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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

चतुर्थ खण्ड

सा ब्रह्मेति होवाच। ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति, ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥

सा=उस (भगवती उमादेवी) ने; ह उवाच=स्पष्ट उत्तर दिया कि; ब्रह्म इति=(वे तो) परब्रह्म परमात्मा हैं; ब्रह्मणः वै=उन परमात्माकी ही; एतद्विजये=इस विजयमें; महीयध्वम् इति=तुम अपनी महिमा मानने लगे थे; ततः एव=उमाके इस कथनसे ही; =निश्चयपूर्वक; विदाञ्चकार=(इन्द्रने) समझ लिया (कि); ब्रह्म इति=(यह) ब्रह्म है॥ १ ॥

व्याख्या—देवराज इन्द्रके पूछनेपर भगवती उमादेवीने इन्द्रसे कहा कि 'तुम जिन दिव्य यक्षको देख रहे थे और जो इस समय अन्तर्धान हो गये हैं, वे साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं। तुमलोगोंने जो असुरोंपर विजय प्राप्त की है, यह उन ब्रह्मकी शक्तिसे ही की है; अतएव वस्तुतः यह उन परब्रह्मकी ही विजय है, तुम तो इसमें निमित्तमात्र थे। परंतु तुमलोगोंने ब्रह्मकी इस विजयको अपनी विजय मान लिया और उनकी महिमाको अपनी महिमा समझने लगे।

यह तुम्हारा मिथ्याभिमान था और जिन परम कारुणिक परमात्माने तुमलोगोंपर कृपा करके असुरोंपर तुम्हें विजय प्रदान करायी, उन्हीं परमात्माने तुम्हारे मिथ्याभिमानका नाश करके तुम्हारा कल्याण करनेके लिये यक्षके रूपमें प्रकट होकर अग्नि और वायुका गर्व चूर्ण किया एवं तुम्हें वास्तविक ज्ञान देनेके लिये मुझे प्रेरित किया। अतएव तुम अपनी स्वतन्त्र शक्तिके सारे अभिमानका त्याग करके, जिन ब्रह्मकी महिमासे महिमान्वित और शक्तिमान् बने हो, उन्हींकी महिमा समझो। स्वप्नमें भी यह भावना मत करो कि ब्रह्मकी शक्तिके बिना अपनी स्वतन्त्र शक्तिसे कोई भी कुछ कर सकता है।' उमाके इस उत्तरसे देवताओंमें सबसे पहले इन्द्रको यह निश्चय हुआ कि यक्षके रूपमें स्वयं ब्रह्म ही उन लोगोंके सामने प्रकट हुए थे॥ १ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड ४ ]

तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वार्युरिन्द्रस्ते होनत्रेदिष्टं पस्पृशुस्ते होनन्तु प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥

तस्मात् वै=इसीलिये; एते देवाः=ये तीनों देवता; यत्=जो कि; अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु (और); इन्द्रः=इन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं; अन्यान्=दूसरे (चन्द्रमा आदि); देवान्=देवोंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं; हि=क्योंकि; ते=उन्होंने ही; एनत् नैदिष्टम्=इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पृशुः=(दर्शनद्वारा) स्पर्श किया है; ते हि=(और) उन्होंने ही; एनत्=इनको; प्रथमः=सबसे पहले; विदाञ्चकार=जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ २ ॥

व्याख्या —समस्त देवताओंमें अग्नि, वायु और इन्द्रको ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिये; क्योंकि उन्हीं तीनोंने ब्रह्मका संस्पर्श प्राप्त किया है। परब्रह्म परमात्माके दर्शनका, उनका परिचय प्राप्त करनेके प्रयत्नमें प्रवृत्त होनेका और उनके साथ वार्तालापका परम सौभाग्य उन्हींको प्राप्त हुआ और उन्होंने ही सबसे पहले इस सत्यको समझा कि हमलोगोंने जिनका दर्शन प्राप्त किया है, जिसे वार्तालाप किया है और जिनकी शक्तिसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है, वे ही साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं।

सारांश यह कि जिन सौभाग्यशाली महापुरुषको किसी भी कारणसे भगवान्के दिव्य संस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हो गया है, जो उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सद्वाप करनेका सुअवसर पा चुके हैं, उनकी महिमा इस मन्त्रमें इन्द्रादि देवताओंका उदाहरण देकर की गयी है ॥ २ ॥

सम्बन्ध —अब यह कहते हैं कि इन तीनों देवताओंमें भी अग्नि और वायुकी अपेक्षा देवराज इन्द्र श्रेष्ठ हैं—

तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स होनत्रेदिष्टं पस्पृशं, स होनन्तु प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥

तस्मात् वै=इसीलिये; इन्द्रः=इन्द्र; अन्यान् देवान्=दूसरे देवताओंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं; हि=क्योंकि; सः=उसने; एनत् नैदिष्टम्=इन

खण्ड ४ ] केनोपनिषद् ६१


अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पर्श=(उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया; स हि=(और) उसीने; एनत्=इनको; प्रथमः=अन्यान्य देवताओंसे पहले; विदाञ्चकार=भलीभाँति जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं॥ ३ ॥

