भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

६० हर्षचरितम् अवश्यं गन्तव्यञ्च । सर्वथा भगवान्भवानीपतिर्भुवनपतिर्गतस्य मे शर- णम्, सर्वं सांप्रतमाचरिष्यति, इत्यवधार्य गमनाय मतिमकरोत् । अथान्यस्मिन्नहन्युत्थाय, प्रातरेव स्नात्वा, धृतधवलदुकूलवासाः, गृहीताक्षमालः, प्रास्थानिकानि सूक्तानि मन्त्रपदानि च बहुशः समावर्त्य देवदेवस्य विरूपाक्षस्य क्षीरस्नपनपुरःसरं सुरभिकुसुमधूपगन्धध्वजबलि- विलेपनप्रदीपकबहुलां विधाय परमया भक्त्या पूजाम्, प्रथमहुततरलति- लत्वग्विघटनचटुलमुखरशिखाशेखरं प्राज्याज्याहुतिप्रवर्धितदक्षिणार्चिषं भगवन्तमाशुशुक्षणिं हुत्वा, दत्त्वा शुल्मं यथाविद्यमानं द्विजेभ्यः, प्रदक्षि- णीकृत्य प्राङ्मुखीं नैचिकीम्, शुक्लाङ्गरागः, शुक्लमाल्यः, शुक्लवासाः, रोच- नाचित्रदूर्वाप्रपल्लवग्रथितगिरिकर्णिकाकुसुमकृतकर्णपूरः, शिखासक्तसिद्धा- र्थकः, पितुः कनीयस्या स्वस्रा मात्रेव स्नेहार्द्रहृदयया श्वेतवाससा साक्षा-

अवश्यं गन्तव्यं चेत्यादि । 'काकुः स्त्रियां विकारो यः शोकभीत्यादिभिर्ध्वनेः' । इह च लक्षणया वक्रोक्तिः । सांप्रतं युक्तम् । अथेत्यादौ । अन्यस्मिन्नहनि प्रीतिकूटान्निर्गत्यादिति संबन्धः । प्रस्थानं प्रयोजनं येषां तानि प्रास्थानिकानि सूक्तानि, वेदोक्ता मन्त्रविशेषाः । विरूपाक्षस्यद्यः । प्राज्यं भूरि । आज्यं घृतम् । शुल्मं धनम् । यथाविद्यमानमित्यनेन निर्लोभतोक्ता । नैचिकीं वराङ्गीम्, होमधेनुं वा, शुक्लां वा । गिरिकर्णिकाश्वखुरी मङ्गल्यौषधिः । सिद्धार्थकाः सर्षपाः । स्वस्रा भगिन्या । महाश्वेता देवताविशेषः । रविस्थदेवते-

है। जाना तो पड़ेगा ही। त्रिभुवन-गुरु भगवान् शंकर मेरी शरण हैं, वही जाने पर सब भला करेंगे।' यही सोचकर चलने का इरादा पक्का कर लिया । दूसरे दिन बाण उठे, प्रातःकाल ही स्नान कर लिया । श्वेत दुकूल पहनकर हाथ में अक्षमाला ली । प्रास्थानिक सूक्तों और मन्त्रों को बारबार दुहराया और देवों के देव भगवान् शंकर की दूध से स्नान कराके सुगन्धित फूल, धूप की गन्ध, ध्वज, भोग, विलेपन, प्रदीप आदि सामग्री के साथ बड़ी श्रद्धा-भक्ति से अर्चना की। अग्नि में आहुति दी। पहली बार तिल की आहुति पड़ते ही अग्नि की शिखाएँ चटकने लगीं और तब घी की आहुति पड़ते ही बढ़ गई। तत्पश्चात् बाण ने अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा दी। पूर्व की ओर खड़ी हुई उत्तम गौ की प्रदक्षिणा की। श्वेत चन्दन, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किया। गोरोचना लगाकर दूबनाल में गुथे हुए श्वेत अपराजिता के फूलों का कर्णफूल कान में लगाया, चोटी में पीली सरसों रखी। पिता

तृतीय उच्छ्वास: प्रभाकरवर्धन व स्थाण्वीश्वर राज्य वर्णन

द्वितीय उच्छ्वासः ६१ दिब भगवत्या महाश्वेतया मालत्याख्यया कृतसकलगमनमङ्गलः, दत्ता- शीर्वांदो बान्धववृद्धाभिः, अभिनन्दितः परिजनजरतीभिः, वन्दितचर- णैरभ्यनुज्ञातो गुरुभिः, अभिवादितैराघ्रातः शिरसि कुलवृद्धैः, वर्धित- गमनोत्साहः शकुनैः, मौहूतिकमतेन कृतनक्षत्रदोहदः, शोभने मुहूर्ते हरितगोमयोपलिप्ताजिरस्थण्डिलस्थापितमसितेतरकुसुममालापरिक्षिप्तक- ण्ठं दत्तपिष्टपञ्चाङ्गुलपाण्डुरं मुखनिहितनवचूतपल्लवं पूर्णकलशमीक्ष- माणः, प्रणम्य कुलदेवताभ्यः कुसुमफलपाणिभिरप्रतिरथं जपद्भिनिर्जद्वि- जैरनुगम्यमानः, प्रथमचलितदक्षिणचरणः, प्रीतिकूटाद्विनिर्गात् । प्रथमेऽहनि तु घर्मकालकष्टं निरुदकं निष्पत्रपादपविषमं पथिकजन- नमस्क्रियमाणप्रवेशपादपोत्कीर्णकात्यायनीप्रतियातनं शुष्कमपि पल्लवित- मिव तृषितश्वापदकुललम्बितलोलजिह्वालतासहस्रैः पुलकितमिवाच्छभ- त्यन्ये । दत्तंत्यादिभागो बान्धववृद्धाभिप्रायेण समुचित एव । अभिनन्दित इति । प्रतिपदं द्वयमुह्यम् । जरत्यो वृद्धाः । आघ्रातः शिरसि चुम्बितः । मौहूर्तिका गणकाः । नक्षत्रदोहदं प्रतिनक्षत्रप्राशनम्, नक्षत्रविषयोऽभिलाषो वा । अजिर- मङ्गणम् । स्थण्डिलं भूः । परिक्षिप्तो वेष्टितः । पिष्टपञ्चाङ्गुलमाजकोक्ताभिः पञ्च- भिरङ्गुलीभिमङ्कल्याय दीयते । अप्रतिरथं प्रास्थानिकं मन्त्रम् । निजैस्त्यादिना स्वस्य दातृत्वमुक्तम् । उत्कोर्णां निखाता । कात्यायनी दुर्गा । प्रतियातना प्रतिमा । काननत्वात्पह- की छोटी बहन मालती ने जो माता के समान स्नेह॒ भरे हृदयवाली, मानो भगवती महाश्वेता हों, बाण के प्रस्थान-समय के लिये उचित मङ्गलाचार किया। सगी वृद्धाओं ने आशीर्वाद दिया और परिवार की वृद्धाओं ने अभिनन्दन किया । पूजितचरण गुरुओं ने जाने की अनुमति दी और अभिवादित कुलवृद्धों ने मस्तक सूँघा। शकुनों से जाने का उत्साह बढ़ा। फिर ज्योतिषी के अनुसार नक्षत्र-देवताओं को प्रसन्न किया । इस प्रकार शुभ मुहूर्त में हरित गोबर से लिपे हुए आँगन के चौतरे पर स्थापित पूर्ण कलश के दर्शन करके कुलदेवताओं को प्रणाम करके, हाथ में फल-फूल लिए हुए और अप्रतिरथ सूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए अपने पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा अनुगत होकर बाण दाहिना पैर पहले उठाकर प्रीतिकूट से निकले । पहले दिन चण्डिका वन पार किया और मल्लकूट नामक गाँव में पड़ाव किया। चण्डिका वन के मार्ग में घाम हो जाने के कारण बाण को चलने में कष्ट हुआ, क्योंकि

