जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
२२ सटीकजातपारिजाते- षोडशांशचक्रम्-
| विषमे स्वा. | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कु. | मी. | समे स्वा. | अं. | क. | वि. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्रह्मा | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | वृ./९ | सूर्य. | १ | ५२ | ३० |
| विष्णु | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शिव. | ३ | ४५ | ० |
| हर | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | विष्णु | ५ | ३७ | ३० |
| सूर्य | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | ब्रह्मा. | ७ | ३० | ० |
| ब्र. | सू./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | सू. | ९ | २२ | ३० |
| वि. | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | हर | ११ | १५ | ० |
| ह. | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | वि. | १३ | ७ | ३० |
| सू. | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | ब्र. | १५ | ० | ० |
| ब्र. | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | सू. | १६ | ५२ | ३० |
| वि. | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | ह. | १८ | ४५ | ० |
| ह. | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | वि. | २० | ३७ | ३० |
| सू. | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | ब्र. | २२ | ३० | ० |
| ब्र. | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | वृ./९ | मं./१ | र./५ | वृ./९ | मं./१ | सू./५ | वृ./९ | सू. | २४ | २२ | ३० |
| वि. | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | शु./२ | बु./६ | श./१० | हर. | २६ | १५ | ० |
| ह. | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | बु./३ | शु./७ | श./११ | वि. | २८ | ७ | ३० |
| सू. | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | चं./४ | मं./८ | वृ./१२ | ब्र. | ३० | ०० | ० |
राशिरीलाध्यायः ॥ १ ॥ २३ १० षष्ट्यंशचक्रम् ।
| वि. ष. मे. सं. | विषमे अं. । क. | शुभ वा अशुभ | अंशपतिः | समे अं. । क. | स. मे. सं. | वि. ष. मे. सं. | विषमे अं. । क. | शुभाशुभ | अंशपतिः | समे अं. । क. | स. मे. सं. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ०।३० | अ. | घोर | ३०।० | ६० | ३१ | १५।३० | अ | मृत्यु | १५।० | ३० |
| २ | १।० | अ. | राक्षस | २९।३० | ५९ | ३२ | १६।० | अ. | काल | १४।३० | २९ |
| ३ | १।३० | शु. | देव | २९।० | ५८ | ३३ | १६।३० | अ. | दावाग्नि | १४।० | २८ |
| ४ | २।० | शु. | कुबेर | २८।३० | ५७ | ३४ | १७।० | अ. | घोर | १३।३० | २७ |
| ५ | २।३० | अ. | यक्ष | २८।० | ५६ | ३५ | १७।३० | अ. | अधम | १३।० | २६ |
| ६ | ३।० | शु. | किन्नर | २७।३० | ५५ | ३६ | १८।० | अ. | कण्टक | १२।३० | २५ |
| ७ | ३।३० | अ. | भ्रष्ट | २७।० | ५४ | ३७ | १८।३० | शु. | सुधा | १२।० | २४ |
| ८ | ४।० | अ. | कुलघ्न | २६।३० | ५३ | ३८ | १९।० | शु. | अमृत | ११।३० | २३ |
| ९ | ४।३० | अ. | गरल | २६।० | ५२ | ३९ | १९।३० | शु. | पूर्ण चन्द्र | ११।० | २२ |
| १० | ५।० | अ. | अग्नि | २५।३० | ५१ | ४० | २०।० | अ. | विषदग्ध | १०।३० | २१ |
| ११ | ५।३० | शु. | माया | २५।० | ५० | ४१ | २०।३० | अ. | कुलनाश | १०।० | २० |
| १२ | ६।० | अ. | यम | २४।३० | ४९ | ४२ | २१।० | शु. | मुख्य | ९।३० | १९ |
| १३ | ६।३० | शु. | अपांपति | २४।० | ४८ | ४३ | २१।३० | अ. | वंशक्षय | ९।० | १८ |
| १४ | ७।० | शु. | इन्द्र | २३।३० | ४७ | ४४ | २२।० | अ. | उत्पात | ८।३० | १७ |
| १५ | ७।३० | शु. | कक | २३।० | ४६ | ४५ | २२।३० | अ. | कालरूप | ८।० | १६ |
| १६ | ८।० | अ | सर्प | २२।३० | ४५ | ४६ | २३।० | शु. | सौम्य | ७।३० | १५ |
| १७ | ८।३० | शु. | अमृत | २२।० | ४४ | ४७ | २३।३० | शु. | मृदु | ७।० | १४ |
| १८ | ९।० | शु. | चन्द्र | २१।३० | ४३ | ४८ | २४।० | शु. | सुशीतल | ६।३० | १३ |
| १९ | ९।३० | शु. | मृदु | २१।० | ४२ | ४९ | २४।३० | अ. | दंष्ट्राकराल | ६।० | १२ |
| २० | १०।० | शु. | कोमल | २०।३० | ४१ | ५० | २५।० | शु | इन्दुमुख | ५।३० | ११ |
| २१ | १०।३० | शु | पद्म | २०।० | ४० | ५१ | २५।३० | शु | प्रवीण | ५।० | १० |
| २२ | ११।० | शु. | विष्णु | १९।३० | ३९ | ५२ | २६।० | अ. | कालाग्नि | ४।३० | ९ |
| २३ | ११।३० | शु. | वागीश | १९।० | ३८ | ५३ | २६।३० | अ. | दण्डायुध | ४।० | ८ |
| २४ | १२।० | अ. | दिगम्बर | १८।३० | ३७ | ५४ | २७।० | शु. | निर्मल | ३।३० | ७ |
| २५ | १२।३० | शु. | देव | १८।० | ३६ | ५५ | २७।३० | शु | शुभ | ३।० | ६ |
| २६ | १३।० | शु. | आई | १७।३० | ३५ | ५६ | २८।० | अ. | अशुभ | २।३० | ५ |
| २७ | १३।३० | शु. | कलिनाश | १७।० | ३४ | ५७ | २८।३० | शु. | अतिशीत० | २।० | ४ |
| २८ | १४।० | शु. | क्षितीश | १६।३० | ३३ | ५८ | २९।० | शु. | सुधापयो० | १।३० | ३ |
| २९ | १४।३० | शु. | मलाकर | १६।० | ३२ | ५९ | २९।३० | अ. | भ्रमण | १।० | २ |
| ३० | १५।० | अ. | मन्दात्मज | १५।३० | ३१ | ६० | ३०।० | शु. | इन्दुरेखा | ०।३० | १ |
२४ सटीकजातकपारिजाते- ६ त्रिंशांशचक्रम् ।
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | राशि. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | स्वामी अंश |
| श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | स्वामी अंश |
| बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | बृ. ८ | स्वामी अंश |
| बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | बु. ७ | श. ५ | स्वामी अंश |
| शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | शु. ५ | मं. ५ | स्वामी अंश |
अथ दशवर्गजाताः संज्ञाविशेषाः । मूलत्रिकोणस्वगृहोच्चभागवर्गोत्तमानां दशवर्गजानाम् ॥ संयोगजातोत्तमनामपूर्वा वैशेषिकांशा इति ते वदन्ति ॥ ४४ ॥ उत्तमं तु त्रिवर्गैक्यं चातुर्वर्गन्तु गोपुरम् । वर्गपञ्चकसंयोगं सिंहासनमिहोच्यते ॥ ४५ ॥ वर्गद्वयं पारिजातं षष्णां पारावतांशकः । सप्तमं देवलोकः स्यादष्टमं च तथा भवेत् ॥ ४६ ॥ ऐरावतं तु नवकं फलं तेषां पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥ अत्र दशवर्गवशाज्जाताः काश्चित् विशेषसंज्ञा उच्यन्ते । दशवर्गजानां = दशवर्गातः समुत्पन्नानां स्वस्वमूलत्रिकोणस्वगृहोच्चभागवर्गोत्तमानां ( पूर्वोक्तानां ) च संयोगजातोत्तम- नामपूर्वाः = वर्गाणामैक्येनोत्पन्ना उत्तमनामपूर्वाः = उत्तमाद्या वैशेषिकांशास्ते विशेषयोगाः भवन्तीति विद्वांसो वदन्ति । अथ के ते विशिष्टसंज्ञा योगाः कथं चोत्पद्यन्ते तत्राह— उत्तममिति । त्रिवर्गैक्यं = त्रयाणां स्ववर्गाणामैक्ये ( दशवर्गेषु चेत् त्रयः स्ववर्गा भवन्ति तदा ) उत्तमं १ । चातुर्वर्गं तु गोपुरसंज्ञम् २ । वर्गपञ्चकसंयोगम् इह सिंहासनमुच्यते ३ । वर्गद्वयं पारिजातम् ४ । षष्णां वर्गाणामैक्ये पारावतांशकः ५ । सप्तमं = सप्तवर्गाणामैक्यं देवलोकः ६ । अष्टमं चाष्टवर्गैक्यमपि तथा = देवलोक एव भवेत् । नवमं = नववर्गैक्यं ऐराव- तम् ७ । दशैक्यं = ( दशवर्गे स्वकीया एव यदि सर्वे वर्गाः स्युस्तदा ) वैशेषिकांशो भवति ८ । तथोक्तं ग्रन्थान्तरे— "द्विवर्गैक्ये परिजातयोगस्तज्नो धनी भवेत् । त्रिवर्गैक्य उत्तमं श्रीश्चतुर्वर्गेस्तु गोपुरः ॥ सिंहासनः पञ्चवर्गे योगस्तज्नो नृपो भवेत् । षड्वर्गैक्ये पारावतयोगोऽत्र शास्त्रविच्चरः ॥ सप्ताष्टैक्ये देवलोकयोगस्तज्नः सुढो नृपः । नववर्गैक्य ऐरावतयोगोऽत्र सार्वभौमकः ॥ दशवर्गैक्ये वैशिशिको योगोऽस्मिन्बुद्धिमाञ्चरः । इति ॥ अत्र पराशरमतेन भेदो दृश्यते । तद्वचनञ्च— "पारिजातं भवेद्द्वाभ्यामुत्तमं त्रिभिरुच्यते । चतुर्भिर्गोपुराख्यं स्याच्छरैः सिंहासनं तथा ॥ पारावतं भवेत्षड्भिर्देवलोकं च सप्तभिः । वसुभिर्ब्रह्मलोकाख्यं नवभिः शक्रवाहनम् ॥ दिग्भिः श्रीधामयोगः स्यादिति" ।