व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमें ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था; परंतु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओंने केवल सुनकर जाना; परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं; क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये॥ ३॥

सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा संकेतसे समझाते हैं—

तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा इतीन्म्यमीमिषदा इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥

तस्य=उस ब्रह्मका; एषः=यह; आदेशः=सांकेतिक उपदेश है; यत्=जो कि; एतत्=यह; विद्युतः=बिजलीका; व्यद्युतत् आ=चमकना-सा है; इति=इस प्रकार (क्षणस्थायी) है; इत्=तथा जो; न्यमीमिषत् आ=नेत्रोंका झपकना-सा है; इति=इस प्रकार; अधिदैवतम्=यह आधिदैविक उपदेश है॥ ४॥

व्याख्या—जब साधकके हृदयमें ब्रह्मको साक्षात् करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी उत्कण्ठाको और भी तीव्रतम तथा उत्कट

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड ४ ]

बनानेके लिये बिजलीके चमकने और आँखोंके झपकनेकी भाँति अपने स्वरूपकी क्षणिक झाँकी दिखलाकर छिप जाया करते हैं। पूर्वोक्त आख्यायिकामें इसी प्रकार इन्द्रके सामनेसे दिव्य यक्षके अन्तर्धान हो जानेकी बात आयी है। देवर्षि नारदको भी उनके पूर्वजन्ममें क्षणभरके लिये अपनी दिव्य झाँकी दिखलाकर भगवान् अन्तर्धान हो गये थे। यह कथा श्रीमद्भागवत (१। ६। १९-२०) में आती है। जब साधकके नेत्रोंके सामने या उसके हृदय-देशमें पहले-पहले भगवान्के साकार या निराकार स्वरूपका दर्शन या अनुभव होता है, तब वह आनन्दाश्रयसे चकित-सा हो जाता है। इससे उसके हृदयमें अपने आराध्यदेवको नित्य-निरन्तर देखते रहने या अनुभव करते रहनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। फिर उसे क्षणभरके लिये भी इष्ट-साक्षात्कारके बिना शान्ति नहीं मिलती। यही बात इस मन्त्रमें आधिदैविक उदाहरणसे समझायी गयी है—ऐसा प्रतीत होता है। वस्तुतः यहाँ बड़ी ही गोपनीय रीतिसे ऐसे शब्दोंमें ब्रह्मत्वका संकेत किया गया है कि जिसे कोई अनुभवी संत-महात्मा ही बतला सकते हैं। शब्दोंका अर्थ तो अपनी-अपनी भावनाके अनुसार विभिन्न प्रकारसे लगाया जा सकता है ॥४॥

सम्बन्ध— अब इसी बातको आध्यात्मिक भावसे समझाते हैं—

अथाध्यात्मं यदेतद्ब्रह्मतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्षणः संकल्पः ॥ ५ ॥

अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक (उदाहरण दिया जाता है); यत्= जो कि; मनः=(हमारा) मन; एतत्=इस (ब्रह्म) के समीप; गच्छति इव=जाता हुआ-सा प्रतीत होता है; च=तथा; एतत्=इस ब्रह्मको; अभीक्षणम्=निरन्तर; उपस्मरति=अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है; अनेन= इस मनके द्वारा (ही); संकल्पः=च=संकल्प अर्थात् उस ब्रह्मके साक्षात्कारकी उत्कट अभिलाषा भी (होती है) ॥५॥

व्याख्या— जब साधकको अपना मन आराध्यदेव श्रीभगवान्के समीपतक

खण्ड ४ ] केनोपनिषद् ७१


पहुँचता हुआ-सा दीखता है, वह अपने मनसे भगवान्‌के निर्गुण या सगुण—जिस स्वरूपका भी चिन्तन करता है, उसकी जब प्रत्यक्ष अनुभूति-सी होती है, तब स्वाभाविक ही उसका अपने उस इष्टमें अत्यन्त प्रेम हो जाता है। फिर वह क्षणभरके लिये भी अपने इष्टदेवकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता। उस समय वह अतिशय व्याकुल हो जाता है (तद्विस्मरणे परमव्याकुलता, नारदभक्तिसूत्र १९)। वह नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण करता रहता है और उसके मनमें अपने इष्टको प्राप्त करनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। पिछले मन्त्रमें जो बात आधिदैविक दृष्टिसे कही गयी थी, वही इसमें आध्यात्मिक दृष्टिसे कही गयी है॥ ५॥

सम्बन्ध— अब उस ब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं—

तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनꣳ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥

तत्= वह परब्रह्म परमात्मा; तद्वनम्= (प्राणिमात्रका प्रापणीय होनेके कारण) ‘तद्वन’; नाम ह= नामसे प्रसिद्ध है; (अतः) तद्वनम्= वह आनन्दघन परमात्मा प्राणिमात्रकी अभिलाषाका विषय और सबका परम प्रिय है; इति= इस भावसे; उपासितव्यम्= उसकी उपासना करनी चाहिये; सः यः= वह जो भी साधक; एतत्= उस ब्रह्मको; एवम्= इस प्रकार (उपासनाके द्वारा); वेद= जान लेता है; एनम् ह= उसको निःसंदेह; सर्वाणि= सम्पूर्ण; भूतानि= प्राणी; अभि= सब ओरसे; संवाञ्छन्ति= हृदयसे चाहते हैं अर्थात् वह प्राणिमात्रका प्रिय हो जाता है॥ ६॥