५२ हर्षचरितम् ल्लगोलाङ्गूललिह्यमानमधुगोलचलितसरघासंघातै रोमाञ्चितमिव दग्ध- स्थलीरूढस्थूलाभीरुकन्दलशतैः शनैश्चण्डिकायतनकाननमतिक्रम्य मल्ल- कूटनामानं ग्राममगात् । तत्र च हृदयनिर्विशेषेण भ्रात्रा सुहृदा च जग- त्पतिनाम्ना संपादितसपर्यः सुखमवसत् । अथापरेद्युरुत्तीर्य भगवतीं भागीरथीं यष्टिगृहकनाम्नि वनग्रामके निशामनयत् । अन्यस्मिन्दिवसे स्कन्धावारमुपमणिपुरमन्वजिरवति कृतसन्निवेशं समाससाद । अतिष्ठच्च नातिदूरे राजभवनस्य । निर्वर्तितस्नानाशनव्यतिकरो विश्रान्तश्च मेखलकेन सह याममात्रा- वशेषे दिवसे भुक्तवति भूपुजि प्रख्यातानां क्षितिभुजां बहूनिशिबिरसंनि- वेशान्वीक्षमाणः शनैः शनैः पट्टबन्धार्थमुपस्थापितैश्च डिण्डिमाधिरोहणा- याहूतैश्चाभिनवबद्धैश्च विद्वेषोपार्जितैश्च कौशलिकायतैश्च प्रथमदर्शनकु- वितमिवेत्युत्प्रेक्षा । जिह्वैव लता, दीर्घत्वात् । गोलाङ्गुलः कृष्णमुखो वानरः । मधुगोलं माक्षिककरण्डः । सरघा मधुमक्षिकाः । अभीरुः शतावरी । कन्दलानि नवनालानि । भ्रात्रेति चन्द्रसेनेन । हृदयत्याद्यभिप्रायेण सुखमित्युक्तम् । उपमणिपुरं पत्तनभेदम् । अन्वजिरवति नदीभेदनिकटे । संनिवेशो गृहादिरचना । निर्वर्तितस्त्यादौ राजद्वारमीदृशमगमदिति संबन्धः । निर्वर्तितेत्यादि । राज- दर्शनेऽकातरत्वमात्मनः प्रतिपादयति । वारणेन्द्रैः श्यामायमानमिति राजद्वारवि- वहाँ कहीं जल का ठिकाना न था और न घनी छाया वाले पेड़ ही मिले । कहीं-कहीं वन के वृक्षों पर कात्यायनी की मूर्तियाँ खुदी हुई थीं जिन्हें रास्ते में आते जाते पथिक नमस्कार करते थे । वह वन सूख गया था, फिर भी श्वापद जन्तुओं की लपलपाती जीभें उस वन को मानों पल्लवित कर रही थीं । भालू और लंगूर मधुमक्खियों के छत्ते को चाटने लगते तो ये भन्नाकर उड़ने लगतीं मानों वन इस दृश्य से पुलकित हो रहा था । दावाग्नि से जली हुई वनभूमि में सतावर के पौधे इस तरह निकल आये थे मानों वह जंगल रोमाञ्चित हो उठा हो । मल्लकूट ग्राम में बाण के परममित्र और भाई जगत्पति ने उसकी आवभगत की और सुखपूर्वक ठहराया । दूसरे दिन बाण ने गङ्गा पार कर यष्टिगृहक नाम के वन गाँव में रात बिताई । फिर राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणिपुर नामक ग्राम के समीप छावनी में पहुँचा और राजभवन के पास ही ठहरा । बाण ने स्नान-भोजन आदि से निवृत्त होकर विश्राम किया और जब एक पहर दिन रहा और हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब मेखलक को साथ लेकर उनसे

द्वितीय उच्छ्वासः ६३ तूहलोपनीतैश्च नागवीथीपालप्रेषितैश्च पल्लीपरिवृढढौकितैश्च स्वेच्छायुद्ध- क्रीडाकौतुकाकारितैश्च दूतसंप्रेषणप्रेषितैश्च दीयमानैश्चाच्छिद्यमानैश्च मुच्य- मानैश्च यामावस्थापितैश्च सर्वद्वीपविजिगीषया गिरिमिरिव सागरसेतुबन्ध- नार्थमेकीकृतैर्ध्वजपटपटुपटहशङ्खचामराङ्गरागरमणीयैः पुष्याभिषेकदिव- तैरिव कल्पितैर्वारणैन्द्रैः श्यामायमानम् , अनवरतचलितखुरपुटप्रहतमृद- ङ्गैश्च नर्तयद्भिरिव राजलक्ष्मीमुपहसद्भिरिव सृक्विपुटप्रसृतफेनाट्टहासेन जबजडजङ्घां हरिणजातिमाकारयद्भिरिव संघट्टहेतोर्हर्षहेषितेनोच्चैःश्रव- समुत्पतद्भिरिव दिवसकररथतुरगरुषा पक्षायमाणमण्डनचामरमालैर्ग- गनतलं तुरङ्गेस्तरङ्गायमाणम्, अन्यत्र प्रेषितैश्च प्रेष्यमाणैश्च प्रेषितप्रतिनि- वृत्तैश्च बहुयोजनगमनगणनसंख्याक्षरावलीभिरिव वराटिकावलीभिर्घटित- मुखमण्डनकस्तारकितैरिव संख्यातपच्छेदरुणचामरिका रचितकर्णपूरैः शोषणम् । डिण्डिमः पटहः । विक्षेपः करः । नागवीथी हस्तिभूः । पल्ली शवरवसतिः । परिवृढः स्वामी । आकारितैराह्वानैः । आच्छिद्यमानैरपहियमाणैः । यत्र दिने पुष्यनक्षत्रे राजा स्नाति तद्दिनं पुष्याभिषेकाख्यम् । श्यामायमानं कालत्वमाप- द्यमानम् । अथ च दिवसः श्यामायति रात्रिवदाचरतीति वक्रोक्तिः । अभि- षेकदिनानि च ध्वजादिरम्याणि । अनवरतत्यादौ । तुरङ्गैस्तरङ्गायमाणमिति संबन्धः । मृदोऽङ्गं मृदङ्गश्च मुरजः । सृक्किण्योष्ठपर्यन्तौ । अन्यत्रेत्यादौ—क्रमेलककुलैः कपि- मिलने के लिए चला । वह राजाओं के अनेक शिविरों को देखता हुआ धीरे-धीरे राजद्वार के पास आया । राजद्वार पर बड़े-बड़े हाथी झूम रहे थे, कुछ पट्टबन्ध के लिए लाए गए, कुछ धौँसे चढ़ाने के लिए लाए गए, कुछ नए पकड़ कर लाए हुए, कुछ कर रूप में प्राप्त, कुछ नागवीथी या नागवन के अधिपतियों द्वारा भेजे गए, शबर बस्तियों के सरदारों द्वारा भेजे हुए, कुछ गजयुद्ध की क्रीडाओं और खेल-तमाशों के लिए बुलाए गए या स्वेच्छा से दिए गए, कुछ तो बलपूर्वक छीने गए, कुछ बंधन से मुक्त हुए और कुछ पहरे के लिए रखे गए थे। मानो समस्त द्वीपों पर विजय पाने की इच्छा से समुद्रों में पुल बाँधने के लिए पहाड़ के पहाड़ जुटाए गए हों। ध्वजपट, पटह, शंख, चामर, अंगराग आदि से सजे हाथी दीख पड़े, मानों अभिषेक के पुण्य दिन ही एकत्र हो गए। वहाँ घोड़े लहरों के समान मचल रहे थे। उनके चंचल खुरों की टाप हमेशा मृदंग की आवाज में जमीन पर पड़ रही थी मानों राजलक्ष्मी को नचा रहे थे। थूथून तक बहते हुए मुँह के गाज के अट्टहास से वे मानों वेग से विडंडित जाँघ वाले हरिणों का उपहास कर रहे थे। प्रसन्नता से इस तरह हिनहिना रहे थे मानों होड़ के लिए इन्द्र के घोड़े उच्चैःश्रवा को पुकार रहे हों। सूर्य के रथ के घोड़ों की मानों ईर्ष्या से वे

