हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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के साथ भी बड़ी लड़ाई रही। इन पहाड़ियों का मुखिया बालेछा जाति का मूंजा नामी एक राजपूत था जिसके साथ लड़ाई करने में एक बार अजयसिंह बहुत घायल हुए। इस समय अजयसिंह के दो पुत्र सजनसी और अजीतसी भी थे जिनकी आयु अनुमान १५ वर्ष की थी परंतु वे कुछ भी वीरता लड़ाई में न दिखा सके। इससे उन्होंने अपने भतीजे हम्मीरसिंह को बुला लिया और उनको सब वृत्तांत कह सुनाया। हम्मीरसिंह अपने दोनों चचेरे भाइयों से बड़े न थे परंतु तो भी उन्होंने मूँजा बालेछा का सिर काट लाना ऐसा विचार निश्चय करके वे निकले। थोड़े दिनों में उन्होंने मूंजा का सिर काट लाकर अपने काका को भेंट किया। अजयसिंह इस बात से बहुत प्रसन्न हुए, और मूँजा के ही रुधिर से तिलक करके अपने पीछे हम्मीरसिंह को राज्य का अधिकारी ठहराया। जब अजयसिंह मरे तो उनसे पहले ही अजमाल मर चुके थे। सजनसी गद्दी के लिये हम्मीरसिंह को अधिकारी नियत हुआ देख दक्षिण में चले गए, जिनके वंश में एक ऐसा वीर पुरुष जन्मा कि जिसने मुसलमानों से पूरा बदला ही न लिया किंतु अपने असामान्य पराक्रम और साहस से मुसलमानी राज्य का मूलोच्छेदन ही कर दिया। यह पुरुष मरहठों के राज्य की नींव जमानेवाला सितारे का राजा शिव जी था जो समस्त भारतवर्ष में विख्यात है। सजनसी से बारहवीं पीढ़ी में यह हिंदू धर्म्मरक्षक और अतुलित पराक्रमो वीर पुरुष शिव जी हुआ है। सजनसी जी से पीछे दुलीपजी, सीओजी, भोराजी, देवराज, उग्रसेन, माहुल जी, खेलुजी जनकोजी, संतोजी, शाहजी और शिव जी हुए। अजयसिंह के पीछे हम्मीरसिंह सं० १३०१ ई० में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय मेवाड़ की गिरती दशा होने से आस-पास के राजा लोगों ने मेवाड़ के राणाओं को अपना शिरोमणि मानना छोड़ दिया था। हम्मीरसिंह ने अपने पहाड़ी साथियों को इकट्ठा करके जिन जिन राजाओं ने इनको अधिष्ठाता मानना छोड़ दिया था उन सभों को परास्त करके अपने अधीन किया। इस प्रकार
( ६३ ) थोड़े दिनों में हीं हम्मीरसिंह ने अपना गौरव आस पास के राजाओं पर जमा लिया। अब चित्तौर को किस विधि लूँ इस विचार में हम्मीरसिंह पड़े। “हम्मीरसिंह ने चित्तौर के आस-पास का सारा देश लूटकर उजाड़ डाला, अकेला चित्तौर ही मुसलमानों के अधीन रह गया था। किसी प्रकार उसे लूँ, यही हम्मीरसिंह का दृढ़ विचार था। एक दिन उन्होंने अपने सब मनुष्यों को बुलाकर कहा कि "भाइयो ! जिसे जीने की इच्छा हो, जिसे संसार के इन क्षणिक सुखों के बदले स्वर्ग का सुख छोड़ देना हो, जिसे अपनी प्रतिष्ठा की अपेक्षा प्राण प्यारे हों, जिसे अपने उग्र वैरी मुसलमानों का डर हो, जिसे अपनी गई हुई भूमाता को तुर्कों के हाथ में से निकाल लेने की हौस न हो और जिसको इस अर्वली पर्वत की झाड़ो जंगलों में सदा पड़े रहने की इच्छा हो, वह भले ही सुख से इस अर्वली की विकट गुह्य गुफाओं में रहे, यह मेरी आज्ञा हं । जो मेरी भुजा मे बल होगा तो तुम्हारे चले जाने पर भी अपने कुलदेवता की सहायता स अकेला भी चित्तौर को लूँगा । तुम लांग सुख से जाओ और जो ईश्वर-इच्छा से मैं चित्तोर को जल्दी ले सका तो तुमको पाछे बुला लूँगा, उस समय आ जाना ।” हम्मीरसिंह के मनुष्यों में राजपूत भी थे परंतु अधिक तो आसपास के भील लोग थे । उन लोगों ने बालकपन से ही हम्मीरसिंह का पराक्रम देख रखा था और निरंतर उनके साथ रहने से वे भी राजपूतों के समान ही साहसी और पराक्रमी हो गए थे और हम्मीरसिंह के चाल-चलन तथा व्यवहार से ही वे लोग ऐसे प्रसन्न थे कि यदि वे कहते तो प्राण देने को वे लोग उद्यत हो जाते । हम्मीरसिंह के उपरोक्त वचनों का उत्तर उन लोगों ने इस प्रकार दिया—"हम मरेंगे अथवा शत्रुओं को मारेंगे परंतु अपने राजा को छोड़कर कभी पीछे न हटेंगे, हम अपने कुल को कलंकित न करेंगे, हम अपने शत्रुओं के हाथ में से अपनी भूमाता को छुड़ाने के लिये अपने प्राण देंगे और इस जगत् के क्षणस्थायी सुखों को छोड़ स्वर्ग