राशिशीलाध्यायः ॥१॥ २५ अथ कस्यचिन्मते “दिग्वर्गैक्ये वैशेषिकः” तथा कस्यचिन्मते “दिग्भिः श्रीधामयोगः” इति दृश्यते । परञ्च दिग्वर्गैक्यं तदैव भवितुमर्हति यदि सर्वेषां होरात्रिशांशकाश्च भवेयुरन्यथा दिग्वर्गैक्यमाकाशपुष्पवदसम्भवमित्यतोऽवगम्यते यन्मते दिग्वर्गैक्यं सम्भावि तन्मते सर्वेषां होरात्रिशांशकाश्चावश्यमेव सम्भाव्यन्त इति विवेचनीयं महात्मभिः । तेषां विशेषयोगानां फलं पृथक् पृथक् यथावसरं वक्ष्य इति शेषः ॥ ४४-४६ १/२ ॥ अथ पारिजातादिदशवर्गसंज्ञाचक्रम् ।
| २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | वर्गैक्ये |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पारिजात | उत्तम | गोपुर | सिंहासन | पारावत | देवलोक | ब्रह्म-लोक | शक्र-वाहन | श्रीधाम | योगः |
| अपने २ मूलत्रिकोण, गृह, उच्चभाग, और वर्गोत्तर्मोके योगसे एवं अपने २ दशवर्गके | |||||||||
| संयोगसे उत्पन्न उत्तम आदि वैशेषिकांश ( विशिष्टयोग ) होते हैं, यह विद्वानोंका मत है । | |||||||||
| उसमें दशवर्गमें तीन अपने वर्गके हों तो उत्तम, चार हों तो गोपुर, पांच हों तो सिंहासन, | |||||||||
| दो हों तो पारिजात, छ हों तो पारावत, सात और आठ हों तो देवलोक, नव हों तो | |||||||||
| ऐरावत योग होता है । इन विशिष्ट योगोंके फल अलग २ कहे जायेंगे ॥ ४४-४६ १/२ ॥ | |||||||||
| अथषड्वर्गाः सप्तवर्गाश्च । | |||||||||
| विलग्नहोराद्रेष्काणनवांशद्वादशांशकाः ॥ ४७ ॥ | |||||||||
| त्रिंशांशकश्च षड्वर्गः शुभकर्मसु शस्यते । | |||||||||
| सप्तांशयुक्तः षड्वर्गः सप्तवर्गोऽभिधीयते ॥ ४८ ॥ | |||||||||
| जातकेषु च सर्वेषु ग्रहाणां बलकारणम् ॥ १/२ ॥ | |||||||||
| अथात्र षड्वर्गं सप्तवर्गञ्चाह—विलग्नेति । विलग्न-होरा-द्रेष्काण-नवांश-द्वादशां- | |||||||||
| शकाः-त्रिंशांशकश्चेति षड्वर्गः कथ्यते । असौ षड्वर्गः शुभकर्मसु शस्यते । तयोक्तं | |||||||||
| रामाचार्येण— | |||||||||
| “.............गेहं होराऽथदृक्कन्नवमांशकसूर्यभागाः । | |||||||||
| त्रिंशांशकश्च षडिमे कथितास्तु वर्गाः सौम्ये शुभं भवति चाशुभमेव पापैः” इति ॥ | |||||||||
| अयं षड्वर्गः सप्तांशेन युक्तस्तदा सप्तवर्गोऽभिधीयते = कथ्यते सुधीभिरिति । असौ | |||||||||
| सप्तवर्गः सर्वेषु जातकेषु ग्रहाणां बलकारणं भवति । यतो जातके बहुत्र सप्तवर्गांत एव ग्रहा- | |||||||||
| णां बलानि विचार्यन्ते ॥ ४७-४८ १/२ ॥ | |||||||||
| लग्न, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश ये षड्वर्ग हैं । षड्वर्ग शुभकर्मों- | |||||||||
| में शुभ कहे गये हैं । षड्वर्गमें सप्तांशके मिलानेसे सप्तवर्ग होता है । यह सप्तवर्ग समस्त | |||||||||
| जातकोंमें ग्रहोंके बलका हेतु कहा गया है, याने सप्तवर्गसे ग्रहोंके बलका विचार | |||||||||
| होता है ॥ ४७-४८ १/२ ॥ | |||||||||
| अथ भावानां नामानि । | |||||||||
| कल्पोदयाद्यतनुजन्मविलग्नहोरा वागर्थमुक्तिनयनस्वकुटुम्बभानि ॥ | |||||||||
| दुश्चिक्यविक्रमसहोदरवीर्यधैर्यकर्णस्तृतीयभवनस्य भवन्ति संज्ञाः ॥ ४६ ॥ | |||||||||
| पातालवृद्धिविबुकचित्तिमातृविद्यायानाम्बुगेहसुखबन्धुचतुष्टयानि । | |||||||||
| धीदेवराजपितृनन्दनपञ्चकानि रोगांगशस्त्रभयषष्ठरिपुक्षतानि ॥ ५० ॥ | |||||||||
| जामित्रकामगमनानि कलत्रसम्पद्यूनास्तसप्तमगृहाणि वदन्ति चार्याः । | |||||||||
| रन्ध्रायुरष्टरणमृत्युविनाशनानि धर्मो गुरुः शुभतपोनवभाग्यभानि ॥ ५१ ॥ | |||||||||
| ३ जा० |
२६ सटीकजातकपारिजाते- व्यापारमेषूरणमध्यमानं ज्ञानं च राजास्पद्कर्मसंज्ञाः । एकादशोपान्त्यभवायलाभा रिःफव्ययद्वादशकान्त्यभाति ॥ ५२ ॥ अथेदानीं लग्नादिद्वादशभावानां नामान्युच्यन्ते-कल्पेति । कल्पादीनि सप्त लग्नस्य नामानि । वागादीनि षट् धनभावस्य । दुश्चिक्यादीनि षट् तृतीयभवनस्य । पातालादीनि द्वादश चतुर्थभावस्य । धीमुखानि षट् पञ्चमभावस्य । रोगादीनि सप्त षष्ठभावस्य । जामि- त्रादीनि अष्टौ सप्तमभावस्य । रन्ध्रादीनि षडष्टमभावस्य । धर्मादीनि षट् नवमभावस्य । व्यापारमुखानि अष्टौ दशमभावस्य । एकादशादीनि पञ्चैकादशभावस्य । रिःफादीनि चत्वारि द्वादशभावस्य नामान्यार्या वदन्ति ॥ ४९-५२ ॥ तनु भावके-कल्प, उदय, आद्य, तनु, जन्म, विलग्न और होरा नाम हैं। धन भावके-वाक्, अर्थ, भुक्ति, नयन, स्व और कुटुम्ब नाम हैं। तृतीयके-दुश्चिक्य, विक्रम, सहोदर, वीर्य, धैर्य और कर्ण नाम हैं। चतुर्थ भावके-पाताल, बुद्धि, हिबुक, क्षिति, मातृ, विद्या, यान, गेह, सुख, बन्धु और चतुष्टय नाम हैं। पञ्चम भावके-धी, देव, राज, पितृ, नन्दन और पञ्चक नाम हैं। छठें भावके-रोग, अङ्ग, शस्त्र, भय, षड, रिपु और क्षत नाम हैं। सप्तमके-जामित्र, काम, गमन, कलत्र, सम्पत्, द्यून, अस्त और सप्तम नाम हैं। अष्टमके-रन्ध्र, आयु, अष्ट, रण, मृत्यु और विनाश नाम हैं। नवमके-धर्म, गुरु, शुभ, तप, नव और भाग्य नाम हैं। दशम भावके-व्यापार, मेषूरण, ज्ञान, राज, आस्पद और कर्म नाम हैं। ग्यारहवें भावके-एकादश, उपान्त्य, भव, आय और लाभ नाम हैं। बारहवें भावके-रिष्फ, व्यय, द्वादश और अन्त्य नाम हैं ॥ ४९-५२ ॥ अथ भावानां केन्द्रादिसंज्ञाः । मेषूरणोदयकलत्ररसातलानि स्युः केन्द्रकण्टकचतुष्टयसंज्ञितानि । लग्नात्रिकोणभवनं नवपञ्चमं च स्यात्त्रित्रिकोणमुदयान्नवमं वदन्ति ॥ ५३ ॥ तनुसुखसदनाज्ञा राशयः केन्द्रसंज्ञाः पणफरभवनानि स्वायपुत्राष्टमानि । व्ययरिपुगुरुदुश्चिक्यानि चापोक्लिमानि प्रभवति चतुरस्रं मृत्युबन्धुद्वयं च ॥५४॥ दुश्चिक्यायारिमनान्युपचयभवनान्यहुरार्य्यमुख्याः शेषाः पीडर्त्तसंज्ञा नवधनजलधीकामरण्ध्रान्त्यहोराः ॥ एते भावास्तदीशन्दुजसितगुरुभिः संयुता वीक्षिता वा नान्यैर्युक्ता न दृष्टा यदि शुभफलदा जन्मतः पृच्छतो वा ॥ ५५ ॥ अथेदानीं भावानां केन्द्रादिविशिष्टसंज्ञा उच्यन्ते—मेषूरणेति । मेषूरणोदयकलत्ररसा- तलानि = दशम-लग्न-सप्तम-चतुर्थभवनानि, केन्द्र-कण्टक-चतुष्टयसंज्ञितानि भवन्ति । तथोक्तं सारावल्याम्— “होरास्तदशजलानां चतुष्टयं कण्टकं केन्द्रम् । नामानि" इति । अत्र त्रिकोणम् । लग्नात् नवपञ्चमं च त्रिकोणभवनमिति । त्रिकोणशब्देन नवम- पञ्चमौ गृह्येते । त्रित्रिकोणमिति । उदयाल्लग्नात् नवमं त्रित्रिकोणं स्यादिति वदन्ति विद्वांसः । तथोक्तं सारावल्याम्— “धर्मसुतयोस्त्रिकोणं सुतस्य धीस्त्रिकोणमिति तपसः" इति । पुनः, केन्द्रम् । तनुसुखमदनाज्ञा राशयः = लग्न-चतुर्थ-सप्तम-दशमभावाः केन्द्र- संज्ञा भवन्ति । पणफरभवनानि । स्वायपुत्राष्टमानि = द्वितीयपञ्चमाष्टमैकादशभवनानि
