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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १२ )

बोधसागर

यकदेशी अनुभव अरु ज्ञाना । सो कछु कामको नहीं बखाना ॥
ब्रह्म सर्व देशी कह सोई । साक्षी सर्व अकर्ता होई ॥
सब करतूत प्रकृती ठाना । योग समाध साधना नाना ॥
उत्तपति अस्थित परलय कर्मा । सो सबही प्रकृतके धर्मा ॥
पांचों तत्त्व पचीस प्रकृती । चारों देह आदि सब नास्ती ॥
ईश्वरको जो जाननहारा । सर्वसाक्षि सो आस्ति पुकारा ॥
ये सब अनितमें नितको आस्ती । योग आदि सब मिथ्या नास्ती ॥
झूठे वेदान्ती ऐसे कहई । मिथ्यावाद सकल यह अहई ॥
एक अखण्ड ब्रह्म है जोई । तामें अस्ति नास्ति नहिं कोई ॥
आप आप सम्पूर्ण व्यापा । अमकरी त्रिपुटी तामें थापा ॥
ध्याता ध्यान घेय नहिं कोई । ज्ञाता ज्ञान होय नहिं जोई ॥
ब्रह्म अखण्ड अद्वैत एकरस । ताते द्वैत भाष भाषे कस ॥
नित्य नित्य समाधि है जोई । तामें सो सम्भवै न कोई ॥
देखन अरु देखनमें आये । देखनहार ब्रह्म बतलाये ॥
ब्रह्मते इतर और न कोई । नास्ति और सब मिथ्या होई ॥

सोरठा-वाद करे इमि सोय, चार वेद षट् शास्त्र मिलि ।

भेद न पावे कोय, अगम अपार अकथ कथा ॥

सत्य कबीर वचन

सारखी-वेद हमारा भेद है, हम वेदनके माहिं ।

जौन भेदमें मैं बसो, वेदौ जानत नाहिं ॥

अथ विष्णुके चौवीस अवतारको-वर्णन

दोहा-मीन कूर्म बाराह कह, नरहरि बामन बंक ।

परशुराम रघुराम कह, कृष्ण बुद्ध निष्कलंक ॥

व्यासकपिल हयग्रीव पृथु, यज्ञत्रहपभ सनकादि ।

दत्त मन्वतर बद्धिपति, धानन्तर इंसादि ॥

आगमनिगमबोध

( १३ )

चौपाई

हरि औतार बहुत जग माँही । तिनकी कथा कही नहिं जाही ॥
हरि औतार जेते जग भैऊ । राम कृष्ण सर्वोपरि कहेऊ ॥
सुजस जासु जगमाहिं बखाना । गुण गण गावै वेद पुराना ॥
हरिमहैं चक वर्त तिहु पुरके । कोई शत्रु नहिं सम्मुख फरके ॥
ताते तिनकी कथा न लेखो । वेद पुराण न अधनी देखो ॥
जहाँ तहाँ हरिमंदिर सेवा । पूजै विष्णु विश्वंभर देवा ॥
तीन देवमें होइ है सोई । घट घट माह विराजै ओही ॥
चारों विधिकी मुक्ति लहीजै । विष्णु देवकी सेवा कीजै ॥

इति विष्णुके चौबीस अवतार

अथ ब्रह्माके षट् अवतारके नाम

दोहा-गौतम कलि कृपाद मुनि, व्यासो जैमिनि जान ।
मंडनमिश्र मीमांसकहि, ब्रह्म जग प्रकटान ॥

इति

अथ शिवजीके ग्यारह रुद्रके नाम

दोहा-सर्पकपाली त्र्यंबको, कपि कर्पादि मृग व्याधि ।
बहुरूपो वृष शम्भु हरि, रैवत वीरभद्रादि ॥

इति ग्यारहरुद्र

अथ ब्रह्माके दैहिक और मानसिक पुत्रनके नाम-चौपाई

ब्रह्मा द्वे सुत प्रथम उपाये । एक दक्ष एक अत्रि कहाये ॥
दक्षते सूर्यको औतारा । अत्रिते बहुरि चन्द तनु धारा ॥
सूर चन्द कुल क्षत्री भैऊ । पुनि सातो ऋषि देही गहेऊ ॥
भृगु अत्री अरु पुलह बतावो । फिर अंगिरा पुलस्त कहावो ॥
नारद और वशिष्ठ उचारा । पुनिकहसनकादिक औतारा ॥
ब्रह्मा मानसी पुत्र बतावो । अत्री और अंगिरा गावो ॥

नं. १० बोधसागर - ७

( १४ )

बोधसागर

पुलह पुलस्ती कृत गनीजै । भृगु प्रचेत वाशिष्ठ कहीजै ॥
पुनि ब्रह्म तनु सुतकह नामा । दक्ष प्रजापति धर्मो कामा ॥
कोथ लोभ मद मोह उपाये । हर्ष मृत्यु दशनाम बताये ॥

इति

अथ चौदह विष्णुके नाम

दोहा-यज्ञ विभू शतसेन हरि, पुनि वैकुंठो होय ।
पुनि अजितो बामन कहो, सर्वभूमि ऋषि भोय ॥
पुनि अमूर्ति भ्रममें तहै, बहुरि सुधामा जान ।
योगेश्वर बृहद्दान ये, चौदह विष्णु बखान ॥

अथ चौदह इंद्रके नाम

दोहा-यज्ञो रोचनसतजितो, बहुरित्रिशिखविभु जान ।
तथा मंत्र दुम जानिये, फेर पुरंदर मान ॥
बलि अद्भुत शंभू कहो, पुनि वैधृत उच्चार ।
रिनुधामा पुनि धौसपति, श्रुची इंद्रदशचार ॥