( ६४ ) का सदैव सुख भोगेंगे ।” इस प्रकार वे एक स्वर होकर बोले कि मानो एक साथ मेघ की गर्जना हुई । हम्मीरसिंह ने इन वीर राजपूतों के ऊपर पुष्पों की वृष्टि करके कहा “धन्य हो मेरे प्यारे ! धन्य हो ! धन्य हो क्षत्रिय-पुत्रो ! धन्य हो ! ऐसे ही उत्तर की मैं आशा रखता था और सोही अंत को मिला । तुम लोगों की शुभचिंतकता से मैं अपनी भूमाता को छुड़ा सकूँगा । तुम्हारी राजभक्ति और तुम्हारी एकता देख, तुम्हारा साहस और पराक्रम देख हमारे कुलदेवता हमारे सहायक होंगे । और मुझे निश्चय है कि हमारा मनोरथ सिद्ध होगा; इसलिये प्यारे वीर पुरुषो, तैयार हो जाओ । अपने बाल-बच्चों को इस पहाड़ की सुरक्षित गुफा में छोड़ आओ और उनकी सब प्रकार रक्षा होती रहे इसके लिये पाँच सहस्र वीर भीलों को नियत कर चलो ।” हम्मीरसिंह के इन वाक्यों को सुनकर सर्वत्र जय जयकार होने लगी । उक्त प्रकार के प्रबंध करके वे सब चित्तौर के लिये पहाड़ों से उतर पड़े । “इस समय हम्मीरसिंह के पास पाँच हजार से कुछ अधिक मनुष्य थे तथापि, ‘एक मराऊ सौ को मारे’ इस कहावत के अनुसार वे पाँच लाख के समान थे । उन्होंने चित्तौर के चारों ओर का देश लूट लिया, ग्राम जला दिए, मुसलमानों को पकड़ लिया। चारों ओर अशांति रहने से व्यापारी व्यापार से और किसान खेती करने से रुक गए । मुसलमान लोग अपनी प्रजा का रक्षण न कर सके । इससे प्रजा का समूह हम्मीरसिंह के अधीन हो बसने लगा । इस समय हम्मीरसिंह की रहन सहन अर्वली पर्वत की चोटियों पर केलवाड़े में थी । वहाँ जाने का मार्ग बड़ा बेड़ा था । शत्रुओं के अधिकार कर लेने योग्य कदापि न था । अर्वली पर्वत के भीतरी गुप्त स्थलों को वहाँ से भाग जाने का मार्ग पृथक् था । ये गुप्त स्थल पहाड़ों की घनी झाड़ियों में होने से बड़े विकट थे । वहाँ इतने फलादि खाने योग्य पदार्थ उत्पन्न होते थे कि वर्षों तक सहस्रों मनुष्यों का निर्वाह हो सकता था । केलवाड़े से पश्चिम ओर का मार्ग खुला था जहाँ
( ६५ ) होकर गुजरात और मारवाड़ का माल व्यापारी लाते थे तथा मित्रता रखनेवाले भीलों से भोजन की बड़ी सहायता मिलती थी । बाल बच्चों की रक्षा के लिये जो पाँच सहस्र भील नियत थे वे आवश्य- कतानुसार रसद पहुँचा जाते थे । अच्छी तरह सोच समझ के और चतुराई से हम्मीरसिंह ने अपने लिये निर्भय स्थान ढूंढ़ा था । परंतु हम्मीरसिंह की बुद्धि को भला उनका दुर्दांत शत्रु अलाउद्दीन कैसे सह सकता था । वह सैन्य लेकर स्वयं आया और उसने अर्वली का पूर्व भाग जीत लिया । परंतु इससे हम्मीर की कुछ भी हानि न हुई । बादशाह ने अर्वली का पूर्वी भाग जीत लिया तो वे दक्षिण भाग में धूम मचाने लगे । अंत में अलाउद्दीन थक गया और हम्मीरसिंह को अधीन करने का काम चित्तौर के सूबेदार मालदेव को सौंप आप दिल्ली को लौट गया । मालदेव अपने बल से तो हम्मीरसिंह को वश में कर न सका, छल से उनको वश में लाने तथा उनके अपमान करने का विचार कर अपनी पुत्री के विवाह कर देने के बहाने से उसने हम्मीरसिंह के पास नारियल भेजा । हम्मीरसिंह ने अपने संपूर्ण राजपूत लोगों तथा साथियों से इस विषय में संमति ली तो उन सभों ने इस संवंध के स्वीकार करने का निषेध किया, परंतु हम्मीरसिंह ने कहा कि "भाइयो मेरी समझ में तो यही आता है कि तुम सब भूल रहे हो । तुम लोग जो भय बतलाते हो उससे मैं अजान नहीं हूँ परंतु राज- पूत होकर किसी के डर से अपना निश्चय किया हुआ कार्य्य छोड़ देना यह बड़ी कायरता है । यह राजपूत का नहीं किंतु दासीपुत्र का काम है । राजपूतों को तो सदा दुःख के समय के लिये कटिबद्ध रहना चाहिए । राजपूतों को तो एक बार घायल होकर घर भी छोड़ना पड़ता है, और एक बार बाजे गाजे के साथ गद्दी पर भी बैठना पड़ता है । जो भेजा हुआ यह टीका न स्वीकार करूँ तो मेरी माँ की कोख कलंकित होवे । मेरे शूर वीर भाइयो ! मैं यह जानता हूँ कि तुम लोग अपने प्राणों की अपेक्षा मेरे प्राणों की अधिक चिंता ६
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रखते हो परंतु इसमें तुम्हारी भूल है। घर में बैठे बैठे सवा मन रुई के गद्दे पर सोते सोते और बातें करते करते सैकड़ों मनुष्य मर जाते हैं, यह हम सभों से छिपा नहीं है। क्या यह तुम समझते हो कि जो इस संसार का मारने वा जिलानेवाला है वह हमको जो डर- कर घर में छिप जावेंगे तो न मारेगा। और जो उसे जीवित रखना होगा तो हमारा नाम मिटानेवाला कौन है? इसलिये घर में निकम्मे पड़े पड़े मर जाने से तो शत्रु को मारते मारते मरना ही श्रेष्ठ है, नहीं तो जीना भी किस काम का है। भला इस बहाने से जिन स्थानों में मेरे बाप दादे रहते थे, जिन किलों के ऊपर मेरे बाप दादों के झंडे फहराते थे, जिन जंगलों में मेरे बाप दादों के शरीर का रुधिर बह चुका है, वे स्थल, वे गढ़ और राजमहल तो देखने को मिलेंगे। मेरे बाप दादे जिन स्थानों में मरे हैं वहीं मैं भी मरूँगा, उनके साथ मैं भी स्वर्गधाम पाऊँगा। कहीं हमारे कुल देवताओं ने ही अथवा हमारी भूमाता ने ही इस बहाने से मुझे वहाँ बुलवाया हो। कदाचित् उनकी इच्छा यहो हो कि मैं वहाँ जाऊँ, इसलिये वहाँ जाने से वे भी हमारी सहायता अवश्य करेंगी। भाइयो! मेरी इच्छा है कि नारियल को स्वीकार करना चाहिए। उनके बचन सुनते ही सब लोगों में वीर-रस उमड़ आया और यह बात सबने स्वीकार कर ली और हम्मीरसिंह ने पाँच सौ सवार लेकर चित्तौर जाने का विचार कर लिया। हम्मीरसिंह अपने छुँटे छुँटाए पाँच सौ सवार लेकर चित्तौर के निकट पहुँचे, उस समय मालदेव के पाँच लड़के उनकी अगवानी को आए। द्वार पर तोरण बँधा हुआ न देखा, तथा नगर में कोई धूमधाम और विवाह की तैयारी न देखी, इससे उन्होंने मालदेव के पुत्रों से पूछा कि क्यों क्या बात है, विवाह की कुछ धूमधाम नहीं दीखती। वे कुछ उत्तर न दे सके। इससे हम्मीरसिंह क्रोध में भरे हुए चित्तौर में जाकर दर्बार में बैठ गए। हम्मीरसिंह का कोप और उनके मनुष्यों के लाल मुख देख मालदेव के देवते कूँच कर गए। उनके पकड़ लेने की तो सामर्थ्य कहाँ थी पाँच सौ
२. द्वितीय भाग: मंगोल विद्रोही महिमाशाह को शरण एवं शरणागत धर्म प्रतिज्ञा
( ६७ ) वीर नंगी तलवारें लिए अडिग जमे हुए थे, वहाँ किसकी सांमर्थ्य थी जो हम्मीरसिंह की ओर देख सके । हम्मीरसिंह अकेले भी माल- देव और उसके पाँच पुत्र के लिये काफी थे । मालदेव ने डरकर अपनी पुत्री के साथ हम्मीरसिंह का पाणिग्रहण कर दिया । उस लड़की ने हम्मीरसिंह को चित्तोर लेने की यह युक्ति बतलाई कि आपको जिस समय दहेज दिया जाय, उस समय आप उस वृद्ध महता को जो मेरे पिता का बड़ा चतुर सेवक है अपने लिये माँग लेना । निदान यही हुआ । इस भाँति विवाह करके हम्मीरसिंह अपने घर को लौटे । केलवाड़े में लोग बड़े अधीर हो रहे थे परंतु हम्मीर- सिंह को कुशलपूर्वक लोट आया देख लोग आनंद में मग्न हो गए । “इस रानी से हम्मीरसिंह के खेतसा नामक पुत्र जन्मा। जब