काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( ३६ ) हनुमान जी के वेग जन्य वायु से समुद्र का जल आकाश में चला जाता था । नीचे तिमि, नक्र, बड़ी-बड़ी मछलियां बड़े-बड़े कच्छप ऐसे दिखाई देते थे जैसे कपड़ा हट जाने पर देह दिखाई देता है । 'तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा । वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ १७५ ॥ समुद्र में रहने वाले सर्पों ने आकाश मार्ग पर हवा में तैरते हुए हनुमान जी को देखकर गरुड़ समझ लिया । 'क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरङ्गमाः । व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ १७४ ॥' महाबली कपि श्रेष्ठ हनुमान समुद्र में जिस-जिस मार्ग से निकलते थे उधर- उधर ऐसा लगता था मानो जल के पनाले बह रहे हों । 'येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः । तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ १८०॥ इतना ही नहीं श्री वाल्मीकि ने समुद्र का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जैसा आज तक किसी कवि ने किया ही नहीं । वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक स्थान पर ही होगी' की कल्पना निस्सार है । क्योंकि रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है । परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई है । ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रामाणिकता की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है । महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया है । आज भी उसी मार्ग से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा हो जाया करती है । किष्किन्धा में बालि को मारकर राम ने चौमासा किया था । वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है । वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी
प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शंकायें उठायी गई हैं। जो सर्वथा निर्मूल हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्वपूर्ण घटना शूर्पणखा की नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण में दोनों स्थानों का आस पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का वाल्मीकि रामायण के वर्णन से सादृश्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ आठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही है। गोदावरी, कृष्णा, बरदा आदि नदियाँ, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं। समुद्र सम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकि रामायण में लंका जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धा (काण्ड ६७ सर्ग श्लोक ३८) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दर काण्ड ५६ सर्ग श्लोक २६) पर चढ़ना बताया गया है। इसी तरह सुवेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकि रामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र हजार वर्ष पुराना है जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित बाली के शव
( ३८ ) ... की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है । रामायण की संस्कृति, सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, बाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे । हनुमान जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे । वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तम् शरीरम्' इत्यादि वेद मन्त्र के अनुसार प्राचीन शवदाह का ही समर्थन किया गया है । अतः बाली एवं रावण के शवदाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था । शव को गाड़ने की कल्पना कथंचित् हो भी तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है । इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं माना जा सकता । उधर भारत में भी साधु, संन्यासी, संत, महात्मा इत्यादियों को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है, छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है । कहीं-कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क पुरुषों के शवों को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है । हमारे यहाँ शवों के संबंध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा हैं । अतः इनमें से किसी एक को किसी भाग विशेष की परम्परा नहीं माना जा सकता । जिस प्रकार किसी मुस्लिम बहुल प्रदेश में कब्रों को देख कर यह निर्विवाद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं । यह बात तत्का- लिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है । जहाँ तक वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थानों का प्रश्न है, वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है । वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिये जिन स्थानों का वर्णन किया है वह अत्यन्त सजीव तथा किसी भी अन्वेषण करने वाले के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकती है । प्रारम्भ में जो-जो घटनाएं जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लंका विजय के पश्चात् लौटते भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन किया है ।