अथ चौदह मनुके नाम

दोहा-मनु स्वयंभू सारोचको, उत्तम तामस रैवत् ।
चाक्षु शतवृत्त सावनीं, दक्ष सवरनी सत् ॥
ब्रह्म सवनीं धर्म सवनीं, रुद्रसावनीं होय ।
देवसावनीं इन्द्रसावनीं, ये चौदह मनु रोय ॥

इति

अथ सप्तस्वर्गके नाम

दोहा-भुवरलोक अरु स्वर्ग कहैं, महरलोक जनलोक ।
तपलोक सतलोक है, सात नामको थोक ॥

इति सप्तस्वर्ग

आगमनिगमबोध

( १५ )

अथ सप्त पातालके नाम

दोहा—अतल वितल सुतलोक ही, फेरि तलातल होय ।
महातला पाताल पुनि, अंत रसातल जोय ॥

इति सप्त पाताल

अथ नौघरोके नाम चौपाई

प्रथम भूमि भूलोक बखानी । दूजे भुवरलोक है पानी ॥
स्वर्गलोक पुनि अग्निको घेरा । पितर लोक पुनि वायू टेरा ॥
पंचम शून्य लोक आकाशा । अन्तर लोक हँकार प्रकाशा ॥
सप्तम सत्यलोक मह तचू । अष्टम लोका लोक कहचू ॥
ॐ शब्द तहवां ते होई । मायाको घेरा है सोई ॥
ताके परे नामै अस्थाना । शुद्ध स्वरूप निरंजन जाना ॥
शब्द निरञ्जन ते उत पानी । ताते तब माया प्रकटानी ॥
मायाते महतत्त्व पसारा । महा तत्त्व से भा हँकारा ॥
अहँकार आकाश उपायो । पुनि आकाश वायू प्रकटायो ॥
वायुते अग्नि अग्निते पानी । ताते यह भूलोक बखानी ॥

इति

अथ सप्तद्वीप और ब्रह्मांडको वर्णन

दोहा—प्रथमै जम्बूद्वीप कह, शाकद्वीप कर फेर ।
कौंच कुशा शलमरूप पुनि, पुक्षो पुष्कर टेर ॥

चौपाई

ताते परे योजन दश कोरी । कंचनकी पृथ्वी लै जोरी ॥
परम प्रकाश मान महि सोई । तासु परे परवत यक होई ॥
लोकालोक नाम सो भाषा । महाशून्य बन तापर राखा ॥
उग्र उद्दि यक ताते आगे । बहुरि अग्नि ताते पर लागे ॥

( १६ )

बोधसागर

पौन दसगुना पुनि पर ताही । तासु परे दशगुन नभ आही ॥
तासु परे योजन यक लाखा । सघन कंथ ब्रह्मण्डको राखा ॥

इति समद्वीप

अथ अष्टवसुओंके नाम

दोहा-प्रथम द्रौन पुनि प्रानकह, ध्रू अर्क अग्नि प्रमान ।
दोषा वसू विभावसू, अष्ट वसू ये जान ॥

इति अष्ट वसु

अथ चार युगोंकी आयुस्थितिर्वर्णन चौपाई

चारों युगकर लेखा प्रमाना । कृत त्रेता द्वापर कलि जाना ॥
सतयुगकी आयू इमि कहसे । सत्रह लक्ष अठाइस सहसे ॥
त्रेताकी आयू पुनि भाषा । छानवे सहस्र अरु बारहलाखा ॥
आठ लक्ष चौसठ हजारा । द्वापर आयू करो विचारा ॥
बत्तिस सहस्र चार लक्ष कहिये । कलियुगको यह लेखा लहिये ॥
चारों युग यक ठौर गहीजै । एक महायुग तासु कहीजै ॥
एक सहस्र महा युग होई । कल्प एक मुनि कहिये सोई ॥
चौद मन्वंतर कल्पमें होई । कल्प एक ब्रह्मादिक सोई ॥
ऐसे दिनको लेखा लीये । एकसौ वर्ष लौ ब्रह्मा जीये ॥
एक सहस्र ब्रह्मा है बीते । तब एक घडी विष्णुकी रीते ॥
ताके दिनते करि पुनि लेखो । निजुसौ वर्षविष्णु थित देखो ॥
जबदशलक्ष विष्णु बित जाही । घडी एक तब रुद्र सिराही ॥
ताहि वर्ष पुनि लेखा कीये । निजु सौ वर्ष रुद्र पुनि जीये ॥
ग्यारह रुद्र जो उगि खपिजाना । रमा शिवा यक घडी प्रमाना ॥
निजु सौ वर्ष कि आयू पाई । सहस्रशिवा जबउगिखपजाई ॥
तब मायाको पलभर होई । न्यौरा वेद बखाने सोई ॥
यह लेखा यक भयो प्रमाना । प्रभु माया गति काडुन जाना ॥

आगमनिगमबोध

( १७ )

चहुँ युगमें आयू नर केरी । लखदश सहस्र सहस्र सत केरी॥
याहूको नहिं कीन प्रमाना । आयू थित हैं विविधि विधाना॥

इति

अथ चौदह रत्नके नाम

दोहा-श्रीमणि रंभा वारुणी, अमी शंख गजराज ।
कल्पद्रुम शशि घेनु धन, धन्वन्तर विष बाज॥