खेतसी एक वर्ष का हुआ तो उसकी माता ने अपने वाप को लिखा कि मुझे अपने क्षेत्रपाल देवता के पगों लगना है, इसलिये मुझे वहाँ बुला लो । मालदेव उस समय मेर लोगों के साथ लड़ने को गया हुआ था, इससे उसके भाइयों ने अपनी बहिन को बुला लिया । इस प्रकार हम्मीरसिंह की स्त्री, उनका पुत्र और कुछ मनुष्य चित्तौर में प्रविष्ट हुए । उसी बूढ़े महता के यत्न से जो कि मालदेव के यहाँ सेना का अध्यक्ष रह चुका था, और अब हम्मीरसिंह के यहाँ रहता था यह परिणाम निकला कि चित्तौर की संपूर्ण राजपूत सेना हम्मीरसिंह के पक्ष में हो गई । हम्मीरसिंह को गद्दी पर बिठाने के समाचार भेजे गए । हम्मीरसिंह आगे से ही सावधान होकर आस पास फिरते रहते थे । यह समाचार पाते ही आ निकले, परंतु इतने ही में शत्रु की सेना भी लड़ने को आ गई । इस समय हम्मीरसिंह के पास थोड़े और शत्रु के पास बहुत से मनुष्य थे परंतु बड़े पराक्रम के साथ अपनी तलवार का स्वाद चखाते हुए हम्मीरसिंह सबको परास्त करके विजय प्राप्तकर चित्तौर में आ गद्दी पर बैठ गए । “अलाउद्दीन उस समय मर गया था और मुहम्मद तुगलक उस समय बादशाह था । मालदेव यह देखकर कि चित्तौर छिन गया
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और बिना बादशाही मदद के फिर मिलना कठिन है, दिल्ली को भाग गया। “चित्तौर के गढ़ पर राणा जी का झंडा फहराता हुआ देख पहाड़ों में से आसपास के ग्रामों में से तथा गुप्त स्थानों में से निकल निकलकर टिड्डी दल की भाँति लोग चित्तौर में घुसने लगे। चित्तौर में से मुसलमानों का राज्य उठ गया और राजपूतों का आ गया, यह सुनकर लोग आनंद मग्न हो गए और दूर दूर से वहाँ आने लगे। छोटे और बड़े सब ही लोग मुसलमानों से बदला लेने की उमंग के साथ आ एकत्रित हुए। जो इस समय मुसलमानों की सेना चित्तौर लेने को आवे तो उसे कुचल डालो ऐसा वचन सबके मुख से निकलने लगा। हम्मीरसिंह को सेना की कमी न रही। मुसलमानों से युद्ध करने की उमंग में चित्तौर में झुंड के झुंड सहस्रों मनुष्य फिरने लगे। सब कहने लगे कि जो मुसलमानी सेना ऐसे समय में लड़ने को आ जावे तो उसकी अच्छी दुर्गति हो और वे जो कह रहे थे सो ही हुआ। मुहम्मद अपने छिने हुए राज्य को लौटाने को आया। हम्मीरसिंह के पास बिना बुलाए सहस्रों मनुष्य मुसलमानों के प्राण लेने को आ उपस्थित हुए और उनके उत्साह को देख राणाजी तत्काल चित्तौर से बाहर लड़ने के लिये निकले। सिंगोली स्थान के निकट बड़ा संग्राम हुआ। सारांश यह है कि राजपूतों ने इस उत्कटता से युद्ध किया कि मुसलमानों का एक भी मनुष्य दिल्ली को लौटकर न जाने दिया। “इस लड़ाई में स्वयं मुहम्मद पकड़ा गया। मालदेव का पुत्र हरीसिंह हम्मीरसिंह के साथ द्वंद्व युद्ध करता हुआ मारा गया। मुहम्मद को तीन महीने तक हम्मीरसिंह ने बँधुआ बनाकर रखा। पीछे मुहम्मद ने अजमेर, रणथंभौर, नागौर आदि पर्गने सौ हाथी और पचास लाख रुपया देकर छुटकारा पाया। “हम्मीरसिंह का बड़ा साला बनवीरसिंह उनके पास नौकरी के लिये आया। राणा जी ने उसे सत्कारपूर्वक अपने पास रखा और
( ६६ ) उसके निर्वाह के लिये नीमच, जीरण, रतनपुर और कीरार ये पर्गने जागीर में दिए । जागीर देते समय राणा जी ने उससे कहा कि 'यह जागीर भोगो और प्रामाणिक रीति से चाकरी देते रहो । तुम एक समय तुरकों के पादसेवी थे परंतु अब तो अपनी ही जाति के, स्वधर्मवाले के तथा अपने सगे संबंधी के नौकर हो । जिस भूमि के लिये मेरे बाप दादों तथा सहस्रों शुभचिंतक पुरुषों ने अपना रुधिर बहाया था उस भूमि को फिर लौटा लेने का मेरे ऊपर ऋण था सो मैंने कुलदेवताओं की कृपा से लौटा लिया। तुम अब से तुर्क के