( ३९ ) अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥ २२ ॥ एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥ सेतुबन्ध इतिख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् । एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥ एष सेतुर्मया वद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १७ ॥ कैलाश शिखराकारे त्रिकूटशखरे स्थिताम् । लंकामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥ यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता वलात् ॥ ४५ ॥ एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥ ( युद्ध काण्ड सर्ग १२३ ) इसी तरह हिरण्यनाभ पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२, ४४, शवरी मिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं शरभंग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृङ्गवेर- पुर ५२, इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है । इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक हैं । अब भी उन स्थानों की स्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्त्व पर किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है । डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकि रामायण को पूर्ण प्रामाणिक माना है फिर उसी ग्रंथ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता । ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अंग को पकड़कर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिये रख छोड़ने की घटना के समान है । लंका की स्थिति ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिये वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है । इस रामायण के अनु- सार लंका समुद्र से सौ योजन दूर थी । इन लोगों द्वारा पूर्वी मध्य प्रदेश,
( ३६ ) हनुमान जी के वेग जन्य वायु से समुद्र का जल आकाश में चला जाता था । नीचे तिमि, नक्र, बड़ी-बड़ी मछलियाँ बड़े-बड़े कच्छप ऐसे दिखाई देते थे जैसे कपड़ा हट जाने पर देह दिखाई देता है । 'तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा । वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ १७५ ॥ समुद्र में रहने वाले सर्पों ने आकाश मार्ग पर हवा में तैरते हुए हनुमान जी को देखकर गरुड़ समझ लिया । 'क्रममाणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरङ्गमाः । व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ १७४ ॥' महाबली कपि श्रेष्ठ हनुमान समुद्र में जिस-जिस मार्ग से निकलते थे उधर- उधर ऐसा लगता था मानो जल के पनाले बह रहे हों । 'येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः । तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ १८०॥ इतना ही नहीं श्री वाल्मीकि ने समुद्र का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जैसा आज तक किसी कवि ने किया ही नहीं । वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक स्थान पर ही होगी' की कल्पना निस्सार है । क्योंकि रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है । परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई है । ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रमाणिकता की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है । महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया है । आज भी उसी मार्ग से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा हो जाया करती है । किष्किन्धा में बालि को मारकर राम ने चौमासा किया था । वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है । वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी
( ३७ ) प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शंकायें उठायी गई हैं। जो सर्वथा निर्मूल हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा की नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण में दोनों स्थानों का आस पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का वाल्मीकि रामायण के वर्णन से सादृश्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ आठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही है। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियाँ, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं। समुद्र सम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकि रामायण में लंका जाते समय हनुमान का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धा (काण्ड ६७ सर्ग श्लोक ३९) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दर काण्ड ५६ सर्ग श्लोक २६) पर चढ़ना बताया गया है। इसी तरह सुवेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकि रामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकि रामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र ६ हजार वर्ष पुराना है जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णित बाली के शव
२. द्वितीय खण्ड: सौर, चान्द्र, नाक्षत्र काल-भेद एवं कर्मकाण्ड विनियोग
( ३८ ) दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है । रामायण की संस्कृति, सर्वथा वैदिक संस्कृति है । राम, रावण, बाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे । हनुमान जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे । वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तम् शरीरम्' इत्यादि वेद-मन्त्र के अनुसार प्राचीन शवदाह का ही समर्थन किया गया है । अतः बाली एवं रावण के शवदाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था । शव को गाड़ने की कल्पना कथंचित् हो भी तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है । इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं माना जा सकता । उधर भारत में भी साधु, संन्यासी, संत, महात्मा इत्यादियों को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है, छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है । कहीं-कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क पुरुषों के शवों को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है । हमारे यहाँ शवों के संबंध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा हैं । अतः इनमें से किसी एक को किसी भाग विशेष की परम्परा नहीं माना जा सकता । जिस प्रकार किसी मुस्लिम बहुल प्रदेश में कब्रों को देख कर यह निर्विवाद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं । यह बात तत्का- लिक ऐतिहासिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है । जहाँ तक वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थानों का प्रश्न है, वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है । वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिये जिन स्थानों का वर्णन किया है वह अत्यन्त सजीव तथा किसी भी अन्वेषण करने वाले के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकती है । प्रारम्भ में जो-जो घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लंका विजय के पश्चात् लौटते भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन किया है ।
( ३९ ) अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥ २२ ॥ एतत्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ॥ २० ॥ सेतुबन्ध इतिख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् । एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥ एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणार्णवे ॥ १७ ॥ कैलाश शिखराकारे त्रिकूटशखरे स्थिताम् । लंकामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥ यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता वलात् ॥ ४५ ॥ एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥ ४६ ॥ '( युद्ध काण्ड सर्ग १२३ ) इसी तरह हिरण्यनाभ पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२, ४४, शबरी मिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं शरभंग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृङ्गवेर- पुर ५२, इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक हैं। अब भी उन स्थानों की स्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्व पर किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है। डाक्टर साकलिया ने वाल्मीकि रामायण को पूर्ण प्रामाणिक माना है फिर उसी ग्रंथ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता। ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अंग को पकड़कर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिये रख छोड़ने की घटना के समान है। लंका की स्थिति ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिये वाल्मीकि रामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस रामायण के अनु- सार लंका समुद्र से सौ योजन दूर थी। इन लोगों द्वारा पूर्वी मध्य प्रदेश,
