कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३२ )
बोधसागर
तृतीय नेत्र दोउ कंठपुनि, उर नाभी फिर होय ॥
उर दोहु दिश भुज दोय पुनि, तथा पूष्ट परमान ।
बरन बइणवके यही, द्वादश तिलक बखान ॥
इति द्वादश तिलक
अथ वैष्णवके दशचिन्ह वर्णन
दोहा-भद्र भेषतशोचकर पुनि, तुलसी गल माथ ।
रामकृष्णको मंत्र गह, गोपी मृतिका साथ ॥
शिखा सूत्र करमण्डलो, धौत वस्त्र गुरुवाक ।
चिह्न वैष्णवके दशो, चार संप्रदा साक ॥
इति
अथ बावनद्वारेके नाम
दोहा-प्रथम अनंता जी कहे, साहिब सत्य कबीर ।
पुनि सुरेश्वरानंदजी, सुखानन्द मति धीर ॥
अनभय नन्द सुरारजी, अग्रदासजी काल ।
दीपाजी रवि दासजी, नामदेव हृदशील ॥
खोजी जंग दिवाकर, वीरम त्यागी जान ।
परशराम नाभा टिला, भोला नैन बखान ॥
पूरन बैराटी कहे, बहुरि घमण्डी देव ।
ज्ञानिकुबा हरि बंशजी, राधावा वस्त्रभ येव ॥
गोकुल विटुल करम चँद, जोगानंदी जोय ।
धरनीदास मल्लकजी, असख देवनी होय ॥
माधौ कानी रामरावल, आत्माराम प्रकाश ।
लाल तरंगी देव भंडंग, भगवान तुलसीदास ॥
हठी नरायण राम रँगी, चतुरा नागा होय ।
नित्यानन्दी राम कबीर, श्यामानन्दी सोय ॥
आगमनिगम बोध
( ३३ )
हनुमान दास कमालजी, चेतन स्वामी नाम ।
दास चतुर्भुज राम जपु, मन पुनि कह दुंदराम ॥
इति बावनद्वार
अथ सात अखाडनके नाम
दोहा-टाटंबी निरालंबी कह, संतोषी विरुध्यात ।
निर्वानी दीगम्बरी, पोकी निरमोहि सात ॥
इति सात अखाडन
अथ तेरह परमभागवतके नाम-चौपाई
नारद पुंडरीक प्रहलादा । ग्यास वशिष्ठ पराशर वादा ॥
भीषम रुक्मांगद विभीषनौ । अर्जुन अम्बरीष शुक् सेनौ ॥
इति
अथ रामानन्दजी और सत्यकवीरकी कथा-चौपाई
सत्यकवीर मनुष तन लीने । जोलहाके घर बासा कीने ॥
अगम ज्ञान कथ साधुन पाही । सुनि आश्चर्य करे मनमाही ॥
निजु निजु मनमें करे बिचारा । बालक नहीं सिद्ध औतारा ॥
सत्यकवीर वचन शब्द
साखी-तब हम साध सिद्धते, कथे गुष्ठि घन ज्ञान ।
सिद्ध साध मिलिमोकह, पूछै गुरुको नाम ॥
चौपाई
गुरु नहिं नाम कहौ क्यों ओही । तब वे दोष देहि सब मोही ॥
साकठ होई कथ्यो बहु ज्ञाना । गुरुविन मुक्ति नहोय निदाना ॥
तब अपने मन कीन बिचारा । तब गुरु उठो द्वंद संसारा ॥
हम गुरुमुक्ति हटावन आये । गुरुमारग जिवलोक पठाये ॥
गुरु धारनको मनहिं बिचारा । रामानंदसे वचन उचारा ॥
रामानन्द गुरु दिशा दीजै । गुरुपूजा कछु हमसे लीजै ॥
( ३४ )
बोधसागर
तब रामानन्द बचन सुनाई । शूद्रके कान न लागौ भाई ॥
रामानन्द न दिक्षा दीने । तब कबीर अस उद्यम कीने ॥
वीच पंथमें पौढे जाई । जिहि मारग रामानन्द आई ॥
पिछला पहर राति जब आवै । रामानन्द असनानको जावै ॥
चले जात मारगमें जबहीं । लगा खराऊँ ठोकर तबहीं ॥
तब पुकारिके रोवन लागे । रामानंद खड़े भे आगे ॥
बालक देखि दया उर आई । रामानंद कहे समुझाई ॥
मतिरोवो मति करो पुकारा । राम नाम किन कहु मेरे बारा ॥
तब कबीर सो शिक्षा पाई । गुरु शिष्यको भाव बनाई ॥
रामराम धुनि रटनि लगाया । रामानंदसे बचन सुनाया ॥
सत्यकबीर बचन