व्याख्या— वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सभीका अत्यन्त प्रिय है। सभी प्राणी किसी-न-किसी प्रकारसे उसीको चाहते हैं, परंतु पहचानते नहीं; इसीलिये वे सुखके रूपमें उसे खोजते हुए दुःखरूप विषयोंमें भटकते रहते हैं, उसे पा नहीं सकते! इस रहस्यको समझकर साधकको चाहिये कि उस परब्रह्म परमात्माको प्राणिमात्रका प्रिय समझकर उसके नित्य अचल अमल अनन्त परम आनन्दस्वरूपका नित्य-निरन्तर चिन्तन करता रहे। ऐसा करते-

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड ४ ]

करते जब वह आनन्दस्वरूप सर्वप्रिय परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह स्वयं भी आनन्दमय हो जाता है। अतः जगत्के सभी प्राणी उसे अपना परम आत्मीय समझकर उसके साथ हृदयसे प्रेम करने लगते हैं ॥ ६ ॥

उपनिषद् भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥

भोः =हे गुरुदेव; उपनिषदम् =ब्रह्मसम्बन्धी रहस्यमयी विद्याका; ब्रूहि =उपदेश कीजिये; इति =इस प्रकार (शिष्यके प्रार्थना करनेपर गुरुदेव कहते हैं कि); ते =तुझको (हमने); उपनिषत् =रहस्यमयी ब्रह्मविद्या; उक्ता =बतला दी; ते =तुझको (हम); वाव =निश्चय ही; ब्राह्मीम् =ब्रह्मविषयक; उपनिषदम् =रहस्यमयी विद्या; अब्रूम =बतला चुके हैं; इति =इस प्रकार (तुम्हें समझना चाहिये) ॥ ७ ॥

व्याख्या —गुरुदेवसे सांकेतिक भाषामें ब्रह्मविद्याका श्रेष्ठ उपदेश सुनकर शिष्य उसको पूर्णरूपसे हृदयङ्गम नहीं कर सका; इसलिये उसने प्रार्थना की कि ‘भगवन्! मुझे उपनिषद्—रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये।’ इसपर गुरुदेवने कहा—‘वत्स! हम तुम्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर चुके हैं।’ तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ से लेकर उपर्युक्त मन्त्रतक जो कुछ उपदेश किया है, तुम यह दृढ़रूपसे समझ लो कि वह सुनिश्चित रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश है ॥ ७ ॥

सम्बन्ध —ब्रह्मविद्याके सुननेमात्रसे ही ब्रह्मके स्वरूपका रहस्य समझमें नहीं आता, इसके लिये विशेष साधनोंकी आवश्यकता होती है; इसलिये अब उन प्रधान साधनोंका वर्णन करते हैं—

तस्यै तपो दमः कर्मैति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गनि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥

तस्यै =उस रहस्यमयी ब्रह्मविद्याके; तपः =तपस्या; दमः =मन-इन्द्रियोंका नियन्त्रण; कर्म =कर्तव्यपालन; इति =ये तीनों; प्रतिष्ठा =आधार हैं; वेदाः =वेद; सर्वाङ्गनि =उस विद्याके सम्पूर्ण अङ्ग हैं अर्थात् वेदमें उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका

खण्ड ४ ] केनोपनिषद् ७३

सविस्तर वर्णन है; सत्यम्=सत्यस्वरूप परमेश्वर; आयतनम्=उसका अधिष्ठान—प्राप्य है॥ ८ ॥

व्याख्या—सुन-पढ़कर रट लिया और ब्रह्मज्ञानी हो गये, यह तो ब्रह्मविद्याका उपहास है और अपने-आपको धोखा देना है। ब्रह्मविद्यारूपी प्रासादकी नींव हैं—तप, दम और कर्म आदि साधन। इन्हींपर वह रहस्यमयी ब्रह्मविद्या स्थिर हो सकती है। जो साधक साधन-सम्पत्तिकी रक्षा, वृद्धि तथा स्वधर्मपालनके लिये कठिन-से-कठिन कष्टको सहर्ष स्वीकार नहीं करते, जो मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें नहीं कर लेते और जो निष्कामभावसे अनासक्त होकर वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे ब्रह्मविद्याका यथार्थ रहस्य नहीं जान पाते; क्योंकि ये ही उसे जाननेके प्रधान आधार हैं। साथ ही यह भी जानना चाहिये कि वेद उस ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग हैं। वेदमें ही ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गोंकी विशद व्याख्या है, अतएव वेदोंका उसके अङ्गोंसहित अध्ययन करना चाहिये और सत्यस्वरूप परमेश्वर अर्थात् त्रिकालाबाधित सच्चिदानन्दघन परमेश्वर ही उस ब्रह्मविद्याका परम अधिष्ठान, आश्रयस्थल और परम लक्ष्य है। अतएव उस ब्रह्मको लक्ष्य करके जो वेदानुसार तप, दम और निष्काम कर्म आदिका आचरण करते हुए उसके तत्त्वका अनुसंधान करते हैं, वे ही ब्रह्मविद्याके सर्वस्व परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त कर सकते हैं॥ ८ ॥