दक्षिणी बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं छोटा नागपुर के आस-पास लंका की स्थिति का जो निर्धारण करना है। उसके लिये अभी कोई प्रमाण भी नहीं है। आज भी लंका नाम से ही जब प्रसिद्ध द्वीप है तब फिर 'लक्का' को 'लंका' कहा होगा' यह कहने की आवश्यकता ही क्या है। यह नहीं कहा जा सकता कि लंका नाम की कोई चीज नहीं थी । वर्तमान श्री लंका भी हमारे मत में रावण की लंका नहीं है। इस लंका का दूसरा नाम सिलोन भी है। ग्रन्थों में इस सिंहलद्वीप को रावण की लंका से विभिन्न बतलाया गया है। भारतीय पौराणिक भूगोल के अनुसार आज की श्री लंका महाभारत का सिंहल द्वीप ही है। वास्तविकता यह है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित रावण की लंका सर्व साधारण के लिये आज लुप्त हो गई है। वहाँ दीर्घजीवी लोग रहते हैं। वे सामान्य व्यक्ति द्वारा नहीं देखे जा सकते । आधुनिक भूगोल वेत्ता भी यह मानते हैं कि सहस्राब्दियों में भूगोल में पर्याप्त परिवर्तन हो जाया करता है। यह मान्यता बहुसम्मत है कि जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले समुद्र था। स्वयं डाक्टर साकलिया ने यह माना है कि कुछ टीले ऐसे रहें होंगे जो इस समय आस्ट्रेलिया की ओर बढ़ गये होंगे। अतः रावण की लंका आध्यात्मिक एवं भौगोलिक दोनों कारणों से ही लुप्त हो गई है। लंका को मध्यप्रदेश अथवा इधर-उधर खोजना एक व्यर्थ का प्रयास है। वाल्मीकि रामायण की कतिपय घटनाओं को अप्रामाणिक मानने के लिये कुछ भी ठोस तर्क प्रस्तुत नहीं किये गये हैं। जहाँ तक रावण की जाति एवं संस्कृति का सम्बन्ध है, वाल्मीकि रामा- यण के अनुसार वह वैदिक संस्कृति में दीक्षित कर्मनिष्ठ ब्राह्मण था। वह परम तपस्वी पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा मुनि का पुत्र था ! आज भी भारत में पुलस्त्य गाँव प्रचलित है। इन प्रमाणों के रहते हुए भी उसे दूसरी जाति का व्यक्ति मानने की निराधार कल्पना करना सर्वथा अनुचित है। यह सही है कि वाल्मीकि रामायण की कथाएँ युगों से गायी जाती रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि उन कथाओं में प्रमाण विरुद्ध अंश आ जाय तो उसमें कुछ कल्पना का अंश आ सकता है। पर इन कथाओं में ऐसी कोई प्रामाणि-
( ४१ ) विरुद्ध बात नहीं पाई गई है। इसके विपरीत युग से प्रचलित इन कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकि रामायण की प्रामाणिकता के लिये सबसे बड़ा आधार है। हमारे यहाँ वेदों की आचार्य परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य सम्प्रदाय परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्य परम्परा से ही रामायण तथा पुराण की भी रक्षा होती रही है। इसीलिए रामायण में यदि कोई नयी चीज प्रवृष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक की संज्ञा दे दी गयी। वाल्मीकि रामायण के टीकाकारों ने तत्तत्क्षेपकों को न मानने का यही आधार बताया कि 'इनकी सम्प्रदाय प्राप्त व्याख्या नहीं है' अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। बस; इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण ही वाल्मीकि रामायण के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह कहना ठीक नहीं है कि वाल्मीकि रामायण की कथाओं में कालान्तर में व्यापक काट छांट किया गया। रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। महाभारत एवं काव्यों में तथा कालिदास, अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन ग्रन्थों में रामायण का वर्णन है पर वह प्रामाणिक नहीं। इस लिये इनके आधार पर राम कथाओं के भिन्न रूप बने भी हैं पर वाल्मीकि रामायण में जो इसकी चर्चा है वही प्रामाणिक है। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी राम कथा के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण को ही सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय संस्कृति का संदेशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथा सागर में युगों से भारतीयों को गोता लगवाता हुआ आज भी प्रत्येक भारतीय को उसमें गोता लगा कर अपने जीवन को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे रहा है। ऐसे प्रामाणिक ग्रन्थ को छोड़ कर निराधार कल्पना के सहारे नयी खोजों का दावा करना बौद्धिक स्तर से नीचे उतरने की बात है। आधुनिक लोग वाल्मीकि रामायण के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लंका इन पाँच काण्डों को प्रामाणिक मानते हैं और कहते हैं कि इनमें राम
