गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
(अहमदाबाद) में प्रारंभ किया गया था। आज इस गुरुकुलम् की प्रेरणा व मार्गदर्शन से देश के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक गुरुकुल शुरू हो चुके हैं।
A photograph showing a group of young boys, likely students, sitting on the ground in an outdoor setting. They are wearing white dhotis. The boy in the foreground is looking towards the camera with a slight smile. A dark banner with white text is overlaid at the bottom of the image.
गुजरात के ये बच्चे देते हैं पूरी दुनिया को चुनौती !
‘गुरुकुलम्’ द्वारा ‘मैकाले-पुत्र’ नहीं ‘महर्षि-पुत्र’ का निर्माण –
‘हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला’ (गुरुकुलम्) आर्यशिक्षण प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ विकल्प है। यह संस्था आधुनिक विनाशकारी मैकाले शिक्षा-पद्धति से देश को मुक्त करवाने के लिए प्रयत्नशील है। व्यक्ति-निर्माण से कुटुम्ब-निर्माण, कुटुम्ब-निर्माण से समाज निर्माण, समाज निर्माण से राष्ट्र-निर्माण एवं राष्ट्र-निर्माण से विश्वनिर्माण करने में अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करने के लिए कटिबद्ध है।
An illustration of an elderly sage with a long white beard, wearing a yellow dhoti, sitting on the ground and writing on a palm leaf manuscript. He is surrounded by a lush green landscape with trees and a small hut in the background.
हम मानते हैं कि इस पाठशाला में से प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए विद्यार्थी ‘मैकाले-पुत्र’ नहीं किन्तु ‘महर्षि-पुत्र’ बनकर भारत को जगदगुरु बनाने में अपना योगदान करेंगे।
‘गुरुकुलम्’ (हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला) का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थी के चरित्र्य निर्माण के साथ-साथ सर्वतोमुखी विकास करने का है, उसके लिए उसे ऋषि-महर्षियों द्वारा प्रस्थापित पुरुषों की 72 कलाओं और महिलाओं की 64 कलाओं पर आधारित प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा के द्वारा विद्यार्थी ‘ज्ञानी’, ‘गुणीयल’, ‘सधम’, ‘बुद्धिमान्’ और ‘चरित्र्यवान्’ बनता है।
‘गुरुकुलम्’ द्वारा श्रेष्ठ प्रशिक्षण –
विद्यार्थियों को इस पाठशाला में तत्वज्ञान, ईशभक्ति के संस्कारों के साथ-साथ संस्कृत-व्याकरण, न्याय शास्त्र, प्राकृत भाषा, गुजराती, अंग्रेजी, प्राचीन वैदिक गणित, आधुनिक गणित, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र, इतिहास, भूगोल, चित्रकला, रंगोली, हस्त-लेखन कला, संगीत कला (गीत-नृत्य-वादन), नाट्यकला, वक्तृत्व-कला, जादु-कला, माटी-कला, पाक-कला के साथ-साथ शारीरिक कला-कौशल, योग-कराटे-जूडो-कुश्ती, लाठी-दाँव, जिम्नास्टीक, रोप मलखम, पोल-मलखम, स्वदेशी खेल, घोड़ा गाड़ी, घुड़सवारी आदि सिखाया जाता है।
A large group of students, mostly girls, are participating in a physical exercise session. They are arranged in rows, facing forward, and have their arms extended straight out in front of them. They are wearing various colorful school uniforms. The background shows a large crowd of people, likely teachers and other staff, watching the session.
इस प्रकार, इस पाठशाला में शिक्षा-विद्या प्राप्त करके प्रशिक्षित हुए विद्यार्थी जीवन का सर्वतोमुखी विकास पा कर इस देश के लिए एक प्रखर राष्ट्र-भक्त और संस्कृति-भक्त बनकर बाहर आएंगे।
धर्म-रक्षा, संस्कृति रक्षा और राष्ट्र-रक्षा के श्रेष्ठ धर्मयज्ञ तुल्य हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला की प्रत्यक्ष मुलाकात लेने के लिए हमारा भावपूर्ण निमंत्रण है।
इस गुरुकुलम् को प्रत्यक्ष देखने के बाद आपकी.....
औंखें अहोभाव और आश्चर्य से भरे हुए बगैर नहीं रह पायेगी....
लि.- संचालकगण
हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला (गुरुकुलम्) नवजीवन के मूलाधार एवं विकास के प्रधान अंगरूप शिक्षा के बीज को बचाने जैसा पुण्यकार्य, सामाजिक कार्य एवं आध्यात्मिक कार्य अन्य नहीं हो सकता। क्योंकि शिक्षा से ही मानव में सदगुणों की पूर्णता पायी जाती है।
हमारा प्रयोजन...
