जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
२६८ सटीकजातकपारिजाते-
मं. बृ. शु. ( २५ ) चं. मं. बृ. श. ( २६ ) चं. मं. शु. श. ( २७ ) चं. बु. बृ. शु. ( २८ ) च. बु. बृ. श. ( २९ ) चं. बु. शु. श. ( ३० ) चं. बृ. शु. श. ( ३१ ) मं. बु. बृ. शु. ( ३२ ) मं. बु. बृ. श. ( ३३ ) मं. बु. शु. श. ( ३४ ) मं. बृ. शु. श. ( ३५ ) बु. बृ. शु. श., इति ३५ भेदा जायन्ते, तेषु-२६, ३३, ३४, तमभेदास्त- त्फलानि चात्र नोक्तानि । शेषं सर्वं स्पष्टमेवेति ॥ १५-२५ ॥ एक राशिमें सूर्य, चन्द्रमा, मंगल और बुध हों तो जातक मायावी, प्रपञ्ची, लेखक और रोगी होवे । चन्द्रमा, मंगल, सूर्य और बृहस्पतिके एकराशिस्य होने से जातक धन- वान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, राजाका प्रिय करनेवाला, निरोग और निश्चिन्त होता है ॥१५॥ मंगल, सूर्य, चन्द्रमा और शुक्रके एक राशिमें होनेसे पुत्र-स्त्री-धनसे युक्त, विद्वान्, अल्पभोजी, सुखी, कार्योंमें निपुण और कृपालु होता है । सूर्य, चन्द्रमा, शनि और मंगलसे चञ्चल नेत्रवाला, घूमने वाला, व्यभिचारिणी स्त्रीका स्वामी, और निर्धन होता है ॥ १६ ॥ एक राशिस्थ बुध, चन्द्र, सूर्य और गुरु होनेसे जातक मित्र-पुत्र-स्त्रीसे युत, धनवान्, गुणी, यशस्वी, बलवान् और उदार होवे । शुक्र, चन्द्रमा, सूर्य और बुध एकत्र हों तो विकल और वाचाल होवे । शनि, चन्द्र, सूर्य और बुध एकत्र हों तो निर्धन और कृतघ्न होवे । सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति और शुक्र एकत्र हों तो जलमें, वन्यस्थलमें चलनेवाला, राज- पूज्य और भोगी हो । सूर्य, चन्द्र, गुरु और शनि एक राशिस्थ हों तो विशाल नेत्र, बहुत धन पुत्र से युत हो और वेश्याका पति होवे ॥ १८ ॥ शनि, चन्द्रमा, सूर्य और शुक्र एक राशिस्थ हों तो निर्बल, डरपोक, कन्याओंके द्वारा धनोपार्जन और खाने पीने में तत्पर होता है । मंगल, सूर्य, बुध और गुरु एकत्र हों तो सबल, विपत्तिसे युक्त, स्त्री-सम्पत्तिवाला, नेत्र रोगी, और भ्रमणशील होता है ॥ १९ ॥ सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र के एकत्र रहनेसे दूसरेकी स्त्रीमें लीन, विषमनेत्र (छोटा बड़ा नेत्र, या टेढ़ा नेत्र) चोर बुद्धि, धनादिसे रहित होता है । सूर्य, मंगल, बुध और शनि एक राशिमें हों तो सेनापति वा राजमंत्री, नीच कर्म करनेवाला और भोगी होता है ॥२०॥ सूर्य, मंगल, बृहस्पति और शुक्रके एकत्र होनेसे राजाके सदृश, विख्यात, विशेष पूज्य और धनी होता है । बृहस्पति, मंगल, शनि और सूर्य एक राशिमें हों तो निर्धन, भ्रान्त हो तथा मित्र और परिवारवाला होवे । मंगल, सूर्य, शुक्र और शनि एक राशिस्थ हों तो हारनेवाला, कुकर्मियोंमें प्रधान होवें । शुक्र, सूर्य, बुध और गुरु एकत्र हों तो धन और यशमें मुख्य, लोकमें प्रधान होवे ॥ २१ ॥ बृहस्पति, शनि, बुध, और सूर्यके योगसे झगड़ालु, मानी और दुराचारी होता है । शनि, बुध, सूर्य और शुक्रके योगसे सुन्दरमुख, सत्यव्रत, और आचारवान् होता है । सूर्य, शनि, बुध और शुक्र एकत्र हों तो कलामें निपुण, नीचोंका मालिक और साहसी होता है । बृहस्पति, चन्द्रमा, बुध और मंगल एकत्र हों तो राजाका प्रिय करनेवाला, मंत्री, कवि और राजा होता है ॥ २२ ॥ चन्द्रमा, मंगल, बुध और शुक्र एकत्र हों तो सुन्दरी स्त्री-सुन्दर पुत्रसे युत, बुद्धिमान्, विरूप और सुखी होता है । शनि, मंगल, चन्द्रमा और बुध एकत्र हों तो जातक दो माता पितावाला, पराक्रमी और विशेष स्त्री-पुत्रवाला होता है । चन्द्रमा मंगल बृहस्पति और शुक्र एकत्र हों तो पापकर्ममें निपुण, निद्रालु और धनादिमें आतुर होता है । बृहस्पति, मंगल, सूर्य और चन्द्रमा एक राशिमें हों तो स्थिर बुद्धि, पराक्रमी सुखी और पण्डित होता है । शुक्र, बुध, चन्द्रमा और बृहस्पतिके योगसे बधिर, विद्वान्, यशस्वी और धनी होता है । चन्द्रमा, शनि, बुध और गुरु एक राशिमें हों तो बड़ा धनी, बन्धुप्रिय, और धार्मिक होता है । शुक्र, बुध, शुक्र और शनिके एकत्र होनेसे बहुत जनसमूहोंका वैरी, दूसरेकी स्त्रीका प्रेमी होता है । बृहस्पति, चन्द्रमा, शनि और शुक्र एक राशिमें हों तो सुख और श्रद्धा-दयासे हीन होता है ॥ २४ ॥ मंगल, बुध, गुरु और शुक्रके एकत्र होनेसे धनवान् और निन्दित होता है ।
म्बरः'? It is 'तराम्वरः' (म् + व, i.e., म्व).
Now line : "पूज्यः कलासु निपुणो वधबन्धनाढ्यो रोगी सितासितगुरुज्ञधराकुमारैः ।" Planets: सित (शुक्र), असित (शनि), गुरु (बृहस्पति), ज्ञ (बुध), धराकुमार (मंगल).
Line : "प्रेष्योऽतिदुःखभयरोगयुतः क्षुधार्तः शन्यारबोधनविकर्तनदानवेज्यैः ॥३२॥" Wait, look at the first word: "प्रेष्योऽतिदुःख..." -> In image: "प्रेष्योऽतिदुःखभयरोगयुतः क्षुधार्तः शन्यारबोधनविकर्तनदानवेज्यैः ॥३२॥" Wait, look at 'प्रेष्यो': In : "प्रेष्योऽतिदुःखभयरोगयुतः" In : "प्रेष्योऽधनो मलिनवेषयुतोऽतिमुर्खश्चोरः कुजेन्दुगुरुशुक्रदिनेशपुत्रैः ।" Wait, 'अतिमुर्खश्चोरः' or 'अतिमूखश्चोरः' or 'अतिमूर्खश्चोरः'? In : "अतिमुर्खश्चोरः" - wait, look at 'मुर्ख
और शुक्र एक राशिमें हों तो मन्त्री, धनी, प्रतापसे दूसरोंLine 3:को दण्ड देनेवाला होवे। सूर्य, बुध, चन्द्र, गुरु, और शनि एकत्र हों तो पराश्रमोपजीवी, विशेषLine 4:डरपोक, पाप करनेवाला, और उग्रवृत्ति वाला होवे ॥ २९ ॥Line 5:बुध, शनि, चन्द्रमा, शुक्र और सूर्य एकत्र हों तो धन-हीन, दीर्घ आकृति, पुत्ररहितLine 6:और बहुत रोगवान् हो । बृहस्पति, चन्द्रमा, शुक्र, सूर्य और शनि एकत्र हों तो वह स्त्रीLine 7:सहित वाचाल, इन्द्रजाल करनेमें चतुर, भयरहित और शत्रु युत होवे ॥ ३० ॥Line 8:शुक्र, मंगल, सूर्य, गुरु और बुध एकत्र हों तो शोकरहित, सेना और घोड़ोंका स्वामीLine 9:और अन्य स्त्रीमें चञ्चल हो । मंगल, गुरु, रवि, बुध और शनि एकत्र हों तो मिष्टासेWait, line 9:मिष्टासेorमिष्ठासे? Look at line 9: मिष्ठासेorमिष्टासे? It has 'ष्ठ': मिष्ठासे! Line 10: भोजन, मलीन-पुराना वस्त्र धारण करनेवाला होवे ॥ ३१ ॥Line 11:शुक्र