पणफरसंज्ञानि भवन्ति । व्ययरिपुगुरुदुश्चिक्यानि = द्वादश-षष्ठ-नवम-तृतीयभवनानि च आपोक्लिमानि भवन्ति । तयोक्तं सारावल्याम्— “केन्द्रात्परं पणफरमापोक्लिमसंज्ञितं तयोः परतः” इति । मृत्युबन्धुद्वयं च = अष्टमचतुर्थभावद्वयं 'चतुरस्रं' प्रभवति । तयोक्तं वराहेण— “लग्नाच्चतुर्थनिधने चतुरस्रसंज्ञे” इति । उपचयम् । दुश्चिक्यायारिशानानि = तृतीयैकादशषष्ठदशमभवनान्युपचयभवनान्य- चार्यमुख्याः = प्राक्तना मुनय आहुः । शेषाः=अवशिष्टाः, नवधनजलधीकामरन्ध्रान्त्यहोरा= नवम-द्वितीय-चतुर्थ-पञ्चम-सप्तमाष्टम-द्वादश प्रथमभावाः 'पीडर्त्तसंज्ञाः' भवन्ति । तथोक्तं स्वल्पजातके-“त्रिषेडेकादशदशभान्यपचयभवनान्यतोऽन्यथाऽन्यानि” इति । अथ भावानां स्थितिवशाच्छुभाशुभफलदत्वमुच्यते । एते भावाः पूर्वोक्तास्तदीशन्दु- ज्ञसितगुरुभिः = स्वस्वामि-बुध-शुक्र-बृहस्पतिभिः संयुताः = सहिताः, वा वीक्षिताः=अव- लोकिताः, अन्यैरितरैर्न युक्ता न दृष्टाश्च यदि भवन्ति तदा जन्मतः पृच्छतो वा = जातस्य, प्रष्टुर्वा शुभफलदा भवन्ति । तयोक्तं सारावल्याम्— “आत्मीयनाथदृष्टः सहितस्तेनैव तत्प्रियैर्वाऽपि । शशिसुतजीवभ्यामपि राशर्बलवान् चेच्छेषैः ॥” इति ॥ ५३-५५ ॥ ( १०।१।७।४ ) भावोंकी केन्द्र, कण्टक और चतुष्टय संज्ञा हैं। लग्नसे ( १।५ ) की त्रिकोण संज्ञा है । लग्नसे नवमको त्रित्रिकोण कहते हैं ॥ ५३ ॥ ( १।४।७।१० ) भाव केन्द्र हैं। ( २।५।८।११ ) भाव पणफर हैं। ( १२।६।९।३ ) भाव आपोक्लिम संज्ञक हैं। अष्टम और चतुर्थ चतुरस्र हैं ॥ ५४ ॥ ( ३।११।६।१० ) इन चार स्थानोंकी उपचय संज्ञा है। शेष ८ स्थान ( ९।२।४।५।७।८। १२।१ ) पीडर्त्त संज्ञक हैं। ये भाव जन्मकुण्डली वा प्रश्नकुण्डलीमें अपने अपने स्वामियोंसे और बुध, शुक्र, बृहस्पतिसे युक्त हों वा देखे जाते हों तो और अन्यग्रहसे युत या दृष्ट न हों तो शुभफल देते हैं ॥ ५५ ॥ अथ राशीनामुदयमानानि । नखाः जिना विंशतिरष्टयुक्ता रदाङ्गलोका वियदर्णवाख्याः । मेषादिमानं क्रमश्रो वदन्ति तुलादिषट्कस्य विलोमतस्ते ॥ ५६ ॥ अयेदानीं लग्नानामुदयमानान्युच्यन्ते । तत्र मेषस्य नखां(२०)शाः । वृषस्य जिन (२४)भागाः । मिथुनस्याष्टाधिकविंशति-(२८)भागाः । कर्कस्य रदां-(३२)शाः । सिंह- स्याङ्गलोकां-(३६)शाः । कन्यायाः वियदर्णवां-(४०)शा उदयमानानि सन्ति । एवमेतेषां वैपरीत्येन तुलादिषड्राशीनामुदयांशा ज्ञेयाः । अथात्र पठिता एते उदयभागाः सार्द्धसप्ताङ्गुलपलभादेशीयाः । तत्प्रत्यक्षार्थं गणि- तम्— पलभाऽङ्गुलादिः=७ १/२ । ततश्चरदलानि ७५, ६०, २५ । एभ्यः— “लङ्कोदया विघटिका गजभानि गोऽङ्कदन्त्याश्विपक्षदहनाः क्रमगोत्क्रमस्थाः । हीनान्विताश्चरदलैः क्रमगोत्क्रमस्थैर्मेषादितो घटत उत्क्रमतस्त्विमे स्युः ॥” इत्यादिना सार्द्धसप्ताङ्गुलपलभादेशीयोदयमानानि— मे. मी.=२७८^प—७५^प = २०३^प अत्र स्वल्पान्तरात् २००^प गृहीताः। दशाप्ता अंशा २०° वृ. कुं.=२९९^प—६०^प = २३९^प ,, ,, २४०^प ,, ,, ,, २४° मि. म.=३२३^प—२५^प = २९८^प ,, ,, २८०^प ,, ,, ,, २८° क. ध.=३२३^प + २५^प = ३४८^प ,, ,, ३२०^प ,, ,, ,, ३२°
२८ सटीकजातकपारिजाते- सिं. वृ.=२९९^प + ६०^प = ३५९^प अत्र स्वल्पान्तरात् ३६०^प गृहीता दशांशा अंशा ३६° क. तु.=२७८^प + ७५^प = ३५३^प ” ” ४००^प ” ” ” ४०° स्वदेशीयोदयमानार्थं स्वदेशीयपलभातश्च खण्डैश्चोक्तविधिना गणितं कार्यम् । इह ये राशोनामुदयभागाः पठितास्ते स्थिराः केवलं नष्टादिचिन्तायां द्रव्यपरिज्ञानाय पुरुषावयव- ज्ञानाय चेति ॥ ५६ ॥ मेषादि छ राशियोंके क्रमसे २०, २४, २८, ३२, ३६, ४० अंश मान हैं और तुलादि छ राशिके विलोमसे ये ही मान हैं ॥ ५६ ॥ अथ राशीनां शुभाशुभभागाः । तनुः शरा रारिखराः किरीटिनो घना गुरुर्हेयनखा नरा नुकाः । शशाङ्कभागा यदि तुम्बुरादिके मुहूर्त्तजन्मादिषु मृत्युसूचकाः ॥ ५७ ॥ पुत्रो वटुर्दिव्यजनाधिको धनी विराटयो गोत्रवयो धिको धुनाः । मेषादिके पुष्करभागसंज्ञका मुहूर्त्तजन्मादिषु शोभनप्रदाः ॥ ५८ ॥ इदानीं राशीनामशुभभागान्छुभभागांश्चाह । मुहूर्त्तजन्मादिषु = मुहूर्त्तेषु जन्मसु च तुम्बुरादिके = मेषादिराशौ यदि तन्वादिकाः शशाङ्कभागाश्चन्द्रांशा भवेयुस्तदा ते मृत्युसूचका भवन्ति । यथा मेषे तनुरष्टौ ( तनुशब्देन मूर्त्तिरुच्यते, मूर्त्तयोऽष्टौ-‘क्षिति-जल-पवन-हुता- शन-यजमाना-काश-सोम-सूर्याख्याः’ शिवस्येति । ) अष्टमोंऽशश्चान्द्रो मेषस्याशुभ- करो भवति जन्मवतामिति । वृषे शराः = पञ्चविंशः ( अत्र “कटपयवर्गभवै” रित्याद्युक्तप्र- कारेणाङ्कसङ्केतो ज्ञेयः ) मिथुने रारिः=द्वाविंशः । कर्के खराः = द्वाविंशः । सिंहे किरी=एक- विंशः । कन्यायां टिनः = प्रथमः । तुलायां घनाः = चतुर्थः । वृश्चिके गुरुः = त्रयोविंशः । धनुषि हेयः = अष्टादशः । मकरे नखाः=विंशः । कुम्भे नराः=विंशः । मीने नुकाः=दशमः अंशोऽशुभः । अत्रेदमवधेयं-यस्य जन्मकाले राशिपठितांशप्रमितश्चन्द्रो भवेत्तदा तावत्स- ङ्ख्यामिते वर्षे तस्य जातकस्य मृत्युरादेश्य इति । तथोक्तं सर्वार्थचिन्तामणौ— “कुम्भे विंशतिभागे स्यान्मृत्युं दद्यान्निशाकरः । एकविंशतिभागेस्तु सिंहे तत्त्वैस्तु ग्लौः वृषे ॥ अष्टमे मेषचन्द्रस्तु त्रयोविंशतिकोऽलिगः । द्वाविंशतिः कुलीरे तु तुलायां वेदभागकः ॥ विंशतिमर्करे चन्द्रः कन्यायां प्रथमांशकः । धन्विन्यष्टादशो भागो मीने दशमभागयुक् ॥ द्वाविंशतिर्नृयुग्मे तु चन्द्रोऽप्येवं मृतिप्रदः । ये ये निशाकरांशास्तु मृत्युभागा विवक्षिताः ॥ तावद्भिर्वत्सरैर्जातो मृत्युमेति न संशयः” ॥ इति ॥ अथ शुभांशाः । मेषादिके = मेषप्रभृतिराशौ, पुत्रादयः पुष्करभागसंज्ञाः = पुष्कराख्यां- शांः, मुहूर्त्तजन्मादिषु शोभनप्रदा भवन्ति । तथथा—मेषे पुत्रः = एकविंशतितमोंऽशः पुष्क- राख्यः शुभो भवति । एवं-वृषे वटुः = चतुर्दशः । मिथुने दिव्यं = अष्टादशः । कर्के जनः= अष्टमः । सिंहे अधिकः = एकोनविंशः । कन्यायां धनी = नवमः । तुलायां विरा = चतु- र्विशः । वृश्चिके टयो = एकादशः । धनुषि गोत्रः = त्रयोविंशः । मकरे वयः = चतुर्दशः । कुम्भे धिकः = एकोनविंशः । मीने धुनाः = नवमोंऽशः पुष्करसंज्ञो भवति । जन्मकाले पठि- तराशिभागतुल्यश्चन्द्रो जातस्य शुभकरो भवतीति ॥ ५७–५८ ॥
| राशयः | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कु. | मी. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शुभांशाः | २१ | १४ | १८ | ८ | १९ | ९ | २४ | ११ | २३ | १४ | १९ | ९ |
| अशुभांशाः | ८ | २५ | २२ | २२ | २१ | १ | ४ | २३ | १८ | २० | २० | १० |
राशिशीलाध्यायः ॥१॥ २९ मेषादि राशियों में क्रमसे ८।९।२२।२२।१।१।४।२३।१८।२०।२० और १० वां चन्द्रमा के अंश मुहूर्त्त और जन्मकालमें मरणसूचक हैं । एवं २१।१४।१८।८।१९।२२।२४।११।२३।१४।१९ और ९ वां अंश पुष्कर नामक होते हैं। ये मुहूर्त्त और जन्मकाल में शुभसूचक हैं। जिसके जन्मसमयमें चन्द्रमा मेषके ८ वें अंश पर हो उसका ८ वें वर्षमें मरण कहना चाहिये । इसी तरह हर एक राशिमें जाने । (सु० ज्ञा० कारः ) ॥ ५७-५८ ॥ अथ मेषादिराशीनां वासदेशाः । क्रमात्पाटलकर्नाटचरचोलवसुन्धराः । पाण्ड्यकेरलकोल्लासमलयावनिसैन्धवाः ॥ ५९ ॥ उदक्पाञ्चालयवनकोशलक्षितिसंज्ञकाः । मेषादिसर्वराशीनां वासदेशाः प्रकीर्तिताः ॥ ६० ॥ इदानीं राशीनां वासदेशा उच्यन्ते । मेषादिसर्वराशीनां = द्वादशानां क्रमात् पाटलादयो द्वादश वासदेशा प्रकीर्त्तिताः सद्भििरिति । मेषस्य पाटलाः । वृषस्य कर्नाटः । मिथुनस्य चरः । कर्कस्य चोलः । सिंहस्य पाण्ड्यः । कन्यायाः केरलः । तुलायाः कोल्लासः । वृश्चिकस्य मलयः । धनुषः सैन्धवः । मकरस्योदक्पाञ्चालः । कुम्भस्य यवनः । मीनस्य कोशलः । प्रयोजनम्-तद्राश्युदये जनिमतां तदुक्तदेशः श्रेयस्करो भवतीति ॥ ५९-६० ॥ पाटल, कर्नाट, चर, चोल, पांडु, केरल, कोल्लास, मलय, सैन्धव, पांचाल, यवन, और कोशल ये क्रमसे मेषादि राशियों के देश हैं ॥ ५९-६० ॥ अथ राशीनां प्लवत्वनिरूपणम् । स्वाम्याशाख्यं यत्तदापप्लवत्वं भानुक्रान्तादम्बुसंज्ञोऽभिजित्स्यात् । होरातन्त्रे पारिजाताभिधाने संज्ञाध्यायः कीर्तितो राशिशीलः ॥ ६१ ॥ इति श्रीनवग्रहकृपया वैद्यनाथविरचिते जातकपारिजाते राशिशीलाध्यायः प्रथमः ॥ १ ॥
