हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
[ ११ ] २. सब से उत्तम मार्ग "उपाधीचें काम ऐसें । काही साधे, काही नासे" —रामदास "कांहीं दिवस भयरहित सदोदित स्वराज्य चालविलें दरिद्र अटकेपार जनाचें ज्यानीं घालविलें जलचर हैदर नवाब इंग्रज रण करतां थकले ज्यानीं पुण्याकडे विलोकिले ते संपत्तीला मुकले —प्रभाकर यदि मरहठों ने, लोगों को भुजबल से अधीन करके प्रजातन्त्र- राज्य स्थापित करने की जगह, उनके सामने साम्य-भाव का आदर्श उपस्थित करके, एक ऐसा हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया होता, जो सर्वसाधारण हिन्दूमात्र के नाम से पुकारा जाता और जिसमें बंगाली, पंजाबी, मरहठा, राजपूत, ब्राह्मण और शूद्र आदि का भेद भाव उड़ा कर एकमात्र हिन्दुत्व की भावना पैदा की होती तो क्या इससे उनके स्वदेशानुराग का इससे अधिक परिचय न मिलता ? यदि विचार-पूर्वक देखा जाय तो वास्तव में यही असली प्रजातंत्र-राज्य होता और इसके द्वारा मरहठों की देशभक्ति और भी ऊंची समझी जाती। किंतु यदि हिंदुओं के भीतर इस प्रकार एकता के सूत्र में बंधने का गुण वर्तमान होता तो मुसलमान सिंध को कदापि पार न कर सकते । हमें प्रत्येक घटना को उसके वास्तविक रूप में देखना चाहिये और इस जाति ※ कठिन कार्य कुछ तो सफल हो जाते हैं और कुछ असफल भी रह जाते हैं। —रामदास थोड़े दिन तक भयरहित होकर अच्छी तरह से स्वराज्य चलाया, प्रजा की निर्धनता को अटक से पार भगा दिया। मकर के समान हैदर, नवाब और बड़े २ फरंगी लड़ते २ थक गये। जिन्होंने पूना की ओर ख्याल किया वे सम्पत्तिहीन होगये। —प्रभाकर
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के कार्यक्रम का निर्णय उस समय की परिस्थितियों के प्रकाश में ही करना चाहिये। यह नियम है कि कोई राष्ट्र या कोई व्यक्ति अपने समय की वर्तमान परिस्थितियों की बिल्कुल अवहेलना नहीं कर सकता। उसे विवश होकर उन परिस्थितियों के अधीन होकर चलना ही पड़ता है। यदि कोई कहे कि मरहठों द्वारा चलाए गए हिंदू-आंदोलन के आदर्श में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं थी तो ऐसा कहना केवल भ्रम और भूल है और ऐसा दावा करना सच्चाई का गला घोंटना है। मरहठे भी आदमी ही थे और आदमियों के साथ ही रहते थे; वे न देव ही थे और न देवों के मध्य रहते थे। इसीलिये हमने कहा है कि उनमें भी कुछ राजनैतिक त्रुटियां थीं जो प्रायः सभी हिंदुओं में पाई जाती हैं। यही कारण है कि वे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये कोई और विशेष देशभक्तिपूर्ण साधन नहीं सोच सके। हिंदुओं के अन्तर्गत कोई दूसरा सम्प्रदाय भी ऐसा न कर सका। तो भी जितना मरहठों ने कर दिखाया था उतना भी किसी और से न बन सका था। कहना सरल है, परन्तु किसी कार्य का करना कठिन होता है। किसी मनुष्य को साम्यभाव दिखलाकर उसे मनाने के लिये यह परमावश्यक है कि जिस मनुष्य को हम मनाना चाहते हैं वह निष्पक्ष होकर हमारी बातों को सुन कर उस पर ध्यान दे, और यदि उचित समझे तो उसे स्वीकार करे। और यदि मरहठे दूसरों को अपनी ओर मिलाने के लिए उनको मनाने पर ही संतोष करते तो क्या हिंदू राजे स्वेच्छानुसार अपने छोटे २ राज्यों और पदों को हिंदू-पद- पादशाही के हित के लिये, जिसमें उनका भी मरहठों के बराबर ही अधि- कार और उत्तरदायित्व होता, छोड़ कर अपने अस्तित्व को मिटाने के लिये कभी उद्यत हो पाते। हम इस बात को दावे से कह सकते हैं कि कोई भी हिंदू-राजा मरहठों की यह बात मानने के लिये तैयार न होता। यह स्वदेशानुराग उन राजाओं के भीतर कहां से आ सकता था ? गद्दी पर बैठने से पहले जिन राजाओं का राजसिंहासन कई बार गृह-कलह के
[ १३ ] झगड़ों मे पैदा हुए रक्त-द्वारा सींचा जा चुका था, जिन्होंने अपने गृह- कलह के निपटारे के लिये मुसलमान और अङ्गरेजों को आमन्त्रित किया था, जिन्होंने वेदों को कुचलने वाले मुगलों के सामने अपना सिर झुकाना अपने भाइयों के सामने सिर झुकाने से श्रेष्ठ समझ रक्खा था, उन हिंदुओं से इस प्रकार की शुभ कामना की आशा रखना मूर्खता नहीं तो और क्या थी। साथ-ही-साथ जिस समय देश की राजनीति और राष्ट्रीय एकता इतनी नीच दशा को प्राप्त हो गई हो, उस समय किसी से ऐसी आशा करना कि वह सहसा राजनैतिक विचारों और भावों के उच्च शिखर पर पहुँच जायगा, भूल है। दूसरी बात यह है कि जिस कार्य के पूर्ण करने का भार सब लोगों के ऊपर बराबर है उसकी पूर्ति न करने के लिये अपने में से किसी एक व्यक्ति या जाति को दोषी ठहराना अन्याय ही नहीं बल्कि अनुचित भी है। यदि यह कहा जाय कि हिंदू-साम्राज्य के प्राप्त करने के आदर्श अच्छे नहीं थे तो इस दोष के अपराधी और उत्तरदायी भारतवर्ष के हिंदूमात्र हैं, न कि कोई व्यक्ति- विशेष या समुदाय विशेष। दूसरे इसके अधिक उत्तरदायी वे लोग हैं जिन्होंने हिंदू-पद-पादशाही के प्राप्त करने और परतन्त्रता की बेड़ी को चूर्ण करने में इतना भी नहीं किया जितना कि मरहठों ने कर दिखलाया था। यह भी कहा जा सकता कि हिंदू साम्राज्य स्थापित करने के लिये दूसरे हिंदुओं के पास जा कर उन से इस आंदोलन में भाग लेने के लिये बिल्कुल ही नहीं कहा गया। ऐसा किया गया और बहुत से देश- भक्तों ने इस पुकार को सुनकर इसमें भाग भी लिया। उत्तर और दक्षिण के कई एक राजपूत बुन्देला, जाट और दूसरे हिंदू भाई कार्यक्षेत्र में उतर पड़े। हम इस प्रकार के उदाहरणों का वर्णन पहले कर आये हैं और उनके विषय में अपनी टीका टिप्पणी भी लिख आये हैं, इसलिये उन्हे पुनः उद्धृत करके हम अपने पाठकों को उकताना उचित नहीं समझते। यदि राजनैतिक विचारों के विकास और शिक्षा को पूर्ण अवकाश