द्वयादिग्रहयोगाध्यायः ॥८॥ २७१ होता है। बृहस्पति-मंगल-चन्द्रमा-रवि-बुध-शनि एक राशिमें हों तो चोर, परस्त्रीमें रत, कोढ़ी, बाँधवोंसे दूषित, पुत्र-रहित, मूर्ख और विदेशी होवे ॥ ३७ ॥ मंगल-सूर्य-चन्द्र-शुक्र-शनि-बुध एक राशिमें हों तो जातक नीच, दूसरेके कर्ममें लीन, क्षय और पीनस दुःखसे दुःखी हो। शुक्र-शनि-मंगल-सूर्य-बृहस्पति-चन्द्रमा एक राशिमें हों तो मन्त्री, स्त्री-धन-पुत्र-हर्षसे हीन और शान्त होवे ॥ ३८ ॥ अथ मेषादिराशिस्थग्रहफलम् जातः स्वल्पधनंस्तु गानरसिको विद्याधनैःक्लेशधी- रज्ञः सर्वकलारसज्ञचतुरो हैरण्यकैः साहसी । सम्पूज्यः कुवणिजत्क्रियासु कुशलः पुत्रादिभाग्यैश्च्युतः श्रीमाँस्तोयकृषिक्रियादिभिरिने मेषादिराशिस्थिते ॥ ३९ ॥ स्वर्क्षे भूपकृषिक्रियाटनधनः,
२७२ सटीकजातकपारिजाते-- मङ्गल अपनी राशि (मे. वृश्चि.) में हो तो राजासे, कृषि क्रियासे, यात्रासे धन प्राप्त होवे । शुक्रके गृह (वृ. तु.) में हो तो कामवृद्धि हो । बुधके गृह (मि. कं.) में हो तो दीन वचन बोलने वाला, कर्कमें राजप्रिय, धनवान्, सिंहमें हो तो निर्भय धनी होवे । बृहस्पति की राशि (ध. मी.) में होतो शत्रुजित, सुखी, कुम्भमें हो तो दुर्जनसेवित, मकरमें हो तो राजा वा राजाके सदृश होता है ॥ ४० ॥ बुध मङ्गलकी राशि (१. ८.) में होतो दरिद्र, शुक्रके गृहमें (वृ. तु.) में विद्वान्, मिथुन में सुखी, कर्कमें निज धनका नाशक, सिंहमें अपनी स्त्रीसे पराजित, कन्यामें हो तो सुन्दर- गुणका खान, भयरहित, धनुमें हो तो राजा का प्रिय, मीनमें हो तो लेखकसे पराजित और शनिके गृहमें हो तो शिल्पी (कारीगर) और दूत होता है ॥ ४१ ॥ बृहस्पति मङ्गलके गृह (१. ८.) में हो तो अधिक सेना-वित्त-सुतसे युत हो, गुणी तथा दाता हो । शुक्रके गृहमें (वृ.तु.) में हो तो तेजस्वी हो, बुधके गृह (मि. कन्या) में हो तो परिच्छद-सुहृद्-युत हो, कर्कमें हो तो बुद्धिमान्, पुत्र-धनी, कुम्भमें भोगी, सिंहमें यशस्वी और अपने गृह (ध. मी.) में राजा या राजाके सदृश हो और नीच (मकर) में हो तो घूमनेवाला, क्लेश बुद्धिवाला होवे ॥ ४२ ॥ शुक्र मेषादि राशिमें स्थित हो तो छिनार, वृषमें हो तो धन-बुद्धि-मित्र-बन्धु वाला हो, मिथुनमें हो तो विद्या-धन-ज्ञानवान्, कर्कमें हो तो डरपोक, सिंहमें हो तो अल्पपुत्र, कन्यामें हो तो अति नीच आचारवाला, तुलामें हो तो राजप्रिय, वृश्चिकमें हो तो दुष्ट स्त्रीगणोंसे सेवित, धनुमें हो तो जनोंका स्वामी, मकरमें हो तो भोगी, कुम्भमें हो तो कुमारी कन्यासे भोग करनेवाला, मीनमें हो तो श्री-विद्या-गुण-शीलवान् होवे ॥ ४३ ॥ मेषादि राशिस्थ शनिका फल-मेष राशिमें शनि हो तो मूर्ख, वृषमें हो तो अल्पधनी, मिथुनमें हो तो धन-पुत्र-बुद्धिसे हीन, कर्कमें हो तो मातृसुखसे रहित, सिंहमें हो तो स्त्रीके अनुकूल, कन्यामें होतो थोड़ा धन-पुत्र, तुलामें होतो गुणाग्रणी, पुर तथा ग्राममें मुखिया, वृश्चिकमें उग्र बुद्धिवाला, धनुमें पुत्र कलत्र-धन-विभवयुक्त, मकरमें राजप्रिय कुम्भमें धनवान्, मीनमें तेज आदि गुणसे बड़ा होवे ॥ ४४ ॥ चन्द्रमाके मेषादि राशिमें जो फल कहे हैं वे तथा यहां नवांशका फल विचार कर पण्डित कहें ॥ ४५ ॥ अथ दृष्टिफलम्- पापेक्षिते गगनगामिनि दुष्टरोगी जातः स्वधर्मगुणवित्तयशोविहीनः । पापन्विते तु परवित्तवधूविलोलोः पारुष्यावाक्पटुबुद्धियुतोऽलसः स्यात् ॥ ४६ ॥ यदि शुभकरदृष्टे खेचरे जातमर्त्यः सुतधनयुतभोगी सुन्दरो राजपूज्यः । परिभवरहितः स्यात्सौम्यखेटोपयाते जितरिपुरिह धर्माचारवानिङ्गितज्ञः॥४७॥ इदानीं दृष्टिफलमुच्यते । गगनगामिनि=ग्रहे (अत्र ग्रहशब्देन कारकग्रहोऽवगन्तव्यः) पापेक्षिते = पापग्रहेणावलोकिते, शेषं स्पष्टार्थमेवेत्यलं विस्तरेण ॥ ४६-४७ ॥ कारक ग्रह पापग्रहसे यदि देखा जाता हो तो दुष्ट-रोगी, अपने धर्म-गुण-धन-यशसे हीन होवे । पापग्रहसे युक्त हो तो परायेका धन-स्त्री भोगनेवाला,
दृष्ट्यादिग्रहयोगाध्यायः ॥८॥ २७३ कर्कस्थे शशिनि क्षमासुतमुखैरालोकिते शौर्यवा- नार्यश्रेष्ठकविर्महीपतिरयोजीवी सनेत्रामयः । भूपः पण्डितवाग् धनी नरपतिः पापी विभुः सिंहगे कन्यायां धनिको विभुः प्रभुसमो विद्वान् विशीलः सुखी ॥ ४९ ॥ तौलिस्थे हिमगौ बुधादिशुभदैरालोकिते स्यात् क्रमाद् भूपः स्वर्णकरो वणिक्कुजरविच्छायासुतैर्वञ्चकः । कीटस्थे शशिनि द्विमातृपितृको राजप्रियो नीचकृ- द्रोगी निर्धनिको नृपालसचिवो दृष्टे बुधादिग्रहैः ॥ ५० ॥ चन्द्रे धनुःस्थे शुभदृष्टियुक्ते विद्याधनज्ञानयशोबलाढ्यः । दृष्टे कुजादित्यदिनेशपुत्रैः सभाशठः पत्यवधूरतः स्यात् ॥ ५१ ॥ राजा महीपतिर्विद्वान् धनी निर्धनिको विभुः । कुजादिग्रहसन्दृष्टे मकरस्थे निशाकरे ॥ ५२ ॥ कुम्भस्थिते निशानाथे शुभदृष्टे यशोधनः । जातः परवधूलोलः पापखेटनिरीक्षिते ॥ ५३ ॥ मीनस्थे शुभवीक्षिते हिमकरे हास्यप्रियो भूपति- र्विद्वान् पापनिरोक्षिते परुषवाक् पापात्मको जायते । पापांशे खलवीक्षिते शठमतिर्जातोऽन्यजायारतः सौम्यांशे शुभवीक्षिते हिमकरे जातो यशस्वी भवेत् ॥ ५४ ॥ राशिदृष्टिफलं यत्तद्वंशकेषु च योजयेत् । भवन्ति शुभदाः सर्वे शुभदृग्योगसंयुताः ॥ ५५ पूर्वं सामान्यतो दृष्टिफलमुक्तमिदानीं चन्द्रस्य स्थानपरत्वेन ग्रहदृष्टिफलमुच्यते । चन्द्रे मेषराशौ गते तत्र कुजादिखचरैर्मङ्गलादिग्रहैरवलोकिते जातो भूपतिः, विद्वान, राजसमो वा समस्तगुणवान् भवति । एतदुक्तं भवति, जन्मकाले यदि चन्द्रे मेषराशौ भौमादिकेन ग्रहे- णावलोक्यते तदा जातः क्रमात् राजा, विद्वान, राजसदृशः, सकलगुणयुक्तः, चोरः, दरिद्रः, भवति । एवं स्पष्टमेव निखिलमिति । अत्र राशिपरत्वेन चन्द्रस्य यथा दृष्टिफलमुक्तं तथैव तत्तद्राशेर्नवांशवशतोऽपि दृष्टिफलं तदेव तथैव चावगन्तव्यम् । तत्र शुभग्रहस्य योगो दृष्टिश्च यदि भवेत्तदा शोभनमन्यथा ( पापयोगदृष्ट्या ) न शुभमिति ॥ ४८-५५ ॥ चन्द्रमा मेष राशिमें स्थित हो मंगलादि ग्रह उसको न देखते हों तो क्रमसे राजा, विद्वान्, राजसम, समस्त गुणवान्, चोर, दरिद्र होवे । वृष राशिमें चन्द्रमा को मङ्गल देखता हो तो निर्धन, बुध देखे तो राजा, गुरुकी दृष्टिसे मान्य, शुक्रकी दृष्टिसे राजा, शनिकी दृष्टिसे धनी, सूर्यकी दृष्टिसे दूत होता है ॥ ४८ ॥ चन्द्रमा मिथुन राशिमें हो उसपर मंगलकी दृष्टि हो तो विकल, बुधकी दृष्टिसे राजा, गुरुकी दृष्टिसे सुमतिमान्, शुक्रकी दृष्टिसे वीर, शनिकी दृष्टिसे खल, सूर्यकी दृष्टिसे दरिद्र होता है। कर्क राशिमें चन्द्रमा हो उसपर यदि मंगलकी दृष्टि हो तो पराक्रमी, बुधकी दृष्टिसे श्रेष्ठ कवि, शुक्रकी दृष्टिसे राजा, शनिकी दृष्टिसे लौहजीवी, सूर्यकी दृष्टिसे नेत्र रोगी होवे। कन्या राशिमें चन्द्रमापर कुजादि ग्रहकी दृष्टि हो तो फल इस प्रकार है कि मंगलकी दृष्टिसे धनिक, बुधकी दृष्टिसे विभु ( स्वामी-व्यापक ) गुरुकी दृष्टि हो तो प्रभुके सदृश, शुक्रकी दृष्टि हो तो विद्वान्, शनिकी दृष्टि हो तो शीलरहित, सूर्यकी दृष्टि हो तो सुखी होता है ॥ ४९ ॥ तुला राशिमें चन्द्रमाको बुधादि शुभग्रह देखते हों तो फल इस प्रकार है कि बुधकी