५४ हर्षचरितम् सरक्तोत्पलैरिव रक्तशालिशालेयैरनवरतमणभणायमानचारुचामीकरघुरु- घुरुकमालिकैरर्जत्कारञ्जवनैरिव रणितशुष्कबीजकोशीशतैः श्रवणोपान्तप्रे- ङ्खत्पञ्चरागवर्णोर्णाचित्रसूत्रजूटजटाजालैः कपिकपोलकपिलैः क्रमेलककुलैः कपिलायमानम्, अन्यत्र शरज्जलधरैरिव सद्यःस्रुतपयः पटलधवलतनुभिः कल्पपादपैरिव मुक्ताफलजालकजायमानालोकलुप्तच्छायमण्डलैर्नारायण- नाभिपुण्डरीकैरिवाश्लिष्टगरुडपक्षैः क्षीरोदोद्देशैरिव द्योतमानविकटविद्रु- मदण्डैः शेषफणाफलकैरिवोपरिस्फुरत्स्फीतमाणिक्यखण्डैः श्वेतगङ्गा- पुलिनैरिव राजहंसोपसेवितैरभिभवद्भिरिव निदाघसमयमुपहसद्भिरिव लायमानमित्यन्वयः । वराटिकाः श्वेतिकाः । शालीनां भवनं क्षेत्रं शालेयम् । ‘व्रीहिशाल्योर्ढक्’ । बीजकोशी शिम्बिका । क्रमेलका उष्ट्राः । अन्यत्रेत्यादिनाऽऽत- पत्रखण्डैः श्वेतायमानमित्यन्वयः । सद्य इत्याद्यभिप्रायेण शरद्ग्रहणम् । स्रुतं निर्गतम् । पयः क्षीरम्, जलं च । पटलवत्सेन च धवला तनुराकारो येषाम् । अन्यत्र,-धवलाश्च ते तनवः, क्षीणाश्च ते । पुण्डरीकग्रहणेनाकारसादृश्यत्वमप्युच्यते । गरुडपक्षा रत्नभेदाः, गरुडस्य चाङ्गरुहाः । क्षीरोदेति । शुक्कतया राजहंसाः मुख्यनृपाः; रक्तचञ्चुचरणा राजहंसाः । निदाघस्य तिरस्करणादभिभवद्भिरिवेत्युक्तम्—उपहस- स्वयं अपनी चामरमाला को पंख बनाकर आकाश में उड़ जाना चाहते थे। ऊँटों ने राजद्वार को कपिल वर्ण में परिणत कर दिया था। कुछ ऊँट भेजे गए थे, कुछ भेजे जा रहे थे, कुछ भेजे गए थे फिर वापिस आ गए थे। उनके मुँह के चारों ओर कौड़ियाँ गूँथ कर पहना दी गई थीं जो मानों बहुत योजन पार करने पर उनकी संख्या गिनने के लिए अक्षरों की माला थीं और वे कौड़ियाँ इस तरह लगतीं मानों सायंकाल के आतप के टुकड़े हों। ऊँटों के कानों में लाल चंवरियों के फूल लगे थे मानों लाल वर्ण वाले धान के खेतों में लाल कमल उत्पन्न हों। सोने के बने घुँघुरुओं की माला हमेशा उनके गले में झनझन आवाज करती थी, ऐसा लगता था जैसे सूखे हुए करंज-वनों में उनकी गुठलियों के बीज बज रहे हों। उनके कानों के पास पंचरंगी ऊन के फुँदने लटक रहे थे। वे वानर के कपोल की भाँति कपिल वर्ण के थे। उजले उजले अनेक छत्र उस प्रदेश को श्वेत द्वीप बना रहे थे। वे छत्र पानी बरस जाने के बाद बिल्कुल सफेद वर्ण वाले शरत् काल के मेघ के समान प्रतीत हो रहे थे। कल्प वृक्षों की भाँति उनमें मोतियों की झालरें लगी थीं, जिनसे उत्पन्न आलोक के द्वारा 'छाया मिट गई थी। उनमें गारुड रत्न पिरोए गए थे जैसे विष्णु के नाभि-कमलों में गरुड़ के पंख लगे रहते हैं। उनके दण्ड विद्रुम के बने थे, मालूम पड़ता था वह क्षीरसमुद्र का एक भाग हो गया हो। जैसे शेषनाग

द्वितीय उच्छ्वासः ६५

विवस्वतः प्रतापमापिबद्भिरिवातपं चन्द्रलोकमयमिव जीवलोकं जन- यद्भिः कुमुदमयमिव कालं कुर्वद्भिज्योत्स्नामयमिव वासरं विरचयद्भिः फेन- मयीमिव दिवं दर्शयद्भिरकालकौमुदीसहस्राणीव सृजद्भिरुपहसद्भिरिव शातक्रतवीं श्रियं श्वेतायमानैरातपत्रखण्डैः श्वेतद्वीपायमानम्, क्षणदृष्टन- ष्टाष्टदिङ्मुखं च मुष्णद्भिरिव भुवनमाक्षेपोत्क्षेपदोलायितं दिनं गतागता- नोव कारयद्भिरुत्सारयद्भिरिव कुनृपतिसम्पर्ककलङ्ककालीं कालेयीं स्थितिं विकचविशदकाशवनपाण्डुरदशदिशं शरत्समयमिवोपपादयद्भिर्बिसतन्तु- मयमिवान्तरिक्षमाविर्भावयद्भिः शशिकररुचीनां चलतां चामराणां सह-