नौकर न रहकर राजपूत के हुए सो ईमानदारी से काम करना।' बनबीर भी वैसा ही ईमानदार निकला । उसने मरते समय तक शुद्ध चित्त से सेवा की और चंचल नदी के ऊपर का भीनौर ग्राम जीतकर मेवाड़ में मिलाया । “जब से चित्तौर को मुसलमानों ने ले लिया था तभी से मेवाड़ के राणाओं की प्रतिष्ठा घट गई थी । भरतखंड के समस्त देशी राज्यों में मेवाड़ के राणा शिरोमणि गिने जाते थे परंतु चित्तौर के निकल जाते ही इसमें बाधा पड़ गई थी । जो राजा कर देनेवाले थे उन्होंने कर तथा गद्दी पर बैठते समय भेंट, और आवश्यकता के समय पर सेना द्वारा सहायता करना आदि सब बंद कर दिया था । उस समय संपूर्ण क्षत्रिय राज्य निर्बल थे । उनको किसी के आश्रय की आव- श्यकता थी । जब तक चित्तौर में राणा रहे वे लोग उनके आश्रय में रहे परंतु चित्तौर निकल जाने से वे दिल्ली के बादशाहों के अधीन हो गये, परन्तु राणा हम्मीर सिंह जी ने फिर से इस प्रवाह को फेरा । उन्होंने चित्तौर को मुसलमानों से छीनकर उन फेरफारों को फिर ज्यों का त्यों कर दिया जिन्हें कि मुसलमानों ने अपने राज्य समय में कर डाला था । देश के संपूर्ण क्षत्रिय राजा मुसलमानों की अपेक्षा चित्तौर के राणाओं के अधीन रहने से प्रसन्न हुए । ज्यों ही हम्मीरसिंह जी ने चित्तौर ले लिया और मुहम्मद को हराया कि संपूर्ण आर्य वंश के राजा एक के पीछे एक भेंट ले लेकर आए, कर
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देने लगे और यथासमय सेना द्वारा युद्ध में सहायता करने लगे। इस भाँति मारवाड़, जयपुर, बूँदी, ग्वालियर, चंदेरी, राजौड़, राय- सेन, सीकरी, कालपी और आबू आदि ठिकानों के राजा हम्मीरसिंह जी के आज्ञाकारी हुए। हम्मीरसिंह जी भरतखंड के समस्त राजपूत राज्यों में महाराजाधिराज बन गए। मुसलमानों के आने से पहले इस देश में मेवाड़ के राजाओं की शक्ति अधिक थी, मुसलमानों के आते ही वह दिन दिन घटने लगी। हम्मीरसिंह जी ने इस अवनति को केवल रोका ही नही किंतु मुसलमानों के आने से पहले मेवाड़ की जो उत्तम दशा थी फिर उसी पर उसे पहुँचा दिया। मुहम्मद के पीछे किसी भी बादशाह ने चित्तौर के लेने का साहस न किया, इसका एकमात्र हेतु हम्मीरसिंह जी के पराक्रम का भय था। इसी से हम्मीर- सिंह के राज्यशासन के पिछले पचास वर्षों में मेवाड़ में अटल शांति रही और इस दीर्घकाल की शांति ने मेवाड़ देश को व्यापार, धन, विद्या, सभ्यता, तथा शूर पुरुषों से परिपूर्ण कर दिया। हम्मीरसिंह जी जैसे बलवान् थे वैसे ही राज्य चलाने में, न्याय करने में, कला- कौशल को उन्नति देने में प्रवीण थे। उनके राज्य में यह कहावत पूर्णतया चरितार्थ हो गई थी कि "बाघ और बकरी एक घाट पानी पीते हैं"; शांति बढ़ने से संपूर्ण व्यापारी, किसान और कारीगर अपने अपने धंधों में लग गए, इससे देश में संपत्ति बढ़ी जिससे राज्य की आय में अधिकता हुई। इन्होंने उत्तम उत्तम स्थान बनाकर कारीगरी की उन्नति की और प्रजा का न्याय यथोचित करके तथा पुत्रवत् पालन करके सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया। इस भाँति चौंसठ वर्ष राज्य भोगकर अति वृद्धावस्था में सन् १३६५ ई० में हम्मीरसिंह जी ने वैकुंठधाम का मार्ग लिया। परम बुद्धिमान् और पराक्रमी महाराणा हम्मीरसिंह जी अपने पुत्र खेतसी जी के लिये शांति-संपन्न और विस्तीर्ण राज्य छोड़ गए। मेवाड़पति महाराणा हम्मीरसिंह जी अपनी अक्षय कीर्ति छोड़कर मरे। वहाँ के लोग उन्हें अब तक सराहते हैं।"
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इन हम्मीर के विषय में विशेष कुछ लिखना अथवा इनके
संबंध की घटनाओं पर विचार करना मैं आवश्यक नहीं समझता ।
