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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० ३६ ] भाषाटीकासमेतं । ( ४०७ ) काथ बना सेक करनेसे व्रणोंका शोधन होता है ॥ २४ ॥ पीछे शुद्धहुए व्रणको जानके व्रणको नौनी घृतसे धोलेवे अर्थात् नौनी घृत धोके लगावे, नौनी घृत श्रेष्ठ है इससे व्रण भर- जाता है और दाह नहीं होता ॥ २५ ॥ अथ जात्यादि घृत । जातीकरञ्जपिचुमन्दपटोलमत्र यष्टीमधुश्च रजनी कटुरोहिणी च ॥ मञ्जिष्ठकोत्पलमुशीरकरञ्जबीजं स्यात्सारिवा त्रिवृन्माग- धिका समांशा ॥२६॥पक्वं घृते विहितमस्ति व्रणे प्रशस्तं नाडी गते च सरुजे च सशोणिते च॥लूताविसर्पमपि हन्ति गभीर- येञ्च व्रणाः सदाहकठिना अपिरोहयन्ति॥२७॥ इति जात्यादि घृतम्॥इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने व्रणचिकित्सा नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ जावित्री, करंजुवा, नींव, परवल, मुलहटी, हलदी, कुटकी, हर्र, मँजीठ, कमल, खश, करंजु- वाके बीज, अनंतमूल, निशोत, पीपल, इनको समान भाग ले ॥ २६ ॥ इनको घृतमें पकालेवे यह घृत व्रणमें हित है और पीडा सहित तथा रक्तसहित नाडीव्रण, लूत, विसर्परोग इनको, नाश करता है और इससे दाहसहित तथा कठिन ऐसा व्रण भरजाता है ॥ २७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने व्रणचिकित्सानाम पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥ षट्त्रिंशोऽध्यायः ३६. अथ श्लीपदरोगका निदान तथा लक्षण । आत्रेय उवाच॥व्रणोक्तरूपचारैश्च जायते श्लीपदं तथा ॥ वातेन स्फुटितं रूक्षं श्यामञ्चापि प्रदृश्यते ॥ १ ॥ सदाहपाकं पित्तेन सज्वरञ्चैव दृश्यते॥श्लेष्मणा जायते स्निग्धं घनं शोफसमन्वि- तम् ॥२॥ सन्निपातेन सर्वाणि जायन्ते भिषजांवर ॥ मेदाश्रितं तु वाल्मीकं वल्मीकवत् प्रदृश्यते॥३॥ सहश्यानि च चिह्नानि वातिकोत्थानि लक्षयेत्॥क्रियास्तस्य व्रणोक्ताश्च कारयेद्विधि- पूर्विकाः ॥ ४ ॥ जात्यादि च घृतं शस्तं तथैवालेपनानि च ॥

(४०८) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पुनः प्रलेपनं कार्यं धवार्जुनकदम्बकैः ॥५॥ गिरिकर्णिकामू- लञ्च तथा वृक्षादनीमपि ॥ पिष्ट्वा प्रलेपनं कार्यं वाल्मीकश्ली- पदस्य च ॥ ६ ॥ सूरणकन्दकं पिष्ट्वा मधुना च घृतेन च ॥ लेपनं च हितं तस्य वाल्मीकश्लीपदापहम् ॥७॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सा नाम षट्त्रिंशो- ऽध्यायः ॥ ३६ ॥ व्रणमें कहेहुए उपचारोंकरके श्लीपदसंज्ञकरोग हो जाता है, वातसे उपजा श्लीपद स्फुटित हो, रूखा हो, श्याम वगवाला हो ॥ १ ॥ पित्तसे उपजे श्लीपद रोगमें दाहहो, पाकहो और ज्वर होता है और कफसे उपजा श्लीपदरोग चिकनाहो करडाहो शोजासे युक्त होता है ॥ २ ॥ सन्निपातसे उपजे श्लीपद रोगमें सब लक्षण मिलते हैं और मेदके आश्रय हुआ यह रोग सर्पकी बँवईके समान लक्षणोंवाला होता है ॥ ३ ॥ और वातसे उपजे इस रोगमें समान लक्षण होते हैं उसकी क्रिया व्रणमें कहीहुई करना चाहिये ॥ ४ ॥ और पहले कहाहुआ जात्यादिघृत लेप करनेमें हित है और धव, अर्जुनवृक्ष, कंदंब, ॥ ५ ॥ गिरिकर्णिकाकी मूल, अमरवेल, इनको पीस लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ६ ॥ जमीकंदको पीस शहद और घृतमें मिला लेप करनेसे वल्मीकसंज्ञक श्लीपदरोगका नाश होता है ॥ ७ ॥ इति वेरीनिवार्सबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने श्लीपदचिकित्सानाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३७. अथ अर्बुदरोगकी चिकित्सा । वाताभिघातपवनाद्व्रणाद्वापि तथा पुनः॥ रक्तनाड्यः प्ररोहन्ति रुन्धन्ति च तथा पुनः ॥१॥ तेन रक्तस्य मार्गस्तु रुध्यते तेन जायते ॥ अर्बुदञ्च महास्थूलं मार्गरोधाच्च जायते ॥२॥ वाता- न्मृदुच परुषं कफाच्च घनशीतलम् ॥पित्तेन दाहपाकार्यं विजा- नीयं विचक्षणैः॥३॥सन्निपातेन कठिनं घनं पाषाणसन्निभम्॥ वृद्धिंमच्च गंडुकं स्यादासाध्यं तद्भिषग्वर ॥४॥ तस्यादौ पाटनं

कार्य्यं मर्मस्थानञ्च वर्जयेत् ॥ सैन्धवेन घृतेनापि कुर्य्यात्त- स्यानुलेपनम् ॥ ५ ॥ सूरणं कन्दकं दग्ध्वा घृतेन च गुडेन च ॥ लेपनं चार्बुदानाञ्च नाशनञ्च भिषग्वर ॥ ६ ॥ शेषा व्रणक्रिया प्रोक्ता शस्ता वार्बुदशान्तये ॥ वातघ्नानि च पथ्यानि हितानि मधुराणि च ॥७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती- यस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-चोटके अभिघातसे और वायुसे तथा व्रणसे रक्तकी नाड़ी भरजाती और रुकजाती है ॥ १ ॥ उससे रक्तका मार्ग रुकजाता है सो मार्गके रुकनेसे महास्थूल अर्बुदरोग हो जाता है ॥ २ ॥ वातसे उपजा अर्बुद रोग कोमल हो और खरदरा हो और कफसे कडा और शीतल होता है और पित्तसे उपजेमें दाह और पाक होता है ऐसा वैद्यजनोंको जानना चाहिये ॥ ३ ॥ सन्निपातसे उपजा कठिन और पत्थरके समान कड़ा होता है हे वैद्यजन! बढनेवाला और गोलीसरीखा यह अर्बुदरोग असाध्य होता है॥४॥उस रोगकी आदिमें मर्मस्थानको वर्जके फाडनेकी विधि करनी चाहिये पीछे सैंधानमक घृत इनका लेप करना चाहिये ॥ ५ ॥ जमीकंदको दग्ध कर घृत और गुडमें मिला लेप करनेसे अर्बुदरोगोंका नाश होतां है ॥ ६ ॥ बाकीकी व्रणमें कही हुई क्रिया करनी यह श्रेष्ठ है और वातको नाश करनेवाले मधुर पदार्थ हित कहे हैं और पथ्य हैं ॥ ७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अर्बुदचिकित्सानाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ अष्टत्रिंशोऽध्यायः ३८. अथ लूत तथा गंडमाला रोगका निदान और लक्षण । आत्रेय उवाच ॥ इति व्रणक्रिया प्रोक्ता समासेन भिषग्वर ॥ यथायोगं चोपचारं ज्ञात्वा सम्यगुपाचरेत् ॥१॥ दुष्टाम्बुपानक कद्वन्ननिषेवणाच्च संजायते चक्रमिसम्भवगण्डमाला॥सामारुते च कफपित्तभवे विकारे संसर्पते क्रिमिजदोषगणश्च गण्डात्॥२॥ वातेन वातसदृशानि च लक्षणानि पित्तेन दाहसरुजव्रणशोष-