स्रैरिवेति । प्रतापस्योपहास एव समुचितो वैधर्म्यात् । अथ च प्रतापपदेन भङ्ग्या विवस्वत आरोपितविजिगीषुव्यवहारत्वाच्छत्रुमनःसंतापकारि यश उक्तम् । आतपं प्रकाशम् । आपिबद्भिरिति । तस्य सर्वत एवातिदर्शनात् । जीवलोकमिति । यश्च जीवानां लोकस्तत्र कथं चन्द्रलोक इति विरोधः । कुमुदमयमिवेति । कुमुदमय- त्वाच्छुक्लं भवति न तु कालम् । कुमुदमयं च समयं कार्तिकादि । ज्योत्स्नेति । वासरे ज्योत्स्ना न संभवतीति विरोधः । एवं च दिवः फेनमयीत्वम् । जलदे हि फेनानामभावः । कौमुदी कुमुदिनी, कार्त्तिकी च ज्योत्स्ना । पूर्वं सामान्येनोक्ता इति । विशेषेण श्वेता इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तैस्तन्त्र तेषां स्वत एव श्वेतत्वाच्छ्वेतपदेन कथमुपमानतेत्युच्यते । श्वेतगुणा इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तेन यथा श्वेतगुणयो- गादन्यत्किंचिच्छ्वेतेते तद्वदेतद्योगात् राजद्वारमिति । श्वेताः स्फटिका इत्यन्ये । केचित्तु 'श्वेतमानैः' इति पठन्ति । शस्त्यादौ चामराणां सहस्रैर्दोलायमानमित्यन्वयः ।

के फनों पर माणिक्य के टुकड़े चमकते रहते हैं उसी प्रकार इनमें भी लगे हुए थे । गंगा के श्वेत सिकतिल तटों के समान उनमें राजहंस की आकृतियाँ कढ़ी हुई थीं । मानों वे ग्रीष्मकाल पर विजय प्राप्त कर रहे थे, मानों सूर्य के प्रताप को हँस रहे थे, आतप को मानों पीते जा रहे थे, मानों जीवलोक को चन्द्रलोकमय बना रहे थे, उस ग्रीष्मकाल को कुमुदमय बना रहे थे, दिन में चाँदनी ही चाँदनी फैला रहे थे, आकाश को मानों फेन- मय दिखा रहे थे, असमय में हजारों चाँदनियों का निर्माण कर रहे थे, इन्द्र की सम्पत्ति का मानों उपहास कर रहे । चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल चलते हुए चँवर भी स्कन्धावार की शोभा बढ़ा रहे थे । आठों दिशाओं को क्षणभर में ही स्पष्ट कर देते और क्षण भर में ढँक लेते मानों इस प्रकार त्रिभुवन का ही अपहरण करने लगे हों । ऊपर नीचे डोलते हुए चामरों ने सूर्य की किरणों को क्रम से छोड़ते-रोकते हुए मानों दिन का आना-जाना लगा दिया था । कुत्सित राजाओं द्वारा कलंकित कलियुग के आचारों को मानों वे झाड़ रहे थे । वे शरत्काल की छटा को उत्पन्न कर रहे थे जिसमें काश के उजले-

६६ हर्षचरितम् क्षैर्दोलयमानम्, अपि च हंसयूथायमानं करिकर्णशङ्खैः, कल्पलता- वनायमानं कदलिकाभिः, माणिक्यवृक्षकवनायमानं मायूरातपत्रैः, मन्दाकिनीप्रवाहायमानमंशुकैः, क्षीरोदायमानं क्षौमैः, कदलीवनायमानं मरकतमयूखैः, जन्यमानान्यदिवसमिव पद्मरागबालातपैः, उत्पद्यमाना- परम्बरमिवेन्द्रनीलप्रभापटलैः, आरभ्यमाणापूर्वनिशमिव महानीलमयू- खान्धकारैः, स्यन्दमानानेककालिन्दीसहस्रमिव गारुडमणिप्रभाप्रतानैः, अङ्गारकितमिव पुष्परागरश्मिभिः, कैश्चित्प्रवेशमलभमानैरधोमुखैश्चरण- नखपतितवदनप्रतिबिम्बनिभेन लज्जया स्वाङ्गानीव विशद्भिः कैश्चिदङ्गु- लीलिखितायाः क्षितेर्विकीर्यमाणकरनखकिरणकदम्बव्याजेन सेवाचाम- कलेरियं कालेयी। सर्वत्राभिकलिभ्यां ढक्। पद्मरागा इव बालातपास्तैः। महानीला गरुडमणयः। पुष्परागाश्च मणिभेदाः। कैश्चिदित्यादौ शत्रुमहासामन्तैः समन्तादा- सेव्यमानमित्यन्वयः। सेवेत्यादि। स्वयेदानीं चामरग्रहणेन सेवनीय इति तेषां हि क्षितिः कलत्रमतस्तद्द्वारेण सेवनेच्छा। 'हारस्य यो मध्यमणिस्तरलंः स प्रकी- उनके फूल चारों ओर खिल जाते हैं, मानों आकाश को मृणालसूत्रों से भर रहे थे। हाथी के कानों के शंख हंससमूह की भाँति लग रहे थे। केले के खम्भे इस तरह लगाए गए थे कि राजद्वार कल्पलतावन के समान लग रहा था। नाचते हुए मोर के बर्हमंडल की आकृति वाले मायूर आतपत्रों से वह स्थान माणिक्य के वृक्षों का वन हो रहा था। वहाँ अंशुक इस तरह लहरा रहे थे कि आकाश गंगा का प्रवाह बन गया। क्षौम वस्त्रों से क्षीर- समुद्र का दृश्य उत्पन्न हो रहा था। मरकत मणियों की हरी हरी किरणें इस तरह फैल गई थीं मानों वह केले का वन हो। पद्मराग मणियों की लाल-लाल किरणें उषाकाल की लाली के समान छिटक रही थीं मानों दूसरा दिन होने लगा हो। इन्द्रनीलमणियों की नीली प्रभा के फैलने से दूसरा आकाश उत्पन्न हो गया ऐसा लग रहा था। महानील मणियों की किरणें इस तरह फैल रही थीं मानों कोई अपूर्व रात्रि ही उत्पन्न होने वाली हो। गारुड मणियों की प्रभा इस प्रकार फैलती जा रही थी मानों यमुना के हजारों प्रवाह चल पड़े हों। पुष्पराग मणियों की रश्मियाँ अंगारे की भाँति लग रही थीं। भुजनिर्जित अनेक शत्रु महासामन्त वहाँ उपस्थित थे। कुछ तो भीतर प्रवेश नहीं पाने के कारण मुख नीचा किए हुए खड़े थे, चरण के नखों पर उनका मुख प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वे लज्जा के कारण अपने ही अङ्गों में निमटते जा रहे थे। कुछ बैठे बैठे उँगलियों से जमीन पर लिख रहे थे। अपने नख के फैलते हुए किरणजाल से महाराज की सेवा में मानों