इति चौदह रत्न

अथ पंचप्रकारके यज्ञ वर्णन

दोहा-अभ्यागत आदर कहै, बहुरि वेदको पाठ ।
आहुत भूतन यज्ञ कह, पितर यज्ञकी ठाट ॥

इति पंचप्रकार यज्ञ

अथ कर्म उपासना और ज्ञानको वर्णन—चौपाई

मारग तीन वेद जो भाषा । प्रथमहि कर्म कांडको शाषा ॥
पुनि उपासना ज्ञान कहाही । तिहुके तीन देवतन माही ॥
क्रम इन्द्री क्रम कांड गहाये । अन्तःकरण उपासक गाये ॥
ज्ञान इन्द्री सो ज्ञान गहंता । यह तिहु देवको भेव भनंता ॥
सूरख कहाँ उपासक होई । कर्म ज्ञान यामें नहिं कोई ॥
कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । चौदह इन्द्रीते कहि दीनी ॥
जबलो नहिं तिहुकोसम ताई । कोई कर्म शुद्ध नहिं पाई ॥
एक हाथ जो चोरी करई । देह समस्त बन्दिमें परई ॥
कर्म उपासना ज्ञान गहाई । भली भांति तिहुमेल मिलाई ॥
हट हौ गहे मुक्ति जिव पावैं । अब कर्मनको भेद बतावैं ॥
जो कोई पित्रकिमुक्तिकि हेता । तन मन धन अपने सब देता ॥
पितृ लोकमें सो चलिजाई । पुनि जो जैसो कर्म कराई ॥
कोई गंधर्वके लोक समाही । देवकभी परजा पति पाही ॥

( १८ )

बोधसागर

हिरण्य गर्भं गुरु पंडित जासी । यज्ञ करंत चन्द्रपुर वासी ॥
जीव आतमाको गुण येही । जेहि औसर जैसी गह देही ॥
भ्रम भयते संयुक्त जो होई । भ्रमही रूप बनावै सोई ॥
ज्ञान बुद्धि जब होय संघट्टा । ज्ञान रूप हो भ्रम भय कट्टा ॥
पुण्य पाप कर्मनते जूटा । बँधा जीव ग्रह ताही खूटा ॥
तिहि अनुसार कर्म सब करई । जैसो कर्म धाम तस धरई ॥
जैसी देह कर्म कर तैसा । सदा आत्माको गुण ऐसा ॥
जीव वासनाते नित पूरन । जस वासना ताहिते जूरन ॥
मनमें यथा मनोरथ होई । अंतकाल फल पावै सोई ॥
रही लगी जह जीवकी आशा । सूक्ष्म तन धरि तहकरबासा ॥
पुत्र कामना जाको होई । पुत्र देह धरि प्रकटै सोई ॥
पुत्रको ऐसो उचित बतावै । पिताकि मन कामना पुरावै ॥
पिता मनोर्थ जो सुतन पुरावै । तौ पितु बहुरि देह धरि आवै ॥
पितु अपने मनोर्थ को हेरे । धरे देह निज इच्छा प्रेरे ॥
ज्ञान अरु परमारथ के कारण । जीव कीन मानुष वपु धारण ॥
अबलों कथा प्रसंग जो रहेऊ । बंधकामना व्यौरा कहेऊ ॥
वर्णन अब कीजे कछु तिनको । रहित कामना मन है जिनको ॥
सकल कामनाको जो त्यागे । कारण द्वै तिहि माह विभागे ॥
होय कामना जो कछु हीये । फेर न चाह भोगिभल लीये ॥
द्वितिये ज्ञानदृष्टि मनकामा । तुच्छ दृष्टि देवै सब तामा ॥
मिथ्या सकल जो कछु दरशाई । जानि अनित्य न नेह लगाई ॥
आतम ज्ञान सर्व पर जानी । ताते सर्व लाभको मानी ॥
आतमते सब कुछ प्रकटाना । ताहि लाभ सब लाभ लहाना ॥
सकल कामना जो कोइ त्यागे । आतम ज्ञान तासु उरजागे ॥
जो कछु चितमें चाह चपेरे । तौ बीन तन यह जिव हेरे ॥

आगमनिगमबोध

( १९ )

जाके हृदय कामना नाहीं । ब्रह्म स्वरूप कहीजै ताहीं ॥
रहित मनोरथ अमर है सोई । मयनहार कातिक जिव होई ॥

छन्द-सब चाह उत्तरते दाह भै तब सुक्ति याकी सन्ध है ।
जब लोन करिये बामना तिहि कामना जिव अन्ध है ॥
यहि लोककी वहि लोककी तिहि शोकमें यह बन्ध है ।
चाहे चमारी चूहरी तिहि फूहरी डुरगन्ध है ॥
जिमि सर्प त्यागे केखुली इमि चाह उत्तरे त्यागिये ।
तजिताहि फणि फिरि चाह नहि यौ पुनि ना तामें पागिये ॥
मद मार विषय बिकार डारके रूपते अनुरागिये ।
दलमलितखलदलललितज्ञानते ब्रह्महो जिय जागिये ॥

जो निष्काम कर्मको करही । तिनको कबहुँ न घाटा परही ॥
चाह न कर्म पलनते जाही । निश्चय अधिक फल कर्मते ताही ॥
नफाहेतु जो कर्मको गहते । घाटा हू पुनि सोई सहते ॥
जिनको फलनकी इच्छा नाहीं । जो प्रभुकृपासे तिहि मिल जाही ॥
सो फल नफामें लेख लगाये । ऐसी समुझ सुक्तिपद पाये ॥
जप तप तीर्थार्थदिक व्रत दाना । सहित मनोरथ जाने ठाना ॥
इनको फल जो कोई चाही । सो जिव असुर लोकमें जाही ॥
कर्मके बन्धनमें सो बांधा । बूथा सो निज इन्द्रीको साधा ॥
बादिसो आपनो ग्रह सुख खोई । अन्धकारमें अधिक बिगोई ॥
जो कोई है आतम ज्ञानी । सर्वमई सो आपुहि जानी ॥
पुण्य पाप सुख दुःख सब जोई । नर्क स्वर्ग आदिक जो होई ॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र अभिमानी । सो सब अपनी देह बखानी ॥
भ्रम रज बन्धा जीव अज्ञानी । सो टूटे आतम जब जानी ॥
जिनमें नहि साधूकी करनी । बचन बनाय ज्ञान बहुबरनी ॥

