कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानस्थितिबोध
( ८७ )
अब प्रभु मोपर दया हि कीजे । भेद अमीको मो कहिदीजे ॥
अमी अंक केहि कारण कीन्हा । वह तो अंक मोर नहि चीन्हा ॥
सो प्रभु मोकहैं देहु चिन्हाई । अंक विस्तार कहो समुझाई ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि तुम विनती अनुसारी । सोई भेद अब कहो विचारी ॥
ज्ञान स्थिति हम कीन्ह बखानी । जाते भई सकल उत्पानी ॥
जबहि देह धरी प्रभु आई । अमी अंक है अंक बनाई ॥
अशर नाम देह धरि आई । अंक यही मैं कहो बुझाई ॥
स्थूल धरो साहिब यहि कारण । बिन अस्थूल न वस्तु उचारन ॥
मूलहि अंक विदेह विचारा । देह धरी नामहि संचारा ॥
जो नहि होत नाम परभाऊ । तो सब जगतकाल धरिखाऊ ॥
जोकहैं लेइ नाम टकसारा । देह छूटी जाय पुरुष दुवारा ॥
जबही नाम लेतहैं हंसा । तबही काल मरत है संसा ॥
तारण हंस देहमें धरहूँ । यमको मारि मुक्ति मैं करहूँ ॥
नाम प्रताप सबै कछु भाखा । सुमिरत हंस बोल हम राखा ॥
साखी—हंस उबारन नाम यह, कहैं कबीर बखानि ।
जाय जीव सतपुरुष घर, धरमराय पछितानि ॥
चौपाई
अमी अंक जब ही प्रभु कीन्हा । उत्पति सकल ताहि हम दीन्हा ॥
पुछुप दीप सब दीप निवासा । तीन लोक याते परकाशा ॥
स्वर्ग पताल भयो पुनि सबही । अमी अंक पुरुषहि किय जबही ॥
चन्द्र सूर्य सकलहि विस्तारा । अमी अंक सो भयो संसारा ॥
अमी अंक दोइ रूप बनावा । पुरुष शक्ति सो नाम कहावा ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश विचारा । अमी अंक ते सब संसारा ॥
अमी अंकके गुण हैं ऐसे । सोरह सुत उत्पत भये तैसे ॥
अमी अंक जब नाहीं कीन्हा । तबही सुनहि शब्दमें चीन्हा ॥
( ८८ )
बोधसागर
सोही अंक कही अब तुमसों । अंक प्रभाव सुनो तुम हमसों ॥
अमी अंक तुम राखि छिपाई । सुरतिवंत कहैं देहु लखाई ॥
अंक बिना पारस नहिं जोई । पारस बिना मुक्ति नहिं होई ॥
पारस लोहा कंचन सोई । पारस विन पहुँचे नहिं कोई ॥
पारस परस गुरु शिर नावा । गुरु पारस परसे सतभावा ॥
सार शब्द है बीजक ध्याना । पारस आहि मूल रथाना ॥
तब सुकृत मिलि सत्य समाना । सत्य शब्द निश्चय करिजाना ॥
सिखापन मानि पुरुषकर लीन्हा । बलि तुम्हार हम पारस दीन्हा ॥
नाम तुम्हार न धोखे डारों । घट भीतर सो कबहुँ न टारों ॥
साखी—सब धोखा कौ मेटिके, पारस परसे संत ।
कबीर कहै धर्मदाससो, मेटों भवका अंत ॥
धर्मदास
धर्मदास चित बहुत हुलासा । ज्यों रविउदय कमल परकाशा ॥
दयासिन्धु पूरण गुरु स्वामी । कीन्ह कृतारथ अन्तर्यामी ॥
अविचल नाम मोहिं कहदीना । सकल जीव आपन कर लीन्हा ॥
जो जिय नाम तुम्हारा पावै । अवागमन रहित घर जावै ॥
साहेब कहिये शब्द विचारी । जाते छूटै भ्रमकी बारी ॥
अन्त समै बालक कर आही । तब यम सूझ परै कहि नाही ॥
समय साधिबालक नहिं जानैं । कैसे बाचै जीव आपनै ॥
यमकी घरी पहुँचे जब आई । तहाँको भेद कहों समुझाई ॥
वह बाचै यम जाइ हँराई । कष्ट परै सब सुधि बिसराई ॥
जड़ चेतनको है यह चारो । कैसे भवसे होत उबेरो ॥
सद्गुरु वचन
पुरुष अंश सुकृत तुम आगर । भलमति पूछब धर्मनि नागर ॥
सो समुझाइ कहुँ तोहि रंगू । जाहि रंगभौ यमको अंगू ॥
ज्ञानास्थितिबोध
( ८९ )
जब आवै बालकके पाहा । पलटे देह धरै निजु नाहा ॥
भक्तिरूप धरि आवै सोई । मस्तक श्याम फेर नहिं होई ॥
जब जिय नाम करै सम्भारा । तब यमकी जड़ होवे छारा ॥
शब्द सिंधुमें रहै समाई । तहांयम कबहु निकट नहिं आई ॥
शब्दविचार बारि टढ़ करहीं । मूल हंस रखवारी धरहीं ॥
जब फिर चाहे करन पयाना । अग्रज नाम करी संधाना ॥
साखी-वंश छांय बीरा लिखो, नाम सन्धि चित लाय ।
कहै कबीर निःशंक हो, हंस लोक कहैं जाय ॥
जब सठहार चले लै हंसा । सत सिंधु पहुँचत गइ संसा ॥