इदानीं ग्रहाणां प्लवत्वकथनपूर्वकमध्यायमुपसंहरति । स्वाम्याशाख्यं यत् = स्वामिनोऽ-
धिपतेराशाख्यं यत् = या दिगिति, तद्राशोरापप्लवत्वं = निम्नता भवति । यथा मेषराशेरधिपो
भौमस्तस्य दक्षिणा दिकस्यां मेषः प्लवाख्य इति । एवं सर्वत्र । अथाभिजित् । भानुक्रा-
न्तादम्बुसंज्ञः = सूर्याक्रान्तराशेश्चतुर्थो राशिरभिजित्स्यादभिजित्संज्ञको भवति । यथा मेषे
रविश्चेत्तदा कर्कोऽभिजिदिति ।
अथाध्यायोपसंहारः । होरातन्त्रे = जातकशास्त्रे, पारिजाताभिधाने = 'पारिजात'
इति नामके ग्रन्थे राशिशीलः = राशीनां शीलविशिष्टः संज्ञाध्यायो मया ग्रन्थकर्त्रा कीर्तितो
वर्णित इति ॥ ६१ ॥
पारिजाते सुधा टीका कपिलेश्वररचिता । प्रथमे राशिशीलेऽस्मिन्नध्याये पूर्णतां गता ॥ १ ॥
सभी राशि अपने २ स्वामी की दिशा में प्लवित ( नीचोन्मुख ) होती हैं और सूर्य
जिस राशिमें हो उससे चौथी राशि अभिजित् संज्ञक है । होराशास्त्रके पारिजात नामक
ग्रन्थमें राशिशील नामक पहला संज्ञाध्याय समाप्त हुआ । (सु० शा० कारः ) ॥ ६१ ॥
इति श्रीवैद्यनाथविरचिते जातकपारिजाते राशिशीलाख्ये प्रथमेऽध्याये
'विमला' हिन्दी टीका समाप्ता ॥ १ ॥
अथ ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥ २ ॥ तत्रादौ सूर्यादीनां कालात्मत्वादिनिरूपणम् ॥ कालस्यात्मा भास्करश्चित्तमिन्दुः सत्त्वं भौमः स्याद्वचश्चन्द्रसूनुः । देवाचार्यः सौख्यविज्ञानसारः कामः शुक्नो दुःखमेवार्कसूनुः ॥ १ ॥ अथेदानों कालाङ्गे सूर्यादिग्रहाणामधिकारनिरूपणं क्रियते-कालस्येति । भास्करः=सूर्यः, कालस्य = कालपुरुषस्यात्मा भवति । इन्दुश्चन्द्रश्चित्तमन्तःकरणम् । भौमः = मङ्गलः सत्त्वं = बलम् । चन्द्रसूनुः = बुधो वचः = वचनम् । देवाचार्यः = गुरुः, सौख्यविज्ञानसारः= सुखज्ञानपरः । शुक्रः कामः = मदनम् । अर्कसूनुः = शनिर्दुःखं भवति । प्रयोजनञ्च-जन्म- काले तत्तद्ग्रहे बलिनि पुरुषस्य तत्तदधिकृदङ्गभावो बलवान् भवति, निर्बले च निर्बल इति । तयोक्तं स्वल्पजातके— “आत्मादयो गगनगैर्बलिभिर्बलवत्तराः । दुर्बलैर्दुर्वला ज्ञेया विपरीतं शनेः स्मृतम् ॥” इति । काल (समय) रूपी पुरुषका अङ्गविभाग इस प्रकार है—सूर्य आत्मा, चन्द्रमा चित्त (मन), मङ्गल पराक्रम, बुध वचन, बृहस्पति सुख तथा विज्ञान का सार, शुक्र काम और शनि दुःख है । जन्मकालमें बली ग्रहका अङ्ग पुष्ट, निर्बलका निर्बल जाने ॥ १ ॥ अथ रव्यादीनां राजत्वादिनिरूपणम् । दिनेशचन्द्रौ राजानौ सचिवौ जीवभार्गवौ । कुमारो वित् कुजो नेता प्रेष्यस्तपननन्दनः ॥ २ ॥ स्पष्टार्थः । प्रयोजनञ्च--पुरुषस्य जन्मकाले यो ग्रहो बलीयानसौ निजानुरूपं जातकं करोति । तथोक्तं सारावल्याम्— “सत्त्वा नराणां कुर्वन्ति जन्मसमये निजमेव सत्त्वम् ।” इति ॥ २ ॥ सूर्य और चन्द्रमा राजा, बृहस्पति और शुक्र मन्त्री, बुध राजकुमार, मङ्गल नेता और शनि दूत हैं ॥ २ ॥ अथ सूर्यादीनां नामान्तराणि । हेलिः सूर्यस्तपनदिनकृद्भानुपूषारुणार्काः, सोमः शीतद्युतिरुडुपतिर्ग्लौर्मृगाङ्केन्दुचन्द्राः ॥ आरो वक्रक्षितिजक्षुधिराङ्गारकक्रूरनेत्राः, सौम्यस्तारातनुजबुधविद्बोधनात्रेय्सुपुत्राः ॥ ३ ॥ मन्त्री वाचस्पतिगुरुसुराचार्यद्वेज्यजीवाः, शुक्रः काव्यः सितभृगुसुतास्फुजिद्दानवेज्याः । छायासूनुस्तर णितनयः कोणशान्यार्कि मन्दाः, राहुः सर्पाशुरफणितमः सैंहिकेयागवञ्च ॥ ४ ॥ ध्वजः शिखी केतुरिति प्रसिद्धा वदन्ति तज्ज्ञा गुलिकश्च मान्दिः ॥ ४३ ॥ इदानीं ग्रहाणां नामान्तराण्युच्यन्ते । हेल्याद्यष्टौ नामानि सूर्यस्य । सोमादीनि सप्त नामानि चन्द्रस्य । आरादीनि षष्णनामानि मङ्गलस्य । सौम्यादीनि षण्णामानि बुधस्य । मन्त्र्यादीनि षट् गुरोर्नामानि । शुक्रप्रभृति सप्त नामानि शुक्रस्य । छायासुनुमुखानि षट् शनेर्नामानि । राहादीनि सप्त राहोर्नामानि । ध्वजादीनित्रीणि केतोर्नामानि । गुलिको मान्दि- श्चेति द्वयं गुलिकस्य नाम तज्ज्ञाः = ज्योतिषशास्त्रविदो वदन्तीति ॥ ३-४३ ॥ सूर्यके-हेलि, सूर्य, तपन, दिनकृत, भानु, पूषा, अरुण और अर्क नाम हैं। चन्द्रमाके- सोम, शीतद्युति, उडुपति, ग्लौ, मृगाङ्क, इन्दु और चन्द्र नाम हैं। मंगलके-आर, चक्र,
ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥२॥ ३१ क्षितिज, रुधिर, अङ्गारक और क्रूरनेत्र नाम हैं। बुधके-सौम्य, तारातनय, बुध, विद्, बोधन और इन्दुपुत्र नाम हैं। बृहस्पतिके-मंत्री, वाचस्पति, गुरु, सुराचार्य, देवेज्य और जीव नाम हैं। शुक्रके-काव्य, सित, भृगुसुत, आच्छ, आस्फुजित् और दानवेज्य नाम हैं। शनिके-छायासुतु, तरणितनय, कोण, शनि, आर्कि और मन्द नाम हैं। राहुके-सर्प, असुर, फणि, तम, सैंहि- केय और अगू नाम हैं। केतुके-ध्वज, शिखी, केतु नाम हैं। गुलिक और मान्दि ये दो गुलिक (शनिके अंश) के नाम हैं। ये सभी नाम प्रसिद्ध हैं, ऐसा विद्वानोंने कहा है ॥ ३-४½॥ अथ रव्यादीनामुपग्रहाः । उपग्रहा भानुमुखग्रहांशाः कालादयः कष्टफलप्रदाः स्युः ॥ ५ ॥ क्रमशः कालपरिधिधूमार्द्धप्रहराह्वयाः । यमकण्टककोदण्डमान्दिपातोपकेतवः ॥ ६॥ इदानीमुपग्रहनामान्युच्यन्ते । के च ते उपग्रहा इति ? भानुमुखग्रहांशाः कालादयः । अत्रैदमवधेयं प्रतिदिनं प्रतिरात्रं च सर्वेषां ग्रहाणामंशा भवन्ति । ते कालादयो नवोपग्रहा उच्यन्ते । ते च कष्टफलप्रदा भवन्ति । तेषामुपग्रहाणां नामानि-रवेः कालः । चन्द्रस्य परि- धिः (परिवेषः) । भौमस्य धूमः । बुधस्यार्द्धप्रहरा । गुरोर्यमघण्टकः । शुक्रस्य कोदण्डः । शनेर्मान्दिः (गुलिकः) । राहोः पातः । केतोरुपकेतुरिति । एतेषामुपग्रहाणां ज्ञानार्थं बृह- त्पाराशरहोरायाः पूर्वार्द्धे द्वितीयाध्यायो द्रष्टव्यः ॥ ५-६ ॥ अथ दिने कालादिज्ञानचक्रम् ।
| दिन | १ खण्ड | २ खं. | ३ खं. | ४ खं. | ५ खं. | ६ खं. | ७ खं. | ८ खं. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रवि | काल | परिधि | धूम | अर्धयाम | यमघण्ट | कोदण्ड | गुलिक | निरीश |
| सोम | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | ,, |
| मंगल | धू. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | प. | ,, |
| बुध | अ. या | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | ,, |
| बृह. | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | ,, |
| शुक्र | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | ,, |
| शनि | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | ,, |
| दिन-रात्रिचक्रद्वयज्ञानप्रकारः (रात्रिचक्रं ३२ पृष्ठे द्रष्टव्यम् )- | ||||||||
| दिवसानष्टधा कृत्वा वारेशाद्गणयेत्क्रमात् । अष्टमांशो निरीशः स्यात् शन्यंशो गुलिकः स्मृतः॥ | ||||||||
| रात्रिरप्यष्टधा भक्ता वारेशात्पञ्चमादितः । गणयेदष्टमः खण्डो निष्पतिः परिकीर्तितः ॥ | ||||||||
| शन्यंशो गुलिकः प्रोक्तो गुर्वंशे यमघण्टकः । भौमांशे मृत्युरादिष्टो रव्यंशे कालसंज्ञकः ॥ | ||||||||
| सौम्यांशेऽर्द्धप्रहरकः स्पष्टकर्मप्रदेशकः । इति । | ||||||||