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मिला होता और इनका प्रचार हिंदुओं में भली भांति हुआ होता तो निस्सं- देह महाराष्ट्र-मंडल बढ़ कर हिंदू-साम्राज्य या हिंदू प्रजातंत्र राज्य बन गया होता। ज्यों २ महाराष्ट्र-मंडल बढ़ता गया वैसे २ वह धीरे-धीरे उदार बनता गया और उसके भीतर उत्तर और दक्खिन के जो कई छोटे और बड़े राज्य सम्मिलित होगये थे, उन्हें अपने प्रजातंत्र राज्य में उचित स्थान और उत्तरदायित्व का भार भी देता गया। वे प्रायः हिन्दू राज्यों को अपने साथ मिलाने के प्रयत्न करते रहते थे ताकि उनकी सहायता से एक महान् प्रजातंत्र की स्थापना करने में सफल हो सकें। वास्तव में नाना फड़नवीस के पश्चात्, अर्थात् सन् १८०० में सारा भारतवर्ष पुनः हिंदुओं के हाथ आ गया था। नेपाल से लेकर त्रावनकोर तक सारा देश हिंदू राजाओं के अधीन हो गया था; जिनका प्रबन्ध अथवा पथ-प्रदर्शन कुछ न कुछ अंशों में महाराष्ट्र-मंडल द्वारा होता था। यदि इङ्गलैंड जैसे देश ने जो राष्ट्रीयता, देशभक्ति और सामाजिक संगठन में महाराष्ट्र से बढ़ा हुआ था, ऐसे कुसमय में भारतवर्ष के इतिहास में हस्ता- क्षेप न किया होता तो निस्संदेह हिंदुस्तान का यह हिंदू राज्य प्रांतीय राज्य न रहकर, एक सुसंगठित और दृढ़ हिंदू-संयुक्त सम्राज्य हो गया होता। जिस प्रकार हिंदुओं ने, विशेषतः मरहठों और सिक्खों ने मुसल- मानों से हारते २ उनके दांव और उपायों को समझ कर ऐसी नीति का अवलम्बन किया कि मुसलमान किसी प्रकार उनपर विजय नहीं प्राप्त कर सके और उनके अच्छे से अच्छे शस्त्र मरहठों पर बेकार रहे, उसी प्रकार थोड़ा ही और समय बीतने पर वे युरोपियनों के सारे गुणों को सीख कर इस योग्य हो गये होते कि जापान की तरह हिंदुस्तान में उन्होंने एक हिंदू-साम्राज्य स्थापित करके भारत में उन युरोपियनों की दाल न गलने देते ! मरहठे इन युरोपियनों की युद्धकला का वह महत्त्वपूर्ण अंश भली
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भांति ताड़ गये थे जिसके कारण कि वे सफल हो रहे थे और इस प्रकार के सैनिक ड्रिल और डिसिप्लिन को उन्होंने आत्मसात कर लिया था। उन्होंने महादजी सींधिया तथा बख्शी आदि अपने सुयोग्य नेताओं की अध्यक्षता में, इन यूरोपियनों द्वारा प्रयुक्त हथियारों को चलाना और बनाना भी अच्छी तरह सीख लिया था जिससे यह सिद्ध होता है कि महाराष्ट्र-मण्डल, जो उन्नत होता हुआ हिंदु-साम्राज्य में परिणान हो चुका था, उन सब गुणों को ग्रहण कर लेता और उनका विकसित भी कर पाता जो कि उन यूरोपियनों में पाये जाते थे। जिस प्रकार मरहठो ने मुसलमानों को पराजित किया था उसी प्रकार वे भारत में एक संयुक्त राष्ट्र या जर्मन साम्राज्यकी तरह हिंदुओं की संगठित रियासतों के आकार में एक हिंदू साम्राज्य को स्थापित करन में सफल हो जाते । परंतु हम इन कल्पनाओं को एक ओर रखकर उन सभी घटनाओं का उल्लेख करते हैं जिनकी साक्षी इतिहास देता है। उन घटनाओं का मूल्य, उस समय के आदर्शों और परिस्थितियों के अनुसार आंकने का प्रयत्न करेंगे। इस ऐतिहासिक परिमाण से यदि हम विचार करें तो भारतवर्ष का कोई भी सम्प्रदाय इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि वह शीघ्र ही हिंदू-प्रजातन्त्र राज्य स्थापित करने में असफल रहा है। यदि हम शिवाजी को दोषी ठहराना चाहें तो केवल उनपर इतना ही दोष आरोपित कर सकते हैं कि वह मोटर पर नहीं चलते थे, और महाराज जयसिंह को इसलिये दोषी ठहरा सकते हैं कि उन्होंने अपने आंदोलन को समाचार पत्रों द्वारा नहीं फैलाया। इस प्रकार के अपराधी या तो भारतवर्ष के हिंदू मात्र हैं या कोई भी नहीं है। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो हमें स्पष्ट ज्ञात हो जायगा कि मरहठों के अतिरिक्त हिंदुओं के किसी सम्प्रदाय के लोगों में इतना उत्साह नहीं आया था, जो अपने प्रान्तीय भेदभावों को छोड़-कर हिंदूजाति के हित में लीन हो जाते। केवल मरहठे ही देश को दासता की बेड़ी से मुक्त कराने के लिये प्राणपण से प्रयत्न