द्वितीय उच्छ्वासः ६७ राणीबार्पयद्भिः कैश्चिदुरःस्थलदोलायमानेन्द्रनीलतरलप्रभापट्टैः स्वामि- कोपप्रशमनाय कण्ठबद्धकृपाणपट्टैरिव कैश्चिदुच्छ्वाससौरभभ्राम्यद्भ्रम- रपटलान्धकारितमुखैरपहृतलक्ष्मीशोकधृतलम्बश्मश्रुभिरिवान्यैः शेखरोड्डी- यमानमधुपमण्डलैम्रैः प्रणामविडम्बनाभयपलायमानमौलिभिरिव निर्जितै- रपि सुसंमानितैरिवानन्यशरणैरन्तरान्तरा निष्पततां प्रविशतां चान्तर- प्रतीहाराणामनुमार्गप्रधावितानेकार्थिजनसहस्राणामनुयायिनः पुरुषानश्रा- न्तैः पुनः पुनः पृच्छद्भिः 'भद्र ! अद्य भविष्यति भुक्तास्थाने दास्यति दर्शनं परमेश्वरः, निष्पतिष्यति वा बाह्यां कक्षाम्' इति दर्शनाशया दिवसं नयद्भिर्भुजनिर्जितैः शत्रुमहासामन्तैः समन्तादासेव्यमानम् , अन्यैश्च प्रतापानुरागगतैर्नानादेशजैर्महामहीपालैः प्रतिपालयद्भिर्नरपतिदर्शनकाल- मध्यास्यमानम् , एकान्तोपविष्टैश्च जैनैराहतैः पाशुपतैः पाराशरिभिर्वर्णि- भिः सर्वदेशजन्मभिश्च जनपदैः सर्वाम्भोधिवेलावनवलयवासिभिश्च म्ले-

र्त्तितः' । चपलो वा । शेखरं मुण्डमालिकम् । मौलयः केशाः । निर्जितैः पुरस्कृत- न्यक्कृतैः, राजसेवाप्राप्तैः, संमानितैः पूजितैरिव । अनुयायिन इति । तेषां स्वयं सुलभत्वात् । जैनैः शाक्यैः । आर्हतैर्नग्नक्षपणकैः । पाशुपतैः शैवभेदैः । पाराशरेण

चँवर अर्पित कर रहे हों । कुछ के वक्ष पर लटकते हुए इन्द्रनील की प्रभा तरल हो रही थी मानों उन्होंने महाराज के क्रोध को शान्त करने के लिए अपने-अपने [कंठ में कृपाण बाँध लिए थे । कुछ के मुख पर उच्छ्वास की सुगन्ध से भौंरे छा गए थे, मानों लक्ष्मी के अपहरण कर लिए जाने के शोक से उन्होंने बड़ी लम्बी दाढ़ी बढ़ा रखी थी। उनके मस्तक के ऊपर भौंरे मँडरा रहे थे, मानों प्रणाम करने के लिए झुकने के तिरस्कार के भय से उनके धम्मिल्ल उड़े जा रहे थे । वे पराजित थे, फिर भी सम्मानित के समान थे । उनका कोई दूसरा आश्रय नहीं था । बीच-बीच में अन्तःपुर से द्वारपाल निकलते तो उनके पीछे-पीछे अनेक याचक दौड़ पड़ते, आगे जानेवाले पुरुषों से ये शत्रुसामन्त बिना थकते पूछते रहते थे कि 'भद्र, सजाए जाते हुए भुक्तास्थानमंडप में सम्राट् आज दर्शन देंगे या वे बाहरी आस्थानमंडप में निकल कर आएँगे ?' इस प्रकार सम्राट् के दर्शनों की आशा में दिन बिताते थे । भिन्न-भिन्न देशों के दूसरे राजे जो प्रताप के अनुराग से पधारे हुए थे, महाराज के दर्शनों के अवसर की प्रतीक्षा में वहाँ विराजमान थे । एक ओर बौद्ध, जैन, शैव, संन्यासी, ब्रह्मचारी, अनेक देशों के लोग, समुद्रों के तटवर्ती जंगलों के निवासी म्लेच्छ, अनेक देशों के आए हुए राजदूत वहाँ वर्तमान थे । वह राजद्वार मानों प्रजा- ७ ह० च०

६८ हर्षचरितम् च्छ्रजातिभिः सर्वदेशान्तरागतैश्च दूतमण्डलैरूपास्यमानम् , सर्वप्रजानि- र्माणभूमिमिव प्रजापतीनां लोकत्रयसारोच्चयरचितं चतुर्थमिव लोकम् , महाभारतशतैरप्यकथनीयसमृद्धिसंभारम् , कृतयुगसहस्रैरिव कल्पितसन्नि- वेशम् , स्वर्गाबुर्दैरिव विहितरामणीयकम् , राजलक्ष्मीकोटिभिरिव कृत- परिग्रहं राजद्वारमगमत् । अभवच्चास्य जातविस्मयस्य मनसि—'कथमिवेदमियतप्रमाणं प्राणि- जातं जनयतां प्रजासृजां नामीत्परिश्रमः, महाभूतानां वा परिक्षयः, पर- माणूनां वा विच्छेदः, कालस्य वान्तः, आयुषो वा व्युपरमः, आकृतीनां वा परिसमाप्तिः' इति । मेखलकस्तु दूरादेव द्वारपाललोकेन प्रत्याभिज्ञाय- मानः 'तिष्ठतु तावत्क्षणमात्रमत्रैव पुण्यभागी' इति तमभिधायाप्रतिहतः पुरः प्राविशत् । प्रोक्तमधीयते पाराशरियो यतयस्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । सर्वप्रजेति । अत्र हि स्थित्वा यदि प्रजापतयो न सृज्येयुः तत्कथं सर्व भावाः कारणभूता इव तत्र लभ्येरन् । अर्बुदं दशकोटयः । कोटिर्लक्षशतम् । इह तु बहुसंख्योपलक्षणार्थार्बुदकोटिशब्दौ । परिसमाप्तिरिनारम्भः । तिष्ठत्विति । विद्यायुक्ते कदाचिदनादरशङ्केत्येतदर्थमाह- पुण्यभागीति । पतियों की सब प्रकार की प्रजाओं के निर्माण का स्थान था। तीनों लोकों के सार को इकट्ठा करके मानों कोई चौथा लोक बना दिया गया था। सैकड़ों महाभारत भी लिखे जाँय फिर भी उसके वैभव का वर्णन नहीं किया जा सकता। मानों हजारों सतयुगों ने अपने अपने रहने के लिए वहाँ भवन बना लिया था। मानों करोड़ों स्वर्ग वहाँ आ टिके थे और उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। करोड़ों की संख्या में राजलक्ष्मी ने आकर उसे मानों अपना आश्रय बना लिया था। इस दृश्य को देखकर बाण के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगा—'इतने प्राणियों को उत्पन्न करते हुए प्रजापतियों को कैसे नहीं थकान हुई ? या पाँचों महाभूत समाप्त क्यों न हुए ? परमाणुओं का विच्छेद क्यों न हुआ ? समय का अन्त या आयु का खात्मा या आकृतियों की परिसमाप्ति क्यों न हुई ?' इधर मेखलक को दूर से ही द्वारपालों ने देखा और पहचान लिया । 'पुण्यभागी आप क्षण भर यहीं ठहरें' बाण से यह कह मेखलक बेरोक-टोक भीतर घुस गया।

अथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैलशि- लाविशालवक्षसा, हरवृषककुद्कूटविकटांसतटेन, उरसः चपलहृषीकह- रिणकुलमंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणैरधिकारगौरवाह्नीयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसादलब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना

अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वस्वन्तरादिवर्णनाभावाद्येत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आनयने तस्य प्रविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स स्वश्रणं गच्छति । वेणिका

कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर आया । उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । वह निर्मल कंचुक पहने हुए था । उसकी पतली कमर में सोने के सूत्रों की बनी हुई पेटी कसी थी । उस पेटी में माणिक्य का बना हुआ राजचिह्न पदक लगा हुआ था । उसकी छाती बर्फ की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय-हरिणों को बाँध रखने के लिये पाश के समान अपने वक्ष पर हार धारण किए हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानों मुंडमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानों अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिलकुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देखकर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह स्वभाव से नम्र था । उसके झुके हुए मस्तक पर सफेद पगड़ी

१०० हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— ‘एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणभिनिवेशी’ इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— ‘आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः’ इति। बाणस्तु ‘धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते’ इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पार- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः। अपनीतेत्यादिनास्य नियमवि- धायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथत्यादौ। एवंविधैस्तुरङ्गैररचितां मन्दुरां विलोकयन्दूराद्धिभक्षिष्यागारमप- श्यदिति संबन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि थी। उसके बायें हाथ में मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार थी और दाहिने हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान चमकवाली सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतिहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, पारियात्र नामक दौवारिक हैं। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें।' दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिये प्रवेश कीजिए, महाराज आप पर प्रसन्न हैं।' बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाये जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखी। वहाँ कुछ वनायुज अर्थात् वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न घोड़े, कुछ आरट्टज अर्थात् वाहीक या पञ्जाब में उत्पन्न घोड़े, कुछ काम्बोज अर्थात् मध्य एशिया में वंक्षु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न घोड़े, कुछ भारद्वाज अर्थात् उत्तरी गढ़वाल के घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज अर्थात् सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न घोड़े, कुछ पारसीक अर्थात् सासानी ईरान के घोड़े थे। रङ्गों के हिसाब से कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुश्की), कुछ श्वेत (सुब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासुब्जा),

द्वितीय उच्छ्वासः १०१ सीकैश्च, शोणैश्च, श्यामैश्च, श्वेतैश्च, पिङ्गरैश्च, हरिद्भिश्च, तित्तिरिकल्माषैश्च, पञ्चभद्रैश्च, मल्लिकाक्षैश्च, कृत्तिकापिञ्जरैश्च, आयतनिर्मासमुखैः, अनुत्क- टकर्णकोशैः, सुवृत्तश्लक्ष्णसुघटितघण्टिकाबन्धैः, यूपानुपूर्वीवक्रायतोदग्र- ग्रीवैः, उपचयश्वसत्स्कन्धसंधिभिः, निर्भुग्नोरःस्थलैः, अस्थूलप्रगुणप्रसृ- वर्णविशेषवर्णनम् । 'शोणः पद्मार्जुनः स्मृतः' । पिञ्जरैरीषत्कपिलैः । हरिच्छुकनिभो वर्णः । तित्तिरिः पक्षिविशेषस्तद्वच्चित्रैः । 'सिताक्ष यस्य वाजिनः शफाः समस्तकं मुखम् । स पञ्चभद्रनामको नृपस्य राज्यसौख्यदः' । शुक्लपर्यन्ते असिततारके नयने येषां ते मल्लिकाक्षाः । उक्तं च—'पृथुस्निग्धा समा चैव मल्लिकाकुसुमप्रभा । राजी यस्य तु पर्यन्ते परिक्षेप्ये तु लोचने ॥ सह यो मल्लिकाक्षस्तु दृष्टिपर्यन्ततारकः ॥' इति । तारकाः कदम्बककल्पनेकबिन्दुकल्माषितत्वचः कृत्तिकापिञ्जरा यतः । आयतेत्यादि । तदुक्तम्—'मुखं तन्वायतनातं चतुरस्रं समाहितम् । ऋजु चैवोप- पदिष्टं च परिपूर्णं च शस्यते ॥' इति । कृष्णेनाप्युक्तम्—'उज्जा अतुंगअत्यं णिम्मं संवाहिरण अच्छअणं' इति । अनुत्कटो ह्रस्वः । कोशो मध्यम् । शिरसो ग्रीवायाश्च यन्मध्यं स घण्टिकाबन्धः । यो निगाल इत्युच्यते तस्य सुवृत्तादि शस्यते । यदाह- 'ग्रीवाशिरोऽन्तरस्थितो दीर्घवृत्तः समाहितः । नोद्धतो नार्थितो नातिदुर्नाहोऽति- विधानतः ॥ सुदिग्धोऽनुपदिग्धश्च निगालो गदितः शुभः ॥' इति । यूपो यज्ञचिह्नं तस्येवानुपूर्वी यस्याः । तथा वक्रा आयता उदग्रा उद्धुरा ग्रीवा येषाम् । तदुक्तम्— 'ग्रीवा मूलम्बिनी वृत्ता दीर्घा च सुसमाहिता । गले बद्धा विदोर्वृत्ता तथा शिरसि चोद्यता ॥ निगाले स्याच्च निर्मांसा वृद्धौ साकुञ्चिता भृशम् । श्लिष्टमांसाग्रबद्धा च तुरगस्य प्रशस्यते ॥' इति । उपच्येत्यादि । तदुक्तम्—'स्कन्धः सुपरिपूर्णः स्याद्व्यक्त- मांसः पृथुत्रिकः । बहुमांसाङ्गसंश्लिष्टः स्थिरमांसश्च पूरितः ॥' इति । निर्भुग्नं स्थूल- त्वाद्बहिर्निःसृतम् । उक्तं च—'स्थूलास्थि महदच्छिद्रं पृथुलं यच्च निर्वलि । उर ईदृक्प्रशंसन्ति स्थूलक्रोडं महत्तरम् ॥' इति । निर्भुग्नमुरपन्नद्रोणिकमिति केचित् । कुछ तित्तिरकल्माष (तीतरपंखी) घोड़े थे । शुभ लक्षणों वाले घोड़े थे जैसे पञ्चभद्र (अर्थात् पञ्चकल्याण हृदय, पृष्ठ, मुख और दोनों पाश्र्वों में पुष्पित या भौंरी वाला), मल्लिकाक्ष (शुक्ल अपांग-वाला) और कृत्तिकापंजर (तारों जैसी सफेद चित्तियों वाला, चितकबरा) । उनका मुँह लम्बा और पतला था, कान छोटे छोटे थे, घंटी (सिर और गर्दन की जोड़) गोल, चिकनी और सुडौल थी, गर्दन ऊपर उठी हुई और यूप की तरह लम्बी और टेढ़ी थी, कन्धे की जोड़ मांस से फूली हुई थी, छाती निकली हुई थी, टांगें पतली और सीधी थीं, खुर लोहे की भाँति कड़े थे, वेग में टूटने के भय से मानों नाड़ियों