| सूर्य आदि ग्रहोंके अंश कालादि कष्ट फल देनेवाले उपग्रह हैं। काल, परिधि, धूम, अर्ध- | ||||||||
| 4 प्रहर, यमघण्ट, कोदण्ड, मान्दि, पात, उपकेतु ये क्रमसे सूर्यादि उपग्रहोंके नाम हैं ॥५-६॥ |
३२ सटीकजातकपारिजाते- रात्रौ कालादिज्ञानचक्रम्
| रात्रि | १ खं. | २ खं. | ३ खं. | ४ खं. | ५ खं. | ६ खं. | ७ खं. | ८ खं. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र. | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | निरीश |
| चं. | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | ,, |
| मं. | गु. | का. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | ,, |
| बु. | का. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | गु. | ,, |
| बृ. | प. | धू. | अ. या. | य. घं. | कें दं. | गु. | का. | ,, |
| शु. | धू. | अ. या. | य. घं. | कोद. | गु. | का. | प. | ,, |
| श. | अ. या. | य. घं. | कोदं. | गु. | का. | प. | धू. | ,, |
| अथ रव्यादीनां स्वरूपम् । | ||||||||
| भानुः श्यामललोहितद्युतितनुश्चन्द्रः सिताङ्गो युवा, | ||||||||
| दूर्वाश्यामलकान्तिरिन्दुतनयः, संरक्तगौरः कुजः ॥ | ||||||||
| मन्त्री गौरकलेवरः, सिततनुः शुक्रोऽसिताङ्ग शनिः, | ||||||||
| आनीलाकृतिदेहवानहिपतिः, केतुर्विचित्रद्युतिः ॥ ७ ॥ | ||||||||
| अथेदानीं सूर्यादीनां शरीरवर्णा उच्यन्ते । भानुः=सूर्यः श्यामललोहितद्युतितनुः = | ||||||||
| श्यामरक्तमिश्रितकान्तिशरीरः = जपाकुसुमवर्णः । चन्द्रः सिताङ्गः = श्वेतवर्णो यथा दुग्धम् , | ||||||||
| युवा = यौवनावस्थश्च । इन्दुतनयः = बुधः, दूर्वाश्यामलकान्तिः = दूर्वासदृशश्यामवर्णः । | ||||||||
| कुजः मङ्गलः संरक्तगौरः=रक्तगौरमिश्रवर्णो यथा प्रवालः । मन्त्री=बृहस्पतिः, गौरकलेवरः= | ||||||||
| गौरशरीरः । शुक्रः सिततनुः = श्वेतशरीरः । शनिरसिताङ्गः = कृष्णवर्णः । अहिपतिः = | ||||||||
| राहुः, आनीलाकृतिदेहवान् = अतिनीलवर्णः । केतुर्विचित्रद्युतिः = अनेकवर्णमिश्रितशरीर इति । | ||||||||
| प्रयोजनञ्च - जन्मनि जातकस्य तथा प्रश्ने प्रष्टुरभीष्टवस्तुनश्च तत्काले बलीयान् ग्रह आ- | ||||||||
| त्मवर्णमिव वर्णं करोति ॥ ७ ॥ | ||||||||
| सूर्य-श्याम और लाल मिश्रित वर्ण है। चन्द्रमा-सफेद रंगका युवा है। बुध-दूर्वाके | ||||||||
| सदृश हरितवर्ण है। लाल और सफेद मिला हुआ वर्ण मंगलका है। बृहस्पति गौर शरीर- | ||||||||
| वाला है। शुक्रका सफेद शरीर है। शनिका कृष्ण शरीर है। नीले रङ्गकी देहवाला राहु और | ||||||||
| विचित्रवर्ण केतु है ॥ ७ ॥ | ||||||||
| अथ ग्रहाणां शुभाशुभत्वादिनिरूपणम् । | ||||||||
| प्रकाशकौ शीतकरप्रभाकरौ, ताराग्रहाः पञ्च धरासुतादयः ॥ | ||||||||
| तमः स्वरूपौ शिखिसिंहिकासुतौ, शुभाः शशिज्ञामरवन्द्यभार्गवाः ॥ ८ ॥ | ||||||||
| क्षीणेन्दु मन्दरविराहुशिखिक्षमाजाः पापास्तु पापयुतचन्द्रसुतश्च पापः ॥ | ||||||||
| तेषामतीव शुभदौ गुरुदानवेज्यौ, क्रूरौ दिवाकरसुतक्षितिजौ भवेताम् ॥ ६ ॥ | ||||||||
| शुक्लादिरात्रित्रिदशकेऽहनि मध्यवीर्यशाली, द्वितीयदशकेऽतिशुभप्रदोऽसौ । | ||||||||
| चन्द्रस्तृतीयदशके बलवर्जितस्तु सौम्येक्षणादिसहितो यदि शोभनः स्यात् ॥१०॥ |
ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥२॥ ३३ इदानीं ग्रहाणां शुभाशुभादि निरूप्यते-प्रकाशकाविति । शीतकर-प्रभाकरौ = चन्द्र- सूर्यौ, प्रकाशकौ ( सकलतारकापेक्षयाऽधिकप्रभाकरावित्यर्थः ) धरासुतादयः पञ्च = मङ्गल- बुध-गुरु-शुक्र-शनयस्ताराग्रहा न स्वतस्तेजस्का इति । तथोक्तं तत्त्वविवेके- "तेजसां गोलकः सूर्यो ग्रहर्क्षाण्यम्बुगोलकाः । प्रभावन्तो हि दृश्यन्ते सूर्यरश्मिप्रदीपिताः ॥" इति । शिखिसिंहिकासुतौ = केतुराहू, तमःस्वरूपौ = छायास्वरूपावन्धकारमयावित्यर्थः । शशिज्ञामरेज्यभार्गवाः = (१) चन्द्र-(२) बुध-गुरु-शुक्राः, शुभाः = शुभग्रहाः । क्षीणे- न्दुमन्दरविराहुशिखिक्षमाजाः = कृष्णपक्षीयचन्द्र-शनि-रवि-राहु-केतु-मङ्गलाः, पापाः = पापग्रहाः । पापयुतचन्द्रसुतश्च = पापग्रहेण केनचिद्युतो बुधोऽपि पापी भवति । तथोक्तं वरा- हेण-"क्षीणेन्द्वर्कमहीसुतार्कत नयाः पापा बुधस्तैर्युतः ।” अथोक्तेषु शुभेष्वशुभेषु चात्यन्तशुभाशुभत्वनिरूपणम् । तेषामुक्तग्रहाणां गुरुदानवेज्यौ = बृहस्पतिशुक्रावतीव शुभदौ स्तः । दिवाकरसुतक्षितिजौ = शनिमङ्गलौ चातीव क्रूरावशुभौ भवेतामिति । अत्र कालपरत्वेन चन्द्रस्य शुभाशुभत्वमुच्यते । शुक्लादिरात्रिदशकऽहनि = शुक्लपक्षप्रतिपदादितो दशमीं यावच्चन्द्रो मध्यवीर्यशाली = मध्यबली भवति । द्वितीयदशके= शुक्लौकादशीमारभ्य कृष्णपक्षपञ्चमीं यावदसौ चन्द्रोऽतिशुभप्रदो बलीयान् भवति । तृतीय- दशके = कृष्णपक्षपञ्चमीमारभ्यामावास्यां यावच्चन्द्रो बलवर्जितो निर्बलोऽशुभ इति । यदि सौम्येक्षणादिसहितः = अशुभोऽपि चन्द्रः शुभग्रहैर्युक्तो दृष्टश्च चेद्भवैत्तदा, शोभनः = शुभदो भवतीति ॥ ८-१० ॥ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश ( उजेला ) करनेवाले हैं । मंगलादि पांच (मं०बु०बृ०शु० श० ) तारा ग्रह हैं । केतु और राहु तम- (अन्धकार ) स्वरूप हैं। चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र शुभग्रह हैं । क्षीणचन्द्रमा शनि, सूर्य, राहु, केतु और मंगल पापग्रह हैं । पापग्रहसे युक्त बुध भी पापग्रह है । इनमें बृहस्पति और शुक्र विशेष शुभ हैं। शनि और मंगल क्रूर हैं। शुक्लपक्ष की प्रतिपदासे दश दिन चन्द्रमा मध्यबली रहते हैं। फिर दश दिन पूर्ण बली, तीसरे दशकमें बलहीन रहते हैं । परन्तु यदि चन्द्रमा शुभग्रहोंसे दृष्टियुत हों तो शुभ होते हैं ॥ १० ॥ अथ रव्यादीनामुदयप्रकारः । रव्यारराहुमन्दाश्च पृष्ठेनोद्यन्ति सर्वदा । शिरसा शुक्रचन्द्रज्ञा जीवस्तृभयतो व्रजेत् ॥ ११ ॥ इदानीं ग्रहाणामुदयविवरणं क्रियते । रव्यारराहुमन्दाश्च = सूर्यमङ्गलराहुशनयः, सर्वदा पृष्ठेनोद्यन्ति । ते पूर्वाभिमुखास्तिष्ठन्तीति भावः । शुक्रचन्द्रज्ञाः शिरसा । एतेषां शिर एव प्रथममुदयक्षितिजे आयाति । जीवः = बृहस्पतिस्तूभयतः = पृष्ठेन शिरसा चोदेति ॥ ११ ॥ सूर्य, मङ्गल, राहु और शनि सदा पृष्ठ से उदित होते हैं । शुक्र, चन्द्रमा और बुध शिरसे. उदित होते हैं । बृहस्पति पृष्ठ और शिर दोनों प्रकार से उदित होते हैं ॥ ११ ॥ अथ रव्यादीनामाकारविशेषाः । दिवाकरज्ञौ विहगस्वरूपौ सरीसृपाकारयुतः शशाङ्कः । पुरन्दराचार्यसितौ द्विपादौ चतुष्पदौ भानुसुतक्ष्माभौ ॥ १२ ॥ इदानीं ग्रहाणामाकारविशेषा उच्यन्ते । दिवाकरज्ञौ = सूर्यबुधौ, विहगस्वरूपौ = पक्षि- रूपिणौ । शशाङ्कश्चन्द्रः सरीसृपाकारयुतः = कीटाकृतिसहितः । पुरन्दराचार्यसितौ = गुरु- ( १ ) चन्द्रः शुक्लपक्षीयः । ( २ ) बुधः पापवियुक्तः ।