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कर रहे थे। वे ही देशभक्ति और राष्ट्रीयता से भरे हुए थे। किन्तु वे अभी तक उन सब गुणों को भली भांति नहीं जानते थे जिनका जानना देश- भक्तों के लिये परमावश्यक है। इन गुणों की प्राप्ति के मार्गों पर वे बड़ी शीघ्रता से जा रहे थे। यदि हम भारतवर्ष के भिन्न २ राज्यों की शक्तियों पर एक एक करके विचार करें और उस समय के हिन्दुओं के विचारों पर ध्यान दें तो हमें भली-भांति विदित हो जायगा कि केवल महाराष्ट्र वासी ही ऐसे थे जिनमें हिन्दू-जीवन का प्रसार था, और केवल महाराष्ट्र मण्डल ही एक ऐसी शक्ति थी, जिसके नीचे भारत की सारी हिन्दू- शक्तियां एकत्रित होकर बलवान् से बलवान् शत्रुओं को भी परास्त करने में समर्थ होसकती थी। यदि हम पान-हिन्दू सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हम महाराजा शिवाजी और स्वामी रामदास जी के वंशजों के उन सिद्धान्तों और प्रयत्नों को भी न्याय-संगत मानेंगे कि सब महाराष्ट्र को हिन्दू-धर्म के नीचे एकत्रित करके सबसे पहिले एक स्वतंत्र साम्राज्य दक्षिण में स्थापित किया जाय और जब वह दृढ़ हो जाय तो हिन्दू-धर्म की स्वतंत्रता की लड़ाई को महाराष्ट्र के बाहर उत्तर में नर्मदा से अटक और दक्षिण में तुंगभद्रा से ले कर समुद्र तक विस्तृ किया जाय और ज्यों २ वे अपने राज्य को बढ़ाते जायं त्यों २ उसके अन्तर्गत हिन्दू-शक्तियों को संगठित करते जायं और उसे बढ़ाते २ अन्त में हिन्दू-साम्राज्य बना दें। वास्तव में यह कार्य में लाने योग्य, हिन्दुओं को मुक्त कराने और हिन्दू-पद- पादशाही स्थापित करने का सर्वोत्तम मार्ग मालूम होता है। किन्तु यदि मरहठे इस उपाय को काम में लाकर सफलता प्राप्त करना चाहते तो, जैसे कि हम पीछे कह आये हैं, उस पर यदि ध्यान दें तो प्रकट हो जायगा कि ऐसा करने पर उन्हें कुछ और भी हिंदू-राजाओं से घोर शत्रुता कर- नी पड़ी होती। इन में से कुछ लोग अपने गौरव को बिल्कुल भूल गये थे और मुसलमानों की दासता की बेड़ी में रहने ही में अपनी प्रतिष्ठा सम- झते थे। उन्हें नवाबों, निज़ाम और दिल्ली के बादशाह की अधीनता में
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गुलाम और पराधीन कहलाने में कुछ भी लज्जा अनुभव न होती थी वरन् इसी बात में वे अपना गौरव समझते थे । परन्तु यदि मरहठे, जो कि स्पष्ट उनके सामने हिंदू जाति के मान और अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, उनको हिंदू-साम्राज्य के प्रति भक्ति प्रदर्शन करने के लिए कहते तो यह बात उनके लिए असह्य हो जाती। जब मरहठों के अश्वारोही उन्हें, जिन्हें कि वे स्वभावतः मुसलमानों के मित्र समझते थे, दण्ड देते तभी वे अपने आपको धन्य मानते थे। मरहठों के वे लोग इस समय तक शत्रु बने रहते थे जबतक कि उन्हें महाराष्ट्र हिंदू साम्राज्य का प्रभुत्व स्वीकार करने पर विवश न कर दिया जाता या उनके स्वामी मुसलमान-शासक मरहठों से हार कर उनकी अधीनता स्वीकार न कर लेते थे । वे अपनी इच्छा से मरहठों के अधीन होना कभी भी पसंद नहीं करते थे। कुछ ऐसे हिंदू-राजा भी मरहठों से लड़े जो विदेशी शत्रुओं का नाम भारतवर्ष से मिटा देने के लिये उतने ही उत्सुक थे जितने कि मरहठे । उन पर भी पान हिंदू-आंदोलन का प्रभाव पड़ा हुआ था। ये लोग इस बात पर हठ कर रहे थे कि मरहठों को क्या अधिकार है कि वे भारतवर्ष की स्वतंत्रता की लड़ाई के मुख्य कार्य-कर्त्ता बनें और दूसरे राजाओं को अपने साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करने के लिये विवश करें । अब प्रश्न यह उठता है कि मरहठों के अतिरिक्त दूसरे राजाओं या जातियों ने अपने आप को भारत की सर्वश्रेष्ठ शक्ति स्वीकार कराने का प्रयत्न क्यों न किया ? इनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके पूर्वजों ने हिंदू-धर्म की रक्षा भारतवर्ष के बहुत बुरे दिनों में की थी। इस समय जबकि मुगल राज्य की अवनति हो रही थी, सबको अपनी योग्यतानुसार अपना २ हिंदुराज्य बनाने का सुअवसर मिला था। इसलिये मरहठे भी अपने लिये एक राज्य स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे। भला वे ऐसा क्यों न करते ? दूसरे राजों का दावा उचित ही था, किंतु मरहठों का विचार भी तो अनुचित न था। पान-हिंदू दृष्टि से प्रत्येक हिंदू को ऐसा
५. नाना फड़नवीस, साम्राज्य संदेश व उपसंहार
[ १८ ] करने का पूर्ण अधिकार था; किंतु साथ ही साथ सबका यह भी कर्तव्य था कि मुसलमानों को अपनी शक्ति अनुसार मार भगाते। और यदि वे हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने में असफल भी रहते तो भी उन्हें यथासंभव असंख्य छोटे बड़े स्वतंत्र हिन्दु राज्य बनाने का प्रयत्न करना चाहिये था। परंतु जब उनके छोटे २ राज्य के सामने एक साम्राज्य के रूप में संगठित होने का प्रश्न छिड़ा तो वे उस समय की राजनैतिक अद्भुत परिस्थितियों के अधीन होकर एक दूसरे की योग्यता और नेकनीयती के सम्बन्ध में आशंका करने लगे और आपस ही में लड़ पड़े। मरहठे सोचने लगे कि उन्होंने मुस- लमानों, अङ्गरेज़ों और पुर्तगेज़ों से लड़कर हिंदू-धर्म की रक्षा की है; इसलिये वे शक्तिशाली हैं और उन में ही यह योग्यता है कि हिन्दुओं के प्रमुख बनकर रहें। दूसरे लोग सोचने लगे कि यह कोई उपयुक्त युक्ति