( ४१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

त्रापाः ॥ शैत्यं कफेन परुषत्वमनेकयोगात्सा सन्निपातवि- हिता च समस्तलिङ्गैः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे उत्तमवैद्य ! इस प्रकारके संक्षेपमात्रसे व्रणकी चिकित्सा कहदी है इसके यथार्थ उपचारको जानकेअच्छी तरहसे चिकित्सा करनी चाहिये॥ १॥दूषित जलके पीने से और कुत्सित अन्नके सेवनेसे क्रिमिरोगसे उपजीहुई गंडमाला जाननी।वात पित्त कफ इन दोषोंसे उपजेहुए इस विकारमें क्रिमियोंसे उपजाहुआ दोष गंड अर्थात् कपोल स्थानसे चलता है॥ २ ॥ वातसे उपजे हुए इसरोगमें वातके समान लक्षण होते हैं और पित्तसे उपजेमें दाह,पीड़ा,व्रण, शोष, ताप, ये होते हैं और कफसे उपजेमें शीतलता, कठोरता ये उपचार होते हैं और जिसमें सब लक्षण मिलते हों वह सन्निपातसे उपजा जानना ॥ ३ ॥ अथ लूता गंडमाला चिकित्सा । तस्य चेमं प्रतीकारं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ रोहिणी विशदा चैव विजया च विभेदिनी ॥ ४ ॥ कान्तारि वज्रपुष्पा च तथा चेंद्रायुधापरा॥इति सप्तविधा लूताः शृणु पश्चात्पृथक्पृथक्॥५॥ रक्तमुण्डा भवेद्रक्ता रक्तस्थाने च रोहिणी ॥ विशदा मांसलस्थाने श्वेतवर्णा च दीर्घिका ॥ ६ ॥ विजया च शिरोमध्ये पीतवर्णा यवप्रभा ॥७॥ भेदिनी मेदसंस्थाने श्वेता च नीलरखिका ॥ ८ ॥ कान्तारि बस्तिमध्ये च श्वेताङ्गा रक्तमुण्डिका ॥ वज्रपुष्पा चास्थिमध्ये श्वता कृष्णा शिरा मता ॥९॥ इंद्रायुधा शिरान्ते च धूम्रा कृष्णा शिरा मता ॥१०॥ रोहिण्यङ्गुलिमाश्रेण मूत्रेण विशदा समा॥विजया च यवाकारा वर्त्तुला विजया तथा॥११॥ अन्या नृणां च विज्ञेया तण्डुलीकण्टकानिभा ॥ रोहिणी विजया विंशा मांसस्थाने समाश्रिता ॥ १२॥ गुल्फे वा चास्थिसन्धौ च दृश्यते भेदिनी नरे ॥ कुक्षौ कर्णान्तरेऽपाङ्गे कान्तारि विद्धि पुत्रक ॥ १३ ॥ वज्रपुष्पा शिरसि च शिरान्ते चेन्द्रायुधा मता॥ अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु पुत्र प्रयत्नतः ॥१४ ॥ सान्द्रपूय- विस्रावञ्च गम्भीरञ्च व्रणं विदुः॥अन्यं च सरुजं चैव पक्वजम्बू- समप्रभम् ॥१५॥ लूताव्रणानां चैतानि अपक्वं यावद्दश्यते ॥

अ० ३८] भाषाटीकासमेता । (४११) त्यक्त्वा सन्धिस्थमर्मस्थां लूतां चैवहि तद्द्रणम्॥ तदा तप्तेनं तैलेन दाहश्चाशु विधीयते ॥ १६॥ अङ्कोलश्चैव मध्यानि पारिभद्र- दलानि च ॥ गृहधूमं कृष्णजीरं गोमूत्रेण तु पेषितम् ॥ लेपनं च प्रशस्तं च लूतानां मारण परम् ॥ १७ ॥ पिण्डीतकं विड- ङ्गानि तथा चेङ्गुदिमूलकम् ॥ बीजपूरकमूलानि पेषितानि वि- लेपयेत् ॥ गण्डमालां तथा घोरां हन्ति शीघ्रं प्रकण्टकान् ॥ १८॥ स्नुहीक्षीरं चार्कक्षीरं लूतारन्ध्र नियोजयत् ॥ तेन की- टस्तु तन्मध्ये म्रियते नात्र संशयः ॥ १९॥ आस्यतो गिरिक- र्णीञ्च चन्दनञ्च समांशकम् ॥ पिष्ट्वा लेपः प्रयोक्तव्यो लूतां हन्ति सुदारुणाम् ॥ २० ॥ करवीरं चार्कदुग्धं तथा च कटु- तुम्बिकाम् ॥ निशाद्वयं जाङ्गलिकां तिलतैले विपाचयेत् ॥ २१ ॥ लूतामभ्यञ्जने हन्ति गण्डमालाञ्च दारुणाम् ॥ घृतं जात्यादिकं नाम तथा चात्र प्रयोजयेत् ॥ २२ ॥ अन्यान्यपि व्रणे यानि प्रोक्तानि च यथाविधि ॥ २३ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने लूतागण्डमालाचिकित्सा नामाष्ट- त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ हे पुत्र! उसके इलाजको कहते हैं सुनो, रोहिणी, विशदा, विजया, विमेदिनी ॥४॥ कान्तारी, वज्र-- पुष्पा, इन्द्रायुधा, ऐसे सात प्रकारकी लूत होती हैं सो हे पुत्र ! जुदी जुदी सुनो॥ ५॥ रक्तमुखवाली,. रक्तवर्णवाली, रक्तके स्थानमें होनेवाली ऐसी रोहिणी नामक लूत होती है और सफेद वर्णवाली तथा दीर्घ ऐसी विशदानामवाली लूत मांसस्थानमें होती है ॥ ६ ॥ विजयानामवाली लूत पीलेवर्णवाली और शिरके मध्यमें होती है और जवसरीखी होती है ॥ ७ ॥ सफेदवर्णवाली नीलीरेखावाली ऐसी लूत मेदके स्थानमें मेदिनीनामवाली होती है ॥ ८ ॥ सफेदवर्णवाली रक्तमुखवाली ऐसी कांतारीनामवाली लूत बस्तिस्थानमें होतीहै और वज्रपुष्पा नामक लूत अस्थि- स्थानमें होती है और सफ़ेदवर्णवाली तथा काले मुखवाली होती है ॥ ९ ॥ इंद्रायुधा लूत नसोंके मध्यमें होती है धूम्रवर्णवाली और काले शिरवाली होती है ॥ १० ॥ रोहिणी- नामवाली लूत अंगुल प्रमाणमें होती है विशदालूत सूतके समान होती है, विजया लूत जबके आकारवाली अथवा गोल आकारवाली होती है ॥ ११ ॥ अन्य लूत मनुष्योंके चौलाईके कांटेके समान जाननी और रोहिणी विजया विशदा लूत मांसस्थानके