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥

यः=कोई भी; एताम् वै=इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याको; एवम्=पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति; वेद=जान लेता है; [सः=वह;] पाप्मानम्=समस्त पाप-समूहको; अपहत्य=नष्ट करके; अनन्ते=अविनाशी असीम; ज्येये=सर्वश्रेष्ठ; स्वर्गे लोके=परमधाममें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; प्रतितिष्ठति=सदाके लिये स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥

व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे जो उपनिषद्-रूपा ब्रह्मविद्याके

७४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ४

रहस्यको जान लेता है, अर्थात् तदनुसार साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पापोंका—परमात्म-साक्षात्कारमें प्रतिबन्धकरूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका अशेषरूपसे नाश करके नित्य-सत्य सर्वश्रेष्ठ परमधाममें स्थित हो जाता है, कभी वहाँसे लौटता नहीं। सदाके लिये वहाँ प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ 'प्रतिष्ठित' पदका पुनः उच्चारण ग्रन्थ-समाप्तिका सूचक तो है ही, साथ ही उपदेशकी निश्चितताका प्रतिपादक भी है॥ ९॥
चतुर्थ खण्ड समाप्त॥ ४॥
॥ सामवेदीय केनोपनिषद् समाप्त॥


शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

इसका अर्थ इस उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

कठोपनिषद्

कठोपनिषद् उपनिषदोंमें बहुत प्रसिद्ध है। यह कृष्णयजुर्वेदकी कठशाखाके अन्तर्गत है। इसमें नचिकेता और यमके संवादरूपमें परमात्माके रहस्यमय तत्त्वका बड़ा ही उपयोगी और विशद वर्णन है। इसमें दो अध्याय हैं और प्रत्येक अध्यायमें तीन-तीन वल्लियाँ हैं।

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

ॐ=पूर्णब्रह्म परमात्मन्; (आप) नौ=हम दोनों (गुरु-शिष्य) की; सह=साथ-साथ; अवतु=रक्षा करें; नौ=हम दोनोंका; सह=साथ-साथ; भुनक्तु=पालन करें; सह=(हम दोनों) साथ-साथ ही; वीर्यम्=शक्ति; करवावहै=प्राप्त करें; नौ=हम दोनोंकी; अधीतम्=पढ़ी हुई विद्या; तेजस्वि=तेजोमयी; अस्तु=हो; मा विद्विषावहै=हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।

व्याख्या—हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनोंकी साथ-साथ सब प्रकारसे रक्षा करें, हम दोनोंका आप साथ-साथ समुचितरूपसे पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकारसे बल प्राप्त करें, हम दोनोंकी अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो—कहीं किसीसे हम विद्यामें परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्रसे बँधे रहें, हमारे अंदर परस्पर कभी द्वेष न हो। हे परमात्मन्! तीनों तापोंकी निवृत्ति हो।

प्रथम अध्याय

प्रथम वल्ली

ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥

=ॐ इस सच्चिदानन्दघन परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; ह वै=प्रसिद्ध है कि; उशन्=यज्ञका फल चाहनेवाले; वाजश्रवसः=वाजश्रवाके पुत्र (उद्दालक) ने; सर्ववेदसम्=(विश्वजित् यज्ञमें) अपना सारा धन; ददौ=(ब्राह्मणोंको) दे दिया; तस्य=उसका; नचिकेता=नचिकेता; नाम ह=नामसे प्रसिद्ध; पुत्रः आस=एक पुत्र था॥ १ ॥

**व्याख्या—**ग्रन्थके आरम्भमें परमात्माका स्मरण मङ्गलकारक है, इसलिये यहाँ सर्वप्रथम 'ॐ कार' का उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ हुआ है। जिस समय भारतवर्षका पवित्र आकाश यज्ञधूम और उसके पवित्र सौरभसे परिपूर्ण रहता था, त्यागमूर्ति ऋषि-महर्षियोंके द्वारा गाये हुए वेदमन्त्रोंकी दिव्य ध्वनिसे सभी दिशाएँ गूँजती रहती थीं, उसी समयका यह प्रसिद्ध इतिहास है। गौतमवंशीय वाजश्रवात्मज महर्षि अरुणके पुत्र अथवा अन्नके प्रचुर दानसे महान् कीर्ति पाये हुए (वाज=अन्न, श्रव=उसके दानसे प्राप्त यश) महर्षि अरुणके पुत्र उद्दालक ऋषिने फलकी कामनासे विश्वजित् नामक एक महान् यज्ञ किया। इस यज्ञमें सर्वस्व दान करना पड़ता है। अतएव उद्दालकने भी अपना सारा धन ऋत्विजों और सदस्योंको दक्षिणामें दे दिया। उद्दालकजीके नचिकेता नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र था॥ १ ॥