गुरुजी समुझि गहो मोरे बाहीं । औरनसो चेला हम नाहीं ॥
जो बालक घुनघुनवा खेले सो बालक हम नाही ।
चौदह सो चौरासी चेले तिनमध्ये हम नाहीं ॥
हम तो लेते सत्तको सौदा पाखंड पूजवै हम नाहीं ।
बांह गहो तो गहिके पकरो फेर छूटि ना जाहीं ॥
हाड चाम मेरे नहिं कोई जुलहा जाति हमनाहीं ।
तुमरी नावमें केवट नाहीं लहरि उठै बिकरारा ॥
गुरु समेत शिष्य जब बूड़े कौन उतारो पारा ।
जौं तुमरे कछु उद्यम नाही भीख मांगि किन खाहू ॥
मूरि सजीवन जानत नाहीं भूलि न बांधो काहू ।
सूखे काठमें ज्यों घुन लागे लोहे लागी काई ॥
बिन पगतीत गुरु जो कीजै तो काल घसीटे जाई ॥
कहे कबीर सुनौ रामानंद यह सिखलेव हमारी ।
निरखि परखिके चेला कीजै तागुरुकी बलिहारी ॥
आगमनिगमबोध
( ३५ )
चौपाई
रामानन्द गये असनाना । तब कबीर गृह कियौ पयाना ॥
भोरहि कण्ठी तिलक लगाये । नग्रलोग सब देखन आये ॥
पूछे किमि यह भेष बनाये । तब कबीर यह उत्तर सुनाये ॥
रामानन्दको गुरु हम धारा । ताते ऐसे भेष सँवारा ॥
रामानन्द खबर जब पाई । तब कबीरको टेरि बोलाई ॥
रामानन्द गुरु परदा धारा । सत्य कबीर से बचन उचारा ॥
रे जोलहा ते कहसि न मोही । कब मैं दीक्षा दीनों तोही ॥
गुरुजी राम कृष्ण तुम मेरे । रैन पन्थ प्रकटै कयों तोरे ॥
तुम तब रामनाम मोहि दीना । मैं निज जन्मसुफलकरिलीना ॥
कहै गुरु यह बालक रहेऊ । ठोकर लगा राम तिहि कहेऊ ॥
गुरुजी हंमही रहै सो बाला । राम राम सुनि भयेनिहाला ॥
कह गुरु तू वैश्य कि शूद्रा । वह तो इता बाल बुधि भोरा ॥
तिहि छिनबालरूप दिखलाओ । तब गुरु रामानंद पतियायो ॥
पै जोलहा ब्रह्मवादि कराही । अन्तर ओट सोदियौ बहाई ॥
कहै साधु गुरुसे समुझाई । कबीरहिजुलहानकहिये गुसाई ॥
अनंतानंद कहै परचाये । कबीर सो ब्रह्मरूपधरि आये ॥
दीजै दरशन इनको स्वामी । ये आहि ब्रह्मसोअन्तर्यामी ॥
तबहु न दर्शन दीन गुसाई । तब हम सन्मुख ठाढभे जाई ॥
साखी-गुफामाह गोपहुँचहौं, पूछे को तुम आहु ।
मैं कबीर सेवक अहौं, अजहुँ नहिं पतियाहु ॥
चौपाई
रामानंद कहाव गुरु मेरा । सत् कबीर मैं सेवक तोरा ॥
गुरु सोई जो शिष्य चितावै । शिष्य सोई गुरुसेवा लावै ॥
कहौ गुरु गुरुज्ञान विचारी । को है पुरुष कौन है नारी ॥
( ३६ )
बोधसागर
कौन पुरुषको सुमिरो नामा । कहौ कहाँ अबिचलनिजुधामा ॥
कहौ ध्यान कीजै किहि केरा । तन छूटे कह होय बसेरा ॥
रामानंद कहै सुनु पूता । गुरुसुख ज्ञान रहो संयुक्ता ॥
आपै पुरुष आप है नारी । कहो ज्ञान चित्तराख संभारी ॥
सुमिरहु दशरथ सुत श्रीरामा । अवधपुरी अविचलनिजधामा ॥
श्याम स्वरूप ध्यानमन धारो । तन छूटे बैकुण्ठ सिधारो ॥
कहै कबीर सुनो गुरुदेवा । यह समुझाय कहो मोहिभेवा ॥
रामचन्द्र त्रेतामें भयऊ । काहुहुखाय काहु सुख दयऊ ॥
लोभमोह जुत वन वन डोला । तत्त्वप्रकृत संगतितिहि बोला ॥
जौन बाटते रघुपति आये । सूत कौशल्याको कहलाये ॥
जब त्रेता तब राम भुवारा । कौन पुरुषको सकलपसारा ॥
सारखी-अहो गुरु समुझाइये, कोहै सिरजन हार ।
रामचन्द्र गुरु बंदेउ, कौन नाम आधार ॥
चौपाई.