( ४१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आश्रय रहती है ॥ १२ ॥ टांकनेकी गुल्फ अस्थि संधि इनमें विमेदिनी लूत होती है और कोखो कानके समीपस्थान, नेत्रोंके समीप यह कांतारीनामक लूत होती है ॥ १३ ॥ वज्रपुष्पा शिरमें होती है और नसोंके मध्यमें इंद्रायुधा लूत होती है हे पुत्र ! अब इनकी औषध कहते हैं यत्नसे सुनो ॥ १४ ॥ कड़ीराध झिरती हो तहां गंभीर व्रण कहते हैं और अन्य पीडा स- हित और पकेहुए जामनके फलके समान व्रण होता है ॥ १५ ॥ लूतके व्रण जबतक पके नहीं उससे पहले मर्मसंधियोंको त्यागके लूतको और व्रणको गरम २ तैलसे दग्ध करना चाहि- ये ॥ १६ ॥ अंकोल मदिरा, नींवके पत्ते, घरका धूम, कालाजीरा इनको गोमूत्रमें पीस लेप करनेसे लूतका नाश होता है ॥ १७ ॥ तगर, वायविडंग, इंगुदीवृक्षकी जड़, बिजोराकी जड़ इनको पीस लेप करनेसे घोर गंडमाला कंटकरोग इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ १८ ॥ और थोहरका दूध, आकका दूध, इनको लूतके छिद्रोंमें युक्त करनेसे उसके मध्यके कीडे मरजाते हैं, ॥ १९ ॥ सफेद गोकर्णी, चंदन, इनको समान भाग ले पीसके लेप करनेसे दारुण लूतका नाश होता है ॥ २० ॥ कनेर, आकका दूध, कडुई तुंबी, दोनों हल्दी कपूर, कचरी, इनको तिलोंके तैलमें पका ॥ २१ ॥ मालिस करनेसे लूत, गंडमाला, इनका नाश होता है और जात्यादिक नामवाला घृत यहां युक्त करना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ और अन्य जो व्रणमें कहीहुई औषध हैं वे यहां करनी श्रेष्ठ हैं ॥ २३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थानेलूतगंडमालाचिकित्सानानाम अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३९. अथ कुष्ठचिकित्सा । आत्रेयउवाच॥ विरुद्धपानानि गुरूणि चाम्लपापोदक सेवन- केन वापि ॥निद्रा दिवासुप्रतिजागराच्चपित्तं प्रकुप्येद्रुधिराश्रितं तत् ॥ १॥ त्वचागतः सर्पति रोगदोषः कुष्ठेति संज्ञां प्रवदन्ति धीराः ॥ पापोद्भवास्ते प्रभवन्ति देहे नृणां भृशं कोपयतां विधिज्ञा ॥ २॥ आत्रेयजी कहते हैं-विरुद्धपान और गरिष्ठ भोजन, खट्टे तथा दूषित जलके सेवनेसे, दिनमें सोने और रातमें जागरण करनेसे रक्तके आश्रय हुआ पित्त कुपित होता है ॥ १ ॥ त्वचामें प्राप्त हुआ रोगरूपदोष फैलता है,तब कुष्ठ ऐसी संज्ञा होती है । पापसे उत्पन्न होनेवाले वे रोग मनुष्योंके शरीरमें कोपसे प्राप्त होजाते हैं अब तिनके जुदे जुदे लक्षणोंको कहेंगे ॥२॥

अ० ३९] भाषाटीकासमेता । (४१३) कुष्ठोंके सामान्यभेद और लक्षण । कुष्ठानि चाष्टादशधा वदन्ति तेषां पृथक्त्वेन वदामि चिह्नम् ॥ असाध्यसाध्यानि च कर्मजानि दोषोद्भवानि सहजानि तानि ॥३॥कारुण्यपारुष्यमथैव कण्डू रोमप्रहर्षःस्तिमितं तथैषाम्॥ तोदस्तथा संव्यथनं च देहे त्वचि स्थिते कुष्ठभवस्य चिह्नम्॥४॥ कुष्ठोंको अठारहप्रकारके कहते हैं वहां कर्मसे उपजे कुछ साध्य हैं और वातआदि दोषों- से तथा स्वभावसे उपजे असाध्य हैं ॥ ३ ॥ दीनता, कठोरपना, खाज, रोमहर्ष, नीलापन, शरीरमें चुभनेकीसी पीड़ा ये लक्षण कुष्ठकी आदिमें होते हैं ॥ ४ ॥ अथ कुष्ठोंके नाम । कपालकं चैवमुदुम्बरञ्च तथैव दद्रूणि च मण्डलानि॥ विसर्पकं हस्तिबलं किणञ्च गोजिह्वकं लोहितमण्डला वा॥५॥वैपादिकं चर्मदलं तथान्यं विस्फोटकान्यथ बहुव्रणञ्च ॥ कण्डूर्विचर्ची कथितं तथान्यद्धातुमभेदांस्त्वचि रोगसिद्धाः ॥ ६ कपालकुष्ठ, उदुम्बरकुष्ठ, दुद्रुमण्डल कुष्ठ, विसर्पकुष्ठ, हस्तिवलकुष्ठ, किणकुष्ठ, गोजिह्वक कुष्ठ, लोहितमंडला॥ ५ ॥ वैपादिक, चर्मदल, विस्फोटका, बहुव्रण, कंडु, विचर्चिका ऐसे इसप्रकारसे धातुओंके भेदसे उपजे हुए रोग त्वचा में प्रतीत होते हैं ॥ ६ ॥ कपाल व उडुंबरकुष्ठलक्षण । कपालकाभं सितवर्णकञ्च कपाल्यकं तद्वदितं विधिज्ञैः ॥ स्निग्धञ्च सर्वाङ्गगतं च कण्डूमदुम्बरं तं प्रवदन्ति सन्तः॥ ७ ॥ कपालसरीखा सफेद वर्णवाला हो वह वैद्यजनोंने कपालककुष्ठ कहा है और चिकना हो सब अंगमें प्राप्त हो, खाजी हो वह उदुंबरकुष्ठ कहाता है ॥ ७ ॥ अथ मंडलकुष्ठ तथा गजचर्मकुष्ठका लक्षण । दद्रूपमं यद्भवते च दद्रूर्दद्रूपमं मण्डलकं तमाहुः ॥ विसर्पकं सर्पति तद्विसर्पे तथान्यमान्त्रं गजचर्मतुल्यम्॥८॥ जो दादके समान हो दादसरीखे मंडल हो वह दद्रुमंडल कुष्ठ कहाता है और जो विसर्परोगकी तरह शरीरमें फैले उसको विसर्पकुष्ठ कहते हैं, जिसकी हस्ती सरीखी त्वचा होजावे उसको गज- चर्मककुष्ठ कहते हैं ॥ ३८ ॥

( ४१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गोजिह्वक कुष्ठ लक्षण । यद्रूक्ष्यपारुष्यसकर्कशञ्च गोजिह्वकं स्यात्खलु भेद्योग्यम् ॥ यवासरक्तानि च मण्डलानि सकण्डुकानि व्रणसंयुतानि॥ ९ ॥ जो रूषा हो कठोर हो कड़ा हो गौकी जिह्वाके समान वर्णवालाहो वह गोजिह्वककुष्ठ कहाता है और रक्त मंडलहो कुंडलसरीखेहों व्रणसे संयुक्तहो वह लोहित मंडल कुष्ठ जानना ॥ ९ ॥ अथ विपादिका कुष्ठ लक्षण । ज्ञेयं तु तल्लोहितमण्डलञ्च रक्तोद्भवं तद्रुधिराश्रितञ्च ॥ सवेदनार्त्तस्य परिस्फुटञ्च विपादिका सा कथिता विधेया १०॥ जो रक्तसे उत्पन्न हो रक्तके आश्रय हो पीड़ायुक्त हो प्रकटहो वह विपादिका कुष्ठ कहाता है॥१०॥ कोपेन रक्तानिलयोश्चजातातथैवविस्फोटकसन्निभा वा॥तथापरं नाम बहुव्रणं च सूक्ष्मा च सा वै विदिता नरस्य॥११॥ कण्डू- र्विचर्चीभुवने प्रतीता श्वेतानि सूक्ष्माणि च पाटलानि॥विसर्पते यस्य नरस्य रक्तं युवा न केनापि भवेच्च सिद्धः ॥ १२ ॥ जो रक्तवातके कुपित होनेसे उत्पन्न हो और विस्फोटके समान हो और बहुतसे व्रण हों वह सूक्ष्मा विपादिका नामक कुष्ठ जानना ॥ ११ ॥ कंडू विचर्चिका ये संसारमें प्रसिद्ध हैं और जिसके सूक्ष्मवर्णवाले तथा सफेदवर्णवाले और पीले वर्णवाले ऐसे चिह्न दीखें, रक्त दुष्ट होके फैलाता है ऐसा तरुणरोग किसी प्रकारसेभी सिद्ध नहीं होता है ॥ १२ ॥ अथ वातादिजन्य कुष्ठका लक्षण । शिरीषपुष्पाणि शिरीषकाणि सन्त्यक्तभावः पुरुषश्च सूक्ष्मः॥ तोदस्तथा वेपथुवातलिङ्गं पित्तेन शोषभ्रमदाहतृष्णाः ॥१३॥ श्लेष्मोद्भवे कठिनशीतलपाण्डुरञ्च नेत्रे नखेषुचवपुष्यभिलाषता च॥ मित्रेण संश्रुतभवानि भवन्ति यस्य स्यात्सान्निपातिकभवं बहुभिश्च लिङ्गैः ॥ १४ ॥ शिरसके पुष्पोंके समान और शिरसके समान वर्ण हो, कठोर हो, सूक्ष्म हो, व्यथा हो कंपना हो ये वातसे उपजे कुष्ठके लक्षण हैं और पित्तसे उपजे कुष्ठमें शोषहो, भ्रम हो दाह हो तृषाहो ॥ १३ ॥ कफसे उपजा कुष्ठ कठिन, शीतल होता है और नेत्र, नख, शरीर ये पीले होजाते हैं इनमें खाज करनेकी इच्छा रहे और सब मिलेहुए दोषोंसे मिलेहुए लक्षण होते हैं, सन्निपातसे उपजे कुष्ठमें बहुतसे लक्षण मिलते हैं ॥ १४ ॥

