बालकों के संस्कार-निर्वाण में अभिवाचक भी कम जवाबदेह नहीं हैं। यदि माँ-बाप खुद संस्कारों के शिकार हैं, तो वे अपनी संतति से क्या अपेक्षा रख सकते हैं? ऐसे माँ-बाप, माँ-बाप कम, दुश्मन ज्यादा होते हैं।
माँ-बाप का बेटे के प्रति कर्तव्य है कि वे अपनी संतान को इतना सुयोग्य बना दे कि सत्पुरुषों सज्जनों की सभा में वह अग्रिम पंक्ति में बैठने कि पात्रता रखें और बेटे का माँ-बाप के प्रति कर्तव्य वह है कि वह ऐसा जीवन जिये, जिससे हर आदमी उसके माँ-बाप से पूछे कि तुमने किस पुण्य कर्म के उदय से ऐसा सुपुत्र पाया हैं। माँ किसी बेटे कि जागीर नहीं होती और संस्कारों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। पुत्र को जन्म देने मात्र से स्त्री माँ नहीं हो जाती और कोई पुरुष बाप नहीं हो जाता। माँ-बाप को अपनी संतान के प्रति उनके क्या-क्या कर्तव्य और दायित्व हैं, यह ज्ञान भी होना चाहिए।।
नाट्य कलाएं, संगीत, नृत्य, चित्रकला, साहित्य की विभिन्न विद्याएँ, कला के अलग-अलग रूप हैं और कलाएँ इंसान को संस्कारित करती है, उसे संवारती है, उसे पशु होने से बचाती है, उसके जीवन में संतुलन रखती है। मगर कलाकर्म के इस मर्म को पीछे धकेल कर व्यवसाय कर्म से जोड़ दिया जाये, तो जो नतीजे आने चाहिए वे आज की कटु मगर चिंताजनक सच्चाई हैं।
-मुनि श्री प्रसन्न सागरजी
भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गए?
1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकाले ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने वहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा अधिकारी था Thomas Munro दोनों ने अलग-अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आस-पास की बात है। Litnar जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा था कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है, और उस समय जब भारत