नहीं। यद्यपि मरहठों ने विदेशियों को हराकर हिंदू-धर्म की रक्षा की है तथापि जो हिन्दुओं से और विशेषतः हिंदू-राजाओं से चौथ वसूल करके उन्हें अपने अधिकार में रखना चाहते हैं यह उनकी अनुचित और अनधिकार चेष्टा है। दोनों पक्षों का ऐसा सोचना स्वाभाविक ही था। मरहठों का ऐसा सोचना इसलिये स्वाभाविक था क्योंकि वे इतनी अधिक सफलता प्राप्त कर चुके थे और अभी तक सफलतायें प्राप्त करने की आकांक्षायें भी कर रहे थे, वे शुद्ध हृदय से विश्वास करने लगे कि हिंदू-धर्म का अस्तित्व और हिंदुओं की राजनैतिक और पारिवारिक स्वतंत्रता तभी स्थिर रह सकती है यदि वह अपने शक्ति को संगठित करके एक केंद्रीय राज्य की स्थापना करलें। और इस केंद्रीय राज्य की स्थापना का यह अर्थ था कि प्रत्येक हिन्दू उस बड़े साम्राज्य के हित के लिये उसकी अधीनता स्वीकार करे और अपने व्यक्तिगत स्वार्थों का परित्याग कर दे। उनका यह सोचना भी उचित ही जान पड़ता है कि जिस हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना उन्होंने विदेशियों से लड़कर अपनी वीरता और बाहुबल द्वारा की थी उसका प्रबन्ध दूसरों के हाथ में देना उचित नहीं है। सभी लोग इस बात को
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जानते थे कि हिन्दुओं मे मरहठे सबसे अधिक शक्तिशाली हैं और दूसरों में इतना सामर्थ्य भी नहीं है कि विदेशियों के आक्रमणों को रोक कर इतने बड़े राज्य का प्रबन्ध कर सकें। इस लिये मरहठों के अधिकार के सम्बन्ध में उनका प्रश्न करना सर्वथा अनुचित था। इस प्रकार इन परिस्थितियों में यह परमावश्यक हो गया कि हिन्दुओं में जो सबसे शक्ति शाली हो वही हिन्दू-साम्राज्य का स्वामी बने परिणामतः हिन्दू-राजे हिन्दू-हित को दृष्टि में न रख कर, अपने स्वार्थवश, मरहठों से शक्तिहीन होने पर भी, हिन्दू-साम्राज्य-पति बनने की इच्छा करने लगे। उनसे मरहठों की लड़ाई अनिवार्य हो गई। राष्ट्रीय संगठन और राजनैतिक एकता के आन्दोलन को सफल बनाने के लिये, देशभक्ति की तरंग में उन्मत्त हो कर राष्ट्रीय हित के लिये, मनुष्य व्यक्तिगत हित की ओर ध्यान न दे कर कभी २ ऐसे भी कामों को करने के लिये विवश हो जाता है जो उसकी इच्छा के बिल्कुल विरुद्ध होते हैं। पहले मरहठों की बात ही लीजिये। वहां भी कुछ जमींदार, सरदार और राजकुमार ऐसे वर्तमान थे जो कि दासता की बेड़ी को काटने के लिये उत्सुक थे और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें दासता की दशा में पड़े रहने में ही आनन्द आता था। जब महाराज शिवाजी ने महाराष्ट्र के संगठन का कार्य प्रारम्भ किया तब ये दोनों ही प्रकार के लोग उनके और उनके साथियों के विरोध में उठ खड़े हुए क्योंकि इन्हें शिवाजी की नीयत के सम्बन्ध में विश्वास नहीं था। बाद को ये लोग यह कहने लगे कि राष्ट्रीय संगठन और हिन्दू एकता के बहाने भोंसला स्वयं बड़ा बनना चाहता है। वे लोग बहुधा यह प्रश्न किया करते थे कि यदि शिवाजी की वास्तव में यही इच्छा थी कि एक हिन्दू- राज्य स्थापित हो तो उन्हों ने स्वयं किसी दूसरे राजा को महाराजा स्वीकार करके उसकी अधीनता में क्यों नहीं काम किया । यदि भोंसला का भी यह उद्देश्य है तो वह हमारे अधीन क्यों नहीं हो जाता, हम ही
को क्यों अपने अधीन करना चाहता है। नीच और दास-वृत्ति में रहने वाले लोगों ने मरहठों की गर्व भरी ललकार का सामना करने के लिये मुसलमानों को आमन्त्रित करने या उनकी सेना में मिल जाने में तनिक भी आनाकानी न की। लेकिन वे लोग, जो इनके समान नीच नहीं थे, बल्कि यह सोचा करते थे कि शिवाजी का इस आन्दोलन का प्रमुख होने का गर्व करना अनुचित और अन्यायपूर्ण है उन्होंने ऐसा मार्ग ग्रहण किया जो कि कम आपत्तिजनक था अर्थात् वे स्वयं उनसे लड़ने के लिए संग्राम में आ डटे इन्हीं। कारणों से महाराज शिवाजी को कई बार अपने भाइयों के विरोध में तलवार उठानी पड़ी। इतिहास शिवाजी को उनके इस कार्य के लिये दोषी नहीं ठहरा सकता और इस कार्य के कारण उसे यह भी साहस नहीं होता कि वह महाराज शिवाजी को हिन्दू धर्म का रक्षक, मरहठा-राज्य का संस्थापक और हिन्दुओं का सुधारक तथा शिरोमणि न कहे। जातीय हित के लिये यह परमावश्यक था कि छोटे २ राज्यों को तोड़ कर एक बड़े राष्ट्र का का निर्माण किया जाता। जिन लोगों की यह इच्छा थी कि भारतवर्ष के हम प्रमुख बनें उन्हें यह उचित था कि शिवाजी के विप्लवकारी बनने के पहले ही वे लोग मुसलमानों के विरोध में उठ खड़े होते, और जिन कामों को शिवाजी ने किया उनको वे लोग पहले ही सम्पादित करके हिन्दू-राज्य की स्थापना करने में शिवाजी से अपने को अधिक योग्य प्रमाणित कर देते। ऐसा होने पर हिन्दू-इतिहास उन्हें भी शिवाजी और उनके साथियों की भांति हिन्दू आन्दोलन का प्रमुख मान लेता। चूंकि अन्य मरहठे सरदार इस कार्य को न कर सके थे अतएव उनके लिये यही उचित था कि वे शिवाजी को इस कार्य की पूर्ति का अवसर देते और इस आन्दोलन का उन्हें उत्तरदायी बना देते, साथ ही उन्हें अपने प्रमुख बनने की लालसा का भी परित्याग करके शिवाजी को सारे महाराष्ट्र का राजा बना देना चाहिये था।