॰अ० ३९] भाषाटीकासमेता । (४१५) अथ रक्तस्थ कुष्ठ । रूक्षं तथा सकण्डु त्वक्स्थितञ्च मृदु शीतलम् ॥ आस्रावदाहरक्ताभं रक्तस्थं रक्तगं विदुः ॥ १५ ॥ जो रूखाहो, खाजहो, कोमलहो, शीतलहो वह त्वचा में स्थित कुष्ठ जानना और जिसमें झिरनाहो, रक्तसरीखी कांतिहो वह रक्तमें स्थित हुआ कुष्ठ जानना ॥ १५ ॥ अथ मांसस्थ मेदःस्थ तथा अस्थिस्थ कुष्ठ । सुस्निग्धं तोदगम्भीरं मांसगञ्च विनिर्दिशेत्॥मेदःस्थं तोदवेष्टत्वं सुस्निग्धं रक्तलोचनम् ॥अस्थिसंस्थञ्च गम्भीरं विसर्पे नासि- कामुखे ॥ १६ ॥ स्निग्धहो गम्भीर व्यथावाला वह मांसमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना जो मेदमें स्थितहो उसमें पीडाहो और ऐंठन चिकनाहो, रक्तनेत्रहों और जो अस्थिमें स्थितहो वह गंभीर होता है मुखमें तथा नासिकामें विसर्परोग दीखता है ॥ १६ ॥ अथ मज्जास्थ तथा शुक्रस्थ कुष्ठ । मज्जसंस्थश्च विकलो मज्जास्रावश्च जायते॥विशीर्यते च सर्वाङ्गे तथैव शुक्रगं विदुः ॥ १७ ॥ अतो वक्ष्ये समासेन प्रतिकर्म भिषग्वर ॥ १८॥ मज्जामें स्थितहोनेसे विकल होजावे, और मज्जास्राव होता है और जिसमें सब अंग शिथिल होजावें वह वीर्यमें प्राप्त हुआ कुष्ठ जानना ॥ १७ ॥ हे उत्तम वैद्य ! अब संक्षेप मात्रसे इनकी चिकित्साको कहेंगे ॥ १८ ॥ अथ कुष्ठचिकित्सा । त्वक्स्थे स्वेदस्तथालेपो रक्तस्रावश्च रक्तगे॥विरेकं मांसगे प्रोक्तं मेदोगे क्वाथपाचनम् ॥१९॥ अथ तानि च त्रीण्येवमस्थिमज्जा- गतानि च ॥ वातिके स्वेदनं पथ्यं पित्त शीतोपचारणम्॥२०॥ कष्टसाध्यमिदं प्रोक्तमसाध्यं सान्निपातिकम् ॥ रोगकारणमा- लोच्य तदा कम समारभेत् ॥ २१ ॥ त्वचामें स्थितहुए कुष्ठमें पसीना दिलावे, लेप करे, रक्तमें प्राप्तहुएमें स्राव करावे, मांसमें प्राप्तहुए कुष्ठमें जुलाब देवे और मेदमें प्राप्तहुएमें क्वाथ पाचन देवे ॥ १९ ॥ और यही उप- चार अस्थि, मज्जा, इनमें प्राप्तहुएमें भी करना चाहिये, वातसे उपजे कुष्ठमें पसीना दिवाना

(४१६) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- पथ्य है, पित्तसे उपजेमें शीतल उपचार करना श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ यह कुष्ठरोग कष्टसाध्य कहा है और सन्निपातसे उपजा असाध्य होता है, पहले रोगके कारणको जानके पीछे कर्म कर- नेका आचरण करे ॥ २१ ॥ पक्षान्नपक्षाञ्छोधनं पाचनञ्च मासान्मासान्कारयेद्रेचनञ्च ॥ मासान्कुष्ठे शोधनाय प्रकर्षात्तिष्ठे षष्ठ मास्यसृग्मोक्षणञ्च ॥ २२ ॥ वासापटोलफलिनीलवणं वचाञ्च निम्बत्वचं क्वथि- तमाशु पिबेत्कषायम्॥ कुष्ठे करोति वमनं मदनान्विते च पथ्याकषायवमने मदनान्वितेषु ॥ २३ ॥ फलत्रिकं त्रिवृद्दन्ती भिषग्वर विरेचकम् ॥ क्वाथो वचोष्णतोयेन पाने स्याद्भिषगु- त्तम॥२४॥ श्वासप्रश्वासयोर्वेध्या शिरा शिरसि चेद्वहिः ॥ ततः प्रयोजनीयश्च क्वाथस्नेहस्य भोजनम् ॥ २५ ॥ पक्षपक्षको प्रति शोधन और पाचनकर्म करे । महीना २ को प्रति जुलाव दिलानी चाहिये और कुष्ठरोगमें छठे २ महीनेके प्रति रक्तको निकसावे ॥ २२ ॥ वांसा, परवल, मालकांगनी, नमक, वच, नींबकी त्वचा, इनका काथ बना मैनफल मिला कुष्ठमें पीनेसे वमन होता है और पंचवृक्षोंका काथ बना मैनफूल मिला वमनके वास्ते देना चाहिये ॥ २३ ॥ हे वैद्य ! त्रिफला, निशोत, इनसे जुलाव दिलानी श्रेष्ठ है और वचका काथ बना गरम २ जलके संग पीना श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥ कुष्ठमें जो ज्यादा श्वास होवे तो शिरमें रहनेवाली वाहिरकी नस वींधनी चाहिये, पीछे क्वाथ और स्नेह अर्थात् घृत आदिक भोजन करवाना चाहिये ॥ २५ ॥ अथ शुण्ठ्यादिक्वाथ । शुण्ठीकणाखदिरपाटलिकापटोलीमञ्जिष्ठकंटविषबिल्वयवानि- कानाम्॥वासाफलत्रिकजलेन कषायसिद्धः पानान्निहन्ति मनु- जस्य च कुष्ठदोषम् ॥२६॥ वासाविडङ्गपिचुमन्दपटोलपाठा- शुण्ठीसुदारुतरुपञ्चमूलपथ्याः ॥ क्वाथो निहन्ति च मरुत्प्र- भवं सुकुष्ठं त्रिःसप्तकेऽहनि महौषधमेव योज्यम् ॥ २७ ॥ सूंठ, पीपल, खैर, पाड़लवृक्ष, परवल, मँजीठ, लघुगोखरू, अतीस, बेलगिरी, अजवायन, वांसा, त्रिफला, इनका काथ बना पीनेसे मनुष्यका कुष्ठरोग दूर होता है ॥ २६ ॥ वांसा, वायविडंग, नींव, परवल, पाठा, सूंठ, देवदार, बड़ आदि पंचवृक्ष, लाख, मूली,