१०२ हर्षचरितम् तैर्लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयादनिर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उच्चद्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितश्रीबागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दुर्वारसश्याम लफेन- लवशबलान्दंशनगृहीतमुक्तान्फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान्प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलितज- घनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिblack/श्न, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितदमातलैर्घासमभिलषद्भिblack/श्च, प्रकीर्यमाणयवसमासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचडालहु- ङ्कारकातरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- अस्थूलप्रगुणप्रस्थितैर्निमांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्गे वृत्ते दीर्गे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'सुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलगिभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह—'पृष्ठोरु कटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पश्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्रयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराद्यःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- से रहित और गोल उदर भाग था, पुट्ठे चौड़े और मांसल होने से उठे हुए थे, पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी दो रस्सियों से कसकर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिलकुल फैल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने चौगुने सूत में गुथा हुआ था। वे कुछ कुछ झपकी ले रहे थे। खुजान मिटाने के लिये अपने शरीर में दाँतों से रह-रहकर कोड़ते रहते और त्वचा को फरफराते रहते थे। उन स्थानों पर मुँह की दूब के रस की गाज लग-लग जाती थी। कभी कभी पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही पैर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी जाँघ टटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँककर धीरे धीरे हिनहिनाने लगते थे। घास की इच्छा से खुर पटककर धरती को

द्वितीय उच्छ्वासः १०३ जनानलरद्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरः पूजिताभिमतदेवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन् , कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युन्नतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम् , महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवाप- तन्तीभिरापूर्यमाणम् , आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामा- मोदेन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- 'अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौप- वाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडा- सुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः । आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्य- कृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्- 'मालतीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्छु ते तं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च धर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधम- दवर्णनया श्लेषप्रकृतिकत्वं प्रकाशयति—'श्लेषप्रकृतिकं श्लेष्ठं भद्रजातिं तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांनाह्यत्व- मेवोक्तम् , तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽर्थद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य खरोंच रहे थे । सामने घास के पड़ते ही चंचल होकर फटकने लगते थे । सईसों की डपटान सुन कर मारे डर के उनको पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गए थे । उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती थी । उनके ऊपर चँदोवे तने हुये थे । उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे । मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर अव्यक्त रूप में दूर ही से हाथीसाल को देखा, जो आकाश में बहुत ऊँचा उठा हुआ था । केलों के वन से वह चारों ओर घिरा हुआ था । सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौंरे लुझ रहे थे । उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो । बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं । यह हाथी नहीं बल्कि महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है।' बाण ने उससे कहा—'भद्र, मैंने दर्पशात का नाम

१०४ हर्षचरितम् महान्दृश्यते' इति । स तमवादीत्—'भद्र ! श्रूयते दर्पशातः । यद्येवम- दोषो वा पश्यामि तावद्वारणेन्द्रमेव । अतोऽर्हसि मामत्र प्रापयितुम् । अतिपरवानस्मि कुतूहलेन' इति । सोऽभाषत—'भवत्वेवम् । आगच्छतु भवान् । को दोषः । पश्यतु तावद्वारणेन्द्रम्' इति । गत्वा च तं प्रदेशं दूरादेव गम्भीरगलगर्जितैर्वियति चातक- कदम्बकैर्भुवि च भवननीलकण्ठकुलैः कलकेकाकलकलमुखरमुखैः क्रियमाणाकालकोलाहलम् , विकचकदम्बसंवादिमदसुरासौरभभरित- भुवनम् , कायवन्तमिवाकालमेघकालम् , अविरलमधुबिन्दुपिङ्ग- लपद्मजालकितां सरसीमिवात्यवगाढां दशां चतुर्थीमुत्सृजन्तम् ,

निश्चीयते । जात्यन्तरितो द्वितीयां जातिं हस्तिरूपां प्राप्तः । यद्येवमिति । यदि सत्यं दर्पशातोऽयमदोषो वेति । वाशब्दश्चार्थे । यदि च न दोष इत्यर्थः । यतो रसदाना- विभयेन केनचिद्रष्टुं न लभ्यते । कुतूहलेन परवान्कुतूहलायितः । गत्वेत्यादौ । दूरादेव दर्पशातमपश्यदिति संबन्धः । गर्जितं बृंहितम् । चातकाः स्तोककाः । नीलकण्ठा मयूराः । केका मयूररुतानि । मेघकालमिति । मेघकालश्च चातककदम्बनीलकण्ठकुलकदम्बकसौरभादियुक्तः । अविरला घना ये मधुबिन्दव इव मधुबिन्दवो माक्षिककणास्तद्वत्पिङ्गलानि पद्मजालकानि संजातानि यस्याम् । 'पद्मकं बिन्दुजालं स्याद्गात्रकं करिणीमिति' । यथा—'पद्मस्वस्तिकसंस्थानो बिन्दु- मिश्र कचैस्तथा । स्वङ्गिताङ्कस्तुषाराभः शावः शक्तिकरः करी ॥' इत्युक्तम् । अन्ये मधुबिन्द्वो मकरन्दकणास्तैः पिङ्गलानीति व्याख्येयम् । महत्सरः सरसी । अत्यव- गाढामिति । परिणताम् । दशां कालावस्थाम् । चतुर्थीमिति । 'चतुर्थ्यामवगाढायां

सुना है । यदि ऐसी बात है और कोई झंझट न हो तो उस गजराज को देखूँगा । मुझे वहाँ ले चलो, मैं अपने कुतूहल के वेग से लाचार हूँ ।' वह बोला—'ऐसी बात है तो आइए, झंझट क्या है ? तब तक गजराज को ही देख लें ।' उस स्थान में जाकर बाण ने दूर ही से दर्पशात को देखा । उसकी गम्भीर चिग्घाड़ सुनकर आकाश में चातक पक्षी मेघ की गड़गड़ाहट समझ कर कोलाहल करने लगे और पृथिवी के गृहमयूर अपनी केका-वाणी द्वारा असमय में मुखरित हो उठे । खिले हुए कदम्ब के समान अपने मद की सुरा-सौरभ से उसने दिशाओं को भर दिया था । असमय में वर्षाकाल शरीरधारी हो गया था । इसके गण्डस्थल से निरंतर मदजल क्षरित हो रही था । वह अपनी चौथी दशा मदावस्था में बिल्कुल परिणत हो रहा था । उसके ढिंकते

द्वितीय उच्छ्वासः १०५ अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदीललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवत्तया मेदिनीबिदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायमिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्बार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्माण्डस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनैरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्तेना- नेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तरङ्गि- तोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डेनार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैलस- मुद्रद्वापकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाविन्दुभिरचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिध्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यकारिणौ सप्रशंसिनौ' इति । पञ्चमी दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीला । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटंकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह-'पयः कुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोकौ हुए कानों के शंख दुन्दुभि के समान आवाज कर रहे थे, मानो वह पाँचवीं स्वास्थदशा के प्रवेश का मंगलारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को कम्पित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो । मानों वह झूमता हुआ दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजों को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण बाहर निकलना चाहता था। बहुत दिनों से परिचय में आए हुए घसियारे उसके सामने पत्ते लाकर फेंकते जा रहे थे । महावत भी ग्रीष्मकाल के अनुकूल उपचार से उसे आनन्दित कर रहे थे। वह किसी अपने प्रतिद्वंद्वी गज के मद की गंध सूँघ कर सहन न करके अपनी सूँड़ फेंक रहा था। उसकी सूँड़ पर सिकोड़ने से छोटी छोटी खाएं पड़ने लगीं, मानों अनेक लड़ाइयों में विजय पाने की गणना के चिह्न हों