सत सिंधु आसन जो करहीं । हृदय रूप हंसा सब धरहीं ॥
आगे लेन हंस तहैं आवहि । आरति साजि चीर पहिरावहि ॥
कुशल क्षेम पूछे सब कोई । यमकी लज्जा किहि विधि खोई ॥
कहि प्रसाद आइ यदि ठाऊं । केहिं करनी पहुँची इहिं गंजि ॥
तबै हंस उठि बोले बैना । गुरुप्रसाद पाया निज नैना ॥
गुरु मोहि वह नाम सुनाई । तेहि प्रताप आये इहि ठाई ॥
तबही हंस पुरुष सौ कहई । हंसन चाह दर्शकी अहई ॥
साखी-नाम महात्म कबीरको, तेहि प्रसाद सो आइ ।
बिनय करत अभिलाष चित, पुरुषहि दरस कराइ ॥
चौपाई
पुरुष बुलाइ हंस कह लीन्हा । हंसन सकल डण्डवत कीन्हा ॥
दीन सिंहासन क्षत्र जु धरहीं । हंस सुजन जन दर्शन करहीं ॥
सिंहासन बैठी सुख पावा । शब्द अहार पुरुष संग आवा ॥
जन्म मरनकी भूख बुझाई । सब सुख भुगते अग्र अघाई ॥
निरंजन सुख सुधि नहिं पावा । ब्रह्मा विष्णु बैठि पछितावा ॥
वहतो हंस कहाँ उड़ि गयऊ । आदि अंत काहू नहिं लयहू ॥
( ९० )
बोधसागर
सारखी—यह सुख ज्ञान स्थितहिमें; जो कोइ भुगते आय ।
धन्य भाग्य वा हंसके, कहै कबीर समुझाय ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनवै करजोरी । देह विदेह कहिब कछु थोरी ॥
कवने कमल उठत है बानी । कवने कमल शब्द सहिदानी ॥
कवने कमल मूल अस्थाना । कवने कमल सुरति पहिचाना ॥
कवने कमल ब्रह्मालिय वासा । कवन कमल है जीव निवासा ॥
सद्गुरु वचन
अक्षय कमल सुशब्द उचारी । सुरति कमल वानी अनुसारी ॥
श्वेत कमल निर्गुण अस्थाना । भँवर गुहा मूलहि पहिचाना ॥
कंबु नाल मूलके पास । तहवां ब्रह्म लीन है बासा ॥
अष्टकमलते उठे जो बानी । कुसुमहि दल ताके परवानी ॥
बंकहि नाल बंक है घाटा । जो हंसा चीन्है वह बाटा ॥
सारखी—बंक नालनी नवरिके, भिन्न भिन्न कर लेख ।
भँवर गुहामें पैठिके, घरियारी कर पेख ॥
सुरति कमलके बीचमें, सद्गुरुको विश्राम ।
सहस्र जाप अजपा कही, पूरुषको निज धाम ॥
चौपाई
द्वान्छ कमलमें झिलमिल तारा । अलख सरूपहिको विस्तारा ॥
विषम सरोवर है तेहि ठाई । मान सरोवर परै रहाई ॥
मान सरोवर दहिनो देही । सद्गुर पंथ तहां हो लेही ॥
आप कमल तेहिकहीं बखानी । विरले जन कीन्हहीं पहिचानी ॥
पारब्रह्म बस अधर अटारी । जगमग ज्योति जहां उजियारी ॥
हीरा रतन जटित बहु भांती । लाल अमोल गने को पांती ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९१ )
रत्न कमल पै सत्य विराजे । हिरमर हंस संग बहु छाजे ॥
गोरख दंत पहुँचि नहिं कोई । पारब्रह्म अस भवन है सोई ॥
ये सब अटकहिं सुनि मंझारा । सत्य पुरुष नहिं कीन्ह विचारा ॥
चउदा कमल महुं सुत्र विराजे । द्वादश कमल गगन धुनि गजै ॥
भर्म भूलि अटके तहां ज्ञानी । भर्महिं भर्म भर्म लपटानी ॥
सुर नर मुनि पवनहि अवराधे । सिद्धहु बारे उनमनि साधे ॥
नाभी मण्डल पवन किवारा । तहैं लगि गमी कीन्ह टकसारा ॥
हमरा घर कहैं विरलन बूझा । ऊर्ध्व कमलका पंथ न सूझा ॥
साखी-सुरति कमलपर बैठिके, अमी सरोवर चाखि ।
कहै कबीर विचारिके, संत विवेकहि भाखि ॥
ऊर्ध्व कमलकै उपरै, परिमल बास सुवास ।
अमी कमल महुं बैठिके, दर्शन दर्श हुलास ॥
चौपाई
उत्पतिको वह वृक्ष बखानी । प्रलय कबहुं होवे नहिं हानी ॥
पिण्ड मांह वह वृक्ष बताऊं । अगम अगोचर गम नहिं पाऊं ॥
अगम गोष्ठि तुम पूछन लाई । सुनो धर्म अब कहौ बुझाई ॥
अगम गोष्ठि अगम व्यवहारा । अगम पंथ हम कहौ विचारा ॥
अब मैं कहौ जो गम्य बखानी । अगम गोष्ठि काहू नहिं जानी ॥
उत्पति सब मैं तुम्हैं सुनावा । ये हमते कोउ जानि न पावा ॥
उत्पति सुनु वा वृक्षकी भाई । प्रलय तेरे वह कबहुँ न आई ॥
जासों कहों अमरपुर गाऊं । बिना बीज वह वृक्ष रहाऊं ॥
बिन धरती अंकूरहि आनी । पानी रंग नहीं उत पानी ॥
मूलवृक्ष वह पुरुष बखानी । शाखा तासु निरंजन जानी ॥