अ० ३९] भाषाटीकासमेता । ( ४१७ ) हरडै इनके काथसे वातसे उपजा कुष्ठका नाश होता है, इक्कीस दिनतक यह महान् औषध पीना चाहिये ॥ २७ ॥ गुडूच्यादि क्वाथ । नित्यं छिन्नोद्भवाचूर्णं तस्याः क्वाथसमन्वितम् ॥ पीतं जीर्णे सघृ- तञ्च पीतञ्च षाष्टिकं पयः ॥ २८ ॥ हन्ति कुष्ठानि सर्वाणि सप्त- धातुगतानि च ॥ २९ ॥ गिलोयके क्वाथके संग गिलोयके चूर्णको नित्य पीवे । जर जावे तब घृत सहित सांठि चावलोंके मांडको पीवे ॥ २८ ॥ यह सातों धातुओंमें प्राप्त हुए सब कुष्ठोंको नाशता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठरोगमें लेपविधि । रसेन्द्रकाश्मर्यघनञ्च कुष्ठं निशाद्वयं काञ्जिककुष्ठमेतत् ॥ लेपे प्रशस्तं विनिहन्ति कुष्ठं विचर्चिकां चापि विसर्पदोषम् ॥३०॥ पिष्टानि तत्र मधुकाञ्जिकमूत्रपिष्टलेपेन कुष्ठमपि दुष्टविचर्चि- काञ्च ॥ ३१ ॥ विसर्पदोषे प्रोक्तानि धावनानि च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि धावनं त्रिफलाम्बुना ॥ ३२ ॥ वातिके चैव कुष्ठे च प्रशस्तं कथितं बुधैः॥ निम्बपत्रकषाये च यष्टीमधुक- कल्कितम् ॥ ३३ ॥ दुग्धेन शीतलेनापि विदार्याः क्वाथके- न वा ॥ हन्ति कुष्ठं महाघोरं धावनं न प्रशस्यते ॥३४॥ अग्नि- मन्थपटोलानि मातुलुङ्गदलानि च॥शटीपर्पटकःक्वाथो धावनं श्लेष्मरोगिणाम् ॥ ३५ ॥ विपादिकां नवनीतेन क्षालयित्वा विदांवर ॥ स्वेदयित्वार्कदुग्धैश्च मधुतैलेन लेपनम् ॥ ३६ ॥ खंभारी, सिंगरफ, नागरमोथा, कूठ, दोनों हलदी, कांजीमें शोधा हुआ लोहा, इनको पीस कुष्ठपै लेप करना श्रेष्ठ कहा है और विचर्चिका, विसर्पदोष, इनका नाश होता है ॥३०॥ सीसाकी रजको शहद, कांजी, गोमूत्र इनमें पीस लेप करनेसे कुष्ठ, दुष्ट विचर्चिका इनका नाश होता है ॥ ३१ ॥ विसर्प दोषमें कहेहुए धोवनेके कर्म यहां करने चाहिये और कांजी, त्रिफलाका रस इनसे धोना श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥ यह इलाज वैद्यजनोंने वातसे उपजे कुष्ठमें श्रेष्ठ कहा है और नींबके पत्तोंके काथमें मुलहटीका कल्क बना ॥ ३३ ॥ शीतल दूधमें मिला अथवा विदा- रीकंदके काथमें मिला उससे धोवनेसे महाघोर कुष्ठका नाश होता है ॥ ३४ ॥ अरणी, पर- २७

( ४१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बल, बिजौराके पत्ते, कचूर, पित्तपापडा इनका काथ बना कफसे उपजें कुष्ठको धोना श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ विपादिका कुष्ठको नौनी घृतसे संयुक्त कर तहां आकके दूधसे पसीना दिया शहद और तैलका लेप करे ॥ ३६ ॥ अथ खदिरआदि क्वाथ । खदिरनिम्बकदम्बकमर्जुनमथ च पाटलिका च शिरीषकम् ॥ कुटजकिंशुकवासुसमोरटो वटकुटं नटपिप्पलिपीलुकम् ॥३७॥ धवमुदुम्बरवेतसमेकतः कथितपानविधानघृतेन तु ॥ सकल- कुष्ठविनाशनकारकं भवति चेन्दुसमानवपुर्नरः ॥ ३८ ॥ खैर, नींव, कदंब, अर्जुनवृक्ष, पाडलवृक्ष, शिरस, कूडाकी छाल, टेशू, वांसा, मोर अर्थात् खैरका भेद, वड, टेंटूवृक्ष, पीलूवृक्ष ॥ ३७ ॥ धव, गूलर, वैत, इनको एक जग- हकर काथ बना घृत मिला पीनेसे संपूर्ण कुष्ठोंका नाश होता है और चंद्रमाके समान सुन्दर शरीर होजाता है ॥ ३८ ॥ अथ आरग्वधआदिक्वाथ । आरग्वधाधातकिर्काणकारधवार्जुनैः सज्जककिंशुकानाम् ॥ कदम्बनिम्बाकुटजाटरूषा मूर्वा च युक्ता खदिरेण चैषा ॥ ॥३९॥मूलानि चैषामुपहृत्य सम्यगष्टावशेषे कथितः कषायः॥ घृतेन तुल्यं प्रतिमानवस्य निहन्ति सर्वाणि शरीरजानि ॥ ॥ ४० ॥ कुष्ठानि सर्वाणि विसर्पदद्रुविचर्चिका हन्ति नरस्य शीघ्रम् ॥ ४१ ॥ अमलतास, धाय, कनेर, धववृक्ष, अर्जुनवृक्ष, रालवृक्ष, टेशू, कदंब, नींव, कूडाकी छाल, वांसा, खैर, मूर्वा ॥ ३९ ॥ इनकी जडको ले काथ बना लेवे पीछे अष्टमांश बाकी रहे तब उतार उसमें समान भाग घृत मिला खानेसे मनुष्यके शरीरके सब प्रकारके कुष्ठोंका नाश होता है ॥ ४० ॥ सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्परोग, दाद, विचर्चिका इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४१ ॥ अथ खदिरादिघृतपानक । खदिरकदरमूर्वावालकं कर्णिकारः कुटजसपरिभद्रारग्वधाभिश्च पिष्टाः॥कथितमिति समांशं पीतमाज्येन युक्तं जयति सकल- कुष्ठान् वै विसर्पस्य दोषान् ॥ ४२ ॥

५. पञ्चम व षष्ठ स्थान: शारीर स्थान, विष-चिकित्सा व उपसंहार

अ० ३९ ] भाषाटीकासमेता । (४१९) खैर, सफेद खैर, मूर्वा, नेत्रवाला, वडा अमलतास, कुडाकी छाल, नींव, अमलतासको पीस इन्हींके समान घृत मिला काथ बना पीनेसे संपूर्ण कुष्ठरोग विसर्पदोष इनका नाश होता है॥४२॥ अथ भल्लातक तैल । भल्लातकत्र्यूषणमक्षचूर्णं कुष्ठञ्च गुञ्जालवणानि पञ्च ॥ फलत्रिकं तैलविपाचितानि चाभ्यञ्जनं हन्ति च दद्रुकुष्ठम् ॥४३ ॥ भिलावा, त्र्यूषण अर्थात् सोंठ, मिर्च, पीपल, बहेडा, कूठ, घोंवचिल, पांचों नमक, त्रिफला इनको समान भाग ले चूर्ण बना तेलमें पकावे पीछे इस तेलकी मालिस करनेसे दद्रुकुष्ठका नाश होता है ॥ ४३ ॥ अथ तिलतैल । अश्वघ्नमूलं मलिनं समङ्गा निशाद्वयं सर्षपचित्रकञ्च ॥ सभृङ्ग- राजं कटुतुम्बिका च कुष्ठं विडङ्गं मगधा च चूर्णम् ॥४४॥ स्नु- ह्यर्कदुग्धेन विपाचितं तु तैलं तिलानां परिपक्वमेतत् ॥ अभ्यञ्जनं चैव नरस्य नूनं दद्रूणि कण्डूनि विनाशयेच्च ॥ ४५ ॥ कनेरकी जड, अगर, मंजीठ, दोनों हलदी, सरसों, चीता, भंगरा, कुटकी, तुंबी, कूठ, वायविडंग, पीपली ॥ ४४ ॥ इनको थोहरके और आकके दूधमें पका पीछे इसमें तिलोंके तेलको पकावे इसकी मालिस करनेसे मनुष्यके दद्रुकुष्ठोंका नाश शीघ्र ही होता है ॥ ४५ ॥ अथ हरिद्रादि तैल । हरिद्रा समङ्गा सुराह्वं सचित्राविडङ्गानि कृष्णा विशालाम्बु कुष्ठम् ॥ तथा लाङ्गली चक्रमर्दं च गुञ्जा विशाला तथारिष्ट- पत्राणि चैतत् ॥४६॥ सुचूर्णीकृतं भावितं वै तथैतद्गुडैनैव सर्वं हि घर्मे विपाच्यम् ॥ हितं लेपने कुष्ठपामाविचर्चीर्नरस्याति शीघ्रं निहन्तीति शल्यम् ॥ ४७ ॥ हलदी, मंजीठ, देवदार, चीता, वायविडंग, पीपली, इंद्रायण, नेत्रवाला, कूठ, कलहारी, चकौंडी, घोंवचिल, इंद्रायण, नींवके पत्ते ॥ ४६ ॥ इनको समान भाग ले चूर्ण बना गुड़के रसमें भावना दें । घाममें धरके पका लेप करना हित है । कुष्ठ, पामा, विचर्चिका इन रोगोंका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४७ ॥ अथ निंबादिघृत । निम्बं पटोलं च किरातकञ्च जाती विशाला सपुनर्नवा च ॥