आधुनिक शिक्षा प्रणाली के सभी हानिकारक, बुरे और नकारात्मक पहलुओं से नई पीढ़ी को सुरक्षित बनाना है।
वर्तमान शिक्षा पद्धति का भारतीयकरण और अध्यात्मकरण इस विद्याधाम का मुख्य उद्देश्य है।
जैन दर्शन और भारतीय आर्य संस्कृति उनके मूल्य और प्रबंध के अनुसार विद्यार्थियों का बौद्धिक, शारीरिक, वैचारिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं बहुमुखी विकास हो सके, ऐसी अध्ययन-अध्यापन-प्रणाली का संरक्षण, विकास, संवृद्धि एवं विनियोग इस विद्याधाम के महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं।
अध्ययन-अध्यापन कार्य में गुरु की प्रमुखता और समाज में गुरुओं के गौरव को पुनः संस्थापित करना है।
A wide-angle photograph showing a large group of students, both boys and girls, sitting cross-legged on a green grassy field. They are arranged in several rows, facing towards the camera. Most of the students are wearing white tank tops and dark shorts or trousers. In the background, there is a long, two-story red building with many windows. The scene appears to be an organized outdoor activity, possibly a yoga or meditation session as part of a school program.
पुरुषों के लिए 72 और महिलाओं के लिए 64 कलाओं की शिक्षण पद्धति के माध्यम से धीरता, वीरता, विद्वत्ता, प्रज्ञानशीलता, चरित्र्यशीलता, राष्ट्रप्रेम, धर्मप्रेम, स्वनिर्भरता, साहसिकता, पराक्रमिता, निडरता, स्वास्थ्य, उदारता, परोपकारिता, जीवदया, विनय, विवेक, व्यवहार-कुशलता, औचित्य, शीघ्र प्रत्युत्तर-क्षमता, शीघ्र निर्णय-शक्ति, नेतृत्व-क्षमता, दूरदर्शिता एवं श्रेष्ठ, समर्थ व्यक्तित्व धारण करने वाले नर-नारी का निर्माण करना हमारा लक्ष्य हैं।
तक्षशिला व काशी विश्वविद्यालय के लिए किसी समय पहचाना जाने वाला हमारा देश अब अपने कलखानों के लिए विख्यात होने पर गर्व करेगा।
ग्लोबलाईजेशन नये रोजगार देने के नाम पर हमारे बच्चों के हाथों में कसाई का छुरा थमा रहा हैं।
दिनचर्या
- • दिनचर्या आधुनिक विकृतियों से दूर जैन परम्पराओं के आचार-पालन और रासायनिक-जंतुनाशक रहित आहार के साथ व्यवस्थित की गई है।
- • उत्तिष्ठ = ब्रह्म मुहूर्त में उठना
- • संस्कृत व धार्मिक पठन
- • प्रार्थना, ध्यान व प्राणायाम
- • शारीरिक कुशलताएँ (योग, व्यायाम, लाठी, दौड़ इत्यादि)
- • दर्शन एवं पद्यकक्षाण
- • दंतमंजन, त्रिफलांजन, नवकारशी, गौ-दोहन, धारोष्ण दुग्धपान
- • अभ्यंग, स्नान व जिन पूजा
- • धार्मिक अध्ययन-सूत्रपाठ-सामायिक
- • मध्याह्न भोजन एवं वामकुक्षी
- • ज्योतिष, संस्कृत, गणित, चित्रकला, संगीत इत्यादि विभिन्न विषयों का अध्ययन
- • विभिन्न शारीरिक तालीम एवं क्रीडा
- • सायं भोजन-स्वैर विहार इत्यादि
- • दर्शन, संध्याभक्ति, आरती-मंगल दीपक
- • गायन-वादन, नाट्य, वक्तृत्व इत्यादि कला-कुशलताओं का प्रशिक्षण
- • शयन
अंग्रेज चालबाज मैकाले ने ऐसी शिक्षण प्रणाली प्रस्थापित की जिसको आज तक कोई भी बदल नहीं सका। उसकी शिक्षा पद्धति के कारण भारत के लोग अपनी संस्कृति, धर्म एवं अपनी मात्रभाषा से आप ही आप विमुक्त हो गए हैं। देश में आज अनेक देशी अंग्रेजी पैदा हो रहे हैं।
अध्ययन और प्रशिक्षण
विद्या
- 1.भाषाएँ - संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, हिन्दी, अंग्रेजी।
- 2.जैन दर्शन और जैनाचार - षट्दर्शन, तत्व ज्ञान, आवश्यक सूत्र-अर्थ-रहस्य एवं क्रिया।
- 3.गणित - गणना की सरल और शीघ्र पद्धतियाँ, व्यवहारिक गणनाएँ।
- 4.आयुर्वेद - स्वस्थवृत्त (दिनचर्या-ऋतुचर्य-जीवनचर्या), चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अष्टांग हृदय, भाव प्रकाश इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन।
- 5.ज्योतिष शास्त्र - ऋतु ज्ञान, पंचांग, राशि काल, मुहूर्त, चौघडिये, होरा, प्रहर, चंद्र, योगिनी, सन्मुख काल, कुंडली, फलादेश, शगुन-स्वप्न संकेत विद्या, शारीरिक मुद्राओं का प्राथमिक ज्ञान, अष्टांग निमित्त इत्यादि का अध्ययन।