( ४२ ) को भगवान् का अवतार नहीं माना गया, पर वाल्मीकि रामायण में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही राम को विष्णु का अवतार माना गया है । अतः राम को गुप्त काल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया गलत है । उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण प्रामाणिक हैं । भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता । किसी मान्य ग्रन्थ के कुछ अंश को प्रामाणिक तथा कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग इस समय अत्यावश्यक है । सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का प्रयास करना चाहिए । धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण पैदा हो जाता है । हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो । रामायण की घटनाओं के विषय में धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देशक होना चाहिए । कालनिर्धारण में पूर्वाग्रह अनुचित यद्यपि मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद अनादि हैं, अनादि काल से ही हम लोगों के पूर्वज उन्हें अपौरुषेय मानते आये हैं, मीमांसादि शास्त्रों में इनकी अनादिता अपौरुषेयता बड़े समारोह से सिद्ध की गई है, तथापि मेक्समूलर, प्रो० वेण्टली, प्रो० बायो, प्रो० वेबर, प्रिसिपल थीबो, म० म० सुधाकर द्विवेदी, लोकमान्य तिलक, पं० शंकर बालकृष्ण दीक्षित, ज्योतिर्विद् केतकर आदि ने वेदों का निर्माण काल ६ हजार वर्ष माना है । गोडबोले, लेले, आदि इससे अधिक चौबीस हजार वर्ष आगे बढ़े हैं । पुरातत्त्वज्ञ दास बाबू ८० हजार वर्ष वेद काल मानते हैं ।
( ४३ ) हड़प्पा मोहनजोदड़ो आदि की खुदाई में उपलब्ध एक के नीचे दूसरा, तीसरा नगरनिर्माण और उसमें मिली हुई वस्तुओं की छानबीन करने से उसका काल १५ हजार वर्ष प्राचीन बताया जाता है। इससे भारतीय संस्कृति अति प्राचीन सिद्ध होती है। इसी से उसके साहित्य की भी प्राचीनता सिद्ध होती है। साहित्य कितना प्राचीन है इसका निर्णय भी उन्हीं साहित्य ग्रन्थों के अन्तःसाक्ष्य एवं घटनाओं से होना चाहिए। वेद काल निर्णय के लेखक पण्डित दीनानाथ चुलेट के अनुसार कात्यायन श्रौतसूत्र, पारस्कर गृह्यसूत्र एवं शुल्वसूत्र के भाष्यकार कर्कचार्य का काल वर्तमान से पन्द्रह हजार वर्ष पूर्व है। कहा जाता है कि बसन्त सम्पात (बसन्त- ऋतु का आगमन) सर्वदा एक नक्षत्र पर नहीं होता, किन्तु सभी नक्षत्रों पर बसन्त गति से घूमता हुआ पच्चीस हजार आठ सौ वर्षों अथवा २६ हजार वर्षों में उसी नक्षत्र पर आ जाता है, जहाँ से प्रारम्भ हुआ है। जैसे यदि इस उत्तराभाद्रपद के द्वितीय चरण पर बसन्त सम्पात हुआ है तो २६ हजार वर्ष बाद फिर उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के द्वितीय चरण पर आयेगा। बावन हजार वर्ष पहले भी उसी पर बसन्त सम्पात निश्चित है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूर्व पश्चिमी आदि दिशाओं के निर्णय के लिए समस्थल पर बारह अंगुल का शङ्कु खड़ा करके बारह अंगुल की रस्सी से शङ्कु के चारों ओर वर्तुलाकार लकीर बनाने से वृत्त बनता है। उसका नाम है त्रिज्यावृत्त। दिन के दूसरे पहर में (अर्थात् नव बजे के आस पास) जब शङ्कु की छाया का अग्रभाग त्रिज्या वृत्त के भीतर आने के लिए त्रिज्या वृत्त के जिस अंश का स्पर्श करता है वही है पश्चिम दिशा। इसी तरह तीसरे पहरे के अन्त में शङ्कु की छाया का अग्रभाग त्रिज्यावृत्त को पार करने के लिए त्रिज्यावृत्त के जिस अंश का स्पर्श करता है वह पूर्व दिशा। त्रिज्यावृत्त के दोनों छायास्पर्शी अंशों को मिलाने वाली रेखा का नाम पूर्व पश्चिम रेखा है। साल भर में छः-छः महीने बाद दो दिन ऐसे आते हैं जिनमें सूर्य का उदय और अस्त इस पूर्व पश्चिम रेखा पर होता है। उदय होने का क्रम शनैः शनै दक्षिण की ओर बढ़ते-बढ़ते जिस दिन पूर्व-पश्चिम रेखा पर उदयास्त होता है