एक तो इनका इस रासो काव्य से कोई संबंध नहीं है, दूसरे यह
भूमिका योंही इतनी बड़ी हो गई है कि अब इसे और बढ़ाना अनु-
चित जान पड़ता है। केवल कथाभाग मैंने इसलिये दे दिया है कि
जिसमें पाठकों को इसके जानने का यहीं अवसर प्राप्त हो जाय और
वे स्वयं इसके विषय में और जानने का उद्योग करें। जिन महाशयों
को हम्मीर के विषय में कुछ लिखने का अवसर प्राप्त हो उन्हें उचित
है कि वे दोनों हम्मीरों को अलग अलग मानकर उनके संबंध की
घटनाओं का उल्लेख करें।
बस अब मुझे हिंदी के प्रेमियों से क्षमा माँगनी है कि एक तो
इस भूमिका के लिखने में इतना विलंब हो गया, दूसरे यह भूमिका
इतनी बड़ी हो गई । आशा है कि पहले अपराध का मार्जन दूसरे
से हो जाय ।
इस भूमिका को समाप्त करने के पहले मैं कुँवर कन्हैया जू और
पंडित रामचंद्र शुक्ल को अनेक धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने
इसके कई अंशों के लिखने में मुझे बड़ी सहायता दी। साथ ही मैं
कुँअर कृष्णसिंह वर्मा को भी धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता।
उन्हीं के द्वारा मुझे यह काव्य प्राप्त हुआ । ठाकुर विजयसिंह जी ने
इस काव्य को प्राप्त करने और कुँवर कृष्णसिंह जी की सहायता
करने में जो कष्ट उठाया उसके लिये मैं उनका भी उपकार मानता
हूँ। आशा है कि ये सब महाशय इसी प्रकार मुझपर कृपा बनाए
रहेंगे जिससे मैं अन्य अन्य ऐसे काव्यों के संपादन करने में
समर्थ होऊँ ।
काशी,
६ फरवरी १६०८ \quad } \qquad\qquad\qquad\qquadश्यामसुंदर दास
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हम्मीररासो —————— दोहा सिंधुर बदन अमंद दुति, बुद्धि सिद्धि वरदाय। सुमिरत पद-पंकज तुरत, बिघ्न अनेक विलाय ॥ १ ॥ छप्पय दुरद* वदन बुधि-सदन चंद्र लल्लाट बिराजै । भुजा च्यारि आयुद्ध तेज फरसो+ कर राजै १ ॥ इक्क दंत छवि-धाम अरुण सिंदुरमय सोहैं । मनो प्रात रबि उदित कहन उपमा कबि को है ॥ कर-कमल माल मोदक लिये उर उदार उपबीत बर । सिव सिवा सुवन गणराज तुम देहु सदा वरदाँन वर २ ॥२॥ पुंडरीक सुत सुता तासु पद-कमल मनाऊँ ॥ बिसद÷ बरण ३ बर वसन बिसद भूषण हिय ध्याऊँ ॥ बिसद जंत्र सुर सुद्ध तंत्र तुबरजुत सोहै । बिसद ताल इक भुजा द्वितिय पुस्तक मन मोहै ॥ गति राजहंस हंसह चढ़ा रटी सुरन कीरति बिमल । जय मात बिमल ४ वरदायिनी देहु सदा वरदाँन बल ॥३॥
१ वर साजै । २ वरदायक वरदान बर । ३ बसन । ४ सदा ।
- दुरद=द्विरद, गज । + फरसो=परशु । ÷ बिसद=बिमल, सुंदर ।
२ हम्मीररासो छंद पद्धरी जय विन्नराज गणईसदेव । जय जगदंय जननी सएव१ * ॥ गुरु - पाद - पद्म वंदन सुकीन । सब सज्जन पद मन२ लीन कीन ॥ ४ ॥ प्रथिराज राज जग भौ प्रसिद्ध । भृगु वंस मध्य प्रगटे सुसिद्ध ॥ नृप चंद्रभाँन तिहिं बंस मध्य । किरवाँन+ दाँन दोऊ प्रसिद्ध ॥ ५ ॥ पिच निंवराण जग गाँम नाँम । जुत बर्णाश्रम निज धर्म्म धाँम ॥ जय कीरति भुवमंडल उदार । अरु तेज प्रतापी बल अपार ॥ ६ ॥ सब कहैं राठ कौ पातस्याह । जस श्रवन सुनन को सदा चाह ॥ द्विजराज गौड़कुल जग - प्रसिद्ध । बिद्या - बिनीत हरि - धर्म्म - वृद्ध ॥ ७ ॥ सब दया दाँन उद्दार बीर । गुण - सागर नागर परम धीर ॥ कुल पंच बृत्त कै मूल जाँन । द्विज आदि गौड़३ जानत जहाँन४ ॥ ८ ॥ सौ चौदह सै चालीस च्यार । जन - सासन-सागर अति उद्दार ॥ अब सब को किंकर मोहिं जानि । १ सहेव । २ हुलसन । ३ सोइ आदि गोर । ४ जानि ।
- सएव ( सहेव ) = स्वामिनी । * किरवाँन ( किरपान ) = कृपाण ।