( २० )

बोधसागर

साधू नहीं भाँड है सोई । ताते अधिक न शठ है कोई ॥
तिनते भलो जानिये सोऊ । आगम फल आसा कर जोऊ॥
कर्म उपासना ज्ञान जो होई । भिन्न भिन्न तिहि फल कर जोई॥
ज्ञानते इतमें भेद बिचारा । तिनको फलहुबतावज्योन्यारा॥
सो अक्षर अभ्यासी अहई । ताहि न अर्थी पण्डित कहई॥
कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । एकै फल तीनते कहि दीनी ॥
सनबन्धी यक दूजा हेरो । ज्ञानको अर्थ जाननो टेरो ॥
कर्मको मर्म न हृदय गहाया । नहीं उपास्य गुणको लखिपाया॥
कर्म उपासना झूठे तिनके । कछु व्योरा हियमें नहि जिनके॥
कर्मको अर्थ याहि बिधि कहना । चाल चलन सुकर्म सब गहना ॥
जाके हृदय हो उत्तम ज्ञाना । करनी तासु विरुद्ध लखाना ॥
ताहि ज्ञानते गुन कछु नाही । कर्म उपासना वृथा कराही ॥
साची प्रीत उपासना सोई । होय एकता रहै न दोई ॥
जबलो नहीं यह गुन दृश्याई । कर्म उपासना ज्ञान वृथाई ॥
जो कोई विषयनको त्यागे । ताके हृदय ज्ञान यह जागे ॥
ज्ञान दृष्टि करि तब सो जाना । कर्मापासन योगो ज्ञाना ॥
चारों चार तत्त्वसे कहिये । रचना सकल सृष्टितिहि लहिये ॥
चारों मिश्रित सम सुख दाई । घटि बटि भये न सुख कोइ पाई ॥
बिना ज्ञान करा कर्म जो लोगू । कर्मापासन अथवा योगू ॥
सोनिशि दिन जौ निजुतन कसही । आशा तृष्णा युति बुधि नशही ॥
कर्मापासन योग समाधा । ज्ञान सहित जो कोई साधा ॥
सो सब विषम अविद्या जानी । जीयत जीवन मुक्त सो प्रानी ॥
मुये विदेह मुक्ति लह सोई । जिनके हृदय ज्ञान अस होई ॥
मरण काल जिहि औसर आवै । देहकि नेह जीवको छावै ॥
तनकी प्रीतिसे दुःख बड माने । काहूको नहीं तब पहिचाने ॥

आगमनिगमबोध

( २१ )

जीव आत्मा यह तिहि बेले । इन्द्रिको निजु संग सकेले ॥
सब इंद्री तजि निज खुटे । जाय जीव आतम ते जूटे ॥
उरमह दिसे बुद्धिके रूपा । मूर्ति एक तामें सब गुपा ॥
तनधारि तन आपुहि जाना । इन्द्रि सकल रहित भे ज्ञाना ॥
दृष्टि तब खनते हिलही । सूक्ष्म तन गति सूरजते मिलही ॥
सूर्यन पृथ्वी माह समाई । रसना स्वाद वरुणा में जाई ॥
वाक् अग्निमें पौन समीरा । दिशा सौन मन शशिके तीरा ॥
भूताकाश बुद्धिकर थाना । जिव सब संगले करे पयाना ॥
जो जिव भले कर्मको करता । दृगसार बाहर पग धरता ॥
सूर्य माह सब जाय समाई । इमि सब इंद्री राह गहाई ॥
भले कर्म जिनके अधिकार्ई । ब्रह्मरंध्र कटि बाहर आई ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसी राह गहै पुनि सोई ॥
जिवको बासा तनते छूटे । आवा गौन श्वासको टूटे ॥
जड समान देही रहि जाई । जीव नवीन कलेवर पाई ॥
अहं बोलिके जीव सिधारै । हौं मैं प्रथमहि शब्द उचारै ॥
सहित कर्म जिव करे पयाना । तजि तनथूलसौलिंग लहाना ॥
निज कर्मनके प्रेरित येही । सदा नवीन धरे जिव देही ॥
जिमियक भूषण भंजि सोनारा । निज इच्छाते और संबारा ॥
तैसे देह जीव यह गहई । पुनि पुनि गहै तजै श्रुतिगहई ॥
पूरन काल जीवको बाजा । उर्ध्व गमनको करै समाजा ॥
अधर लोक दोड लोकके बीचे । कर्म तहां जब जिवको खींचे ॥
ज्यों जाग्रत स्वप्नने भरमाई । अपने कर्मको फल इमि पाई ॥
सरगुन गहिकर सुरनमें बासा । असुरको गुनगहिदुःखबहुँपासा ॥
प्राण स्वप्नमें देखत सोई । जाग्रित माह बिचारे जोई ॥
ताहि समान गहैं सो देहा । दुख सुखको है कारण येहा ॥

( २२ )