कहत निगम अस करे विचारा । पूर्व अवर्न जन्मसो न्यारा ॥
तात मात बंधु सो नहिं ताही । ना वह आवै ना वह जाही ॥
श्याम श्वेत नहिं कहिये ताही । इन्द्रासन बैकुण्ठ न जाही ॥
तीन लोक सब परलय होई । निजु धाम कहो कहाँ है सोई ॥
स्वर्ग लोक तुम राखी आशा । फिरि फिरि होय गर्भमें वासा ॥
सारखी-स्वर्गनरक न्यारा, सो मोहि देहु चिह्नाय ।
कहवाते जीव आयेऊ, कहोगुरु समुझाय ॥
चौपाई
सुनहु कबीर कहो सो गहहु । करिये योग अमर है रहहु ॥
आसन साधहु बांधहु मूला । अष्टकमलदल निरखहु फूला ॥
आगमनियमबोध
( ३७ )
चन्द सूर गहि कीजै मेला । मन पौना शुभ निधर खेला ॥
चढ़ि अकाश अमृत रसपीवो । तब कबीर तुम युग युग जीवो ॥
साखी-स्वर्ग नरकते न्यारा, ज्योतिपुरुष निर्वाण ।
तहवाँसे जीव आइया, कहो गुरु सहिदान ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो हो स्वामी । तुम हो उत्तगुरु अन्तरजामी ॥
योगके किये अमर जो होई । तौ पुनि योगी मरे न कोई ॥
का भो साथे आसन मूला । जौं नहिं मेटे संशय झूला ॥
का भो अष्टकमलके पेखे । जौं नहिं आप रूप निजु देखे ॥
का भो चन्द सूरके मेला । जौं नहिं शब्दसुरति गहि खेला ॥
का भो सुष्मनि जाय समाये । जौं नाहीं अक्षर लखि पाये ॥
क्याअकाश चढ़ि अमृत पीये । जौं नहिं नाम अभी चित दीये ॥
ज्योति स्वरूपी पुरुष बतायहु । ज्योति काल तीनों पुरुषायहु ॥
यहिजिव नाहिं ज्योतिसे आवा । परम ज्योतिसे अंश उपावा ॥
जो जिव ज्योति पुरुषते होई । नौ काहे जिव जाय विगोई ॥
ज्योति निरंजन काल अन्याई । सिद्धि तपी सब धीरधरिखाई ॥
साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुर नर मुनि सब झार ।
ज्योति निरंजन सब कहे, खायो बारंबार ॥
चौपाई
जाहि कहत हो पुरुष निर्वाण । वही आहि तौ काल देवाना ॥
साखी-योग यज्ञ जपतीरथ, यह सब यमके जाल ।
कहै कबीर सतनामबिन, कबहु न छोड़ै काल ॥
पाँच तीन जहवां नहिं, नहीं प्रकृत प्रवेश ।
रविशशिपानीपौननहिं, तहँको कहो सँदेश ॥
( ३८ )
बोधसागर
चौपाई
कहै गुरु तुम शिष्य भये मोरे । यह सब बुद्धिको दीनेहु तेरे ॥
कहै कबीर सब तुम परतापा । हमरे तुमहि माया अरु बापा ॥
तब गुरु हमपर भये दयाला । निजकरदियौ सुमिरिनी माला ॥
कहै गुरु सुन साधु कबीरा । तुम तो सेवक हो मतिधीरा ॥
सर्वांनंद विप्र यक आये । तिन पुनि गुरुते गोष्ठि कराये ॥
ताहि जीत गुरु शिष्य करावा । तब गुरु हम कह तिलककरावा ॥
सब पर श्रेष्ठ हमें गुरु कीना । हम पुनि सबते रहै अधीना ॥
साखी-गुरुके सब शिष्य मोहिको, बोलैं गुरुसमान ।
हम गुरु साधु अधीन हैं, भाषै निर्भय ज्ञान ॥
शब्द
लख कोई विरलापद निर्बान । बिन रसना सूर धरै ध्यान ॥
तामें दरसे पुरुष पुरान । कर्म छोड़ि सब भर्म नसान ॥
डुरमति छोड़ि कमल धरु ध्यान । तीन लोकमें काल समान ॥
चौथे लोकमें नाम निसान । रामानन्द गुरु करै बखान ॥
दास कबीरको निरमल ज्ञान ।
इति
मेरो नाम कबीरा हो जगत गुरु जाहिरा ।
तीन लोकमें मागा मेरा त्रिकुटी है अस्थान ॥
पानीपौन समेरसमाना इस विधि रच्यौ जहाना ।
गगन मन्दिरमें वासा मेरा मंजनि है अस्थाना ॥
ब्रह्मबीज हमहीसे आया हमरै सकल जहाना ।
अनहद लहर गगन गढ उपजै बाजै सोहं तारा ॥
गुप्त भेद वाहीसे कहिये जो निज होय हमारा ।
भवबंधनसे लेहु छोड़ाई निरमल करो शरीरा ॥
आगमनिगमबोध
( ३९ )
सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥
वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा ।
कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥
चौपाई
रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥
कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥
सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥
केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥
मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥
रामानंद वचन
दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष ।
मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥
करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव ।
तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब ।
औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥
काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं ।
यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥
घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज ।
काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥
चौपाई
योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥
काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥
चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥
( ४० )
बोधसागर
सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥
गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥
तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥
सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥
रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥
रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥
कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥
प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥
बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥
सत्यकबीर वचन--शब्द
कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी ।
नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥
धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला ।
जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥
धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका ।
शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥
द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा ।
सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥
गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया ।
कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥
जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी ।
असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥
कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी ।
हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥
दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।
आगमनिगमबोध
( ४१ )
सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥
कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी ।
देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥
नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी ।
कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥
अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया ।
ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥
काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया ।
माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥
जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी ।
धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥
सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा ।
अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥
ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा ।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥
तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।
गोरखवचन
कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥
सत्यकबीर वचन
शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।
गोरखवचन
कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥
कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥
सत्यकबीर वचन
मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥
अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥
( ४२ )
बोधसागर
गोरख वचन—चौपाई
कौन तुमारी उत्पत्ति कीनी । किसने तुमको माला दीनी ॥
कौन गुरु दीनो उपदेश । उतारो माला करो आदेश ॥
कबीर वचन
आदि पुरुषने उत्पत्ति कीनी । सिरजन हारने माला दीनी ॥
गुरु गोविंद दीनो उपदेश । न उतारों माला नाकरों आदेश ॥
गोरख वचन
क्या लै उठो क्या लै बैठो रहो कौनकी छाया ।
कौन माह निरञ्जन पेखे कैसे त्यागी माया ॥
कबीर वचन
एकले उठ एकले बैठे रहै एककी छाया ॥
एकै माह निरञ्जन पेखा सहजे त्यागी माया ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी डिब्बी बोलिये कौन तुमारा चावल ॥
कौनसो तुममें सिद्ध बोलिये कौनसो तुमरो रावल ॥
कबीर वचन
काया हमारी डिब्बी बोलिये कर्म हमारे चावल ॥
एक हमसे सिद्ध बोलिये और सकल है रावल ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी गुदरी बोलिये कौन तुमारा धागा ॥
कौन तुमारी टोपी बोलिये काहेते मन लगा ॥
कबीर वचन
काया हमारी गुदरी बोलिये पौन हमारा धागा ॥
गगन हमारी टोपी बोलिये अलख पुरु मन लगा ॥
आगमनिगमबोध
( ४३ )
गोरखवचन
कौन तुमारी तिलक बोलिये कौन तुमारा छापा ॥
कौन तुमारी जाति बोलिये कहा तुमारी आसा ॥
कबीरवचन
तत्त्व हमारी तिलक बोलिये राम नाम है छापा ॥
वैष्णव हमारी जाति बोलिये शब्द मंडलमें आसा ॥
गोरखवचन
शब्द कहाँसे आया कहो शब्दको विचार ॥
नहीं तो तिलक माला धरो उतार ॥
कबीरवचन
शब्दै धरती शब्दै अकाश । शब्दै पांच तत्त्वके बास ॥
कहैं कबीर हम शब्द सनेही । शब्द न बिनसै बिनसै देही ॥
गोरखवचन
अंडान मंडान चार खुरो द्वै कान ॥
जान तो जान नातो झोली माला उरे आन ॥
कबीरवचन
अण्डान धरती मंडान आकाश चारों खूट चारोंखूरी चंद्रसूर्यद्वै
कान ना जानो मात्रा तो गुरु रामानंदकी आन ॥
शेर्ली सिंगी और खटपटी । फिर बोलो तोरों कनपटी ॥
गोरखवचन
आसन बांधो बासन बांधो अरु बांधो नौद्वारा ॥
तोहि बांधों तेरे गुरुको बांधों निकसे कौने द्वारा ॥
कबीरवचन
आसन मुक्ता वासन मुक्ता मुक्ता है नौ द्वारा ॥
मैं मुक्ता मेरो गुरुभी मुक्ता निकसै दशमें द्वारा ॥
( ४४ )
बोधसागर
चौपाई
गोरखनाथ कबीर समाजा । विविध ज्ञान विज्ञान विराजा ॥
चर्चा पर्चा बहुविधि ठानो । विदित जत्तमें लोगन जानो ॥
इहांसो कथा लिखो नहिं कोई । अन्त बाद जिहि औसर होई ॥
गोरख नर्म भये तिहि बारा । विनयसहित निजबचनउचारा ॥
गोरखबचन
नवो नाथ चौरासी सिद्ध, इनको अनहद ज्ञान ।
अविचल घर कबीरको, यह गति विरलाजान ॥
झोरी झण्डा कूबरी, शेली टोपी साथ ।
दाय़ा भई कबीर की, चढ़ाई गोरखनाथ ॥
धर्मदास बचन
दोहा-बाजा बाजा रहितका, परा नगरमें शोर ।