- 6.कौटिल्य का अर्थशास्त्र - संचालन (मेनेजमेन्ट) और नेतृत्व की प्रशिक्षण।
- 7.इतिहास - रामायण, महाभारत, जैन धर्म का इतिहास विभाग 1 से 4 सहित और विश्व की सर्व परम्पराओं का ज्ञान।
- 8.आन्वीक्षिकी विद्या - न्याय विद्या (बुद्धि कथाएँ, शतरंज की क्रीडा, पहेलियाँ)
- 9.नीतिशास्त्र - चाणक्य की नीतिशास्त्र एवं विभिन्न नीतिकथाएँ।
- 10.वास्तुशास्त्र - गृहवास्तु, नगरवास्तु, मंदिरवास्तु, आधारवास्तु।
- 11.पदार्थ ज्ञान और सामान्य ज्ञान - द्रव्य, परमाणु, स्कन्ध, द्रव्य और स्कंध का रूपांतरण,द्रव्य के विभिन्न गुण और विश्व की वर्तमान गंभीर समस्याएँ।
- 12.विविध शास्त्र - शिल्प शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, धातु शास्त्र, भूगर्भ-जल विद्या, तन्त्र शास्त्र, मन्त्र शास्त्र, यन्त्र शास्त्र, धातु शास्त्र, कृषि व पशु शास्त्र, कृषि इत्यादि 100 शिल्प, क्षेत्र विद्या (विश्व दर्शन-भूगोल) बृहद्क्षेत्र समास।
- 13.अध्यात्म विद्या - पंतजली योग दर्शन, अन्य योग- दर्शन, ध्यान, आत्मा का विकास क्रम, सम्यक्त्व व मुक्ति
- 14.व्यवसाय विद्या - लेखांकन (हिसाब), लेन-देन, क्रय-विक्रय, उत्पादन व निर्माण, व्यवस्था व संचालन, प्रचार-प्रसार।
अक्षर ज्ञान न तो शिक्षा का आरंभ है और न अंतिम लक्ष्य। वह तो उन अनेक उपायों में से एक हैं, जिनके द्वारा स्त्री-पुरुषों को शिक्षित किया जा सकता है। फिर सिर्फ अक्षर ज्ञान को शिक्षा कहना गलत है। - गांधी जी
कला
- • चित्रकला - रेखा-चित्र, आकृतियाँ, वास्तविक चित्र, चालीं, ब्यंग चित्र, छाया चित्र, रंगीन चित्र
- • संगीतकला - गायन-विभिन्न रागों का ज्ञान व प्रशिक्षण
- • वादन - सितार, ढोलक-तबला, हार्मोनियम, डफ, मंजीरा, पखवाज, संतूर, वेणुवादन, वायलिन, सारंगी, जलतरंग, इत्यादि
- • अभिनय/नाट्यकला - नृत्य(कथक, रास, दीवानृत्य, बांबुनृत्य, भांगडानृत्य, चामरनृत्य, झांझनृत्य इत्यादि) नाटक, एकांकी नाटक, संवाद, मुखमुद्राएँ और शारीरिक चेष्टाएँ।
- • संभाषण - वक्तृत्व, भाषण, कथन।
- • जादू कला - मूलभूत सिद्धांत व विभिन्न खेल।
- • पाक कला - उबालना, तलना, सेंकना, तडका लगाना, स्वास्थ्य अनुकूल भोजन बनाना।
- • सृजनकला - विविध चीज-वस्तुएँ बनाना एवं सर्जन करना।
- • सिलाई - विविध टांकों का ज्ञान, कांतना, चरखा चलाना।
- • शृंगार - शरीर-शृंगार, मंडप-शृंगार, गृह-शृंगार, मंच-शृंगार।
- • पठन - शीघ्र और प्रभावी पठन का अभ्यास।
- • लेखन - हस्तलेखन, लेख, निबंध कहानी, अहेवाल, योजनापत्र, भाषण, काव्य, नाटक, संवाद
- • अन्य कला - गहूली, रंगोली, अतिथि सत्कार।
आधुनिकता की इस दौड़ में आज समाज के पेशेवर अपराधियों से ज्यादा खतरा सफेदपोश अपराधियों से है। इस देश को चोरों, डकैतों से ज्यादा रईस और पढ़े-लिखे लोग लूट रहे हैं।
कुशलता
साक्षरता विषयक- कुशलता : लेखन, पठन, श्रवण
शरीर संतुलन व प्रशिक्षण और क्रियाएँ –
- • लाठीदाव,
- • कुस्ती,
- • जूडो,
- • कराटे,
- • रोप मलखम,
- • पोल-मलखम,
- • जिम्नास्टिक क्रीडा,
- • सवारी-घुड़ सवारी,
- • बैलगाड़ी,
- • घोड़ागाड़ी इत्यादि चलाना।
सुश्रूषा विषयक –
- • उपचार करना
- • मलिश करना
- • शेक करना
- • पट्टी बांधना
- • लेपन करना
- • पगचंपी
- • शरीर दबाना
बंधन विषयक –
- • विभिन्न किस्म की गांठ बांधना
- • फंदा बनाना
- • नाडा बांधना
- • बक्सा या बंडल बांधना
- • पैकेट बांधना
- • दवाई का पैकेट मोड़ना इत्यादि
प्रतिदिन की दिनचर्या
- • वस्त्र धोना
- • आसन बिछाना
- • अलमारी – पेट्टी को सजाना इत्यादि
गौशाला विषयक -
गौ दोहन, गौवर-थोपन को थेपना इत्यादि
भक्ति विषयक -
आरती उतारना, दीया तैयार करना, दीया जलाना, धूप करना, भगवान की अंगरचना करना इत्यादि
आयोजन -
संचालन विषयक- नेतृत्व, खरीदना, देखभाल करना, यात्रा प्रवास, कार्यक्रम-महोत्सव इत्यादि का आयोजन करना।
अन्य कुशलताएँ -
स्वयं सेवक के लिए प्रशिक्षण (आफत-भूकंप-आग-बाढ़-बीमारी-मृत्यु के समय) आपातकालीन उपचार की तालीम, विविध राष्ट्रीय-सामाजिक-धार्मिक पर्वों की जानकारी-समझ, बाल-मेलों का आयोजन, अखबारों की जानकारी, उद्यापन-कार्य, मिट्टी-कार्य, जल संचय, ऐतिहासिक स्मारकों का प्रवास।