[ २१ ] जिन अनिवार्य कारणों के उपस्थित होने से महाराज शिवाजी को अपने मरहठे भाइयों के विरुद्ध तलवार उठानी पड़ी, जिनके कारण महाराज रणजीतसिंह ने कई एक सिक्ख मिसलों को दण्ड देकर अपनी अधीनता स्वीकार कराई, उन्हीं कारणों के उपस्थित होने पर महाराष्ट्र मण्डल को भी हठी हिंदू राज्यों को अपने अधीन करने में शस्त्र उठाना पड़ा। और जैसे महाराज शिवाजी तथा रणजीतसिंह अपने उन कार्यों के लिये दोषी नहीं ठहराये जाते वैसे ही महाराष्ट्र-मण्डल भी इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मरहठों के विरोधियों में भी केवल एक ही दो ऐसे हैं जो कि मरहठों से विरोध करने के लिये दोषी ठहराये जा सकते हैं, उनमें से बहुतेरे ऐसे थे जो हिंदू हित को ध्यान में रखकर एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये प्रयत्न कर रहे थे। उनका मरहठों के प्रति शस्त्र उठाना कोई अनुचित न था क्योंकि वे स्वयं हिंदू हित को ध्यान में रखकर एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये प्रयत्न कर रहे थे। और अपने आपको स्वतन्त्र समझते थे। किन्तु हिंदू जाति, हिंदू सभ्यता तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिये एक विशाल हिंदू साम्राज्य की आवश्यकता थी, चाहे यह राज्य किसी प्रणाली का होता और भारत के किसी प्रांत या किसी जाति द्वारा इसका शासन होता। यदि इस कार्य की पूर्ति के लिये मरहठे अग्रसर हुए और उन्हें अपने धर्मावलम्बियों के प्रति शस्त्र उठाना ही पड़ा तो इसके लिये वे दोषी नहीं ठहराये जा सकते। जैसा कि पहले कह आये हैं कि इन दोषों का उत्तरदायित्व या तो सभी हिंदुओं पर आता है या किसी पर भी नहीं, अतः हम केवल मरहठों को ही किसी प्रकार से भी दोषी नहीं ठहरा सकते। उन्होंने अपने बाहुबल द्वारा एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया, इसलिये उनका यह आशा करना उचित ही था कि अन्य हिंदू-सम्प्रदाय अपनी २ इच्छाओं को छोड़कर उन्हें अपना प्रभु समझें। यदि वे ऐसा करने के लिये उद्यत नहीं थे तो उन पर विजय प्राप्त करके
[ २२ ] उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार कराने का मरहठों को सर्वथा अधिकार था । ३. प्राचीन और वर्तमान इतिहास के प्रकाश में सिंहावलोकन "ज्या प्रकारें वानरांकरवीं लंका घेवविली त्या प्रकारें हे गोष्ट झाली. सर्व कृत्यें ईश्वरावतारसारखीं आहेत. जे सेवक हे पराक्रम पाहत आहेत त्यांचे जन्म धन्य आहेत. जे कामास आले त्यांनीं तो हा लोक आणि परलोक साधिला । हे तर्दुद, हे मर्दूमकी, या समयांत हे हिम्मत, ही गोष्ट मनांसि कळवत नाहीं !" 𑁯 —ब्रह्मंद्र स्वामींचा पत्रव्यवहार यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने दूसरे सभी राजाओं पर विजय प्राप्त करने वाले तथा सम्पूर्ण राज्य की बागडोर संभालने वाले राजा के लिए भारत के राज्य-मुकुट से अपने मस्तक को सुशोभित करने तथा चक्रवर्तित्व की उपाधि को ग्रहण करने के अधिकार को न्यायसंगत तथा परम पवित्र भी माना है। चक्रवर्ती राज्य की प्रणाली में कुछ त्रुटियां तो अवश्य थीं किंतु इससे लाभ भी विशेष थे। हमारे पूर्वजों को यही उत्तम साधन सूझा था जिसके कारण राष्ट्रीय संगठन का विकास हो सकता था, जिसके कारण सारी हिंदू जाति की राजनैतिक तथा 𑁯 जिस प्रकार बन्दरों द्वारा लंका को जीता उसी प्रकार यह बात हुई। सब काम अवतारों के समान हुए। जो सेवक इस पराक्रम को देख रहे हैं उनका जन्म धन्य है। और जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान किया उन्होंने इहलोक और परलोक दोनों साध लिये। उस समय के वीरों की युद्धकला, वीरता और साहस की हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। —ब्रह्मंद्र स्वामी का पत्र व्यवहार।
[ ८३ ] सार्वजनिक समानता तथा सार्वजनिक जीवन में एकता की शिक्षा दीक्षा दी जा सकती थी। देश के शासन की बागडोर लेने के लिये केवल वे ही लोग अग्रसर हुआ करते थे, जिनमें राजनैतिक निपुणता और संगठन करने की दक्षता रहती थी। यदि कोई पुरुष, जिसके द्वारा देश और धर्म के अहित होने की सम्भावना रहती थी, राजकुल में जन्म लेने के कारण इस पद के लिये प्रयत्न करता था तो देश के धार्मिक और योग्य पुरुष उसका साथ सदा छोड़ के लिये दिया करते थे और केवल योग्य व्यक्ति ही को सम्राट् के पद पर सुशोभित करने के पक्षपाती रहा करते थे। यही कारण था कि हिन्दू-राजनैतिक शक्ति का केन्द्र हस्त- नापुर, पाटलीपुत्र, उज्जैन, प्रतिष्ठाथान और कन्नौज इत्यादि भिन्न २ स्थानों और प्रान्तों में बदलता रहा। कभी कोई राजनैतिक संकट आ पड़ता तो उस समय सब विश्वविजेता राजा को अपना चक्रवर्ती महाराजा स्वीकार कर लिया करते और अपनी पिछली सारी शत्रुताओं को भूल जाया करते थे, क्योंकि लोगों का यह दृढ़ विश्वास हो जाया करता था कि इसी सम्राट् के द्वारा भारत देश और हिन्दू-धर्म की