सतगुरु खसम कबीर है, नजर न आवै और ॥
नानकशाह बचन
शब्द-वाह वाह कबीर गुरु पूरा है ।
पूरे गुरुनकी मैं बलि जैहौं जाको सकल जहूरा है ॥
अधर दुलैच परै है गुरुनके शिव ब्रह्मा जह शूला है ॥
श्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके बाजत अनहद तूरा है ॥
पूर्ण कबीर सकल घट दरशै हरदम हाल जहूरा है ॥
नाम कबीर जपै बडभागी नानक चरणको धूरा है ॥
सत्य कबीरबचन नानकशाहप्रति
शब्द-वाह वाह लडके जीतारहु ।
मंड़येकी रोटी बथुयेकी भाजी ठंडा पानी पीतारहु ॥
प्रेमकि मुई सुरतिको धागा ज्ञानगूदरी सीतारहु ॥
आगमनिगमबोध
( ४५ )
यहि लडकेकी बड बड अँखियां नितप्रति दरशन करतारहु ॥
कहैं कबीर सुनो भाई लडके रामरसिक रस पीतारहु ॥
मल्लुकदास वचन
शब्द-जपो रे भाई साहिब नाम कबीर ॥
एक समय गुरुवंशी बजाई कार्लिंदीके तीर ।
सुरनरसुनि सब चकित भये हैं अरु यमुनाजीको नीर ॥
काशी तजि गुरु मगहर आये दोऊदीनके पीर ।
कोइ गाड़ै कोइ अभ्रजलावै नेक न धरते धीर ॥
चार दागते सतगुरु न्यारा अजर अमरो शरीर ।
जगन्नाथको मंदिर थापे हटि गये सायर नीर ॥
आसा रोपि ससुद्ध हटाये ऐसे गुरु गँभीर ।
दास मल्लुक श्लोक कहत हैं खोजहु खसम कबीर ॥
दाबूराम वचन
साखी-अधर चाल कबीरकी, मोसे कही न जाय ।
दाढ़ कूदै मिरग ज्यों, पर धरनि पर आय ॥
हिन्दूको सतगुरु सही, सुसलमानको पीर ।
दाढ़ दोनों दीनमें, अदली नाम कबीर ॥
हिन्दू अपनी हृद चले, सुसलमान हृद माह ।
दाढ़ चाल कबीरकी, दोऊ दीनमें नाह ॥
दाढ़ बैठे जहाजपर, जो दरियाके तीर ।
जलकी जेती माछरी, रटै कबीर कबीर ॥
नाभाञ्च वचन
दोहा-वानी अरबो खरबो, ग्रन्था कोटि हजार ।
करता पुरुष कबीर, रहै नामे विचार ॥
नं. १० बोधसागर - ८
( ४६ )
बोधसागर
गरीबदास वचन
सारखी-गरीबपंजा दस्त, कबीरकासिरपर धारो हंस ।
जम किंकर चपै नहीं, अथर जात है वंश ॥
श्रीमहादेव उवाच
श्लोक-यः सुखसागरो दाता बीजज्ञानं तथैव च ।
आद्यन्तरहितो लोके यः कबीर इहोच्यते ॥
कलांशेन गतो भूम्यां विलासा सत्य संज्ञकः ।
दीनोद्धारतिदक्षः कबीरसंज्ञः इहोच्यते ॥
कर्ताकोन्यायकारी च व्यक्ताव्यक्तःसनातनः ।
रमते सत्यलोके यः स कबीर इहोच्यते ॥
पारवतीजीने पूछा कि कबीर किसको कहते हैं ? उनके उत्तरमें शिवजीने कबीर साहिबकी स्तुतिमें सौ एक श्लोक कहे हैं उस ग्रन्थको कबीर एकोत्तर कहते हैं जो सामवेद और पाताल खण्डमें हैं उसमेंसे यह तीन श्लोक लिखे हैं ।
इति
अथ वैष्णव आचार वर्णन-चौपाई
सहित बिचार आचार घनरे । उज्वल क्रिया तासुकी हेरे ॥
नित दातन मज्जन तन करही । शौच क्रिया भली भाँतिसे धरही ॥
मांस मद्य आदिक हैं जेते । जानि अभक्ष न संग्रह तेते ॥
जप तप ध्यान धुन्दधते धारे । ठाकुरकी पूजा विस्तारे ॥
मूरति होय कि मानस ध्याना । उभय भाँति हरि सेवा ठाना ॥
अथ मूर्तिपूजा आठ प्रकार वर्णन
दोहा-मनोमयी परतक्ष कही, चित्र बखानो काठ ।
माटी धात ध्यानमय, प्रतिमा पूजा आठ ॥
आगमनिगमबोध
( ४७ )
चौपाई
प्रथमहि पानी विद्या जानो । विनविद्या किमिहरि पहिचानो॥
द्वितिये पुष्पको अर्थ कहीजै । एक देवकी टेक कहीजै ॥
तृतिये चावल अर्थ सुनाओ । भोग अशुचिपरधान्यन खाओ॥
चौथे चन्दनते इमि जानी । काम क्रोधकी कीजै हानी ॥
कीना डाह द्वेष सब जोई । उरते दूर बहाओ सोई ॥
पंचम धूप अर्थ इमि कहिये । प्रीति देव गरमीते गहिये ॥
छठये दीपको अर्थ बताओ । बुद्धिदीप निजहृदय जगाओ ॥
अथ मुक्तिस्वरूप वर्णन—चौपाई
जीवते ब्रह्म होय जो कोई । मुक्तनाम भाषे श्रुति सोई ॥
चार भांतिकी मुक्ति प्रमाना । सालोको सामीप बखाना ॥