शिक्षा से मेरा मतलब है – बच्चे या मनुष्य की तमाम शारीरिक और आत्मिक शक्तियों का सर्वतोमुखी विकास।
- गांधी जी
झलक
- • निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण
- • बोझ रहित शिक्षा
- • मैकाले शिक्षा का प्रभावशाली विकल्प
- • सक्षम, सशक्त, अडिग, सौम्य, प्राज्ञ, निडर, विनम्र, विवेकी, धैर्यवान् एवं चारित्रवान् व्यक्तित्व का निर्माण।
- • विद्या, कला व कौशल का त्रिवेणी संगम।
- • समग्र और सर्वांगी विकास
- • शुद्ध, विष से मुक्त(रसायनों और कीटनाशकों से रहित) संपूर्ण निर्दोष बल एवं स्वास्थ्य दायक आहार।
- • खान-पान के लिए वर्षा ऋतु में प्राप्त दिव्य जल, वर्षा कालीन जल संचयन के लिए एक लाख लीटर क्षमता की टंकी।
- • पात्र, वस्त्र, आसन, बैठक, शिक्षा, शयन आदि सभी की संपूर्ण भारतीय पद्धति से सुव्यवस्था।
- • घुड़ सवारी, घोड़ा गाडी इत्यादि की प्रशिक्षण और अन्य बहुत कुछ...।
प्रत्येक समस्या आज की गलत शिक्षा की उपज है। आज देश-दुनिया की कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसको गंभीर बनाने में इस पैशाचिक स्कूली शिक्षा की बुनियादी जिम्मेदारी न हो।
युगों से भारत में ज्ञान, विद्या, शिक्षा के विषय में चिंतन एवं प्रयोग होते रहे हैं। भारत ज्ञान का उपासक रहा है। भारत में कहा गया है, 'नास्ति विद्या समं चक्षुः'। शिक्षा के बारे में एक सर्वस्वीकृत सूत्र है 'सा विद्या या विमुक्तये'। विद्या वही है जो मुक्ति प्रदान करे। परंतु आज हम देखते हैं कि विद्या स्वयं मुक्त नहीं है। विद्या बाजार के बंधन में है, विद्या अर्थ के बंधन में है, विद्या शासन के नियंत्रण में है। इन नियंत्रणों से मुक्त नहीं होगी तो शिक्षा शिक्षार्थी को कभी भी मुक्त नहीं कर सकती, इसलिए प्रथम आवश्यकता है शिक्षा को ही बंधनों से मुक्त करने की।
गुरुकुलम् इस दिशा में प्रयास कर रहा है। गुरुकुलम् एक ऐसा शिक्षा केंद्र है जो समग्रता में विचार कर भारतीय शिक्षा का प्रतिमान विकसित करने हेतु प्रयासरत हैं। विगत 22 वर्षों से कुलपति माननीय उत्तमभाई शाह के द्वारा अपने ही चार बच्चों के साथ यह प्रारंभ किया, और समाज में इस शिक्षा का विस्तार संभवतः 500 बच्चों तक पहुंच गया है। शिक्षा के क्षेत्र में विगत 7 वर्ष में अध्ययन, अनुसंधान, पाठ्यक्रम निर्माण आदि कार्य चल रहा है। इस कार्य के साथ-साथ परिवार शिक्षा, शिक्षक शिक्षा, विद्वानों, संघ, संस्था, एवं सभी धर्माचार्यों (संतो) का धूर्वीकरण के क्षेत्र में प्रयास चल रहे हैं।
शिक्षा को ठीक करने के कई प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे हैं। उसी प्रकार छोटे-छोटे पैमाने पर भी अनेकानेक प्रयास हो रहे हैं। ऐसे सभी प्रयासों को संकलित करने का प्रयास भी इस गुरुकुलम् द्वारा धूर्वीकरण के दौरान करना हैं।
आज भारतीय शिक्षा युरोपीय जीवनदृष्टि से पूर्ण रूप से ग्रस्त हो गई है। इसलिए भारतीय ज्ञानधारा का प्रवाह क्षीण हो गया है। भारतीय ज्ञानधारा आज अधिकृत नहीं मानी जाती है। परंतु वह सुरक्षित है देश के सामान्य जन के पास। यह सामान्य जन तुलना में अशिक्षित या कम शिक्षित है। वह पिछड़ा माना जाता है। उसका ज्ञान अधिकृत नहीं माना जाता क्योंकि उसके पास कोई प्रमाणपत्र नहीं है। ऐसे भारतीय ज्ञान को प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है ताकि समाज इससे लाभान्वित हो सकें।
आज शिक्षा से कोई भी संतुष्ट क्यों नहीं है? शिक्षा के बाजारीकरण से कौन से भीषण संकट पैदा हुए हैं? शिक्षित मनुष्य सुसंस्कृत भी होना चाहिए ऐसी अपेक्षा क्यों नहीं रखी जाती है? वर्तमान शिक्षा में किस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है? शिक्षा का दायित्व समाज का है या सरकार का? शिक्षा में उद्योगों की क्या भूमिका है? शिक्षा में सामान्य जन की क्या भूमिका है? क्या शिक्षा आज भी समाज के लिए लाभदायी हो सकती है?