बोधसागर

स्वप्न समान नर्क अरु स्वर्गा । इच्छारहित अहित अपवर्गा ॥
ऐसे निज अनुमान गहाये । नर्क स्वर्ग अरुमध्य गहाये ॥
मारग मुक्ति कहावे सोई । सूर्य मंडल बेधे जोई ॥
ब्रह्म लोक की मारग पाई । ताहि संग निज बास गहाई ॥
जिमि दीपक घटज्योति अपारा । जीव आतमा रूप सोधारा ॥
नसाजाल आतमकी ज्योती । सो बहुरंग ढंग की होती ॥
श्वेत हरित दुति प्रीती देखाये । भूरा रंग तासु प्रगटाये ॥
नसन प्रकाश तासु उर होई । मुक्त होत पहुँचे जो कोई ॥
सुषुम्णामें मिलि एकसौ नारी । उत्तम मध्यम लोक सिधारी ॥
केती नशा अधोमुख आहीं । अधोगती को सो ले जाहीं ॥
गहै गैल तिहि मारग जबहीं । अधोगती जिव पहुँचे तबहीं ॥
यहि विधि नर्क स्वर्ग जिव जाही । थित प्रमाण दुखसुखलह ताही ॥
पूरण जब करार हो आवै । तब मृत मंडल वासा पावै ॥
कर्मके बंधन जिव तन धरही । चार खानिमें दुख सुख भरही ॥
स्वेदज जरायुग अंडज पिंडज । नाना बरन रूप निजु २ सज ॥
अंतमें जीव सुरति रह जाही । प्रगट होय सो धरितन ताही ॥

इति

अथ जीवको योनिप्रवेशवर्णन-चौपाई

योनि प्रवेश जीव जब करता । कोई ध्रुत्र मारग पग धरता ॥
देह वानमें जाय समाई । वीर्य रूप है सो प्रगटाई ॥
मेघ बून्द मारग ते कोई । हो रसरूप औषधि सोई ॥
तेहि भोगीके वीर्य मैझारा । केते प्राण वायुके द्वारा ॥
पौन पंथ गहि केते समाई । केते धान खेत प्रवेशाई ॥
चावल आदिक अन्नमें रहई । नाना वर्ण रूप सो गहई ॥
केते गगनमें स्थित गहाई । चंद्र किण्मैं रहे समाई ॥

आगमनिगमबोध

( २३ )

किर्णमार्ग औषधहि समाही । किते पुष्प फलमें भरजाही ॥
तनधारी तिहि भोजन करही । जड आतमके वीर्यमें भरही ॥
सो सुखोसि में वेष्टित सारे । पिंजर गर्भमें सोई सिधारे ॥
दूध यथा है घृतमें पुरा । तिमि वीरजमें सब जिव जुरा ॥
वीरज दूरबीन ते देखो । चलतहिलतजिवअनितनिरिखो ॥

इति

अथ शरीरवृक्षवर्णन-चौपाई

एक प्रणवते सब संसारा । सबको आदि सर्व करतारा ॥
ब्रह्म सोई ओंकार कहीजै । मन ओंकार न भेद गहीजै ॥
ओंकार मन कर्म निरंजन । कर्म स्वरूप जबतको रंजन ॥
कर्मते फुटी तीन पुनि शाखा । रज सत तम जगकारन राखा ॥
कर्मते करत होय निहकर्मा । आगम ज्ञान गहि दूटे भर्मा ॥
तृष्णा ग्रन्थि कर्ममें परई । सोई जीवको बंधन करई ॥
आतम परमातम यह रूपा । विषयमें भूलि परा भ्रम कूपा ॥
विषय वा सना त्यागे जोई । ब्रह्म स्वरूप जानिये सोई ॥
आतम परमातमा विहंगा । दोनों एक स्वरूप यक ढंगा ॥
एक है पंछी एक है छाया । छाया नहीं आया लखिपाया ॥
मूल थूल जहैं तहैं प्रभु आपू । भ्रमकरि न्यारा न्यारा थापू ॥
पड़ा जीव यह त्रिगुनके फंदा । भूला रूप चिदानन्द कन्द ॥
काया वृक्ष ऊर्ध्व है मूला । हेठ शाख पत्री फल फूला ॥
मूल परम पुरुषको भेवा । पेड निरंजत शाख त्रिदेवा ॥
पाती जान सकल संसारा । सत्य कबीर वचन उचारा ॥

सत्य कबीर वचन-शब्द

सार शब्दसे बाचिहो मानो इतबारा हो ।
अक्षय पुरुष यक वृक्ष है नीरंजन डारा हो ॥

१. शरीर वृक्ष का चित्र देखो "कबीर मानु प्रकाश" में।

( २४ )

बोधसागर

शाखा तिरदेवा बने पाती संसारा हो ।
ब्रह्मा वेद सही किया शिव योग पसारा हो ॥
विष्णु माया उत्पति किया उरला न्यौहारा हो ।
तीन लोक दशहु दिशा रोकै यमद्वारा हो ॥
ज्योतिस्वरूपी हाकिमा जिन अमल पसारो हो ।
अमल मिटावो ताहिको पठावो भवपारा हो ॥
कहै कबीर तिहि अमर करो निज होय हमारा हो ।

चौपाई

यजुरवेद भाषै भल ढंगा ।जिमि आतम परमात्मा बिहंगा॥
बहुरि यकादश गीता कहई ।जैसे फाँस जीव गल गहई ॥
क्रामिक जीव बँधा बहु बन्धन ।फँसा आशा तृष्णाके धंदन ॥
साखी-माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गई शरीर ।
आशा तृष्णा ना मुई, यौं कथित कहै कबीर ॥