२७४ सटीकजातकपारिजाते- दृष्टि हो तो राजा, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो सोनार, शुक्रकी दृष्टि हो तो वैश्य हो । मंगल सूर्य-शनिकी दृष्टि हो तो ठग होता है । चन्द्रमा वृश्चिक राशिमें हो, उसपर बुधादि ग्रह की दृष्टि होनेसे फल-बुधकी दृष्टि हो तो दोमाता-वाला, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो राज- प्रिय, शुक्रकी दृष्टिवाला नीचकर्मा, शनिकी दृष्टिसे रोगी हो, सूर्यकी दृष्टिसे दरिद्र, और मंगलकी दृष्टिसे राजाका मन्त्री होवे ॥ ५० ॥ चन्द्रमा धनुराशिमें हो शुभ ग्रहसे दृष्ट युत हो तो जातक विद्या-धन-ज्ञान-चक्षसे बली हो, मङ्गल-सूर्य-शनिकी दृष्टि हो तो सभा-शठ, वेश्याओंसे विहार करनेवाला होवे ॥ मकर राशिके चन्द्रमापर बुधादि ग्रहकी दृष्टि होनेसे इस प्रकार फल है-बुधकी दृष्टि हो तो राजा, बृहस्पतिकी दृष्टि हो तो राजा, शुक्रकी दृष्टि हो तो विद्वान्, शनिकी दृष्टिमें धनी, सूर्यकी दृष्टि हो तो दरिद्र, मङ्गलकी दृष्टि हो तो विभु ( व्यापक ) होता है ॥ ५२ ॥ कुम्भ राशिमें चन्द्रमा स्थित हो उसे शुभ ग्रह देखते हों तो जातक यश-धनसे युक्त हो, और पापग्रह देखते हों तो दूसरेकी स्त्रीसे रमण करे ॥ ५३ ॥ मीन राशिमें चन्द्रमा हो शुभग्रह उसे देखते हों तो हास्यप्रिय, राजा, या विद्वान् हो, पापग्रह देखते हों तो कठोर वचनवाला तथा पापात्मा होवे । पापांशकमें चन्द्रमाको पापग्रह देखते हों तो शठ बुद्धि हो और दूसरेकी स्त्रीसे भोग करे । चन्द्रमा शुभांशमें हो और शुभग्रह देखते हों तो जातक यशस्वी हो ॥ ५४ ॥ राशि दृष्टिका जो फल वही नवांशकमें भी योजना करे। शुभग्रहकी दृष्टिसे वा योगसे सब शुभ प्रद होते हैं ॥ ५५ ॥ अथ लग्नादिभावगतग्रहफलम् । मार्तण्डो यदि लग्नगोऽल्पतनयो जातः सुखी निर्घृणः स्वल्पाशी विकलेक्षणो रणतलश्लाघी सुशीलो नटः । ज्ञानाचाररतः सुलोचनयशःस्वातन्त्र्यकस्तूत्तुङ्गे' मीने स्त्रीजनसेवितो हरिर्गते रात्र्यन्धको वीर्यवान् ॥ ५६ ॥ क्षीणे शशिन्युदयगे बधिरोऽङ्गहीनः प्रेष्यश्च पापसहिते तु गतायुरेव । स्वोच्चर्क्षगे धनयशोबहुरूपशाली पूर्णे तनौ यदि चिरायुरुपैति विद्वान् ॥५७॥ क्रूरः साहसिकोऽटनोऽतिचपलो रोगी कुजे लग्नगे विद्यावित्ततपःस्वधर्मनिरतो लग्नस्थिते बोधने । जीवे लग्नगते चिरायुरमलज्ञानी धनी रूपवान् कामी कान्तवपुः सदारतनयो विद्वान् विलग्ने भृगौ ॥ ५८ ॥ दुर्नासिको वृद्धकलत्ररोगी मन्दे विलग्नोपगतेऽङ्गहीनः । महीपतुल्यः सुगुणाभिरामो जातः स्वतुङ्गोपगते चिरायुः ॥ ५६ ॥ क्रूरो दयाधर्मविहीनशीलो राहौ विलग्नोपगते तु रोगी । केतौ विलग्ने सरुजोऽतिलुब्धः सौम्येक्षिते राजसमानभोगी ॥६०॥ रविंर्क्षेत्रोदये राहू राजभोगाय सम्पदि । स्थिरार्थपुत्रान् कुरुते मंदिर्क्षेत्रोदये शिखी ॥ ६१ ॥ इदानीं भाव रस्त्वेन ग्रहाणां फलानि विवक्षुः प्रथमं लग्नगतग्रहफलान्युच्यन्ते । श्लोकाः सरलार्था एव ॥ ५६-६१ ॥ यदि जन्मलग्नमें सूर्य हो तो थोड़े पुत्रवाला, सुखी, निर्दयी, अल्पभोजी, विकलनेत्र, रणकी इच्छा रखनेवाला, सुशील, नाट्य करनेवाला हो, लग्नमें यदि उच्च राशिका सूर्य हो तो ज्ञानाचारमें रत, सुन्दर नेत्र, तथा यशस्वी और स्वतन्त्र हो । मीनमें स्त्रीजनसे सेवित हो सिंहका सूर्य लग्नमें हो तो रात्र्यन्ध तथा वीर्यवान् होवे ॥ ५६ ॥
द्वचादिग्रहयोगाध्यायः ॥८॥ २७५ क्षीण चन्द्रमा लग्नमें हो तो बधिर, अङ्गहीन हो। पापग्रहसे युक्त हो तो दूत और अल्पायु होवे। अपनी उच्च राशिका हो तो धनी यशस्वी, बहुत रूपवान् हो। यदि पूर्ण चन्द्रमा लग्नमें हो तो दीर्घायु और विद्वान् हो ॥ ५७ ॥ मङ्गल लग्नमें हो तो क्रूर, साहसी, घूमनेवाला, अत्यन्त चपल और रोगी हो। बुध लग्नमें हो तो विद्या, धन, तपसे युक्त, धर्मात्मा हो। बृहस्पति लग्नमें हो तो बड़ी आयु- वाला, स्वच्छ-ज्ञानी, धनी और रूपवान् हो। शुक्र लग्नमें हो तो कामी, सुन्दर शरीर, स्त्री- पुत्रसे युक्त, और विद्वान् हो ॥ ५८ ॥ शनि लग्नमें हो तो दुर्नासिका, वृद्धाक्षीवाला, रोगी और अङ्गहीन हो। यदि शनि अपने उच्च स्थानमें हो तो राजाके समान, सुन्दर गुणवाला हो ॥ ५९ ॥ राहु लग्नमें हो तो क्रूर, दया-धर्म-हीन, शीलवान् और रोगी हो। केतु लग्नमें हो तो रोगसे युक्त, लोभी हो। शुभग्रह देखते हों तो राज-समान भोगी हो ॥ ६० ॥ सूर्यके गृहमें होकर लग्नमें राहु हो तो जल्द राज-भोग प्राप्त करता है। शनिके गृहमें केतु लग्नमें हो तो स्थिर-धन-पुत्रको देता है ॥ ६१ ॥ अथ द्वितीयस्थग्रहफलम् । त्यागी धातुद्रव्यवानिष्टशत्रुर्वाग्मी वित्तस्थानगे चित्रभानौ । कामी कान्तश्चारुवागिङ्गितज्ञो विद्याशीलो वित्तवान् वित्तगेन्दौ ॥ ६२ ॥ धातोर्वादात्कृषिक्रियाटनपरः कोपी कुजे वित्तगे बुद्ध्योपार्जितवित्तशीलगुणवान् साधुः कुटुम्बे बुधे । वाग्मी भोजनसौख्यवित्तविपुलस्त्यागी धनस्थे गुरौ विद्याकामकलाविलासधनवान्वित्तस्थिते भार्गवे ॥ ६३ ॥ असत्यवादी चपलोऽटनोऽधनः शनौ कुटुम्बोपगते तु वञ्चकः । विरोधवान्वित्तगते विधुन्तुदे जनापराधी शिखिनि द्वितीयेगे ॥ ६४ ॥ अत्र त्रिभिः श्लोकैर्द्वितीयभावगतग्रहाणां फलान्युक्तानि । श्लोकाः स्पष्टार्थाः ॥ सूर्य द्वितीय भावमें हो तो जातक दानी धातु द्रव्यवाला, इष्ट शत्रुवाला और वाचाल हो। चन्द्रमा द्वितीय स्थानमें होतो कामी, तेज स्वरूप, सुन्दरवचन, बुद्धिमान्, विद्याशील और धनवान् हो ॥ ६२ ॥ मंगल द्वितीय स्थानमें हो तो धातुवाद-खेती-और घूमनेमें तत्पर तथा क्रोधी हो। बुध दूसरे भावमें हो तो बुद्धिसे उपार्जन किये धन-शील-गुण हों और साधु हो। गुरु द्वितीय भवनमें प्राप्त हो तो वाचाल, भोजन-सौख्यवाला, विशेष धनी और दानी हो। शुक्र द्वितीय स्थानमें हो तो विद्या-काम-कलाका ज्ञाता तथा धनवान् चालक हो ॥ ६३ ॥ शनि द्वितीय स्थानमें हो तो असत्य-वादी, चञ्चल, घूमनेवाला, दरिद्र, और ठग हो। धन भावमें राहु हो तो विरोधी हो। केतु द्वितीय भावमें हो तो लोगों का अपराधी हो ॥६४॥ अथ तृतीयस्थग्रहफलम् । शूरो दुर्जनसेवितोऽतिधनवान् त्यागी तृतीये रवौ । चन्द्रे सोदरराशिगेऽल्पधनिको बन्धुप्रियः सात्त्विकः । ख्यातोऽपारपराक्रमः शठमतिर्दुश्चिक्ययाते कुजे मायाकर्मपरोऽटनोऽतिचपलो दीनोऽनुजस्थे बुधे ॥ ६५ ॥ भ्रातृस्थानगते गुरौ गतधनः स्त्रीनिर्जितः पापकृत् शुक्रे सोदरगे सरोषवचनः पापी वधूर्निर्जितः । अल्पाशी धनशीलवंशगुणवान् भ्रातृस्थिते भानुजे राहौ विक्रमगेऽतिवीर्यधनिकः केतौ गुणी वित्तवान् ॥ ६६ ॥