सारूपो सायुज्य कहीजै । ऐसो तिनको अर्थ गहीजै ॥
सालोकहिं प्रभु लोक निवासा । सामीपा हरिके ढिग वासा ॥
सारूपा प्रभु रूप हो भाषा । सायुज्यौ हरिमें मिल दासा ॥
जस वासना दास उर होई । तैसी मुक्ती पावै सोई ॥
जब उपासना पूर्ण भैऊ । जीवनमुक्त ताहि तब कहेऊ ॥
परम धामको जब सो जावै । हरिपारषद तासु ढिग आवै ॥
जब हरिधामको चालन लागे । थूल देहको तब सो त्यागे ॥
लिंगदेह तब धारण करई । पांचो तत्त्व देह परिहरई ॥
जब भूलोकते आगे चाला । पृथ्वी तत्त्व देह तब डाला ॥
बहुरि देह पानी की धारा । तब जसतत्त्व लंघिहो पारा ॥
बहुरि अग्निदेही गह सोई । पार अग्नि घेरा तब होई ॥
फेर वायुकी देहको धारी । पौन घेर बाहर पग धारी ॥
इमि तन त्यागत गहनव्रीना । सकल घेर बाहर पग दीना ॥
चलि ब्रह्मांड पार जब कीता । मायापार भो त्रिगुणातीता ॥
( ४८ )
बोधसागर
पुनि परमात्म प्रकाश बखाना । तामें जाय करे असनाना ॥
करि असनान लिंगतन छोडा । दिव्य देह अबिकारी जोडा ॥
ज्ञानानंद ब्रह्म तन पाई । निज स्वामी के द्वारे जाई ॥
आदरयुत प्रभुके ढिग आवै । हरिगुण विविधि मांतिसे गावै ॥
प्रभु दायामाया ते छूटा । कठिन दुःखते प्रभुपद जूटा ॥
ब्रह्मानंद मगन मन होई । यद्यपि ऐसो समरथ सोई ॥
रचे अमित ब्रह्मांड जो चाहे । पालपोषिके पुनि तिहि ढाहे ॥
तदपि ब्रह्म सुख ऐसो लहई । और दिशा नहीं तो चितबहई ॥
याहूमें व्यौरा बहु तेरा । कथा कछुक लिखिये तिनकेरा ॥
व्यौरा वेद कहे यहि भाये । जो कोई सुक्त स्वरूप समाये ॥
सागरमें जस बुंद समाना । पै वह बुंद आपको जाना ॥
बढ़ुरि कहै श्रुति ऐसो लेखो । ऐसी मुक्ति जीवको देखो ॥
पुष्पमाल जैसे हरि केलो । अथवा जैसे भूषन हेरो ॥
यहिविधिजिवहरि अंगमें जूटा । जिहि औसर मायाते छूटा ॥
इतिमुक्त
अथ परलोकमें पुण्यात्मा और परमात्माको वर्णन
दोहा-कथा कहौ परलोककी, जब जिव त्यागे प्रान ।
मुरछा मृतके गत भये, पुनि तिहि जक्त फुरान ॥
चौपाई
जीवकी जब मूरछा गत होई । इंद्रिन सहित आप तन जोई ॥
पिछली स्मृतिहि दियो बिसराई । जन्म धरंत आपको पाई ॥
बाल युवा बृद्धादिक माना । जाति पांति कुलमें लपटाना ॥
भ्रम करिके जित जगको देखा । जैसे कछु स्वपनेको लेखा ॥
जाग्रत स्वप्न भेद नहीं कोई । स्वप्नहुमें स्वपनांतर होई ॥
भ्रमही करि पितु माता जाना । मिथ्या भास गहे अज्ञाना ॥
आगमनिगमबोध
( ४९ )
मृतक होय जीव जिहि बारा । देह अन्त बाहक तब धारा ॥
बहुरि बासना प्रेरि लै आवै । अधि भौतिक देही दिखलावै ॥
अधि भौतिक देहि जब पाया । दुखसुखको कारन यह आया ॥
हृदय कमल अंगुष्ठ प्रमाना । जीव अकाश जौ नाम बखाना ॥
ताहि कमलमें भर्मत रहई । लोक अनन्त दृष्टिमें गहई ॥
तहैं कोटिन ब्रह्मांड निहारी । हृदय कमल निज माह विचारी ॥
तीन प्रकार पुण्य जन राशी । मूरख पुनि धानां अभ्याशी ॥
तृतिये सर्व शिरो सुनि ज्ञानी । भिन्न २ गति निर्णय ठानी ॥
धानां भ्यासीकी यह बाता । तन तजि इष्ट देव दिग जाता ॥
अपने इष्ट देव पुर जाई । नाना विधि सुख भोग कराई ॥
नहिं मूरख नहिं ज्ञानी जोई । सुखसे निज तन त्यागे सोई ॥
बहुरि जन्म जगमें सो पाई । पुनि सो आतम लाभ लहाई ॥
अब ज्ञानीकी कथा बखानी । तजत देह सब सुखकी खानी ॥
मुक्ति विदेह तासुको ठीका । जिनके हृदय ज्ञानको ठीका ॥
पापीको अब मरण बतावो । महा दुःख ताके उर छावो ॥
जिनको अज्ञानिनको सङ्ग । उत्तम बुद्धि होय जिहि भंगा ॥
पापी चार कर्म जो करही । श्रुति विरुद्ध मग माह बिचरही ॥
तजै देह जब ऐसे लोगा । तिनको घेर शूल सौ सोगा ॥
विषय बुद्धि जासु लपटानी । दुसह दुःख पावै सो प्रानी ॥