यहाँ विद्या, कला, कौशल, शौर्य एवं पराक्रम की शिक्षा से प्रशिक्षित कर बच्चों के जीवन को संस्कारित किया जाता है। प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी अपनी योग्यता को अपने जीवन का मूलाधार बनाता है। यहाँ ऋषि परंपरा के अनुसार, बिना किसी सरकारी योग्यता प्रमाणपत्र के विद्यार्थियों को शिक्षित किया जाता है।
शिक्षा ऐसी हो जो राष्ट्रीयता का बोध कराए, राष्ट्र प्रेम का पाठ पढ़ाए, ऐसा न हो कि इन महत्वपूर्ण तत्वों को जीवन से विलुप्त कर दिया जाए। मुख्यतः हमारी शिक्षा मस्तिष्क, हाथ, और हृदय तीनों अवयवों का समग्र विकासोन्मुख शिक्षा-प्रणाली होनी चाहिए। जो गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली ही दे सकती है। शिक्षा कला-कौशल एवं पराक्रम से परिपूर्ण हो, जीवन के लिए मोक्ष साध्य होनी चाहिए। “सा विद्या या विमुक्तये” की भावना से ओतप्रोत हो।
गुरुकुलम् में भोजन – व्यवस्था
गोबर के कंड़े और लकड़ी के चूल्हें पर भोजन पकाया जाता है। बारिश का पानी भोजन बनाने एवं पीने में उपयोग किया जाता है। भोजनालय में पीतल व मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाया जाता है। कहा जाता है कि जैसा आहार वैसा विचार और जैसा अन्न वैसा मन।
यहाँ पर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक साधन का कम से कम उपयोग किया जाता है। फ्रीज, ओवन, कुकर, गैस आदि का उपयोग नहीं होता है।
अतः विद्यार्जन के साथ-साथ में विद्यार्थियों के आहार पर भी विशेष ध्यान रखा जाता है। भोजनालय एवं संपूर्ण गुरुकुल के प्रांगण में गोबर और मिट्टी से लिपाई पोताई द्वारा स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। भोजनालय में आसन पर बैठा कर चौकी के ऊपर थाली रख कर पित्तल-कांस्यपात्र में भोजन कराया जाता है। आरोग्य शास्त्र, धर्मशास्त्र, और नीतिशास्त्र की दृष्टि से भोजन बैठकर का करने का विधान है। कारण है कि आरोग्य का मूल आधार हम कैसा
भोजन करते हैं और कितना भोजन ग्रहण करते हैं और कैसे पचा सकते हैं इसी के ऊपर रहा है। अतः योग्य आहार, योग्य समय में और योग्य पद्धति से ही लेना चाहिए। अधिकतर रोग पाचन तंत्र के कमजोरी से ही होते हैं। खड़े-खड़े भोजन करने से पाचन तंत्र निर्बल होता है। आहार का पाचन प्राण वायु की गति बैठकर भोजन करने से जठराग्नि की तरफ होने से पाचन क्रिया सही होती है। लकड़ी के चूल्हे पर बनाया हुआ भोजन अत्यंत स्वादिष्ट होता है। भोजनालय में रासायनिक वस्तुओं का उपयोग नहीं होता है। किसी भी प्रकार का रंग, नींबू का फूल, बेकिंग पाउडर जैसी वस्तुओं का उपयोग नहीं होता है, शाक भाजी से लेकर अनाज तक सभी खाद्य वस्तुएँ जैविक विधि से उपजायी हुई प्रयोग में लाई जाती है। भोजन सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले कराया जाता है जो पूर्ण वैज्ञानिक है। प्रत्येक विद्यार्थियों को प्रतिदिन सुबह भारतीय गायों का उष्णोधर दुग्धपान
यह गुरुकुलम् मूल रूप से प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था को पुनस्थापित कर भारतीय संस्कृति, परंपरा को अक्षुण्ण बनाने तथा सम्पूर्णतया भारत पूर्णोदय की तरफ अग्रसर हैं।
हमारा संकल्प शिक्षा द्वारा भारत का पुनर्निर्माण का है। जो मुख्य रूप से गरीबी एवं महंगाई से, बेकारी और बीमारी से, भय और भ्रष्टाचार से, दुर्व्यसन और हिंसा से मुक्त भारत का निर्माण करें।
सारस्वत चूर्ण के साथ (जिससे बालक मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न होता हैं) कराया जाता है। प्रतिदिन स्थानीय लोगों को निःशुल्क छाछ का वितरण किया जाता है। सदैव ऋतु अनुकूल एवं आयुर्वेदिक नियमों को ध्यान में रखते हुए भोजन की व्यवस्था की जाती है। भोजनोपरान्त पाठशाला की बर्तनों की सफाई उपलों के राख द्वारा की जाती हैं।
आधुनिक परिवेश में शिक्षा का भारतीयकरण हो इस उद्देश्य के साथ वर्षों से विद्वज्जन, संस्था, संगठन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली के विस्तार हेतु देशभर में विभिन्न संस्थाये, संगठन एवं विद्वज्जनों, तथा साधु-संतों से सम्पर्क करके ध्रुवीकरण का प्रयास किया जा रहा है।
- 1. 'भारतीय शिक्षा करणीय कार्य एवं हमारा कर्तव्य' ऐसे विषयों पर सेमिनारों का आयोजन
- 2. 'भारतीय संस्कृति, संरक्षण एवं समृद्धि' हेतु त्रि-दिवसीय सेमिनारों का आयोजन।
- 3. देश की विभिन्न संस्थाओं, संगठनों एवं विद्वानों की संगोष्ठि द्वारा गुरुकुलीय शिक्षा विस्तार विषयक चर्चा विमर्श।