डाली ब्रह्मा विष्णु मधेश्वर । पत्र तासु संसार नरेश्वर ॥
सत्य सुकृत जहँ कर विश्रामा । अछय वृक्ष जाकर है नामा ॥
पत्ररूप संसार बखाना । धर्मदास लखवो यह ज्ञाना ॥
( ९२ )
बोधसागर
साखी-पानीमें सबउपजहि, पानि जान सब कोइ ।
जासों पानी ऊपजा, सो रँग कैसो होइ ॥
चौपाई
रंगहि रंग रंग उपजाया । एक रंगसे सब रँग आया ॥
बहुरंगीसे पानी भयऊ । पानी रंग नाद जो कियऊ ॥
नाद रंगसे वेद उचारा । वेद रंगसे भयो संसारा ॥
साखी-हीर डोरको भाव यह संत सुजाना देखि ।
कहै कबीर विचारिके रंगहि रंग विशेखि ॥
पुरुष डोर तुमसों कही, सुनो संत चित लाइ ।
धन्य भाग्य वह जीवके, ज्ञान स्थित जो पाइ ॥
चौपाई
सो सब तोहि कहिव चित लाई । परखि लेहु हियको समुझाई ॥
पांच तत्त्व जो प्रकटे आई । पांच तत्त्व वे गुणत रहाई ॥
सोह तत्त्व तुमको न सुनावा । हृदये भीतर गुप्त छिपावा ॥
कौन शब्दसे तत्त्व जो आऊ । सो अनुसार तोहि समुझाऊ ॥
विदेह तत्त्व अगरको मूला । सोम तत्त्व आही अस्थूला ॥
अनुम तत्त्व सब दीप बखानी । अनुप तत्त्व सब दीप बखानी ॥
अंकुर तत्त्वसों सब कछु कीन्हा । ताको मरम न काहू चीन्हा ॥
पाच तत्त्व प्रगटे दुनियाई । तामहँ जीव रहै अरुझाई ॥
आप तेज वायु तत्त्व बखानी । पृथ्वी अकाश देह सब जानी ॥
धर्मदास वचन
कौने तत्त्व सो रची है देही । कौन तत्त्व है फूल सनेही ॥
कौन तत्त्व सो देहमें आवा । कौन तत्त्व निज मूल कहावा ॥
सत्गुरु वचन
अजर तत्त्व निःस्वादी कहेऊ । पुढुपतत्त्व निजमूलहि लहेऊ ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९३ )
अमी तत्त्वकी देह बखानी । अजर तत्त्वमूल पहिचानी ॥
साखी-अमरपुरीको यह गुन, अमर हंस होजाइ ।
कबीर ज्ञान स्थिति बिना, जीव प्रलय तर जाइ॥
चौपाई
नाद प्रकट बिंदुहिं सो भयऊ । बिन्दु प्रकट नादहि जो लहिऊ॥
शब्द भेदते श्वास जो जानी । श्वासरूप शब्दहि पहिचानी ॥
नाद बिंदु जब नाहीं रहिया । तबकी बात तुमहिंसों कहिया॥
अमी अघर कीनी जब ग्रामा । नीर ब्रह्म लीनो विश्रामा ॥
नाद निरञ्जन प्रगटे जबही । श्वास प्रेम गुरु कीन्हो तबही ॥
बिन्दु सकलसे भयो पसारा । देह बिदेह सो रहत न न्यारा ॥
जब नहिं धरती नहिं आकाशा । तब नहिं सहज कूर्म परकाशा॥
चकित अण्ड चौँकरे मुचंदा । हमें देखि करि सहज अनंदा ॥
सारशब्द कबीरहि जाना । अंगहि अंग आहि बिहराना ॥
फूटा अंड कटे तब अंशा । योग जीत उपजे निःसंशा ॥
नहिं तब धरती नहिं आकाशा । साखी शब्द नहीं परकाशा ॥
तबही पुरुष कहां धौं रहेऊ । कौन तत्त्वमें वासा लहेऊ ॥
गुप्तहि तत्त्व गुप्त अस्थाना । गुप्त वस्तुमें रहे निदाना ॥
गुप्त हते तब प्रकटे भयऊ । अमर दीप उच्चारण लयऊ ॥
शब्द उचारो अमर अखंडा । बीरा सार बिदेही पंडा ॥
तादिन पुरुष आप जो रहते । कौन पिंडमें वासा करते ॥
साखी-राईभसा जो वस्तु थी, राई मर अस्थूल ।
लहर लहर दिल अंदरा, तहाँ पुरुषको मूल ॥
चौपाई
जब नहिं हते कूर्म नहिं कामा । आदि पुरुष कीन्हो निज नामा ॥
नाम सार हंसा जेहि पावा । वो जन चार काल पहुँचावा ॥
( ९४ )
बोधसागर
पहुँचावतमें कछु दिल मोरा । वारी लांघि सकै नहिं चोरा ॥
जो बोले तो शिर छिन जाई । खूट गहे तो अंग नशाई ॥
सारनाम सतगुरुने दीना । ताते धर्म शीस पर लीना ॥
जो कोइ करै नाम महाँ वासा । ताकहँ होइ न काल तरासा ॥
नाम प्रताप काल नश जाई । काले खेले पुरुष जाई ॥
नौ दल गुप्त हृदयमें टीका । अमर मोक्षपद पावै नीका ॥
नौदल नाम जो कहौं बिचारी । षट्दल काटि जो बाहर डारी ॥
शुभ दल शुभचित बन भरमा । भये दल क्रोध संत तज करमा ॥
अस्थित दल राखे निज मनको । पहुँचे हँस लोक सुरजनको ॥
सार्वी-यहि गुण ज्ञान स्थितिहिमें, शब्द सिंहासन सार ।