२७६ सटीकजातकपारिजाते- सोदरारातिगः शुक्रः शोकरोगभयप्रदः । तत्रैव शुभकारी स्यात् पुरतो यदि भास्करात् ॥ ६७ ॥ श्लोकत्रयेण तृतीयभावस्थग्रहाणां फलान्युक्तानि । सरलार्थाः श्लोकाः ॥ ६५-६७ ॥ सूर्य तीसरे भावमें हो तो पराक्रमी, दुर्जन सेवित, विशेष धनी, और दानी हो । चन्द्रमा तृतीय भावमें हो तो अल्प धनी, बन्धुप्रिय, और सात्विक हो । मंगल तीसरे भावमें हो तो अपार पराक्रमी, और शठ-बुद्धि हो । बुध तृतीय स्थानमें हो तो मायावी, घूमनेवाला, अत्यन्त चञ्चल और दीन हो ॥ ६५ ॥ गुरु भ्रातृ स्थानमें हो तो धन रहित, स्त्रीसे पराजित, पाप करनेवाला हो । शुक्र तृतीय भवनमें हो तो रोष युक्त वचन बोले, और पापी हो, तथा स्त्रीसे पराजित हो । शनि तृतीय स्थानमें हो तो अल्प भोजी, धन-शील-वंशसे युक्त और गुणवान् हो । राहु तीसरे भावमें हो तो अत्यन्त बली और धनी हो । केतु हो तो गुणी और धनी हो ॥ ६६ ॥ शुक्र तृतीय और षष्ठभावमें हो तो शोक-रोग-भय देता है, और उन्हीं स्थानों में शुक्र यदि सूर्यके आगे हो तो शुभ फल देता है ॥ ६७ ॥ अथ चतुर्थस्थग्रहफलम् । हृद्रोगी धनधान्यबुद्धिरहितः क्रूरः सुखस्थे रवौ विद्याशीलसुखान्वितः परवधूलोलश्चतुर्थे विधौ । भौमे बन्धुगते तु बन्धुरहितः स्त्रीनिर्जितः शौर्यवान् बन्धुस्थे शशिजे विबन्धुरमलज्ञानी धनी पण्डितः ॥ ६८ ॥ वाग्मी धनी सुखयशोबलरूपशाली जातः शठप्रकृतिरिन्द्रगुरौ सुखस्थे । स्त्रीनिर्जितः सुखयशोधनबुद्धिविद्यावाचालको भृगुसुते यदि बन्धुयाते ॥ ६६ ॥ आचारहीनः कपटी च मातृक्लेशान्वितो भानुसुते सुखस्थे । राहौ कलत्रादिजनावरोधी केतौ सुखस्थे च परापवादी ॥ ७० ॥ त्रिभिः श्लोकैश्चतुर्थभावगतानां ग्रहाणां फलान्युक्तानि । स्पष्टार्थाः श्लोकाः॥६८-७०॥ सूर्य चतुर्थ स्थानमें हो तो हृदय रोगवाला, धन-धान्य-बुद्धिरहित और क्रूर होवे । चन्द्रमा चतुर्थ स्थानमें हो तो विद्या-शील-सुखसे युक्त और परस्त्रीगामी हो । मंगल चतुर्थ स्थानमें हो तो परिवारसे हीन, स्त्रीसे निर्जित और पराक्रमी हो । बुध चतुर्थ स्थानमें हो तो परिवार रहित, श्रेष्ठ ज्ञानी, धनी, और पंडित हो ॥ ६८ ॥ बृहस्पति सुख स्थानमें हो तो वाचाल, धनी, सुख-यश-रूप-बलवाला, शठ-स्वभाव होता है । यदि शुक्र चतुर्थ स्थानमें हो तो स्त्रीसे पराजित, सुख-यश-धन-विद्या युक्त हो और वाचाल हो ॥ ६९ ॥ शनि सुख भवन में हो तो आचार हीन, कपटी, मातृ-क्लेश युक्त हो । राहु चतुर्थमें हो तो स्त्री आदि जनोंका अवरोध करनेवाला हो । केतु सुखमें हो तो दूसरों को दोष लगानेवाला हो ॥ ७० ॥ अथ पञ्चमस्थग्रहफलम् । राजप्रियश्चञ्चलबुद्धियुक्तः प्रवासशीलः सुतगे दिनेशे । मन्त्रक्रियासक्तमना दयालुर्घनी मनस्वी तनये सतीन्दौ ॥ ७१ ॥ क्रूरोऽटनश्चपलसाहसिको विधर्मा भोगी धनी च यदि पञ्चमगे धराजे । मन्त्राभिचारकुशलः सुतदारवित्तविद्यायशोबलयुतः सुतगे सति ज्ञे ॥ ७२ ॥ मन्त्री गुणी विभव(सार समन्वितः स्यादल्पात्मजः सुरगुरौ सुतराशियाते । सत्पुत्रमित्रधनवानतिरूपशाली सेनानुरङ्गपतिरात्मजगे च शुक्रे ॥ ७३ ॥
द्वन्द्यादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २७७ मत्तश्चिरायुरसुखी चपलश्च धर्मी जातो जितारिनिचयः सुतगेऽर्कपुत्रे । भीरुर्दयालुरधनः सुतगे फणीशे केतौ शठः सलिलभीरुरतीव रोगी ॥ ७४ ॥ अत्र चतुर्भिः श्लोकैः पञ्चमभावगतग्रहफलान्युक्तानि । श्लोकाः सरलार्थाः ॥ ७१-७४॥ सूर्य पञ्चम स्थानमें हो तो राजाका प्रिय, चञ्चल बुद्धिवाला, और परदेशमें रहनेवाला होता है। चन्द्रमा पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्र-क्रियामें आसक्त चित्त, दयावान्, धनी, और मनस्वी होवे ॥ ७१ ॥ मंगल पञ्चम स्थानमें हो तो क्रूर, घूमनेवाला, चपल, साहसी, विधर्मी, भोगी और धनी होता है। बुध पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्र तथा अभिचारमें कुशल, पुत्र-स्त्री-धन- विद्या-यश-बलसे युक्त होवे ॥ ७२ ॥ बृहस्पति पञ्चम स्थानमें हो तो मन्त्री, गुणी, विभवसारसे युक्त और अल्प सन्तान- वाला हो। शुक्र पञ्चम भावमें हो तो सुपुत्रवान्, धनी, अत्यन्त रूपवान्, सेना और घोड़ों- का पति होवे ॥ ७३ ॥ शनि पञ्चम भावमें हो तो मत्त, चिरायु, सुखरहित, चपल और धर्मात्मा हो। राहु पञ्चममें हो तो डरपोक, दयालु और दरिद्र हो। ५ वें केतु हो तो शठ, जलभीरु और विशेष रोगी हो ॥ ७४ ॥ अथ षष्ठस्थग्रहफलम् । कामी शूरो राजपूज्योऽभिमानी ख्यातः श्रीमान् शत्रूँयाते दिनेशे । अल्पायुः स्यात् क्षीणचन्द्रेऽरिसंस्थे पूर्णे जातोऽतीव भोगी चिरायुः ॥ ७५ ॥ स्वामी रिपुघ्नयकरः प्रबलोदराग्निः श्रीमान् यशोबलयुतोऽवनिजे रिपुँस्थे । विद्याविनोदकलहप्रियकृद्विशालो बन्धूपकाररहितः शशिजेऽरियाते ॥ ७६ ॥ कामी जितारिरबलोऽरिगतेऽमरेज्ये शोकापवादसहितो भृगुजे रिपुस्थे । बह्वाशनो विषमशीलसपत्नभीतः कामी धनी रविसुते सति शत्रूयाते ॥ ७७ ॥ राहौ रिपुस्थानगते जितारिश्चिरायुरत्यन्तसुखी कुलीनः । बन्धुप्रियोदारगुणप्रसिद्धविद्यायशास्त्री रिपुगे च केतौ ॥ ७८ ॥ श्लोकैश्चतुर्भिः षष्ठभावे ग्रहाणां फलानि कथितानि । श्लोकाः स्पष्टार्थाः ॥ ७५-७८ ॥ सूर्य षष्ठ स्थानमें हो तो कामी, शूर, राजपूल्य, अभिमानी, ख्यात और श्रीमान् हो। क्षीण चन्द्रमा शत्रुस्थान (षष्ठ) में हो तो अल्पायु हो, पूर्ण चन्द्रमा हो तो अति भोगी और दीर्घायु हो ॥ ७५ ॥ मङ्गल षष्ठ स्थानमें हो तो जनस्वामी, शत्रुनाशक, प्रबल जठराग्नि, श्रीमान्, यश-बल युक्त हो। बुध षष्ठ स्थानमें हो तो विद्याविनोदी, कलहप्रिय, शीलरहित, परिवारके उपकार- से हीन होवे ॥ ७६ ॥ बृहस्पति षष्ठ स्थानमें हो तो कामी, शत्रुओंको जीतनेवाला और अबल हो। शुक्र षष्ठ स्थानमें हो तो शोक-अपवादसे युक्त हो। शनि षष्ठ स्थानमें हो, तो विशेष भोजन करने वाला, विषमबुद्धि, शत्रुसे भयभीत, कामी और धनवान् हो ॥ ७७ ॥ राहु शत्रु स्थानमें हो तो शत्रुसंहारक, दीर्घायु, विशेष सुखी और कुलीन हो। केतु षष्ठ स्थानमें हो तो बन्धुप्रिय, उदार, गुणप्रसिद्ध, विद्वान् और यशस्वी हो ॥ ७८ ॥ अथ सप्तमस्थग्रहफलम् । स्त्रीद्वेषी मदनस्थिते दिनकरेऽतीव प्रकोपी खल- श्चन्द्रे कामँगते दयालुरटनः स्त्रीवश्यको भोगवान् । स्त्रीमूलप्रविलापको रणरुचिः कामँस्थिते भूमिजे व्यङ्गः शिल्पकलाविनोदचतुरस्तारासुतेऽस्तँ गते ॥ ७६ ॥ २४ जा०