( ४२० ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पयोदलाक्षारसमेव वासा त्रायन्तिका बिल्वककुष्ठयष्टिः ॥४८॥ संचूर्णितं क्षीरदधिसमेतं घृतं विपक्वं परिषेचने च ॥ हितञ्च कुष्ठ- क्षतदद्रुरक्तं पामाविचर्चीर्विनिहन्ति कण्डूम् ॥ ४९ ॥ नींव, परवल, चिरायता, जावित्री, इंद्रायण, सांठी, नागरमोथा, लाखका रस, वांसा, त्रायमाण, बिल्व, कूठ, मुलहठी ॥ ४८ ॥ इनका चूर्ण बना दही और दूध मिलावे उसमें घृत मिला सिद्ध करे पीछे इस घृतसे सेक करनेसे कुष्ठक्षत, दद्रुरक्त, पामा, विचर्चिका कंडू इनका नाश होता है ॥ ४९ ॥ अथ पांडुरकुष्ठकी चिकित्सा । पित्तञ्चैव गदं भूत्वा वातेनैव समीरितम् ॥ सरक्तञ्च प्रकुपितं कुरुते पाण्डुरच्छविम् ॥ ५० ॥ स्तब्धचित्तं विरूपञ्च शृणु तस्य च लक्षणम् ॥ असाध्यं कुष्ठं साध्यं वा विज्ञेयं तद्भिषग्वरैः ॥५१॥ ईषद्रक्तं भवेत् पाण्डु सन्निपातेन जायते ॥ असाध्यं तच्च सर्वाङ्गचित्रं स्निग्धं तदेव तु ॥ ५२ ॥ पीतच्छविं पाण्डुररूक्षमेव उपागतं साध्यतमं प्रतीतम् ॥ संपाचनं शोधनमेव शस्तं विरे- चनं रक्तविमोक्षणञ्च ॥ ५३ ॥ वासागुडूचित्रिफलाकरञ्जपटोल- निम्बार्जुनवेतसानाम् ॥ कृष्णासमङ्गासहितं च कल्कं पाने हितं चित्रकमण्डले च ॥५४॥ खदिरवासकनिम्बपटोलकैर्धवयवास- कमेव फलत्रिकैः ॥ सकलकुष्ठविसर्पमण्डलं विजयते मनुजस्य च पाण्डुरम् ॥५५॥ पाठाविडङ्गमगधासुरदारुचित्रं दद्रुघ्नरात्रि- युगलं च तथा समङ्गा॥ कुष्ठं वचामधुकसैन्धवकाञ्जिकेन मूत्रेण पिष्टमथ रक्तरसेन वापि ॥ ५६ ॥ प्रलेपने चित्रमथैव सिद्धं वि- नाशमायाति च कण्डुकुष्ठम् ॥ विचार्चिकां नाशयते च कण्डूं विस्फोटमाशु प्रतिसर्पणानि ॥५७॥ भृङ्गराजो हरिद्रा च दूर्वा जाती विडङ्गकाः॥कृष्णास्तिलाश्चित्रकाणि तथैव हरिचन्दनम् ॥५८॥ मूत्रेण पेषितं तत्तु लेपनं चित्रकुष्ठिनि ॥ हन्ति दद्रूणि सर्वाणि कुष्ठं दद्रूविचर्चिकाः ॥ ५९ ॥ न विदाहीनि चाम्लानि

अ० ४० ] भाषाटीकासमेता । (४२१) वातलानि तथैव च ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ व्रणेषु कुष्ठराजीषु हितमेवोपचारिणाम् ॥ ६०॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानामै- कोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इति कायतन्त्रं समाप्तम् ॥ वातसे प्रेरा हुआ पित्त रोगरूप होके रक्तके संग कुपित हो शरीरको पांडुर अर्थात् कुछ पीला सहित सफेद वर्णवाला करदेता है ॥ ५० ॥ चित्त दुखी रहे विरूप होजावे ऐसे लक्ष- णोंको सुनो, यह कुष्ठ असाध्य और साध्य दो प्रकारका होता है ॥ ५१ ॥ जो कुछ लाल वर्णसे युक्त पीला वर्णवाला कुष्ठ हो वह सन्निपातसे उपजा जानना वह असाध्य होता है उसमें सब अंगमें चिकने और चितले होते हैं ॥ ५२ ॥ जो रूखा तथा पीला वर्ण- वाला पांडुरकुष्ठ हो वह साध्य होता है उसमें पाचन और शोधन करना तथा जुलाब दिलानी और फस्त खुलानी श्रेष्ठ है ॥ ५३ ॥ वांसा, गिलोय, त्रिफला, करंजुवा, परवल, नींव, अर्जुनवृक्ष, बेंत, पीपल, मँजीठ, इन्होंका कल्क बना चित्रकमंडल कुष्ठमें पीना हित है ॥ ५४ ॥ खैर, वांसा, नींव, परवल, धव, जवांसा, त्रिफला, इनका कल्क बना पीनेसे सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्प, मंडल, पांडुरकुष्ठ, इनका नाश होता है ॥ ५५ ॥ पाठा, वायविडंग, पीपल, देवदार, चीता, पुआड, दोनों हलदी, मँजीठ, कूठ, वच, मुलहटी, सेंधानमक, इनको कांजीमें अथवा गोमूत्रमें अथवा रुधिरके रसमें पीसि ॥ ५६ ॥ लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और खाजवाला कुष्ठ, विचार्चिका, कंडू, विस्फोटक, विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५७ ॥ भंगरा, हलदी, दूब, जीरा, वायविडंग, कोले तिल, चीता, लाल चंदन ॥ ५८ ॥ इनको गोमूत्रमें पीस लेप करनेसे चित्रकुष्ठका नाश होता है और सबप्रकारके दाद, दद्रुकुष्ठ, विचार्चिका, विस्फोटक और विसर्प इनका नाश होता है ॥ ५९ ॥ कुष्ठरोगमें विदाही, खट्टा, वातवाला ऐसा भोजन नहीं करना चाहिये, और ज्वरमें कहेहुए जो पथ्य हैं वे यहाँ करने चाहिये और व्रणोंमें कुष्ठोंमें, यही उपचार करना श्रेष्ठ है ६० ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने कुष्ठचिकित्सानाम एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ चत्वारिंशोऽध्यायः ४०. अथ शालाक्य तंत्र । अथ शिरोरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अतिभाषातियोगेन अतितीक्ष्णोष्णभावतः॥