केहे कवीरा नाम बल, पहुँचि पुरुषके द्वार ॥
धर्मदास उवाच
धर्मदास बिनवे कर जोरी । साहब कहौं नामकी डोरी ॥
अगम निगम शारद औ शेशा । तुम दातामांगन सब देशा ॥
कहो बचन प्रभु हृदय विचारी । कैसे कूर्म लीन अवतारी ॥
आदि ब्रह्मका कहौं निवासा । केहिविधि लीन कमलमें बासा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास मैं कहौं बुझाई । अकथ कथा कछु कही न जाई ॥
आदि अन्तको नाहिं निवासा । आसा सार पुरुष परकाशा ॥
बिना नालको कमल अनूपा । पूरुष तामहँ कही सरूपा ॥
तबही भई अधर सों बानी । बिन रसनावह अगम निशानी ॥
बिनहि बिन्दु जिद एक कियऊ । अजय अपार सरोवर लियऊ ॥
अष्ट कमल तहां कीन्ह प्रकाशा । अष्ट पुत्र को तहां निवासा ॥
अष्टताल सुत नाम धरावा । अब मैं कहौं नाम परभावा ॥
मनसा बुद्धि निरञ्जन कीन्हा । सहज सुरतिसों उत्पति लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १६ )
रंग रेख कर्म उपराज् । सरवन सुरति वहे गुण छाज् ॥
योग संत इनको विरमाए । तिनको अंत न काहू पाए ॥
सुकृत अंश भये तेहि ठाऊँ । सोहँ सुरति अचित बनाऊँ ॥
आठ अंश ये उपजे भाई । ज्यों दर्पण प्रतिबिंब समाई ॥
पुरुष सहज सो भाषे लीना । दीप एक तुमहुँ कहँ दीना ॥
अंमो दीप प्रदीप निवासा । गर्भते कूर्म तहाँ परकाशा ॥
तबही पुरुष कूर्म उपराजा । बाहर पलंग रूप तेहि छाजा ॥
उपजे कूर्म पृथ्वीको भारा । सोरह पलंग दीप विस्तारा ॥
रचना सबहि कूर्मकह दीना । इहतो चरित सहज नहि चीन्हा ॥
साहब चरित लखे नहि कोई । सुरति पुत्र उपराजे सोई ॥
महा अपर्वल है अधिकारी । पुरुषके कहिये भण्डारी ॥
दया करी सुरतीको जबही । सुरति अंश उपराजे सबही ॥
साखी- ज्ञानस्थतिके यह गुण, सुरति कूर्म उपजाइ ।
कहै कबीरा नाम बिन, जीव अकारथ जाइ ॥
चौपाई
कूरम उदर बिदारी जबहीं । चारों अंड फूट गये तबहीं ॥
चारों अंड ब्रह्मांड सम्हारा । कृत्रिम वस्तु कीन्ह संसारा ॥
कर्ता आदिपुरुष कर नाऊ । सोई नाम निरंजन पाऊ ॥
फूटि अंड चौभंगा भयऊ । पाँचो तत्त्व तीन गुण ठयऊ ॥
पंच अमीसे सब संसारा । पंच अमीका है विस्तारा ॥
पंच अमीकर नाम न जाने । सो मन आन केल तन ठाने ॥
अमी दहे है सकल जहाना । अमी रंगसे कीन्ह ठिकाना ॥
अमी वस्तु जिनही पहिचाना । पंच अमीको सकल जहाना ॥
पंच अमीको नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न सब तोहि बताऊँ ॥
( ९६ )
बोधसागर
अमीके नाम
सिंधु सुअंशहि । १ । सुरंगको नाम । २ ॥ सहजसुतमूलको नाम । ३ । अकहअमी । ४ । अंकअमी । ५ ।
सार्षी-कही कबीर धर्मदाससों, पंच अमीको नाम ।
शब्द अमीसों जानियो, प्रकट भये गुणधाम ॥
चौपाई
अमी शब्द सुमिरे जो कोई । अमीस्वरूप होहि पुनि सोई ॥
अमी शब्द जिन नाहीं पायब । सोई जीव प्रलय तर आयब ॥
मूल शब्द राखे चित सानी । अमी शब्द मृष बोले वानी ॥
पाँच बेर सुमिरे नर कोई । ताको आवा गौन न होई ॥
एहि शब्द मैं कहीं बखानी । ब्रह्मा विष्णु महेश न जानी ॥
इह पुनि नहीं निरंजन पावा । धर्मदास मैं तुमहिं बतावा ॥
शब्द अमी सुपुरुष लिख दीन्हा । एकहुअंक परै नहिं चीन्हा ॥
सार्षी-कमल अंक पंखुरि अरु, सुरति बंध सुखसेज ।
कहि कबीर संशय गई, महापुरुषके एज ॥
ज्ञानस्थितके यही गुण, अमी अमी होजाइ ।
कहे कबीर धर्मदाससों, देह हिरण्मय पाइ ॥
चौपाई
धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । तुमरी दया पन्यो सब चीन्हा ॥
अपनो भेद कहीं विलछानी । जाते परै दरस पहिचानी ॥
वहै शब्द गुरु कहीं प्रकाशा । जामैं हवै सुकृतको वासा ॥
वही शब्दमें दर्शन होई । भिन्न भिन्न मोहि कहो बिलोई ॥
तुमहिं सगुण तुम निर्गुण रूपा । कारण कारज कहिये भूषा ॥
तुम धरती तुम पवन अकाशा । तुमहीं चांद सूरज परकाशा ॥