२७८ सटीकजातकापारिजाते- धीरश्चारुकलत्रवान् पितृगुरुद्वेषी मदस्थे गुरौ वेश्यास्त्रीजनवल्लभश्च सुभगो व्यङ्गः सिते कामगे । भाराध्वश्रमसप्तधीरधनिको मन्दे मदस्थानगे गर्वी जारशिखामणिः फणिपतौ कामंस्थिते रोगवान् ॥ ८० ॥ अनङ्गभावोपगते तु केतौ कुदारको वा विकलत्रभोगः । निद्री विशीलः परिदीनवाक्यः सदाऽटनो मूर्खजनाग्रगण्यः ॥ ८१ ॥ अत्र त्रिभिः श्लोकैः सप्तमे भावे ग्रहफलान्युक्तानि । तेषु—स्त्रीमूलप्रविलापकः = स्त्रीज- नितदुःखसन्तप्तान्तःकरणः । भाराध्वश्रमतप्तधीरधनिकः = भारेणोत्पन्नो योऽध्वश्रम्रो मार्ग- क्लान्तिस्तेन तप्तो मनोदुःखी, धीरो धनिकश्चेति । जारशिखामणिः = परस्त्रीरता जारास्ते- षां शिखामणिः शिरोमणिः, जाराग्रणीरिति । अन्यत्सर्वं स्पष्टमिति । ७९-८१ ॥ सूर्य मदन (सप्तम) भावमें हो तो स्त्रीका वैरी, विशेष कोपी तथा खल होवे । चन्द्रमा सप्तम भावमें हो तो दयालु, भ्रमणशील, स्त्रीके वंशमें रहने वाला और भोगवान् होवे । मङ्गल सप्तम भावमें हो तो स्त्रीके कारण विलाप करनेवाला और रणमें प्रीति रखने वाला होवे । बुध सातवें हो तो व्यङ्ग ( शरीरावयवमें वक्रतादि युत ), शिल्प कलाका ज्ञाता, विनोदी और चतुर हो ॥ ७९ ॥ बृहस्पति सप्तम भावमें हो त धीर, रमणीय स्त्रीवाला, पिता-गुरुका वैरी हो । शुक्र सप्तम भावमें हो तो वेश्याका स्वामी, सुन्दर और व्यङ्ग हो । शनि सप्तममें हो तो रास्ताके बोझा ढोने चलनेसे तप्त, धीर, धनिक हो । राहु सप्तम हो तो अहङ्कारी व्यभिचारियोंमें शिरोमणि और रोगवान् हो ॥ ८० ॥ केतु सप्तम हो तो निकृष्टस्त्रीवाला वा स्त्रीभोग रहित हो और शीलरहित, निद्रालु, दीन वचन बोलनेवाला, सदा अति भ्रमणशील और मूर्खोमें अग्रगण्य हो ॥ ८१ ॥ अथ अष्टमस्थग्रहफलम् । मनोऽभिरामः कलहप्रवीणः पराभवस्थे च रवौ न तृप्तः । रणोत्सुकस्त्यागविनोदविद्याशीलः शशाङ्के सति रन्ध्रयाते ॥ ८२ ॥ विनीतवेषो धनवान् गणेशो महीसुते रन्ध्रगते तु जातः । विनीतबाहुल्यगुणप्रसिद्धो धनी सुधारश्मिसुतेऽष्टमस्थे ॥ ८३ ॥ मेधावी नीचकर्मा यदि दिविजगुरौ रन्ध्रयाते चिरायु- र्दीर्घायुः सर्वसौख्यात्तुलबलधनिको भार्गवे चाष्टमस्थे । शूरो रोषाग्रगण्यो विगतबलधनो भानुजे रन्ध्रयाते राहौ क्लेशापवादी परिभवगृहगे दीर्घसूत्रश्च रोगी ॥ ८४ ॥ केतौ यदा रन्ध्रगृहोपयाते जातः परद्रव्यवधूरतेच्छुः । रोगी दुराचाररतोऽतिलुब्धः सौम्येक्षितेऽतीव धनी चिरायुः ॥ ८५ ॥ अत्र सरलार्थकैश्चतुर्भिः श्लोकैरष्टमे भावे ग्रहाणां फलान्युक्तानीति ॥ ८२-८५ ॥ सूर्य पराभव (अष्टम) भावमें हो तो खूब सुन्दर और कलहमें चतुर होता है । चन्द्र- मा अष्टम भावमें हो तो लड़ाईमें उत्सुक, दान-प्रमोद-विद्याशील हो ॥ ८२ ॥ मंगल अष्टम स्थानमें हो तो विनीतवेष, धनवान् और मुखिया हो । बुध अष्टम भावमें हो तो विनीत, विशेष गुणोंसे प्रसिद्ध और धनी हो ॥ ८३ ॥ यदि गुरु अष्टममें हो तो बुद्धिमान्, नीचकर्मा और दीर्घायु हो । शुक्र अष्टम स्थानमें हो तो दीर्घायु, सर्व सौख्य युत, अतुलबल और धनिक हो । शनि अष्टम स्थानमें हो तो वीर, क्रोधियोंमें अग्रसर, विगतबल-धनवाला हो । राहु अष्टम भावमें हो तो क्लेशी, अपवादी, दीर्घसूत्री और रोगी हो ॥ ८४ ॥
द्वय्यादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २७६ यदि केतु रन्ध्र (अष्टम) गृहमें हो तो जातक परद्रव्य-परस्त्रीमें रत हो, रोगी, दुरा- चारी, विशेष लोभी हो। यदि शुभ ग्रह उसे देखते हों तो धनी तथा दीर्घायु हो ॥८५॥ अथ नवमस्थग्रहफलम्। आदित्ये नवमस्थिते पितृगुरुद्वेषी विधर्माश्रित- श्चन्द्रे पैत्रिकदेवकार्यनिरतस्त्यागी गुरुस्थे यदा। भूसूनौ यदि पित्र्यनिष्टसहितः ख्यातः शुभस्थौनगे सौम्ये धर्मगते तु धर्मधनिकः शास्त्री शुभाचारवान् ॥ ८६ ॥ ज्ञानी धर्मपरो नृपालसचिवो जीवे तपःस्थानगे विद्यावित्तकलत्रपुत्रविभवः शुक्रे शुभस्थे सति । मन्दे भाग्यगृहस्थिते रणतलख्यातो विदारो धनी भाग्यस्थे भुजगे तु धर्मजनद्वेषी यशोवित्तवान् ॥ ८७ ॥ केतौ गुरुस्थानगते तु कोपी वाग्मी विधर्मी परनिन्दकः स्यात् । शूरः पितृद्वेषकरोऽतिदम्भाचारो निरुत्साहरतोऽभिमानी ॥८८॥ सरलार्थैस्त्रिभिः पद्यैरत्र नवमभावे ग्रहाणां फलानि परिकीर्त्तितानि ॥ ८६-८८ ॥ सूर्य नवम भावमें स्थित हो तो पिता-गुरुका द्वेषी, विधर्मके आश्रय रहनेवाला हो। यदि चन्द्रमा नवम भावमें हो तो पितृ कार्य (तर्पण-श्राद्ध) देवकार्य (सन्ध्या-पूजा-जप- यज्ञ) में युक्त और दानी हो। यदि मङ्गल नवम भावमें हो तो पिताका अनिष्ट करने वाला, और विख्यात हो। बुध धर्म (नवम) भावमें हो तो धर्मका धनिक, शास्त्री, और शुभ आचारवान् होवे ॥ ८६ ॥ बृहस्पति नवमें भावमें हो तो ज्ञानी धर्ममें तत्पर, राजाका मन्त्री हो। शुक्र नवम भावमें हो तो विद्या-धन-स्त्री-पुत्रसे युक्त हो। शनि भाग्यगृह (नवम) में हो तो रणमें विख्यात, बिना स्त्रीवाला, और धनी हो। नवम भावमें राहु हो तो धार्मिक जनोंका वैरी, और यशस्वी हो ॥ ८७ ॥ केतु नवम भावमें हो तो क्रोधी, वाचाल, अधर्मी, परनिन्दक, वीर, पिताका वैरी, विशेष दम्भज्ञी, आलस्यमें लीन और अभिमानी हो ॥ ८८ ॥ अथ दशमस्थग्रहफलम्। मानंस्थिते दिनकरे पितृवित्तशील-विद्यायशोबलयुतोऽवनिपालतुल्यः। चन्द्रो यदा दशमगो धनधान्यवस्त्र-भूषावधूजनविलासकलाविलोलः॥८६॥ खेपूरणस्थेऽवनिजे तु जातः प्रतापवित्तप्रबलप्रसिद्धः। व्यापारगे चन्द्रसुते समस्त-विद्यायशोवित्तविनोदशीलः ॥ ६० ॥ सिद्धारम्भः साधुवृत्तः स्वधर्मी विद्वानाढ्यो मानगे चामरेड्ये। शुक्रे कर्मस्थानगे कर्षकाच्च स्त्रीमूलाद्वा लब्धवित्तो विभुः स्यात् ॥ ६१ ॥ मन्दे यदा दशमगे यदि दण्डकर्ता मानी धनी निजकुलप्रभवश्च शूरः। चोरक्रियानिपुणबुद्धिरतो विशीलो मानं गते फणिपतौ तु रणोत्सुकः स्यात् ॥६२॥ सुधीर्बली शिल्पविदात्मबोधी जनानुरागी च विरोधवृत्तिः ॥ कफात्मकः शूरजनाग्रगण्यः सदाऽटनः कर्मगते च केतौ ॥ ६३ ॥ सुखाबगमार्थकैः पञ्चभिः श्लोकैर्दशमे भावे ग्रहाणां फलान्यत्रोक्तानि ॥ ८९-९३ ॥ सूर्य दशम भावमें हो तो पिताका धन और शील प्राप्त हो, विद्या व यशसे युक्त हो और राजाके सदृश हो । यदि चन्द्रमा दशम भावमें हो तो धन-धान्य-वस्त्र-भूषणसे युक्त, स्त्रियों का विलासी, कला जाननेवाला हो ॥ ८६ ॥