कोई OCR पाठ नहीं।

द्वितीय उच्छ्वासः १०७ वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुनः करटाभ्यां बहलमदामोदव्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरलिकुलवाचालितैर्दानपट्टकैरिवलभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदबिन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाभ्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राजल- सतां मतः ॥' इति । करटाभ्यां गण्डाभ्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकाैश्च तेषां हस्तस्थितिर्न क्रियते । तानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवन्नीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेव श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्—'समं महत् पूर्ण च नातिस्तब्धोञ्चमस्तकम् । नावानं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आय- व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था । १ उसे मानों राजकीय दानपट्ट मिले थे जिनसे हाथियों के जंगलों को अपने वश में कर रखा था । उसके द्वारा तोड़े गये इक्षुकांड की लेखनी से उन पट्टों पर अक्षर खोदे गये थे, उन पर सजावट के साथ हस्ताक्षर भी बनाये गये थे और भौंरे मानों उन्हें पढ़कर सुना रहे थे । नक्षत्रमाला नाम के आभूषण से वह विभूषित था जो मानों बर्फ के टुकड़ों से बनाया गया था और उससे निरन्तर जलबिन्दु के रूप में प्रभा निकल रही थी । उसका मस्तक निम्नोन्नत और ऊँचा था मानों उसने समस्त गजों के आधिपत्य का पाट बाँध लिया था । बारबार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं । इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत के पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था । उसके पृष्ठवंश से १. उस समय सहकार, कपूर, कङ्कोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपभोग किया था ।

२०८ हर्षचरितम् दर्पम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरू- ढिपरिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलेखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदतन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागम्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवर- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, चेलन्तमिव तवंशः, चक्रवंशः, शरवंशः, बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च—'यावत्पूरितपार्श्वश्च वंशश्चापलताकृतिः। शुभो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि बालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्—'वक्रं स्थूलं च हस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हि नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठनाभि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी, पारम्पर्यं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । यश्च लज्जते स भूमिं लिखति, दर्प चोज्झति । अङ्गुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्री आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमि- चँवर के समान पूँछ निकली थी जिससे यह स्पष्ट प्रतीत होता था कि वह गजों का अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बारबार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । वह दूसरे हाथी के डिण्डिम घोष को सुनकर क्षण भर ध्यान से स्थिर होकर खड़ा हो जाता और अन्त में जोर से शीत्कार करते हुए मानों अपना परिभव समझ कर कष्ट व्यक्त करता था और ऐसा अपने आपको सोचता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करता, अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता, लज्जित होता और मद का त्याग करने लगता। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिये हठ किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधे चबाये हुए तमाल-पल्लव के रस की काली धारा धीरे धीरे मद के समान उसके मुँह से चू रही थी। दर्प से वह मानों काँप रहा था, शौर्य से जीवित १. दृप्तन्त ।

द्वितीय उच्छ्वासः १०५ दर्पेण, ग्रसन्तमिव शौर्येण, मूर्च्छन्तमिव मदेन, त्रुट्यन्तमिव तारुण्येन, द्रवन्तमिव दानेन, वल्गन्तमिव बलेन, माद्यन्तमिव मानेन, उद्यन्त- मिवोत्साहेन, ताम्यन्तमिव तेजसा, लिम्पन्तमिव लावण्येन, सिञ्चन्त- मिव सौभाग्येन स्निग्धं नखेषु, परुषं रोमविषये, गुरुं मुखे, सच्छिष्यं विनये, मृदुं शिरसि, दृढं परिचयेषु, ह्रस्वं स्कन्धबन्धे, दीर्घमायुषि, दरिद्रमुदरं, सततप्रवृत्तं दाने, बलभद्रं मदलीलासु, कुलकलत्रमायत्त- तासु, जिनं क्षमासु, वह्निवर्षं क्रोधमोक्षेषु, गरुडं नागोद्धृतिषु, नारदं कलहकुतूहलेषु, शुष्काशानिपातमवस्कन्देषु, मकरं वाहिनीक्षोभेषु, आशी- विषं दशनकर्मसु, वरुणं हस्तपाशाकृष्टेषु, यमवागुरामरातिसंवेष्टनेषु, त्यादि दर्पाधिकरणसमुचितक्रियाप्रतिपादनसाभिप्रायं व्याख्येयम् । स्निग्धमिति । उक्तं च—'नखाः स्निग्धाः सिताः शस्ताः' इति । परुषं निष्कृपम् । यश्च स्निग्धः प्रीतिमान्स कथं परुषः प्रीतिशून्यो भवतीति विरोधः । एवं गुरुर्विस्तीर्णः, आचा- र्यश्च । विनय इति । उक्तं च—'विनये मुनिभिस्तुल्याः क्रुद्धा नागाश्च राक्षसाः । नित्रिंशस्याधिकत्वाच्च शस्त्रां नागा महीपतेः ॥' इति । स्कन्धबन्धे ग्रीवामूले । दरिद्रः कृशः, दुर्गतश्च । दानं मदवारि, वितरणं च । बलभद्रो हलधरः । मदो दानम् , सुराकृतश्च । नागाः करिणः, सर्पाश्च । कलहो रणोऽपि । अविदितशत्रुसैन्ये पातोऽवस्कन्दः । मकरं कुर्मम् । वाहिनी सेना नदी च । दशनकर्म दन्तव्यापारः, दशनरूपा च क्रिया । हस्त एव पाशः, प्रशस्तहस्तो हस्तपाश इति वा । हस्ते च पाशः । वागुरा जालम् । परिणतिषु दन्तविदारणकर्मसु । कालं यमम् । शुभाशुभा- था, मद से मूर्च्छित हो रहा था, जवानी से उसके अङ्ग-अङ्ग टूट रहे थे, दानजल के रूप में वह ढल रहा था, बल से मचल रहा था, मान के कारण अपने मद और भी प्रकट कर रहा था, वह अपने भड़कीले चेहरे से सबको लिप रहा था, सौभाग्य से सींच रहा था, स्निग्धता उसके नखों में थी, परुषता उसके रोमों में, गुरुता मुख में, सच्छिष्यता विनय में, मृदुता सिर में, दृढ़ता परिचय में, ह्रस्वता ग्रीवामूल में, लम्बी आयु, पेट छोटा और दान में हमेशा उसकी प्रवृत्ति थी, वह मदलीलाओं में बलभद्र, अधीनता स्वीकार करने में कुलाङ्गना, क्षमा करने में जिन, क्रोध और त्याग करने में अग्नि और वर्षा, नागों (हाथियों, सर्पों) को उठा लेने में गरुड़, झगड़े के कुतूहल में नारद, आक्रमण में शुष्क वज्रपात, वाहिनी (सेना या नदी) को क्षुब्ध करने में मकर, काटने में सर्प, सूँड़ से पकड़ कर खींच लेने में वरुण, शत्रुओं को घेरने में यमपाश, दाँतों का प्रहार करने में काल, सूँड़ से प्रचण्ड आघात करने में (सूर्य के ग्रहण करने में) राहु, टेढ़ी चाल में