तं॰ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥

दक्षिणासु नीयमानासु=(जिस समय ब्राह्मणोंको) दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये (गौएँ) लायी जा रही थीं, उस समय; कुमारम्=छोटा बालक;

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ७७


सन्तम्=होनेपर भी; तम् ह=उस (नचिकेता) में; श्रद्धा=श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि) का; आविवेश=आवेश हो गया (और); सः=(उन जराजीर्ण गायोंको देखकर) वह; अमन्यत=विचार करने लगा॥ २॥

व्याख्या—उस समय गो-धन ही प्रधान धन था और वाजश्रवस उद्दालकके घरमें इस धनकी प्रचुरता थी। होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—ये चार प्रधान ऋत्विज होते हैं; ऐसा माना गया है कि इनको सबसे अधिक गौएँ दी जाती हैं। प्रशास्ता, प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्तःकरणमें श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २॥

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥ ३॥

पीतोदकाः=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणाः=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहाः=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रियाः=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ताः=ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; सः=वह दाता (तो); ते लोकाः=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दाः=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अतः पिताजीको सावधान करना चाहिये) ॥ ३॥

व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं! अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक

७८ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं—इनमें गर्भधारण करनेतककी भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मृत्युके समीप पहुँची हुई गौएँ जिन ब्राह्मणोंके घर जायँगी, उनको दुःखके सिवा ये और क्या देंगी? दान तो उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपनेको सुख देनेवाली हो, प्रिय हो और उपयोगी हो तथा वह जिनको दी जाय, उन्हें भी सुख और लाभ पहुँचानेवाली हो। दुःखदायिनी अनुपयोगी वस्तुओंको दानके नामपर देना तो दानके व्याजसे अपनी विपद् टालना है और दान ग्रहण करनेवालोंको धोखा देना है। इस प्रकारके दानसे दाताको वे नीच योनियाँ और नरकादि लोक मिलते हैं जिनमें सुखका कहीं लेश भी नहीं है। पिताजी इस दानसे क्या सुख पायेंगे? यह तो यज्ञमें वैगुण्य है, जो इन्होंने सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ करके भी उपयोगी गौओंको मेरे नामपर रख लिया है; और सर्वस्वमें तो मैं भी हूँ, मुझको तो इन्होंने दानमें दिया नहीं। पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजीको इस अनिष्टकारी परिणामसे बचानेके लिये अपना बलिदान कर दूँगा। यही मेरा धर्म है॥ ३॥

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥ ४॥

सः ह=यह सोचकर वह; पितरम्=अपने पितासे; उवाच=बोला कि; तत (तात)=हे प्यारे पिताजी! आप; माम्=मुझे; कस्मै=किसको; दास्यसि इति=देंगे?; (उत्तर न मिलनेपर उसने वही बात) द्वितीयम्=दुबारा; तृतीयम्=तिबारा (कही); तम् ह=(तब पिताने) उससे; उवाच= (क्रोधपूर्वक इस प्रकार) कहा; त्वा=तुझे (मैं); मृत्यवे=मृत्युको; ददामि इति=देता हूँ॥ ४॥

**व्याख्या—**यह निश्चय करके उसने अपने पितासे कहा—'पिताजी! मैं भी तो आपका धन हूँ, आप मुझे किसको देते हैं?' पिताने कोई उत्तर नहीं दिया; तब नचिकेताने फिर कहा—'पिताजी! मुझे किसको देते हैं?' पिताने इस बार भी उपेक्षा की। पर धर्मभीरु और पुत्रका कर्तव्य जाननेवाले नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही कहा—'पिताजी! आप

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ७९

मुझे किसको देते हैं?' अब ऋषिको क्रोध आ गया और उन्होंने आवेशमें आकर कहा—'तुझे देता हूँ मृत्युको!' ॥ ४ ॥

सम्बन्ध— यह सुनकर नचिकेता मन-ही-मन विचारने लगा कि—

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः।
किँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥

बहूनाम् = मैं बहुत-से शिष्योंमें तो; प्रथमः = प्रथम श्रेणीके आचरणपर; एमि = चलता आया हूँ (और); बहूनाम् = बहुतोंमें; मध्यमः = मध्यम श्रेणीके आचारपर; एमि = चलता हूँ (कभी भी नीची श्रेणीके आचरणको मैंने नहीं अपनाया फिर पिताजीने ऐसा क्यों कहा!); यमस्य = यमका; किम् स्वित् कर्तव्यम् = ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है; यत् अद्य = जिसे आज; मया = मेरे द्वारा (मुझे देकर); करिष्यति = (पिताजी) पूरा करेंगे ॥ ५ ॥