२८० सटीकजातकपारिजाते- मङ्गल दशम स्थानमें हो तो प्रबल-प्रताप-धनसे प्रसिद्ध हो । बुध दशम स्थानमें हो तो समस्त विद्याका ज्ञाता, यशस्वी, धनी विनोदी हो ॥ ९० ॥ बृहस्पति दशम स्थानमें हो तो सिद्ध, साधुचरित, स्वधर्मी, विद्वान और धनी होवे। शुक्र दशम स्थानमें हो तो खेती आदि कार्यसे, स्त्रीसे धन प्राप्त हो, विभु हो ॥ ९१ ॥ यदि शनि दशम स्थानमें हो तो दण्डकर्ता, मानी, धनी, निजकुलमें वीर हो । राहु दशम स्थानमें हो तो चोरोंमें निपुण, बुद्धिमान और उद्धत हो ॥ ९२ ॥ केतु दशम स्थानमें हो तो विद्वान्, बली, शिल्पविद्, आत्मज्ञानी, जनानुरागी, विरोधवृत्ति, कफात्मक, वीरोंमें श्रेष्ठ और सदा घूमनेवाला होता है ॥ ९३ ॥ अथ लाभस्थग्रहफलम् । भानौ लाभैगते तु वित्तविपुलस्त्रीपुत्रदासान्वितः सन्तुष्टश्च विषादशीलधनिको लाभस्थिते शीतगौ । आयँस्थे धरणीसुते चतुरवाक्कामी धनी शौर्यवान् सौम्ये लाभगृहं गते निपुणधीर्विद्यायशस्वी धनी ॥ ९४ ॥ आयस्थेऽमरमन्त्रिणि प्रबलधीर्विख्यातनामा धनी लाभस्थे भृगुजे सुखी परवधूलोलाटनो वित्तवान् । भोगी भूपतिलब्धवित्तविपुलः प्राप्तिं गते भानुजे राहौ श्रोत्रविनाशको रणतलश्लाघी धनी पण्डितः ॥ ९५ ॥ उपान्त्यायाते शिखिनि प्रतापी परप्रियश्चान्यजनाभिवन्द्यः । सन्तुष्टचित्तः प्रभुरल्पभोगी शुभक्रियाचाररतः प्रजातः ॥ ९६ ॥ अत्र त्रिभिः श्लोकैर्लाभ-(११) भवने ग्रहाणां फलान्युक्तानि । तेषु—परवधूलोला- टनः = परेषामन्येषां वधूषु स्त्रीषु लोलश्चञ्चलचित्तः ( परस्त्रीकामुक इति ) अटनो भ्रमण- शीलश्चेति । श्रोत्रविनाशकः = कर्णविहीनो बधिर इति । रणतलश्लाघी = सङ्ग्रामप्रियः । अन्यत्सकलं स्पष्टमेवेति ॥ ९४-९६ ॥ सूर्य लाभ ( एकादश ) स्थानमें हो तो विपुल धन, स्त्री, पुत्र और दाससे युक्त हो । चन्द्रमा लाभमें हों तो सन्तुष्ट, विषादी और धनी हो । मङ्गल लाभमें हो तो चतुर- वचन बोलनेवाला, कामी, धनी और पराक्रमी हो । बुध लाभमें हो तो निपुणबुद्धि, विद्या-यशवाला, और धनी हो ॥ ९४ ॥ गुरु लाभमें हो तो प्रबल बुद्धि, विख्यातनाम और धनी हो । शुक्र लाभमें हो तो सुखी, परस्त्रीमें रत, घूमनेवाला और धनी हो । शनि लाभमें हो तो भोगी और राजासे प्राप्त विपुल धनवान् हो । राहु लाभमें हो तो कर्णरहित, रणोत्सुक, धनी और पण्डित हो ॥ ९५ ॥ केतु लाभमें हो तो प्रतापी, परप्रिय, अन्यजनसे वन्दनीय, सन्तुष्टचित्त, समर्थ, अल्प भोगी, शुभ क्रिया तथा आचारवान् हो ॥ ९६ ॥ अथ व्ययस्थग्रहफलम् । व्यैयस्थिते पूषणि पुत्रशाली व्यङ्गः सुधीरः पतितोऽटनः स्यात् । चन्द्रेऽन्त्ययाते तु विदेशवासी भौमे विरोधी धनदारहीनः ॥ ९७ ॥ बन्धुद्वेषकरो धनी विगतधीस्तारासुते रिष्फँगे चार्वाकी चपलोऽटनः खलमत्तिर्जीवे यदाऽन्त्यं गते । शुक्रे बन्धुविनाशकोऽन्यगृहगे जारोपचारोऽधनी मन्दे रिष्फगृहं गते विकलधीर्मूर्खो धनी वञ्चकः ॥ ९८ ॥
द्वयादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २८१ विधुन्तुदे रिष्फँगते विशीलः सम्पत्तिशाली विकलश्च साधुः । पुराणवित्तस्थितिनाशकः स्याच्चलो विशीलः शिखिनि व्ययस्थे ॥ ९६ ॥ स्पष्टार्थैस्त्रिभिः श्लोकैर्व्ययभावे ( १२ ) ग्रहाणां फलान्यत्रोक्तानि । उक्तेषु भावेषु यदि ग्रहाः स्वभवने स्वोच्चे स्ववर्गे च भवन्ति तदोक्तफलानि पूर्णम्परिणमन्ति । अर्थादेव नीचे पापगृहे च विद्यमानानां फले विपर्ययोऽपि भवतीति विवेचनीयम् ॥ ९७-९९ ॥ सूर्य द्वादश भावमें हो तो पुत्रवान्, व्यङ्ग, सुन्दर, धीर, पतित और घूमनेवाला हो । चन्द्रमा अन्त्यभाव ( द्वादश ) में हो तो विदेशवासी हो । १२वें मङ्गल हो तो विरोधी, धन स्त्रीसे हीन हो ॥ ९७ ॥ बुध द्वादश हो तो बन्धुओंसे वैर रखनेवाला, धनी और बुद्धिरहित हो । बृहस्पति द्वादश हो तो चार्वाक मत, चञ्चल, घूमनेवाला और खलबुद्धि हो ।
२८२ सटीकजातकपारिजाते- शुक्र अपनी उच्च राशिमें हो तो स्त्री-संगीत-नृत्य का बड़ा प्रेमी हो । शनि हो तो ग्राम-पुर-बाजारका राजा और कुमारी स्त्रीसे भोग करनेवाला हो । राहु हो तो चोरोंका मालिक, कुलश्रेष्ठ, कुकर्मी तथा धनी हो । केतु हो तो चोरोंसे प्रेम रखनेवाला, नीच राजाका प्रिय हो ॥ १०१ ॥ एक भी उच्च स्थानी ग्रह मित्र ग्रहसे दृष्ट हो मित्रसे युक्त हो तो वह राजा, पूज्य, धनादियुक्त बालकको पैदा करता है, अर्थात् इस प्रकारके योगमें उत्पन्न होनेवाला, धनयुक्त पूज्य राजा होता है ॥ १०२ ॥ एक ग्रह उच्चके बलवान् होनेपर उत्पन्न हो तो वह धन्य और धनी हो । दो ग्रह हों तो सामन्त ( छोटा राजा ), तीन ग्रह हों तो राजा हो । बलवान् चार ग्रह उच्चके केन्द्रमें हों तो महाराजा हो । पांच ग्रह उच्चके हों तो चक्रवर्ती हो ॥ १०३ ॥ अथ मूलत्रिकोणगतफलम् । मार्तण्डे यदि मूलकोणगृहगे जातो धनी वन्दित- श्चन्द्रे वित्तसुखान्वितश्च रुधिरे कोपी दयावर्जितः । ताराजे धनिको जपी, सुरगुरौ भोगी नृपालप्रियः शुक्रे ग्रामपुराधिपस्तरणिजे शूरस्तु, राहौ धनी ॥ १०४ ॥ इदानीं स्वस्वमूलत्रिकोणे ग्रहाणां फलान्युच्यन्ते । श्लोकः स्पष्टार्थ इति ॥ १०४ ॥ यदि सूर्य स्वमूलत्रिकोण गृह ( सिंह ) में हो तो धनी तथा वन्दनीय हो । चन्द्रमा हो तो धन सुखसे युक्त हो । मङ्गल अपने मूलत्रिकोणमें हो तो क्रोधी और निर्दयी हो । बुध हो तो धनी और तपस्वी हो । बृहस्पति हो तो भोगी राजप्रिय हो । शुक्र हो तो ग्राम-पुरका स्वामी हो । शनि हो तो वीर और राहु हो तो धनी हो ॥ १०४ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्थफलम् । स्वर्क्षे भास्वति चारुमन्दिरदुराचारोऽग्रकामी, विधौ तेजोरूपधनी, कुजे कृषिवलख्यातो बुधे पण्डितः । जीवे काव्यकलागमश्रुतपरः, शुक्नो मनस्वी धनी, मन्दे चण्डपराक्रमो गतसुखी, राहौ यशोवित्तवान् ॥ १०५ ॥ स्वजातिकल्पा