जलथल भीतर कीन्ह निवासा । लोकद्वीप तुमहीं परकाशा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९७ )
तुमही माली तुम फुलवारी । तुम हो करता तुमरी बारी ॥
तुम सागर जलहरी तरंगा । तुम मलीन तुम निरमल अंगा ॥
तुम हो उडुगण पर्वत चंदा । मोये तुमये हर्ष अनन्दा ॥
तुम गुपाल तुमहो दिन राती । सुर नर मुनि गंधर्व तुम ज्ञाती ॥
तुमही अलख तुमहि संसारा । तुमही हरि हर विधि अवतारा ॥
तुमही लोप अलोप अलेखा । तुमही गुप्त प्रगट सब देखा ॥
तुमही पुरुष तुमही हो प्रकृति । तुमही योग तुमहि जुगति गति ॥
चारों युग तुम करत निवासा । तुम रमता देहीमें बासा ॥
साखी--तुमहो दूसर अवर नहीं, तुमरा सकल प्रकाश ।
करहु दया अब मोहिपर, सत्य नाम विश्वास ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम विनती कीन्हा । हमरो रूप न काहू चीन्हा ॥
अमरभेद अस्थलकै माहीं । जो पावै अस्थिर मन ताहीं ॥
लीलंगर द्रौप पुरुष अस्थूला । वही द्रौप उत्पतिको मूला ॥
गगन धरनी उत्पति सब नीरा । काया बीर सुनाम कबीरा ॥
याविधि पुरुष हमहि सोंकहिया। विन अंकुर जीव कहाँ रहिया ॥
नाम हमार सुमिरे जो कोई । आवा गमन रहित सो होई ॥
हमरा नाम लेत घर आवै । सुख सागर निर्मल हो जावै ॥
नाम लेत जो काल डराई । सुमिरत नाम हो दूर हो जाई ॥
हमरो नाम सार है भाई । जो चीन्हे तेहि काल न खाई ॥
साखी--नाम हमारा मुक्तामणि, पुरुष आपहि भाखी ।
शब्द शिरोमणि सार यह, हंस सदा चित राखि ॥
चौपाई
येहि नाम लोके पहुँचावै । सुमिरत नाम पुरुष कहैं पावै ॥
अब यह शब्द कहउ सम्भारा । सुनि हृदय महे करो विचारा ॥
नं. ८ कबीरसागर-४
( ९८ )
बोधसागर
जाते दुःख द्वंद मिटि जाई । धर्मराय बैठो पछिताई ॥
यहि नामको शिरहि चढाई । यामें सब सुख विलसे आई ॥
कपट रूप धरिहै जो कोई । भ्रमकी डगर परै पुनि सोई ॥
आदि शब्द सो नाम हमारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥
धन्य भाग्य हंसनके कहिए । जो या नाम मुक्ति मन गहिए ॥
सो करूणाकर बहुत उधारी । एक नाम चित लेय विचारी ॥
पाँच नाम
आदि अजर १ । अदली अदल २ । पुरुष निरक्षर नाम ३ ।
मुक्तामणि प्रभुनाम जो ४ । सुख सागर विश्राम ॥
साखी--ज्ञानस्थितके यह गुण नाम विवेकी पाइ ।
कहे कबीर धर्मदासको, हंस लोकको जाइ ॥
चौपाई
धर्मदास चरण चित धरही । बार बार विनवे अनुसरही ॥
पाँजी नाम मोहि कहो विचारी । जामें होय हंस निस्तारी ॥
बिन पाँजी कहा जाने भेदा । पाँजी नाम गुरु कहीन खेदा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास भल कीन्ह विचारा । हंसराज बड भाग तुम्हारा ॥
नाम सिंधु पायो तुम जब ही । पाँजी निर्भय पहुँचे तब ही ॥
बिन निर्भय कोई भेद न आवे । विना भेद कैसे पहिचाने ॥
कहे कबीर होइ गुरु दाय। तबही हंस अमर घर आया ॥
अब सुनिये पाँजी को द्वारा । ता चढ़ि हंस उतरि है पारा ॥
एक नाम एक चित हो देखा । तहाँ हंसा सुख सागर पेखा ॥
पाँजी अद्भुत कहीं सुमारा । ताते होय मुक्ति व्यवहारा ॥
सोहं शब्द उलली कर देखे । तिल प्रमाण जहाँ द्वारी पेखे ॥
उलटि पवन पश्चिमको घाले । गरजे गगन मेरु तहाँ हाले ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( ९९ )
अरध ऊर्ध्वबिच कमल अपारा । दामिनि कोटि होत उजियारा॥
पाजी नाम पंच दिल राखो । हंसा उबारन कहि यह भाखो॥
आकाशपाँजी
आदि अजर अदलीनिर नामा । सप्तसिन्धु है जियको कामा ॥
सप्तसिन्धु पाजी ले नामा । सो यह परब्रह्मको धामा ॥
यही नाम जियको रख वारा । खोलो कुंजी कुलफ केवारा ॥
हंस ले गए पुरुष दर्बारा । झिलमिल ज्योति झलक उजियारा॥
नाभि मण्डल पवन किवारा । दुरे सुनीरी मूलके द्वारा ॥
भए निरन्तर थकित शरीरा । धर्मदास कह मिले कबीरा ॥
धर्मदास यह दिलकी पाँजी । यही नाम धरि बहुऐ साँजी ॥