( ४४ ) उस दिन शरद् सम्पात (अर्थात् शरद् ऋतु का प्रारम्भ) और क्रमशः उत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते जिस दिन उदयास्त पूर्व पश्चिम रेखा पर होता है उस दिन वसन्त सम्पात (वसन्त का प्रारम्भ) होता है । ‘समे शंकुं निखाय शंकुसम्मितया रज्ज्वा मण्डलं परिलिख्य यत्र लेखयोः शंक्वग्रच्छाया निपतति तत्र शंकुं निहन्ति सा प्राची’ (शुल्ब सूत्र २) इस सूत्र का भाष्य करते हुए कर्काचार्य लिखते हैं—“दक्षिणायने तु चित्रां यावदादित्य उपसर्पति उदगयने स्वातीमेति, विषुवतीये त्वहनि चित्रा स्वात्योर्मध्य एवोदयः । अतस्तन्मध्ये शंकुगतैवच्छाया भवति । एवञ्च सति अहरन्तरेषु सैव प्राची न भवतीत्यत्रोच्यते । ‘तं प्राञ्चमुद्धरति’ इत्यनेन प्राच्युद्धरणे कृते अनेकाहसाध्येऽपि कर्मणि तदेवोद्धरणमित्यहरन्तरे दोषो न भवति ।’ अर्थात् सूर्य चित्रा पर जब तक रहते हैं तब तक दक्षिणायन रहता है । स्वाती पर पहुँचने पर उत्तरायण हो जाता है । अर्थात् स्वाती नक्षत्र पर पहुँचने तक दक्षिणायन रहता है । जब सूर्य चित्रा को पार कर जाता है और ‘स्वाती पर नहीं पहुँचता; इस चित्रा स्वाती के मध्य के काल में ठीक पूर्व पश्चिम रेखा पर उदयास्त होता है । इस कारण उस दिन द्वादशांगुल शंकु की छाया से साधी हुई पूर्व पश्चिम की रेखा शंकु को पार कर जाती है । अन्य दिनों में भी शंकु की छाया के अग्र भाग के मण्डल में प्रवेश निर्गम चिह्नों से पूर्व पश्चिम रेखा होती है किन्तु वह शंकु को पार नहीं करती । साल भर में जिस दिन सूर्य चित्रा स्वाती के मध्य में आता है उस दिन के सूर्योदय से साधित की हुई प्राची अन्य दिनों में भी उपयुक्त होती है । कर्काचार्य के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि उनके समय में वसन्त सम्पात ठीक चित्रा स्वाती के मध्य में हुआ करता था । क्योंकि वसन्त सम्पात के दिन ही सूर्य का उदयास्त पूर्व पश्चिम रेखा पर होता था । यद्यपि उस दिन शरद् सम्पात भी कहा जा सकता है तथापि इस प्रसङ्ग में ‘उदगयने स्वातीमुपैति’ (उत्तरायण में स्वाती पर पहुँचते हैं) इस वचन के अनुसार उत्तरायण के प्रसङ्ग में वसन्त सम्पात ही हो सकता है । इसके अतिरिक्त इसी प्रसङ्ग में ‘विषुवतीये त्वहनि चित्रास्वात्योर्मध्य एवोदयः’
( ४५ ) विषुवत् वाले दिन चित्रा स्वाती के मध्य में ही उदय होता है) इस भाष्य के अनुसार 'विषुवतीय' शब्द से भी यही प्रतीत होता है कि चित्रा स्वाती के मध्य में सूर्य के उदय-अस्त का दिन वसन्त सम्पात ही है । क्योंकि जब उस दिन रात समान होते हैं उसी को विषुवतीय दिन कहा जाता है । यह शरद् सम्पात और वसन्त सम्पात में ही होता है। कारण उस दिन क्रान्ति वृत्त (जिस पर सूर्य चन्द्र आदि ग्रह घूमते हैं) पर घूमते-घूमते सूर्य विषुवत् वृत्त (दैनिक भ्रमण के लिए निश्चित मार्ग) पर आता है। उत्तर गोलार्ध से दक्षिण गोलार्ध पर जाते समय सूर्य के विषुवत् वृत्त पर पहुँचने पर शरद् सम्पात और दक्षिण गोलार्ध से उत्तर गोलार्ध की ओर जाते समय सूर्य के विषुवत् वृत्त में पहुँचने पर बसन्त सम्पात होता है । पर यह स्थिर नहीं होता, सूर्य विषुवत् वृत्त में एक स्थान पर न काटकर कुछ पीछे हटते हुए सम्पात पर आता है। इसी को अयन चलन कहा जाता है। इसीलिए वर्तमान की अयन गति के गणित से बसन्त सम्पात को अपने स्थान पर आने में लगभग २६ हजार वर्ष बीतते हैं। तथा च उत्तर की ओर बढ़ते हुए सूर्य के उदय होने के क्रम में जो विषुव दिन होता है वह बसन्त सम्पात का ही माना जाता है, शरद् सम्पात का नहीं। इस विचार के अनुसार कर्काचार्य का समय पन्द्रह हजार वर्ष प्राचीन है। फिर कात्यायन श्रौतसूत्रादिकों का समय उससे अति प्राचीन होगा। वेदों का समय क्या कहा जाय, वे तो अनादि काल से प्रवृत्त हैं। वेदार्थ के उपबृंहण के लिए रामायण और महाभारत की रचना हुई है। अतः उनके निर्माण काल के विषय में विचार करना आवश्यक है। मनु, व्यास और जैमिनि की दृष्टि में तो मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। स्वयं वेद की दृष्टि में भी वेद नित्य और अनादि हैं। जैसा कि इन वचनों से स्पष्ट होता है। 'वाचा विरूप नित्यया' (ऋ० सं० ८।७५।६) 'पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः' (तै० ब्रा० ३।१२।९।२ ) 'अत एव च नित्यत्वम्' (ब्र० सू० १।३।२९) 'शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' (ब्र० सू० १।३।२८) 'आख्याप्रवचनात्' (जै० सू० १।१।३०) ।
( ४६ ) अतः किसी के कालनिर्धारण में एक सीमा निर्धारण करके उसी दायरे में सोचना बुद्धिमानी नहीं है । उपसंहार इस प्रकार इस छोटे से लेख में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण और श्रीमहा- भारत संहिता का काल निर्णय आस्तिकों की दृष्टि से किया गया है । जो वस्तु जिसकी होती है उसका रहस्य भी उसी पद्धति से जानने पर मिलता है, अन्यथा जो कुछ किया जाता है उसमें विपरीत फल ही निकलता है । वेदशास्त्र आदि हम लोगों को अनादि वंशपरम्परा से अनादि अपौरुषेय ही घोषित आ रहे हैं। यदि उद्धरण वाली पद्धति ही लें तो श्रीमन्महाभारत में वाल्मीकीय रामायण का उद्धरण है, यथा— अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । न हन्तव्यः स्त्रिय इति यद्ब्रवीषि प्लवङ्गम ॥ ६७ ॥ सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात्कर्त्तव्यमेव तत् ॥ ६८ ॥ ( म० भा० द्रोणपर्व १४३ ) यह श्लोक श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के युद्ध काण्ड में ८१ सर्ग का २८ वाँ है । ‘रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ।’ ( म० भा० वनपर्व १४७।११ ) इसी प्रकार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में मनुस्मृति का उद्धरण है । ‘श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ । गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥ राजभिर्धृतदण्डांश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥
( ४७ ) शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजत्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्विषम् ॥ ३२ ॥' ( श्री वा० रा० कि० का० १८. ) कुछ हेर-फेर से ये श्लोक मनुस्मृति में मिलते हैं । 'शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते । अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ॥ ३१६ ॥ राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१८ ॥ ( मनुस्मृति अध्याय ८ ) श्री मद्वाल्मीकीय रामायण चौबीसवें त्रेता में भगवान् श्रीराम के अवतार के समय बना है और मनुस्मृति इस वैवस्वत मनु के पहले जबकि ६ मनु और बीत चुके हैं। इसे सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु के उपदेश से भृगु ने निर्माण किया है। उद्धरण की प्रक्रिया के अनुसार मनुस्मृति का काल सृष्टि के प्रारम्भ से ही होने के कारण वर्तमान संवत् २०३५ तक १ अरब ९५ करोड़ ८८ हजार ७९ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। वस्तुतः दैव असुर दो प्रकार के भूतसर्ग बराबर ही चला करते हैं तथा सृष्टि प्रक्रिया भी पूर्ववत् ही चला करती है। यह श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है— 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।' ( श्री० म० भा० गी० ८।१९ ) अतः आस्तिकता-नास्तिकता दोनों ही सिद्धान्त अनादि काल से ही प्रचलित हैं। नया कोई सिद्धान्त नहीं है। इसी सृष्टि से श्री मद्वाल्मीकीय रामायण में बुद्ध का नाम आना असमञ्जस नहीं है। वेदों में भी 'कथमसतस्सज्जायेत' आदि कहकर इस असद्वाद ( शून्यवाद ) का खण्डन किया है। इस समय श्रीकृष्ण द्वैपायन द्वारा निर्मित पुराण उपलब्ध हैं, किन्तु इसके पहले भी ब्रह्मा जी द्वारा प्रोक्त पुराण थे। उनकी चर्चा वेदों और वाल्मीकीय रामायण में है।
( ४८ ) अतः सभी वेद और वेदानुसारी आर्ष धर्मग्रन्थ भगवद्रूप ही हैं— ‘काव्यालापाश्च ये केचित् गीतकान्यखिलानि च । शब्दमूर्तिधरस्यैतद्वपुर्विष्णोर्महात्मनः ॥ ( वि० पु० १।२२।८४ ) वे सभी सृष्टि के आरम्भ से ही प्रवृत्त हैं । पाश्चात्यों द्वारा उठाई गयी प्रक्रिया अधकचरी है । उस प्रक्रिया से तत्त्व निर्णय नहीं हो सकता । महाभारत युद्ध महाभारत युद्ध कब प्रारम्भ हुआ और कब उसका अन्त हुआ ? भीष्म- पितामह कितने दिनों तक शरशय्या पर आसीन रहे ? अभिप्राय यह कि उनका निर्वाण संग्राम की समाप्ति और शरशय्या की प्राप्ति के कितने दिन बाद हुआ, ये सब विचारणीय प्रश्न हैं । महाभारत और उसके रचनाकाल के सम्बन्ध में आधुनिक विचारकों ने बड़े ही समारोह के साथ विचार प्रारम्भ किया है । उनकी प्रामाणिकता पर महाभारत के सर्वथा अनुरूप विचार अपेक्षित है । यह स्मरण रखना आवश्यक है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मभूमि-कुरुक्षेत्र में युद्धारम्भ से पूर्व विषादग्रस्त अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह श्रीमद्भगद्- गीता नाम से महाभारत में प्रसिद्ध है । अतः महाभारत युद्ध के आरम्भ की और गीता-जयन्ती की तिथि एक ही होनी चाहिये । श्रीमहाभारतकार ने ‘महाभारत युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य- काल में’ कलि का प्रवेश माना है— ना धर्म्यम भवत् तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ॥ कलिमासन्नमाविष्टं निर्वास्य नृपनन्दनः । भ्रातृभिः सहितो धीमान् बभौ धर्मबलोद्धतः ॥ ( अश्वमेध० ९४।१९-२० )