व्याख्या— शिष्यों और पुत्रोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। जो गुरु या पिताका मनोरथ समझकर उनकी आज्ञाकी प्रतीक्षा किये बिना ही उनकी रुचिके अनुसार कार्य करने लगते हैं, वे उत्तम हैं। जो आज्ञा पानेपर कार्य करते हैं, वे मध्यम हैं और जो मनोरथ जान लेने और स्पष्ट आदेश सुन लेनेपर भी तदनुसार कार्य नहीं करते, वे अधम हैं। मैं बहुत-से शिष्योंमें तो प्रथम श्रेणीका हूँ, प्रथम श्रेणीके आचरणपर चलनेवाला हूँ; क्योंकि उनसे पहले ही मनोरथ समझकर कार्य कर देता हूँ; बहुत-से शिष्योंसे मध्यम श्रेणीका भी हूँ, मध्यम श्रेणीके आचारपर भी चलता आया हूँ; परंतु अधम श्रेणीका तो हूँ ही नहीं। आज्ञा मिले और सेवा न करूँ, ऐसा तो मैंने कभी किया ही नहीं। फिर, पता नहीं, पिताजीने मुझे ऐसा क्यों कहा? मृत्युदेवताका भी ऐसा कौन-सा प्रयोजन है, जिसको पिताजी आज मुझे उनको देकर पूरा करना चाहते हैं ॥ ५ ॥

सम्बन्ध— सम्भव है, पिताजीने क्रोधके आवेशमें ही ऐसा कह दिया हो; परंतु जो कुछ भी हो, पिताजीका वचन तो सत्य करना ही है। इधर ऐसा दीख रहा है कि पिताजी अब पश्चात्ताप कर रहे हैं, अतएव उन्हें सान्त्वना देना भी आवश्यक है।

८०ईशादि नौ उपनिषद्[ अध्याय १

यह विचारकर नचिकेता एकान्तमें पिताके पास जाकर उनकी शोकनिवृत्तिके लिये इस प्रकार आश्वासनपूर्ण वचन बोला—

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे। सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥

पूर्वे=आपके पूर्वज पितामह आदि; यथा=जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य=उसपर विचार कीजिये (और); अपरे=(वर्तमानमें भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग; [यथा=जैसा आचरण कर रहे हैं; ] तथा प्रतिपश्य=उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये); मर्त्यः=(यह) मरणधर्मा मनुष्य; सस्यम् इव=अनाजकी तरह; पच्यते=पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है (तथा); सस्यम् इव=अनाजकी भाँति ही; पुनः=फिर; आजायते=उत्पन्न हो जाता है॥ ६॥

**व्याख्या—**पिताजी! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमें न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं; परंतु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुनः जन्म ले लेता है॥ ६॥

**सम्बन्ध—**अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये। आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालनकर मुझे मृत्यु (यमराज)-के पास जानेकी अनुमति दीजिये। पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दुःख हुआ; परंतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया। नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं; अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किये बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा—

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्। तस्यैताँशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८१


**वैवस्वत=**हे सूर्यपुत्र; **वैश्वानरः=**स्वयं अग्निदेवता (ही); **ब्राह्मणः अतिथिः=**ब्राह्मण अतिथिके रूपमें; गृहान्=(गृहस्थके) घरोंमें; **प्रविशति=**प्रवेश करते हैं; **तस्य=**उनकी; (साधु पुरुष) **एताम्=**ऐसी (अर्थात् अर्घ्य-पाद्य-आसन आदिके द्वारा); **शान्तिम्=**शान्ति; **कुर्वन्ति=**किया करते हैं; (अतः आप) उदकम् हर=(उनके पाद-प्रक्षालनादिके लिये) जल ले जाइये॥ ७॥

**व्याख्या—**साक्षात् अग्नि ही मानो तेजसे प्रज्वलित होकर ब्राह्मण अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरपर पधारते हैं। साधुहृदय गृहस्थ अपने कल्याणके लिये उस अतिथिरूप अग्निको शान्त करनेके लिये उसे जल (पाद्य-अर्घ्य आदि) दिया करते हैं; अतएव हे सूर्यपुत्र! आप उस ब्राह्मण-बालकके पैर धोनेके लिये तुरंत जल ले जाइये। भाव यह कि वह अतिथि लगातार तीन दिनोंसे आपकी प्रतीक्षामें अनशन किये बैठा है; आप स्वयं उसकी सेवा करेंगे, तभी वह शान्त होगा॥ ७॥

आशाप्रतीक्षे संगतꣳ सूनृतां च
इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्।
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥ ८॥

**यस्य=**जिसके; **गृहे=**घरमें; **ब्राह्मणः=**ब्राह्मण अतिथि; **अनश्नन्=**बिना भोजन किये; **वसति=**निवास करता है; [**तस्य=**उस;] **अल्पमेधसः=**मन्दबुद्धि; **पुरुषस्य=**मनुष्यकी; **आशाप्रतीक्षे=**नाना प्रकारकी आशा और प्रतीक्षा; **संगतम्=**उनकी पूर्तिसे होनेवाले सब प्रकारके सुख; **सूनृताम् च=**सुन्दर भाषणके फल एवं; **इष्टापूर्ते च=**यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मोंके और कुआँ, बगीचा, तालाब आदि निर्माण करानेके फल तथा; **सर्वान् पुत्रपशून्=**समस्त पुत्र और पशु; **एतद् वृङ्क्ते=**इन सबको (वह) नष्ट कर देता है॥ ८॥