३४ सटीकजातसपारिजाते- शुक्रौ, द्विपादौ = नररूपौ । भानुसुतक्ष्माजौ = शनिमङ्गलौ, चतुष्पदौ = पशुसदृशौ वर्त्तेते इति ॥ १२ ॥ सूर्य और बुध पक्षी के सदृश रूपवाले हैं। चन्द्रमा सरीसृप (कीट) की आकृति से युक्त हैं। बृहस्पति और शुक्र द्विपद हैं। शनि और मङ्गल चतुष्पद हैं ॥ १२ ॥ अथ रव्यादीनां सञ्चारदेशाः। जलाशयौ चन्द्रसुरारिवन्द्यौ बुधालयग्रामचरौ गुरुज्ञौ । कुजाहिमन्दध्वजवासरेशा भवन्ति शैलाटविसञ्चरन्तः ॥ १३ ॥ इदानीं ग्रहाणां गोचरदेशा उच्यन्ते । चन्द्रसुरारिवन्द्यौ=चन्द्रशुक्रौ, जलाशयौ=जल- चरौ । गुरुज्ञौ = बृहस्पतिबुधौ, बुधालयग्रामचरौ = गुरुर्बुधानां=विदुषामालयाः = भवनानि तेषु चरति, बुधो ग्रामः = सामान्यलोकानामधिकासस्तत्र चरतीति । द्वावपि ग्राम्यौ । कुजा- हिमन्दध्वजवासरेशाः=मङ्गल-राहु-शनि-केतु-सूर्याः, शैलाटविसञ्चरन्तः = शैलाः पर्वताः अटव्यो वनानि तेषु सञ्चरन्तो विहरणशीला भवन्ति । प्रयोजनञ्च-प्रसवे प्रश्ने च बलीयान् ग्रह आत्मसञ्चारदेशं कुरुते ॥ १३ ॥ चन्द्रमा और शुक्र जलचर हैं। बृहस्पति और बुध पण्डितोंके गृहमें और ग्रामचर हैं। मङ्गल, राहु, शनि, केतु और सूर्य पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले हैं ॥ १३ ॥ अथ रव्यादीनां बाल्यादिवयोर्निरूपणम् । बालो धराजःशशिजः कुमारकस्त्रिंशद्गुरुः षोडशवत्सरः सितः । पञ्चाशदकॊ विधुरब्दसप्ततिः शताब्दसङ्ख्याः शनिराहुकेतवः ॥ १४ ॥ स्पष्टम् । प्रयोजनम्-हृतनष्टादौ चौरादेर्वयोज्ञानम् ॥ १४ ॥ मंगल बाल है। बुध कुमार है। ३० वर्षका गुरु है। १६ वर्षका शुक्र है। ५० वर्षका सूर्य है। ७० वर्षका चन्द्रमा है। १०० वर्षके शनि, राहु और केतु हैं ॥ १४ ॥ अथ ग्रहाणां शाखाधिपत्यनिरूपणं धातुमूलादिसंज्ञाञ्च । शाखाधिपा जीवसितारबोधना भानुस्वरूपद्युचरौ कुजारुणौ । मूलप्रधानौ तुहिनाकरार्कजौ जीवौ सितार्यौ तु विमिश्र इन्दुजः ॥ १५ ॥ इदानीं शाखाधिपनिरूपणपूर्वकं ग्रहाणां धातवादिसंज्ञा उच्यन्ते । जीवसितारबोधनाः = बृहस्पति-शुक्र-मङ्गल-बुधाः, शाखाधिपा भवन्ति । तत्र बृहस्पतिः ऋग्वेदाधिपः, शुक्रो यजुर्वेदपतिः, मङ्गलः सामवेदाधिपः, बुधोऽथर्ववेदपतिर्भवति । तथोक्तं रामाचार्येण- "शाखेशाः स्युर्जीवशुक्रारसौम्याः ।" इति । प्रयोजनम्- "शाखेशवारतनुवीर्यमतीव शस्तम् ।" इति । अथ धातवादिसंज्ञा । कुजारुणौ = मङ्गलसूर्यौ, धातुस्वरूपद्युचरौ = तौ धातुसंज्ञकौ ग्रहाविति । मूलप्रधानौ तुहिनाकरार्कजौ = चन्द्रशनी मूलमुख्यौ = तौ मूलसंज्ञाविति । सि- तार्यौ = शुक्रबृहस्पती, जीवौ = जीवकारकौ ग्रहाविति । इन्दुजः = बुधः, विमिश्रः=धातुमुल- जीवानां सङ्कलनरूपोऽर्थाद्बुधस्य भागतत्रये त्रयाणां यथाक्रमं निवेश इति । अत्र पराशर- कृता संज्ञा यथा- "राहारपङ्गुचन्द्राश्च विज्ञेया धातुखेचराः । मूलग्रहौ सूर्यशुक्रावपरा जीवसंज्ञकाः ॥" इति । तत्र धातुः (१) स्वर्णादित्याद्युक्तश्लोकाज्ज्ञेयं प्रत्येकस्य विवरणम् ॥ १५ ॥ ( १ ) प्रथमाध्यायस्य १९ श्लोकः ।
ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥ २ ॥ ३५ बृहस्पति, शुक्र, मङ्गल और बुध शाखाओंके स्वामी हैं। जैसे ऋग्वेदका गुरु, यजुर्वेदका शुक्र, सामवेदका मङ्गल और अथर्ववेदका बुध है। मङ्गल और सूर्य धातुस्वरूप ग्रह हैं। मूल प्रधान चन्द्र और शनि हैं। शुक्र और बृहस्पति जीव हैं। बुध मिश्रसंज्ञक है ॥ १५ ॥ अथ ग्रहाणामवस्थेय्यत्त । दीप्तः प्रमुदितः स्वस्थः शान्तः शक्तः प्रपीडितः । दीनः खलस्तु विकलो भीतोऽवस्था दश क्रमात् ॥ १६ ॥ स्पष्टम् ॥ १६ ॥ १ दीप्त, २ मुदित, ३ स्वस्थ, ४ शान्त, ५ शक्त, ६ प्रपीडित, ७ दीन, ८ खल, ९ विकल और १० भीत ये क्रमसे ग्रहों की दश अवस्थायें होती हैं ॥ १५ ॥ अथ स्थानविशेषादवस्थाविशेषाः । स्वोच्चत्रिकोणोपगतः प्रदीप्तः स्वस्थः स्वहेगे मुदितः सुहृद्भे । शान्तस्तु सौम्यग्रहवर्गयातः शक्तोऽतिशुद्धः स्फुटरश्मिजालैः ॥ १७ ॥ ग्रहाभिभूतस्त्वतिपीडितः स्यादरातिराश्यंशगतोऽतिदीनः । खलस्तु पापग्रहवर्गयोगान्नी चेऽतिभीतो विकलोऽस्तयातः ॥ १८ ॥ ग्रहाभिभूत इति । ग्रहैः = स्वेतरैरभिभूतो युद्धे पराजितोऽतिपीडितो भवति । अथ, किं नाम ग्रहाणां युद्धं कथञ्च तत्र पराजितो भवतीत्युच्यते । भौमादिग्रहाणां परस्परयुक्तानां ग्रह- युद्धमिति नाम । उक्तञ्च— “दिवसकरेणस्तमयः समागमः शीतरश्मिसहितानाम् । कुसुतादीनां युद्धं निगद्यतेऽन्योन्ययुक्तानाम् ॥” तत्र ग्रहयुद्धे पराजितस्य लक्षणम्— “दक्षिणदिक्स्थः पुरुषो वेपथुरप्राप्य सन्निवृत्तोऽणुः । अधिरूढो विकृतो निष्प्रभो विवर्णश्च यः स जितः ॥” इति । अन्यत्सर्वं स्पष्टमेवेति ॥ १७-१८ ॥ अपनी उच्चराशिमें, त्रिकोणमें स्थित ग्रह प्रदीप्त होता है। अपने गृहमें स्थित ग्रह स्वस्थ, मित्रके गृहमें रहनेवाला मुदित, शुभग्रहके वर्गमें स्थित ग्रह शान्त, स्फुटरश्मिजालों से अत्यन्त शुद्ध ग्रह शक्त, ग्रहोंसे पराजित (हारा हुआ) अतिपीडित, शत्रु की राशि और नवांशमें प्राप्त ग्रह अतिदीन, पापग्रह के वर्गयोगसे खल, नीचमें अतिभीत और अस्त ग्रह विकल होता है ॥ १७-१८ ॥ अथ ग्रहाणां वर्णविशेषाः । वर्णास्ताम्रसितारक्तहरितपीतकर्कुराः ॥ कृष्णकान्तिरिनादीनां नष्टादौ च प्रकीर्तिताः ॥ १६ ॥ स्पष्टम् । ग्रहाणां वर्णास्तु पूर्वमस्यैवाध्यायस्य ७ मे श्लोके वर्णिताः, पुनर्वर्णनं पिष्टपेष- णमेवेति ॥ १९ ॥ सूर्यादि ग्रहोंके ताम्र, सफेद, खूब लाल, हरा, पीला, चित्र और कृष्ण वर्ण हैं। ये नष्ट द्रव्यादिके ज्ञान होनेके लिये कहे गये हैं ॥ १९ ॥ अथ रव्यादीनां द्रव्याणि अधिदेवताश्च । द्रव्याणि ताम्रम णिकाञ्चनशुक्तिरौप्यमुक्तान्ययश्च दिननाथमुखग्रहाणाम् । वह्न्यम्बुपद्ममुखहरीन्द्रशचीविरञ्चिमुख्या दिवाकरमुखादधिदेवताः स्युः ॥ २० ॥ इदानीं ग्रहाणां द्रव्याण्यधिदेवताश्चोच्यन्ते । दिननाथमुखग्रहाणां=सूर्यादीनां ग्रहाणां ता मणिकाञ्चनशुक्तिरौप्यमुक्तान्ययश्चैतानि द्रव्याणि सन्ति । यथा सूर्यस्य ताम्रम् , चन्द्रस्य
३६ सटीकजातकपारिजाते- मणिः, कुजस्य काञ्चनं=स्वर्णम्, बुधस्य शुक्तिः=कांस्यादिमिश्रितो धातुः, बृहस्पतेः रौप्यं= रजतम्, शुक्रस्य मुक्ता (मोती), शनैश्चरस्यायो लौहमिति । प्रयोजनम्-प्रसवे प्रश्ने च बल- वद्ग्रहद्रव्यसत्ता, ग्रहशुभदशायां तत्तद्द्रव्याप्तिररिष्टकर्तरि ग्रहे तत्तद्द्रव्यदानञ्चेति । अथा- धिदेवताः । दिवाकरमुखात् = सूर्यादितः क्रमेण-वह्न्यम्बुषन्मुखहरीन्द्रशचीविरञ्चिमुख्या अधिदेवता भवन्ति । यथा-सूर्यस्य वह्निरग्निरधिदेवता । चन्द्रस्याम्बु = जलम् । मङ्गलस्य षण्मुखः = कार्त्तिकेयः । बुधस्य हरिर्विष्णुः । गुरोरिन्द्रो देवराट् । शुक्रस्य शचीन्द्रपत्नी । शनेः विरञ्चिः=ब्रह्मेति । प्रयोजनञ्च-ग्रहप्रीतये ग्रहदेवता पूज्या, यात्रायाञ्च ग्रहदेवतां सम्पू- ज्य तद्दिशां यायादिति ॥ २० ॥ सूर्यादि ग्रहोंके क्रमसे ताम्र, मणि, सुवर्ण, शुक्ति, रूपा, मोती और लोह द्रव्य हैं। सूर्यादि ग्रहोंकी क्रमसे अग्नि, जल, कार्तिकेय, विष्णु, इन्द्र, इन्द्राणी और ब्रह्मा अधिदेवता हैं। अथ रव्यादीनां रत्नानि । माणिक्यं दिननायकस्य, विमलं मुक्ताफलं शीतगोः माहेयस्य च विद्रुमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मकम् ॥ देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शनेः नीलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेदवैदूर्यके ॥ २१ ॥ स्पष्टम् । प्रयोजनञ्च-ग्रहशुभदशायां तत्तन्मणिप्राप्तिः, ग्रहवैगुण्ये तत्तन्मणिधारणञ्च ॥ सूर्यका माणिक्य, चन्द्रमाका स्वच्छ मोती, मंगलका मूंगा, बुधका गारुत्मक, बृहस्पतिका पुष्पराग, शुक्रका हीरा, शनिका निर्मल नील, राहुका गोमेदमणि, केतुका वैदूर्य रत्न है ॥ अथ ग्रहाणां वस्त्रादिनिरूपणम् । स्थूलाम्बरं नूतनचारुचेलं कृशानुतोयाहतमध्यमानि ॥ दृढांशुकं जीर्णमनादिकानां वस्त्राणि सर्वे मुनयो वदन्ति ॥ २२ ॥ प्रागादिका भानुसितारराहुमन्देन्दुविद्देवपुरोहिताः स्युः ॥ शुक्रारचन्द्राङ्गजरेज्यमन्दा वसन्तमुख्यावधिपा दृगाणैः ॥ २३ ॥ देवतोयतटवह्निविहाराः कोशगेहशयनोत्कटदेशाः ॥ भानुपूर्वनिलयाः परिकल्प्या वेश्मकोणनिलयाश्चनिकेत् ॥ २४ ॥ इदानीं ग्रहाणां वस्त्राणि, दिशः, ऋतवो वासदेशाश्चोच्यन्ते । इनादिकानां वस्त्राणि । सूर्यस्य स्थूलाम्बरं = स्थूलसूत्ररचितमिति । चन्द्रस्य नूत- नचारुचेलं = नवं मनोरमं च । मङ्गलस्य कृशानुहतं = दग्धम् । बुधस्य तोयाहतं=जलार्द्रम् । गुरोर्मध्यमं = नातिजीर्णं नातिनवम् । शुक्रस्य दृढांशुकं = चिरस्थायि । शनेर्जीर्णं = पुरातनं वस्त्रं भवतीति सर्वे प्राक्तना मुनयो वदन्ति । प्रयोजनम्-सूतिकावस्त्रज्ञाने प्रश्ने च बलवद्ग्र- हवशाद्वस्त्रज्ञानमिति । अथ दिशः । प्रागादिकाः=पूर्वादिक्रमतः, भानुसितारराहुमन्देन्दुविद्देवपुरोहिताः= सूर्य-शुक्र-मङ्गल-राहु-शनि-चन्द्र-बुध-गुरवः स्युः । पूर्वादिशां विदिशां चाष्टानामे- तेऽष्टौ ग्रहा अधिपा भवन्तीत्यर्थः । अथर्तवः । शुक्रारचन्द्राङ्गजरेज्यमन्दा दृगाणैर्वसन्तमुख्यावधिपा भवन्ति । अत्र दृगा- णपरत्वेनर्तूनां परिज्ञानं कृतमिति । यथा-लग्ने शुक्रद्रेष्काणे वसन्तर्तुः । लग्ने भौमद्रेष्काणे ग्रीष्मः । चन्द्रद्रेष्काणे वर्षा । बुधद्रेष्काणे शरत् । गुरुद्रेष्काणे हेमन्तः । शनिद्रेष्काणे शिशि- र्तुरिति । परञ्चात्र लग्नगतैः शुक्रादिभिर्ग्रहैर्वसन्तादयः ऋतवो वाच्याः । लग्ने ग्रहाभावे
ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥२॥ ३७ शुक्रादिद्रेष्काणैरैवं लब्धे ग्रहबाहुल्येऽपि द्रेष्काणेनैवर्तुनिर्देशो वाच्य इति । प्रयोजनम्-नष्टजा- तके ऋतुनिर्देशः । अथ वासदेशाः । देवस्थानादयो भानुपूर्वग्रहाणां निलया इति । तत्र सूर्यस्य देवस्था- नम् । । चन्द्रस्य तोयतटं = जलाशयकूलम् । कुजस्य वह्निरग्निस्थानम् । बुधस्य विहारस्था- नम् । गुरोः कोशगेहं = भाण्डागारगम् । शुक्रस्य शयनालयः । शनेरुत्करदेशः = ऊषर- भूमिः । अहिकेतोः=राहुकेतू वेश्मकोणनिलयौ । राहोर्वेश्म=गृहं, केतोः कोणः=गृहस्य कोणो निलय इत्यर्थः । प्रयोजनञ्च-प्रसवगृहज्ञानं हतनष्टादौ द्रव्यादिस्थितिज्ञानं च बलीग्रहात्कु- र्यात् ॥ इति ॥ २२-२४ ॥ मुनियोने सूर्यका मोटा, चन्द्रमाका नया रमणीय, मंगलका जला, बुधका जलहत, गुरुका मध्यम, शुक्रका दृढ़, शनिका पुराना वस्त्र कहा है ॥ २२ ॥ पूर्वादि दिशाओंमें क्रमसे सूर्य, शुक्र, मंगल, राहु, शनि, चन्द्र, बुध और बृहस्पति का निवास है और ये उन दिशाओंके स्वामी हैं । शुक्र, मङ्गल, चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति और शनि क्रमसे वसन्तादि ऋतुओंके स्वामी हैं । लग्नमें शुक्रादि ग्रहोंके द्रेष्काण होनेसे वसन्त आदि ऋतु जाननी चाहिये ॥ २३ ॥ सूर्यका देवालय, चन्द्रमाका जलाशय, मंगलका अग्निशाला, बुधका क्रीडाभूमि, बृह- स्पतिका भंडार, शुक्रका शयनागार, शनिका ऊसरभूमि, राहु और केतु का गृह और कोण वासस्थल है ॥ २४ ॥ अथ प्रदेशविभाग इनादीनाम् । लङ्कादिकृष्णासरिदन्तमारः सितस्ततो गौतमिकान्तभूमिः ॥ विन्ध्यान्तमार्यः सुरनिम्नगान्तं बुधः शनिः स्यात्तुहिनाचलान्तः ॥ २५ ॥ इदानीं ग्रहाणां प्रदेशा उच्यन्ते । आरः = मङ्गलः, लङ्कादिकृष्णासरिदन्तं = लङ्कातः कृष्णानदीं यावज्ज्ञेयः । मङ्गलस्यैतावान्प्रदेश इति । ततः कृष्णासरितो गौतमिकान्तभूमिः गौतमीनदीं यावत्सितः = शुक्रः । ततो विन्ध्यान्तं = विन्ध्याचलं यावदार्यो गुरुः । ततः सुरनिम्नगान्तं=गङ्गावधिकं बुधः । ततस्तुहिनाचलान्तः = हिमगिरिं यावच्छनिः स्यात् । अत्र सूर्याचन्द्रमसोः प्रदेशो 'देवतोयतटे' त्यायुक्तो ज्ञेयः । सूर्यस्य देवभूमिर्मेरुगिरिः । चन्द्रस्य तोयतटानि महार्णवा इति ॥ २५ ॥ लङ्कासे कृष्णा नदी पर्यन्त मङ्गलका प्रदेश है। कृष्णानदी से गौतमी नदी पर्यन्त शुक्रका, गौतमीसे विन्ध्यपर्वत तक गुरुका, विन्ध्यसे गङ्गा नदी तक बुधका और गङ्गासे हिमा- लय पर्यन्त शनिका प्रदेश है । यहाँ सूर्य और चन्द्रमा का प्रदेश नहीं कहा गया । पीछे के श्लोक 'देवतोयतट' के अनुसार सूर्य का देवभूमि ( मेरु ) और चन्द्रमाका जल ( समुद्र ) प्रदेश कहना चाहिये । ( सु. शा. कारः ) ॥ २५ ॥ अथ ग्रहाणां जातयो गुणाश्च । विप्रौ जीवसितौ दिनेशरुधिरौ भूपालकौ वैश्यराड् इन्दुः शूद्रकुलाधिपः शशिसुतो मन्दोऽवराणां पतिः ॥ आदित्यामरमन्त्रिशीतकिरणाः सत्त्वप्रधानग्रहाः शुक्रज्ञौ सरजोगुणौ शनिधरापुत्रौ तमःस्वामिनौ ॥ २६ ॥ इदानीं ग्रहाणां विप्रादिवर्णाधिपत्यं सत्त्वादिगुणांश्चोच्यन्ते । जीवसितौ=गुरुशुक्रौ, विप्रौ= ब्राह्मणवर्णाधिपौ । दिनेशरुधिरौ = सूर्यमङ्गलौ भूपालकौ=क्षत्रियाधिपौ । इन्दुश्चन्द्रो वैश्यरा- ड् = वैश्यवर्णाधीशः । शशिसुतो बुधः शूद्रकुलाधिपः । मन्दः = शनिरवराणामन्त्यजानां पतिर्भवति । प्रयोजनम्-ग्रहोपघाते तद्वर्णोपघातो हतनष्टादौ च ग्रहबलाच्चौरादेर्वर्णज्ञानम् । ४ जा०
३८ सटीकजातकपारिजाते- अथ गुणाः । आदित्यामन्त्रिशीतकिरणाः = सूर्य-गुरु-चन्द्राः, सत्त्व(१)- प्रधानग्रहा भवन्ति । सूर्य-गुरु-चन्द्रेषु सत्वगुणोऽधिको भवति । शुक्रज्ञौ = शुक्रबुधौ सरजो- गुणौ = रजोगुणयुक्ताविति । शनिधरापुत्रौ = शनिमङ्गलौ, तमःस्वामिनौ = तमोगुणाधिपती भवतः । अत्र भविष्यति कस्यचिदियमाशङ्का यदस्यैवाध्यायस्य प्रथमश्लोके 'सत्त्वं भौम' इत्युक्तमत्र शनिधरापुत्रौ तमः स्वामिनाविति किमुच्यते ? । सत्यं तदुच्यते । तत्र सत्त्वं शौर्य- मिति बोद्धव्यम् । तनु कार्याकार्यप्रवृत्तानां समेषामेव वर्त्तते । इह सत्त्वं गुणवाचकम् । तत्तु महात्मन्येव तिष्ठति । तथोक्तं च- “यः सात्विकस्तस्य दयास्थिरत्वं सत्यार्जवं ब्राह्मणदेवभक्तिः । रजोऽधिकः कालकलाकृतस्त्रीसंसक्तचित्तः पुरुषोऽतिशूरः ॥ तमोऽधिकः वञ्चयिता परेषां मूर्खोंऽलसः क्रोधपरोऽतिनिद्रः” ॥ इति ॥ २६ ॥ बृहस्पति और शुक्र ब्राह्मण हैं । सूर्य और मङ्गल क्षत्रिय हैं । वैश्यका स्वामी चन्द्रमा है । शूद्रका बुध और अंत्यजोंका स्वामी शनि है । सूर्य, बृहस्पति और चन्द्रमा सत्त्वगुणी हैं । शुक्र और बुध रजोगुणी हैं । शनि और मङ्गल तमोगुणी हैं ॥ २६ ॥ अथ ग्रहाणां नरादिसंज्ञा महाभूताधिपत्यञ्च । नराकारा भानुक्षितिजगुरवः शुक्रशशिनौ वधूरूपौ षण्ढप्रकृतिपुरुषौ मन्दशशिजौ ॥ वियत्क्षोणीतेजपवनपयसामेव पतयः सुराचार्यज्ञारद्युमणिसुतदैत्यारिसचिवाः ॥ २७ ॥ इदानीं ग्रहाणां पुरुषादिनिरूपणं पञ्चमहाभूताधिपत्यनिरूपणं च क्रियते । भानुक्षितिज- गुरवः = सूर्यमङ्गलवृहस्पतयः, नराकाराः = पुरुषग्रहा इति । शुक्रशशिनौ, वधूरूपौ = स्त्रीग्रहौ । मन्दशशिजौ = शनिबुधौ, षण्ढप्रकृतिपुरुषौ = नपुंसकग्रहौ भवतः । प्रयोजनम्—जन्मकाले प्रश्नकाले च बलवानात्मपक्षमेव करोति । अथ महाभूताधिपाः । सुराचार्य-ज्ञा-र-द्युमणिसुत-दैत्यारिसचिवाः वियतक्षोणीतेजः पवनपयसामेव पतयो भवन्ति । यथा-सुराचार्यः = गुरुर्वियतः = गगनस्याधिपतिः । ज्ञः = बुधः, क्षोण्याः = पृथिव्याः । आरः = मङ्गलस्तेजसः । द्युमणिसुतः = शनिः, पवनस्य = वायोः । देवानामरयो दैत्यास्तेषां सचिवो मंत्री = शुक्रः पयसः = जलस्याधिपतिरिति । सूर्याचन्द्रमसोस्तु विंशतितमे श्लोके वह्नम्बुन्युक्ते । प्रयोजनम्—स्वदशायां महाभूतच्छायां कुर्व्वन्ति ग्रहा इति ॥ २७ ॥ सूर्य मङ्गल और गुरु पुरुषग्रह हैं । शुक्र और चन्द्रमा स्त्रीग्रह हैं । शनि और बुध नपुं- सक हैं । गुरु आकाशतत्त्वका स्वामी, बुध पृथ्वीका, मङ्गल तेज का, शनि वायुका और शुक्र जलतत्त्वका स्वामी है ॥ २७ ॥ अथ ग्रहाणां कक्षाक्रमः । कक्षायां क्रमशो दिनेशतनयाज्ज्योतिर्भचक्राश्रिताः । छायाूसूनुगुरुक्षमाजदिनकृच्छुक्रेन्दुपुत्रेन्दवः ॥ २७½ ॥ इदानीं ग्रहाणां गतिद्योतकं कक्षाक्रमं निरूपयति । कक्षायां = स्वस्वभ्रमणमार्गे दिनेशन-