( ४९ ) "धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य में कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुष सिंह ! जैसे सत्ययुग में समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापर में भी हो गयी थी।" "कलियुग को समीप आया देख बुद्धिमान नृपनन्दन युधिष्ठिर उसका निर्वासन कर भाइयों के साथ धर्मबल से अजेय होकर शोभा पाने लगे।" भीमसेन द्वारा अनीति पूर्वक आघात से दुर्योधन के पराजित होने पर क्रुद्ध श्रीबलराम को समझाते हुए 'प्राप्तं कलियुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च।' (शल्य० ६०।२५) श्रीकृष्ण भगवान् के इस वचन से युद्धकाल में कलियुग के प्रवेश का प्रभाव विदित होता है। साथ ही— अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ( महा० आदि० २।१३ ) इन श्लोकों के अनुशीलन से महाभारत युद्ध के वर्ष का संकेत प्राप्त है। युद्धारम्भ और युद्धान्त के संदर्भ में सप्ताह के सात दिनों में किसी भी दिन का उल्लेख महाभारत में नहीं है, अतः दिन की दृष्टि से विचार असम्भव है। 'शरदन्ते हिमागमे' ( उद्योग० ८३।६, ७), 'निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे।' ( शान्ति० ४७।३ ), 'विनिवृत्ते दिनकुरे प्रवृत्ते चोत्त्- रायणे।' ( अनुशासन० १६६।१४ ) । इन स्थलों में हेमन्त एवं दक्षिणायन का उल्लेख स्पष्ट ही 'अयन' को सिद्ध करता है। युद्ध के सन्दर्भ में शरद् का अन्त, हेमन्त का प्रारम्भ, कौमुद (कार्तिक) मास का उल्लेख निश्चय ही उपयोगी है। ४
'पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' (भीष्म० ग२३), 'कृष्ण चतुर्दशीम्' (भीष्म पर्व ३।३३), 'अमावास्यां त्रयोदशीम् (भीष्म० ३।३२) 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्मावास्या भविष्यति' (उद्योग० १४२।१८) 'त्रिभाग शेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति' (अनुशासन० १६७।२८) में कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष का स्पष्ट उल्लेख पक्ष निर्णय में उपयोगी है। इन्हीं वचनों से तिथि का भी निर्देश प्राप्त होता है। रेवती, ऐन्द्र (ज्येष्ठा), श्रवण, पुष्य, अनुराधा नक्षत्र के उल्लेख भी तिथि निर्णय के साथ ही तिथि निर्णय में भी उपयोगी हैं। 'सप्तमाच्चापि दिवसात्' (उद्योग० १४२।१८), 'चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च' (शल्यपर्व ३४।६), 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' (अनुशासन० १६७।२७), 'अष्टादशाभवत्' (आदि० २।३८१) आदि वचन दिन संख्या के द्योतक हैं। इस तरह महाभारत युद्धकाल का निर्णय करते समय वर्ष, अयन, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र और दिन संख्या की दृष्टि से विचार कर्तव्य है। पृष्ठभूमि भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के दूत और नायक होकर हेमन्त ऋतु के शुभागमन पर कौमुद मास (कार्तिक) रेवती नक्षत्र में उपप्लव्य नगर से हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान किया— ततो व्यपेततमसि सूर्ये विमलवोद्गते । मैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृदर्चिषिदिवाकरे ॥ कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे । स्फीतसस्य सुखे काले कल्पः सत्त्ववतां वरः ॥ (महा० उद्योग० ८३।६,७) "उसके बाद जब रात्रि का अन्धकार दूर हुआ और निर्मल आकाश में सूर्यदेव का उदय होने पर उनकी कोमल किरणें सब ओर फैल गयीं, कार्तिक मास के रेवती नक्षत्र में मैत्र नामक मुहूर्त उपस्थित होने पर सत्त्वगुणी पुरुषों में श्रेष्ठ एवं समर्थ श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की। उन दिनों शरद ऋतु
( ५१ ) का अन्त और हेमन्त का आरम्भ हो रहा था। सब ओर पर्याप्त उपजी हुई खेती लहलहा रही थी।'" यद्यपि उपप्लव्य से चलकर रात्रि विश्राम वृकस्थल में वर्णित है (उद्योग पर्व ८४।१५-२३)। वृकस्थल उन पाँच गाँवों में एक था, जिनके मिल जाने पर पाण्डव बिना युद्ध के भी सन्तुष्ट हो सकते थे— अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दीं वारणावतम्। अवसानं भवेत्तत्र किञ्चिदेकं च पञ्चमम्॥ (उद्योग० ३१।१९) पुनः रात्रि बीतने पर हस्तिनापुर पहुँचने का उल्लेख है (उद्योग० ८५। १६-१८; ८६।१), फिर विदुर जी के घर में रात्रि विश्राम का वर्णन है (उद्योग० ९१।४१)। तत्पश्चात् प्रातः से सायं तक कौरव-सभा में असफल शान्तिवार्ता का निरूपण है। उसी दिन श्रीकुन्तीदेवी से पाण्डवों के लिये युद्ध की आज्ञा प्राप्त कर तथा कर्ण को एकान्त में कौन्तेय बताकर उनसे पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने के अनुरोध का वर्णन है। अन्त में कर्ण के अस्वीकार करने पर भीष्म, द्रोण, शल्य एवं दुर्योधन के प्रति युद्धारम्भ सम्बन्धी सन्देश की घोषणा है— सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति। संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्॥ (उद्योग० १४२।१८) “आज से सातवें दिन अमावास्या होगी। उसके देवता इन्द्र कहे गये हैं। इसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय।” तत्पश्चात् उपप्लव्य आकर पाण्डवों और समुपस्थित राजाओं को सन्देश सुनाकर रात्रि विश्राम का वर्णन है। इस तरह उपप्लव्य से चलकर पुनः उपप्लव्य लौट आने तक तीन दिनों ही विवरण प्राप्त होने पर भी पाण्डवों से भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कथित