रक्षा हो सकती है। इस बात को लोग कभी ध्यान में नहीं लाते थे कि एक बार इसने उन्हें परास्त किया था, इसलिये इसका विरोध करना चाहिये, प्रत्युत् वे लोग उसका स्वागत करते थे। उन्हें यह ज्ञान था कि उसने चक्रवर्ती बनने के लिये जो उन्हें परास्त किया है इससे उनकी और उसकी शक्ति की परीक्षा हो गयी और यह सिद्ध हो गया कि वह देश और धर्म की रक्षा के लिये उनसे अधिक उपयोगी व्यक्ति है और उसके द्वारा भारतवासियों का अधिक कल्याण होगा। हर्ष और पुलकेशिन ने जब तक अपने सारे सहधर्मी प्रतिद्वंदियों को अपने अधीन न किया, तब तक वे क्रमशः उत्तर और दक्षिण में किसी भी प्रकार अपने साम्राज्य की उत्तम व्यवस्था न कर सके। इनके प्रतिद्वंदी राजाओं में बहुत से ऐसे थे जो इनके जाति या कुल के थे। इनके परिवार
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या जाति वालों ने भी जो अपनी स्वतन्त्रता के लिये लड़े, कोई निन्दित कर्म नहीं किया क्योंकि यह मानव प्राकृति ही है। वे भी शूरवीर थे। यही कारण है कि उन्होंने परतन्त्रता के सामने सिर झुकाना बुरा समझा। हर्ष और पुलकेशिन ने दो शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करके जो राष्ट्रीय सेवायें अपने देश के प्रति की हैं उनके लिये प्रत्येक हिन्दू को उनके प्रति सदैव कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिये। इन दो राज्यों की स्थापना ने हिन्दुओं के राजनैतिक विचारों को दृढ़ और उनके जीवन को कर्मशील बना दिया। कुछ समय पश्चात् अपनी वीरता की तुलना करने के लिये हर्ष और पुलकेशिन रणभूमि में उतर पड़े। युद्ध में प्रस्तुत हुए उनके युद्ध कौशल की तुलना इस प्रकार निष्पक्ष भाव से करनी चाहिए जैसे पिता अपने पुत्रों की, अथवा गुरु अपने शिष्य की तुलना इस दृष्टि से करता है कि समय आ पड़ने पर कौन अपने प्रतिद्वंदी पर विजय पा सकता है! हिन्दुओं के भीतर जो इस प्रकार के विचार- कि हम सब एकही के वंश के हैं, हमारी एकही पवित्र मातृभाषा है, हम एकही धर्म और सभ्यता के- हैं अब भी वर्त्तमान हैं, इसका एकमात्र कारण पुराने समय में चक्रवर्ती राज्यों का होना है, जिन चक्रवर्ती राज्यों की राजधानियां भारत के भिन्न २ प्रान्तों में समयानुसार बदलती रही। ये राजधानियां अयोध्या, दिल्ली, हस्तनापुर, पाटलीपुत्र, कश्मीर, कन्नौज, कांची, मदूरा और कल्यान आदि स्थानों में गईं। जिस समय एक प्रान्त से राजधानी हटकर दूसरे प्रान्त में जाती थी उस प्रान्त के योग्य शूरवीर, विद्वान् और सेनापति इत्यादि भी बहुधा वहीं चले जाते थे। इसलिये अपने प्रांत की रीति, सभ्यता और सद्गुण इत्यादि भी साथ लेते जाते थे और इस प्रकार मिलते-जुलते सारे भारतवर्ष की सभ्यता इत्यादि एक हो गयी और लोग एक दूसरे को भ्रातृभाव से देखने लगे। चूंकि उन पुराने चक्रवर्ती राज्यों द्वारा
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हिन्दुओं के भीतर संगठन रहता था। इसलिये पान-हिन्दू-सिद्धांत की दृष्टि से हमें इनकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। जिन लोगों ने वीरता दिखाई और जय पाई और जो पराजित होकर मिट गये, हम उन दोनों को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। हर्ष और पुलकेशिन भारत के इतिहास के दो सर्वप्रिय नाम हैं और हमें मगध, आन्ध्र, आन्ध्रभृत्य, राष्ट्रकूट, भोज और पांड्य इत्यादि राज्यों की स्थापना के ऊपर गर्व है। इनमें से प्रत्येक अपना राज्य चक्रवर्ती बनाने के लिए हिन्दुओं से ही लड़ा और इन लड़ाइयों में सहस्रों हिन्दुओं की जान गई, फिर भी हम इन राज्यों को किसी प्रकार से दोषी नहीं ठहराते। हम इस स्थान पर इस बात के ऊपर विचार करने के लिये नहीं रुक सकते कि उन्हें अपने राज्य को विस्तीर्ण करके चक्रवर्ती बनने के लिए कोई दूसरे उपयुक्त साधन थे अथवा नहीं, यदि थे तो लड़ाई न करके उन्हीं को क्यों प्रयोग में नहीं लाए? हमें यह भी मालूम है कि इनमें से बहुत से साम्राज्य हमारे ही प्रान्तों को कष्ट पहुंचाकर बड़े हुए, फिर भी इनके द्वारा जो जो सारी हिन्दू-जाति को लाभ पहुंचा, उसे दृष्टि में रखकर हम किसी प्रकार इन्हें दोषी नहीं ठहराते । मरहठे भी इन्हीं कारणों से, प्राचीन साम्राज्यों से अधिक विशाल, सुदृढ साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए। इस साम्राज्य की स्थापना में उन्हों ने अपने पूर्ववर्ती लोगों की अपेक्षा कम खून बहाया। उनकी भी अन्य हिन्दुओं और अन्य प्रान्त वालों के साथ कहीं-कहीं मुठभेड़ हो गई। इसके लिये उन्हें दोषी प्रमाणित करना भूल है। इसलिए प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है कि जातीय और प्रान्तीय भेद-भाव को छोड़कर उनकी उतनी ही प्रतिष्ठा और मान करे जितना पूर्वकाल के हिन्दू अपने चक्रवर्ती राजाओं का किया करते थे। नहीं नहीं, मरहठो का हमें अधिक प्रतिष्ठा करनी चाहिये, इस लिये कि जिन आवश्यकताओं के कारण मरहठा-आंदोलन आरम्भ हुआ वे पहिले आंदोलनों की आवश्यकताओं से अधिक महत्त्वपूर्ण थीं और मरहठों के आदर्श और ध्येय भी हर्ष और पुलकेशिन की अपेक्षा उत्तम