- 4. देश के सभी धर्म एवं संप्रदाय के अग्रणियों(जिस में सभी धर्माचार्यों) को बुलाकर गोष्ठि का आयोजन करना।
- 5. विभिन्न राज्यों एवं शहरों में आयोजित सेमिनार एवं गोष्ठिओं में गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली का प्रचार-प्रसार।
उपरोक्त कार्यों की फलश्रुति के रूप में अधिकांश महानुभावों ने गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली के पक्ष में समर्थन देते हुए गुरुकुलम् के प्रकल्प का सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार के प्रकल्प का विस्तार राष्ट्रीय स्तर पर करने का संकल्प लिया एवं स्वयं कटिबद्ध होने का शुभभाव भी प्रगट किया।
भारतीय शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, वैसी होनी चाहिए, बहुत लोगों ने बहुत कुछ पढ़ा-लिखा-सुना परंतु व्यवहारिक, प्रायोगिक रूप से समाज के समक्ष प्रस्तुत यह अद्भुत गुरुकुलीय शिक्षा प्रकल्प एक सराहनीय कार्य हैं ऐसा सभी का अभिप्राय रहा।
प्रस्तावना
अपने ही हाथों अपना नाश!
अंग्रेज तो इस देश से चले गये, लेकिन जाने से पहले विश्वविद्यालयीन शिक्षा द्वारा हजारों देशी अंग्रेज उन्होंने तैयार कर दिये थे। इस देश की धरती पर निरंतर अपना स्वामित्व बनाए रखने के लिए इनके पास एक ही उपाय था कि 'देश की प्रजा को हर तरह से बर्बाद कर दो, और इसके लिए उनकी संस्कृति का सर्वनाश करो!'
यह कार्य यदि विदेशी लोग करने जाएं तो यहाँ की प्रजा क्रुद्ध होकर विप्लव कर बैठेगी, इसलिए इस देश के लोगों के हाथों ही इस सर्वनाश के कार्यक्रम पर अमल करवाना अनिवार्य था। इसलिए देशी अंग्रेजों को तैयार किया गया। आज तो इन उपाधिधारक (डिग्रीवाले) पश्चिम- परस्त देशी अंग्रेजों की संख्या लाखों-करोड़ो तक पहुँच गई है।
इन देशी अंग्रेजों ने जाने-अनजाने प्राप्त हुए शैक्षिक पश्चिमी उन्नाधिकारी के कारण संस्कृति के सभी क्षेत्रों के मूल पर आघात कर दिया है। मोक्षलक्ष्मी संस्कृत-वृक्ष से सभी अंगों को उन्होंने जड़ से हिला दिया है।
श्री वेणीशंकर मुरारजी वासु बताते हैं कि सांस्कृतिक तत्वों को पश्चिम-परस्त रहस्यमय और अनपढ़ नीति-रीति के वर्तमान वेग से भी नष्ट करने का कार्य चालू रखा जाए तो भारतीय प्रजा के सांस्कृतिक अस्तित्व की आयु शायद सौ-दौ सौ वर्ष से अधिक नहीं रहेगी।
श्री वासु की विचारधारा भारतीय प्रजा के किसी भी स्तर के नेताओं के रूप में गिने जानेवाले सभी भाईयों तक पहुँचे तो मुझे लगता है कि उनके मस्तिष्कों में विदेशी एजेण्टों ने जो गलत विचार भर दिए हैं, वे
सब जड़ मूल से उखड़ जाएँगे और वे इस देश व समाज के उत्थान में अमूल्य योगदान देने में सक्षम होंगे।
पंन्यास चंद्रशेखरविजय जी (श्री वासु के पुस्तकों की प्रस्तावना में से)
अंग्रेजों ने पाठ्य पुस्तकों द्वारा इस प्रकार भाष्रक इतिहास की परम्परा बनाकर तथाकथित देशी अंग्रेजों के एक वर्ग को पैदा कर, जाने से पहले यहाँ छोड़ दिया। इस गलत इतिहास के बल पर, इस देश के दो टुकड़े कर दिये गए, इतना ही नहीं भविष्य में ज्यादा टुकड़े होते रहें।
लॉर्ड मैकाले द्वारा 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में बोले हुये शब्द:
“मैंने भारत की लम्बाई और चौड़ाई तक पूरा भ्रमण किया तथा एक व्यक्ति को भी नहीं देखा जो भिखारी और चोर हो। मैंने इतनी सम्पत्ति को इस देश में देखा, इतने ऊँचे नैतिक आदर्श, इतने योग्य लोग, मैं नहीं सोचता कि हम इस देश को जीत पायेंगे जब तक कि हम इस देश की रीढ़ की हड्डी जो कि इसकी आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक परम्परा है, को नहीं तोड़ देते हैं। इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हमें उनकी पुरानी व प्राचीन शिक्षा प्रणाली व संस्कृति को बदलना होगा। क्योंकि यदि भारतीय सोचते हैं कि, जो कुछ विदेशी तथा अंग्रेजी वस्तु है, वह अच्छी तथा उनकी अपनी वस्तुओं से बेहतर है तो वे अपना आत्म-सम्मान, अपनी नैसर्गिक संस्कृति को खो देंगे तथा वे वही बनेंगे जो हम चाहेंगे, एक सचमुच का गुलाम देश।”
A black and white portrait of Lord Macaulay, a British statesman and historian. He is shown from the chest up, wearing a dark coat and a white cravat. He has a serious expression and is looking slightly to the left. Below the portrait is his signature, which appears to read 'M. Macaulay'.