पिंड नाम सो दिलमें मूला । येहि नाम पहुँचे अस्थूला ॥
सार्वी-ज्ञानस्थितके यह गुन, पुरुष पाजी निज सार ।
यह पाँजी जब पावही, हंस होइ निस्तार ॥
चौपाई
हो सद्गुरुमें तुम बलिहारी । मिटि गइ तिमिर भई उजियारी॥
हों पतंग तुम भुंग गुसाई । आप सरीख कीन्ह एहि ठाई॥
सप्त सिन्धु पृथ्वीमें आहीं । सकल जगत इनहींके माहीं ॥
सप्त सिन्धु जो रहे पताला । सातनाल प्रभु कहौं रिसाला ॥
सातौ नाल कवन विधि हेरा । जामें सुषुमण होइ निवेरा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास यह अकथ कहानी । बिरले हंस कीन्ह पहिचानी ॥
अगम विचार कीन्ह व्यवहारा । जासों भया सकल विस्तारा ॥
जबहीं हंसा तजे शरीरा । शब्द प्रताप होय गंभीरा ॥
सप्त सिंधु नर पावै कोई । सप्त सिंधुमें जाय समोई ॥
सप्त सिंधु आरम्भ न करई । त्यागि शरीर हंस गति धरई ॥
जाय करै मुख सागर बासा । मान सरोवर करहिं निवासा ॥
( १०० )
बोधसागर
सप्त सिन्धुके नाम सुनाऊं । भिन्न भिन्न सब तोहि लखाऊं ॥
सप्त सिन्धु अब लखि पावे कोई । समता सिन्धुमें रहे समोई ॥
योग सिन्धु अब कहों बखानी । अजांवन सिन्धु लेव पहिचानी ॥
अमर सिन्धु हंसा लखि पावे । अकह सिन्धुमें जाय समावे ॥
सुखहिं सिन्धुहि कीन्ह पैठारा । सप्तहि सन्धुहि नाम उचारा ॥
साखी-ज्ञान स्थितको पायके, मन सुस्थिर हो जाय ।
कहे कबीर धर्मदाससों पुरुष नाम समुझाय ॥
चौपाई
पुरुषहि नाम कहौं समुझाई । धर्मदास हिय गहो बनाई ॥
याही कारण अजपा कीन्हा । जीवन संधि परी नहिं चीन्हा ॥
पुरुषहते तब मूलके ठाऊं । तब नहिं दीपलोक अवगाऊं ॥
चौबिश पुत्र तबे नहिं रहिया । तबही वचन अम्र जो कहिया ॥
ता पाछे ओंकार जो कीन्हा । ओंकार सो सब रचि लीन्हा ॥
साहब वचन सत्य फरमाया । सत्य शब्द अक्षर निर्माया ॥
कबहुँ नाहिन अस्थिर होई । बरा बार मन देह बिगोई ॥
काया भीतर आप लखावा । ताते अजपा नाम कहावा ॥
याहि शब्दसे सुद्ध शरीरा । याहि शब्दसे मिले कबीरा ॥
याहि शब्द हृदय सुख होई । निर्मलहोहि विशहिं सबखोई ॥
अस्थिर मनकर प्रफुलित राखे । नाम संधि हृदये महाँ चाखे ॥
निर्मल हंस होत है तबही । अमरलोक पहुँचि है जबही ॥
सातों सुरति तबहि परकाशा । पुरुषहि को राखे विश्वासा ॥
उत्पति शब्द जबे निर्मावा । सो अक्षरमिलिशिवहिं कहावा ॥
शिवहि शब्दसों जीव कहावा । जीव नाम संसार कहावा ॥
सातों नाल वाहिके अंगा । जिहि जग मीतर माडो रंगा ॥
अक्षर शब्दसे शिव जो आवा । वाही अक्षर गुरु कहावा ॥
ज्ञानस्थितिवोध
( १०१ )
काशी मध्य मरे जो कोई । होहि पखान रूप तब सोई ॥
चौरासीसे रहित जो होई । पाहन रूपहि जन्म विगोई ॥
शब्द संपूरन शिव जो जाना । त्यों सुकृतके बहुत परवाना ॥
अक्षत ले आरति कर सोई । उन कर मंत्र कहत सब कोई ॥
तारक मंत्र वयसको नाहीं । पण्डित शब्द गहत मनमाहीं ॥
यही मंत्र कहत सब कोई । साहब चरण न पावैं सोई ॥
क्षमा गुरु निश्चय जो पावा । सद्गुरु शब्द अहर्निश लावा ॥
क्षमा गुरु कहिए अविनासी । मानसरोवर तटके वासी ॥
रचना भेद ले शिव कह दीना । यहि विश्वास मनहि कर लीना ॥
भवसुर केहि शिखावन एहा । सनकादिक कर चरण सनेहा ॥
यही प्रणालि गही सब कोई । गुरु निर्गुणकर भेद समोई ॥
याहीमें सब परै भुलाई । दृढ़तही जग करूप बिताई ॥
जो चाहे सुकृत कर लेखा । आप आप सो करै विवेका ॥
उनकर चीन्हि अमरपद पाई । सूक्ष्म मुक्ति नाम गुण गार्ई ॥
साखी—यह गुण ज्ञानस्थितिके, जो पावैं निज नाम ।
अजपा जपै कबीरको, सो पहुँचे निज धाम ॥
चौपाई
शब्द पाय लोक जिन चीन्हा । नाम अखण्डित जब धरलीन्हा ॥
मुक्तामणि निज नाम हमारा । हंस उबारहि भवसे पारा ॥
साखी—सोहं नाम हृदय धरै, और जपे नहिं जाप ।
मूल शब्दही रटन कर, मूल शब्द हो आप ॥