[ २६ ] थे इसलिए उनके युद्ध और विजय का महत्व भी उतना ही उत्तम था । मरहठे केवल वीरता दिखलाने या अपने सुख और भोगों के प्रलोभन में पड़कर लड़ने के लिये उद्यत नहीं हुए थे; चक्रवर्ती बनकर प्रतिष्ठा के पात्र बनने के लिये भी वे लालायित नहीं थे; वरन् उनके ऐसा करने का मुख्य कारण यह था कि हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति का अस्तित्व मिटने से बचे । महाकवि भूषण ने जो वर्णन किया है “काशीहू की कला जाती, मथुरा मसीत होती, शिवाजी न होते तौ सुनत होति सबकी”—अत्युक्तिपूर्ण नहीं है । तत्काल में हुई घटनाओं का उतना महत्व नहीं होता जितना महत्व उनके कुछ समय बीत जाने पर होता है । भूतकाल में किये गये शुभ कार्यों को लोग विशेष महत्व देते हैं और उन्हें श्रद्धा तथा भक्ति से देखते हैं । यह बात महाराष्ट्र के लिये भी चरितार्थ है । मरहठ-शूरवीरों ने देश और धर्म की जो सेवायें कीं वे विक्रमादित्य, शालीवाहन अथवा चन्द्र- गुप्त के समय के शूरवीरों द्वारा सम्पादित कार्यों से किसी तरह कम महत्ता नहीं रखतीं । इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त का शासन-काल महत्वपूर्ण और ऐश्वर्ययुक्त था; किन्तु हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि उस समय हिंदू धर्म पर आपदायें इतनी भयंकर न थीं जो कि मरहठाकाल के समय आ रही थीं । यदि उस समय कोई आईं भी तो उन्हें दबाने के लिये चन्द्रगुप्त के पास पूर्ण साधन थे । विदेशी इतिहास सिकन्दर बादशाह के आक्रमण का बहुत बड़ा बतलाते हैं । किंतु वास्तव में देखा जाय तो उसके आक्रमण का प्रभाव केवल पंजाब पर पड़ा और वह उसी को विजय कर सका । हिंदूशक्ति का केन्द्र उस समय पाटलिपुत्र था, जहां पर उसका प्रभाव कुछ भी नहीं पड़ा । चन्द्रगुप्त की शक्ति और चाणक्य की नीति ने नन्द को राजसिंहासन त्यागने के लिये विवश कर दिया, कारण नन्द में म्लेच्छों को देश से निकालने की शक्ति न थी । चन्द्रगुप्त ने स्वयं 'महाराजा' की पदवी धारण करके यूनान वालों को भारतभूमि से निकाल दिया । चन्द्रगुप्त के समय से मरहठों के समय
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की तुलना इसीलिये नहीं हो सकती क्योंकि चन्द्रगुप्त के पास शत्रुओं का सामना करने के सब साधन वर्त्तमान थे और हिंदुओं के ऊपर विदे- शियों का इतना आतङ्क नहीं छाया हुआ था और न ही उनके भीतर से सारी शक्तिया और आशायें विदा हो चुकी थीं। मरहठों के समय मे सारा भारत मुसलमानों और पुर्तगेज़ों और दूसरे विभिन्न विदेशियों के पावों तले रौंदा जा रहा था । शताब्दियों से बार बार मुगलों से हारने तथा अपमानित होने के कारण हिंदुओं ने सोच लिया था कि मुगल हम लोगों के ऊपर शासन करने ही के लिये पैदा हुए हैं, और उन्हें ईश्वर की ओर से भारत का शासन करने का अधिकार मिला है। हिंदुओं की तलवारें टूट गई थीं और उनकी ढाले फट गई थीं । फिर भी मरहठे उठे और मुगलों का सामना करके एक ऐसी लड़ाई में विजय प्राप्त की जैसी लड़ाई का सामना इसके पूर्व हिंदुओं को कभी नहीं करना पड़ा था। हूण और शक यद्यपि भारतवर्ष के भीतर पुर्तगेज़ों की तरह घुस आये थे, किंतु वे मुगलों की तरह सारे भारतवर्ष को अधीन करने में असमर्थ रहे थे । हिंदूधर्म पर जैसा आक्रमण हठधर्मी मुसलमानों और पुर्तगेज़ों का मरहठों के समय में हुआ वैसा आक्रमण हिंदू-राष्ट्रीय-गौरव और जातीय जीवन पर तोरामन और रुद्रमन के शासनकाल में भी नहीं हुआ होगा । जिन शूरवीरों ने अपनी धीरता, स्वार्थत्याग और उत्साह द्वारा अपनी मातृ-भूमि और अपने धर्म को हूण और शकों के शासन से मुक्त किया वे अवश्य प्रशंसा के पात्र हैं और हम हिंदूमात्र उन योद्धाओं और नीतिज्ञों के ऋणी हैं। वे हमारे गलों को विदेशियों के पंजे से छुड़ाकर ही शान्त न रहे, वरन् उन्होंने एक शक्तिशाली हिंदू-साम्राज्य स्थापित किया, जिसे मगध या मालवा कहते हैं। चंद्रगुप्त, विक्रमादित्य या शालिवाहन की अध्यक्षता मे जो साम्राज्य स्थापित हुए थे यद्यपि हमारे प्रांतों को विजय करके और हमारे पूर्वजों के रक्तपात से स्थापित किये गये थे तथापि हम में से प्रत्येक का कर्त्तव्य है कि जो