इति शरीर वृक्ष वर्णन

अथ संप्रदाय धर्मवर्णन—चौपाई

वेदमें दोय संप्रदा जानी ।यक श्री यक शंकरी बखानी ॥
श्री सम्प्रदा विष्णुकी होई ।शिव सम्प्रदा शंकरी सोई ॥
दोहुमें चार चार विधि भाखो ।न्यारो न्यारो नाम सो राखो ॥
प्रथमें विष्णु सम्प्रदा कहिये ।चार भाग पुनि तामें लहिये ॥
प्रथमें श्री संप्रदा बखानो ।रामानुज आचार्य मानो ॥
द्वितिये शिव संप्रदा प्रचारी ।विष्णु श्याम ताके आचारी ॥
तृतिये ब्रह्म संप्रदा साका ।माधवानंद आचार्य जाका ॥
सनकादि संप्रदा चतुर्थे ।निबादित्य अचार्य पुछे ॥
प्रथम कहो श्रीसत अर्थाई ।रामानुजकी कथा सुनाई ॥

इति

आगमनिगमबोध

( २५ )

अथ रामानुजजीकी कथा-चौपाई

होन लगी जब धर्मकी हानी । शेषते तब कह शारंग पानी ॥
धरणी जाय धरो औतारा । करो तहाँ श्रुति धर्म प्रचारा ॥
भगवतकी जब आज्ञा पाये । तब धरणी धर धरणी आये ॥
केशव यज्जवा विप्र कहाऊ । कान्तिमती माताको नाऊ ॥
ताके गृहमें सो तनधारी । धर्म धुरंधर परम अचारी ॥
आठ सौ वर्षके ऊपर होने । कांचिपुरीके उत्तर कोने ॥
देश उडीसे के दिश लच्छिन । भूत नगरी औतार धरे तिन ॥
जक्त माँह आचार चलाये । पुनि पुरुषोत्तम पुरमें आये ॥
तहाँ जाय निज मनहि विचारा । जगन्नाथमें चले अचारा ॥
जगन्नाथ नहि मान्यौ सोई । मेरे पुर आचार न होई ॥
तब हरि ऐसी कीन्ह उपाई । रामानुज कह लियौ उठाई ॥
निज पुरते रात्रिके माही । धर दियो रंग पुरीमें ताही ॥
रामानुज को निजु अस्थाना । तोतादरी दक्षिणमें जाना ॥
एकसौ बीस वर्षलों जीये । गुरु पीढी इमि वर्णन कीये ॥

इति

अथ रामानुजजीकी गुरुपीढी वर्णन

दोहा-प्रथमें नारायण कहो, द्वितिये लक्ष्मी जान ।
विश्वसेन तृतीय कहो, पुनिसठकोप बखान ॥
पञ्चम श्रीनाथो कहो, पुंडरीकाक्ष है षष्ठ ।
राममिश्र सतयें कहे, यमुना चारय अष्ट ॥
नौमें पूर्णाचार्य है, रामानुज है तासु ।
ग्यारहें देवाचार्य है, हरियानन्द है जासु ॥
तासु राघवानन्दजी, ताके रामानन्द ।
पन्द्रहें रामानन्दके, शिष्य अनन्तानन्द ॥

( २६ )

बोधसागर

बहुरि अनन्तानंदके, कृष्णदासजी शिष्य ।
बहुरि कीलजी तासुके, लगता गद्दी दिरुय ॥
कीलते पुनि पंद्रह गनो, लगता जयपुर माहि ।
हरिप्रसादलों लेखिये, चौदह पीढी ताहि ॥
उन्नीस सौ तेरह सँवत लों, लेखा कीजै तास ।
ईश्वर जत्तसे भिन्न है, द्वैत धर्म परकाश ॥

इति

अथ त्रिदण्डीको वर्णन-चौपाई

श्री सम्प्रदाके जो संन्यासी । गृह तजिके जब होहि उदासी ॥
दण्ड हाथमें धारे सोई । सो यक ढाककी लकरी होई ॥
तीन शाख तिहि लकुटी माहीं । नाम त्रिदण्डी तासु कहाहीं ॥
जो कोई सो दण्ड गहाये । नाम त्रिदण्डी तासु कहाये ॥
वस्त्र श्वेतके सिंगरफ रंगा । भगवों आदिक धारे अङ्गन ॥

इति त्रिदण्ड

अथ रामानन्दजीकी कथा-चौपाई

रामानन्द विप्र औतारा । मथुरा नग्रमें सो तन धारा ॥
धन विद्याते पूरन रहेऊ । सब लुटाय संन्यासी भयऊ ॥
यक औसर गुरु रामानन्दा । विचरत मिले राघवानन्दा ॥
ताहि राघवानन्द बताई । काल तुम्हारा पहुँचा आई ॥
मृत्यु सुनत रामानन्द डरेऊ । राघवानन्दसे बिनती करेऊ ॥
मैं विद्यामें जन्म गँमायौ । भजन विहीन मृत्यु नियरायौ ॥
मोपर दया करो गोसाई । काल फन्दते लेहु छोड़ाई ॥
राघवानन्द कृपा तब कीने । ताहि आपनी दीक्षा दीने ॥
ऐसी युक्ति बहुरि सो करेऊ । तासु प्राण ब्रह्मांडमें धरेऊ ॥
मृत्यु काल बीता जब सारा । तब ब्रह्मांडसे प्राण उतारा ॥

आगमनिगमबोध

( २७ )