अंग्रेजों के झूठ
आर्य प्रजा का उद्भव इसी देश में हुआ था। “आर्य लोग उत्तरी ध्रुव की ओर से भारत में बंजारा जाति के रूप में आए थे और द्रविड़ प्रजा को पराजित कर, इस पर उन्होंने अपना प्रभुत्व जमा दिया,” ये अंग्रेजों की कपोलकल्पित बातें हैं, मनगढ़ंत बातें हैं। ऐसे करने के पीछे उनका ध्येय यह था कि ‘कभी भी आर्य प्रजा उनसे कहे कि आप लोग विदेशी हैं, अतः भारत छोड़कर चले जाएँ,’ तो उन्हें कह सकें कि ‘तुम लोग भी विदेशी हो, इस देश के मूल निवासी तो वास्तव में द्रविड़ ही हैं।’
आर्य प्रजा लाखों वर्षों से यहीं की निवासी है। उसका क्रमबद्ध इतिहास भी है। लेकिन उन तमाम बातों को दबाकर, अंग्रेजों ने भ्रामक प्रचार शुरू कर दिया कि ‘आर्य, उत्तरी ध्रुव की ओर से आई बंजारा टोलियों के ही वंशज हैं,’ अंग्रेजों ने पाठ्य-पुस्तकों द्वारा इस प्रकार भ्रामक इतिहास की परम्परा बनाकर तथाकथिक देशी अंग्रेजों के एक वर्ग को पैदा कर, जाने से पहले यहाँ छोड़ दिया। इस गलत इतिहास के बल पर, इस देश के दो टुकड़े कर दिये गए, इतना ही नहीं भविष्य में ज्यादा टुकड़े होते रहें।
अंग्रेजों ने 150 वर्षों से भी कम समय में गलत इतिहास और भ्रामक शिक्षा द्वारा हिन्दुओं की भव्यता, धर्म, संस्कृति, चरित्र और गौरव का खंडन कर, अंग्रेजी संस्कृति के आराधक वर्ग को तैयार कर लिया। यह अल्पसंख्यावाला वर्ग 60 करोड़ जैसी विराट बहुसंख्यक प्रजा के सिर पर विदेशी संस्कृति, आचार-विचार, रहन-सहन, रुचि-अरुचि, विचारशैली और अर्थ-व्यवस्था थोप देने के लिए रात-दिन प्रयत्नशील रहा। इससे बढ़कर और क्या अत्याचार हो सकता है? स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद यह आसुरी प्रवृत्ति अधिक बढ़ पाई है क्योंकि स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद भी अंग्रेजों ने हमारा सत्यानाश करने के उद्देश्य से शिक्षा नामक जो सुरंग दाग दी हैं, उसने शिक्षा क्षेत्र में से भारतीयता का नामोनिशान मिटा दिया हैं।
शिक्षा का ध्येय
देश की सही प्रगति का मूलाधार शिक्षा है। शिक्षा में चरित्र निर्माण करने की, मोक्षलक्ष्यी होने की और आसुरी बलों पर विजय पाने की क्षमता होनी चाहिए। वर्तमान सरकार के लिए प्रगति का मापदंड हिंसा, भ्रष्टाचार और शोषण द्वारा साध्य विशिष्ट वर्ग की आर्थिक उन्नति ही हैं।
इतिहास शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। इतिहास द्वारा प्रजा का चरित्र निर्माण होता है। गलत इतिहास से हीनग्रंथि पैदा की जा सकती है। प्रजा विदेशियों की मुहताज ही बनी रहे, उसे इतनी कायर भी बनायी जा सकती है। हमारी प्रजा भी इसी बात का दृष्टान्त है।
अँधेरे में जाती भारत की शिक्षा प्रणाली
A photograph showing a large group of school children sitting on the ground in an outdoor area, possibly a school courtyard or a temporary classroom. They are arranged in rows, facing towards the left. Some children are looking towards the camera, while others are looking towards the teacher. A teacher in a blue shirt is standing on the left side of the frame, near a brick wall. There are some books and bags on the ground near the children. A large, leafy tree is visible in the background, providing shade. The setting appears to be a rural or semi-rural area.