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उपकार उन लोगों ने हिंदू-जाति और हिंदू-धर्म के प्रति किये हैं उनके लिये हम उनके नामों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें और उनके कृत्यों के लिये सदैव कृतज्ञ बने रहें; क्योंकि चन्द्रगुप्त, पुष्यमित्र, समुद्रगुप्त या यशोधर्मन के पौरुष के कारण ही विदेशी हूण और शकों के शासन से भारतवर्ष को मुक्ति मिली थी । महाराज शिवाजी, बाजीरावों, भाऊ, रामदास, नाना, और जनकोजी इत्यादि शूरवीरों ने उचित साधन न होने पर भी ऐसी शूरवीरता के कार्य किये जिनके उदाहरण भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास में भी बहुत ही कम पाये जाते हैं । इन लोगों ने ऐसे समय में, जब कि विक्रमादित्य या चन्द्रगुप्त के समय से अधिक आपत्ति के बादल हिंदू-धर्म पर मंडला रहे थे, एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया । क्या प्रत्येक हिंदू इनके इन कार्यों तथा उनके द्वारा स्थापित साम्राज्य, तथा उनके जातीय गौरव और अभिमान पर ध्यान देकर, उन महापुरुषों के प्रति श्रद्धा से पूर्ण होकर अपना सिर न झुकायेगा और अपने उस राज्य को प्रेम की दृष्टि से न देखेगा ? इस वैज्ञानिक युग में प्रचार आदि के अनेकों साधन रहते हुए भी गेरीवाल्डी और मेंज़िनी जैसे नेता भी अब तक केवल धार्मिक प्रचार का सहारा लेने के कारण सारे इटली के सङ्गठन में असमर्थ रहे । यद्यपि इन्होंने प्रान्तीय भावों को दूर हटाकर लोगों में राष्ट्रीय भाव पैदा करने के लिये प्राणपण से चेष्टा की तथापि उनके कुछ विरोधी खड़े हो ही गये । नेपोलियन और गेमन लोग इस रहस्य को न समझा कि वे अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को इटली के संयुक्तराज्य के हित के लिये क्यों खो दें । जब पाइडमाएट का राजा और गेरीवाल्डी, क्रिस्पी, कैवूर और दूसरे पीडमाएट के नेता एक प्रांत के पश्चात् दूसरे प्रान्त को विजय करके पीडमाएट राज्य में मिला रहे थे, उस समय उन प्रान्तों के नेता इन विजयी शूरवीरों के कार्यों और मनोरथों के जानने के लिए नाना प्रकार के प्रश्न करते थे और उन्हें आपत्तिजनक बतलाते थे । वे
[ ७६ ] आस्ट्रिया या फ्रांस के शासन द्वारा बहुत ही पीड़ित थे, उन्हें विदेशियों की परतंत्रता रूपी बेड़ी की कुछ भी चिंता न थी। जिस प्रकार दास अपने मालिक की नीच से नीच आज्ञाओं के पालन करने का अभ्यासी बन जाता है और अपने बराबर की श्रेणी के लोगों की आज्ञाओं के पालन करने या उन्हे अपना बड़ा समझने में अपना बड़ा अपमान समझना है उसी प्रकार रोम निवासी पाइडमांट के आदेशों के अनुसार चलने में अपना बड़ा ही अपमान समझते थे। इसलिये इटली मे संगठन स्थापित करने के लिये गेरीबाल्डी इम्मानल और दूसरे सेनापतियों को विदेशियों से ही नहीं, किन्तु इटली के लोगों से भी लड़ना पड़ा। इतिहास उन्हें इस कार्य के लिये दोषी नहीं ठहराता। वर्तमान काल के इटली निवासी, जिनमें नेपोलियन और रोमनों के भी वंशज सम्मिलित हैं, इटली के इन निर्मा- त्ताओं के नाम सुन कर, उनके किये गये उपकारों का स्मरण करके भक्ति और श्रद्धा से अपनी टोपियां उतार लेते हैं और भांति-भांति से उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। पाइडमांट का राजा ही पश्चात् में सर्वसम्मति से इटली का बादशाह स्वीकार कर लिया गया। इसी प्रकार यदि उचित परिस्थिति और समय आ गया होता तो मरहठों का राजा भी हिंदुस्तान का सम्राट् स्वीकार कर लिया जाता। इस योग्य पद के लिये उसमे गुण भी वर्तमान थे। शत्रु और मित्र सब लोगों ने यह सुना था कि विश्वासराव को भाऊ ने हिन्दुस्तान का राजाधिराज घोषित कर दिया है। जर्मन राज्य, उनकी स्वतन्त्रता और उनकी एकता का इतिहास मरहठा काल के भारत के राजनैतिक विकास के इतिहास से समानता रखते हैं, जिनमें हिन्दू राजे एक होकर मरहठों के राजा को अपना सम्राट् मानकर काम कर रहे थे। जिस प्रकार पाइड- मांट का इटली राज्य तथा प्रशिया का साम्राज्य राष्ट्रीयता के भावों से परिपूर्ण थे, उसी प्रकार महाराष्ट्र के हिन्दू साम्राज्य में भी राष्ट्रीयता और हिन्दू-हित का उद्देश्य कूट २ कर भरा था, उसके लिये प्रत्येक
[ ३० ] हिंदू का यह कर्तव्य है कि जिन लोगों ने उस साम्राज्य की स्थापना के 'लिये अपने प्राणों को निछावर किया, उनका स्मरण आने पर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें । ४. मरहठों की नवीन युद्ध कला "आपणांस राखून गनीम घ्यावा. स्थलास गनिमाचा वेढा पडला तो रोज झुंजून स्थल जतन करावें. निदान येऊन पडलें तरी परिच्छिन्न वार होऊन लोकीं मरावें. पण सल्ला देऊन, स्थल देऊन, जीव वांचविला असें न सर्वथा न घडावें --राजाज्ञा ऐसे अवघेंची उठतां । परदलाची काय ती चिंता । हरिणें पळती उठतां चित्ता । चहूकडे"--रामदास हम पुस्तक के आरंभ में ही लिख आये हैं कि शिवाजी और उनके पूज्यपाद गुरु सद्ज्ञानी रामदास जी द्वारा हमारी जाति के सामने आध्यात्मिक तथा जातीय उच्च आदर्शों को युक्तिपूर्वक रखने तथा नवीन युद्ध कला तथा और नये २ अस्त्र शस्त्रों के आविष्कार के कारण महाराज शिवाजी के जन्म के साथ हिन्दू जाति के वर्तमान इतिहास में एक बड़े ॐ यदि शत्रु हमारे देश पर आक्रमण करें तो प्रतिदिवस अपने आप को सुरक्षित करके उनसे लड़ना चाहिये । यदि विपत्ति सर पर आपड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिये, वरन् लड़ते २ मर जाना चाहिये ताकि पीछे संसार यह न कहे कि हमने अपने देश का बलिदान करके अपनी जान बचाई है । --राजाज्ञा इसी प्रकार सारा संसार हमारे विरुद्ध खड़ा भी हो जाय तो भी कोई चिंता नहीं । शत्रु-सेना से भय मत खाओ । शत्रु की सेना को इधर उधर भागते हुए हिरणों के समान समझो ।-- रामदास