अधिक कृपा गुरु तापर कीनो । रामानन्दको यह वर दीनो ॥
आयू साठे सात सौ वर्षा । बकसिदीन गुरुको हिय हर्षा ॥
गुरु सेवा चिरकाल बिताये । पुनि रामानन्द काशी आये ॥
रामानुज की सम्प्रदा माही । अधिक अचार देखिये ताही ॥
कछुक खेदको कारण पाई । रामानन्द अचार भुलाई ॥
आचारिनमें जब पग दीने । पगसे तब तिहि बाहर कीने ॥
दोहा-बहुरि राघवानन्दजी; रामानन्दसे भाष ।

अब न्यारी निज सम्प्रदा, कीजै मन अभिलाष ॥
चौपाई

रामानन्द सम्प्रदा न्यारी । तादिनसे मैं अलग अचारी ॥
रामानन्दको घना पसारा । धर्म आपनो जग विस्तारा ॥
रामानंदके शिष्य घनरे । सिद्ध प्रसिद्ध भे जक्त बडेरे ॥
अनंता अरु सत्य कबीरा । सुरसरा सुखानन्द मतिधीरा ॥
भावानन्द पीपा रविदासा । धनाआदि गुनगन परकाशा ॥
केते सिद्ध साधु गुनधारी । रामानंद पसारा भारी ॥
बावन द्वारा जाको भाषा । रामानन्दको बहु शिष साषा ॥

इति

अथ श्रीसम्प्रदायको धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

अयोध्या धर्मशाला चित्रकूट सुखविलास गोदावरी प्रदक्षि-
णाक्षेत्र धनुषतीर्थ रामनाथ धाम अच्युतगोत्र शुक्लवर्ण सीता इष्ट
जानकी मन्त्र राम उपासना मंत्र राघवानंदमहाप्रसाद अनन्त
शाखा सामीप्य मुक्ति श्रीनंदर लक्ष्मी आचार्य विश्वामित्र ऋषि
योगवाशिष्ठ मुनि हनुमान देवता हनुमान मन्त्र राम गायत्री
ऋग्वेद हरिनाम अहार विष्वसेन पार्षद रामानुज वैष्णव ।

इति

( २८ )

बोधसागर

अथ शिवसंप्रदाय वर्णन—चौपाई

विष्णुकांचि दक्षिणके माहीं । विदर्भाजको मन्दिर ताहीं ॥
तहँवा परमानन्द सुनीशा । भजन ध्यान धारे जगदीशा ॥
तापर शिवजी कीनी दाया । हरि उपासना भेद बताया ॥
शिवजी मुख्य अचारज पाका । ताते चली सम्प्रदा शाका ॥
विष्णु श्याम सम्प्रदामें येही । अधिक प्रसिद्ध भयो मतिजेही ॥
भई प्रसिद्ध ताहिके नामा । विष्णु श्याम आचारय यामा ॥
धर्म तासु अद्वैतक होई । ईश्वर जक्त भेद नहिं कोई ॥
जबहि बल्लभा चारय भयऊ । कछु उपासना भिन्न सो कियऊ ॥
गोकुल ग्रामहि सो पग दीने । वृन्दाबनमें बासा कीने ॥
यह सम्प्रदा चाल यह धरही । बालकृष्ण की सेवा करही ॥
भिन्न भिन्न गद्दी तहां अहई । नारि पुरुष हरिसेवा गहई ॥
नन्द यशोदा आपको जानी । पुत्र सो प्रियहरि सेवा ठानी ॥

इति

अथ विष्णु श्यामजीकी कथा और गुरुपीठीवर्णन—चौपाई

विष्णु श्यामद्विजकुलऔतारा । दक्षिण देशमाह पगु धारा ॥
गुरु पीठी ताकी इमि कहिये । शिवके परमानन्दको लहिये ॥
ताके पुनि आनन्द सुनीशा । पुनि प्रकाशसुनि श्रीकृष्णदीशा ॥
नारायणसुनि जैसुनि श्रीसुनि । इमि उनचास पीठी बीती गुनि ॥
उनचासवीं पीठी जब आई । विष्णु श्याम तबहीं प्रकटाई ॥
ताके शिष्य लक्ष्मण भट भैऊ । तासु बल्लभाचारय कहेऊ ॥
ताके विठ्ठलनाथ प्रसंशा । ऐसे प्रकटे पन्द्रह वंशा ॥
पन्द्रहवीं पीठी जब आई । मनसा राम तबै प्रकटाई ॥
विष्णुश्यामसे ये पन्द्रह भो । सम्भवत उन्नीससौ तेरहलो ॥

इति

आयमनिगमबोध

( २९ )

अथ शिवसम्प्रदायको धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

विष्णुकांची धर्मशालामार्कडेयक्षेत्र इन्द्रधनु सुख विलास पुरुषो-
तम धाम लक्ष्मी इष्ट जगन्नाथ उपासी तुलसी मंत्र त्रिपुरारि शाखा
वामदेव आचार्य सायुज्य मुक्ती नेत्रद्वारा हरिनाम अहार यजुर्वेद
अच्युत गोत्र शुक्ल वर्ण बट कृष्ण परिक्रमा जलबिंदु ऋषि नारद
देवता विष्णुश्याम वैष्णव ।