हम्मीररासो ३ ऋषि अत्रि गोत्र मैं जन्म मानि ॥ ९ ॥ डिडवरिया राव कहि बिरद ताहिं । सुभ राठ देस मैं उदित आहि ॥ तिहिं नाँम गाँम भल बीजवार । सब प्रजा सुखी जुत बरण च्यार ॥ १० ॥ जहाँ बालकृष्ण सुत जोधराज । गुन जोतिष पंडित कवि समाज¹ ॥ नृप करी कृपा तिहिं पर अपार । धन धरा बाजि² गृह बसन सार ॥११॥ बाहन अनेक सत्कार भूरि । सब भाँति अजाची कियौ मूरि ॥ नृप एक³ समय दरबार माहिं । रासो हमीर कहि⁴ सुन्यौ नाहिं ॥१२॥ नृप प्रस्न⁵ करिय यहु उभे बात । सब कहो बंस उत्पति सुतात । अरु कहो साहि हम्मीर बैर । किहिं भाँति⁶ कंक= बड्ढ्यौ सु फेर ॥१३॥ तब कही प्रथम यह कल्प आदि । जल सेष सैन जब है अनादि ॥ नहिं धरणि चंद्र सूरज अकास । नहिं देव दनुज नर बर प्रकास ॥१४॥ सब बीज बृक्ष⁷ हरि संग मेलि । करि आप जोग निद्रा सकेलि ॥ करि सैन अंत निज सक्ति जानि । १ उदार । २ बास । ३ इक । ४ कह्यौ । ५ प्रश्न । ६ बत्त । ७ जुक्त । =कंक=ससिश्रु ।
४ हम्मीररासो ऊरण* सु तंत्र करि सूत्र मानि ॥१५॥ द्व माया ईस्वर उभै नाँम । करि महततत्व† गुण÷ प्रगट जाँम+ ॥ यह धरि चरित्र¹ लीला अपार । हरि नाभिकोस पंकज प्रचार² ॥१६॥ तिहिं-प्रगट भए ब्रह्मा सु आदि । बाराहकल्प यह कहि अनादि ॥ बहु काल ब्रह्म-चिंता सु कीन । मैं कौन, करौं का, कर्म कीन³ ॥१७॥ अध उद्ध० भम्यौ बहु कमलि-नाल । नहिं पार लह्यौ तदपि मुहाल⁴ ॥ करि ध्याँन स्वयंभू लख्यौ आप । तप करयौ सृष्टि उपजै •अमाप ॥१८॥ तप करयौ स्वयंभूं अति प्रचंड । तब भयउ प्रजापति बिधि अखंड ॥ मानसी सृष्टि कीनी उदार । सब बृक्ष बीज किन्हे अपार ॥१९॥ जल गगन तेज भुव बायु मानि । १ धरी चित्त । २ वढ्यौ पंकज अपार प्रसार । ३ कर्मचीन, कर्महीन । ४ मुझाय । * ऊरण (ऊर्णा)=ऊन । † महततत्व (महत्तत्त्व)—सांख्य के मतानुसार प्रकृति का प्रथम विकार, बुद्धि । ÷गुण—सांख्य के मतानुसार सत्त्व, रज तथा तम गुण । इस शास्त्र में इन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा गया है । इसी प्रकृति से सृष्टि का विकास होता है । + जाम=प्रहर, काल । ० उद्ध (ऊर्ध्व)=ऊपर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ५ सनकादि भए सुत च्यारि आनि¹ ॥ तप-पुंज भये नृहिं सृष्टि भोग । तहाँ मध्य भए तब रुद्र जोग ॥२०॥ भन तैं मरीचि भय तव सु आय । उपजे पुलस्त ऋषि श्रवण पाय ॥ इमि भए नाभि तैं पुलह और । कृत भए ब्रह्म कर तैं जु मौर ॥२१॥ भृगु भए स्वयंभू त्वचा ठाँन । भय प्राण नात बासिट्ठ माँन ॥ अंगुष्ठ दक्ष उपजे सु ब्रह्म । नारद जु भए उतसंग* अह्म ॥२२॥ भय छाया तैं क़रदम ऋषीस । अरु भए प्रष्टि+ अद्धरम दीस ॥ अरु हृदय भए कामा उदार । करदन तैं भौ धरमावतार ॥२३॥ भय लोम अधर² तैं अति वलिष्ठ । बानी जु विमल मुख तैं प्रतिष्ठ ॥ पद निरत मिंड³† तैं सिंधु जानि । यहिं बिधि जु प्रजापति ब्रह्म मानि ॥२४॥ अब सुनहु बंस तिनकै अपार । यह भयय सृष्टि चहुँ खाँ (चहुँधा?) निवार ॥ सिव कै जु सती त्रिय बिन प्रसूत । दिय दक्ष श्राप तातैं न पूत ॥२५॥ इक कला नाम त्रिय धर मरीच । १ मानि । २ अधुर । ३ मींड, मिड्डु । *उतसंग (उत्संग)=गोद । +प्रष्टि (पृष्ठ)=पीठ । †मिंड (मीढ)=मूत्र ।
६ हम्मीररासो द्वै पुत्र भए ताकै जु बीच ॥ इक भए प्रथम कस्यप सुजाँन । फिर उपजि धरम जहँ पूर्णमाँन ॥२६॥ भय कस्यप कै सूरज सु आय । सो भयौ वंस सूरज सुगाय ॥ अरु सुनो अत्रि कै पुत्र तीन । इक दत्त सोम जान्यौ प्रबीन ॥२७॥ ऋषि भए अपर दुरबास नाँम । सोइ¹ सुनो श्रवण तिहिं वंस जाँम ॥ सुत भयौ सोम कै बुद्ध आय । पुरुरवा पुत्र ताकै सुभाय ॥२८॥ षट पुत्र भए ताकै प्रसिद्ध । भए सोम वंस तिनकै जु सिद्ध ॥ भृगु वंस सुनो अतिसै उदार । चहुवाँन भए तिनतैं अपार ॥२९॥ इक ख्यात नाँम तिय अति अनूप । भय उभै पुत्र ताकै जु भूप ॥ इक कह्यौ प्रथम धाता जु नाँम । फिर भए विधाता धर्म-धाँम ॥