द्वयादिग्रहयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ २८३ वित्तागारसुहृत्प्रियः शशिसुते चातुर्यहास्याग्रणी- जीवे शिष्टरतः सिते सुतसुखी मन्दे परान्नो धनी ॥ १०७ ॥ ख्यातः सुखी सुहृत्प्रीतश्चातुर्यगुणवान् सुधीः ॥ भोगी परान्नभोक्ता च मित्रराशिफलं क्रमात् ॥ १०८ ॥ परद्रव्योपभोक्ता स्यादेको मित्रक्षगो ग्रहः । द्वौ सुहृद्वित्तभोगी स्यात् त्रयः स्वार्जितवित्तभुक् ॥ १०६ ॥ सुहृच्चतुष्टये दाता गणपः पञ्चखेचराः । चमूपः षड्ग्रहाः सप्त ग्रहाः स्याद्धरणीपतिः ॥ ११० ॥ त्रिभिरुच्चंगतैर्भूपास्त्रिभिर्मन्त्री स्वराशिगैः । त्रिभिरस्तं गतैर्दासः त्रिभिर्नीचं गतैर्जडः ॥ १११ ॥ इदानीं स्वस्वमित्रक्षेत्रे ग्रहाणां फलान्युच्यन्ते । जन्मकाले त्रयो ग्रहा उच्चगताः यदि भवेयुस्तदा जातो राजा भवति । त्रयो ग्रहाः स्वराशिगताः स्युस्तदा जातो राज्ञो मन्त्री भवति । यदि त्रयो ग्रहा अस्तंगताः = सूर्यरश्मिपरिभूताः स्युस्तदा जातो दासो भृत्यो भवति । त्रयो ग्रहा यदि स्वनीचगताः स्युस्तदा जातो जडो भवति । शेषं सर्वं स्पष्टार्थकमिति ॥ १०७-१११ ॥ सूर्य मित्रगृहमें हो तो दृढमित्र, दाता, और यशस्वी हो । चन्द्रमा हो तो बहुत मान्य, सुखी-धनी हो । मङ्गल हो तो धन-गृह-मित्र-प्रिय हो । बुध हो तो चतुर, हास्यमें अग्रणी हो । गुरु हो तो अच्छे लोगोंका प्रेमी हो । शुक्र हो तो पुत्रसुखी, शनि हो तो दूसरेके अन्नसे धनी हो ॥ १०७ ॥ ख्यात (नामी), सुखी, मित्रप्रीति, चतुरगुणवान्, सुधी, भोगी, परान्नभोजी, ये क्रमसे मित्रराशिगत सूर्यादि ७ ग्रहोंके फल हैं ॥ १०८ ॥ एक ग्रह मित्रराशिमें हो तो परद्रव्यका भोगी, दो मित्रगृहीमें हों तो मित्र धनका भोगी हो । तीन हों तो धन पैदा कर के भोग करे ॥ १०९ ॥ चार मित्रगृहीमें हों तो दाता हो । पांच ग्रह हों तो मुखिया हो । छः ग्रह हों तो सेना पति हो । सात ग्रह हों तो राजा हो ॥ ११० ॥ तीन ग्रह उच्च राशिमें हों तो राजा हो । तीन ग्रह अपनी राशिमें हों तो मन्त्री हो । तीन ग्रह अस्त हों तो दास हो और तीन ग्रह नीच राशिमें हों तो जड़ होता है ॥ १११ ॥ अथ शत्रुक्षेत्रस्थफलम् । शत्रुक्षेत्रगते रवौ पितृसुखत्यागी च सेवापरः शीतांशौ यदि मातृदुःखनिरतो हृद्रोगशाली भवेत् । भूसूनौ विकलोऽकृतज्ञमलिनः सौम्ये सुखी पापधी- जीवे भव्यरतः सिते तु भृतको मन्देऽध्यशोकाकुलः ॥ ११२ ॥ मिश्रदा रिपुगाः पञ्च षड् ग्रहा हीनसौख्यदाः । सर्वदुःखकराः सप्त मूढाः कुर्वन्त्यशोभनम् ॥ ११३ ॥ इदानीं शत्रुक्षेत्रस्थानां ग्रहाणां फलानि श्लोकद्वयेनोच्यन्ते । यदि जन्मकाले पञ्च ग्रहा रिपुगाः = शत्रुराशिगताः स्युस्तदा ते मिश्रदाः=शुभाशुभविमिश्रफलदा भवन्ति । षड्- ग्रहाः शत्रुराशिगता हीनसौख्याः = सौख्यविहीनं जातकं कुर्वन्ति । सप्त ग्रहाः शत्रुरा- शिस्थाः सर्वदुःखकराः = विविधदुःखदायका भवन्ति । एवमेवोक्तप्रकारेण मूढाः = अस्तङ्गता ग्रहाः जातकस्याशोभनं कुर्वन्तीति । अन्यत्स्पष्टमेवेति ॥ ११२-११३ ॥ सूर्य शत्रुक्षेत्रमें हो तो पितृसुखका त्यागी, दूसरेका सेवक हो । यदि चन्द्रमा हो तो
न्नध्याये पूर्णतां गता ॥ ८ ॥" Wait, "अष्टमे ग्रहयोगोऽस्मिन्नध्याये"? Wait, look at: "अष्टमे" or "अष्टमो"? Letters: अ - ष्ट - मे (or अ - ष्ट - मो) Wait, look at the matra: there is an 'ए' matra on 'म'? Or 'ओ' matra? It has a top stroke to the left: 'अष्टमे'. But wait, "अष्टमो ग्रहयोगोऽस्मिन्नध्याये"? Wait, look at 'मे': it is 'अष्टमे'. And "ग्रहयोगोऽस्मिन्नध्याये" -> ग्रहयोगो + अस्मिन् + अध्याये. "पूर्णतां गता ॥ ८ ॥" (because टीका is feminine: सुधा टीका... पूर्णतां गता).
Now let's check line 31: सूर्य नीच राशिमें हो तो पतित, बन्धुहीन और प्रवासी हो । चन्द्रमा नीच राशिमें हो Let's check line 32: तो रोगी, अल्प पुण्यवाला और धनवान् हो । मङ्गल हो तो कृतघ्न और धनी हो । बुध हो Let's check line 33: तो क्षुद्र, बन्धुओंसे विरोध करनेवाला हो । बृहस्पति हो तो अपवादी तथा खल हो । शुक्र Let's check line 3
३. अध्याय ९-१४: द्वादश भाव फल निरूपण (तनु से व्यय भाव पर्यन्त)
मान्द्यब्दादिफलाध्यायः ॥ ६ ॥ २८५ केन्द्र-त्रिकोणमें सब शुभग्रह बलवान् होते हैं। यदि तीसरे-छठे-ग्यारहवें पाप हों तो शुभ होते हैं ॥ ११७ ॥ छः, पांच, चार, तीन, दो ग्रहोंके मेलका अर्थात् द्विग्रह त्रिग्रहादि योगोंका और ग्रहों का भाव फल तथा उच्चादिकमें स्थित ग्रहोंके फलको सूर्यादि ग्रहोंके प्रसादसे इस ८ वें अध्यायमें वर्णन किया है ॥ ११८ ॥ इति जातकपारिजाते द्वयादिग्रहयोगाख्येऽष्टमेऽध्याये 'विमला' हिन्दी टीका समाप्ता ॥८॥ अथ मान्द्यब्दादिफलाध्यायः ॥ ९ ॥ अथाधुना मान्द्यब्दादिफलाध्यायो व्याख्यायते । तत्र प्रथमं मान्दिस्थितद्वादशभावफ- लानि ततोऽब्दादिफलानि च कथयिष्यन्ते— मान्द्यब्दादिफलानि वच्मि गुलिके लग्नस्थिते मन्दधी रोगी पापयुते तु वञ्चनपरः कामी दुराचारवान् । वित्तस्थे विषयातुरोऽटनपरः क्रोधी दुरालापवान् पापव्योमचरान्विते गतधनो विद्याविहीनोऽथवा ॥ १ ॥ विरहगर्वमदादिगुणैर्युतः प्रचुरकोपधनार्जनसम्भ्रमः । विगतशोकभयश्च विसोदरः सहजधामनि मन्दसुते यदा ॥ २ ॥ हिबुँकभवनसंस्थे मन्दजे वीतविद्याधनगृहसुखबन्धुक्षेत्रयातोऽटनः स्यात् । तनयभवनयाते मन्दसूनौ विशीलश्चलमतिरघवबुद्धिः स्वल्पपुत्रोऽल्पजीवी ॥ ३ ॥ बहुरिपुगणहन्ता भूतविद्याविनोदी यदि रिपुगृहँयाते मन्दपुत्रे तु शूरः । कलहकृदिनपौत्रे कामँयाते कुदारः सकलजनविरोधी मन्दबुद्धिः कृतघ्नः ॥ ४ ॥ विकलनयनवक्रः स्वल्पदेहोऽष्टमस्थे गुरुजनपितृहन्ता नीचकृत्यो गुरुस्थे । अशुभशतसमेतः कर्मगे मन्दसूनौ निजकुलहितकर्माचारहीनो विमानः ॥ ५ ॥ अतिसुखधनतेजोरूपवान् लाभयाते दिनकरसुतपुत्रे चाग्रजं हन्ति जातः । विषयरहितवेषो दीनवाक्यः प्रवीणे निखिलधनहरः स्यान्मन्दजेरिःफयाते ॥ ६ ॥ मान्द्यब्दादिफलानीति । अस्मिन्नध्याये मान्द्यब्दादिफलानि वच्मि, अहं कर्त्तेति शेषः । गुलिके लग्नस्थिते जातो मन्दधी रोगी च भवति । तत्र पापग्रहेण युते गुलिके जातो वञ्चनपरः, कामी, दुराचारवाँश्च भवति । वित्तस्थे = द्वितीयभावगते गुलिके जातो विषयेष्वातुरोऽटनपरो भ्रमणशीलः, क्रोधी, दुरालापवान् = कुत्सितभाषी च भवति । तत्र गुलिके पापव्योमचरान्विते = पापग्रहयुक्ते जातो गतधनो धनहीनः, अथवा विद्याविहीनो भवति । एवमपरे स्पष्टार्थाः ॥ १-६ ॥ गुलिकका भावफल कहते हैं—गुलिक लग्नमें हो तो जातक मन्द बुद्धिवाला, रोगी हो । गुलिक वहां पापग्रहसे युक्त हो तो ठग, क्रोधी और दुराचारी हो । गुलिक धन भावमें हो तो विषयातुर, घूमनेवाला, क्रोधी, खराब बकवाद करनेवाला हो । यदि गुलिक वहां पाप- ग्रहसे युक्त हो तो दरिद्र या मूर्ख होवे ॥ १ ॥ यदि गुलिक तृतीय भावमें हो तो विरह, अहंकार आदि दुर्गुणसे युक्त, विशेष कोपवाला धनके एकत्र करनेमें व्यग्र चित्त, शोक भयसे रहित, तथा भ्रातृ रहित होता है ॥ २ ॥ चतुर्थ स्थानमें गुलिक हो तो विद्यासे रहित, धन-गृह-सुख-परिवारसे रहित हो । तथा परदेशमें रहनेवाला होता है । पञ्चम स्थानमें गुलिक हो तो शील-रहित, चञ्चल- मति, पापबुद्धि, थोड़े पुत्र और थोड़ी आयु वाला होवे ॥ ३ ॥