भाषा द्वारा मानस परिवर्तन
ट्रेवेलियन के मतानुसार अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से मुक्त रहे हिन्दू और मुसलमान भी अंग्रेजों को अपवित्र राक्षस समझते थे और उन्हें हटा देने के षड्यन्त्र बनाते थे। लेकिन जहाँ-जहाँ अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव फैलता गया वहाँ-वहाँ भारतवासियों का मानस परिवर्तन होता गया। वे अंग्रेजों को अपने महान उपकारक, उद्धारक और बलवान मित्र समझने लगे हैं। उन्हें संकीर्णता के लिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी और भक्तिभाव रखने लगे हैं। देश का नसीब केवल
अंग्रेजों की सहायता और रक्षा से ही उदीयमान होगा, ऐसी मान्यता का प्रचार करते हैं।
आगे चलकर सर चार्ल्स ट्रेवेलियन बताते हैं कि जो युवक हमारी शाला में शिक्षा लेते हैं, वे अपने पूर्वजों और अभिभावकों का तिरस्कार करने लगे हैं। तदुपरांत वे अपनी राष्ट्रिय संस्थाओं को अंग्रेजियत का स्वरूप दिलाने के लिए कटिबद्ध होने लगे हैं। अंग्रेजों को उखाड़ कर समुद्र में फेंकने के बजाय भारत के लिए अंग्रेजों की शिक्षा और रक्षा दोनों बातें अनिवार्य बन गई हैं, ऐसी मान्यता के समर्थक बन गये हैं।
ट्रावेलियन कहते हैं –‘मैंने हिन्दुस्तान के ऐसे प्रदेश में वर्षों का समय गुजारा है, जहाँ अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का प्रारंभ नहीं हुआ। वहाँ के लोग अंग्रेजों का कट्टर दुश्मन मानते हैं और उन्हें खत्म कर देने के उपाय सोच करते हैं।’
‘परंतु मैं जब बंगाल में गया तब वहाँ हमने अंग्रेजियत से रंग देने के कारण वहाँ के शिक्षित भारतवासी अंग्रेजों का गला घोटने के बदले अंग्रेजों के साथ ज्यूरी में बैठने में और बैंच मजिस्ट्रेट बनने में धन्यता का अनुभव करते हैं।’
पुरानी प्रणालियों की ताकत का भय
आगे ट्रेवेलियन लिखते हैं कि ‘यदि भारत की प्राचीन रीतियाँ व नीतियाँ एवं उनकी शिक्षा और साहित्य के अस्तित्व को यथाशीघ्र नामशेष न कर दिया तो संभव है कि कभी क्षणमात्र में ही भारत से हमारा अस्तित्व मिट जायेगा।’
शोध समिति के अध्यक्ष ने ट्रेवेलियन से पूछा था कि, ‘आप की योजना का अंतिम ध्येय भारत और इंग्लैण्ड के बीच राजनैतिक संबंध का विच्छेद करना है या हमेशा के लिए उसे सुदृढ़ करना है?’
ट्रेवेलियन ने इसका उत्तर दिया था कि, 'मुझे पूर्ण विश्वास है कि भारतवासियों को अंग्रेजी शिक्षा देने से आखिरी परिणाम यह निकलेगा कि उनके इंग्लैण्ड से अलग हो जाने का काम अनंतकाल तक असंभव बन पाएगा'।
'इसके विपरीत मेरा दृढ़ ख्याल यह है कि यदि भारतवासियों की शिक्षा प्रणाली को यथावत् छोड़ दिया जाए तो किसी भी दिन हम यहाँ से बहुत जल्द खदेड़ दिये जायेंगे'।
'मैंने बारह साल तक भारत में निवास किया है। प्रथम छह साल उत्तर भारत में गुजारे, जहाँ अंग्रेजी शिक्षा का इतना बोलबाला न था, लेकिन उनकी प्राचीन परंपराएं और शिक्षा कार्य जारी थे, जिससे वे अंग्रेजों को अपना जानी दुश्मन मानते और उन्हें हटा देने के लिये षड्यन्त्रों का आयोजन करते। जहाँ तहाँ भारत में से हमें खदेड़ देने की ही बातें सुनाई देती'।
'लेकिन मैं कलकत्ता आया। वहाँ अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण दूसरे ही हालात देखने को मिलें। लोग हमें उखाड़ फेंकने के बजाय, स्वतंत्र अखबार निकालने का, नगरपालिकाओं की स्थापना और अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार कर अधिकाधिक सरकारी नौकरियाँ प्राप्त करने आदि के बारे में ही सोचते थे। वे वास्तव में पूरे अंग्रेज-परस्त बन गये थे'।
वह प्रसिद्ध पत्र – (Sir Charles Trevelyan before parliamentary Committee of 1853)
ई.स. 1853 की इस सर्वांगीण सोच विचार के बाद इस कंपनी के नियामकों ने 16 जुलाई, 1854 के रोज 'एज्युकेशनल डिस्पेच' के नाम से प्रसिद्ध हुआ पत्र गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी पर भिजवाया।
इस पत्र में नियामकों ने लिखा था कि 'शिक्षा की इस नई योजना का आशय शासनतंत्र के प्रत्येक विभाग को विश्वसनीय और काबिल नौकर-कलर्क दिलवाने का है। उसका दूसरा हेतु यहा है कि इंग्लैण्ड के उद्योग-धंधों के लिए जिन अनेक