इति

अथ ब्रह्मसंप्रदायवर्णन चौपाई

कह अब तृतीय सम्प्रदा सोई । ब्रह्मा आदि अचारय होई ॥
आदि काल नारायण देवा । ब्रह्मासे भाषे यह सेवा ॥
यहि सम्प्रदा आचार्य सयाना । भये माधवानंद प्रधाना ॥
मै सम्प्रदा विदित तिहि नाऊ । माधवाचार्य गहे भल भाऊ ॥
कांचि पुरीके पश्चिम दक्षिण । द्विज कुलमें औतार गहे तिन ॥
द्वैताद्वैत धर्म निज केरे । ईश्वर निज मायाको प्रेरे ॥
तब यहि जगकी रचना होई । ईश्वर भिन्न मिला पुनि सोई ॥
गुरु पीठी अब कहो बखानी । आदि अचारय सारंगपानी ॥
द्वितियेब्रह्मा तृतिये नारद । चौथे व्यास जो बुद्धि विशारद ॥
सुबुधा चार्य नरहरा चारय । सप्तम कहै माधवा चारय ॥
माधवाचारजते लेख उचारा । पूर्नानन्द लो वंश अठारा ॥

इति

अथ ब्रह्मसंप्रदायके धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

अवंतिका पुरी धर्मशाला बद्रिकाश्रम धामा नैमिषारण्य सुख-
विलास अङ्गपात्रक्षेत्र सावित्री इष्ट ब्रह्मोपासी विष्णु हंस मंत्र हंस
देवता सालोक मुक्ति मोक्ष द्वारा स्त्री कालाचार्य अद्वैत शाखा

( ३० )

बोधसगार

अच्युत गोत्र शुक्ल वर्ण हरिनाम अहार परमहंस ऋषि नारायण
पार्षद अथर्वण वेद माधवाचार्य वैष्णव ।

इति

अथ सनकादिक संप्रदायवर्णन—चौपाई

चौथी संप्रदाय सनकादिक । निंबादित आचार्यमरयादिक ॥
अरुण ऋषीधर द्विजकुल टेरा । निकट गोदावरि नय मुंगेरा ॥
धर्म वशिष्ठ द्वैत सो धारा । अहि कुंडलनहिं अहितेन्यारा ॥
जग ईश्वर नहिं भिन्न रहाई । सदाकाल दोहुकी यकताई ॥
गुरु पीठी यहि भांति बतायन । प्रथम हंस औतार नरायन ॥
पुनि सनकादिक नारद कहिये । चौथे निम्बादित को लहिये ॥
निम्बादितसे लेखा ठनिये । पैतिसपिदिरिब्यासलोगनिये ॥
भये प्रतापवान हरिब्यासा । ताते भल यह धर्म प्रकाशा ॥
जो हरि ब्यासके शाखा भैऊ । नाम तासु हरिब्यासी कहेऊ ॥
सो भूराम हरि ब्यासके अंशा । ताहूको गुन अधिक प्रसंशा ॥
पुनि हरिब्यास ते लेख लगाई । संवत उन्नीस सो तेरह ताई ॥
बारह पीठी गई सिराई । माखनदास देह तब पाई ॥

इति

अथ सनकादिक संप्रदायके धाम क्षेत्र वार्ता

मथुरा धर्मशाला क्षेत्र गोमती वृन्दावन सुखविलास गोर्वधन
परिक्रमा द्वारावती धाम रुक्मिणी इष्टगोपालउपासी वंशगोपाल
मंत्र गोपाल गायत्री हंस शाखा सारूप्य मुक्ति नासिका द्वारा
सनकादिक आचार्य नारद मुनि दुर्वासा ऋषि गरुडदेवता साम
वेद श्रीभद्र महाप्रसाद अच्युत गोत्र शुक्लवर्ण हरिनाम अहार
निंबादित वैष्णव ॥

आगमनिगमबोध

( ३१ )

अथ चारों भाईका धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

माता वरुणावती पिता अगस्त्य गुरु धर्मऋषि स्वर्ग
नगरी अच्युत शुक्ल वर्ण अनंत शाखा सामवेद ॥ निष्काम
भिक्षा धाम रंगनाथ सुखविलास कोटपाट हरिनाम आहार परम
बदिकाश्रम क्षेत्र मठ वैकुण्ठलक्ष्मीदेवी नारायण ॥ देवता पूजा
अक्षय बटकी श्रीरंग सम्प्रदाय ऊख खाडा शून्य स्थान सुमेर
परिक्रमा बीजमंत्र ॥

इति

अथ चारों संप्रदायके तिलक स्वरूप-चौपाई

श्री संप्रदायके जो आचारी । चरणचिह्न प्रभु तिलक सँवारी ॥
दोय लकीर ऊर्ध्व गत हेरे । श्री अरु नारिबीच तिहि केरे ॥
हेठ तिलक हरिको सिंहासन । जोरी बनावै निछुलीलारन ॥
मध्यमें लाल वरन श्री करही । दीपशिखाजिहिविधिलखिपरही
एता पीता वरन श्री होई । रामानन्द संप्रदा सोई ॥
द्वितिये विष्णुश्यामविधि जोहे । दोय लकीर लीलारमें सोहे ॥
हेठ सो सिंहासन शून्य है बीचे । जाति बरनते चित नहिं खींचे ॥
साधू होहि विरक्त न होहि । कह मरयाद पालना होहि ॥
तृतिये माधो संप्रदा कहिये । दोय लकीर ऊर्ध्वगत लहिये ॥
हेठ सिंहासन ताहि बनाई । चरणचिह्न प्रभु माथ सोहाई ॥
चौथे निम्बादित्य जो साजे । दोय लकीर लीलार विराजे ॥
हेठ सिंहासन बन्दु विचाला । ऊर्ध्व पुंड्र अरु वैष्णव चाला ॥

इति

अथ वैष्णवके द्वादश तिलक वर्णन

दोहा-ऊर्ध्वपुंड्र मस्तक प्रथम, ब्रह्मश्रुपुनि जोय ।

१ तिलकोंका चित्र देखो 'कबीर मानु प्रकाश' में ।