( १ ) सर्वेषु त्रयोऽपि गुणास्तिष्ठन्त्येव परं यस्मिन् यो गुणोऽधिको भवति स तद्गुणः कथ्यते । तेनात्र प्रधानपदोपादानमिति ।
ग्रहनामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥२॥ ३९ तनयात् क्रमशः = शनैश्चरादिक्रमेण छायासुनुगुरुक्ष्ममाजदिनकृच्छुकेन्दुपुत्रेन्दवः = शनि-बृह- स्पति-मङ्गल-सूर्य-शुक्र-बुध-चन्द्राः, ज्योतिर्भचक्राश्रिताः=ज्योतिषां = नक्षत्राणां, भचक्रे= राशिचक्रे, आश्रिताः = सङ्गताः भवन्ति । स्वस्वराशिचक्रे ( कक्षायां ) सर्वे ग्रहा भ्रमन्ति । तेषु सर्वोपरि शनिस्तस्याधो गुरुस्तस्याधो भौमस्ततो रविस्ततः शुक्रस्ततो बुधस्ततश्चन्द्रमा इति । तथोक्तं श्रीभास्कराचार्येण— “भूमेः पिण्डः शशाङ्ककविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षा” इति । अत्रेदमध्येवधेयम्—यः सर्वोपरिस्थस्तस्य गतिः सर्वाल्पा । यश्च सर्वाधःस्थस्तस्य सर्वा- धिका गतिरिति । यतः सर्वा अपि कक्षाश्चक्रकला-( २१६००' ) ङ्किता भवन्ति, तथा सर्वेषां ग्रहाणां योजनात्मिका गतिस्तुल्यैव— “पा दोनगोक्षधृतिभूमितयोजनानि ( ११८५८१८४ ), खेटा व्रजन्त्यनुदिनं निजवर्त्मनीमे” इति भास्करोक्तेः । तेन महत्कक्षायां तावति योजनेऽल्पसङ्ख्याः कला भवन्ति, लघुकक्षायां तावत्येव योजने बह्व्यः कला भवन्ति । तेन शनेः सर्वाधिककक्षायां सर्वाल्पा गतिश्चन्द्रस्य सर्वाल्पकक्षायां सर्वाधिका गतिरिति गतिविदां स्पष्टमेवातोऽलमतिविस्तरेण । उक्तञ्च तत्रभवता भास्करेण— “कक्षाः सर्वा अपि दिविषदां चक्रलिप्ताङ्कितास्ता वृत्ते लघ्व्यो लघुनि, महति स्युर्महत्यश्च लिप्ताः ॥ तस्मादेते शशिजभृगुजादित्यभौमेज्यमन्दा मन्दाक्रान्ता इव शशधराद्यान्ति यान्तः क्रमेण” ॥ इति ॥ २७३ ॥ कक्षाप्रदर्शनम्— अपनी २ कक्षाओंमें शनि आदि ग्रह ज्योतिष्चक्र ( नक्षत्र-राशि-मण्डल ) में लगे हुये भ्रमण करते हैं । सबसे ऊपर शनि, उसके नीचे गुरु, उसके नीचे मङ्गल, फिर
४० सटीकजातकापारिजाते- सूर्य, फिर शुक्र, फिर बुध, सबके नीचे (पृथिवीके ऊपर) चन्द्रमाकी कक्षा है। (सु० ज्ञा० कार) ॥ २७३॥ अथ सूर्यादीनां धातुविशेषादि । मज्जास्नायुवसाऽस्थिशुक्ररुधिरत्वग्धातुनाथाः क्रमाद् आरार्कीज्यदिनेशशुक्रशशभृत्तारासुताः कीर्तिताः ॥ २८ ॥ लवणकटुकपायस्वादुतिक्ताम्लमिश्राः शशिरविशनिजीवारामुरेज्यज्ञनाथाः ॥ अयनदिवसपक्षर्त्त्वब्दमासक्षणेशा रविकुजसितसौम्या मन्दजीवेन्दवश्च ॥ २९ ॥ इदानीं ग्रहाणां दैहिकधातवो रसाः समयाश्च निरूप्यन्ते । आरार्कीज्यदिनेशशुक्रश- शभृत्तारासुताः क्रमान्मज्जादीनां नाथाः कीर्तिताः । यथा-मज्जाया आरः भौमः । स्नायुषः आर्किः = शनिः । वसायाः ईज्यः = गुरुः । अस्थिनो दिनेशः = रविः । शुक्रस्य शुक्रः । रुधि- रस्य शशभृच्चन्द्रः । त्वचस्तारासुतः = बुधो नाथोऽधिपतिः कीर्तितः । प्रयोजनम्-जन्मनि यो ग्रहो बलीयांस्तद्धातुसारो जातको भवति । व्याधिप्रश्ने च तद्धातुकोपो वाच्य इति । अथ रसाः । शश्यादीनां लवणादयो रसाः । यथा-शशिनश्चन्द्रस्य लवणः । रवेः कटुः । शनेः कषायः । जीवस्य स्वादु = मधुरम् । आरस्य = मङ्गलस्य तिक्तम् । असुरे- ज्यस्य = शुक्रस्य आम्लम् । ज्ञस्य = बुधस्य मिश्राः षड्रसा इति । प्रयोजनम्-निषेक- काले यो बलीयान्ग्रहस्तदुक्तरसदोहदो भवति गर्भिण्यास्तथा प्रसूतिकाले प्रसूताया भोजन- ज्ञानमिति । अथ समयाः । सूर्यादीनामयनाद्यः । तत्र सूर्योऽयनपतिः (अयनं मासषट्कं तदर्धे द्वयं सौम्यायनं याम्यायनं च मकरकर्कटाभ्यामिति) । कुजो दिवसपतिः । सितः पक्षपतिः (पक्षः पञ्चदश दिनानि) । सौम्यः ऋतुपतिः (ऋतुर्मासद्वयम्) । मन्दोऽब्दपतिः । जीवो मासपतिः । इन्दुः क्षणपतिः (क्षणो घटीद्वयम्) भवति । प्रयोजनम्-प्रश्नकाले यस्य ग्रहस्य नवांशो लग्ने भवेत्स ग्रहस्तस्मात्नवांशाद्यावत्सङ्ख्ये नवांशके स्यात्तत्सङ्ख्यकायनादि- काले ग्रहस्य शुभाशुभफलपक्तिर्वाच्या इति ॥ २८-२९ ॥ मज्जा, स्नायु, वसा (चर्बी), अस्थि (
ग्रहानामस्वरूपगुणभेदाध्यायः ॥ २ ॥ ४१ क्षणमर्धदृष्टिर्भवतीत्यर्थः । चतुरस्रयुग्मे = चतुर्थाष्टमयोः पादोनदृष्टिनिश्चयस्त्रिपाददृष्टिरिति । अनङ्गगेहे=सप्तमस्थाने सम्पूर्णदृग्बलं = सम्पूर्णा दृष्टिर्भवति । सर्वेषामिति सर्वत्रान्वयः । अत्र दृष्टिविषये युक्तिरुच्यते—तृतीयं बन्धुस्थानं, दशमं पितृस्थानं च बन्धुपि- तरौ लोकाः सामान्येनावलोकयन्तीति ग्रहाणामपि तयोरल्पा दृष्टिर्भवति । ततोऽधिका दृष्टि- र्लोकानामात्मजे स्वभाग्येषु च भवतीति तथा ग्रहाणामपि पञ्चमे आत्मजस्थाने, नवमे भाग्य- स्थाने दृष्टिर्भवति । ततोऽप्यधिका दृष्टिर्लोकानां स्वीये सुखे स्वीय आयुषि च भवति तयोश्च- तुर्थाष्टमे स्थाने, तेन ग्रहाणामपि तथा भवति । ततोऽप्यधिकदृष्ट्या लोकाः स्वीयामर्द्धाङ्गिनीं पश्यन्ति, तत्स्थानं सप्तमं, ग्रहा अपि पूर्णदृष्ट्यावलोकयन्तीति किं चित्रम् ? ॥ ३० ॥ सभी ग्रह अपने २ स्थानसे ३।१० को एक चरणसे, दोनों त्रिकोण (५।९) को अर्ध (दो चरण) से, ४।८ को तीन चरणसे देखते हैं, और ७ वेंको चारों चरणसे देखते हैं । अतः ७ में सम्पूर्ण दृग्बल इनका रहता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥ ३० ॥ अथ रव्यादीनां दृष्टिविशेषे बलित्वम् । शनिरतिबलशाली पाददृग्वीर्ययोगे सुरकुलपतिमन्त्री कोणदृष्टौ शुभः स्यात् । त्रितयचरणदृष्ट्या भूकुमारः समर्थः सकलगगनवासाः सप्तमे दृग्बलाढ्याः ॥३१॥ इदानीं ग्रहाणां दृग्बलमुच्यते । शनिः पाददृग्वीर्ययोगेऽतिबलशाली भवति । यत्र ग्रहाणां पाददृष्टिर्भवति (स्वस्थानात्तृतीये दशमे च ) तद्बलयोगाच्छनैश्चरो बलीयान् भवति । अर्थात्तुतीयं दशमं च शनिः पूर्णदृष्ट्या पश्यति । सुरकुलपतिमन्त्री=बृहस्पतिः कोणदृष्टौ = नवमे पञ्चमे च या दृष्टिस्तस्यां शुभः स्यात् । नवमपञ्चमयोर्गुरोः पूर्णाः दृष्टिरि- त्यर्थः । भूकुमारः = मङ्गलस्त्रितयचरणदृष्ट्या समर्थो बलवान् भवति । चतुर्थेऽष्टमे च त्रिवर- णदृष्टिर्भवति, तयोर्भौमो बली । चतुर्थेऽष्टमे च भौमस्य पूर्णदृष्टिरिति । सप्तमे भावे (स्वस्था- नात्सप्तमे भावे ) सकलगगनवासाः=सर्वे ग्रहा दृग्बलाढ्या भवन्ति । सप्तमं भावं सर्वे ग्रहाः पूर्णं पश्यन्तीत्यर्थः । तथोक्तं सारावल्याम्— “पूर्णं पश्यति रविजस्तृतीयदशमं त्रिकोणमपि जीवः । चतुरस्रं भूमिसुतो द्यूनं च सितार्कशशिबुधाः क्रमशः” इति ॥ अथात्र युक्तिरुच्यते । पराक्रमं राज्यरक्षणं च भृत्यस्य कर्मेति तथाभूतो मन्द स्तयोः स्थाने तृतीयदशमे पूर्णं पश्यति । एवं विद्याधर्मौ गुरुणा सिद्ध्येते रक्ष्यते चेति तथा- भूतो गुरुर्विद्यास्थानं = पञ्चमं, धर्मस्थानं=नवमं च पूर्णं पश्यति । तथैव–सुखायुष्ययो रक्षणं नेतुः कर्मेति नेता मङ्गलो हि सुखस्थानं चतुर्थमायुःस्थानमष्टमं च पूर्णं पश्यति । जाया तु सर्वधामार्द्धाङ्गिनीति सर्वे ग्रहा जायास्थानं सप्तमं पूर्णं पश्यन्तीति युक्ततमम् ॥ ३१ ॥ एक चरण दृष्टिबलसे शनि बली होता है, अर्थात् ३ रे और १० वें भावोंमें शनिकी पूर्ण दृष्टि होती है । बृहस्पति कोणदृष्टि (५।९) में शुभ होता है, अर्थात् ५।९ भावोंको पूर्ण देखता है । मङ्गल तीन चरण दृष्टिसे बली है, याने ४ थे और ८ वें भावोंको पूर्ण देखता है । सभी ग्रह ७ वें भावमें पूर्ण दृग्बली होते हैं । यहां भावों की गिनती अपने २ स्थानसे करनी चाहिये ! (सु० ज्ञा० कार) ॥ ३१ ॥ अथ ग्रहाणामूर्ध्वादिवृष्टयः । अधोर्ध्वदृष्टी दिननाथभौमौ दृष्टिः कटाक्षेण कवीन्दुसून्योः । शशाङ्कगुर्वोः समभागदृष्टिरधोऽक्षिपातस्त्वहिनाथशन्योः ॥ ३२ ॥