**व्याख्या—**जिसके घरपर अतिथि ब्राह्मण भूखा बैठा रहता है, उस मन्दबुद्धि मनुष्यको न तो वे इच्छित पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेकी उसे पूरी आशा थी; न वे ही पदार्थ मिलते हैं, जिनके मिलनेका निश्चय था और

८२ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

वह बाट ही देख रहा था; कभी कोई पदार्थ मिल भी गया तो उससे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। उसकी वाणीमेंसे सौन्दर्य, सत्य और माधुर्य निकल जाते हैं; अतः सुन्दर वाणीसे प्राप्त होनेवाला सुख भी उसे नहीं मिलता; उसके यज्ञ-दानादि इष्ट कर्म और कूप, तालाब, धर्मशाला आदिके निर्माणरूप पूर्तकर्म एवं उनके फल नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अतिथिका असत्कार उसके पूर्वपुण्यसे प्राप्त पुत्र और पशु आदि धनको नष्ट कर देता है॥ ८॥

सम्बन्ध— पत्नीके वचन सुनकर धर्ममूर्ति यमराज तुरंत नचिकेताके पास गये और पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा विधिवत् उसकी पूजा करके कहने लगे—

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व॥ ९॥

ब्रह्मन्= हे ब्राह्मणदेवता; नमस्यः अतिथिः=आप नमस्कार करनेयोग्य अतिथि हैं; ते=आपको; नमः अस्तु=नमस्कार हो; ब्रह्मन्= हे ब्राह्मण; मे स्वस्ति= मेरा कल्याण; अस्तु=हो; यत्=(आपने) जो; तिस्रः=तीन; रात्रीः=रात्रियोंतक; मे=मेरे; गृहे=घरपर; अनश्नन्=बिना भोजन किये; अवात्सीः=निवास किया है; तस्मात्= इसलिये आप (मुझसे); प्रति=प्रत्येक रात्रिके बदले (एक-एक करके); त्रीन् वरान्=तीन वरदान; वृणीष्व=माँग लीजिये॥ ९॥

व्याख्या— ब्राह्मणदेवता! आप नमस्कारादि सत्कारके योग्य मेरे माननीय अतिथि हैं; कहाँ तो मुझे चाहिये था कि 'मैं आपका यथायोग्य पूजन-सेवन करके आपको संतुष्ट करता और कहाँ मेरे प्रमादसे आप लगातार तीन रात्रियोंसे भूखे बैठे हैं! मुझसे यह बड़ा अपराध हो गया है। आपको नमस्कार है। भगवन्! इस मेरे दोषकी निवृत्ति होकर मेरा कल्याण हो। आप प्रत्येक रात्रिके बदले एक-एक करके मुझसे अपनी इच्छाके अनुरूप तीन वर माँग लीजिये'॥ ९॥

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८३


सम्बन्ध— तपोमूर्ति अतिथि ब्राह्मण-बालकके अनशनसे भयभीत होकर धर्मज्ञ यमराजने जब इस प्रकार कहा, तब पिताको सुख पहुँचानेकी इच्छासे नचिकेता बोला—

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥

मृत्यो = हे मृत्युदेव; यथा = जिस प्रकार; गौतमः = (मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि = मेरे प्रति; शान्तसंकल्पः = शान्त संकल्पवाले; सुमनाः = प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्युः = क्रोध एवं खेदसे रहित; स्यात् = हो जायँ (तथा); त्वत्प्रसृष्टम् = आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीतः = वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर); अभिवदेत् = मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत् = यह; (मैं) त्रयाणाम् = अपने तीनों वरोंमेंसे; प्रथमम् वरम् = पहला वर; वृणे = माँगता हूँ ॥ १० ॥

व्याख्या— मृत्युदेव! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेशमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दुःखी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा संतुष्ट हो जायँ तथा आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें ॥ १० ॥

सम्बन्ध— यमराजने कहा—

यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥

त्वाम् = तुमको; मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे; प्रमुक्तम् = छूटा हुआ; ददृशिवान् = देखकर; मत्प्रसृष्टः = मुझसे प्रेरित; आरुणिः = (तुम्हारे पिता) अरुण-पुत्र; औद्दालकिः = उद्दालक; यथा पुरस्तात् = पहलेकी भाँति ही; प्रतीतः = यह मेरा

८४ ईशादि नौ उपनिषद् [ अध्याय १

पुत्र नचिकेता ही है, ऐसा विश्वास करके; वीतमन्युः=दुःख और क्रोधसे रहित; भविता=हो जायँगे; रात्रीः=(और वे अपनी आयुकी शेष) रात्रियोंमें; सुखम्=सुखपूर्वक; शयिता=शयन करेंगे॥ ११॥

व्याख्या—तुमको मृत्युके मुखसे छूटकर घर लौटा हुआ देखकर मेरी प्रेरणासे तुम्हारे पिता अरुण-पुत्र उद्दालक बड़े प्रसन्न होंगे, तुमको अपने पुत्ररूपमें पहचानकर तुमसे पूर्ववत् प्रेम करेंगे तथा उनका दुःख और क्रोध सर्वथा शान्त हो जायगा। तुम्हें पाकर अब वे जीवनभर सुखकी नींद सोयेंगे॥ ११॥

सम्बन्ध—इस वरदानको पाकर नचिकेता बोला, हे यमराज!