२८६ सटीकजातकपारिजाते- यदि शत्रुस्थानमें गुलिक हो तो बहुत शत्रुओंके मारनेवाला, भूतविद्यामें विनोदी और पराक्रमी हो । सप्तम स्थानमें गुलिक हो तो कलह करनेवाला, दुष्टा स्त्रीवाला, सब जनों का विरोधी, मन्द बुद्धि और कृतघ्न होता है ॥ ४ ॥ अष्टम स्थानमें गुलिक हो तो विकल नेत्र और मुखवाला तथा छोटा देहवाला हो । नवममें हो तो गुरुजन तथा पितरोंको मारनेवाला नीचकर्मा हो । दशम स्थानमें गुलिक हो तो सैकड़ों अशुभ कर्म से युक्त, निजकुलके हितकारी-आचरणसे रहित, बिना मानवाला होवे ॥ ५ ॥ यदि गुलिक ११ वें भावमें हो तो जातक बहुत सुखी, धनी, तेजस्वी, सुन्दर हो तथा अपने ज्येष्ठ भाईको मारनेवाला होवे । यदि द्वादश स्थानमें गुलिक हो तो विषयसे रहित वेष, दीन वचनमें प्रवीण और सबका धन हरनेवाला होता है ॥ ६ ॥ मान्दित्रिकोणोपगते विलग्ने तद्द्वादशांशे यदि वा नवांशे । मान्द्यन्विता मान्दियुतर्क्षनाथाः सर्वे सदाऽनिष्टकरा भवन्ति ॥ ७ ॥ मान्दिर्गुलिको यत्र तिष्ठति तस्मात् त्रिकोणे ( ५।९ ) उपगते विलग्ने = जन्मलग्ने, अथवा तद्द्वादशांशे मान्दिद्वादशांशे वा नवांशे स्थिता ग्रहाः, मान्द्यन्विता गुलिकसहिता ग्रहाः, मान्दियुतर्क्षनाथाः = मान्दिर्यस्मिन् राशौ भवति तद्राशिपतयश्चैते सर्वे सदा जातस्या- निष्टकरा भवन्ति ॥ ७ ॥ गुलिकसे त्रिकोण गत लग्नमें जो ग्रह हों, उसके द्वादशांश वा नवांशमें जो ग्रह हों, गुलिकसे युक्त ग्रह, गुलिक स्थित राशिका स्वामी ये सब सदा अनिष्ट करनेवाले होते हैं॥७॥ अथ ग्रहयुक्तमान्दिफलम् । संयुक्ते यदि भास्करेण गुलिके जातः पितृद्वेषको मातृक्लेशकरस्तु शीतरुचिना भौमेन वीतानुजः ॥ सोन्मादः शशिजेन देवगुरुणा पाखण्डको दूषकः शुक्रेण प्रमदाकृतामयहतो नीचाङ्गनावल्लभः ॥ ८ ॥ जातः सौख्यरतस्तु मन्दतनये मन्देन युक्ते यदा सर्पेणैव विषप्रदस्तु शिखिना वह्निप्रदो जायते । भिक्षुः स्याद्विपनाडियुक्तगृहगे भूपालकोऽपि ध्रुवं जातस्योपखगान्विता गगनगाः कुर्वन्त्यनिष्टं फलम् ॥ ६ ॥ इदानीं ग्रहयोगान्मान्दिफलान्युच्यन्ते—संयुक्ते इति । भास्करेण-सूर्येण संयुक्ते गुलिके यदि जन्म स्यात्तदा जातः पितृद्वेषकः-पित्रा सह द्वेषकरो भवति । शीतरुचिना = चन्द्रेण संयुक्ते गुलिके मातृक्लेशकरो भवति । भौमेन=मङ्गलेन संयुक्ते वीतानुजो भ्रातृहीनो भवति । शशिजेन = बुधेन संयुक्ते सोन्मादः=उन्मादेन सहितो ( पागलः ) भवति । देवगुरुणा जीवेन संयुक्ते पाखण्डको नास्तिको दूषकोऽन्यदोषदर्शी च भवति । शुक्रेण संयुक्ते प्रमदा- कृतेन=स्त्रीकृतेनामयेन=रोगेण ( प्रमेहादिना ) हतो भवति, तथा नीचाङ्गनायाः=कुलहीनायाः स्त्रिया वल्लभो भवति ॥ ८ ॥ मन्देन = शनिना युक्ते मन्दतनये = गुलिके जातो नरः सौख्यरतो भवति । सर्पेणैव = राहुणा युक्ते विषप्रदोऽन्येषां गरलदाता भवति । शिखिना = केतुना युक्ते वह्निप्रदोऽन्येषां वेश्मप्रदीपको भवति । अथ विपनाडिकायुक्तगृहगे गुलिके भूपालकोऽपि = नृपवंशजातोऽपि ध्रुवं=निश्चयेन भिक्षुर्भिक्षाशी भवति ( विपनाडिकाविवरणं ५ अ. १२ श्लोकटीकायां द्रष्टव्यम् ) उपखगैरुपग्रहैर्धूमादिभिरन्विताः सहिता गगनगाः = ग्रहा जातस्यानिष्टं = प्रतिकूलं फलं कुर्वन्ति । गुलिकयुक्ताः सर्व एव भावाः खेटाश्चानिष्टकरा एव भवन्ति । तथोक्तञ्च—
गुलिकस्य तु संयोगे दोषान् सर्वत्र निर्दिशेत् । यमकण्टकसंयोगे सर्वत्र कथयेच्छुभम् ॥ दोषप्रदाने गुलिको बलीयान् शुभप्रदाने यमकण्टकः स्यात् । अन्ये च सर्वे व्यसनप्रदाने मान्द्युक्तवीर्यार्द्धबलान्विताः स्युः ॥ इति ॥ ६ ॥ यदि सूर्यसे युक्त गुलिक हो तो पितासे विरोध करनेवाला हो । चन्द्रमासे युक्त हो तो माताको क्लेश देनेवाला हो । मंगलसे युक्त हो तो छोटे भाईसे रहित हो । बुधसे युक्त हो तो उन्मादी हो । बृहस्पतिसे युक्त हो तो पाखण्डी और दूसरोंका दूषक हो । शुक्रसे युक्त हो तो स्त्रीजनित रोगसे निहत हो और नीच स्त्रीका स्वामी हो । शनि से युक्त यदि शनितनय (गुलिक) हो तो सौख्यसे युक्त हो । राहुसे युक्त हो तो जहर खिलानेवाला हो । केतुसे युक्त हो तो गृहादिके जलानेवाला होता है । विष नाडीसे युक्त गृहमें गुलिक हो तो राजा भी निश्चय भिक्षुक होवे । जन्म कालमें उपग्रहसे युक्त ग्रह जातकके अनिष्ट फलको करते हैं ॥ ८-९ ॥ अथ संवत्सरफलम् ! प्रभवशरदि जातः साहसी सत्यवादी सकलगुणसमेतः कालविद्धर्मशाली । विभवशरदि कामी निर्मलो नित्यतुष्टः प्रबलधनसमेतो बन्धुविद्यायशस्वी ॥१०॥ शुक्लाब्दे परदारको गतबलस्त्यागी मनस्वी भवे- न्मन्त्री कार्यपरोऽतिभाषणपटुर्जातः प्रमोदाभिधे । धर्मी दानपरायणः सुतधनः शान्तः प्रजोत्पत्तिजो नीतिज्ञो निपुणः कृपालुरनिशं चाङ्गीरसाब्दे धनी ॥ ११ ॥ जातः श्रीमुखवत्सरे परवधूलोलः शुचिर्वित्तवान् योगी राजकरो महाधनबलख्यातो भवाब्दे भवः ॥ लुब्धश्चञ्चलधीः कृशामयतनुः क्रोधी युवाब्दे भिषक् जातो धातृभवोऽन्यदारनिरतः कार्यार्थवादी शठः ॥ १२ ॥ श्रीमानीश्वरवत्सरे बलमतिर्जातो गुणग्राहकः सत्कर्मा बहुधान्यवत्सरभवो भोगी वणिग्वृत्तिमान् । क्रूरः पापरतः प्रमाथिशरदि क्रोधी विबन्धुः सुखी जातो विक्रमवत्सरे यदि धनी सेनापतिः शौर्यवान् ॥ १३ ॥ वृषशरदि दरिद्रो वीतलज्जो विकर्मा दिनकरसमतेजोरूपवान् चित्रभानौ । यदि निजकुलविद्याचारधर्मः सुभानौ बहुधनबलशाली तारणान्दे विवेकी ॥१४॥ जातः पार्थिववत्सरे नरपतिः श्रीमानतुल्यः सुखी कामी भीरुशीलवित्तगुणवान् पापी व्ययाब्दे यदि । वाग्मी सर्वजिदब्दकेऽतिबलवान् शास्त्री गुणी तत्त्ववित् सम्पन्नो यदि सर्वधारिजनितः शिल्पी नृपालप्रियः ॥ १५ ॥ शोकी दुष्टपरोऽतिपापनिरतः क्रूरो विरोध्यब्दके मायावी मदनातुरो विकृतिजो मन्त्रक्रियातन्त्रधीः । निर्मोही विगुणोऽतिदीनवचनः पापी खराब्दे खलः, सर्वानन्दकरो नृपप्रियनरो मन्त्रार्थविन्नन्दने ॥ १६ ॥ विजयशरदि धर्मी सत्यसम्पन्नशाली, यदि जयशरदि स्याद्राजतुल्यो नृपो वा । मदनरतिविलोलो मन्मथाब्दे जितारि- र्गुणधनरहितः स्याद्दुर्मुखाब्दे विशीलः ॥ १७ ॥