करै निरूपण शब्दको, कहै कबीर बखान ।
मूल ध्यान गहि पावही, सुख सागर अस्थान ।
मूल शब्दके येह गुन, अमी दीपक कहैं जाइ ॥
कबीर ज्ञानस्थित बिना, मूल नाम नहिं पाइ ।
( १०२ )
बोधसागर
गुरु महिमा प्रारम्भः
चौपाई
गुरु होहि वहि ताहि लखावै । गुरु बिन अंत न कोई पावै ॥
जिन गुरुकी कीन्हरी परतीती । एक नामकर भव जल जीती ॥
गुरु पुरुष जिय करहि मराला । गुरु सनेह बिन काग कराला ॥
गुरु दया गुरु शब्द हमारा । गुरु प्रगट है गुप्त अधारा ॥
गुरु पृथ्वी गुरु पवन अकाशा । गुरु जल थलमहँ कीन निवासा ॥
चंद्र सूर्य गुरु सब संसारा । गुरु गंधर्व गुरु सब व्यवहारा ॥
गुरु ब्रह्मा और विष्णु महेशा । गुरु भगवान कूर्म औ शेशा ॥
चराचरहि जहँ लगि सब देखा । गुरु बिना कछू और नहिं पेखा ॥
उत्तम मध्यम और कनिष्ठा । ये सब कीन्हे गुरु शरिष्ठा ॥
ये सब जीव गुरुमय जानो । गुरुसे भिन्न अन्य नहिं मानो ॥
कहैं कबीर सो हंस पियारा । येहि भांति गुरु दरश निहारा ॥
साखी-सो गुरु निशिदिन बंदिये, जासों पाये नाम ।
नाम बिना घट अंध है, ज्यों दीपक बिन धाम ॥
चौपाई
गुरु चरण जे राखे ध्याना । अमर लोक वह करत पयाना ॥
अमर कमल ज्यों रहैं लुभाई । या विधि गुरु चरणन लपटाई ॥
तन मन धन न्योछावर राखे । दर्शहि पशं अमी रस चाखे ॥
चरण धोय चरणामृत पावै । पुरुष समीप पहुँच सो जावै ॥
गुरु बिहून अमृत नहिं दीजै । अमृत छांड़ि विषय रस लीजै ॥
साखी-महा पुरुषको नाम है; जा घट मांहि समाय ।
सोई सद्गुरु जानिया, अरु कृत्रिम सब पाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । समरथ खसम जाहि बलिहारी ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०३ )
जबसे दीन्ह मुक्तिकर बीरा । तीन ताप मिटि गई अधीरा ॥
साहब कहिये शब्द अनन्दा । जाते यमकर छूटै फन्दा ॥
चरणामृत कैसे कर लीजे । तौन शब्द मोसों कहि दीजे ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं कहों विचारी । चरणामृत शब्दहि निरवारी ॥
यहि पाये निज करहि अहारा । जासों यमकी छूटै धारा ॥
प्रथम भोर मुख उठिके धोवे । काल कष्ट यमद्वार बिगोवे ॥
फेर करहिं शब्दको आशाना । वही शब्दसो मुक्ति निदाना ॥
बहुरि हिये महाँ नामहि आने । नाम विदेह दरश पहिचाने ॥
नाम विदेही कठिन अपारा । ताहि चीन्हि कर करहुँ अहारा ॥
ध्यान बीज गुरुचित महाँ आने । सुरति निरति पुरुषहि पहिचाने ॥
बहुरि शब्द आनंदित भाषे । मुख महाँ धोइ नाम रस चाखे ॥
साखी—इह गुण ज्ञानस्थितहिके, शब्द भेद निजसार ।
गुरुचरणामृत लेहि तब, होवे हंस उवार ॥
स्मरण
श्वेत मिठाई श्वेतहि पाना । श्वेत शब्द लेखनि परवाना ॥
योग सत्य इन दीन्हो बीरा । मनको उलटि खोज लै हीरा ॥
बीरा खाय भयो मुख भारी । प्रथम पुरुष ऊपर उजियारी ॥
दूसर सत्य गुरु नाम जो भावा । तीसर लक्ष्मी लै घर आवा ॥
चौथे जन्म मरण नहिं होई । जो चरणामृत पावै कोई ॥
साखी—कालफाँस नहिं आवही, तन्त्र मंत्र क्षयमान ।
वचन कबीर गुसाँइको, संत्य हि शब्द प्रमान ॥
मंत्रसम्पूर्ण
धर्मदास वचन
चरण टेक कर विनती लाई । कीन्ह कृतार्थ मोकहँ आई ॥
( १०४ )
बोधसागर
सब विधि धर्मदास पर दाय। मुक्ति मुक्ति गुरु सबै बताया ॥
साहिब कहिये शब्द उचारी । जौन शब्द मुखधोय निहारी ॥
सोइ शब्द गुरु कहो बखानी । जाते जरै कालकी खानी ॥
साखी--काल जरै कंटक जरै, राखौ चितमें नाम ।
मनसा वाचा कर्मणा, जाय हंस निज धाम ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास यह शब्द उचारी । याही शब्दसों हंस उबारी ॥
काल जँजाल मिटत है जबही । शब्द लेय मुख धोवै तबही ॥
काया शुद्ध होइ निज वारा । मुख धोवै मोहे संसारा ॥
दिन दिन मुख उज्ज्वलतेहिकेरा । रविसमान मुख होय उजैरा ॥