३०॥ इक² अपर प्रिया भृगु कै कनिष्ठ । ए पुत्र भए ताकै प्रतिष्ठ ॥ भय सुक्र जेष्ठ गुरु-असुर जानि । तिहिं अनुज चिमन³ तप-पुंज मानि ॥३१॥ भृगु कै जु भए जग अति बिख्यात । जिहिं सुक्र नाम बल तेज तात ॥ १ सुई । २ एक । ३ च्यवन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७ तिनकैँ रिचीक भए पुत्र आय। जमदग्नि भए तिनकै सुभाय ॥३२॥ ऋषि जामदग्नि सुत परसराँम। हनि छत्र सकल द्विज तेजधाँम ॥३३॥ दोहरा छंद ब्रह्मा कै सुत भृगु भए, भार्गव भृगु कै गेह। ऋषि रिचिचक ताकै भए; तेज-पुंज तप-देह ॥३४॥ जामदग्नि तिनकै भए, परसराँम सुत जाहिं। छत्र मेटि विप्रन दइय, भुंमि किती वर ताहिं ॥३५॥ कमलासन कुल मैं प्रकट, परसराँम रणधीर। सहस्रारजुन बैर तैं, हने जु क्षत्री वीर ॥३६॥ बार इक्कीस जुद्धि जिन, दिन्नौ^१ उर्बीराज। बच्यौ न छत्रो जगत तब, आए तप कै काज^२ ॥३७॥ छंद मुक्तादाम हने क्षिति कै सब बीर अपार। भरे बहु कुंड जु शोणित धार ॥ करे तिहिं पितृन तरपन नोर। भए सब हरषित पित्र सधीर ॥३८॥ दए तब आसिष प्रेम समेत। चले ऋषिराज तपःकृत हेत ॥ रह्यौ नहिं क्षत्रिय जाति बिसेष। भए निरमूल जु छत्र अशेष^३ ॥३९॥ बचे कछु दीन मलीन सुवेस। कहूँ तिनकै अब रूप अशेष ॥ १ दीनौ। २ अप्प (आप) गए तप काज। ३ विसेपु। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
८ हम्मीररासो धरे तृणदंत¹ कि दीन बयन्न² । . किये नियरूप लखे जु नयन्न ॥४०॥ नपुंसक बालक बृद्ध सु दीन । धरे मुख नक्ख सुबैन सहीन ॥ तजे तिन आयुध पिट्ठि दिखाय । गहे तिन आय सुभाय सुपाय ॥४१॥ मिले सब पित्र सु³ दीन असीष । भए सुअ निरभय पित्र जगीस ॥ तजो अब उग्ग⁵ असेष सुभाव । करो सब⁶ उप्पर क्षोभ सु चाव ॥४२॥ तजे तब क्रोध भए सु दयाल । चले पद बंदि पिता पद⁷ हाल ॥ भई कछु काल क्षत्री बिन भुंमि । नहीं जग रक्ष रह्यौ सोइ पुंमि⁸ ॥४३॥ बढ़े⁹ रजनोचर बृंद अनेक । मिटे जप तप्प जु वेद बिबेक ॥ करे उतपात सुघात अपार । तजे कुल-धर्म्म सु आश्रम च्यार¹⁰ ॥४४॥ मिटी मरजांद रहे सब भीत । तबै ऋषिराजन बढ़्ढत¹¹ चीत ॥ जुरे ऋषि-बृंद सु अरबुद आय । जहाँ ऋषि चाय बसैं सत भाय ॥४५॥ सुर नर नाग मिले सह आय । १ तनदंत । २ नयन्न । ३ जु । ४ अनिरिय । ५ उग्र । ६ बन । ७ पहु,पट्ट । ८ नहीं जग रच्छिक यो जग पूमि । ६ वचे । १० चार । ११ बाढत, बाढन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ६ रचे रजनीचर मेटि उपाय¹ ॥ मिले कमलासन और बसिष्ठ। कियौ² सुचि कुंड अनङ्ग³ सुइष्ट ॥४६॥ दोहरा छंद चाय आय अरबुद सुनग⁴, मिलिय⁵ सकल ऋषिराय । तब आराधिय संभु तिन , दिन्नौ दरसन आय⁶ ॥४७॥ जटा मुकट बिभूूति अँग , सीस गंग अहि अंग⁷ । भूत संग अनभंग मन , हरषित अधिक उमंग ॥४८॥ ऋषिसमूह अस्तुति करत⁸, करव (करो)⁹ अचल नग¹⁰ आय। बास करो तिहिं पर अचल, यज्ञ करें तव पाय ॥४९॥ छप्पय छंद तब भव भये¹¹ प्रसन्न बास अरबुद सिरं किन्मिव । कियव यज्ञ आरंभ विप्र सम्मूह¹² सुलिन्निव ॥ द्वैपायन, बासिष्ठ, लोम, दाल्भि,¹³ सम्र आए। जैमिनि हरषन, धौम्य, भृगू, घटयोनि¹⁴, सुभाए ॥ कौसिकह+, बत्स, मुद्दल मिलिउ, उदालीक, मातंग, भनि । स्वर मिलिय स्वयंभुव संभुजुत लगे करन मख मुदित मन ॥५०॥ पुलह, अत्रि, गौतम सम्, गरग, संडिलि महामुनि । भरद्वाज, जाबालि, मारकंडेय, इष्ट गुनि ॥ . १ मेटन पाय । २ किये । ३ अनिल । ४ गन । ५ मिले । ६ धाय । ७ संग । ८ करिव, करथव । ६ करत । १० मन । ११ भयउ । १२ सम्मुहँ सुइ लिन्निव । १३ दालिंभ सु । . १४ जोनि ।
- पुलह अत्रि गौतमहिं गरग सांडिल्ल महामुनि । भरद्वाज जाबालि मारकंडेय उध्म ( उद्दम ) गुनि । ये दो चरण एक प्रति में अधिक हैं सो दूसरी प्रति में दूसरे छप्पय में आए हैं । ६