हो पदार्थसे तिनहि वियोगा । रुंधित कंठ स्मृत सुख भोगा ॥
नैन तासु दोउ तब फटि जाही । कांति विरूप अंग हो ताही ॥
अंग उपांग टूटै तिहि बारी । प्रान निकसिगहि मारग नारी ॥
होय पदार्थ वियोग दुखारी । अस अनुमान करे दुख भारी ॥
अग्नि कुंडमें डारे जैसे । दुःसह पावै दुखजिव जैसे ॥
सर्व द्रव्य तिहि भ्रमयुत भासा । नभ पृथ्वी पृथ्वी आकाशा ॥
( ५० )
बोधसागर
परम कष्ट पावै तिहि काला । नभते जनु कोइ महिमें डाला ॥
पाथर में धरि मनहु पिसाना । जिमि तून भोडरमें भरमाना ॥
अंध कूपमें जैसे गेरा । मानहु कोल्हूमें धरि पेरा ॥
रथते गिरे जीव जिमि नीचे । रस्सी ज्यों गलडारिके खींचे ॥
दुःख अनंत परकार बखानो । कह लो ताकी निर्णय ठानो ॥
मूर्छित होय गहै जडताई । ताके कर्म जुरहि सब आई ॥
जिमि किशान बीजनको बोवे । समय पाय ताको फल होवे ॥
प्रान अपान कला दोउ टूटे । विषय वियोग महा दुख जूटे ॥
मृत्यु समय जब जिव सुरछाना । गगन लीन हो पौन अरु प्राना ॥
ताहि प्रानमें चेतन ताई । चेतनता बासना गहाई ॥
सहित बासना चेतन प्राना । गगन रूप है गगन समाना ॥
यथा गंधको पौन गहाई । ताहि सहित नभ स्थित कराई ॥
तिमि चेतन बासन सहिते । जाय अकाश माह सो थीते ॥
तिहि अनुसार बहुरि जगफुरता । तब कालते सो तिहि जुरता ॥
दोय प्रकारके जीव दुखानी । पापी अरु पुण्यातम प्रानी ॥
पुनि तिनमें कर तीन विधाना । एक महा पापी करि जाना ॥
द्वितिय मध्य तृतिये लघु होई । तीन प्रकार पुण्य जन सोई ॥
एक महा पुण्यातम लोई । पुनि मध्यम लघुको मतिजोई ॥
प्रथम महा पापी दुख हेरे । धन पखान सो ताको टेरे ॥
जड समान सुरछामें रहई । वर्ष सहस्र न चेतन गहई ॥
ताहु सुरछामें दुख भूरी । बहुरि ताहि चेतनता फूरी ॥
जब ताके तनमें सुधि आवै । आको देह सहित लखि पावै ॥
तब सो जायके नरकमें परता । अमित काल तामें दुख भरता ॥
नाना भांति परम दुख पाई । बहुरि नरकते बाहर आई ॥
देह अनंत धरे पशु केरा । बहुरि सो मानुष को तन हेरा ॥
आगमनिगमबोध
( ५१ )
जब धारे सो मानुष देहा । महा नीच दारिद्री गेहा ॥
सोऊ तन धरि दुःखबहु भोगा । कबहु न सुख पावैसो लोगा ॥
अब मध्यपापी गति वरणो । जाहि समय होतोको मरणो ॥
जडीभूत हो वृक्ष समाना । उर अंतर दुख दौंदह काना ॥
कछुक काल पीछे सुधि आवै । अर्क माह निज वासा पावै ॥
नर्क भोगि पुनि पशुतन धारी । फिर नरदेह केरि अधिकारी ॥
अब सुन लछु पापीकी वाता । मूर्छित हो पुनि चेतन गाता ॥
नर्क भोगि पुनि पशु कलेवर । ताहि भोगिफिरमानुषतनधर ॥
अब पुण्यातमको कह मर्मा । जिनके जक्त मोह भल कर्मा ॥
महा पुण्यजन जब मरिजावै । स्वर्गसे तब विमान चलि आवै ॥
तिहि विमानपर ताहि चढाई । आदर सहित वाहि ले जाई ॥
जाहि देवताको सो ध्यावै । तासु लोक निज भौन बनावै ॥
अपने इष्टदेव ढिग जाई । सबहि भांतितिहिमुखसरसाई ॥
भोगि स्वर्ग आवै नर देशा । काहू फलमें करै प्रवेशा ॥
तिहि फलको पुरुष जो खाई । वीर्य द्वार तिहि उदर समाई ॥
जननी जठरते बाहर होई । उत्तम कुल धनवंता सोई ॥
जौं वासना रहित हो येही । तो सौं धरे संत गृह देही ॥
सहित वासना सुख सरसाया । रहित वासना भक्ति अमाया ॥
अब मध्यम धर्मी गति सुनिये । प्रेरित पुण्यस्वर्ग ग्रह गुनिये ॥
अब लछु पुन्यातप गति कहई । मृत्यु पीछे अस चेतन गहई ॥
सगे बंधु मम क्रिया कराही । ताते पितर लोक हम जाही ॥
पितरलोक सुख लहि महि आवै । जैसा कर्म देहै तस पावै ॥
पापी सुये दुःख चहुँ पास । महा कठिनमारगतिहिभासा ॥
जिहि मारग ताको लेजाई । कंटक लगे चरन में ताही ॥
तपै तेज रबि तापै भारी । ताते ताको तन जर छारी ॥