विनाभ्यङ्गेन वा शैत्यात्पित्तेनातिविशेषतः ॥१॥ क्रिमिदोषेण वा पुंसां जायते च शिरोगदः॥वातरक्तकफात्पित्तात्पित्तेनापि विशेषतः॥२॥सन्निपातेन विज्ञेयाः क्रिमिजाश्च तथापरे॥अर्द्ध- शीर्षविकारश्च दिनवृद्धिकरस्तथा ॥ ३ ॥ वातेन रात्रौ भवते व्यथा च अथातुरस्य व्यथते शिरश्च ॥ सौख्यं लभेत्स्वेदन- मर्दनेन वातेन सा विड्वृषणे रुजा वा॥४॥यस्योष्णमङ्गं भवते शिरस्यं घर्मे संतापे च दिने च रात्रौ ॥ स धूमतो वा कटुको बलाशे शीतात्सुखं वा निशि स्वास्थ्यमेति ॥५ ॥ शीतात्सुख वा प्रथमश्च तृष्णा सतीव्रापित्ताद्भवते रुजा च॥ सूर्योदये वा भवते दिनान्ते भ्रमश्च तृष्णा भवते सुतीव्रा॥६॥सजाड्य- मुण्डं भवते च शीतं स्वेदेन युक्तं युगलञ्च नूनम् ॥ सुदृश्यनेत्रं नयते च तद्वा कफे यदीष्टः शिरसो विकारः॥७॥रक्तेन नासा- पुटकेऽपि जालं निरेति शेषा वदने च तृष्णा ॥ रक्ताक्षमन्द्या जठरे च यस्य तमाहू रक्तोद्भवशीर्षरोगम् ॥८॥ मध्यं प्रदूष्य प्रतनोति पीता नासापरिस्रावि सविड्जलञ्च॥सजाड्यमोहश्व- सनं च यस्य त्रिदोषरोधाद्भवते शिरोऽर्त्तिः॥९ ॥ यस्यातिमात्रं शिरसि प्रतोदो विभज्यमानेऽपि च मस्तकान्ते ॥घ्राणे परि- स्रावि सरक्तपूयं क्रिमिप्रसूता च शिरोव्यथा च ॥१०॥क्रोधा- च्छोकाद्भवेच्चान्या व्यायामेऽतिश्रमेषु च ॥ सा वातेन शिरः- पीडा सरुजे च नृणामपि ॥ ११ ॥ अतिलेखनपाठेन तथा सूक्ष्मान्निरिक्षणात्॥ दूरदृष्टेक्षणेनापि वेदना वातरक्तजा ॥१२॥ नासिकाद्धे व्यथा तस्य व्यथाभ्रूयुगले भवेत् ॥ नीलं कृष्णञ्च पश्येत वेदना मस्तके भवेत् ॥ १३ ॥ न रक्तेन विना पित्तं रक्तं पित्तेन चाल्यते ॥ न पित्तेन शिरोऽर्त्तिः स्यात्पित्तं वातेन चाल्यते ॥ १४ ॥

अ० ४०.] भाषाटीकासमेता । ( ४२३ ) आत्रेयजी कहते हैं—अतिभारके अत्यन्त योगसे अतितीक्ष्ण भावसे तैलादिकी मालिस करे बिना शीतलता लगनेसे अत्यंत पित्तसे ॥ १ ॥ अथवा क्रिमि दोषसे पुरुषोंके शिरो- रोग होता है और वातरक्त, कफपित्त, पित्त ॥ २ ॥ अथवा सन्निपात, इनसे उत्पन्न होने- वाले शिरोरोग क्रिमिन शिरोरोग ऐसे होते हैं, और अधशिरका विकार तथा दिनके चढ़नेके समय शिरोरोग होता है ॥ ३ ॥ वातदोषसे उपजे शिरोरोगमें रात्रिमें पीडा हो, और पीड़ित हुएका शिर दुखे और पसीना दिलाने तथा मर्दन करनेसे सुख होवे । विष्ठा उतरनेके समय अथवा वृषणस्थानमें दुःखहो वह वातसे उपजी पीडा जाननी ॥ ४ ॥ जिसका शिर गर्म रहे और घामसे संतापमें दिनमें अथवा रात्रिमें धुवांसे शिरमें पीड़ाहो, कडू कफ भिरे वह पित्तसे उपजा शिरोरोग जानना जिसमें रात्रिमें सुख होता है ॥ ५ ॥ और शीतलतासे सुख हो, तृषा लगे, तीव्र पीड़ाहो, वह पित्तसे उपजी पीडा जाननी और जो सूर्योदयमें अथवा दिनके अंतमें शमहो तृणाहो पीड़ाहो ॥६॥ शिरमें जड़ताहो शीतलहो पसीनेसे युक्त दोनों नेत्रहों और सुंदर नेत्रहों वह कफसे उपजा शिरोविकार जानना ॥ ७ ॥ और रक्तसे उपजे शिरके विकारसे नासिकासे रक्त झिरे, मुखमें तृषा रहे, और जिसके कंघा, कंघाके समीप मन्यास्थान, पैर, ये लाल हों उसको कफसे उपजा शिरोरोग कहते हैं ॥ ८ ॥ मध्यमें दूषित हो, पीली नासिका होजावे, दुर्गंधि सहित जल झिरे, जड़ता हो, मोहहो, श्वासहो वह त्रिदोषसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ ९ ॥ जिसके शिरमें अत्यंत व्यथा हो और मस्तक फटाजावे नासिकासे रक्त और राध झिरे वह क्रिमियोंसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ १० ॥ और क्रोध, शोक, कसरत, अत्यंत परिश्रम इनसे उपजी हुई पीड़ा वातके कोपसे होती है वहां व्यथा होती है ॥ ११ ॥ अत्यंत लिखना, पढ़ना, सूक्ष्म देखना, दूरसे दृष्टिदेके देखना इनसे उपजी पीडा वात रक्तके कोपसे जाननी ॥ १२ ॥ उसकी आधी नासिकामें और दोनों भुकुटियोंके आधे भागमें पीडा हो, नीला और काला वर्ण सरीखा दीखे, मस्त- कमें पीड़ाहो ॥ १३ ॥ रक्तके बिना पित्त नहीं होती है और रक्त, पित्तसे चलायमान होता है और पित्तसे विना शिरमें पीडा नहीं होती है, पित्त वातसे चलायामान होता है ॥१४॥ तस्माद्वक्ष्याम्युपचारं शृणु भेषजलक्षणम् ॥ स्वेदः प्रलेपनं नस्यं पानाभ्यङ्गश्च मर्दनम् ॥ १५ ॥ स्वेदनं वातकफजे चाभिघाते तथा पुनः॥ पित्तजे रक्तजे वापि न कुर्यात्स्वेदनं तयोः॥१६॥ रक्तजे च शिरा वेध्या पित्तजे वापि कुत्रचित्॥ कोकिलाख्या च तर्कारि कटुका निम्बपत्रकैः ॥ १७ ॥ शोभाञ्जनकपत्रैस्तु क्वाथं वा तेन स्वेदयेत् ॥ अमीषाञ्च प्रलेपेन सौख्यं चास्य प्रजायते ॥१८॥ संशीतपरिषेकैश्च यष्टीमधुकचन्दनैः ॥ केसरै-