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति। उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥

स्वर्गे लोके=स्वर्गलोकमें; किंचन भयम्=किंचित्मात्र भी भय; न अस्ति=नहीं है; तत्र त्वम् न=वहाँ मृत्युरूप स्वयं आप भी नहीं हैं; जरया न बिभेति=वहाँ कोई बुढ़ापेसे भी भय नहीं करता; स्वर्गलोके=स्वर्गलोकके निवासी; अशनायापिपासे=भूख और प्यास; उभे तीर्त्वा=इन दोनोंसे पार होकर; शोकातिगः=दुःखोंसे दूर रहकर; मोदते=आनन्द भोगते हैं॥ १२॥

स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥

मृत्यो=हे मृत्युदेव; सः त्वम्=वे आप; स्वर्ग्यम् अग्निम्=उपर्युक्त स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको; अध्येषि=जानते हैं (अतः); त्वम्=आप; मह्यम्=मुझ; श्रद्दधानाय=श्रद्धालुको (वह अग्निविद्या); प्रब्रूहि=भलीभाँति समझाकर कहिये; स्वर्गलोकाः=स्वर्गलोकके निवासी; अमृतत्वम्=अमरत्वको; भजन्ते=

वल्ली १ ] कठोपनिषद् ८५


प्राप्त होते हैं (इसलिये); एतत्= यह (मैं); द्वितीयेन वरेण= दूसरे वरके रूपमें; वृणे= माँगता हूँ ॥ १३ ॥

व्याख्या— मैं जानता हूँ कि स्वर्गलोक बड़ा सुखकर है, वहाँ किसी प्रकारका भी भय नहीं है। स्वर्गमें न तो कोई वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है और न जैसे मर्त्यलोकमें आप (मृत्यु)-के द्वारा लोग मारे जाते हैं वैसे कोई मारा ही जाता है। वहाँ मृत्युकालीन संकट नहीं है। यहाँ जैसे प्रत्येक प्राणी भूख और प्यास दोनोंकी ज्वालासे जलते हैं; वैसे वहाँ नहीं जलना पड़ता। वहाँके निवासी शोकसे तरकर सदा आनन्द भोगते हैं; परंतु वह स्वर्ग अग्निविज्ञानको जाने बिना नहीं मिलता। हे मृत्युदेव ! आप उस स्वर्गके साधनभूत अग्निको यथार्थरूपसे जानते हैं। मेरी उस अग्निविद्यामें और आपमें श्रद्धा है, श्रद्धावान् तत्त्वका अधिकारी होता है; अतः आप कृपया मुझको उस अग्निविद्याका उपदेश कीजिये, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोकमें रहकर अमृतत्वको—देवत्वको प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर माँगता हूँ ॥ १२-१३ ॥

सम्बन्ध— तब यमराज बोले—

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥

नचिकेतः= हे नचिकेता; स्वर्ग्यम् अग्निम्= स्वर्गदायिनी अग्निविद्याको; प्रजानन्= अच्छी तरह जाननेवाला मैं; ते प्रब्रवीमि= तुम्हारे लिये उसे भलीभाँति बतलाता हूँ; तत् उ मे निबोध= (तुम) उसे मुझसे भलीभाँति समझ लो; त्वम् एतम्= तुम इस विद्याको; अनन्तलोकाप्तिम्= अविनाशी लोककी प्राप्ति करानेवाली, प्रतिष्ठाम्= उसकी आधारस्वरूपा; अथो= और; गुहायाम् निहितम्= बुद्धिरूप गुफामें छिपी हुई; विद्धि= समझो ॥ १४ ॥

व्याख्या— नचिकेता ! मैं उस स्वर्गकी साधनरूपा अग्निविद्याको भलीभाँति

८६ईशादि नौ उपनिषद्[ अध्याय १

जानता हूँ और तुमको यथार्थरूपसे बतलाता हूँ। तुम इसको अच्छी तरहसे सुनो। यह अग्निविद्या अनन्त—विनाशरहित लोककी प्राप्ति करानेवाली है और उसकी आधारस्वरूपा है। पर तुम ऐसा समझो कि यह है अत्यन्त गुप्त। विद्वानोंकी बुद्धिरूप गुफामें छिपी रहती है॥ १४॥

सम्बन्ध— इतना कहकर यमराजने—

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः॥ १५॥

तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका; तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; याः वा यावतीः=उसमें कुण्ड-निर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी; इष्टकाः=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं; वा यथा=तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं); च सः अपि=तथा उस नचिकेताने भी; तत् यथोक्तम्=वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर; प्रत्यवदत्=यमराजको पुनः सुना दिया; अथ=उसके बाद; मृत्युः अस्य तुष्टः=यमराज उसपर संतुष्ट होकर; पुनः एव आह=फिर बोले—॥ १५॥

व्याख्या— उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमें किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एवं अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले॥ १५॥