अब मैं शब्द कहत मुख बानी । धर्मदास लीजे पहिचानी ॥
स्मरण
सिंधलद्रीप हंस कहां रहियऊ । पहले पार कबीर कहियऊ ॥
बसले पानी मुख धोय । चंदन काटिके धोय मुख ॥
सुरति करहि अस्नान।तेतिसकोटि सुरदेवता लखे अभ्यंतरधरिध्यान
मुख धोवे मनमोही । औ देह नहि जान ॥
मनमें ध्यान कबीर कहिये । रखे चित्त पहिचान ॥
मोरे माथे मन वसे । अवरहुँ मदिल कोइ ॥
सिंधलद्रीप दिग वैठके । कबहुँ न जाय विगोइ ॥
साखी--ज्ञानस्थितिके यह गुण, मुख धोवे सुर ज्ञान ।
कहे कबीर विचारिके, हंस होहि निर्बान ॥
चौपाई
धर्मदास यह धर्म अपारा । जासों होत दिगंबर भारा ॥
दिगंबर देह होत जब भाई । स्नान शब्द जब गुरुसों पाई ॥
यही शब्द धुंधलको दीन्हा । धुंधल राव मानि शिर लीन्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १०६ )
मृतकहि देह धरे संसारा । बिना शब्द है काल अहारा ॥
स्नान शब्द हृदयमें धरहीं । जीवनमुक्ति होइ भव तरहीं ॥
यही शब्दसो धोवे अंगा । दिव्यदेह जानो परसंगा ॥
जो कोइ करे शब्द असनाना । ताकर धोखा जाय निदाना ॥
लक्षहि दान करै नर कोई । जीव दया बिन मुक्ति न होई ॥
जो धोवे निश्चय करि देहा । तबही कीजे शब्द सनेहा ॥
कहे शब्द अब कहो बखानी । धर्मदास लीजो शिर् मानी ॥
नित्य प्रीतिकर शब्द स्नाना । ताकर दोष न रहै निदाना ॥
स्मरण
साखी-अगम सरोवर विमल जल, हंस बैठिके न्हाइ ।
काया कंचन मनमगन, कर्म भर्म मिटि जाइ ॥
पिंडहिसों ब्रह्मांडहि जाना । मान सरोवर करि असनाना ॥
सोहं सोहं ताको जापा । लिखत न करै पुण्य औ पापा ॥
पुण्य पापसे रहत न न्यारा । पैठि संत जन करो विचारा ॥
याहीविधि जो करि असनाना । सो हंसा करै लोक पयाना ॥
धर्मदास सुन शब्द विशेषा । गंगवारु इतने है लेखा ॥
स्मरण सम्पूर्ण
आदि अंत सब कहों बखानी । धर्मदास कीजो बिलछानी ॥
मूलपुरुष काहू नहिं जाना । सो तुमसो सब कहों बखाना ॥
मूलशब्द तहाँ अग्र कहावा । अग्र विदेह अस्थूल सुभावा ॥
मूलभेद काहू नहिं पावा । मूलनाममें गुप्त छिपावा ॥
कहैं प्रतीत देखी मैं तोरी । तातैं कहों मूल निज डोरी ॥
मूलहि शब्द असंभव नामा । कहैं सुनै नहिं पावै ठाना ॥
चारलोक चार है नाऊँ । चार चार सो बरन सुनाऊँ ॥
सीख गुरु या बिचि जो धरहीं । जैसी विधि तुम हम सो करहीं ॥
( १०६ )
बोधसागर
तन मन शीस न्योछावर डारै । तब गुरु शिष्य हृदय संचारै ॥
रंचक कपट हियेमहैं राखे । गुरुसनेह रस कैसे चाखे ॥
मुखसे बातें मीठी करहीं । अर्थद्रव्य मन कृत्रिम धरहीं ॥
गुरुलोभी शिष्यलालचि जानी । परमारथ नहीं पहिचानी ॥
कैसे ताकर होय उबारा । बूढ़हि भवसागरकी धारा ॥
साखी-युक्ति मुक्तिकी को कहे, नरकहु नहीं ठोर ।
पिशाचरूप भरमत फिरै, बाँधे यमकी पोर ॥
चौपाई
धन्य भाग्य तुम हमको चीन्हा । तन मन धन न्यौछावर कीन्हा ॥
यहि कारण मैं कीन्हो नेहा । मूलशब्दसों करहु सनेहा ॥
साखी-कहियत वचन विचारिके, तुम सुनियो चितलाय ॥
धीरज दृढता ठानिके, अमृत पिये अघाय ॥
चौपाई
जब प्रभु हते मूल अस्थाना । हंस सुजन जन नहिं उत्पाना ॥
सो निज ठांम लखावों तोही । धर्मदास जो पूछै मोही ॥
तब ना हतो अग्रको मूला । तब ना हतो विदेह स्थूला ॥
तब नहिं हंस सुजन जनकीन्हों । तब यह हंस बास कहाँ लीन्हों ॥
तब साहब समसर उपराजा । समसर अग्र कीन्ह सबसाजा ॥
दश ग्यारह नहीं ब्रह्मंडा । तब नहिं हते लोक अरु अंडा ॥
तब नहिं अमी अमी रस छंदा । तब नहिं दिवस रैन अरु चंदा ॥
सो अब कहौं मूल नहिं कन्दा । मूल विदेह नाम आनन्दा ॥
कहेउ भेद लहेउ निज नामा । जासों पूरण है सब कामा ॥
जैसे जलमें दिनकर ज्योती । यों घट भीतर लखिये मोती ॥
धर्म नाम असंभव नाऊं । निरालम्ब अग्रिम है गाऊं ॥
निरालंब आलंब ठिकाना । याविधि साहबको पहिचाना ॥