( ४२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मातुलुङ्गैश्च पित्तजे शीतलेपनम् ॥ १९ ॥ कदम्बार्जुनसिन्धूश्च लेपनार्थे भिषग्वर ॥ गुडेन नागरा वापि पथ्यां वापि गुडेन वा ॥२०॥ गुडशोभाञ्जनरसैर्नस्ययोगात्पृथक्पृथक् ॥ नस्येन बस्तमूत्रेण शिरोऽर्त्तिश्चोपशाम्यति ॥२१॥ मरिचं पथ्या कट्- फलं मूत्रेणोष्णोदकेन वा ॥ नस्यं कफोद्भवे घोरे शिरोरोगे भिषग्वर ॥२२॥ वचामधुकसारं वा मूलं वा गिरिकर्णिका ॥ नस्यप्रयोगे विहितं सन्निपाते शिरोगदे ॥ २३ ॥ वन्ध्याकर्कोट- कीमूलं पिष्टमूष्णेन वारिणा ॥ मितं नस्ये प्रयुञ्जीत क्रिमिजे च शिरोगदे ॥ २४ ॥ इसवास्ते इसके उपचारको कहते हैं औषधोंको सुनो-पसीना दिवाना, लेप करना, नस्य दिवानी, पान कराना, मालिस मर्दन कराना ॥ १५ ॥ वात कफसे उपजे तथा चोट आदिसे उपजे शिरोरोगमें पसीना दिवावे और पित्तसे तथा रक्तसे उपजेमें पसीना नहीं दिवावे ॥ १६ ॥ रक्तसे उपजे शिरोरोगमें फस्त खुलावे और कहींक पित्तसे उपजेमेंभी शिरावेध श्रेष्ठ है और कंकोल, अरणी, कुटकी, नींवके पत्ते ॥ १७ ॥ सहिजनके पत्तेका काथ बना उससे पसीना दिवावे अथवा इनके लेप करनेसे सुख होता है ॥ १८ ॥ पित्तके शिरोरोगमें मुलहटी, महुआवृक्ष, चंदन, इनके शीतल काथसे परिषेक करे और बिजौरेकी केशरसे शीतल २ लेप करे ॥ १९ ॥ और हे उत्तमवैद्य ! कदंब, अर्जुनवृक्ष, सेंधानमक, इनका लेप करना श्रेष्ठ है और गुडके संग सोंठ, तथा हरडैका लेप श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ और गुड़ सहिज- नेका रस इनकी पृथक् २ नस्य देनी श्रेष्ठ है और बकरेके मूत्रकी नस्य देनेसे शिरकी पीडाका नाश होता है ॥ २१ ॥ और कफसे उपजे घोर शिरोरोगमें मिर्च, हरड़ै, कायफल, इनको पीस गरम २ गोमूत्रके संग नस्य देना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ वच, महुआ, मूली, अमलतास, इनको नस्यमें देनेसे सन्निपातसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २३ ॥ बांझ कक्रोडीकी जडको पीस गरम जलके संग नस्य देनेसे कृमिसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २४ ॥ अथ षड्बिन्दुनामकतैल । भृङ्गराजरसं चैकं द्विभागं काञ्जिकेन च ॥ शोभाञ्जनं भागत्रयं सर्वं तत्र विनिक्षिपेत् ॥२५॥ सौवीरकरसं पञ्च षड्भागं तुम्बि- कारसम्॥ शुण्ठी सैन्धवमम्लीका पटोलं वासकं शिवा॥२६॥ अभया सुरसा चैव तैलञ्च चतुरंशकम् ॥ पाचितं तन्तु नस्येन

०अ० ४० ] भाषाटीकासमेता । ( ४२५ ) योजयेच्च षड्बिन्दुकम्॥२७॥ तथैव मस्तकाभ्यङ्गे हितं स्यात् कर्णपूरके॥हितं वातादिजे रोगे शिरोऽत्तौं क्रिमिजे तथा ॥२८॥ भांगरेका रस एक भाग, कांजीदो भाग, हिंसजना ३ भाग॥२५॥बेरोंका रस पांच भाग तुम्बीका रस ६ भाग इनको एक जगह मिला सोंठ, सेंधानमक, अमली, परवल, वांसा, हलदी ॥२६॥ हरडै, तुलसी इनको मिला पीछे इन सब रसोंसे चतुर्थांश तैल मिला उसको पकाके उस तैलकी छह बूंद नस्यमें देनेसे ॥ २७ ॥ तथा मस्तकपर लेप करनेसे अथवा कानमें पूरनेसे वातादिक शिरोरोग तथा क्रिमियोंसे उपजा शिरके रोगका नाश होता है ॥ २८ ॥ अथ बिन्दुत्रयतैल । करञ्जबीजस्य विभीतकानां पुटेन तैलं परिस्रुत्य धीमन् ॥ बिन्दुत्रयं नस्यविधौ प्रयोज्यं जघान कुष्ठं क्रिमिजं विकारम्॥२९ करंजुवाके बीज, बहेड़ा, इनको पुटपाकमें धर तैल निकास उसकी तीन बूँद नस्यमें देवे यह तैल कुष्ठ, क्रिमिसे उपजा विकार इनका नाश करता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठादिघृत । कुष्ठं च यष्टीमधुकं च नीत्वा पटोलजातीसुरसारसञ्च॥ विपा- चितं तन्नवनीतकञ्च घृतेन नूनं च सरक्तपित्ते ॥३०॥ सशर्क- रायुक्तमिदं दिवा च गव्यं प्रवृद्धप्रभवे च दोषे ॥ ३१ ॥ कूंठ, मुलहटी, परवल, जावित्री, तुलसी रस, नौनी घृत इन्होंको पकालेये पीछे इस घृतकी नस्य रक्तपित्तसे उपजें शिरके रोगमें देवे ॥३०॥ और दिनके बढ़नेके समय जो दर्द बढ़ाता है ऐसे रोगमें इस घृतमें खांड मिलाके नस्य देना हित है ॥ ३१ ॥ अथ लाक्षादितैल । लाक्षारसं चन्दनयष्टिकानां पटोलधात्रीफलशर्कराणाम् ॥दधि सदुग्धं नवनीतकञ्च विपाचिते नस्यविधौ प्रयुज्यते ॥ ३२ ॥ भ्रूदोषशङ्खक्षतजक्षये वा दिनादिवृद्धया प्रभवेऽपि दोषे ॥३३॥ लाखका रस, चंदन, मुलहटी, परवल, आंवला, खांड, दही, दूध, नौनीघृत इनको पका नस्य देनेसे ॥३२॥ भ्रूदोष कनपटीस्थानका दर्द चोटसे तथा क्षयरोगसे उपजा तथा दिनवृद्धिके अनु- सार शिरोरोग इनका नाश होता है ॥ ३३ ॥ अथ कुंकुमादिघृत । कुङ्कुमं यष्टिमधुकं कुष्ठं च शर्करासमम्॥पक्वञ्च नवनीतेन घृतं

( ४२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- नस्ये प्रयोजयेत् ॥३४॥ नश्यन्ति पित्तजा रोगा दिनवृद्धयो- पवर्जनात् ॥ अर्द्धशीर्षविकारश्च प्रशमं याति सत्वरम् ॥३५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सा नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ केशर, मुलहटी, कूट, खांड, नौनीघृत इनको समान भाग ले पकाके नस्य देनेसे ॥ ३४ ॥ पित्तसे उपजे तथा दिनवृद्धि, शिरोरोग, अधसिरा इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥३५॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सानाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ एकचत्वारिंशोऽध्यायः ४१. अथ भ्रूदोषलक्षण । आत्रेय उवाच॥अतिपठनशीलस्य सूक्ष्मवस्त्रेक्षणेन वा॥दूरालो- केन चोष्णेन भ्रूदोषश्चोपजायते ॥ १ ॥ रक्तवाताश्रितो दोषः पित्तेन सह मूर्च्छितः ॥ अन्यथा च प्रभवति नासावंशोद्भवा शिरा ॥ २ ॥ व्यथते चोष्णवेलासु शीतेन स्याद्विशेषतः ॥ नेत्रमध्ये नीलपीतमण्डलानि च पश्यति ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अत्यंत पढ़नेसे सूक्ष्म वस्त्र आदिके देखनेसे दूरसे देखनेसे गरम वस्तुके सेवनेसे भ्रूदोष रोग होजाता है ॥१॥ रक्त वातके आश्रयहुआ दोष पित्तके संग मूर्च्छित भ्रुकुटियोंमें पीड़ाकर देता है और नासिकाकी डंडीपर होनेवाली नस ॥ २ ॥ पीड़ित होती है गरमीके समय पीड़ा होती है और ठंडकमें ज्यादे पीड़ा होती है और नेत्रोंके मध्यमें नीले और पीले मंडल दीखे ॥ ३ ॥ भ्रूदोषकी चिकित्सा । तस्यादौ च क्रियां कुर्याच्छिरा वेध्या प्रयत्नतः॥पूर्वोक्तं स्वेदनं कार्य नस्ये षड्बिन्दुकादिकम् ॥ ४ ॥ देवदारु रजनी घनं शटी पुष्करं कुटजबीजमागधी ॥ कुष्ठरोध्रचविकायवासकं क्वाथितं च पुनरेव विस्रुतम् ॥ ५ ॥ तत्र गुग्गुलमपि क्षिपेत्पुनः